Wednesday, June 8, 2011

कवि अज्ञेय पर असद ज़ैदी और मंगलेश डबराल





जन्मशताब्दी वर्ष के बहाने अज्ञेय की प्राण प्रतिष्ठा के अभियान में अक्सर यह आरोप मढ़ा जा रहा है कि अज्ञेय की आलोचना करते समय उनकी रचनाओं की अनदेखी की जाती रही है. या कि उनके रचनाकर्म पर गंभीर विमर्श का अभाव रहा है. असद ज़ैदी और मंगलेश डबराल के ये लेख अज्ञेय के रचनाकर्म की विभिन्न `विशेषताओं` की व्यापक, गंभीर और बेबाक पड़ताल करते हैं. ये दोनों लेख समयांतर के जून 2011 अंक में छपे हैं.



अज्ञेय की विफलता
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-असद ज़ैदी
अज्ञेय मूलतः एक यथास्थितिवादी लेखक और चिन्तक थेयथास्थितिवाद के बारे में दो आमफ़हम सी बातें अक्सर भुला दी जाती हैंपहली तो यह कि यथास्थितिवादी आदमी ज़रूरी नहीं कि यथास्थिति की ज़ोरदार वकालत करेबल्कि होता यह है कि वह यथास्थिति का ज़िक्र ही नहीं करतापहले वह सन्नाटा बुनता हैवह बोलता ही तब है जब यथास्थिति के बदलने -- और उसकी उम्मीदों के विपरीत दिशा में बदलने -- के आसार बनने लगते हैंतब भी वह रक्षक/प्रहरी की भूमिका में कम ही सामने आता हैबल्किअगर वह बुद्धिजीवी है तोपरिवर्तन पक्ष के मोर्चे पर नज़र जमाए रखता हैवह वहाँ बारीक तरीक़े से नैतिक और वैचारिक वैधता का संकट पैदा करता हैया परिवर्तन के विकल्प (विकल्प के विकल्पदिखाने लगता हैअज्ञेय एक ऐसे ही आदमी थेदूसरी बात यह है कि यथास्थिति किसी मृतस्पंदनहीन या जड़ स्थिति का नाम नहीं बल्कि एक चलायमान स्थिति का नाम हैं जिसमें व्यवस्था का भीतरी संतुलनशक्ति संरचनाबुनियादी ढांचा और उसे बनाए रखने वाले भौतिक और मानसिक उपकरण अपनी क्रियाशीलता और उपयोगिता बनाए रखेंयथास्थिति अपने को रोज़ पुनरुत्पादित करती हैउसमें ठोकपीट और 'मेंटेनेंसका काम भी चलता रहता है (बक़ौल आलोकधन्वादुनिया रोज़ बनती है).यथास्थिति एक चलती हुई गाड़ी हैऔर जैसा कि इतिहासकार हॉवर्ड ज़िन कहते थे, "You cannot be neutral on a moving train."अज्ञेय भी इस बात को जानते थे.
परेशानी दूसरी थी : अपने समय के यथास्थितिवादी रचनाकारों के सिलसिले की वह सबसे कमज़ोर कड़ी थेअज्ञेय हमेशा किसी "बड़े साहबकी तरह लिखते थे औरउनकी कविता और कथा साहित्य को हमेशा इसी तरह - रियायत देकर - पढ़ा भी गयाबिना रियायत दिए उनको पढ़ना अपने आप को सज़ा देना हैपुराना उपनिवेश ख़त्म होने केएक डेढ़ दशक तक कुछ हवा बची रही और कुछ "ऊँची कुर्सियाँ", या कि उनका आभासबचा रहाफिर ज़माने ने अपनी राह लीआश्रय और ताबेदारी के सामंती-औपनिवेशिकइथॉस और उसकी सलामती पर भरोसा करने वाली बंगले-वाली कविता के लिए गुंजाइश कम से कमतर होती गयीबराबरी की तेज़ धूप में भाप की तरह उड़ जाने वाली कविता कोसाहित्येतर तरीक़ों से बनाए रखे जा सकता थालेकिन ऐसे चैनल पूरी तरह अज्ञेय के नियंत्रण में  थेनए हिन्दुस्तान में शक्ति संतुलन राजभाषा तंत्र को चलाने वाले राजनीतिकमध्यस्थों और हिन्दी विभागों में नव-स्थापितसशक्तीकृत मध्यवर्ग के हाथ में  गया थाइस सेक्टर में अज्ञेय को यथायोग्य मान-सम्मान तो मिलाकिसी तरह कीसंचालाकीय भूमिका  मिल सकीइस सेक्टर का अपना पिछड़ापन थाजो आचार्य रामचंद्र शुक्ल की खींची लक्ष्मण-रेखा से आगे जाने में हिचकता थाऔर शायद अक्षम भी.उनके लिए अज्ञेय की उपयोगिता सीमित थीहालांकि इसमें दोष अज्ञेय का  था.
मेरी पीढ़ी के लिए 'अज्ञेयहिन्दी साहित्य में औसतपनउससे भी आगे देखें तो रचनात्मक बाँझपनके अवतार थेभावहीन भावात्मकताबेजान अनुभवनिष्प्राण भाषाकृत्रिम मुहावरेकिसी दौर में वे प्रतिभा के अच्छे पारखी रहे होंगेपर हर तरह की मीडियॉक्रिटी को अपनी और खींचनेऔर लगभग उसी ताक़त से बाक़ी को विकर्षित करनेकी चुम्बकीयप्रतिभा उनमें ताउम्र बनी रहीअपने जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने अपने लोगों को लामबंद करके 'प्रतिभावानोंकी जैसी सांस्कृतिक और जातीय जमात छोड़ी है वह अपनी मिसालआप हैजिसके ऐसे मुहाफ़िज़ हों उसे दुश्मनों की क्या ज़रूरत!
उन्हें हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद और नई कविता के जनकों में गिना जाता हैक्या इन दावों पर कभी ग़ौर किया गया हैक्या ये हिन्दी विभागों के पाठ्यक्रम की ज़रूरतों से उपजेऔर प्राध्यापकों के गढ़े हुएकामचलाऊ पद नहीं हैंइनके पीछे कोई गहरा ऐतिहासिक विवेक या आलोचनात्मक श्रम नहीं हैज्ञानात्मक अवधारणा या साहित्य के समाजेतिहासकी श्रेणी के बतौर इनकी उपयोगिता संदिग्ध हैऐसे छात्रोपयोगी वर्गीकरण और उनके गिर्द बुने गए विमर्श हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों की समझ को स्थायी रूप से जड़ता कीतरफ़ धकेलते हैंक्या इस बात में अब विवाद की गुंजाइश है कि अज्ञेय के अनेक महत्वपूर्ण समकालीन उनसे कहीं ज़्यादा  प्रयोगशील और आधुनिक थे और साहित्य में उनकायोगदान भी ज़्यादा बुनियादी था?
मैं यह बात किसी निरादर या अवज्ञा-भाव के तहत नहीं कहताऔर  ही मैं अज्ञेय की राजनीति और सामाजिक-विचारधारात्मक आग्रहों को लक्ष्य करके कह रहा हूँक्योंकि वहपक्ष हमेशा ही स्पष्ट था और प्रायः चर्चा में रहता हैमैं यहाँ उनके साहित्य और सौंदर्यशास्त्र कीऔर हिन्दी साहित्य में उनके उस सफ़र की बात करना चाहता हूँ जिसकी तकमील'जय जानकी जीवन यात्रामें  भी होती तो किसी और बदनसीब जगह पर होतीवत्सल निधि का गठन और उसके तत्वावधान में आयोजित बैठकेंव्याख्यान और यात्राएँ  अज्ञेयके लड़ाका जीवन में कोई नया मोड़ नहीं थाबल्कि इस बात की तसदीक़ थी कि उनके पास बेहतर विकल्प नहीं बचा था.
1960 के दशक सेबल्कि उससे कुछ पहले से हीवह अपनी प्रासंगिकता और 'पकड़खोने लगे थे और अपनी भौतिक साधन-सम्पन्नतासांगठनिक कौशलसंसाधन जुटाने कीक्षमता औरऔद्योगिक-सौदागर घरानों में और नेहरू युग की नौकरशाही के दक्षिणपंथी धड़ों में आशनाई के बावुजूद एक सांस्कृतिक बियाबान और निपट अकेलेपन में जी रहेथेदूसरे विश्वयुद्ध के बाद आलमी पैमाने पर शीतयुद्ध के मोर्चे खुले तो अज्ञेय ने फिर से फ़ौजी अफ़सर की तरह हिन्दी प्रदेश की कमान संभाल ली और साम्यवाद-विरोधी स्पेशलसांस्कृतिक दस्तों के गठन का काम करने लगेशीतयुद्ध के मोर्चों पर डटे रहना और कुछ चौकियों को जीत लेना एक बात हैपर कविता और कथा साहित्य की ज़मीन ही शिफ़्ट होचुकी हो तो कैसे सार्थक ढंग से हस्तक्षेप बनाए रखा जाए यह अज्ञेय को समझ में नहीं  रहा थावह एक क्विग्ज़ोटिक घुड़सवार की तरह मरीचिकाओं से लड़ रहे थे.
