Saturday, April 21, 2018

सैम हैमिल, वाइट हाउस से भिड़ जाने वाला कवि



9 May 1943 – 14 April 2018
दोस्त विक्टर इन्फान्ते की पोस्ट से मालूम हुआ कि सैम हैमिल नहीं रहे। उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक पोएट्स अंगेस्ट दि वॉर (अब याद नहीं कहाँ की) पब्लिक लाइब्रेरी से पुरानी किताबों की सेल में मैंने शायद दसेक साल पहले ख़रीदी थी। `वाइट हाउस` से भिड़ जाने वाले इस एक्टिविस्ट कवि से यह मेरा पहला परिचय था। वह वाक़या तो अब, जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं, `स्टफ़ ऑफ़ लेजंड` है।
2003 में मोहतरमा लॉरा बुश ने `वाइट हाउस` में कवियों की एक संगोष्ठी आयोजित करने का ऐलान किया; निमंत्रण भेजे गए। सैम हैमिल ने न केवल वह निमंत्रण ठुकराया बल्कि इराक़ युद्ध की मुख़ालफ़त में पोएट्स अगेंस्ट दि वॉर नाम की वेबसाइट शुरू की जो एक वैश्विक आंदोलन में बदल गई। इस वेबसाइट पर लगभग बीस हज़ार प्रतिरोध की कविताएँ संकलित हैं। इन्हीं में से कुछ कविताएँ पुस्तकाकार छापी गईं जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है।
हमारे देश में जब चाटुकारिता और सत्ता के पिछलग्गूपन के नए अध्याय रचे जा रहे हैं, सैम हैमिल का जाना और भी तकलीफ़देह है। उन्हें और उनके जज़्बे को सलाम करते हुए उनकी तीन कविताएँ (मूल अंग्रेज़ी से अनुदित) पेश हैं।
-भारत भूषण तिवारी



स्टेट ऑफ़ दि यूनियन, 2003

यरूशलम मैं कभी नहीं गया,
लेकिन शिर्ली बात करती है बमों की.
मेरा कोई ख़ुदा नहीं, पर मैंने देखा है बच्चों को
दुआ माँगते कि बमबारी रुके. वे दुआ माँगते हैं अलग-अलग खुदाओं से.
ख़बर अब फिर वही पुरानी ख़बर है,
जो दुहराई जाती एक बुरी आदत, सस्ते तम्बाखू, सामाजिक झूठ की तरह.

बच्चों ने इतनी अधिक मृत्यु देख ली है
कि अब उनके लिए मृत्यु का कोई अर्थ नहीं.
वे रोटी के लिए क़तार में हैं.
वे पानी के लिए क़तार में हैं.
उनकी आँखें मानों काले चन्द्रमा हैं जिनमें से झाँकता है खालीपन.
हमने उन्हें हज़ारों बार देखा है.
कुछ ही देर में राष्ट्रपति भाषण देंगे.
उनके पास कहने लिए कुछ न कुछ होगा बमों के बारे में
आज़ादी के बारे में
हमारी जीवन पद्धति के बारे में.
मैं टीवी बंद कर दूँगा. हमेशा करता हूँ.
क्योंकि मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर है
उनकी आँखों के स्मारकों को निहार पाना.




जेम्स ओस्को अनामरिया की मौत पर

जब उसकी लाश उन्हें
अबानकाइ में
पचाचाका ब्रिज के पास
कचरे के ढेर में मिली,

कौन कह सकता था
कि किसने
उखाड़े थे उसके नाख़ून,

किसने पैर तोड़े,
नोंच ली आँख किसने,
किसने अंततः उसका गला रेता.

कौन कह सकता था
किसने उसे कचरे में फेंक दिया
बोतल में बंद सन्देश की तरह.

कौन कह सकता था
कि वह कौन था
और क्यों

मगर कोई तो है जिसे पता है
कि किसका हाथ गर्दन पर है
और किसका बन्दूक पर.

युवा कवि ने ऐसा क्या कहा था
जो उसे मरना पड़ा?
क्या मौत का दस्ता था
इस ट्रेजेडी का लिखने वाला?

जिसे सीआईए ने प्रशिक्षण दिया हो?
कह नहीं सकते.

कोई तो जानता था
उसकी ज़ुबां के नाज़ुक स्पर्श को
क्योंकि वह कविता के हर स्वर
और हर व्यंजन में
जान फूँक देती.

लोर्का की मृत्यु पर बोलते हुए
उसकी आँख में छलका आँसू
कोई याद करता है
और जन पर बात करते हुए
उसकी आवाज़ की लय

कोई याद करता है उसके ख़्वाब
एंडीज़ के सायों में
एक लोकतांत्रिक संगीत के;
पंखों वाली कविता के.

बेशक, युवा कवि को पता था
कि कविता प्रेम है
और इस दुनिया में,
प्रेम एक ख़तरनाक शै है.


इराक़ में चल रही लड़ाई के तीन साल पूरे होने पर हेडन करूथ के नाम एक ख़त

लगभग चालीस साल हुए
उन सब जंगों के ख़िलाफ कविता लिखने के बारे में
तुमने कविता लिखी थी, हारलन काउंटी से लेकर इटली
और स्पेन. जब तुम्हारी चुनी हुई कविताएँ
आज मिलीं, उनमें से एक यह कविता थी जिसे
फिर पढ़ते हुए मैं ठिठका.

