Thursday, May 21, 2026

`किसी अनजान ढाणी` से एक खरी-बेचैन आवाज़



``एक आवाज़ आई ये देश महान है
मैंने ग़ौर से देखा तो सदियों से
रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवाय
कुछ दिखाई नहीं दिया।
बेशक ग़ौर से देखना किसी दिन
भेंट चढ़ा देगा मुझे
या तो राजा की या फिर देवताओं की।``

कपिल भारद्वाज का संग्रह `बौने प्रहसन और अन्य कविताएं` आज सुबह का हासिल है। किताब को व्यवस्थित ढंग से पढ़ने के बजाय आदतन एक ख़राब पाठक की तरह यहाँ-वहाँ से पढ़ता रहा। कभी कोई पन्ना, कभी कोई लाइन। कविता `राजा नंगा है` की इन लाइनों पर ठहर गया। यह कपिल का देखने का तरीक़ा ही है जो उसकी कविता में असर पैदा करता है। `सदियों से रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ` जैसी कोई बात अचानक उसकी साधारण सी लगने वाली किसी भी कविता में आती है और उसे अलग बना देती है। बक़ौल कवि मोहन मुक्त, देवताओं की जगह ईश्वर लिख कर कवि आसान रास्ता निकाल सकता था लेकिन तब बात बदल जाती। कपिल की इस कविता की आख़िरी पंक्ति है- `...ग़ौर से देखना कैसे छोड़ दूं`।

ज़ाहिर है कि कपिल भारद्वाज की बड़ी ताक़त देखने की ईमानदारी है। आँखों के साथ बाँधी गईं अपने परिवेश की पट्टियों (blinders) को हटाकर ब्राह्मणवाद को देख पाना सबको नसीब नहीं हो पाता। बल्कि, देखकर भी उसे धर्म या ईश्वर जैसे शब्दों की ओट में छुपा लेने की अक़्लमंदी से बचने का हौसला हर कोई नहीं करता। देखने के ख़तरे कवि जानता है।

बहरहाल कपिल की यह कविता पढ़ते हैं-

।।राजा नंगा है।।

एक आवाज आई ये राजा रंगबिरंगा है
मैंने गौर से देखा तो रंग बिरंगी पेंट से अधेड़
लेकिन चिकने चूतड़ नजर आए।

एक आवाज आई सब मजे में जी रहे हैं
मैंने गौर से देखा तो जेल में बंद कभी आनन्द तेलतुमबड़े
तो कभी सुधा भारद्वाज दिखाई दिए।

एक आवाज आई ये देश महान है
मैंने गौर से देखा तो सदियों से
रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवाय
कुछ दिखाई नहीं दिया।
बेशक गौर से देखना किसी दिन
भेंट चढ़ा देगा मुझे
या तो राजा की या फिर देवताओं की।

फिर भी गौर से देखना कैसे छोड़ दूं!
--

कपिल की कविताओं के पन्ने जल्दी-जल्दी उलटते-पुलटते हुए समझ में आया कि उसकी बेबाकी के पीछे उसकी नज़र के साथ जो एक और ताक़त है, वह है मुसलसल बेचैनी। साफ़ नज़र और बेकली से पैदा होने वाली उसकी समझ उसकी कविता को अच्छी-सिद्ध कविता होने के ख़तरे से बचाए रखती है और इस तरह कवि और उसकी कविता हर तरह के संस्थानों-अनुशासनों-प्रशिक्षणों और संरक्षणों से निरापद हैं। `निरापद रहो!` उसकी एक कविता भी है-

निरापद रहो!