नई ज़मीन पर उनका नेटवर्क काम करना बंद कर चुका थाऔर उस वक़्त के वैचारिक और तकनीकी तक़ाज़ों को झेल पाने में वह मानसिकबौद्धिक और भावनात्मक रूप सेअसमर्थ थेवह सिर्फ़ मुक्तिबोधशमशेरनागार्जुनहरिशंकर परसाईंराजकमल चौधरीधूमिल और ज्ञानरंजन के लिए ही नहींरघुवीर सहायसर्वेश्वरदयाल सक्सेनाधर्मवीरभारतीमोहन राकेशनिर्मल वर्माश्रीकांत वर्मामलयजविष्णु खरेयहाँ तक कि अशोक वाजपेयी के लिए भी अप्रासंगिक हो चुके थेकिसी वक़्त 'प्रयोगवादीऔर 'आधुनिक'कहा जाने वाला यह रचनाकार सबको नितांत अनाधुनिक और अजब 'नमूनेसा दिखाई देने लगा थाइनमें से कुछ ने मुरव्वत से, 'परिमलियनवफ़ादारी में या निजी कारणों सेअज्ञेय से एक रस्मीशरीफ़ाना ताल्लुक़ ज़रूर रखाबाक़ी साहित्यिक दुनिया बिलकुल बेपरवाह रही. 'नया प्रतीकऔर 'चौथा सप्तकके प्रकाशन ने अज्ञेय की असमर्थता कोलेकर रही सही शंकाओं को भी दूर कर दियाहिन्दी ज़बान और साहित्य में अज्ञेय युग शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयावह आज के उस वेंचर कैपिटलिस्ट जैसे थेजो किसीस्टेज पर अपनी कल्पनाशीलता खो देता है और उसके निवेश डूबने लगते हैं.
सच बात तो यह है कि अज्ञेय ऐसे जनरल थे जिन्हें उनकी अपनी सेना ने ही अपदस्थ कर दिया थाइसमें वामपंथी साहित्यालोचकों का कोई ख़ास योगदान  थाअज्ञेय के इसजन्म-शताब्दी वर्ष में - जो कि शमशेरनागार्जुनफैज़मजाज़भुवनेश्वरअश्क और केदार का भी शताब्दी वर्ष है - अचानक अज्ञेय के प्रशंसकों एक तबक़े ने इस सचाई पर पर्दाडालकर वामपंथी लेखकों पर "अज्ञेय की हत्याका इलज़ाम धरना शुरू कर दिया हैयह हिन्दी के साहित्यिकों का अपना 'राइखस्टाग फ़ायर ट्रायलहैविडम्बना यह है कि हिन्दीके कुछ वामपंथी अध्यापकों ने पूरे वामपंथी आन्दोलन की तरफ़ से इस जुर्म का इक़बाल करके तत्परता से क्षमायाचना और भूल-सुधार की मुहिम सी चला दी हैजो अपराध कियानहीं उसका श्रेय लेने की यह जल्दबाज़ी क्योंनाकर्दा गुनाहों पर यह कैसी शर्मसारी!
अव्वल तो यह गुनाहअगर यह गुनाह है तोसिर्फ़ वाम का किया नहीं हैउसका हिस्सा तो बहुत मामूली हैवामपक्ष अगर अज्ञेय जैसे शीतयुद्ध की कमान संभाले हुए लेखक परख़ामोश रहता तो ज़रूर अजीब बात होतीपर वामपंथी आलोचना ने अज्ञेय का ख़ास नुक़सान भी क्या कियाहिन्दी के बहुत सेवामपंथी प्राध्यापक-आलोचकों ने 1950 के दशक केमध्य से ही 'शुक्ल-संहिताऔर हिन्दी प्रतिष्ठान के द्वारा निर्धारित खेल के नियमों के भीतर ही अपनी वाम अस्मिता परिभाषित की हैऔर अक्सर सांस्कृतिक दक्षिणपंथ के साथबड़ा 'सूझबूझभरा तालमेल रखा हैइन लोगों ने क्या तो अज्ञेय का कुछ बिगाड़ा - और अगर कुछ बिगाड़ा तो मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय को भी कितना बख्शाअकादमिक हलकोंके बाहर संघर्षशील वाम प्रतिबद्धता से प्रेरित साहित्य और समालोचना पर समर्पणवादी दबाव कम थेऔर वाम अंतःकरण वहीं महफूज़ भी रहावामपंथी आलोचना की अस्मिताअज्ञेय-विरोध से तय नहीं हुई हैउसके सरोकार ज़्यादा व्यापक और सामाजिक रहे हैंयह अज्ञेय ही थे जिनका वुजूद वामपंथ से गहरी नफ़रत और किसी भी मुक्तिकामीसामाजिक चिंता से फ़रार में रंगा हुआ है. (वह 'शरणार्थीजैसी तथाकथित विभाजन-विषयक रचना में भी खुदग़रज़ी और साम्प्रदायिक विद्वेष दिखाने से बाज़ नहीं आते).
तो इस नए 'वामपंथी पश्चात्तापका आधार क्या हैऔर इस पश्चात्ताप को वाजिब ठहराने के लिए क्या अतीत को बदलना ज़रूरी हैइस कायापलट को वामपंथी परम्परा कादीर्घ-प्रतीक्षित भूल-सुधार कहा जाए या इतिहास का मनमाना पुनर्लेखनअपनी गुमराही को न्यायोचित ठहराने के लिए सांस्कृतिक प्रतिरोध की परम्परा को इतना धुंधला करदिया जाए िक वर्तमान में प्रतिरोध की जगह सिर्फ़ प्रतिरोध का विमर्श या 'जेस्चरले लेक्या यह उस व्यापक राजनीतिक संशोधनवादी पुनर्गठन का ही एक आसार नहीं है जोआज भारतीय वामपंथ के अनेक हल्क़ों पर एकबारगी क़ाबिज़ हुआ चाहता है.
अब उस मशहूर सेल्फ़ की तरफ आएँ जिसका कि चर्चा अज्ञेय के मामले में अक्सर किया जाता है सिर्फ़ उनके अनुयायी बल्कि अनेक विरोधियों ने आत्मा का शिल्पी,आत्माभिव्यक्ति का मननशील कलाकारअंतर्मन का चितेराआत्म-केन्द्रित मेधा का भटका मेघ इत्यादि कहा हैयह हिन्दी साहित्य विमर्श का एक स्कैंडल ही हैयह कहना तोज़्यादती होगी कि अज्ञेय के यहाँ आत्म (सेल्फ़ही ग़ायब हैपर अज्ञेय का आत्म एक आत्म-हीन आत्म हैवह किसी भी तरह की आन्तरिकता से ख़ाली हैउनका आत्म उनकीत्वचा ही है - बाहर और भीतर दोनों ही तरफ़ सेउनका आत्म ढोलपखावज या तबले जैसे चमड़े मढ़े वाद्यों के तरह है जिनपर बाहर से ज़र्ब पड़ती है तो उनके खोखल में भी वहीझंकार होती है.
जिस कविता 'नाचके हवाले से उनकी काव्य-प्रतिभा और काव्य-विवेक को रेखांकित किया जाता हैवह इस औसतपन का उत्कर्ष ही हैयह जन्मशती का दबाव है कि उत्सवधर्मीमौक़ापरस्ती कि अभिव्यक्ति में ऐसी बोदीसंरचना में ऐसी भोली और अंतर्वस्तु में इतनी लचर चीज़ को कुछ लोगों ने बीसवीं सदी की बहुत महत्वपूर्ण हिन्दी कविता का दर्जा देडाला हैपाठ्यालोचना करने बैठें तो इसकी मुआमलाबंदीइसका इकहरापन और शब्दार्थवाद हैरान करने वाला हैकहते हैं अज्ञेय को अमूर्त से बहुत प्यार थापर उन्हें कभीअमूर्तन का मसरफ़ पता  चला. He was more in love with the idea of love. या बक़ौल ग़ालिब : 'हूँ मैं भी तमाशाई- नैरंगे तमन्ना / मतलब नहीं कुछ इससे कि मतलब ही बरआए.' लेकिन  यहाँ ग़ालिब का लुत्फ़ है  मानीसाज़ीयह कविता तमाशाई और तमाशे दोनों को घटाती और डि-ग्रेड करती हैइसमें यह दुराग्रह बिना किसी तजरबे के व्यक्त करदिया गया है कि दर्शक/रसिक के दृष्टिक्षेत्र में रचना की प्रक्रियारचनाकार की तकलीफ़ और जोखिमरचनाकर्म की भौतिक और लौकिक परिस्थिति आती ही नहींउसकी निगाहसिर्फ़ उसके अमूर्त हासिल ("नाच") पर होती हैऐसी कविता अगर ठाले बैठे राज्यपाल या उपराष्ट्रपति लोग लिखें तो क्षम्य हैपर इसे हाल में एक आधुनिक साहित्य की विभूति,भारतीय साहित्य के 'निर्माता', एक 'नोबेल उम्मीदवारकी प्रतिनिधि रचना और उसकी जीनियस के नमूने के बतौर सगर्व पेश किया गया हैऐसा हमारी हिन्दी ही में संभव है!