हम तबसे लगातार युद्धरत हैं.
मैं महायुद्ध के दौरान पैदा हुआ
और मैंने भी अपने सारे दुखदायी दिनों में
उस ख़ास अहमकपन
और बेमतलब और लाचार दर्द को जिया
और उसके खिलाफ लिखा है.
क्या उससे एक जान भी बच पाई?
कौन बता सकता है?
बजाय इसके कि ऐसा करने से
मेरी अपनी जान बची.

आह, मैं बता पाता तुम्हें बची हुई जानों
के बारे में. सित्का में थी
वह एक जवान ख़ूबसूरत औरत
जिसके पति ने, जो उसकी कविता से ईर्ष्या
करता था, उसके दोनों पैर
एक रस्सी से बाँध दिए और
फेंक दिया अपनी नाव से.
दक्षिण-पूर्वी अलास्का के उन पानियों में
आपके पास ज़िन्दगी के लगभग १२ मिनट होते हैं.

या ऊटा की दादी अम्मा
जो छंदबद्ध, रूमानी सॉनेट लिखा करती
और एक दिन रात गए
मुझे मोटेल में फ़ोन किया क्योंकि
उसका जबड़ा टूटा हुआ था, और उसकी नाक,
और वह अब भी पी रहा था. या मैं तुम्हें
एलेक्स के बारे में बता सकता हूँ, जो ड्रग्स
से जुड़े जुर्म में उम्रक़ैद काट रहा था
और क्लासिक्स से रूबरू होने पर उसकी आँखें
कैसे चमक उठीं.

हाँ, कविता ज़िंदगियाँ बचाती है.
सारी जंगें घर से ही शुरू होती हैं
युद्धरत आत्म के भीतर.
ना, हमारी कविताएँ नहीं रोक सकतीं
जंग, ना यह जंग और ना कोई और
बल्कि वह जो
अपने अंदर धधकती है.
जो पहला और एकमात्र कदम है.
यह एक
पाक यकीन है, एक कर्तव्य
कवि का शगल.
हम लिखते हैं कविता जो हमें लिखनी चाहिए.


नोट्स:

  1. स्टेट ऑफ़ दि यूनियन: अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्र के नाम दिया जाने वाला सालाना अभिभाषण
  2. दूसरी कविता का सन्दर्भ है प`रू देश के जेम्स ओस्को अनामरिया नामक कवि और एक्टिविस्ट की दिसम्बर 2005 में टॉर्चर के बाद की गई हत्या। प`रू में अबानकाइ एक शहर है जो पचाचाका नदी पर बसा है।
  3. हेडन करूथ (1921-2008): अमेरिका के एक और रेडिकल कवि जिनसे सैम हैमिल प्रभावित रहे।



Wednesday, April 4, 2018

रजनी तिलक

 
रजनी तिलक (27 मई 1958-30 मार्च 2018)


रजनी तिलक के बारे में जितना सोचता हूं, उनके प्रति सम्मान बढ़ता जाता है। उन्होंने जो काम किए और जो काम वे कर रही थीं, वे उन्हें साहित्य और समाज के सच्चे अध्येताओं, शोधकर्ताओं और सोशल एक्टिविस्ट्स की श्रेणी में रखने वाला है। वे कवयित्री थीं, कहानियां लिखती थीं, सामाजिक मसलों पर लेखन करती थीं। वे एक सोशल एक्टिविस्ट थीं। इस तरह की उनका लेखन और उनका एक्टिविज़्म आपस में घुले-मिले थे। अगर वे सिर्फ अपनी कहानियां-कविताएं लिखने की भूमिका तक ही रहतीं और अगर वे सिर्फ सोशल एक्टिविस्ट तक ही सीमित रहतीं तो भी उन्हें सम्मान से ही याद किया जाता। लेकिन, उनकी बेचैनियां, उनके सरोकार स्त्रियों और इस दुनिया के वंचित तबकों के लिए इतने गहरे और इतने खरे थे कि वे बहुत से कामयाब सवर्ण, दलित और स्त्री साहित्यकारों की तरह करियरिस्ट या आत्मकेंद्रित लेखिका-कवयित्री या सिम्बोलिक एक्टिविस्ट होकर संतुष्ट रह ही नहीं सकती थीं। वे आगे के काम का रास्ता बनाने के लिए उस काम को सामने लाने में जुटी रहीं जिस पर उपेक्षा की धूल जमी थी। खासकर हिंदीभाषी इलाकों में। वे उन लेखिकाओं, नायिकाओं के जीवन और काम को हमारे सामने लाने में लगी रहीं जिन्होंने स्त्रियों, दलित स्त्रियों, वंचित तबकों, सामाजिक बराबरी और समूची मानवता के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया था।

यह सच है कि हिंदी पट्टी में सावित्री बाई फुले का नाम और तस्वीरें सवर्ण बुद्धिजीवियों-नेताओं की बदौलत नहीं आईं बल्कि दलित राजनीति के उभार के साथ फैलीं। लेकिन, तस्वीरों से आगे उनके काम औऱ विचारों को फैलाने का काम करने वाले बुद्धिजीवियों में रजनी तिलक अग्रणी हैं। किताबों के जरिये भी और घूम-घूमकर लोगों से संवाद के जरिये भी। ऐसी कई दूसरी नायिकाओं के जीवन और काम को लेकर उन्होंने लिखा, उनके विचारों को फैलाया, उनके अनुवाद किए। स्त्रियों, दलितों और दूसरे कमजोर तबकों के मानवाधिकार हनन से जुड़े कितने मामलों में वे बतौर एक्टिविस्ट दौड़ती रहीं और इन मामलों की पड़तालों के तथ्यात्मक दस्तावेज तैयार करने में योगदान देती रहीं। मुझे लगता है कि रेशम के कीड़े की तरह एक खोल में दम तोड़ देने वाले कथित साहित्यकारों के काम से ज्यादा मूल्यवान तो ये दस्तावेज ही ठहरते हैं। और असल में वे, उनका जीवन औऱ उनका यह काम सामाजिक न्याय, बराबरी या बेहतर बदलावों में यकीन रखने वाले लेखकों और राजनीतिज्ञों के लिए उदाहरण की तरह भी है कि एक बड़ा और वास्तविक काम क्या है जिससे आगे की लड़ाइयों के लिए खड़े होने जगह बनती है।

