Monday, June 8, 2026

क्या अपमान से निपटने के लिए उग्रता के अलावा कोई रास्ता है?

समीक्षा निबंध: प्रसांता चक्रवर्ती

रॉक्सेन एल. यूबेन. ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स. 

(प्रिंसटन और ऑक्सफ़र्ड: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2025.)

क्या अपमान और यातना के स्तर पर हम सब एक समान हैं: उस स्थिति में जब "सम्मानीय व्यक्ति के साथ चोर जैसा व्यवहार होता है और चोर को एक महानायक की तरह पेश किया जाता है", और इस बीच हम तानाशाहों की अत्याचारियों से अदला-बदली करते रहते हैं? व्यक्ति और उसके साथ ही एक पूरी की पूरी "क़ौम" को समानता के ज़रिए परिभाषित किया जा सकता है- अपमान में, महत्वहीनता और साझी क़िस्मत के मामले में. या क्या हम किसी तरह अपमान का मुक़ाबला करने के बारे में सोच सकते हैं, ताकि उल्टे अपमान की प्रक्रिया का सहारा लेने के बजाय हम इससे निपटने के दूसरे रास्ते खोजें और फिर भी प्रतिक्रिया न तो नीरस रहे और न बहुत जज़्बाती?

हाल ही में छपी सूक्ष्म विश्लेषण और गहन शोध पर आधारित किताब में रॉक्सेन एल. यूबेन हमें बताती हैं कि अपमान का मूल शारीरिक पीड़ा में उतना नहीं होता, जितना एक ख़ास क़िस्म के मानसिक आघात में ज़्यादा होता है, जो केवल असहायता के अनुभवों में नहीं बल्कि जबरन किसी ऐसी चीज़ या व्यक्ति में ढाल दिए जाने में होता है, जिसे अब हम नहीं पहचानते. हम जो हैं और हमें जो बनाया जाता है, अपमान उसमें एक विच्छेद लाता है.

अपनी यात्रा की शुरुआत में ही यूबेन हमें बता देती हैं कि शायद हम अपमानित होने के असल अभ्यास और इसे अंजाम देने के अलग-अलग तरीक़ों पर ध्यान देकर ही किसी तरह की धारणात्मक स्पष्टता तक पहुँच सकते हैं: अपमान आलंकारिक तौर पर हर जगह मौजूद है और राजनीतिक तौर पर प्रबल है, लेकिन धारणा के बतौर यह हमारी पकड़ से फिसल जाता है.

असल में, अपमान में नीचे की ओर एक झुकाव होता है, ज़मीन में गाड़ देने का, असल में मिट्टी चटवानेके लिए मजबूर करने का अनुभव. इस किताब में अपमान के लिए जो दो सबसे ज़्यादा बार इस्तेमाल किए गए शब्द हैं, वो हैं ढल और इहाना. ये मूल शब्द अरबी में गंदगी और धरती के लिए इस्तेमाल होते हैं, यानी गंदगी या धूल से ढक देना, मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मजबूर और विवश किया जाना और नीचा दिखाना. या एक और पुराने मुहावरेदार वाक्यांश अर्घमा अनफ़ाहू का शाब्दिक अर्थ है नाक को ज़मीन से रगड़ देना.इसी तरह अंग्रेज़ी शब्द ह्यूमिलिएशन की उत्पत्ति लैटिन ह्यूमस यानी पृथ्वीया ज़मीनमें खोजी जा सकती है और कुछ ऐसा ही जर्मन और बाइबिल के ज़माने की हिब्रू दोनों में मिलता है. आपकी दुनिया पर दूसरे का कब्ज़ा हो जाता है: आप जो कुछ भी कभी थे, वह सब उस चीज़ से ओझल हो जाता है जो अपमान करने वाले ने आपको बना दिया है.

अपमान का एक अहम पहलू है, इसका सार्वजनिक चरित्र- मसलन घटना के बाद उसका बखान अपमान का महज़ ज़िक्र नहीं है, उसी का एक विस्तार है, जो इसके प्रभावी होने के लिए ज़रूरी है. अपमान एक तमाशा है. दूसरा इससे जुड़ा पहलू है, गवाह की मौजूदगी, जो एक संरचना का हिस्सा है: अपमान करने वाला, अपमानित और गवाह. गवाह में सब कुछ देख रहे भगवान से लेकर असल में इकट्ठा हुई भीड़ तक शामिल हैं या फिर वह मीडिया की बनाई दुनिया का हिस्सा बन सकता है. अगर अपमान अन्यायपूर्ण ढंग से थोपी गई लाचारी और वैध दर्जे के बीच विच्छेद में बसता है, तो इसका बार-बार दोहराया जाना उस विच्छेद का फिर से अभिनय है, जो उस अनुभव को फिर से ज़िंदा करने में सक्षम है.अपमान करने वाले का सुख उसके फिर से शक्ति हासिल करने, विच्छेद को फिर से दिखाने और अपमानित के अनुभव को फिर से ज़िंदा करने में निहित होता है.

