Thursday, February 9, 2012

गीता के बहाने धर्म पर कुछ बातें-पंकज बिष्ट


(पिछले दिनों रूस के प्रांत साइबेरिया में गीता की एक टीका पर हुए विवाद को लेकर भारत में जिस तरह की अजीबोगरीब प्रतिक्रिया और 
उत्साह प्रदर्शित किया गया, उसे देखते हुए `समयांतर` जनवरी, 2012 अंक का यह संपादकीय यहां देना बेहद जरूरी जान पड़ा इसलिए भी क्योंकि गीता को तर्कातीत पुस्तक की तरह पेश करने की परंपरा सी बनी 
हुई है।)

कृष्ण ने गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा हैकर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन  कहा नहीं जा सकता 19 दिसंबर को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान रूस के एक प्रांत साइबेरिया के टाम्स की अदालत में हिंदुओं की पवित्र पुस्तक गीता को आतंकवादी बता कर प्रतिबंधित करने के लिए चल रहे मुकदमे से उत्तेजित शिव सेनाभाजपाराजदबसपासपा और कांग्रेस के सांसद जब विरोध और चिंताएं प्रकट कर रहे थे तो उनके दिमाग में गीता का उपरोक्त उपदेश होगा या नहींक्या वह सिर्फ सांसदों का कर्म था या उसके अलावा भी कुछ थाक्यों कि जब राज्य सभा में 15 दिसंबर को किसानों की आत्महत्या पर चर्चा हो रही थीखबरों के मुताबिक वहां तीन-चौथाई सीटें खाली थीं और बहस के खत्म होते-होते सिर्फ 26 सदस्य रह गए थे जो कि कोरम पूरा करने की न्यूनतम जरूरत है। वैसे संसद के आधे शीतकालीन सत्र के हंगामे और विरोध की भेंट चढऩे को तो कर्म के खाते में ही डाला जाना चाहिए। 
इसलिए जिस तरह की एक जुटता 19 दिसंबर को संसद में गीता के पक्ष में दिखलाई दी वह कई तरह के संदेश देती है।

माना कि गीता की भारतीय समाज में एक ऐतिहासिक भूमिका रही हैसवाल है क्या वह आज भी वैसी ही हैनिश्चय ही आज भी हिंदुओं का वह एक पवित्र ग्रंथ हैपर क्या हमें यह भूल जाना चाहिए कि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैजहां कई धर्मों को माननेवाले रहते हैं और सबके बराबर अधिकार हैं। इसलिए धर्म की चिंता धार्मिक नेताओं और उसके माननेवालों की है  कि सरकार की। जैसा कि अब तक स्पष्ट हो चुका है यह झगड़ा रूस के इस्कान संप्रदाय और वहां के आर्थोडॉक्स चर्च के बीच का है यानी शुद्ध रूप से स्थानीय। झगड़ा चूंकि इस्कान संप्रदाय में प्रचलित गीता के एक भाष्य विशेष के कारण पैदा हुआ है इसलिए इस मसले कोउसे ही सुलटाना चाहिए।  रूस भी एक लोकतांत्रिक देश है और उसकी अपनी न्याय व्यवस्था हैक्या हमें उस पर विश्वास नहीं करना चाहिएसारी तार्किकता और समझदारी को दरकिनार कर कृष्ण भगवान की जय का नारा लगाने के क्या कारण हो सकते हैंयह कोई छिपी बात नहीं है  वोट ऐसी ही चीज है जिससे लोकतंत्र में सत्ता हासिल होती है। भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं। यानी उनका वोट निर्णायक होता है। धर्म हिंदू समाज के टकरावों को छिपा देता हैजैसा कि राम के कारण हुआ है। वैसे भी राम (रामायणके नाम पर भाजपा और संघ परिवार एक अर्से से बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को भुना रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर आक्रमण कर रहे हैं। इसके चलते भाजपा सत्ता में  चुकी है और आज देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। इसलिए यह अचानक नहीं है कि लोकसभा में भाजपा की नेता सुषमा स्वराज ने गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बेतुकी मांग तक कर डाली। वैसे सुषमा जी ने गीता के बारे में सुना जरूर होगा पर पढ़ा भी होगाकहा नहीं जा सकता। यहां यह देखना भी लाभदायक होगा कि गीता  स्त्रियों पर कितनी मेहरबान हैनौवें अध्याय के इस श्लोक को देखें:मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युपापयोनय: स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम॥  इसमें स्त्रीवैश्यशूद्रचांडाल को पापयोनि वाला माना गया है।

सवाल हैक्या राजनीतिक पार्टियों का विरोध वास्तव में एक पौराणिक ग्रंथ की महत्ता को लेकर ही था या इसके पीछे कुछ और भी था?