सामाजिक न्याय की लड़ाइयों के विभिन्न रास्तों से रजनी तिलक का तालमेल, उन्हें समझने की कोशिशें और उनसे असर लेने व उन पर असर डालने की उनकी क्षमता अद्भुत रही। वे कोरी फेमिनिस्ट या दलित फेमिनिस्ट नहीं थीं। मजदूरों, सफाईकर्मियों और सीवर सफाईकर्मियों आद् के पक्ष में वे लगातार मुखर रहीं। उन्होंने महिलाओं के आरक्षण के सवाल पर आरक्षण के भीतर आरक्षण के महत्व को भी समझा और बिना झिझक के साथ इसे रखा। पॉपुलर प्रगतिशील दायरों में दलितों, अदिवासियों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और वंचित तबकों की स्त्रियों को लेकर रही ग्रन्थियों को चिह्नित किया तो दलित लेखन में मौजूद पितृसत्ता जैसी बीमारियों से भी संघर्ष किया। धर्मवीर जैसे स्त्रीद्वेषी दलित लेखकों से भी उन्होंने टक्कर ली और इस बात को हमेशा खारिज किया कि स्त्री शोषण या पितृसत्ता सिर्फ सवर्णों की बीमारियां हैं। ऐसी स्त्री का दलित लेखक संघ की अध्यक्षा होना दलित लेखक संघ के लिए भी महत्व की बात थी।

किसी के निधन के बाद उसकी अंतिम य़ात्रा में जुटे लोगों की संख्या से किसी मनुष्य का महत्व साबित नहीं होता है। प्रेमचंद और दुनिया के कई लेखकों और हमारे आसपास के ही बहुत से खरे मनुष्यों के मरने पर अनेक बार मुट्ठी भर लोग जुटते हैं। लेकिन, रजनी तिलक के निधन पर आई श्रद्धांजलियों और उनकी अंतिम यात्रा के मौके पर जुटने वालों का जिक्र बताता है कि उनकी स्वीकार्यता व्यापक थी और वे प्रगतिशील हलकों में भी पाई जाने वाली संकीर्ण जगहों से न सिर्फ ऊपर थीं बल्कि एक सेतु की तरह थीं। आम्बेडकरवादी दलित एक्टिविस्टों, छाज्ञ-छात्राओं के साथ बड़े साहित्याकर, वृंदा कारत जैसी पॉलिटिशयन और तमाम महिला बुद्धिजीवी-एक्टिविस्ट, लेखक संघों के पदाधिकारी उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे।

और यह जिक्र सबसे बाद में जो सबसे पहले भी महत्वपूर्ण है कि एक साधारण जाटव परिवार से ताल्लुक रखने वालीं रजनी तिलक का जीवन सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक संघर्षों से जूझते हुए शुरू होता है। यूपी के बुलंदशहर इलाके में उनके दादा की ज़मीन दबंग राजपूत कब्जा लेते हैं तो यह जाटव परिवार पलायन कर दिल्ली आ जाता है। दिल्ली में उनके दादा तांगा चलाते हैं और 1947 में अंग्रेज उन्हें शव ढोने का काम देते हैं। पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पास के इलाके में रहने वाले उनके पिता दर्जी हैं और कागज के लिफाफे बनाने वाली उनकी मां मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाती हैं। वे चाहते हुए भी ढंग से पढ़ पाने से वंचित हो जाती हैं और अपने बड़े भाई मनोहर के साथ मिलकर पांच छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी संभाल लेती हैं जिनमें से अनीता भारती और अशोक भारती तो पढ़ने-लिखने वालों की दुनिया में आज परिचित नाम हैं। इतने कठिन जीवन में भी वे राजनीतिक-सामाजिक चेतना से लैस रहती हैं या कहें कि उनकी परिस्थितियां इसकी ज़मीन या अनिवार्यता बनाती हैं। बड़े भाई की वजह से वामपंथ के असर में आती हैं। आंबेडकर और दूसरे दलित बुद्धिजीवियों को पढते हुए दलित आंदोलन से जुड़ती हैं। और आजन्म बेहतर दुनिया के लिए संघर्षरत रहती हैं।