यूबेन के प्रमुख स्रोत एक पूरी सभ्यता को अपमानित करने के पश्चिमी मॉडल को इस्लामी प्रतिक्रियाओं और मिस्र में हुए अरब स्प्रिंग पर आधारित हैं. एक जवाब यह है कि इस्लाम के दुश्मनों ने मुसलमानों को अपमानित करने के लिए बेइंतहा ताक़त का इस्तेमाल और मुस्लिमों की यह पहचानने में नाकामी कि इस्लाम की श्रेष्ठता के प्रतिनिधि और उसकी सेवक उम्मत (अदल्ला अल-उम्मा) के अस्तित्व के लिए सत्ता के उस पदानुक्रम को उलटने के लिए संघर्ष की ज़रूरत है, जो अपमान से जन्मता है. अपमान का यह ढाँचा कैसे आकार लेता है, जिसमें ये घटक एक साझा ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में गढ़े गए प्रतीकों, छवियों, रूपकों और कोड वाली शब्दावली के एक ख़ास संग्रह के ज़रिए कई जगहों पर कैसे बनते हैं? यूबेन बयानबाज़ी को एक उपकरण के तौर पर ठीक ही काफ़ी अहमियत देती हैं (शुरुआती बयानबाज़ी के तरीक़े हैं- मौखिक, दिखावटी और देहगत). शुरुआत में वह अपमान के फ़ौरी समाधान की माँग के औज़ार के बतौर तफ़सीर और फ़तवा की अहमियत पर विचार करती हैं. इसके अलावा वह विज्ञप्तियों, लंबे-चौड़े साक्षात्कारों, धुंधले पड़ चुके शौकिया वीडियो, हाई-प्रोडक्शन छोटी फ़िल्मों, पत्रिका लेखों, रेडियो प्रसारणों, प्रेस विज्ञप्तियों, विस्तृत भाषणों को बारीक़ी से जाँचती हैं- जो टेप कसेट से लेकर इंटरनेट तक कई तकनीकों के ज़रिए फैलाए गए हैं. ये प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रकृति में प्रतिशोधात्मक हैं. यह अपने अपमान करने वाले को सचमुच या प्रतीकात्मक रूप से मिट्टी में मिला देने की भावना ही है, जो 'बदले में अपमान' को पैदा करती है, जो तुरंत लाचारी के साये को छिन्न-भिन्न कर देती है. लेकिन असल में यह सिर्फ़ अपमान के ईश्वरीय न्याय का औचित्य है. इसका यह दावा होता है कि जिन्होंने इस्लाम को अपमानित किया है, उन पर लाचारी थोपना सत्ता संबंधों का एक शाब्दिक और प्रतीकात्मक उलटफेर है, जो बुरी तरह से अस्त-व्यस्त दुनिया में व्यवस्था और समझ बहाल करता है. बदले में अपमान ईश्वर की ओर से नियत सामाजिक व्यवस्था के प्रति समर्पण का एक सर्वोच्च प्रमाण बन जाता है. और विरोधाभास यह है कि ईश्वर के प्रति विनम्रता के मायने हैं अपमान करने की दिव्य शक्ति को हथिया लेना.

क्या अपमान से निपटने के लिए साहस, उग्रता और ताक़त की जवाबी बयानबाज़ी या इसका उलटा इस्तेमाल करने के अलावा कोई और तरीक़ा है: कांट की नैतिक स्वायत्तता और मानवीय गरिमा की भाषा के अलावा? शानदार स्रोतों के साथ ही इस किताब का सबसे अहम योगदान असल में अपमान से निपटने के लिए एक तीसरी संभावना पेश करना है. पहली बात तो यह समझना है कि भले ही कांट के नैतिक ढांचे का इस्तेमाल करना जवाब न हो पर अपमान और करामा (या "गरिमा") असल में एक-दूसरे के विरोधी होने के बजाय एक-दूसरे के पूरक हैं. पूरी कौम गरिमा चाहती है और ज़रूरी नहीं कि हमेशा सामाजिक न्याय या आज़ादी की बात ही करे- क्योंकि घोर लाचारी की भावना का आख़िर समाधान होना चाहिए (अपमान आख़िर में दैहिक और प्रतीकात्मक होता है: झुका हुआ सिर और चेहरे पर थप्पड़; या ज़मीन पर गिराए जाने की मजबूरी). ऐसे में करामा में पहचान का एक अनुभूत क्षण है- जो सामूहिक दृढ़ता का नतीजा है.

और यहाँ यूबेन नुक़सान की भरपाई के मेलियन तरीक़े की याद दिलाती हैं. "मेलियन" का संदर्भ थ्यूसीडाइड्स की किताब हिस्ट्री ऑफ़ पेलोपोनेशियन वॉर में मेलोस के निवासियों से है, जिन्होंने विनाश और गुलामी की धमकी दिए जाने के बावजूद एथेंस के साम्राज्य के सामने झुकने से इनकार कर दिया था. मेलियन लोगों ने उन्हें जीतने को तैयार सेना की ओर से भेजे गए एथेंस के दूतों से कहा था, "आत्मसमर्पण का मतलब है खुद को निराशा के हवाले करना. जबकि कार्रवाई से हमें अभी भी उम्मीद है कि हम सीधे खड़े हो पाएँगे" (स्टेनाई ऑर्थोस, जिसका अर्थ है सीधा रहना या खड़ा होना). एथेंस की चेतावनियों के सामने डटकर खड़े रहना ख़ुद में ही एक तरह की जीत है.

अपनी बात रखने के लिए यूबेन स्टोइक्स और अर्नेस्ट ब्लॉक के सीधे खड़े होने के ख़याल ऑर्थोस का ज़िक्र करती हैं: गरिमा "सीधे खड़े होने का ऑर्थोपीडिया" है. करामा को कांट के बजाय मेलियन के रूप में बताना उसे दृढ़ता से खड़े होने के प्रतीक और प्रदर्शन के रूप में दिखाना है, जहाँ "खड़े होने" को शाब्दिक और रूपक दोनों तरह से समझा जाता है. अपमान विरोध में नहीं, बल्कि एक मंज़ूरशुदा ईमानदारी या क़द के संदर्भ में आकार लेता है, और यह अपमान ही है जो उस ईमानदारी या क़द पर छा जाता है और जिसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए. चूँकि "अपमान और गरिमा/करामा का क्या मतलब है और वे क्या करते हैं, यह एक ही जगह और शरीर पर और उसके ज़रिए दिखाया जाता है, इसलिए एक के बिना दूसरे की सत्ता-मीमांसा और राजनीति को पकड़ पाना असंभव है." यह नैतिक स्वायत्तता के मानदंडों या हिंसा के फ़ैसलों के बारे में कम है, बल्कि यह समझने को लेकर है कि गरिमा भी अपमान की तरह ही एक देहगत अभ्यास है, जिसकी यह किताब प्रशंसा करती है. दृढ़ता से खड़े रहना अपने जीवन की कहानी को आकार देने की शक्ति पर क्रियात्मक ढंग से दावा करना है, जो अपमान के केंद्र में मौजूद `नपुंसकता` की पकड़ को ढीला करता है. गरिमा की बहाली धीरे-धीरे होती है और यह फैलती जाती है. इंसान खड़ा होना शुरू करता है. और जब पूरा समाज इनकार के ज़रिए अपना सिर उठाता है- तो यह "निर्विवाद रूप से ज़ाहिर" हो जाता है: दूसरों को, पर साथ ही ख़ुद को भी.