इस संदर्भ में मध्य प्रदेश को याद किया जा सकता है जहां गीता को प्राथमिक कक्षाओं में लगा दिया गया है। प्राथमिक स्कूलों में गीता  पढ़ाया जाना इस दार्शनिक ग्रंथ का अपमान नहीं हैक्या भाजपा की मध्यप्रदेश सरकार यह मानती है कि सांख्य और योग दर्शन की यह जटिल और गंभीर किताब कोई आसान-सी उपदेशों की किताब है जिसे बच्चों को समझाया जा सकता हैहां बच्चों को उसमें जो सबसे ज्यादा आकर्षक लग सकता है वह उसके पहले अध्याय का सेनाओं का वर्णन हैजो एक तरह की कट्टरता अवश्य उनके कोमल मनों में पैदा कर सकता है। संभव है भाजपा सरकार का उद्देश्य ही यह हो। वैसे हिंदू आतंकवाद के बढ़ते खतरे को इस अधकचरी धार्मिक समझ से भी जोड़ा जा सकता है। और इसी भ्रम के चलते रूसी अदालत को यह आतंकवाद पैदा करनेवाली किताब लगी होगीइसकी संभावना भी कम नहीं है। या कहना चाहिए रूसी ऑर्थोडाक्स चर्च को इस तरह का सरलीकरण करने का आसान तरीका हाथ लग गया। एक मामले में यह इस बात का संकेत और चेतावनी भी है कि धार्मिक मामलों में किस तरह के खतरे लगातार शामिल रहते हैं। और यह एक धर्म का मसला नहीं है।
   
मध्यप्रदेश ही क्यों स्वयं संसद में मुलायम सिंह ने मांग की कि गीता को पूरे देश में प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाया जाए। मुलायम सिंह हों या लालू यादव या शरद यादव उनकी जातीय राजनीति के अपने समीकरण हैं। पर देखने की बात यह है कि ये स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यकों का मसीहा सिद्ध करना चाहते हैं जबकि गीता शुद्ध रूप से एक धर्म विशेष के आधारभूत मूल्यों को ही प्रस्तुत करती है। और वे भी एक समय विशेष में महत्त्वपूर्ण रहे हो सकते हैंपर आज उनकी कितनी उपयोगिता है यह विचारणीय है। यही हाल बसपा का भी है जिसके सांसद गीता को लेकर यादव त्रिमूर्ति से किसी भी रूप में कम मुखर और उद्वेलित नहीं थे। हम जानते हैंसपा और बसपा की अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं। फरवरी में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं और दोनों ही सत्ता के दावेदार हैं।  इसके बावजूद कि वे मूलतजाति विशेष के नेता हैं पर वे जानते हैं कि  एक जाति तो छोडि़ए साथ में अगर अल्पसंख्यक भी मिल जाएं तो भी लखनऊ के तख्त पर कब्जा नहीं किया जा सकता है।

चुनावी समीकरणों और जोड़-तोड़ को भूल भी जाएं तो भी यह किसी से छिपा नहीं  है कि ये दोनों पार्टियां जाति-व्यवस्था का विरोध करती हैं। सवाल है क्या इन दलों के नेताओं ने कभी गीता पढ़ी हैया क्या वे इस बात से अनजान हैं कि गीता का कर्म मार्ग , जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा रहती हैपुनर्जन्म के सिद्धांत से मिलकर कितना घातक हो जाता हैयह किस तरह से जातीय व्यवस्था (चातुर्वर्णका पोषक है यह देखने लायक है। चौथे अध्याय में कृष्ण कहते हैंजन्म कर्म  मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत: त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोअर्जुन।। (मेरे यानी व्यक्ति विशेष केजन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं जो यह बात समझ लेता हैवह जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।)

इसके बाद के चौथे श्लोक में कहा गया हैचातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: (ब्राह्मणक्षत्रीयवैश्य और शूद्र - इस चार वर्णों का समूहगुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। -गीता प्रेस गोरखपुर के संस्करण से) इसके अलावा यह याद रखना भी जरूरी है कि साथ में गीता में यह भी कहा गया है कि श्रेयान्स्वधर्मो विगुणपरधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेय परधर्मो भयावह:।। (अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देनेवाला है।यह अर्जुन को उसके क्षात्र धर्म को निभाने के लिए तैयार करने की प्रक्रिया में कहा गया है।  यहां धर्म का बहुत ही संकीर्ण अर्थ में प्रयोग है और वह है चातुर्वर्ण के तहत निर्धारित कर्म  करने का।
पर लगता है किसी को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि धर्म वास्तव में आज क्या भूमिका निभा रहा है या निभाता आया है। यहां सारा दारोमदार सत्ता में आने का है और धर्म सदा से सत्ता की मदद करता रहा है। या एक व्यवस्था विशेष की दार्शनिक पीठिका का काम करता रहा है। पिछड़े समाजों में ज्ञानशिक्षा  अन्य आधुनिक मूल्यों और सामाजिक संस्थानों के प्रभावशाली  होने या बिल्कुल  होने से जनता पर धर्म की पकड़ अभी भी गहरी है। खेद की बात यह है कि राजनीतिक दल इस अज्ञान और श्रद्धा को दूर करने की जगह उसे बढ़ाने या कम से कम यथावत बनाए रखने का काम कर रहे हैं।