Wednesday, March 14, 2018

काले गड्ढे के उस पार हॉकिंग रेडिएशन : शिवप्रसाद जोशी


8 January 1942-14 March 2018


प्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिकविद् स्टीफन हॉकिंग का निधन उस दिन के शुरुआती लम्हों में हुआ जो महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्श्टाइन की जयंती के तौर पर जाना जाता है. अब 14 मार्च सैद्धांतिक भौतिकी की इन दो विभूतियों की जयंती और पुण्यतिथि के तौर पर याद किया जाता रहेगा.
हॉकिंग एक भरापूरा परिवार और सवालों से जूझती सघन विज्ञान परंपरा और ब्रह्मांड भौतिकी के बहुत से जटिल रहस्यों और निश्चित रूप से अपनी विज्ञान बिरादरी के साथ हुए विवादों, छींटाकशियों और ईर्ष्याओं को छोड़ कर इस दुनिया से गये. नोबेल समिति के विस्तृत खालीपन में अब स्टीफन हॉकिंग भी भर गये हैं. या वो शायद महानता के ब्लैक होल से कहीं अलग और दूर निकल गये हैं. जैसा कि अपनी प्रस्थापनाओं में वो प्रकाश विकिरण के बारे में कहते भी थे. जिसे हॉकिंग रेडिएशन के नाम से जाना गया.  
समय का संक्षिप्त इतिहास (अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम) जैसी लोकप्रिय प्रसिद्ध किताब से स्टीफन हॉकिंग दुनिया भर में एक जाना पहचाना नाम कई साल पहले बन गए थे. 1993 में दूसरी किताब ब्लैक होल्स ऐंड बेबी यूनिवर्सेस ऐंड अदर एसेस प्रकाशित हुई. इसी किताब में हॉकिंग ने ब्रह्मांड से जुड़े अपने अध्ययनों को रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. इसमें कुछ व्याख्यान भी हैं और वो महत्वपूर्ण लेख भी है जिसमें हॉकिंग ने आइंश्टाइन की दुविधाओं पर अंगुली रखी है. 2001 में उनकी किताब आयी द युनिवर्स इन अ नटशैल. और इसने भी तहलका मचा दिया. रिकॉर्ड बिक्री हुई.
गैलीलियो की मृत्यु के 300 बाद, आठ जनवरी 1942 को जन्मे हॉकिंग शारीरिक रूप से अपाहिज और बोलने या चलने फिरने में असमर्थ थे. उनके लिए एक ख़ास किस्म की चेयर तैयार की गयी थी जिस पर कई अत्याधुनिक उपकरणों के साथ कंप्यूटर लगाया गया था. हॉकिंग के कंप्यूटर को एक स्पीच सिंथेसाइज़र प्रणाली से जोड़ा गया था. हॉकिंग एक अत्यंत घातक बीमारी एएलएस (amyotrophic lateral sclerosis) के मरीज थे. इस बीमारी को मल्टीपल स्कलेरोसिस यानी एमएस या मोटर न्यूरॉन डिज़ीज़ भी कहा जाता है. डॉक्टरों के खारिज़ कर दिए जाने के बावजूद हॉकिंग न सिर्फ लंबे समय तक अच्छे भले रहे बल्कि उनके तीन बच्चे भी हुए. जबकि धुरंधर न्यूरोसर्जनों का दावा था कि अगर महोदय बच भी गए तो बच्चे किसी सूरत में पैदा नहीं कर सकते.
ब्रह्मांड की गुत्थियां सुलझाते हुए एक मोड़ पर आइन्श्टाइन ठिठक गये थे और उन्होंने कुछ थकान कुछ मजाक में कह दिया था कि ईश्वर पासे नहीं खेलता. कई वर्षों बाद अपनी थ्योरी में हॉकिंग ने मजाकिया अंदाज में बताया कि ईश्वर न सिर्फ पासे खेलता है बल्कि न तो वो खुद न हम कभी ये जान पाते हैं कि उसके वे पासे कहां कहां गिरते हैं. हॉकिंग ने न सिर्फ ईश्वर की अवधारणा को चुनौती दी बल्कि तमाम अंधविश्वासों और धार्मिक रूढ़ियों का भी सख्ती से विरोध किया. आकाशगंगा में बिखरे हुए ब्लैक होल्स (कृष्ण विवर-काले गड्ढे) को लेकर उन्होंने ये सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि ब्लैक होल पूरी तरह से ब्लैक नहीं है. यानी एक स्थिर दर से वे कणों को और विकिरणों को वापस भेजते रहते हैं. इस वजह से काला गड्ढा धीरे धीरे वाष्पित होता रहता है. लेकिन अंतिम तौर पर ब्लैक होल और उसकी सामग्री का क्या होता है, ये पता नहीं चल पाया है. ब्लैक होल में समा जाने वाली चीजें क्या नष्ट हो जाती हैं या वे अन्य ब्रह्मांड में निकल जाती हैं. यही वो बात है जो हॉकिंग के मुताबिक वो शिद्दत से जानना चाहते थे लेकिन शरारती अंदाज में ये भी कहते थे कि इसका मतलब ये नहीं कि मेरा इरादा उस काले गड्ढे में कूद जाने का है.
पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर उनका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट था. उन्होंने ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे मुद्दों पर गहरी चिंता जताई और समय समय पर कहते रहे कि आदमी ने धरती का अधिकतम दोहन कर लिया है और इसे जीने लायक नहीं छोड़ा है, इन्हीं चिंताओ के बीच वे अन्य ग्रहों में (जहां जीवन संभव है) मानव बस्तियों के निर्माण के अवश्यंभावी भविष्य की ओर रेखांकित करते थे. हॉकिंग ने एलियन की अवधारणा को भी कभी पूरी तरह खारिज नहीं किया. वे एक ऐसे प्राणी के बारे में हमेशा बोलते थे जो मनुष्य प्रजाति से शारीरिक मानसिक मनोवैज्ञानिक तकनीकी तौर पर उच्चतम अवस्था में है और किसी एक आकाशगंगा का हिस्सा है. हालांकि अपने इन बयानों के पक्ष में वो कोई ठोस वैज्ञानिक तर्क या प्रमाण नहीं रख पाये लेकिन हॉकिंग विज्ञान और उससे इतर सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर इतने लोकप्रिय रहे हैं कि उनकी बात एक सनसनी से ज्यादा एक भविष्यवाणी का दर्जा रखती थी.
ये तय है कि पूरी दुनिया के समकालीन विज्ञान जगत में इतना खिलंदड़ और मस्तमौला वैज्ञानिक नहीं देखा गया. कई मायनों में तो वो अपने निकट पूर्वज आइन्श्टाइन से भी ज्यादा नटखट थे. रही बात समानताओं की तो आइन्श्टाइन जैसी समानताएं सबसे ज़्यादा उन्हीं में थीं. संगीत को लेकर आइन्श्टाइन में जो आला दर्जे की समझ थी, हॉकिंग उस समझ को नये विस्तारों में ले गये. पश्चिमी शास्त्रीय और पॉप संगीत पर उनकी असाधारण पकड़ थी. स्टीफन हॉकिंग का जीवन, कला की उन उद्दाम ऊंचाइयों की झलक दिखाता है जहां संगीत और भौतिकी जैसी दो जटिल दुनियाएं एक बिंदु पर थिरकती रहती हैं.  