आलोचना के हवाले से एक बात. भले ही किताब अपमान के प्रति दो तरह की प्रतिक्रियाओं के बीच अंतर करने की कोशिश करती है: बदले में अपमान और अपमान करने वाले के सामने खड़ा होना, यह पूरी तरह से आश्वस्त नहीं कर पाती कि मिस्र का प्रतिरोध सही रास्ते पर था और इस्लामिस्ट प्रतिक्रियावादी थे. यह अंतर कुछ ज़्यादा ही साफ़-सुथरा है और हमें एक बाइनरी में बाँधता है, जबकि इतिहास कहीं ज़्यादा उलझावभरा होता है. इसके अलावा, लेखिका इस बात पर ध्यान नहीं देतीं कि अगर अपमान राजनीतिक क़दमों और रणनीतियों के मूल्यांकन का आधार होता है तो पहचान/राष्ट्र/कौमों पर आधारित राजनीति में हमेशा प्रतिक्रियावादी बनने की संभावना होती है, ख़ासकर तब जब आलोचनात्मक विवेक को एक तरफ़ रख दिया जाता है और संकट के समय शिकायत-आधारित भावनाएँ हावी हो जाती हैं. तो एक अहम सवाल जो पूछा जाएगा: गरिमा या 'सीधी खड़े होने की भंगिमा' आख़िर किसके भरोसे टिकी होगी? शिकायत-आधारित सत्ता-मीमांसा का तर्क न तो प्रगतिशील है और न ही इसमें कोई परिवर्तनकारी हस्तक्षेप करने की सामर्थ्य है. अहम बात यह देखना है कि गरिमा से जुड़ी गर्व की भावना को एक न्यायपूर्ण समाज की तरफ़ रचनात्मक दिशा कैसे दी जा सकती है.

 (अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: अजय शर्मा)

Prasanta Chakravarty
 प्रसांता चक्रवर्ती साहित्य, संगीत और विविध कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले विरल बौद्धिक शख़्स हैं। वे कवि-गद्यकार हैं, सहृदय आलोचक हैं, गीतकार हैं, संगीतकार हैं, कैमरामैन हैं और प्रतिबद्ध पाठक हैं। सबसे बढ़कर ग़ालिब के वो दुश्वार आदमी हैं जिसने इंसां होना मयस्सर किया है। पेशे से विश्वविद्यालय में अंग्रेजी अध्यापक प्रसांता की बांग्ला, अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य में उसी तरह आवाजाही रहती है जैसे विभिन्न कला-रूपों में। हिन्दी कविताओं से उन्हे प्यार है और वे हिन्दी कविताओं पर अपनी पसंद के आधार पर अंग्रेजी में लिखते रहे हैं। 

रॉक्सेन एल. यूबेन की किताब ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स पर यह लेख उन्होंने समयांतर पत्रिका के अनुरोध पर लिखा था। वहीं से साभार।


Friday, June 5, 2026

मोहन मुक्त की कविताएँ

कवि मोहन मुक्त



मेरा पहाड़ ?????

मुंडा कोल
गोंड नाग

बौद्ध द्रविड़
या हडप्पन बाद के
जो कोई भी थे मेरे पुरखे
उन्होंने कभी नहीं कहा ....'मेरा पहाड़'
कम से कम रिकॉर्ड तो यही बताते हैं
अगर कहा भी हो
तो कैसे जानें
उनकी तो बची नहीं भाषा भी कोई
जो कुछ बच गया
उनकी भाषा का
वो गाली बन गया
भाषाविद कहते हैं
कि 'डूम' शब्द आर्य भाषा का नहीं है
खशो ने बनाया 'खशदेश'
उन्होंने जरूर कहा ....'मेरा पहाड़'
गुप्तों के अधीन कत्यूरियों ने कहा....'मेरा पहाड़'
आर्यों ने कहा गंगा मेरी तो..... 'मेरा पहाड़'
नीलगिरी पर कब्ज़ा छोड़े बिना
विंध्य को लांघकर
सारी बुद्ध प्रतिमाओं को
शिव बनाकर
शंकराचार्य ने कहा .....'मेरा पहाड़'
मैदानी चन्दो ने कत्यूरियों को कहा खदेड़कर अब ...
.....'मेरा पहाड़'
नेपाली गोरखाओं ने चंदों से छीनकर कर कहा गरजते हुए
.......'मेरा पहाड़'
काली के इस तरफ़ ना आना
सागौली में अंग्रेज ने धमकाकर कहा गोरखों से.... 'मेरा पहाड़'
मल्ल पंवार कहते रहे ......'मेरा पहाड़'
गंगोली मड़कोटी राजा ने भी कहा... 'मेरा पहाड़
राजा का राजपुरोहित
उप्रेती भी कहता रहा... 'मेरा पहाड़'
कहा जाता है कि उसने मार दिया था राजा
उसकी जगह बैठाए
गुमानी के मराठी पुरखे भी बोले ...'मेरा पहाड़'
नेपाल के ज्योतिष
जिन्हें राजा ने दी
पोखरी की जागीर
वो कहने लगे.... 'मेरा पहाड़'
महाराष्ट्र से आये डबराल ने तो
अपना नाम ही रखा हिमाल के डाबर गांव पर
और कहा .......'मेरा पहाड़'
थानेश्वर कुरुक्षेत्र से आये
जनार्दन शर्मा के वंशज
मंदिर में पाठ करने के चलते कहलाये पाठक
वो सगर्व और साधिकार कहते हैं ...'मेरा पहाड़'
जो भी कहता है 'मेरा पहाड़'
वो प्यार नहीं करता
वो जताता है दावा
जीती गई
लूटी गई
छीनी गयी
कब्जाई गयी
और बांटी गयी
ज़मीनों पर
जागीरों पर
बर्फ जंगल पानी और बुग्याल
किसी के हो कैसे सकते हैं भला
सारे कवि जो मुग्ध हैं पहाड़ों के सौंदर्य पर
जो पहाड़ों को ऊंचाई और मजबूती का रूपक बताते हैं
वो बेईमान हैं
वो शिकार में मारे गए बाघ की लाश पर
उसकी ताक़त का बखान कर
दरअसल गा रहे हैं हत्यारे की प्रशस्ति
सारे राजा
सारे विजेता
सारे हत्यारे
सारे लुटेरे
सारे ज्योतिष
सारे पुरोहित
सारे गुमानी
सारे धर्माधिकारी
और सब के सब कवि एक साथ भी कहें अगर ...
.....'मेरा पहाड़'
तो भी मैं नहीं कहूंगा
मैं नहीं कहूंगा ....'मेरा पहाड़'
मैं कह ही नहीं सकता कभी....'मेरा पहाड़'
दो वजहों के चलते
एक तो ...'मेरा पहाड़' ...ये भाषा नही मेरी
और ज़्यादा मजबूत वज़ह
मैं ही पहाड़ हूँ...................
***