चिंता की बात यह है कि यह बढ़ती असहिष्णुता हमारे सामाजिकसांस्कृतिक और शैक्षिक माहौल को बिगाड़  रही है।  यह असहिष्णुता और आक्रामकता सांप्रदायिक तो है ही जातीय  प्रांतीय तत्त्वों से भी भरी है। इधर दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा .केरामानुजन के एक ऐसे लेख को जो रामायण के बारे में तथ्यात्मक जानकारी देता हैपाठ्यक्रम से निकालना इसका ताजा उदाहरण है। यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि यह काम रामभक्तों के दबाव और आतंक में किया गया है। इस तरह की असहिष्णुता का शिकार पिछले कुछ वर्षों में सलमान रुश्दी का उपन्यास सेटेनिक वर्सेजजेम्स लेन की किताब शिवाजी  हिंदू किंगरोहिंग्टन मिस्त्री का उपन्यास सच  लॉंग जर्नी और तसलीमा नसरीन की आत्मकथा  द्विखंडितो हो चुकी है। ध्यान देने की बात यह है कि इनमें से अधिसंख्य पाबंदियां 'धर्मनिरपेक्षता को समर्पित` कांग्रेस के शासन या उसके द्वारा शासित राज्यों में लगी हैं। द्विखंडितो को प्रतिबंधित करने का श्रेय वामपंथी गठबंधन को जाता है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि कांग्रेस ही नहीं वामपंथी दल भी सांप्रदायिकता के मोर्चे पर अपनी हार मान चुके हैं और वे इससे टकराने की हिम्मत नहीं करते। एक तरह से देखा जाए तो यह कांग्रेस की पिछले 65 वर्ष की राजनीति का परिणाम है जिसने सायास अल्पसंख्यकों को अपने साथ रखने या कहना चाहिए उनकी असुरक्षा का लाभ उठाने के लिए हिंदू सांप्रदायिकता कोअगर बढ़ावा नहीं भी दिया तो भीउसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की।

हमारे वे राजनीतिक नेता या दल भीजो सामाजिक समानता और धर्मनिरपेक्षता की घोषणा करने में पीछे नहीं रहतेधार्मिक रूढि़वादिता और अंधविश्वासों का लाभ उठाने से नहीं चूकते। जबकि आज यह चुनौती है कि हम धर्म  के उस प्रभाव को तो देखने की कोशिश करें जो वास्तव में जमीनी स्तर पर है। मात्र उसे आस्था का मामला मान कर छोड़  देना खतरनाक है। विज्ञान और तर्क के इस युग में आस्था सबसे ऊपर कैसे हो सकती हैअगर ऐसा होगा तो फिर क्या कोई शोध या वैज्ञानिक अनुसंधान संभव हो पाएगाहमें याद रखना चाहिए कि मनुष्य के विकास का आधार उसकी जिज्ञासा और वैज्ञानिक दृष्टि रही है। इसलिए वही समाज आगे बढ़ते हैं जो इन मूल्यों पर विश्वास करते हैं और इन्हें सप्रयास बढ़ावा देते हैं।

Wednesday, February 1, 2012

कठघरे में सरदार पटेल



(महात्मा गांधी की हत्या की साजिश में शामिल रहे मदनलाल पाहवा ने इस बारे में बंबई में प्रो. डॉ. जगदीशचंद्र जैन को महत्वपूर्ण जानकारियां दी थीं। गांधी की प्रार्थना सभा में बम विस्फोट के बाद जैन ने पाहवा से मिली जानकारियों को गंभीरता से लिया और उन्होंनें बंबई सरकार के तत्कालीन प्रीमियर बी. जी. खेर और वहां के गृह मंत्री मोरारजी देसाई को विस्तार से सब कुछ बता दिया था। इसके बावजूद न तो षडयंत्रकारी गिरफ्तार हुए और न गांधीजी की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए गए। बाद में जैन को ही प्रताड़ित किया गया। अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह जैन की डायरी बाद में बतौर किताब प्रकाशित हुई। यहां इसी किताब के एक छोटे से टुकड़े `SARDAR PATEL IN DOCK` का अनुवाद प्रस्तुत है।)

कठघरे में सरदार पटेल
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30 जनवरी 1948 की महान त्रासदी के बाद देश भर में तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रति गहरा गुस्सा था कि वह अग्रणी भूमिका में होने के बावजूद महात्मा का जीवन बचाने में नाकाम रहे। गांधीजी के निधन से उत्पन्न आतंक और दुख के सिलसिले में कांग्रेस पार्टी द्वारा बुलाई गई एक मीटिंग में पार्टी के समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने जोर देकर कहा कि पटेल हत्या की जिम्मेदारी (जवाबदेही) से बच नहीं सकते हैं। उन्होंने इस बारे में पटेल के स्पष्टीकरण की मांग की कि गांधीजी की हत्या के लिए लोगों को उकसाने का खुला प्रोपेगेंडा होने और हत्या वाले दिन से 10 रोज पहले भी उन (गांधीजी) पर बम फेंका जा चुकने के बावजूद कोई विशेष कदम (क्यों) नहीं उठाए गए।