कविता का सपाट चेहरा
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-मंगलेश डबराल
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की जन्मशती की धूमधाम के बीच कई तरह से यह कहा जा रहा है किउनका पाठ फिर से किया जाना चाहिए क्योंकि उनमें अपने देश-काल के गंभीर साक्ष्य हैं। ऐसे स्वर भी सुनाई दिये हैं कि हिंदी में अज्ञेय का वही महत्व है जो बांग्ला में रवींद्रनाथ ठाकुर का है। विभिन्न अनुष्ठानोंरजतस्वर्ण और प्लेटिनम जयंतियों या अमृत महोत्सवों के समय लोगों को उदात्त और अतिशय शब्दावली में याद करना हम भारतीयों की चिरपरिचित प्रवृत्ति है। वास्तविकता यह है कि रवींद्रनाथ का प्रभाव बांग्ला समाज और परवर्ती साहित्य पर इतना गहरा है कि कई रचनाकारों ने बहुत प्रयत्न करके उनसे मुक्ति पाने की कोशिश की  सुकांत भट्टाचार्य से लेकर सुनील गंगोपाध्याय तक अनेक लेखकों-कवियों ने उनकी परंपरा से खुलमखुल्ला विद्रोह किया लेकिन अंततः यह पाया कि रवींद्रनाथ की उपस्थिति,उनकी जड़ें बांग्ला संस्कृति में इतनी व्यापक   और बुनियादी हैं कि उनसे पीछा छुड़ाना मुमकिन नहीं। कविताकहानीगीत-संगीतउपन्यासनाटकनृत्य,निबंधचित्रकलारंगकर्मअभिनयहर विधा में वे   इस कदर बैठे हुए हैं। प्रसिद्ध बांग्ला फिल्मकार ऋत्विक घटक कभी-कभी अपनी मुंहफट शैली में कहते थे: "हम जहां भी जायेंहर रास्ते पर वह बूढ़ा दाढ़ी हिलाता हुआ दिखाई दे जाता है।'
रवींद्रनाथ की इस उपस्थिति के संदर्भ में अज्ञेय को देखा जाये तो वह लगभग नगण्य दिखती है और कुछ आश्चर्य होता है कि कवियों की परवर्ती पीढ़ियों पर अज्ञेय की संवेदना और उनके विवेक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सरीखे प्रमुख कवि
जो कि अज्ञेय से अपनी निकटता के दौर में भी सामाजिक रूप से जागरूक कविता लिख रहे थेजल्दी ही अज्ञेय के प्रभामंडल से बाहर  गये। अक्सर देखागया है कि एक पीढ़ी की संवेदना अगली पीढ़ी तक भले ही  जाती होलेकिन उसका विवेक जरूर हस्तांतरितहोता रहता है। अज्ञेय की विडंबना यह है कि उनका काव्यात्मक विवेक उन्हीं तक सीमित रहा और परवर्ती   कविता के काम का नहीं साबित हुआ। यहां तक कि अज्ञेय की तुलना में काफी कम कविता लिखने वाले विजयदेव नारायण साही की कविता से नयी पीढ़ी ने कहीं अधिक संवाद कायम किया। इसी तरह बच्चनजैसे लोकप्रियतावाद की ओर झुके हुए कवि की भाषा ने   शमशेर बहादुर सिंह और रघुवीर सहाय तक को प्रभावित किया। इसमें संदेह नहीं कि तीन सप्तकों के संपादन के माध्यम से अज्ञेय ने नयी कविता की एकबड़ी पीढ़ी को रेखांकित करने का ऐतिहासिक काम किया था और तीनों सप्तकों में शामिल 21 कवियों में से करीब दस कवि अपनी रचना की सार्थकता को अंत तक सिद्ध करते रहे। लेकिन बाद में कविता के नये परिदृश्यऔर नये प्रस्थापना बिंदुओं से अज्ञेय का कितना संबंधरह गया थाइसका एक स्थूल प्रमाण उनके द्वारा संपादित "चौथा सप्तकमें दिखाई देता है जिसमेंशामिल सातों कवि कोई अर्थवान कविता नहीं लिख सके।
आखिर अज्ञेय की विपुल मात्रा में लिखी कविता किसीकाम की क्यों नहीं बन पायी
जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी "नाच', "घर', "चीनीचाय पीते हुए', "मेरे देश की आंखेंजैसी कुछ कविताओं में सत्तर और अस्सी के दशक की कविता का रचाव प्रभाव दिखाई देता हैलेकिन इसके बावजूद उनकी यहनयी प्रयोगधर्मिता स्थायी महत्व की साबित नहीं हो पाती। इसके कारण शायद अज्ञेय की कविता में ही निहित हैं। उन्होंने कविता की प्रक्रियाभाषाव्यंजना और बात के संदर्भ में भी कई कविताएं लिखीं हैं। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि छायावाद से बाहर जाने, "मैले हो चुके उपमानोंऔर "कूच कर गये प्रतीकों के देवताओंसे मुक्ति पाने और प्रेमिका को "ललाती सांझके नभ की अकेली तारिकाकी बजाय "हवा मेंलहलहाती बाजरे की छरहरी कलगीजैसा नया संबोधन देने की कोशिश में अज्ञेय के लिए अपनी कविता काघोषणापत्र लिखना जरूरी था। लेकिन यह प्रयोगधर्मिता शुरू से ही अपनी सीमाओं के साथ प्रकट हुई थी। सन् 1949 की एक कविता में वे कहते हैं: "एक मौन ही है जो अब भी नयी कहानी कह सकता हैइसी एक घट मेंनवयुग की गंगा का जल रह सकता है।दरअसल अज्ञेय का यह मौन वर्षों पहले ही उनकी काव्य संवेदना की प्रस्थापना बन चुका था और वह "असाध्य वीणाको पार करता हुआ आखिरी दौर की "छंदजैसी कविता तक चला आता है जिसमें वे कहते हैं: "शब्द में मेरीसमाई नहीं होगी/मैं सन्नाटे का छंद हूं।अज्ञेय का यह मौन और सन्नाटा हिंदी के अकादमिक जगत औररूपवादी कहे जाने वाले कवियों के बीच प्रबल आकर्षणऔर चर्चा का विषय रहा हैऔर इसे कविता की प्रक्रिया का एक पर्याय मान लिया गया है। यह और बात है कि हिंदी विभागों से बाहर कवियों की विशाल बिरादरी में इस मौन की कोई अनगूंज नहीं सुनी गयी और शब्द कीसीमाएं बतलाने के अज्ञेय के प्रयासों को उनके काव्य की सीमा के रूप में ही देखा गया। आखिरकारकवि शब्दोंके ही कारीगर होते हैं और उनके अनुभवों की सारी समाई शब्दों में ही होनी चाहिए। अज्ञेय की कविता इस बात का उदाहरण है कि एक उत्कट प्रयोगधर्मिता और नयी राहों की खोज अगर किसी उतनी ही उत्कट अंतर्वस्तु और अनुभवों से संपन्न  हो तो वह किसतरह मौन और मूकता के घट में गंगाजल की तरह रखी हुई रह जाती है।
अज्ञेय नाम की त्रासदी की एक तस्वीर डॉ
नामवर सिंह द्वारा संपादित और जन्मशती के उपलक्ष्य में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित "अज्ञेयसंकलित कविताएंसे उभर कर आती है। इसकी कुल153 कविताओं में अज्ञेय के काव्य का भरसकप्रतिनिधित्व करने की कोशिश की गयी है हालांकि भूमिका में कहा गया है कि "अन्य संकलनों की तरह यह संकलन भी संपादक की अपनी रुचि और विवेक का   फल है।बेमन से लिखी हुई साढ़े तीन पृष्ठों की इस सामान्य-सी भूमिका में डॉनामवर सिंह गहरे पानी में  जाकर अज्ञेय की कविता की कुछ स्थूल और बाहरी विशेषताओंउनके कुछ काव्य गुणों का उल्लेख करते हैं। मसलन यह कि "नाटकीयता अज्ञेय की कविता काउल्लेखनीय पहलू है। वह सटीक शब्दों के चयन मेंजितने सर्तक हैं उतने ही कुशल हैं नये शब्दों को गढ़ने में   और ऐसे शब्दों की एक लंबी सूची बनायी जा सकती है जो उन्होंने हिंदी को दिये हैं।या यह कि "वह अपनीकविता में भी कम-सुखन हैं। क्या मजाल कि उनकी कविता में भूल से भी कोई फालतू शब्द  जाये।नामवर जी यह बताना भी नहीं भूलते कि "अज्ञेय मीठे व्यंग्य और विनोद का भी शौक रखते हैं।लेकिन इस भूमिका में डॉनामवर सिंह की दो धारणाएं खास तौर से   गौर करने लायक हैं। एक तो यह कि "ध्यान से देखें तो अज्ञेय हिंदी में प्रकृति के शीर्षस्थ चित्रकार हैं। उनकी कविता की चित्रशाला में कोमल रूप-छवियों के साथ "अंधड़के लिए भी यथोचित जगह है', और दूसरी यह कि "अज्ञेय की सच्ची तस्वीर उनकी "नाचशीर्षक कविता के उस नट की है जो दो खंभों में बंधी हुई तनीरस्सी पर नाचता है।'
हिंदी में प्रकृति के शीर्षस्थ कवि का दर्जा अभी तक सुमित्रानंदन पंत को ही मिला हुआ है। वे पेड़ों