Saturday, September 9, 2017

रामचंद्र छत्रपति : पब्लिक इंटेलक्चुअल जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट

रामचंद्र छत्रपति : एक रोशन मशाल
`असहमति का साहस और सहमति का विवेक`
`सच और झूठ के बीच कोई तीसरी चीज़ नहीं होती और मैं सच के साथ हूँ।`` मैं अपनी बात पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के अखबार ``पूरा सच`` के इस मोटो से शुरु करना चाहता था पर अचानक रामचंद्र छत्रपति पर लिखे गए एक अन्य लेख पर नज़र पड़ी जिसकी शुरुआत इसी पंक्ति से थी तो लगा कि अब यह नकल करने वाली बात होगी। लेकिन इस पंक्ति को छोड़कर आगे बढ़ पाना संभव नहीं हो सका। ``बीच का रास्ता नहीं होता`` - यह पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश की मशहूर पंक्ति है जो उनके एक काव्य संग्रह का भी नाम है। क्या यह मात्र संयोग है कि रास्ता चुनने को लेकर दोनों के बीच ऐसी स्पष्टता थी और दोनों को ही गोलियों का सामना करते हुए शहीद होना पड़ा? पाश की हत्या भी धर्म के नाम पर खालिस्तान की मांग के समर्थक आतंकवादियों ने कर दी थी तो छत्रपति को ``डेरा सच्चा सौदा` के नाम पर धर्म की आड़ में आतंक का पर्याय बने गुरमीत राम रहीम के गुर्गों ने मार दिया था। फिलहाल गुरमीत अपने डेरे की साध्वियों के साथ रेप के अपराध में जेल पहुंच चुका है और उस पर हत्या के मामलों में फैसला आना बाकी है। इसके बावजूद यह अपराधी और उसका डेरा अभी भी ताकतवर है तो समझ सकते हैं कि उस समय तो उसकी कारगुजारियों को लेकर मुंह खोलने का साहस प्राय: किसी में नहीं था।
 
