या हडप्पन बाद के
जो कोई भी थे मेरे पुरखे
उन्होंने कभी नहीं कहा ....'मेरा पहाड़'
कम से कम रिकॉर्ड तो यही बताते हैं
अगर कहा भी हो
तो कैसे जानें
उनकी तो बची नहीं भाषा भी कोई
जो कुछ बच गया
उनकी भाषा का
वो गाली बन गया
भाषाविद कहते हैं
कि 'डूम' शब्द आर्य भाषा का नहीं है
खशो ने बनाया 'खशदेश'
उन्होंने जरूर कहा ....'मेरा पहाड़'
गुप्तों के अधीन कत्यूरियों ने कहा....'मेरा पहाड़'
आर्यों ने कहा गंगा मेरी तो..... 'मेरा पहाड़'
नीलगिरी पर कब्ज़ा छोड़े बिना
विंध्य को लांघकर
सारी बुद्ध प्रतिमाओं को
शिव बनाकर
शंकराचार्य ने कहा .....'मेरा पहाड़'
मैदानी चन्दो ने कत्यूरियों को कहा खदेड़कर अब ...
.....'मेरा पहाड़'
नेपाली गोरखाओं ने चंदों से छीनकर कर कहा गरजते हुए
.......'मेरा पहाड़'
काली के इस तरफ़ ना आना
सागौली में अंग्रेज ने धमकाकर कहा गोरखों से.... 'मेरा पहाड़'
मल्ल पंवार कहते रहे ......'मेरा पहाड़'
गंगोली मड़कोटी राजा ने भी कहा... 'मेरा पहाड़
राजा का राजपुरोहित
उप्रेती भी कहता रहा... 'मेरा पहाड़'
कहा जाता है कि उसने मार दिया था राजा
उसकी जगह बैठाए
गुमानी के मराठी पुरखे भी बोले ...'मेरा पहाड़'
नेपाल के ज्योतिष
जिन्हें राजा ने दी
पोखरी की जागीर
वो कहने लगे.... 'मेरा पहाड़'
महाराष्ट्र से आये डबराल ने तो
अपना नाम ही रखा हिमाल के डाबर गांव पर
और कहा .......'मेरा पहाड़'
थानेश्वर कुरुक्षेत्र से आये
जनार्दन शर्मा के वंशज
मंदिर में पाठ करने के चलते कहलाये पाठक
वो सगर्व और साधिकार कहते हैं ...'मेरा पहाड़'
जो भी कहता है 'मेरा पहाड़'
वो प्यार नहीं करता
वो जताता है दावा
जीती गई
लूटी गई
छीनी गयी
कब्जाई गयी
और बांटी गयी
ज़मीनों पर
जागीरों पर
बर्फ जंगल पानी और बुग्याल
किसी के हो कैसे सकते हैं भला
सारे कवि जो मुग्ध हैं पहाड़ों के सौंदर्य पर
जो पहाड़ों को ऊंचाई और मजबूती का रूपक बताते हैं
वो बेईमान हैं
वो शिकार में मारे गए बाघ की लाश पर
उसकी ताक़त का बखान कर
दरअसल गा रहे हैं हत्यारे की प्रशस्ति
सारे राजा
सारे विजेता
सारे हत्यारे
सारे लुटेरे
सारे ज्योतिष
सारे पुरोहित
सारे गुमानी
सारे धर्माधिकारी
और सब के सब कवि एक साथ भी कहें अगर ...
.....'मेरा पहाड़'
तो भी मैं नहीं कहूंगा
मैं नहीं कहूंगा ....'मेरा पहाड़'
मैं कह ही नहीं सकता कभी....'मेरा पहाड़'
दो वजहों के चलते
एक तो ...'मेरा पहाड़' ...ये भाषा नही मेरी
और ज़्यादा मजबूत वज़ह
मैं ही पहाड़ हूँ...................
***
मेरी विचारधारा...
मुझे किसी संस्कृति से प्यार नहीं
मुझे किसी सभ्यता से प्यार नहीं
मुझे किसी गांव से प्यार नहीं
मुझे किसी क्षेत्र से प्यार नहीं
मुझे किसी प्रदेश से प्यार नहीं
मुझे किसी देश से प्यार नहीं
मुझे किसी धर्म से प्यार नहीं
मुझे किसी जाति से प्यार नही
मुझे किसी भाषा से प्यार नहीं
मुझे किसी 'परिभाषा' से प्यार नहीं
मैं ख़ुद को और ख़ुद जैसे दूसरे सभी इंसानों को किसी तारे की धूल के अलावा कुछ नहीं मानता
वो इसके अलावा कुछ हो भी नहीं सकते
यही अब तक जाना पहचाना गया वस्तुगत, गतिमान,वैज्ञानिक और गरिमापूर्ण सच है
मैं इंसानों से प्यार करता हूँ और डूबकर करता हूँ,
जिन्हें प्यार किया है और करता हूँ वो जानते हैं कि मैं कैसा प्यार करता हूँ
लेकिन मैं केवल प्यार नहीं करता मैं घृणा भी करता हूँ
हर उस संकीर्ण विचार से घृणा करता हूँ जो तारे की एक मुट्ठी धूल को दूसरी मुट्ठी धूल से बेहतर या बद्तर मानता है
यही प्यार और घृणा मेरा बोध अस्तित्व और चरित्र है
यही मेरा सब कुछ है
केवल यही मेरी विचारधारा है...... और कुछ नहीं...