जैसा कि महात्मा गांधी के सचिव प्यारेलाल ने इशारा किया है, यह सच था कि गांधीजी ने प्रार्थना सभा में आने वाले हर शख्स की जांच के प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया था। दरअसल, बंबई से मिली सूचना के आधार पर पटेल सुरक्षा इंतजामात कड़े करने का आदेश दे चुके थे। गांधीजी ने इससे यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि प्रार्थना के दौरान जब वे खुद ईश्वर की एकमात्र सुरक्षा में हों तो उनकी आस्था किसी तरह की मानवीय सुरक्षा को स्वीकार करने की इजाजत नहीं देती है।

चक्कर में डालने वाली बात यह थी कि अथॉरिटीज षड़यंत्र की निश्चित और ठोस जानकारी होने के बावजूद षड़यंत्रकारियों को पहचानकर गिरफ्तार करने और उनकी योजना को नाकाम करने में विफल रहे जबकि हत्यारे दल के सभी सदस्य मुख्य प्रवेश द्वार से ही भीतर पहुंचे थे। असल में यह नाकामी उस सड़न की इंतिहा की गवाह थी जो सुरक्षा एजेंसियों की पुलिस समेत बहुत सी शाखाओं में फैल चुकी थी। बाद में यह उजागर किया गया कि आरएसएस की एंट्री सरकारी महकमों तक में थी और बहुत से पुलिस अधिकारी (पद और श्रेणी का उल्लेख नहीं) न केवल आरएसएस की गतिविधियों में संलिप्त एक्टिविस्टों से सहानुभूति रखते थे, बल्कि उनकी सक्रिय मदद भी करते थे। नेहरू ने इस स्थिति को गंभीरता से लिया और 26 फरवरी 1948 को तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल को चेतावनी दी, `आरएसएस हमारे दफ़्तरों और पुलिस फोर्स में घुसपैठ कर चुका है और इस तरह ऑफिसियल सीक्रेसी मुमकिन नहीं रह गई है।`

बंटवारे के वक़्त देश में कांग्रेस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी आरएसएस बंटवारे के लिए सीधे-सीधे गांधीजी की `मुस्लिम तुष्टिकरण नीति` को जिम्मेदार ठहरा रहा था। उधर, हिन्दू और सिख शरणार्थियों का जबरदस्त रेला पहुंच रहा था जो अपनी भयावह दुर्दशा के लिए कांग्रेस को, खासतौर से गांधीजी को कोस रहा था। यहां तक कि 20 जनवरी 1948 के बम विस्फोट से पहले भी दिल्ली के कुछ शरणार्थी शिविरों में गांधीजी और साम्प्रदायिक विचारधारा के विरोधी दूसरे कांग्रेस नेताओं की हत्या की बातों की गूंज दर्ज की जा चुकी थी। एक अतिवादी हिंदू ग्रुप के हाथों महात्मा के त्रासद अंत ने पहले से ही आवेश भरे माहौल को और ज्यादा संगीन कर दिया। नतीजतन, आरएसएस पर पाबंदी आयद कर दी गई और उसके तत्कालीन मुखिया माधव सदाशिवराव गोलवलकर समेत महत्वपूर्ण ओहदेदारों को हिरासत में ले लिया गया।

सरदार पटेल ने गांधीजी की हत्या के सिलसिले में 1 फरवरी 1948 को लोगों से ओछी प्रतिक्रियाओं से बचने की अपील की। इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित किया, `आज रात उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने सभी वर्गों के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि वे यह जानकर व्यथित हैं कि बंबई और मद्रास में दिग्भ्रमित लोग हिंदू महासभा और आरएसएस के  सदस्यों के खिलाफ हिंसा की कार्रवाइयों में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा है, `यदि हम बदले की भावना के अधीन होते हैं तो हम खुद को महात्मा गांधी के सिद्धांतो और विश्वास के अयोग्य साबित करेंगे।`-API`

30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्र के नाम संबोधन में नेहरू ने कहा, `` एक पागल आदमी ने उनके जीवन का अंत कर दिया, मैं उसे केवल पागल ही कह सकता हूँ जिसने ऐसा किया और पिछले वर्षों और महीनों में इस मुल्क में काफी जहर फैलाया जा चुका है और इस जहर ने लोगों के दिमागों पर असर डाला है। हमें इस जहर का मुकाबला करना होगा, और हमें उन सभी खतरों का मुकाबला करना होगा जिनसे हम घिरे हैं, और पागलपन या खराब ढंग से नहीं बल्कि जिस तरह कि हमारे प्यारे रहनुमा ने हमें मुकाबला करना सिखाया है।` बाद में दिल्ली के रामलीला मैदान में एक सभा में उन्होंने फिर जोर देकर कहा, `हमें यह देखना है कि कैसे और क्यों 400 मिलियन्स में से एक भी आदमी हमारे देश पर इस भयानक जख़्म की वजह बना। ऐसा माहौल कैसे पैदा कर दिया गया था कि उसके जैसे लोग इस तरह की हरकत कर सके और फिर भी खुद को हिंदुस्तानी कहने की धृष्टता करते हैं।` नेहरू तो फिर भी शुरू से ही आरएसएस को लेकर शंकाग्रस्त थे और यहां तक कि महान त्रासदी से कुछ दिनों पहले ही पंजाब में अमृतसर की एक जनसभा में प्रधानमंत्री ने आगाह किया था,`आरएसएस मुल्क को बेहद नुकसान पहुंचा चुका है, यह पक्का सामने आ जाएगा।`