मेरी विचारधारा...

मुझे किसी संस्कृति से प्यार नहीं
मुझे किसी सभ्यता से प्यार नहीं
मुझे किसी गांव से प्यार नहीं
मुझे किसी क्षेत्र से प्यार नहीं
मुझे किसी प्रदेश से प्यार नहीं
मुझे किसी देश से प्यार नहीं
मुझे किसी धर्म से प्यार नहीं
मुझे किसी जाति से प्यार नही
मुझे किसी भाषा से प्यार नहीं
मुझे किसी 'परिभाषा' से प्यार नहीं
मैं ख़ुद को और ख़ुद जैसे दूसरे सभी इंसानों को किसी तारे की धूल के अलावा कुछ नहीं मानता
वो इसके अलावा कुछ हो भी नहीं सकते
यही अब तक जाना पहचाना गया वस्तुगत, गतिमान,वैज्ञानिक और गरिमापूर्ण सच है
मैं इंसानों से प्यार करता हूँ और डूबकर करता हूँ,
जिन्हें प्यार किया है और करता हूँ वो जानते हैं कि मैं कैसा प्यार करता हूँ
लेकिन मैं केवल प्यार नहीं करता मैं घृणा भी करता हूँ
हर उस संकीर्ण विचार से घृणा करता हूँ जो तारे की एक मुट्ठी धूल को दूसरी मुट्ठी धूल से बेहतर या बद्तर मानता है
यही प्यार और घृणा मेरा बोध अस्तित्व और चरित्र है
यही मेरा सब कुछ है

केवल यही मेरी विचारधारा है...... और कुछ नहीं... 

***

मोहन मुक्त



जादू

अकारण ही की जानी वाली नफ़रत
बस यूँ ही बिचकाए गए चेहरे
एक अजीब सी अलग सी दुर्लभ सी
लेकिन रोज़ ही दिखने वाली मुस्कुराहट
जिससे धक्क होती है
सायास बनाया गया फ़ासला
कभी उल्टी किये गए शब्द
और कभी घोड़े की नाल की तरह
मुंह मे ठोकी गई बुदबुदाहट
मुझे देखते ही मुँह और नाक पर रख लिए गए अदृश्य रुमाल
और ख़ामोश लेकिन घृणा से लबरेज निगाहें
क्या क्या नहीं देखा है मैंने
लेकिन सच कहता हूँ
इतनी बारीक लेकिन साफ़ साफ़ चीज़ों को देखने बाद
हर बार मैंने अपने चेहरे को आईने में देखा है
अपने गालों को कोमलता से छुआ है
जीवन और जिजीविषा से भरी अपनी आँखों को चूमा है
ख़ुद को भर लिया है
अपनी स्नेहिल बाहों में
बहुत बहुत देर तक
सहलाया है अपना माथा
अपने आलिंगन को ख़ुद में पैवस्त कर
मैं थोड़ा सुबकता हूँ
घृणा के हर तमाचे के बाद
मैं छोटे बच्चे सा ख़ुद के पास आता हूँ
लिपट जाता हूँ ख़ुद से माँ की तरह
कहता हूँ ख़ुद से
तुम नायाब हो
बेमिसाल हो
मेरे हाथ मुझे छूते हैं ...त्वचा के पर्दे के पार
कहते हैं मेरे चेहरे से
तुम सबसे ख़ूबसूरत हो
और मेरा चेहरा मेरे हाथों से बोलता है
तुम कोई जादू हो क्या ???
***
('हम ख़त्म करेंगे' कविता संग्रह से)


चयन

या तो धीरे धीरे सिको
धीमी धीमी आंच पर देर तक 'कालजयी' महाकाव्य जैसे
बनो सुगंधित स्वादिष्ट प्रशंसनीय और सुपाच्य
या रह जाओ अनगढ़ शब्द
जैसा कौंधा था ख़याल आदिम
उमड़ी थी नफ़रत
उबला था दिल
कंकड़ की तरह गड़ जाओ
जबड़ों में
आंखों में
और ज़ेहन में तुरंत
छील डालो मसूड़े ...
बहाओ खून...
रंग को कर दो भंग
हो जाओ अवांछित
तुम्हें खाया जाना तय हो चुका है
अब तुम चुनो अपनी भूमिका
कि तुम्हें तारीफ़ के साथ पचाया जायेगा
या थूक दिया जाएगा
गाली और ख़ून एक साथ उगलते हुए...
***

लोक संस्कृति

मोहन उप्रेती
गिरीश तिवारी
और नारायण दत्त तिवारी भी
बजाते थे गज़ब का हुड़का
सच में.... वो शानदार हुड़का बजाते थे
जिस दिन आप कह दोगे
कि मोहन उप्रेती
गिरीश तिवारी
और नारायण दत्त तिवारी
तीनों बेमिसाल हुड़क्या थे
उस दिन से मैं भी लोकसंस्कृति का संरक्षण करूंगा.....
*हुड़का =प्रसिद्ध वाद्य जो ख़ास तौर पर कुमाऊं हिमालय के कई हिस्सों में बजाया जाता है और सामान्यतया मृत जानवर की खाल से तैयार किया जाता है
*हुड़क्या = वंशानुगत तौर पर हुड़का बनाने और बजाने वाली दलित जाति
***

पुष्प की अभिलाषा...