यह बात साफ करता चलूं कि छत्रपति की महान शहादत को उनके महिमामंडन का जरिया न मान लिया जाए। उनका व्यक्तित्व और सचाई के प्रति उनकी ज़िद उनकी हत्या की गारंटी की तरह जरूर थी पर यह हादसा पेश नहीं आता तो भी वे इसी सम्मान से लिखे जाने के हकदार थे। यह जरूर है कि हम उन्हें उनकी शहादत की वजह से ही जान पाए। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम का फैसला रोकने के लिए जिस तरह कोर्ट पर दबाव बनाया गया और जिसके लिए कोर्ट ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व उनकी सरकार को फटकार भी लगाई, उससे भगवान होने का स्वांग रचने वाले इस अपराधी की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां तक कि इस फेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। गुरमीत को जैसे ही पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने साध्वियों के यौन शोषण का दोषी करार दिया, प्रदेश सरकार का संरक्षण पाकर इकट्ठा हुए कथित श्रद्धालुओं ने हिंसा और आगजनी शुरु कर दी। इस उपद्रव में पंचकूला व दूसरी कई जगहों पर निजी और सरकारी संपत्तियों के भारी नुकसान के साथ 36 लोगों की मौत हुई। गुरमीत राम-रहीम और उसके अनुयायियों की तरह उसके जलवे को जानने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह अविश्वसनीय था कि धर्म का कवच पहने बैठे इस अपराधी को इस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। इस संघर्ष में अडिग रही दोनों साध्वियों, सीबीआई के ईमानदार अधिकारियों, जज जगदीप सिंह सहित जिन कुछ लोगों की प्रतिबद्धता की वजह से यह संभव हो सका, उनमें एक नाम पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का भी है।
छत्रपति उसी सिरसा शहर के रहने वाले थे जहां `डेरा सच्चा सौदा` का मुख्यालय है। छत्रपति सांध्य दैनिक `पूरा सच` निकालते थे। 1948 में शाह मस्ताना द्वारा शुरु किए गए `डेरा सच्चा सौदा` की गद्दी 1990 में गुरमीत सिंह ने हासिल कर ली थी और उसने अपने नाम के साथ राम रहीम भी जोड़ लिया था। 1998 में डेरे की जीप से कुचले गए बेगू गांव के एक बच्चे की मौत को लेकर हुए विवाद की खबर सिरसा के एक सांध्य दैनिक `रमा टाइम्स` ने छाप दी थी तो डेरे के अनुयायियों ने अखबार के दफ्तर पर जाकर पत्रकार विश्वजीत शर्मा को धमकी दी थी। तब पत्रकारों की एकजुटता के सामने डेरा प्रबंधन को लिखित माफी मांगनी पड़ी थी लेकिन देखते-देखते यह तय हो गया था कि डेरे की अनियमितताओं, अराजकता और भयंकर करतूतों के बारे में मुंह खोलना मौत को दावत देना है। 30 मई 2002 को छत्रपति ने अपने अखबार में डेरे की साध्वी की उस चिट्ठी को प्रकाशित किया था जिससे डेरे में साध्वियों के यौन शोषण की जानकारी पहली बार सार्वजनिक तौर पर दर्ज होकर लोगों में फैल गई थी। चिट्ठी बेनामी थी जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायलय को भेजी गई थी। शायद यह अखबारों के दफ्तरों में भी पहुंची थी पर इसे जगह `पूरा सच` में ही मिल सकी थी। दरअसल 30 मई को सिरसा के रोडी बाजार में डेरे के एक कार ड्राइवर की एक पुलिस अधिकारी से झड़प हो गई थी। पुलिस अधिकारी ने डेरे की साध्वी की ओर से लिखी गई चिट्ठी का जिक्र आम लोगों के बीच कर दिया था। छत्रपति ने अपने अखबार में एक खबर ``कार चालक के हठ ने खोल दिया धार्मिक डेरे का कच्चा चिट्ठा`` शीर्षक से प्रकाशित की थी और ``धर्म के नाम पर किए जा रहे साध्वियों के जीवन बर्बाद`` शीर्षक से बॉक्स में उस चिट्ठी के मजमून का खुलासा किया था। इस खबर के छपते ही डेरा प्रमुख बौखला उठा था।
 
डेरे की ओर से फोन कर छत्रपति को धमकियां दी गईं। बौखला गए डेरे ने एक के बाद एक गुंडागर्दी की कई घटनाओं का अंजाम दिया। साध्वी की उस अनाम चिट्ठी की किसी ने फोटोस्टेट प्रतियां रोडी बाजार में बांट दी थीं। डेरे के गुंडों ने एक चाय विक्रेता प्यारे लाल सेठी को उठाकर प्रताड़ित किया। इस चिट्ठी की चर्चा को लेकर रतिया में भी फोटोस्टेट की दुकान चलाने वाले दो लोगों पर हमले से हंगामा खड़ा हुआ। पत्रकार आरके सेठी ने फतेहाबाद से निकलने वाले अपने सांध्य दैनिक `लेखा-जोखा` में 7 जून को चिट्ठी के बारे में जांच की मांग को लेकर खबर छापी तो उसी दिन इस अखबार के दफ्तर पर हमला कर दिया गया। पहले तो पुलिस ने डेरे के चार अनुयायियों का गिरफ्तार कर लिया पर बाद में डेरे के अनुयायियों की भीड़ के दबाव में संपादक सेठी को ही गिरफ्तार कर लिया। छत्रपति ने 7 जून को ही इस गुंडागर्दी के खिलाफ भी विस्तार से खबर छापी। इसी चिट्ठी के सिलसिले में डेरे से जुड़े लोगों ने 27 जून को डबवाली में एक वकील से बदतमीजी की और उनके चैम्बर का ताला तोड़ने की कोशिश की। `पूरा सच` ने डेरे के इस उपद्रव की खबर भी छापी। डबवाली में ही 14 जुलाई को डेरे के लोगों ने एक स्कूल में चल रही तर्कशीलों की बैठक पर हमला कर मारपीट की। डेरे को शक था कि तर्कशीलों की बैठक में साध्वी की चिट्ठी को लेकर कोई योजना बनाई जा रही थी। इस गुंडागर्दी को लेकर भी छत्रपति ने तथ्यों के साथ समाचार प्रकाशित किया। आखिरकार डेरे के प्रतिनिधिमंडल ने सिरसा के उपायुक्त से मिलकर मांग की कि `पूरा सच` अखबार में डेरे से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगाई जाए।
 
इस बीच 20 जुलाई को `डेरा सच्चा सौदा` की प्रबंधन समिति के सदस्य रहे कुरुक्षेत्र के रणजीत सिंह की हत्या कर दी गई। रणजीत सिंह और उनकी साध्वी बहन डेरे से निकल गए थे। माना जाता है कि डेरा प्रमुख को शक था कि चिट्ठी रणजीत सिंह ने ही लिखवाई थी और उसी ने चिट्ठी व डेरे से जुड़ी जानकारियां रामचंद्र छत्रपति को दी हैं। इसी साल 2002 में 24 सितंबर को हाई कोर्ट ने साध्वियों के यौन शोषण से जुड़ी बेनामी चिट्ठी का संज्ञान लेते हुए डेरे की सीबीआई जांच के आदेश दिए। 24 अक्तूबर 2002 को रामचन्द्र छत्रपति को घर से बाहर बुलाकर पांच गोलियां मारी गईं। दो हमलावरों को मौके पर ही पकड़ लिया गया। ``पूरा सच`` के मुताबिक, हमलावरों को डेरा प्रमुख के आदेश पर डेरा प्रबंधक किशन लाल ने भेजा था। बुरी तरह घायल छत्रपति ने 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दम तोड़ दिया था।