पंडित नेहरू ने 26 फरवरी 1948 को सरदार पटेल को लिखे पत्र में आरएसएस में बद्धमूल `जहर` को चिह्नित करते हुए जोर देकर कहा, `उत्तरोत्तर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि बापू की हत्या कोई छुटपुट ढंग से अंजाम दी गई गतिविधि नहीं थी बल्कि बड़े पैमाने पर खासतौर से आरएसएस द्वारा सुनियोजित किए गए व्यापक अभियान का हिस्सा थी।` ठीक अगले दिन नेहरूजी को पहुंचे फौरी जवाब में पटेल ने निर्णायात्मक वक्तव्य दिया, `मैं बापू हत्याकांड की जांच के सिलसिले में हो रही प्रगति को लेकर लगभग रोजाना संपर्क में हूं...सभी मुख्य अभियुक्त अपनी गतिविधियों के बारे में लंबे और विस्तृत बयान दे चुके हैं। बयानों से यह भी साफतौर पर सामने आ जाता है कि इसमें आरएसएस की कतई भी संलिप्तता नहीं है।` `भारत के लौह पुरुष` कहे जाने वाले पटेल ने आरएसएस के बारे में पार्टी के दूसरे साथियों से पूरी तरह उलट निरंतर एक अलग दृष्टिकोण रखा। भयानक हत्याकांड से कुछ दिनों पहले ही जबकि आरएसएस का खूंखारपन मुल्क का सफाया कर रहा था, 6 जनवरी 1948 को लखनऊ की एक जनसभा में पटेल ने ऐलान किया,
`कांग्रेस में जो लोग ताकतवर हैं, इस भ्रम में हैं कि वे अपने ओहदों के प्रभाव के चलते आरएसएस को कुचलने में कामयाब हो जाएंगे। आप एक संस्था को डंडे के इस्तेमाल से कुचल नहीं सकते हो। डंडा चोरों और डकैतों के लिए मायने रखता है। आखिरकार आरएसएस के लोग चोर-डाकू नहीं हैं। वे अपने देश को प्यार करने वाले देशभक्त हैं।`

सौभाग्य से मैं कुछ गोपनीय खुफिया दस्तावेज देख सका जो पुख्ता तौर पर यह इशारा करते थे कि भले  ही तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सीधे तौर पर आरएसएस को (इस मामले में) फंसाया नहीं था लेकिन तत्कालीन आरएसएस संघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर इस घटना के किसी भी तरह खिलाफ नहीं थे। 6 दिसंबर 1947 को गोलवलकर ने दिल्ली के पास ही गोवर्धन कस्बे में आरएसएस कार्यकर्ताओं की बैठक आयोजित की थी। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बैठक में `कांग्रेस के अग्रणी नेताओं की हत्या कर जनता को आतंकित करने और उन पर पकड़ कायम करने` की योजना पर विचार किया गया था। 

दो दिन बाद गोलवलकर ने दिल्ली में रोहतक रोड रिफ्यूजी कैम्प में हजारों स्वयंसेवकों की भीड़ को संबोधित किया। वहां मौजूद रहे पुलिस रिपोर्टर के मुताबिक आरएसएस नेता ने कहा, `पाकिस्तान को मिटा देने तक संघ चैन से नहीं बैठेगा। जो रास्ते में आएगा, हम उसे भी मिटा देंगे, फिर वह नेहरू सरकार हो या कोई अन्य सरकार...` मुसलमानों का जिक्र करते हुए उसने कहा कि दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें हिंदुस्तान में नहीं रख पाएगी। उन्हें यह देश छोड़ना ही पड़ेगा...` अगर वे यहां रुके तो सरकार जिम्मेदार होगी, हिंदू समुदाय जिम्मेदार नहीं होगा। महात्मा गांधी उन्हें अब और गुमराह नहीं कर सकते हैं। हमारे पास अपने शत्रुओं को फौरन खामोश कर देने के उपाय मौजूद हैं।`