पत्तोंचिड़ियोंबादलोंहिमशिखरोंतारों-नक्षत्रोंसुबह की किरणों और चांद से भरी हुई रातों के आदिकवि हैं। "प्रकृति का भूधराकार शरीरउन्हीं के पास है और उसका "मौन निमंत्रणभी। उनकी बहुत सी कविताओंमें निसर्ग अपने मौन के माध्यम से निमंत्रण देता रहता है। इसी कारण बदलते हुए काव्य यथार्थ के संदर्भ में पंत   की कविता जल्दी ही अप्रासांगिक भी करार दी गयी।लेकिन जब नामवर सिंह सरीखे विद्वान प्रकृति का यहमुकुट अज्ञेय के सर पर पहनाते हैं तो आश्चर्य होता है कि   वे अपनी ही बहुचर्चित पुस्तक "छायावादको भूल रहे हैं और एक ऐसे कवि को शीर्षस्थ बता रहे हैं जो पंत की कविता से छूटी हुई प्रकृति के चित्र उकेरता है। प्रकृति के रौद्र-उद्दाम चित्रकल्प भी अज्ञेय के "अंधड़की तुलना में पंत की कविता में अधिक दिखेंगे। अपनी एक कविता में   वे बादल को पृथ्वी की तरह उड़ते हुए चित्रित करते हैं। दरअसलप्रकृति ही नहींअज्ञेय की संवेदनाशब्द-योजना और चित्रात्मकता पर सबसे अधिक प्रभाव   पंत की कविता का ही है। फर्क शायद यह है कि पंतप्रकृति को एक स्वायत्तमनुष्य से कहीं बड़ी सत्ता की तरह व्याप्त देखते हैं और"द्रुमों की मृदु छायाको छोड़कर किसी "बाले के बाल-जालमें अपने "लोचननहीं उलझाना चाहतेजबकि अज्ञेय "नीड़ों में उमंगों सी चढ़ती डगर', "दर्द की रेखा जैसी नदीऔर "मौन नीड़ोंमें विहग-शिशुको सिर्फ "आंख भरदेखते हैं।
सामाजिक संदर्भों पर लिखी हुई कविताओं को छोड़ देंतो अज्ञेय जब भी प्रकृति की ओर जाते हैं
उनकी संवेदना में पंत हमेशा दस्तक देते रहते हैं: "सामने था आर्द्र तारा नील', "बुझ गया आलोक जग मेंधधकते हैं प्राण मेरे', "रात के सहमे चिहुंकते बाल-खग अब निडर हो चुप हो गये हैं', "यह पथ अगम अंधेरा होअनुभव का कटु फल मेरा हो', "कब कैसे किस आलोक-स्फुरण में इन्हेंमिला दूं/दोनों हैं जो बंधु सखाचिर सहचर मेरे', "नीचे तरु-रेखा से मिलती हरियालीपर बिखरे रेवड़ को दुलार से टेरती हुई सी गड़रिये की बांसुरी की तानइसके कुछ उदाहरण हैं। यह शब्दावली कुल मिलाकर नव-छायावादी हैउसकी संरचना भी "देवि-सहचरी-प्राणजैसी पंक्ति लिखने वाले पंत की रचनाओं से मिलती है और वह प्रयोगधर्मिताजो "कलगी बाजरे कीसरीखी कविताओं में आज भी पाठक को आकृष्ट करती हैफिर से छायावाद की शरण में चली   जाती है। वह प्रकृति को मनुष्य के लिए किन्हीं नये अर्थों में अन्वेषित नहीं करतीजैसा हमें शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल के अत्यंत मर्मस्पर्शी प्रकृति-काव्य में दिखता है। यही नहींशायद हरिवंश राय बच्चनप्रकृति के पर्यवेक्षण में अज्ञेय से अधिक आधुनिक कहे जायेंगे।
अज्ञेय को आधुनिक कविता से एक शिकायत यह रहीकि वह बोलती बहुत हैजबकि "कविता को बोलना नहीं   चाहिए।सच यह है कि हिंदी कविता में मौन की उपस्थिति ज्यादा नहीं है और निरालाप्रसादमहादेवी के छायावाद से शमशेर-नागार्जुन-मुक्तिबोध की त्रयी और फिर बाद के अधिकतर कवियों की रचनाएं अपने देशकाल को मौन के भीतर रूपायित करने की बजाय उसमें हमेशा एक मुखर हस्तक्षेप करती हैं इसलिए इनमें से कोई कवि अज्ञेय का निकटवर्ती नहीं लगता। हिंदी आलोचना इस पर एकमत है कि अज्ञेय की "असाध्य वीणाउनके मौन की सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति है और उनके काव्य-चिंतन का सार भी है। डॉनामवर सिंह भी इस संकलन में कहते हैं कि "कवि की दृष्टि में मौन ही श्रेष्ठ अभिव्यक्ति हो सकता है।मूलतः एक चीनी लोककथा पर आधारित यह कविता अपने पूरे शिल्प-लाघव के साथ उस वीणा से संगीत के अवतरण को संभव करती है जिसे कोई नहीं बजा सका था औरयह तभी संभव होता है जब स्वयं महामौन एक साधक के रूप में उपस्थित होकर वीणा को गोद में लेता है और वीणा स्वयं इस तरह गा उठती है कि उसका स्वर सबके   भीतर गूंजने लगे। किसी श्रोता को उसके स्वर में "तिजोरी में सोने की खनकसुनाई देती हैकिसी को "अन्न की सोंधी खुशबू', किसी को "मंदिर की ताल-युक्त घंटा ध्वनिऔर किसी को "लोहे पर सधे हथौड़े कीचोटें।यानी हर व्यक्ति उसमें अपना प्रिय राग सुन लेता है। ज़ाहिर है कि यह यथास्थिति,आत्म को पहचाननेआत्म-सिद्धि का राग हैउसमें कोई परिवर्तन उपस्थित करने का नहीं। यह वीणा जिस पेड़ की लकड़ी से निर्मित हुई हैजिस प्रकृति,बादलवर्षाकुहरेजीव-जंतुओंगड़रियों की बांसुरी और पर्वतीय गांव के उत्सवों ने उस पेड़ को "अभिमंत्रितकिया हैउस सबका अवतरण और अभ्यर्थना करती हुई यह कविता एक मिथकीयप्रभामंडल की सृष्टि करती हैलेकिन अंततः इतने बड़ेप्रयत्न का विसर्जन सिर्फ एक महामौन में होता है और उसके साथ कवि की "वाणी भी मौनहो जाती है। विडंबना यह है कि यह वह मौन नहीं है जिसमें हिंदी समाज-बल्कि हिंदुस्तानी समाजऔर उसका मन जीता हैबल्कि यह एक अवधारणात्मकअर्ध-दार्शनिक-सा मौन है जो अपनी कोई अनुगूंज नहीं छोड़ताअपना अध्यात्म प्रकट नहीं करता और एक निरावेग-निरात्म शून्य में तिरोहित हो जाता है।
अज्ञेय की एक और कविता
"नाचपर इन दिनों खास तौर से गौर किया जा रहा हैऔर उसे रचनाकार के अंतर्जगत के साक्ष्य के तौर पर पढ़ा जा रहा है। डॉनामवर सिंह ने एकाधिक जगह उसकी चर्चा की है और मार्क्सवादी युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने उस पर एक कुतूहल-भरी टिप्पणीभी लिखी है। बेशक, "नाचअज्ञेय की जानी-पहचानीतत्सम शब्दावली से मुक्तएक चुस्त शिल्प में ढली हुई कविता है जिसमें रस्सी पर चलकर दर्शकों को रोमांचित करने वाले नट की यह विडंबना दर्ज हुई है कि लोगउसकी रस्सीखंभोंरोशनी और तनाव को नहींबल्कि सिर्फ उसके नाच को देखते हैं अर्थात अंतर्क्रिया की पीड़ाको नहीं,उसकी परिणति से ही सरोकार रखते हैं। इस कविता की अंर्तवस्तु निश्चय ही मार्मिक है और नटों के करुण कठोर जीवन से जरा भी परिचित लोग जानते हैंकि उनके अबोध बच्चे तक रोजी-रोटी के लिए किस तरह इस कला में माहिर बना दिये जाते हैं। पूरे देश में फैले हुए नटों की यह परंपरा गरीब तबकों से लेकरसर्कस के कलाकारों तक मौजूद हैऔर सामंती दौर मेंउत्तराखंड जैसी जगहों में राजा के आदेश पर नटों को ढोलक बजाते हुए रस्सियों पर चलना और उनसे नीचे उतरना पड़ता था और इस खेल में कई बार उन्हें प्राण गंवाने पड़ते थे। लेकिन अज्ञेय का यह नट अपनीसामाजिक और वर्गीय चेतना से विच्छिन्नएक हदतक नट का एकांतिक और आद्य-रूप हैजीता-जागतानट नहींबल्कि उसका एक प्रतीकजो देशकाल-विहीन अपने निस्संग अकेलेपन में एक रस्सी पर चलता है और   जिसे देखकर एक तकलीफदेह कला पर गुजारा करने वालों की याद नहीं आती।
"
नाचअगर पाठक को विचलित नहीं करती और सिर्फकुतूहल पैदा करके रह जाती है तो इसकी वजह यह है कि उसमें उस वस्तुगत सह-संबंध(ऑबजेक्टिवकोरिलेटिवका अभाव है जिसे तमामआधुनिकतावादियों के आदर्श टीएस एलियट कविता के लिए लगभग अनिवार्य मानते थे और जिससे कथ्य के अंतर्संबंधों की विश्वसनीय पहचान संभव होती है। कविता यह बताने से चूक जाती है कि नट आखिर क्यों गांठ को खोलकर रस्सी के तनाव में ढील देना चाहता है (वैसे भी यह तथ्य का निषेध है क्योंकि कोई नट ऐसानहीं चाहताऔर दर्शक क्यों रस्सीगांठतनावरोशनी   और खंभे की अनदेखी करते हैं। यथार्थ में नटों के कतरब देखने वाले दर्शक ऐसा नहीं करते। "वस्तुगत सह-संबंधके अभाव में इस कविता का नट बेशक गिरता नहीं हैलेकिन कविता जरूर गिर पड़ती है। इस सह-संबंध के कई उदाहरण खोजे जा सकते हैं। मसलनधूमिल जब "मोचीराममें जब यह कहते हैं कि "सच कहूंबाबूजी/मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है/जो मेरेसामने मरम्मत के लिए खड़ा हैया रघुवीर सहाय "रामदासकविता में बताते हैं कि "रामदास उस दिन उदास था/अंत समय  गया पास था/उसे बता यह दिया गया था/उस दिन उसकी हत्या होगीतो हमें उनकी विश्वसनीयता यानी वस्तुपरक सह-संबंध के लिए कविता से बाहर नहीं जाना पड़ता।
इस संचयन में अज्ञेेय सौ वर्ष बाद एक ऐसे कवि के रूप   में उभरते हैं जिनका भूगोल ऊंचाइयों

