Monday, April 14, 2008

अम्बेडकर जयंती पर

भीमराव अम्बेडकर के विचार
-हिंदू धर्म में रहकर जातिप्रथा समाप्त करने का प्रयास मीठे जहर को चाटने के समान होगा।


-हिन्दूवाद आजादी, बराबरी और भाईचारे के लिए एक खतरा है। इसी कारण इसका लोकतंत्र से कोई मेल नहीं, यह उसका विरोधी है।



-हिंदू धर्म जो असमानता और अन्याय की विचारधाराओं पर आधारित है, गरिमा एवं उत्साह के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता।



-मैं घृणा करता हूँ अन्याय से, ज़ुल्म से, आडम्बर से व पाखण्ड से, छल कपट और बकवास से। जो लोग इनके अपराधी हैं, वे सभी मेरी घृणा की लपेट में आते हैं।



-हिंदू समाज एक ऐसी मीनार के समान है जिसमें अनेक मंजिलें हैं, पर उनमें प्रवेश के लिए कोई द्वार नहीं है। व्यक्ति उसी मंजिल में दम तोड़ेगा जिसमें वह पैदा हुआ।



-हिंदू समाज व्यवस्था की जड़ में वह धर्म है जो मनुस्मृति में निर्धारित है......जब तक स्मृति-धर्म की वर्तमान नींव को उखाड़कर कोई नवीन नींव नहीं डाली जाती, तब तक हिंदू समाज से असमानता का अंत सम्भव नहीं होगा...
-भीमराव अम्बेडकर

3 comments:

अतुल said...

लेकिन बौद्ध बनने से भी दलितों का सामाजिक स्तर नहीं सुधर सका. जरूरत विचार और मानसिकता में बदलाव लाने की है न कि धर्म बदलने की.

dhiresh said...

बात आपकी वाजिब है, पर धर्म का ऐसा असर है कि उसे तोड़कर लोगों को निकालना मुश्किल है. शायद इसीलिए अम्बेडकर को धर्म की जरुरत पडी होगी और यह अकारण नहीं कि उन्होने बौद्ध धर्म चुना, ऐसा धर्म जो किसी ईश्वर के बजाय मनुष्य के सामर्थ्य, प्रयास और विवेक को सम्मान देता है. ये बात अलग कि बौद्ध धर्म को भी पंडावाद में रिड्यूस किया जाता है और अम्बेडकर को भी प्रतिमा तक सीमित किया जाता है. अम्बेडकर कहते भी हैं - `हिंदू समाज एक ऐसी मीनार के समान है जिसमें अनेक मंजिलें हैं, पर उनमें प्रवेश के लिए कोई द्वार नहीं है।'
दलित आन्दोलन भी भटकाव का शिकार होता है. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि भ्रष्ट और अन्यायकारी हिन्दू धर्म को नकारने की जरुरत ख़त्म हो जाती है.

Shakadal said...

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