गांधीजी जहां आरएसएस को `निरंकुश दृष्टिकोण वाले साम्प्रदायिक ढांचे` के रूप में कैरेक्टराइज करते हुए उसके `अनुशासन, हौसले और कठिन परिश्रम की कुव्वत` की तुलना हिटलर के नाज़ियों और मुसोलिनी के फ़ासिस्टों से कर रहे थे तो इसके विपरीत पटेल की दृष्टि में आरएसएस के सदस्य `राष्ट्रभक्त, गोकि गुमराह` थे। गोलवलकर को एक पत्र में आरएसएस सदस्यों के लिए कांग्रेस में शामिल होने का पटेल का व्यापक प्रस्ताव महत्वपूर्ण था। सरदार पटेल संभवत: कांग्रेस के अकेले ऐसे सदस्य थे जिनकी आरएसएस के साथ सहानुभूति एक आम रहस्य के तौर पर जानी जाती थी, और जिनके निधन पर हिंदू महासभा ने एकमत से दृढ़तापूर्वक प्रस्ताव पारित कर दृढ़निश्चयी, भारत के हिंदू मानसिकता वाले बिस्मार्क - सरदार वल्लभभाई पटेल के विछोह पर गहरा दुख जताया था। हिंदू राष्ट्रपति (हिंदू महासभा के) डॉ. खरे ने असेंबली के सामने खुद प्रस्ताव रखा और कहा, `हम कांग्रेस के लोगों की तरह संकुचित मानसिकता वाले नहीं हैं जिन्होंने हिंदू महासभा के नेताओं धर्मवीर डॉ. मूनजी और श्री एन. सी. केलकर जो एक वक़्त में कांग्रेस के भी वफादार लेफ्टिनेंट रह चुके थे, की मृत्यु पर सहानुभूति और अफसोस का एक शब्द भी नहीं बोला था। दूसरी ओर, हम महासभाई सरदार के प्रति अपना सम्मान व श्रद्धा प्रकट करने के लिए अपना अध्यक्षीय प्रसेशन स्थगित करते हैं।` 


Saturday, January 28, 2012

थियो एंजोलोपॉलस : `अतीत कभी अतीत नहीं होता`


महान ग्रीक फिल्मकार थियो एंजोलोपॉलस का 24 जनवरी 2012 मंगलवार को एथेंस में सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। 76 वर्षीय एंजोलोपॉलस के निधन की जानकारी कम से कम मुझे हिंदी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल से मिली। यहां असद जी की उसी पोस्ट का भारतभूषण तिवारी द्वारा किया गया अनुवाद दिया जा रहा है-


थियो एंजेलोपॉलस नहीं रहे. पता नहीं कैसे वर्णन किया जाए इस क्षति का: वे हमारे समय की सबसे अनमोल फ़िल्म शख्सियत थे. उनकी काव्यात्मक दृष्टि, ऐतिहासिक फैलाव, राजनीतिक सरोकार, और परिवर्तन, निर्वासन और पराजय इन विषयों से उनकी सतत भिड़ंत उन्हें सिनेमा की दुनिया में एक अद्वितीय हस्ती बनाते हैं. उन्हें ग्राम्शियन ढंग का फ़िल्मकार भी कहा जा सकता है. 
उनकी कार्य पद्धति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बड़े सामान्य ढंग से कहा, "मैं फ़िल्म वैसे ही शूट करता हूँ जैसे साँस लेता हूँ. "

उनके एक साक्षात्कार से लिए गए कुछ उद्धरण:

"दुनिया से जो मुझे मिल रहा है, मैं उसका संवेदनशील राजप्रतिनिधि बनने का प्रयास करता हूँ. यहाँ तक कि ऐतिहासिक विषय वस्तु पर बनाई गई मेरी फिल्में भी उस बुनियाद को ज़ाहिर करती हैं जिन पर हमारा आज तामीर है. यहाँ की तानाशाही की समस्या से मैं क्यों अक्सर मुखातिब होता हूँ? यह इस समस्या की जड़ और उसकी फ़ितरत को बयां करने की कोशिश है. मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि अगर कोई लेखक/कलाकार आज को समझने की जद्दोजहद में है, तो उसके लिए अतीत का अन्वेषण करना और वहां किसी न किसी परिघटना के कारणों को ढूंढना अपरिहार्य होगा."
...
"बहुत से लोगों का कोई अतीत नहीं होता. व्यक्तिगत तौर पर मैं उन में दिलचस्पी रखता हूँ जिनका अतीत है. इसके अलावा, अतीत कभी अतीत नहीं होता. वह वर्तमान और भविष्य दोनों में होता है. जब मैं फ़िल्म बना रहा होता हूँ, तब मैं किसी चीज़ की बुनियाद रखने की कोशिश कर रहा होता हूँ न कि उसे बर्बाद करने की. बर्बादी से बर्बादी ही होती है. जो मेरे आसपास हो रहा है मैं उस से रहित नहीं हो सकता. नागरी कर्तव्य और ज़िम्मेदारी कलाकार के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों में से एक है."
...
"मैं न तो निराशावादी हूँ, और न आशावादी. आशावादी होने का मतलब है तथ्यों को साफ़-साफ़ न देखना. कुछ कुछ मतलब यह कि इंसान दुनिया में बेहद सार्थक परिवर्तन के लिए हस्तक्षेप नहीं दे सकता. निराशावादी होने का मतलब है बेहतर दुनिया के सपने को, संभावना को छोड़ देना, तज देना. दोनों ही संकल्पनाओं में गतिरोध आ जाता है. व्यक्तिगत तौर पर मैं तर्कपूर्ण ढंग से सोचने की, साफ़-साफ़ देखने की कोशिश करता हूँ."
...
"जो उन दिनों हमारे भविष्य के प्रति निराशाजनक संभावनाओं का सिलसिला नज़र आती थीं, हर उस चीज़ की अब पुष्टि हो रही है. मैं उस पीढ़ी का हूँ जो सोचती थी कि हम दुनिया को बदल डालेंगे. 2000 के आसपास ऐसा लगा कि सपना टूट गया है."