-गहराइयों से नहींबल्कि समतल-सपाट रेखाओं से निर्मित हुआ है। इसमें अज्ञेय की कुछ चर्चित कविताएं भी छूट गयी हैं। मसलन, "घृणा का गान', "पराजय है याद', "हरी घास पर क्षण भर', "कांगड़े की छोरियां', "जितना तुम्हारा सच है', "सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान', "बांगर और खादर', "भारऔर"औपन्यासिकजैसी कविताएं इस लिहाज से उल्लेखनीय अनुपस्थिति हैं। भारत विभाजन के समय हुए दंगों पर लिखी गयी "शरणार्थीश्रृंखला की कविताएं भी यहां नहीं हैं जिन पर जाने-माने मार्क्सवादी आलोचक डॉमेनेजर पांडे और कवि राजेश जोशी ने पिछले दिनों काफी सकारात्मकटिप्पणियां करते हुए अज्ञेय के सामाजिक सरोकारों को याद करने की कोशिश की है। लेकिन ये सब कविताएंअगर इस संचयन में शामिल होतीं तब भी इसमें संदेह है कि अज्ञेय अपनी समतल कविता से और हिंदी के अकादमिक सरोकारों से ऊपर उठ पाते। अक्सर लगता है कि कई वर्ष पहले शमशेर बहादुर सिंह ने अज्ञेय के बारे में अपनी जो संक्षिप्त राय दी थी उसमें शायद अज्ञेय का समग्र आकलन था। शमशेर सराहना करने के मामले में अत्यंत उदार थे और उन्होंने शायद ही कभी किसी कवि की कठोर आलोचना की होगी। लेकिन नेमिचंद्र जैन और मलयज से अपनी लंबी बातचीत में उन्होंने अज्ञेय के बारे में दो टूक ढंग से एक महत्वपूर्णबात कही थी: "अज्ञेय एक चतुर शिल्पी हैं। इससेअधिक कुछ नहीं। ही इज  फाइनेस्ट क्राफ्ट्समैनबट हिज लैंग्वेज इज नॉट अवर लैंग्वेज।कहना  होगा कि अज्ञेय के बारे में अंतिम सत्य काफी पहले कहा जा चुका था।