गौरतलब है कि उस दौरान हरियाणा में इनेलो-बीजेपी गठबंधन की सरकार थी और केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी। डेरे का मुख्यालय सिरसा तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का भी गृह जिला है और उनके पिता पूर्व उप प्रधानमंत्री चौ. देवीलाल के जमाने से ही यहां इस परिवार का भी प्रभाव रहा है। चौटाला ने छत्रपति के परिवार को इंसाफ दिलाने का वादा किया था जिस पर वह कायम नहीं रह सके। मुख्यमंत्री ने इस मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति के अनुरोध को भी अनसुना कर दिया। इस बारे में सिरसा में तमाम तरह की चर्चाएं रही हैं। पीड़ित परिवार का कहना था कि पुलिस उनकी मदद करने के बजाय आरोपी को बचाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश और केंद्र सरकारों के रवैये से निराश होकर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति ने जनवरी 2003 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम पर हत्या का आरोप लगाते हुए इस केस की सीबीआई से जांच कराने का अनुरोध किया। रणजीत सिंह के पिता भी बेटे की हत्या की सीबीआई जांच की मांग लेकर हाई कोर्ट पहुंचे थे। हाई कोर्ट ने हत्या के दोनों मामलों में सीबीआई जांच शुरु करा दी।

साध्वियों के यौन शोषण के केस में गुरमीत उर्फ राम-रहीम अदालत के फैसले से जेल पहुंच चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि छत्रपति की हत्या समेत दूसरे मामलों में भी अदालत गुरमीत को सजा सुनाएगी। एक अपराजेय लगने वाली अन्यायी शक्ति से लोहा लेते हुए रामचंद्र छत्रपति शहीद हुए थे तो राष्ट्रीय मीडिया ने खबर को समुचित सम्मान नहीं दिया था। इन दिनों अपराजेय सी मानी जा रही बीजेपी की सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद राम-रहीम को जेल जाना पड़ा तो राष्ट्रीय मीडिया को रामचंद्र छत्रपति की शहादत की याद आ रही है। हालांकि, छत्रपति की हत्या को जनता ने खामोशी से नहीं गुजर जाने दिया था। उनकी हत्या के विरोध में सिरसा अभूतपूर्व रूप से बंद रहा था। छत्रपति की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। छोटा सा स्थानीय सांध्य अखबार चलाने वाले शख्स के लिए जितनी जनता उमड़ी थी, सिरसा में कभी भी उतनी जनता किसी प्रभावी से प्रभावी शख्स की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुई थी। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं थी कि मर्डर में स्वयंभू `भगवान` का हाथ होने से यह केस बेहद चर्चा में आ चुका था। दरअसल, छत्रपति उस शहर के आम लोगों के लिए बंद कोठरी में रोशनी की तरह थे। यह आम शोहरत थी कि जिसकी सुनने वाला कोई नहीं है, उसकी सुनने के लिए छत्रपति है। मार खाए सताए गरीब-गुरबा ही नहीं, शहरी मध्य वर्ग या संपन्न वर्ग भी जानता था कि वह अपने से ज्यादा ताकत वालों की टेढ़ी नज़र का शिकार हो तो उसकी बात को छापने का साहस सिर्फ और सिर्फ `पूरा सच` में है। यह एक लोकप्रिय पत्रकार के लिए शोकाकुल जनसमूह था। बेशक, इसमें ऐसा तबका भी था जो डेरे के उत्पीड़न का शिकार था या समाज में उसके आतंक को पसंद नहीं करता था। इस पत्रकार-एक्टिविस्ट की मृत्यु ने भी उनकी खबरों की तरह यह यह संदेश दिया था कि किसी भी आततायी सत्ता के सामने समर्पण के बजाय मुखर होना एकमात्र रास्ता है और फर्ज भी। वोटों के लालच और अनैतिक सांठगांठ की वजह से डेरे के मामलों में चुप रहने वाले राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी छत्रपति के अंतिम संस्कार और शोकसभा में शामिल हुए थे हालांकि बाद में वे डेरे के ही साथ खड़े होते नज़र आए थे।