Sunday, January 22, 2012

कुमार अम्बुज की एक कविता


कुमार अम्बुज की यह कविता 2009 में उनके ब्लॉग पर पढ़ी थी। मेरी यह अत्यंत प्रिय कविता और इस कविता के बाद में उनकी टिपण्णी वहीं से साभार है।



मेरा प्रिय कवि

वह हिचकिचाते हुए मंच तक आया
उसके कोट और पैंट पर शहर की रगड़ के निशान थे
वह कुछ परेशान-सा था लेकिन सुनाना चाहता था अपनी कविता
लगभग हकलाते हुए शुरू किया उसने कविता का पाठ
मगर मुझे उसकी हकलाहट में एक हिचकिचाहट सुनाई दी
एक ऐसी हिचकिचाहट 
जो इस वक्‍त में दुनिया से बात करते हुए
किसी भी संवेदनशील आदमी को हो सकती है
लेकिन उसने अपनी कविता में वह सब कहा 
जो एक कवि को आखिर कहना ही चाहिए

वह हिचकिचाहट धीरे-धीरे एक अफसोस में बदल गई
और फिर उसमें एक शोक भरने लगा
उसकी कविता में फिर बारिश होने लगी
उसके चश्मे पर भी कुछ बूँदें आईं
जिन्हें मेरे प्यारे कवि ने उँगलियों से साफ़ करने की कोशिश की
लेकिन तब तक और तेज हो गई बारिश 
फिर कविता में अचानक रात हो गई
अब उस गहरी होती रात में हो रही थी बारिश 
बारिश दिख नहीं रही थी और बारिश में सब कुछ भीग रहा था
कवि के आधे घुँघराले आधे सफेद बालों पर फुहारें थीं
होठों पर धुएँ के साँवले निशानों को छूकर
कविता बह रही थी अपनी धुन में
एक मनुष्य होने के गौरव के बीच 
संकोच झर रहा था उसमें से
वह एक आत्मदया थी वह एक झिझक थी
जो रोक रही थी उसकी कविता को शून्य में जाने से

कविता पढ़ते हुए वह 
बार-बार वज़न रखता था अपने बाएँ पैर पर
बीच-बीच में किसी मूर्ति-शिल्प की तरह थिर होता हुआ
(एक शिल्प जो काव्य-पाठ कर सकता था)
उसके माथे पर साढ़े तीन सलवटें आती थीं
और बनी रहती थीं देर तक

मैं अपने उस कवि से कुछ निशानी - 
जैसे उसका कोट माँगना चाहता था
लेकिन अचानक उसने मुझे एक गिलास दिया
और मेरे साथ बैठ गया कोने में
उसने कहा तुम्हें मैं राग देस सुनाता हूँ
फिर उसने शुरू किया गाना 
वह एक कवि का गाना था 
जिसे गा रही थी उसकी नाजुक और अतृप्त आत्मा

एक घूँट लेकर उसने कहा 
कि तुम देखना मैं अगला आलाप लूँगा
और सुबह हो जाएगी

अचानक मेरा कवि मेरे करीब और करीब आया
कहने लगा मैं बहुत कुछ न कर सका इस संसार को बदलने के लिए
मैं शायद ज्‍यादा कुछ कर सकता था
मुझे छलती रहीं मेरी ही आराम-तलब इच्छाएँ
जिम्मेवारी की निजी हरकतों ने भी मुझे कुछ कम नहीं फँसाया
दायीं आँख का कीचड़ पोंछते हुए वह फिर कुछ गुनगुनाने लगा
कोई करुण संगीत बज रहा था उसमें
मैंने कभी न सुनी थी ऐसी मारक धुन
मेरे भीतर एक लहर उमड़ी और मैं रोने लगा

उधर मेरा प्रिय कवि 
मंच से उतर कर 
चला आ रहा था अपनी ही चाल से।
---------


दस बरस पहले की इस कविता के बारे में अनेक पाठकों-मित्रों-आलोचकों की राय रही है कि यह हिन्दी के किसी कवि विशेष को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। आज कुछ मुखर होने का जोखिम लेकर मैं कहना चाहता हूँ कि यह कविता किसी कवि को केन्द्र में रखकर नहीं है बल्कि उसके बहाने `समकालीन कविता के पाठ` -रिसाइटल- के पक्ष में लिखी गई है।