Tuesday, May 24, 2011

नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तीं



अनिल यादव १९९४ में अचानक मुज़फ़्फ़रनगर के अमर उजाला के दफ्तर में नमूदार हुए थे. दरअसल, अमर उजाला के मुज़फ़्फ़रनगर जिले के प्रभारी जितेंद्र दीक्षित गंभीर रूप से बीमार हो गए थे, जिस वजह से अनिल को मेरठ से हमारे इस कस्बाई शहर में रवाना किया गया था. मैं तब अपनी चौबीसों घंटों की मस्त आवारगी को अखबार की चौबीसों घंटों की अहमकाना रिपोर्टिंग के जुनून में तब्दील कर चुका था. वे दो-ढाई महीने मुज़फ़्फ़रनगर में बिताकर चले गए. उसके बाद बरसों तक उनसे कोई मुलाक़ात नहीं हुई पर उनके किस्से यहाँ-वहाँ सुनने में आते रहे. ये किस्से किसी संपादक-मालिक को किसी खबर से परेशानी में डाल देने, वजह-बेवजह टकरा जाने, किसी रात किसी कब्रिस्तान में होने या किसी गुम्बद पर रात काट देने से लेकर किसी भी हद तक रोमांचित करने वाले हुआ करते थे. किस्से सुनाने वाले इस शख्स की बेपरवाहियों को मिथक की तरह सुनाते गए और धीरे-धीरे अख़बारों की दुनिया में बड़े पदों पर सुरक्षित होते गए. जाहिर है, अनिल यादव की `हाकिम-ए-शहर` से टकराने की जो चीज़ यारों को आसानी में रखने में मदद करती थी, अब उन्हें अपने सुरक्षित ठिकानों को मुश्किल में डालने वाली लगने लगी थी.
एक दिन अचानक खबर मिली कि हजरत दाग़ की नसीहत मानते हुए यह क्रोनिक किस्म का `आवारा` घुमक्कड़ प्रेम की छाँव में जा बैठा है (गो घुमक्कड़ी अभी तक जारी है). और अफसानों के केंद्र में रहने के बाद अफसानानिगार बन चुका है. उनके पास ज़िंदगी के ठेठ अनुभवों का जखीरा है, जो उन्होंने मुश्किलें उठाते हुए बल्कि मुठभेड़ करते हुए पायी हैं और अखबारों की ख़बरों में गर्क होती रही शानदार भाषा है.

अनिल यादव के पहले कहानी संग्रह ‘नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तीं` पर हमारे समय के महत्वपूर्ण कहानीकार-विचारक योगेंद्र आहूजा की राय गौरतलब है-
`हिंदी में कहानी की दुनिया में इस वक्त एक खलबली, एक उत्तेजना, एक बेचैनी है। एक जद्दोजहद जारी है कहानियों के लिए एक नया स्वरूप, नयी संरचना, नया शिल्‍प पाने की। इस जद्दोजहद का हिस्सा अनिल यादव की कहानियां भी हैं। इस समय जबकि संकल्पनाएं टूट रही हैं, प्राथमिकताएं बदल रही हैं, हमारे राष्‍ट्रीय और सामाजिक जीवन में नयी सत्ताएं और गठजोड़ उभर रहे हैं, आर्थिक संबंध तेजी से बदल रहे हैं और उसके नतीजे में सामाजिक ढांचा और यथार्थ जटिल से जटिलतर होते जा रहे हैं – स्वाभाविक है कि उन्हें व्यक्त करने की कोशिश में कहानी का स्वरूप वही न रहे, उसका पारंपरिक रूपाकार भग्न हो जाये। लेकिन अपने समकालीनों से अनिल यादव की समानता यहीं तक है, इतनी ही – और उनकी कहानियों का वैशिष्‍ट्य इसमें नहीं है।
अनिल जानते हैं कि नये शिल्‍प के माने यह नहीं कि कहानी शिल्‍पाक्रांत हो जाये या भाषिक करतब को ही कहानी मान लिया जाए। ऐसी रचना जिसमें चिंता न हो, विचार न हो, कोई पक्ष न हो, किसी तरह की बौद्धिक मीमांसा न हो, वह महज लफ्जों का एक खेल होती है, कहानी नहीं। अनिल का सचेत चुनाव है कि वे कहानी की दुनिया में चल रहे इस फैशनेबल, आत्महीन खेल से बाहर रहेंगे। वे कहानियों के लिए किसी ऐसे समयहीन वीरान में जाने से इनकार करते हैं, जहां न परंपरा की गांठें हों, न इतिहास की उलझनें। वे अपने ही मुश्किल, अजाने रास्ते पर जाते हैं। तलघर, भग्न गलियों, मलिन बस्तियों, कब्रिस्तान, कीचड़, कचरे और थाने जैसी जगहों से वे कहानियां बरामद कर लाते हैं। तभी लिखी जाती हैं ‘नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ और ‘दंगा भेजियो मौला’ जैसी अद्वितीय ‘डार्क’ कहानियां, इस पुरानी बात को फिर याद दिलाती हुईं कि एक संपूर्ण और प्राणवान रचना केवल अनुभवों, विवरणों या सूचनाओं से या केवल भव्य और आकर्षक शिल्‍प से नहीं बनती, वह बनती है दोनों की एकता से। ‘लोक कवि का बिरहा’ और ‘लिबास का जादू’ में, अन्य कहानियों में भी, हम देखते हैं कहन का एक नया अंदाज, नैसर्गिक ताना बाना और संतुलित और सधा हुआ शिल्‍प, लेकिन अंततः उन्हें जो कहानी बनाता है, वह है जीवन की एक मर्मी आलोचना। इन कहानियों का अनुभवजगत जितना विस्तृत है, उतना ही गझिन और गहरा भी। आज के कथा परिदृश्‍य में ‘लोक कवि का बिरहा’ जैसी कहानी का, जो एक ग्राम्य अंचल में एक लोकगायक के जीवन का, उसकी दहशतों, अपमान, अवसाद और संघर्ष का मार्मिक आख्यान है, समकक्ष उदाहरण तलाश पाना मुश्किल होगा, और ऐसी कहानी शायद आगे असंभव होगी।

इस वक्त हिंदी की दुनिया में हर जानी पहचानी चीज के अर्थों में तोड़ फोड़ की जा रही है। जहां अस्‍पष्‍टता को एक गुण मान लिया जाए, वहां अर्थों की स्‍पष्‍टता भी एक अवगुण हो सकती है। इन कहानियों में न अस्‍पष्‍टता है, न चमकदार मुहावरे, न एकांत आत्मा का नाटक, न अनंत दूरी पर स्थित किसी सत्य को पाने की कोशिश या आकांक्षा, न आत्मालाप, न आत्मा पर जमी गर्द को मिटाने की कोशिश। लेकिन इनमें दर्द से भरे चेहरे बेशुमार हैं जिन्हें आप स्पर्श कर सकते हैं।`


नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तीं
अंतिका प्रकाशन
सी-५६/यूजीएफ़-४
शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II
ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.)

Monday, May 23, 2011

चन्द्रबली सिंह




वरिष्ठ आलोचक चन्द्रबली सिंह नहीं रहे, यह खबर अभी अशोक कुमार पाण्डेय की फेसबुक पोस्ट के जरिये मिली. वे लम्बे समय से बीमार थे. दो बरस पहले मैं और सुम्मी उनसे बनारस में उनके घर पर मिले थे तो ये धुंधली सी तस्वीरें लीं थीं. चन्द्रबली सिंह ने बातों-बातों में जिक्र किया था कि वाचस्पति और ज्ञानेन्द्रपति लगातार उनका हालचाल लेने आते हैं. दोनों उस दिन भी वहाँ मौजूद थे. एक चित्र में वाचस्पति उन्हें अखबार से पढ़कर कुछ सुना रहे हैं.