छत्रपति की ताकत सिर्फ यह नहीं थी कि वे निर्भीक पत्रकार थे। अगर वे सिर्फ इतना ही होते तो भी कम बड़ी बात न होती। छत्रपति सच के सामने खड़े होने वाले मुफस्सिल पत्रकार थे जिनका हर तरह की सत्ता से बैर था। डेरे के अलावा भी उनके अखबार ने कई बड़े नेताओं के कारनामों का खुलासा किया था। अपनी पुश्तैनी खेती-बाड़ी पर आश्रित इस संपादक-पत्रकार के लिए रोज अखबार छापना हर तरह `घर फूंक तमाशे` की तरह था। विज्ञापनों के लिए दर-दर गुहार लगाना न उनके स्वभाव में शामिल था और न उनका अखबार किसी भी तरह की सत्ताओं को खुश रखना जानता था। एक सच्चा पत्रकार हर तरह की सत्ता का प्रतिरोध होता है, प्राय: सिर्फ बोले जाने वाला यह वाक्य सहज रूप से उनके जीवन का हिस्सा था। वे पत्रकार थे, एक्टिविस्ट थे और शहर के लिखने-पढ़ने वालों को प्रेरित करने वाले कवि-लेखक-बुद्धिजीवी थे, किसी शहर के लाइट हाउस की तरह। यह एक ऐसी चीज़ थी जो उन्हें किसी सत्ता से टकरा जाने वाले महज ज़िद्दी पत्रकार से अलग करती थी। असल में वे एक `पब्लिक इंटेलक्चुअल जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट` थे। इस बात को समझना हमें उनके महत्व को ठीक-ठीक समझने के लिए भी जरूरी है। इस एक बात पर गौर करना किसी कस्बे-शहर में सत्ताओं के प्रतिरोध में लगभग निष्कवच खड़े होने वाले पत्रकार के लिए भी जरूरी है।
छत्रपति प्रगतिशील लेखक संघ की सिरसा इकाई के उपाध्यक्ष थे। सिरसा के लिखने-पढ़ने वाले मित्र उनकी स्मृति में हर साल एक बड़ा सेमिनार आयोजित करते हैं और उनके नाम पर किसी बुद्धिजीवी को सम्मानित भी करते हैं। छत्रपति सम्मान पाने वालों में गुरदयाल सिंह, प्रो. अजमेर औलख, कुलदीप नैयर, प्रो. जगमोहन, रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी जैसे जाने-माने बुद्धिजीवी-पत्रकार शामिल हैं। सिरसा के शिक्षक-बुद्धिजीवी परमानंद शास्त्री बताते हैं कि शहर का कवि-लेखक, बुद्धिजीवी वर्ग छत्रपति को गणेश शंकर विद्यार्थी की परंपरा के पत्रकार के रूप में याद करता है। उस युग में भी जबकि देश और समाज के लिए सब कुछ उत्सर्ग कर देने की एक परंपरा थी और उसका सम्मान भी था, विद्यार्थी जी एक विरल व्यक्तित्व थे। छत्रपति का जमाना वह जमाना नहीं था। बड़े घरानों के अखबार जनपक्षधरता के दिखावे तक से पल्ला झाड़ चुके थे। लोकल अखबारों की छवि प्राय: ब्लेकमेलिंग और मांगने-खाने के धंधे की बन गई थी। ऐसे दौर में उन्होंने धारा के विपरीत चलकर एक सांध्य दैनिक के जरिये पत्रकारिता की विश्वसनीयता और जनपक्षधरता की मिसाल कायम की।

छत्रपति हरियाणा पत्रकार संघ की सिरसा इकाई के जिला प्रधान भी थे और इस वजह से उनका लकब प्रधानजी ही पड़ गया था। उनके निधन पर हरियाणा भर में पत्रकारों ने प्रदर्शन किए थे। सिरसा में पत्रकारों ने डेरे की खबरें नहीं छापने का फैसला भी लिया था जो कई साल जारी रहा पर बाद में यह बरकरार नहीं रह सका। इसकी एक वजह `बड़े` अखबारों का प्रबंधतंत्र भी रहा। डेरे की तरफ से पत्रकारों को कोई बहुत बड़े विज्ञापन या एकाध अपवाद को छोड़कर कोई बड़े निजी लाभ दिए जाते हों,ऐसा भी नहीं रहा। अखबारों से डेरे के संबंध डेरे के लोगों की अकड़ और शर्तों पर ही चलते रहे हैं। डेरे के खिलाफ पड़ने वाली बड़ी खबरें भी अक्सर सिरसा के बजाय चंडीगढ़ डेटलाइन से ही छपती रहीं। इन परिस्थितियों में सिरसा के पत्रकार किसी बड़े प्रतिरोध की परंपरा को भले ही कायम नहीं रख सके पर वे छत्रपति को हमेशा सम्मान के साथ याद करते हैं। छत्रपति को चाहने वालों को यह भी याद रखना होगा कि छत्रपति की तरह हमेशा ही कुछ लोग होते हैं जो आततायियों के सामने डटकर खड़े होते हैं। जैसे कि अंशुल ने एनडीटीवी पर लेखराज ढोंट, अश्विनी बख्शी, आरएस चीमा और राजेंद्र सच्चर जैसे वकीलों को याद किया कि कैसे उन लोगों ने बिना पैस लिए उनका केस लड़ा और जैसे कि सीबीआई के अफसर मुलिंजा नारायणन और सतीश डागर। शायद यह संयोग हो कि छत्रपति की मृत्यु के बाद उनके हत्यारों के खिलाफ संघर्ष से न भागने वाला उनका साथी पत्रकार भी एक स्थानीय अखबार का संपादक ही है। फतेहाबाद से निकलने वाले सांध्य दैनिक `जन सरोकार` के संपादक आरके सेठी जो खुद 1998 में डेरे के हमले का शिकार हुए थे, छत्रपति हत्याकांड में सीबीआई के गवाह हैं। उनका कहना है कि खतरा बरकरार है पर बात सिर्फ यह नहीं कि हो क्या रहा है या होगा क्या। बड़ी बात यह है कि इन सब हालात से सबको डरना छोड़ देना चाहिए।
(लेख में डेरे की कारगुजारियों से जुड़ी घटनाओं का विवरण `पूरा सच` ब्लॉग से लिया गया है।)
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`समयांतर` के सितंबर 2017 अंक में `सच के लिए बीच का रास्ता नहीं होता` शीर्षक से प्रकाशित।
फोटो में स्पेशल इफेक्ट : अनुराग अन्वेषी