कविता को गाकर, चीखकर या अभिनय के साथ पढ़ने की पक्षधरता के बरअक्स यह मानवीय दुर्बलताओं के पाठ के साथ कविता का पक्ष रखने की भी एक कोशिश है। दूसरे, इसमें किसी कवि विशेष की नहीं बल्कि हमारे समय के अनेक कवियों की काव्यपाठ करने की स्मृतियाँ और बुदबुदाहटें हैं।

Wednesday, January 18, 2012

थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ


भारत भूषण तिवारी के ब्लॉग अबे कस्बाई मन! पर घूमते-घूमते `थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ` के बारे में पढ़ा। नाना पाटेकर के डर से फिल्म देखने से बचना चाह रहा था लेकिन देख ही डाली। खूबसूरत फिल्म। भारत भाई की ही वही पुरानी पोस्ट शेयर किए दे रहा हूँ- 



थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ

'थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ' याद है? अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित सपनों और हकीकत की यह लिरिकल दास्तान पहली बार दूरदर्शन पर बहुत पहले देखी थी. हॉलीवुड म्यूजिकल के अंदाज़ में बनाई गयी यह अनूठी फ़िल्म मन के किसी कोने में धँस गयी. अभी दो-तीन सालों पहले अपने जर्सी सिटी वाले गुजराती भाई की वीडियो लाइब्रेरी से लाकर यह फ़िल्म फिर देखी. और चार-छः महीनों पहले यूट्यूब के सौजन्य से टुकडों-टुकडों में देखी.

भयंकर गर्मी से झुलसा हुआ बारिश के लिए तरसता मध्य भारत का एक पहाड़ी क़स्बा, एक 'ज़रा-हटके' या पारम्परिक सन्दर्भों में अति-साधारण लड़की जो शादी की उम्र पार करने को है, एक सम्वेदनशील मगर चिन्तित पिता, एक बिलकुल 'बड़े भैया टाइप' बड़े भैया, एक जवान होता छोटा लड़का जिसे बड़े भैया बच्चा ही मानते हैं. फिर एंट्री होती है 'धृष्टधुम्न पद्मनाभ प्रजापति नीलकंठ धूमकेतु बारिशकर' की. यह बड़बोला ठग उनके घर में घुस आता है और पाँच हज़ार रुपयों के बदले मात्र 48 घंटों में बारिश करवाने की गारण्टी देता है. बड़े भैया और बिन्नी उसे झूठा और मक्कार कहते हैं मगर पापा और छोटा बेटा मानते हैं कि ट्राई करने में क्या हर्ज़ है. और उस एक गर्मी की रात में बारिशकर बिन्नी को उसके अन्दर की सुन्दरता से परिचित करवाता है, उसे अपने सपनों में विश्वास करना सिखाता है. जवान होते लड़के में वह इतना आत्म-विश्वास भर देता है कि ज़रुरत पड़ने पर बड़े भैया को घूँसा भी मार सके.

फ़िल्म के बिलकुल असली लगने वाले पात्र ,काव्यमय संवाद और छोटे-छोटे मधुर गीत इसे अद्भुत 'फेअरी टेल' का रूप देते हैं.'पोएट्री इन मोशन' शायद इसे ही कहते होंगे. फ़िल्म के अंत में बड़ी साफगोई से अमोल पालेकर ने यह बता दिया कि इस फिल्म की कथा अंग्रेजी फिल्म/नाटक ' दि रेनमेकर' से ली गयी है.
इसीलिए बड़े दिनों से 'दि रेनमेकर' देखने का मन था; कल रात वो भी देख ली. 1956 में बनी, जोसफ अन्थोनी द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है केथरीन हेपबर्न और बर्ट लैन्कस्टर. यह फ़िल्म भी अच्छी लगी, विशेषकर केथरीन हेपबर्न का शानदार अभिनय. वैसे अपने देसी संस्करण में अनीता कँवर ने बहुत अच्छा अभिनय किया है, परन्तु हिन्दी उच्चारण की त्रुटियों को नज़र अंदाज़ कर दिया जाए तो यह फिल्म नाना पाटेकर की है. एक लवेबल लम्पट की भूमिका उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ निभाई है. मगर 'फेअरी टेल' शायद अपनी भाषा में ज्यादा मोहक लगती है. यह अंग्रेजी फ़िल्म देखकर फिर एक बार अमोल पालेकर को सैल्यूट करने का मन हुआ. लगा कि हॉलीवुड फ़िल्मों की कॉपी करने की अमोल पालेकर जैसी कला (और ईमानदारी भी) अन्य निर्देशकों में भी आ जाये.
हिन्दी फ़िल्म का टाइटल गीत बहुत मधुर है और बोल भी उतने ही आकर्षक है. यूट्यूब पर बानगी देखिये (वीडियो में तस्वीर शायद इसे अपलोड करने वाले सज्जन की ही है). वैसे तो पूरी फिल्म ही यूट्यूब पर उपलब्ध है.