Wednesday, May 4, 2011

गुजरात का बलात्कार : दिलीप चित्रे


गुजरात का बलात्कार

(ग़ुलाम मोहम्मद शेख़, तैयब मेहता और अकबर पदमसी के लिए एक कविता-रूपी म्यूरल)

दिलीप चित्रे




नहीं, यह बंबई में बनी किसी मुस्लिम सोशल पिक्चर में 
शिफ़ॉन का पर्दा सरका कर झाँकता कोई रूमानी गुलाब नहीं
जहाँ हर दृश्य में होती है काली रेशम और मख़मल की सरसराहट
और ग़म सितार के तार छेड़ता है
यह तो भय से कांपती नग्न देह से फाड़कर उतारे जाते सारे आवरण हैं
नहीं, यह लरज़ते जज़्बात और एन्द्रिकता से लबालब 
इन्तिज़ार की चाशनी में जन्मा रहस्यमय बिम्ब नहीं
आघात की गहरी सतहों पर कुलबुलाता, छेड़ा गया, कुरेदा गया, कोंचा गया,
बलात्कृत, चीर डाला गया, कतलों में बदल दिया गया, रेशा रेशा किया गया  
योनि तक कुचल डाला गया इंसानी जिस्म है
जिसे सब सूँघ सकें पर कोई बतला न सके
जिसे आग में झोंक दिया गया ताकि उठे वह जाना पहचाना धुआँ
कोई माँ, कोई बेटी, कोई बीवी, कोई प्रेमिका, कोई दोस्त सुरक्षित नहीं है
ये मादरचोद बना रहे हैं भगवा, काले और हरे रंग से एक उत्पाती तस्वीर
ऊँचे और मध्यवर्गीय घरों से निकलकर आए,
फ़रसान का नाश्ता करने वाले, पूजा से पहले पादने वाले
हर भड़कीले मंदिर में पीतल की घंटियाँ और
श्रद्धा के घड़ियाल बजाने वाले
मोबाइल संभाले, डिस्कमैन पर संगीत सुनते,  
उम्दा शहरी कारें चलाते, 90 से ज़्यादा चैनलों का लुत्फ़ लेते
ये भावुक होना चाहते हैं तो व्हिस्की पीते हैं
नरक से आए उपदेशकों के सामने नतमस्तक होकर देते हैं दान
ये हमारे ही परिवार के हैं, हमारे ही दोस्त,
हमारे बग़ल वाले पड़ोसी जिनसे हम दही मांग लेते हैं
जो संक्रांति के दिन पतंग उड़ाते हैं,
दिवाली पर और क्रिकेट में जीत पर पटाखे फोड़ते हैं
जिनके साथ हम पिकनिक पर जाते हैं, सिनेमा देखते हैं,
जो हमें बैठे दिखते हैं हमारे पसंदीदा रेस्तराओं में
जिनकी तीन पीढ़ियाँ 1947 के बाद से ही ये मंसूबे बनाती आई हैं
और अब मौजूद है चौथी पीढ़ी
लेकर अपने अतुलनीय उदात्त का ठोस पाठ जिसका आप कूटवाचन कर सकें 
साबरमती के तट पर बैठकर जहाँ
बापू बच्चों और बकरियों से खेला करते थे दो आज़ादियों के बीच 

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दिलीप चित्रे (1938-2009) मराठी और अंग्रेज़ी के महत्वपूर्ण कवि और लेखक होने के अलावा एक जाने माने फ़िल्मकार, आलोचक और चित्रकार भी थे। उनकी इस अंग्रेज़ी कविता का अनुवाद हिन्दी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने किया है।


Saturday, April 30, 2011

'क्रांति' का जंतर मंतर : अरुंधति रॉय






अण्णा हज़ारे के आह्वान पर हज़ारों लोग जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए थे।



बीस साल पहले जब उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का दौर हम पर थोपा गया तब हमें बताया गया था कि सार्वजनिक उद्योग और सार्वजनिक संपत्ति में इतना भ्रष्टाचार और इतनी अकर्मण्यता फैल गई है कि अब उनका निजीकरण ज़रूरी है। हमें बताया गया था कि मूल समस्या इस प्रणाली में ही है।



अब लगभग हर चीज़ का निजीकरण हो चुका है। हमारी नदियाँ, पहाड़, जंगल, खनिज, पानी सप्लाई, बिजली और संचार प्रणाली प्राइवेट कंपनियों को बेच दिए गए हैं। तब भी भ्रष्चातार सुरसा के मुँह की तरह फैलता जा रहा है।



भ्रष्टाचार की विकास दर कल्पना से परे है। घोटाला दर घोटाला जितनी बड़ी रक़में निगली जा रही हैं उसका कोई हिसाब नहीं। इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस देश के लोग बुरी तरह नाराज़ हैं। लेकिन ग़ुस्से में होने का मतलब ये नहीं है कि आप साफ़ साफ़ सोच भी पा रहे हों।






अन्ना हज़ारे और उनकी टीम के समर्थन में जंतर मंतर पहुँचे हज़ारों हज़ार लोगों के सामने भ्रष्टाचार को एक नैतिक मुद्दे की तरह पेश किया गया, एक राजनैतिक या व्यवस्था की कमज़ोरी की तरह नहीं। वहाँ भ्रष्टाचार पैदा करने वाली व्यवस्था को बदलने या उसे तोड़ने का कोई आह्वान नहीं किया गया।






जंतर मंतर की क्रांति






'भ्रष्टाचार नैतिक नहीं राजनीतिक समस्या है'।



इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि जंतर मंतर पर मौजूद मध्यम वर्ग के ज़्यादातर लोगों और कॉरपोरेट-समर्थित मीडिया को भ्रष्टाचार के जनक इन आर्थिक सुधारों का बहुत फ़ायदा हुआ।






मीडिया ने इस आंदोलन को “क्रांति” और भारत का तहरीर चौक बताया। इसी मीडिया ने पहले दिल्ली में हज़ारों हज़ार ग़रीब लोगों की रैलियों को नज़रअंदाज़ किया क्योंकि उनकी माँगें कॉरपोरेट एजेंडा के माफ़िक़ नहीं थीं।जब भ्रष्टाचार को धुँधले तरीक़े से, सिर्फ़ एक ‘नैतिक’ समस्या के तौर पर देखा जाता है तो हर कोई इससे जुड़ने को तैयार हो जाता है – फ़ासीवादी, जनतांत्रिक, अराजकतावादी, ईश्वर-उपासक, दिवस-सैलानी, दक्षिणपंथी, वामपंथी और यहाँ तक कि घनघोर भ्रष्ट लोग जो आम तौर पर प्रदर्शन करने को हमेशा उत्सुक रहते हैं।






ये एक ऐसा घड़ा है जिसे बनाना बहुत आसान है और उससे आसान उसे तोड़ना है। अन्ना हज़ारे ने अपने बनाए इस बर्तन पर सबसे पहले पत्थर मारा और वामपंथी समर्थकों को हैरान कर दिया जब वो नरेंद्र मोदी को विकास-प्रतिबद्ध मुख्यमंत्री का जामा पहना कर अपने मंच के केंद्र में ले आए। उन्होंने विकास के नाम पर मोदी की उपलब्धियों की झूठी प्रकृति पर बहस में पड़ना ठीक नहीं समझा। हम में से कई लोग ये सोचते रह गए कि क्या हमें भ्रष्ट मगर कथित जनतांत्रिक लोगों की जगह एक ईमानदार फ़ासीवादी नेता का विकल्प दिया जा रहा है।






मूलभूत प्रश्न



मैं एक मज़बूत भ्रष्टाचार-विरोधी संस्था के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, पर मैं ये भरोसा पाना चाहूँगी कि ऐसी संस्था बहुत सारे अधिकार पाने के बाद ग़ैरज़िम्मेदार और ग़ैरजनतांत्रिक न हो जाए। हालाँकि मैं ये नहीं मानती कि सिर्फ़ क़ानूनी तरीक़ों से ही सांप्रदायिक फ़ासीवाद और उस आर्थिक निरंकुशता के ख़िलाफ़ लड़ा जा सकता है जिसके कारण 80 करोड़ से ज़्यादा लोग क़ानूनी तरीक़े से 20 रुपए प्रतिदिन पर गुज़र करते हैं।जब तक मौजूदा आर्थिक नीतियाँ जारी हैं तब तक राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना से भूख और कुपोषण ख़त्म नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून से अन्याय नहीं ख़त्म हो सकता और अपराध विरोधी क़ानूनों से सांप्रदायिक फ़ासीवाद को ख़त्म नहीं किया जा सकता।






क्या सूचना के अधिकार या जन लोकपाल बिल के ज़रिए उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में किए गए उन गुप्त सहमति पत्रों को सामने लाया जा सकता है जिन पर सरकार ने व्यापार घरानों के साथ दस्तख़त किए हैं और जिनके लिए वो अपने सबसे ग़रीब नागरिकों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने को तैयार है?