***
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| मोहन मुक्त |
जादू
अकारण ही की जानी वाली नफ़रत
बस यूँ ही बिचकाए गए चेहरे
एक अजीब सी अलग सी दुर्लभ सी
लेकिन रोज़ ही दिखने वाली मुस्कुराहट
जिससे धक्क होती है
सायास बनाया गया फ़ासला
कभी उल्टी किये गए शब्द
और कभी घोड़े की नाल की तरह
मुंह मे ठोकी गई बुदबुदाहट
मुझे देखते ही मुँह और नाक पर रख लिए गए अदृश्य रुमाल
और ख़ामोश लेकिन घृणा से लबरेज निगाहें
क्या क्या नहीं देखा है मैंने
लेकिन सच कहता हूँ
इतनी बारीक लेकिन साफ़ साफ़ चीज़ों को देखने बाद
हर बार मैंने अपने चेहरे को आईने में देखा है
अपने गालों को कोमलता से छुआ है
जीवन और जिजीविषा से भरी अपनी आँखों को चूमा है
ख़ुद को भर लिया है
अपनी स्नेहिल बाहों में
बहुत बहुत देर तक
सहलाया है अपना माथा
अपने आलिंगन को ख़ुद में पैवस्त कर
मैं थोड़ा सुबकता हूँ
घृणा के हर तमाचे के बाद
मैं छोटे बच्चे सा ख़ुद के पास आता हूँ
लिपट जाता हूँ ख़ुद से माँ की तरह
कहता हूँ ख़ुद से
तुम नायाब हो
बेमिसाल हो
मेरे हाथ मुझे छूते हैं ...त्वचा के पर्दे के पार
कहते हैं मेरे चेहरे से
तुम सबसे ख़ूबसूरत हो
और मेरा चेहरा मेरे हाथों से बोलता है
तुम कोई जादू हो क्या ???
***
('हम ख़त्म करेंगे' कविता संग्रह से)
चयन
या तो धीरे धीरे सिको
धीमी धीमी आंच पर देर तक 'कालजयी' महाकाव्य जैसे
बनो सुगंधित स्वादिष्ट प्रशंसनीय और सुपाच्य
या रह जाओ अनगढ़ शब्द
जैसा कौंधा था ख़याल आदिम
उमड़ी थी नफ़रत
उबला था दिल
कंकड़ की तरह गड़ जाओ
जबड़ों में
आंखों में
और ज़ेहन में तुरंत
छील डालो मसूड़े ...
बहाओ खून...
रंग को कर दो भंग
हो जाओ अवांछित
तुम्हें खाया जाना तय हो चुका है
अब तुम चुनो अपनी भूमिका
कि तुम्हें तारीफ़ के साथ पचाया जायेगा
या थूक दिया जाएगा
गाली और ख़ून एक साथ उगलते हुए...
***
लोक संस्कृति
मोहन उप्रेती
गिरीश तिवारी
और नारायण दत्त तिवारी भी
बजाते थे गज़ब का हुड़का
सच में.... वो शानदार हुड़का बजाते थे
जिस दिन आप कह दोगे
कि मोहन उप्रेती
गिरीश तिवारी
और नारायण दत्त तिवारी
तीनों बेमिसाल हुड़क्या थे
उस दिन से मैं भी लोकसंस्कृति का संरक्षण करूंगा.....
*हुड़का =प्रसिद्ध वाद्य जो ख़ास तौर पर कुमाऊं हिमालय के कई हिस्सों में बजाया जाता है और सामान्यतया मृत जानवर की खाल से तैयार किया जाता है
*हुड़क्या = वंशानुगत तौर पर हुड़का बनाने और बजाने वाली दलित जाति
***
पुष्प की अभिलाषा...