मुझसे कहा जाता है
निरापद रहो
किसी न किसी दिन एक सन्देश आयेगा
और तुम जेल में सड़ते रहोगे बरसों या मारे भी जा सकते हो।

सांप के जैसी चिकनी त्वचा वाले
अक्सर मुझे यही कहते रहते हैं
निरापद रहो वरना...।
--

कपिल के यहाँ एक तरह की आवारगी की गंध है या एक सुव्यवस्थित जीवन से बचने की; पंजाब के कवियों के राग-विराग की और बग़ावत की। वह शिवकुमार बटालवी (जो उसकी एक कविता में भी आया है) की तरह दु:ख के रूमान को गाकर काम चला सकता था, इसकी गुंजाइश उसके भावनात्मक ढांचे में झलकती भी है लेकिन समाज के दु:खों से उसका रिश्ता इतना गहरा है कि वह ऐसे किसी मर्ज़ में तबाह होने से बचा रहता है। वह सचेत है- `दु:ख व्यक्तिगत कम राजनैतिक और सामाजिक ज़्यादा है`।

कविता `दु:ख - 1` में कपिल अपने मिज़ाज के विपरीत पंक्ति दर पंक्ति सधी हुई लय में बहता है और अंतत: इस नतीज़े पर पहुँचता है कि ``दु:ख व्यक्तिगत कम राजनैतिक और सामाजिक ज़्यादा है``। तो उसकी कविता के सरोकार सामाजिक हैं, उसकी नज़र बार-बार वहीं लौटती है:

।।मंच का जादूगर कवि।।

कौन सी भाषा में बिलखता है बच्चा
जब उसकी मृत माँ की चूचियों से दूध नहीं आता?

मैंने पूछा एक मंच के जादूगर कवि से
जो टेलीविजन में आँखें गड़ाकर देख रहा था
व गदगद हो रहा था
एक मरी हुई माँ की छाती पर रोते बच्चे वाले दृश्य को देखकर।

बमों और गोलियों की आवाज़ों से अपनी पांडुलिपि रंगने वाले
उस कवि ने मुझे ऐसी नज़रों से देखा
जैसे बम गिराने वाले ने मरने वालों को देखा होगा।
--

कपिल की कविता के सरोकार समाज में हैं तो उसकी कविता बार-बार राजनीति की बात करती है। साफ़ बात जिसमें दो अर्थ की गुंजाइश या अमूर्तन की हुनरमंदी नहीं है। दुतरफ़ापन से, दुचित्तेपन से उसे चिढ़ है और इस कसौटी को वह कवियों-लेखकों के लिए भी दोहराता रहता है। उसकी कविता में आत्मुग्ध मसखरे, होर्डिंग या तानाशाह को ठीक-ठीक पहचाना जा सकता है।

कपिल कई बार तंज़ के ज़रिये भी इस फ़ासिस्ट दौर की विडम्बनाओं और कारगुज़ारियों को बख़ूबी निशाना बनाते हैं। उनकी यह कविता ``लोकतंत्र में वेज बिरयानी`` पढ़िए:

पहाड़ की चोटी पर बने होटल के बाहर लगी थी एक तख्ती
जिस पर लिखा था 'यहाँ प्योर वेज बिरयानी मिलती है'।
दरभंगा से आए मजदूर के बेटे ने पढ़ा तख्ती को
और अपने पिताजी से पूछा 'वेज बिरयानी' का अर्थ तो
मजदूर ने कहा 'आहिस्ता बोलो बेटे'।

कथावाचक ने माइक से कहा -
'माँस खाने वाले राक्षस होते हैं'
(लाखों भूखे लोग सिहर उठे)
कथावाचक के हारमोनियम वाले ने जोर से झटका
हारमोनियम का तार और मन ही मन मुस्कुराया
मानो कह रहा हो 'वेज बिरयानी तो फेवरेट है मेरी'।

टेलीविजन स्क्रीन पर एक संभ्रांत महिला पत्रकार ने
चीखते हुए दोहराया कि 'माँस खाने वाले लोग हिंसावादी होते हैं'
और कैमरा ऑफ होते ही मँगवाई एक वेज बिरयानी की प्लेट।

चिकन बिरयानी छोड़ो और वेज बिरयानी खाओ
मुर्गियों को दाना डालते हुए कह रहा था एक अभिनेता।