जो अभिलाषा बताई गई
वो चतुर्वेदी की अभिलाषा थी
वो फूल की अभिलाषा नहीं थी
फूल की कोई चाह नहीं थी
उसे तो खिलना था
महकना था
बिखर जाना था
इच्छा क्या होती है
फूल नहीं जानता
जाना हुआ या जानने लायक
कोई उद्देश्य नहीं होता
फूल की ज़िंदगी का ...फूल के लिए
काश कि मैं भी फूल होता
मुझे बहुत अफ़सोस है
कि मैं फूल नहीं हूं
लेकिन फिर भी मेरी ज़िंदगी का एक हासिल है
मैं मुतमईन हूँ
कि मेरी अभिलाषा तय नहीं कर पाएगा
कोई 'माखन'... 'लाल' ...'चतुर्वेदी'...
***
('हिमालय दलित है' संग्रह से।)

लेकिन...

दासों ने
विद्रोह किया
वो लड़े.......
वो हार गये
पकड़ लिये गये
उन्हें खम्बों पर लटकाया गया
वो धीरे धीरे मरे...
तो क्या विद्रोह असफल हो गया
नहीं...
विद्रोह और प्रेम...
कभी असफल नहीं होते
जिस समय
वो मर रहे थे
उस समय
वो दास नहीं रह गये थे...
***

प्रिय कवि के लिये

1
प्रिय कवि... किताब मिली...
गुलदस्ते जैसी...
प्रिय कवि मुझे गले लगा लो
चलो हम दोनों रोयें... फूलों की मौत पर...
मेरे प्रिय कवि
2
प्रिय कवि... उस मंच पर मत जाओ
वहाँ तुम अपनी सबसे प्रिय कविता नहीं पढ़ पाओगे
... वो मेरी भी सबसे प्रिय कविता है
उसे एक बार मेरे मुँह से सुनो
मेरे प्रिय कवि
3
प्रिय कवि
... आपकी ज़बान में शहद है
उन चीटियों को देखो... जो चाशनी में डूबी हुई हैं
त्वचा से सांस लो...
मेरे प्रिय कवि...
4
प्रिय कवि
... पुल मत बनाओ...
मैं नदी के पास पानी पीने आया हूँ
मेरे प्रिय कवि..
5
प्रिय कवि
... मौन मत रहो कभी...
अकेले रहा करो अक्सर
मेरे प्रिय कवि...
***


सुखना लेक पर चाँद

सबसे ख़ूबसूरत जगहों पर भी
उदास और भारी मन ही रहता है
मेरे सबसे क़रीब
मैं क्या करूं
मैं आपके किसी जश्न में शामिल नहीं हूं
जब देश गर्व में डूब जाते हैं
उस समय मैं देखना चाहता हूं
एक कोलाहल से भरे तट वाली झील में
जीते जा चुके चांद का डूबा हुआ प्रतिबिम्ब
या आदिम चुम्बनों को साझा करते बेपरवाह प्रेमियों के साए जिनकी कोई पहचान ना होती हो
लेकिन वो नहीं हैं वहाँ
जब झंडों की संख्या इंसानों से ज़्यादा हो
जब झंडे होंठो के बीच खड़े हो जाएं... दीवार की तरह
बन जाएं पर्दे,
हो जाएं नक़ाब
जब झंडे निर्वात में लहराएं
जब झंडे आदिम ज़ि स्मों की खाल बन जाने पर उतारू हो जाएं
जब झंडे पृथ्वी के साथ चाँद को भी लपेटकर सूदखोर का बही खाता हो जाना चाहें
तो वेग से नीचे की ओर बहते हुए गर्व के ताक़तवर सैलाब के बीच मेरा भारी मन अपनी गहरी उदासी के साथ टिका हुआ है, झील के बीचों बीच
सबसे ख़ूबसूरत जगहों पर भी मेरा मन उदास बना रहता है
शायद यही एक बात है जिसके लिए मुझे ख़ुश होना चाहिए...
(24/8/2023, सुखना लेक,चंडीगढ़)
***

साफ़ नज़र और बेबाक बयान वाले कवि मोहन मुक्त के दो संग्रह `हिमालय दलित है` और `हम ख़त्म करेंगे` प्रकाशित हो चुके हैं। वे ऐसे कवि हैं जो संग्रहों के आने से पहले और साहित्य की मुख्यधारा में प्रकाशित-स्वीकृत होने से पहले या इनके बावजूद पाठकों के बीच गहरा प्यार हासिल कर चुके थे। कविता उनके लिए वर्चस्व के विरुद्ध एक सांस्कृतिक-वैचारिक माध्यम रही और किसी प्रचलित-स्वीकृत मापदंड की उन्होंने परवाह भी नहीं की। बल्कि, उन्होंने वर्चस्ववादी पैमानों को ब्राह्मणवादी कहकर चुनौती दी और उसके बरअक्स कभी तीखी-तेज़ प्रवाह वालीं और कभी लम्बे संवाद वालीं कविताओं के ज़रिये वंचित तबकों के दिलों से वाबस्ता नया बौद्धिक सौंदर्य गढ़ा और गहरा असर छोड़ा है।

Thursday, May 21, 2026

`किसी अनजान ढाणी` से एक खरी-बेचैन आवाज़


`बौने प्रहसन और अन्य कविताएं`
कविता संग्रह
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन


``एक आवाज़ आई ये देश महान है
मैंने ग़ौर से देखा तो सदियों से
रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवाय
कुछ दिखाई नहीं दिया।
बेशक ग़ौर से देखना किसी दिन
भेंट चढ़ा देगा मुझे
या तो राजा की या फिर देवताओं की।``

कपिल भारद्वाज का संग्रह `बौने प्रहसन और अन्य कविताएं` आज सुबह का हासिल है। किताब को व्यवस्थित ढंग से पढ़ने के बजाय आदतन एक ख़राब पाठक की तरह यहाँ-वहाँ से पढ़ता रहा। कभी कोई पन्ना, कभी कोई लाइन। कविता `राजा नंगा है` की इन लाइनों पर ठहर गया। यह कपिल का देखने का तरीक़ा ही है जो उसकी कविता में असर पैदा करता है। `सदियों से रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ` जैसी कोई बात अचानक उसकी साधारण सी लगने वाली किसी भी कविता में आती है और उसे अलग बना देती है। बक़ौल कवि मोहन मुक्त, देवताओं की जगह ईश्वर लिख कर कवि आसान रास्ता निकाल सकता था लेकिन तब बात बदल जाती। कपिल की इस कविता की आख़िरी पंक्ति है- `...ग़ौर से देखना कैसे छोड़ दूं`।

ज़ाहिर है कि कपिल भारद्वाज की बड़ी ताक़त देखने की ईमानदारी है। आँखों के साथ बाँधी गईं अपने परिवेश की पट्टियों (blinders) को हटाकर ब्राह्मणवाद को देख पाना सबको नसीब नहीं हो पाता। बल्कि, देखकर भी उसे धर्म या ईश्वर जैसे शब्दों की ओट में छुपा लेने की अक़्लमंदी से बचने का हौसला हर कोई नहीं करता। देखने के ख़तरे कवि जानता है।

बहरहाल कपिल की यह कविता पढ़ते हैं-

।।राजा नंगा है।।

एक आवाज आई ये राजा रंगबिरंगा है
मैंने गौर से देखा तो रंग बिरंगी पेंट से अधेड़
लेकिन चिकने चूतड़ नजर आए।

एक आवाज आई सब मजे में जी रहे हैं
मैंने गौर से देखा तो जेल में बंद कभी आनन्द तेलतुमबड़े
तो कभी सुधा भारद्वाज दिखाई दिए।

एक आवाज आई ये देश महान है
मैंने गौर से देखा तो सदियों से
रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवाय
कुछ दिखाई नहीं दिया।
बेशक गौर से देखना किसी दिन
भेंट चढ़ा देगा मुझे
या तो राजा की या फिर देवताओं की।

फिर भी गौर से देखना कैसे छोड़ दूं!
--

कपिल की कविताओं के पन्ने जल्दी-जल्दी उलटते-पलटते हुए समझ में आया कि उसकी बेबाकी के पीछे उसकी नज़र के साथ जो एक और ताक़त है, वह है मुसलसल बेचैनी। साफ़ नज़र और बेकली से पैदा होने वाली उसकी समझ उसकी कविता को अच्छी-सिद्ध कविता होने के ख़तरे से बचाए रखती है और इस तरह कवि और उसकी कविता हर तरह के संस्थानों-अनुशासनों-प्रशिक्षणों और संरक्षणों से निरापद हैं। `निरापद रहो!` उसकी एक कविता भी है-

निरापद रहो!

मुझसे कहा जाता है
निरापद रहो
किसी न किसी दिन एक सन्देश आयेगा
और तुम जेल में सड़ते रहोगे बरसों या मारे भी जा सकते हो।

सांप के जैसी चिकनी त्वचा वाले
अक्सर मुझे यही कहते रहते हैं
निरापद रहो वरना...।
--

कपिल के यहाँ एक तरह की आवारगी की गंध है या एक सुव्यवस्थित जीवन से बचने की; पंजाब के कवियों के राग-विराग की और बग़ावत की। वह शिवकुमार बटालवी (जो उसकी एक कविता में भी आया है) की तरह दु:ख के रूमान को गाकर काम चला सकता था, इसकी गुंजाइश उसके भावनात्मक ढांचे में झलकती भी है लेकिन समाज के दु:खों से उसका रिश्ता इतना गहरा है कि वह ऐसे किसी मर्ज़ में तबाह होने से बचा रहता है। वह सचेत है- `दु:ख व्यक्तिगत कम राजनैतिक और सामाजिक ज़्यादा है`।

कविता `दु:ख - 1` में कपिल अपने मिज़ाज के विपरीत पंक्ति दर पंक्ति सधी हुई लय में बहता है और अंतत: इस नतीज़े पर पहुँचता है कि ``दु:ख व्यक्तिगत कम राजनैतिक और सामाजिक ज़्यादा है``। तो उसकी कविता के सरोकार सामाजिक हैं, उसकी नज़र बार-बार वहीं लौटती है:

।।मंच का जादूगर कवि।।

कौन सी भाषा में बिलखता है बच्चा
जब उसकी मृत माँ की चूचियों से दूध नहीं आता?

मैंने पूछा एक मंच के जादूगर कवि से
जो टेलीविजन में आँखें गड़ाकर देख रहा था
व गदगद हो रहा था
एक मरी हुई माँ की छाती पर रोते बच्चे वाले दृश्य को देखकर।

बमों और गोलियों की आवाज़ों से अपनी पांडुलिपि रंगने वाले
उस कवि ने मुझे ऐसी नज़रों से देखा
जैसे बम गिराने वाले ने मरने वालों को देखा होगा।
--

कपिल की कविता के सरोकार समाज में हैं तो उसकी कविता बार-बार राजनीति की बात करती है। साफ़ बात जिसमें दो अर्थ की गुंजाइश या अमूर्तन की हुनरमंदी नहीं है। दुतरफ़ापन से, दुचित्तेपन से उसे चिढ़ है और इस कसौटी को वह कवियों-लेखकों के लिए भी दोहराता रहता है। उसकी कविता में आत्मुग्ध मसखरे, होर्डिंग या तानाशाह को ठीक-ठीक पहचाना जा सकता है।