अगर ऐसा हो सकता है तो इन सहमति पत्रों से ये स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार देश की खनिज संपदा को निजी कॉरपोरेशनों के हाथों कौड़ियों के मोल बेच रही है।






लेकिन ये भ्रष्टाचार नहीं है। ये पूरी तरह क़ानूनी लूट है और 2-जी घोटाले से कई गुना बड़ा घोटाला है। अगर हमें सूचना के अधिकार के तहत ये सूचना मिल भी जाती है तो हम उस सूचना का क्या कर पाएँगे?मैं मानती हूँ कि जंतर मंतर की क्रांति में अगर किसी ने इन समझौता पत्रों का सवाल उठाया होता तो टीवी कवरेज और वहाँ मौजूद भीड़ का एक बड़ा हिस्सा तुरंत ग़ायब हो गया होता।



(जनतांत्रिक आंदोलनों के गठबंधन की ओर से दिल्ली में 29 अप्रैल को आयोजित किए गए एक सेमीनार में प्रस्तुत अरुंधति रॉय के भाषण के संपादित अंश bbchindi.com से साभार)

Friday, April 1, 2011

क्रिकेट वर्ल्ड कप और नफरत का कारोबार

यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि क्रिकेट वर्ल्ड कप की `कवरेज़` ने हिन्दुस्तानी मीडिया की पोल खोल कर रख दी है. दरअसल हमारा मीडिया पहले ही इतना नंगा हो चुका था कि `पोल खुल जाने` जैसी बातों की गुंजाइश नहीं बचती. खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने क्रिकेट वर्ल्ड कप के नाम पर जो अश्लील अभियान छेड़ रखा था, वो मोहाली सेमीफाइनल तक अपने चरम पर पहुँच चुका था. सट्टेबाजी के दौर में भी क्रिकेट के कुछ नियम हैं जिनका मैदान पर दिखावे के लिये ही सही, पर पालन किया जाता है. लेकिन हिन्दुस्तानी मीडिया जो कुछ खेल रहा था, उस खेल का कोई कायदा-कानून नहीं था, कोई जिम्मेदारी नहीं थी. खेल के बजाय नफरत का दिन-रात गुणगान किया गया. पाकिस्तान से नफरत का गुणगान और दरअसल अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी बेशर्मी के साथ मुसलामानों से नफरत का गुणगान. जो काम संघ और बीजेपी करते रहे हैं, और जिस काम में हमारा मीडिया सहायक रहता आया है, वो घिनौना काम मीडिया अब खुद आगे रहकर कर रहा था. इसका मोटा मुनाफा उसे तत्काल मिलता है, संघ और बीजेपी को तो लगातार मिलता ही रहता है. बहरहाल, पाकितान की क्रिकेट टीम हार गई है. सेमीफानल को फाइनल बता चुके हिन्दू(स्तानी?) मीडिया के लिए अब वैसी नफरत की ज़मीन तो उपलब्ध नहीं है कि वह अपना तम्बू मैदान के बजाय बाघा बोर्डर की तरह कन्याकुमारी में गाड़ ले. लेकिन पड़ोसी देश के लिए, जिसकी टीम यहाँ खेलने आई है,और जो बड़े गौरवपूर्ण ढंग से फाइनल में पहुँची है और जिसमें सर्वकालिक महान खिलाड़ी मुरलीधरन भी है, उसका विष वमन जारी है, मिथकों का सहारा लेकर ही सही. `लंका दहन` जैसे जुमले बेशर्मी से चिल्लाये जा रहे हैं. यह हमारा जिम्मेदार मीडिया है

मैन ऑफ दी मैच
सभी जानते हैं कि क्रिकेट विश्वकप का सेहरा भारत के सिर पर बंधे, इसमें अकेले हिन्दुस्तानी मीडिया का ही नहीं पूरी दुनिया की हरामखोर कंपनियों का भला है. सचिन तेंदुलकर जैसा उम्दा खिलाड़ी भी इस बाज़ार के लिए खिलाड़ी नहीं है बल्कि खिलौना बना लिया जाता है. मोहाली में उसके कैच पर कैच छोड़े जा रहे थे, नए तकनीकी अम्पायर और संदेह के लाभ भी उसे मिल रहे थे, तो मेरे जैसा उसका पक्का फैन भी यही चाह रहा था कि वो गरिमामय ढंग से आउट होकर वापस पैविलियन लौट आए. बात कई-कई जीवनदान मिलने की नहीं थी, बल्कि इस महान बल्लेबाज के पूरी तरह बेबस हो जाने की थी. उसे गेंद ढूंढें नहीं मिल पा रही थीं, खासकर स्पिनर अज़मल के हांथों फेंकी गई गेंदें. लेकिन इस पूरी तरह आभाहीन पारी के लिए उसे `मैन ऑफ दी मैच` दे दिया गया. मोहाली की बल्लेबाजी की तरह ही इस ईनाम को लेते हुए सचिन असहज लग भी रहे थे. पर दुनिया के बाज़ार के लिए यही फैसला सही था और क्रिकेट के जज इसी बाज़ार की नुमाइंदगी कर रहे थे. तमाम अटकलों को झुठलाते हुए शानदार प्रदर्शन करने वाला गेंदबाज वहाब रियाज़ आखिर हारने वाली टीम से था और वो पांच विकेट लेकर भी बाज़ार के लिए उतना ग्लेमरस नहीं था।

शाहिद अफरीदी

जबरन नफरत और तनाव पैदा किए जाने की कोशिशों के बावजूद मोहाली मैच के दौरान शाहिद अफरीदी की मुस्कान दिल जीतने वाली रही. सच्चे `मैन ऑफ दी मैच` जैसी, चैम्पियन जैसी. यह तब था, जब वे गुटबाजी में फंसे अपने ही खिलाड़ियों के रवैये को भी देख रहे थे. सचिन के कैच टपकाए जा रहे थे तो भी वे मजाक उड़ाने के बजाय एक बड़े खिलाड़ी के साथ एक बड़े खिलाड़ी जैसा व्यवहार करते नज़र आए. मैदान पर उनका बर्ताव हिन्दुस्तानी मीडिया के नफरत भरे गुब्बारे की हवा निकलता रहा. और अब जबकि पकिस्तान में अफरीदी को मैदान पर कम आक्रामक बताकर उनकी कप्तानी की कमियां निकली जा रही हैं तो उन्होंने पूछा है कि आखिर हिन्दुस्तान से इतनी नफरत क्यों. इधर,हमारे यहाँ ऐसा सवाल कौन पूछे? हरभजन अभी भी राग अलाप रहे हैं कि पकिस्तान के खिलाफ मैच ही उनका फाइनल था. सचिन जैसा खिलाड़ी भी चुप है. वैसे तो यह भी नहीं पूछा जा रहा है कि आखिर शोएब अख्तर को उनका आख़िरी मैच होने के बावजूद मोहाली मैदान पर क्यों सम्मानित नहीं किया गया. और यह भी नहीं कि मुरली भी सचिन से कम महान नहीं है (बल्कि उनका सफ़र ज्यादा मुश्किल रास्तों से भरा रहा है), वे मुम्बई में खेलते हैं तो यह उनका आख़िरी मैच होगा, तो फाइनल को सिर्फ़ सचिन का मैच क्यों प्रचारित किया जा रहा है? वैसे तो पैसे के दलदल में फंस चुके इस खेल को लेकर ऐसे सवाल अब बेमानी हो चुके हैं।