जो अभिलाषा बताई गई
वो चतुर्वेदी की अभिलाषा थी
वो फूल की अभिलाषा नहीं थी
फूल की कोई चाह नहीं थी
उसे तो खिलना था
महकना था
बिखर जाना था
इच्छा क्या होती है
फूल नहीं जानता
जाना हुआ या जानने लायक
कोई उद्देश्य नहीं होता
फूल की ज़िंदगी का ...फूल के लिए
काश कि मैं भी फूल होता
मुझे बहुत अफ़सोस है
कि मैं फूल नहीं हूं
लेकिन फिर भी मेरी ज़िंदगी का एक हासिल है
मैं मुतमईन हूँ
कि मेरी अभिलाषा तय नहीं कर पाएगा
कोई 'माखन'... 'लाल' ...'चतुर्वेदी'...
***
('हिमालय दलित है' संग्रह से।)
लेकिन...
दासों ने
विद्रोह किया
वो लड़े.......
वो हार गये
पकड़ लिये गये
उन्हें खम्बों पर लटकाया गया
वो धीरे धीरे मरे...
तो क्या विद्रोह असफल हो गया
नहीं...
विद्रोह और प्रेम...
कभी असफल नहीं होते
जिस समय
वो मर रहे थे
उस समय
वो दास नहीं रह गये थे...
***
प्रिय कवि के लिये
1
प्रिय कवि... किताब मिली...
गुलदस्ते जैसी...
प्रिय कवि मुझे गले लगा लो
चलो हम दोनों रोयें... फूलों की मौत पर...
मेरे प्रिय कवि
2
प्रिय कवि... उस मंच पर मत जाओ
वहाँ तुम अपनी सबसे प्रिय कविता नहीं पढ़ पाओगे
... वो मेरी भी सबसे प्रिय कविता है
उसे एक बार मेरे मुँह से सुनो
मेरे प्रिय कवि
3
प्रिय कवि
... आपकी ज़बान में शहद है
उन चीटियों को देखो... जो चाशनी में डूबी हुई हैं
त्वचा से सांस लो...
मेरे प्रिय कवि...
4
प्रिय कवि
... पुल मत बनाओ...
मैं नदी के पास पानी पीने आया हूँ
मेरे प्रिय कवि..
5
प्रिय कवि
... मौन मत रहो कभी...
अकेले रहा करो अक्सर
मेरे प्रिय कवि...
***
सुखना लेक पर चाँद
सबसे ख़ूबसूरत जगहों पर भी
उदास और भारी मन ही रहता है
मेरे सबसे क़रीब
मैं क्या करूं
मैं आपके किसी जश्न में शामिल नहीं हूं
जब देश गर्व में डूब जाते हैं
उस समय मैं देखना चाहता हूं
एक कोलाहल से भरे तट वाली झील में
जीते जा चुके चांद का डूबा हुआ प्रतिबिम्ब
या आदिम चुम्बनों को साझा करते बेपरवाह प्रेमियों के साए जिनकी कोई पहचान ना होती हो
लेकिन वो नहीं हैं वहाँ
जब झंडों की संख्या इंसानों से ज़्यादा हो
जब झंडे होंठो के बीच खड़े हो जाएं... दीवार की तरह
बन जाएं पर्दे,
हो जाएं नक़ाब
जब झंडे निर्वात में लहराएं
जब झंडे आदिम ज़ि स्मों की खाल बन जाने पर उतारू हो जाएं
जब झंडे पृथ्वी के साथ चाँद को भी लपेटकर सूदखोर का बही खाता हो जाना चाहें
तो वेग से नीचे की ओर बहते हुए गर्व के ताक़तवर सैलाब के बीच मेरा भारी मन अपनी गहरी उदासी के साथ टिका हुआ है, झील के बीचों बीच
सबसे ख़ूबसूरत जगहों पर भी मेरा मन उदास बना रहता है
शायद यही एक बात है जिसके लिए मुझे ख़ुश होना चाहिए...
(24/8/2023, सुखना लेक,चंडीगढ़)
***
साफ़ नज़र और बेबाक बयान वाले कवि मोहन मुक्त के दो संग्रह `हिमालय दलित है` और `हम ख़त्म करेंगे` प्रकाशित हो चुके हैं। वे ऐसे कवि हैं जो संग्रहों के आने से पहले और साहित्य की मुख्यधारा में प्रकाशित-स्वीकृत होने से पहले या इनके बावजूद पाठकों के बीच गहरा प्यार हासिल कर चुके थे। कविता उनके लिए वर्चस्व के विरुद्ध एक सांस्कृतिक-वैचारिक माध्यम रही और किसी प्रचलित-स्वीकृत मापदंड की उन्होंने परवाह भी नहीं की। बल्कि, उन्होंने वर्चस्ववादी पैमानों को ब्राह्मणवादी कहकर चुनौती दी और उसके बरअक्स कभी तीखी-तेज़ प्रवाह वालीं और कभी लम्बे संवाद वालीं कविताओं के ज़रिये वंचित तबकों के दिलों से वाबस्ता नया बौद्धिक सौंदर्य गढ़ा और गहरा असर छोड़ा है।



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