कपिल कई बार तंज़ के ज़रिये भी इस फ़ासिस्ट दौर की विडम्बनाओं और कारगुज़ारियों को बख़ूबी निशाना बनाते हैं। उनकी यह कविता ``लोकतंत्र में वेज बिरयानी`` पढ़िए:

पहाड़ की चोटी पर बने होटल के बाहर लगी थी एक तख्ती
जिस पर लिखा था 'यहाँ प्योर वेज बिरयानी मिलती है'।
दरभंगा से आए मजदूर के बेटे ने पढ़ा तख्ती को
और अपने पिताजी से पूछा 'वेज बिरयानी' का अर्थ तो
मजदूर ने कहा 'आहिस्ता बोलो बेटे'।

कथावाचक ने माइक से कहा -
'माँस खाने वाले राक्षस होते हैं'
(लाखों भूखे लोग सिहर उठे)
कथावाचक के हारमोनियम वाले ने जोर से झटका
हारमोनियम का तार और मन ही मन मुस्कुराया
मानो कह रहा हो 'वेज बिरयानी तो फेवरेट है मेरी'।

टेलीविजन स्क्रीन पर एक संभ्रांत महिला पत्रकार ने
चीखते हुए दोहराया कि 'माँस खाने वाले लोग हिंसावादी होते हैं'
और कैमरा ऑफ होते ही मँगवाई एक वेज बिरयानी की प्लेट।

चिकन बिरयानी छोड़ो और वेज बिरयानी खाओ
मुर्गियों को दाना डालते हुए कह रहा था एक अभिनेता।

लोकतंत्र है और वेज बिरयानी का विज्ञापन है
बाकी सब असत्य है इस महादेश में
चूल्हे, चूल्हे में पड़ी राख, पेट और पेट में जलती आग
सब असत्य है सिवाय वेज बिरयानी के।
--

यह कवि अपनी कविताओं के सम्पादन से लेकर उन्हें क़द्रदानों की निगाह में लाने जैसे हर काम में बेपरवाह लगता है। गो कि कविताओं को लेकर उससे और संज़ीदगी की अपेक्षा ज़रूरी है लेकिन क़द्रदानों के प्रति उसका रवैया वाजिब है और उसके खरा बने रहने की उम्मीद बढ़ाता है- ``कविता के क़द्रदानो\तुम सब रंगे हुए सियार हो``।

कवि पर हिन्दी साहित्य उद्योग की मेहरबानियों का बोझ नहीं है तो यह उसकी पेश-आगाही ही है-

जब तस्कर बन जाएं समीक्षक
तो कवि को रहना पड़ेगा उनसे दूर
खेतों में बनी किसी अनजान ढाणी* में।
(कविता के नकली क़द्रदान)

हिन्दी कविता के सितारों के चमकीले मेकअप वाले मृत वाक्य उनकी कविताओं को तमाम चर्चाओं के बावजूद जान नहीं बख़्श पाते। लेकिन, कपिल की संवेदनाओं और सरोकारों का खरापन उसकी कविताओं में अचानक किसी पंक्ति में, किसी बिम्ब में, कन्ट्रास्ट दिखा देने वाले किसी दृश्य विधान में कौंद जाता है:

क्या मालूम कल को रोटी सिर्फ़
दो-चार प्लेटों में ही रह जाएं और बाकी लोग
गेहूँ की खाली बोरी को ओढ़कर
बरसते बादलों के बीच से गुज़र जाएं।
(एक विकृत चेहरा)

किताब की भूमिका में अशोक भाटिया लिखते हैं - ``...टकराहट, विक्षोभ और आक्रोश में कवि कई बार बात के खरेपन को कविताई पर तरजीह देता है। कुछ पंक्तियाँ देखें-
1. हमारी सांस्कृतिक लड़ाई को एक दिमाग़ नियंत्रित कर रहा है।
2. ईश्वर को, धर्म को और आस्था को डाल रखा है ऑनलाइन वेबसाइट पर।
3. हिन्दू देश की गलियों में फिरती गायें\सुअरों के साथ सेंकती हैं अपनी देह धूप में।``

गोकि खरेपन को तरजीह ही सच्ची कविता की सबसे बड़ी ज़रूरत है और इस दौर की कविताओं में प्राय: इसी का अभाव है। कपिल के यहाँ बाज़ दफ़ा अखरने वाले प्रतीक आते हैं तो भी उनकी ईमानदारी पर शक नहीं होता जबकि बड़े चौकन्ने रहकर पॉलिटिकली करेक्ट दिखने की कोशिश करते रहने वाले बहुत से कवियों की सेंसेबिलिटी संदिग्ध बनी रहती है।

कपिल भारद्वाज की जिस नज़र की बात इस टिप्पणी के ठीक आरम्भ में उनकी कविता के टुकड़े से की थी, समापन भी उनकी ऐसी ही एक कविता `मुक्ति` से कर रहा हूँ:

``कृष्ण का रथ ज़रूर देखिए``
ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार पर खड़े हुए
एक सौम्य मुख के स्वामी व टीकाधारी कह रहे हैं
ऐसा रथ है कि देखने भर से
मुक्ति पा जाए आदमी।

ब्रह्मसरोवर के दूसरे द्वार पर भीख मांग रही
एक भिखारिन ने दूसरी भिखारिन से कहा - ऐ बहन
सुबह से न भात न चावल
लगता है मुक्ति हो जाएगी शाम तक
--

-धीरेश सैनी

कपिल भारद्वाज हरियाणा में रहते हैं। उनका पहला कविता संग्रह `फिर देवता आ गए` 2021 में प्रकाशित हुआ था।

*ढाणी - गाँव से दूर खेतों में बसे कुछेक घरों का समूह। 

Saturday, January 17, 2026

शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़ खुलता कवि

अदनान कफ़ील दरवेश की कविता पर शिवप्रसाद जोशी 

अदनान, शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़ खुलता है- उसकी यह काव्य-पंक्ति उसका परिचय है।