लोकतंत्र है और वेज बिरयानी का विज्ञापन है
बाकी सब असत्य है इस महादेश में
चूल्हे, चूल्हे में पड़ी राख, पेट और पेट में जलती आग
सब असत्य है सिवाय वेज बिरयानी के।
--

यह कवि अपनी कविताओं के सम्पादन से लेकर उन्हें क़द्रदानों की निगाह में लाने जैसे हर काम में बेपरवाह लगता है। गो कि कविताओं को लेकर उससे और संज़ीदगी की अपेक्षा ज़रूरी है लेकिन क़द्रदानों के प्रति उसका रवैया वाजिब है और उसके खरा बने रहने की उम्मीद बढ़ाता है- ``कविता के क़द्रदानो\तुम सब रंगे हुए सियार हो``।

कवि हिन्दी के साहित्य उद्योग की मेहरबानियों से शर्मिन्दा नहीं है तो यह उसकी पेश-आगाही ही है-

जब तस्कर बन जाएं समीक्षक
तो कवि को रहना पड़ेगा उनसे दूर
खेतों में बनी किसी अनजान ढाणी* में।
(कविता के नकली क़द्रदान)

हिन्दी कविता के सितारों के चमकीले मेकअप वाले मृत वाक्य उनकी कविताओं को तमाम चर्चाओं के बावजूद जान नहीं बख़्श पाते। लेकिन, कपिल की संवेदनाओं और सरोकारों का खरापन उसकी कविताओं में अचानक किसी पंक्ति में, किसी बिम्ब में, कन्ट्रास्ट दिखा देने वाले किसी दृश्य विधान में कौंद जाता है:

क्या मालूम कल को रोटी सिर्फ़
दो-चार प्लेटों में ही रह जाएं और बाकी लोग
गेहूँ की खाली बोरी को ओढ़कर
बरसते बादलों के बीच से गुज़र जाएं।
(एक विकृत चेहरा)

किताब की भूमिका में अशोक भाटिया लिखते हैं - ``...टकराहट, विक्षोभ और आक्रोश में कवि कई बार बात के खरेपन को तरजीह देता है। कुछ पंक्तियाँ देखें-
1. हमारी सांस्कृतिक लड़ाई को एक दिमाग़ नियंत्रित कर रहा है।
2. ईश्वर को, धर्म को और आस्था को डाल रखा है ऑनलाइन वेबसाइट पर।
3. हिन्दू देश की गलियों में फिरती गायें\सुअरों के साथ सेंकती हैं अपनी देह धूप में।``

गोकि खरेपन को तरजीह ही सच्ची कविता की सबसे बड़ी ज़रूरत है और इस दौर की कविताओं में प्राय: इसी का अभाव है। कपिल के यहाँ बाज़ दफ़ा अखरने वाले प्रतीक आते हैं तो भी उनकी ईमानदारी पर शक नहीं होता जबकि बड़े चौकन्ने रहकर पॉलिटिकली करेक्ट दिखने की कोशिश करते रहने वाले बहुत से कवियों की सेंसेबिलिटी संदिग्ध बनी रहती है।

कपिल भारद्वाज की जिस नज़र की बात इस टिप्पणी के ठीक आरम्भ में उनकी कविता के टुकड़े से की थी, समापन भी उनकी ऐसी ही एक कविता `मुक्ति` से कर रहा हूँ:

``कृष्ण का रथ ज़रूर देखिए
ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार पर खड़े हुए
एक सौम्य मुख के स्वामी व टीकाधारी कह रहे हैं
ऐसा रथ है कि देखने भर से
मुक्ति पा जाए आदमी।

ब्रह्मसरोवर के दूसरे द्वार पर भीख मांग रही
एक भिखारिन ने दूसरी भिखारिन से कहा - ऐ बहन
सुबह से न भात न चावल
लगता है मुक्ति हो जाएगी शाम तक
--


कपिल भारद्वाज हरियाणा में रहते हैं। उनका पहला कविता संग्रह `फिर देवता आ गए` 2021 में प्रकाशित हुआ था।

*ढाणी - गाँव से दूर खेतों में बसे कुछेक घरों का समूह।