अपने जीवन के तीसरे दशक में दाख़िल हो चुके अदनान कफ़ील दरवेश का यह तीसरा कविता संग्रह है। ठिठुरते लैम्प पोस्ट और नीली बयाज़ के बाद पाठकों आपको सामने लानत का प्याला है और ध्यान रहे कवि उस प्याले को ख़ुद पर ही उड़ेल देने को तत्पर है। यह कर दिखाने की ताब हममें से बहुत ही कम लोगों को हासिल है। अदनान उन चुनिंदा व्यक्तियों में से है जिनके पास ख़ुद को लानत भेजने का माद्दा है, ख़ुद को फटकारने का साहस है, और ख़ुद पर सवालों की तीखी बौछार गिराने का हौसला है। कविता में भीगा हुआ, डूबा हुआ, उससे तरबतर मनुष्य है- हिंदी की इस भाषा को समकालीन समय में नसीब हुआ कवि अदनान- जो सिर्फ़ अपने देस, अपने मुलुक और अपनी ज़बान का ही नहीं- वृहद वैश्विक मनुष्यता और व्यापक वैश्विक जनचेतना का पहरेदार कवि भी है। अपने संताप और अपने दु:ख और अपनी घुटन को अदनान ने इतना कसा, इतना भुगता, इतना तपाया है कि उस प्रक्रिया की निष्पत्ति में सिर्फ़ कविता ही पैदा हो सकती है, तभी वह कह पाता हैः भाषा की ठंडी पीठ पर मुझे जलानी ही होगी कविता की सुलगती आग।


कविता से पहले/अच्छी कविता/अमरूद/मुझे ये सब अच्छा लगता है…’  ये अदनान की कविता का जादू ही हो सकता है कि कविताओं क शीर्षक-क्रम भी मानो दूर तक खिंची चली आती एक लंबी कविता है या चार-पाँच या पाँच-छह लाइनों या दो तीन लाइनों या एक ही लाइन वाली कविता। शीर्षकों की फ़ेहरिस्त में भी कविता का महीन धागा यहां से वहां गुज़रता हुआ, काँपता हुआ सा है, वे मानो धुनें हैं लिपटी हुई उलझी हुईं किसी बचपन की स्मृति से, कोई पेड़ या पलंग या छाता या लालटेन या रस्सी या दोस्त या हवा या पानी या मिट्टी या महक से गुंथी हुई। पानी में तैरती पत्तियाँ, हवा में लहराती कनातें, ज़मीन में धंसी जड़ें- जो न जाने कितनी तहों में कहीं कुलबुलाती रहती हैं, एक-दूसरे को पुकारती हैं, एक-दूसरे के पास जाती हैं और एक-दूसरे से बरसों की बिछड़ी की तरह लिपट जाती हैं। “Give me your hand from the deep zone of your disseminated pain (अपने फैले हुए दर्द के गहरे घेराव से अपना हाथ थमाओ मुझे) – पाब्लो नेरुदा अपनी एक प्रसिद्ध कविता में कहते हैं। हमारा कवि भी अपनी कविताओं के ज़रिए पीड़ित, पुकारती मनुष्यता से यही कहना चाहता है। क्या वापस कवि के लिए भी ऐसी करुणा और साहस भरी आश्वस्ति हम दे सकते हैं जिसकी कविताओं में झाड़ियों सी जलती है रात।   


कुछेक वर्षों के अंतराल पर आए अदनान के कविता-संग्रहों का ओज बढ़ता ही जाता है, कविता नये नये चक्कर बनाती हुई लौटती है और उसकी धुरी में एक कवि-हृदय की दीप्ति प्रखर होती जाती है। वहां प्रेम, शाम, मुलाक़ातों की मीठी सी यादें हैं लेकिन एक नागरिक के जीवन के तहस-नहस होने का ऐतिहासिक सिलसिला इस कदर एक बेकली और रुंधी हुई ख़ामोशी में दर्ज हुआ है कि पढ़ते हुए एक गहरी टूट, एक तीखी घुटन, एक शर्मिंदगी, एक अफ़सोस दिल पर धम-धम बजता हुआ उतरता जाता है। उसकी चोटें हमारी याददिहानी हैं। आने वाली पीढ़ियां पढ़कर जानेंगी कि उनका कवि सिर्फ़ कविता ही नहीं कर रहा था।


अदनान प्रकांडता और पांडित्य की धज से फूटने वाला कवि नहीं, सुदूर स्मृति के एक गांव से उसके ही पेड़ की किसी शाख की तरह झुका और टूटा-निकला एक बेकल नौजवान है जो अपने बचपन की स्मृतियों और आज के सपनों-विसंगतियों को एक साथ गूंथता हुआ, एक-दूसरे में उन्हें पिरोता हुआ, समकालीन यातना का एक असाधारण बिम्ब बना रहा है। जिसे मालूम है कि बहुत जोर की आंधियाँ चल रही हैं और नयी गर्जनाएं उसकी ओर बढ़ी चली आ रही हैं, वह कुछ कुछ वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉल्टियूड उपन्यास के आत्मनिर्वासित और अकेले, बूढ़े जिप्सी कीमियागर मेल्केदिएस जैसा है जिसे दुनिया के विकट यथार्थों जितना ही यक़ीन अपनी अपार, नाज़ुक कल्पनाओं पर है लेकिन वो अवश्यंभाविता के लिए नहीं एक मानवीय प्रयत्न और जिजीविषा की खातिर खड़ा है। अदनान को भी यक़ीनन कविता से किसी सर्वकालिक महानता का तोहफ़ा नहीं चाहिए, कवि के पास तो पहले से लानत का प्याला है! बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने कहा था कि सारी कलाएं एक महान कला की रचना करती हैं और वो है जीने की कला। मंगलेश डबराल की एक कविता  के हवाले से कहें तो अदनान की कविता इसीजीवन की एक आवाज़ है जो अनेक आवाज़ों में सुनाई देती है। ज़िंदगी की रोशनियां उनकी कविता में झिलमिलाती रहती हैं और वह दृश्य बचा रहता है जो चारों तरफ़ अदृश्य हुआ जाता है।