Monday, August 4, 2008

ज़ाफर ज़टल्ली (जान जाये या रहे, न रहें कहे बगैर)

हरियाणा में सांस्कृतक विरासत के सिलसिले में मनमोहन के मुंह से कई बार ज़ाफर ज़टल्ली का जिक्र सुना कि वे नारनौल के रहने वाले शायर थे। ज़टल्ली का मतलब है गाली-गलौज करने वाला और इस शायर को इससे भी परहेज नहीं था और इसीलिए उन्होंने अपना उपनाम ज़टल्ली रख लिया था। तबीयत से विद्रोही थे और सच (वो भी अपने अंदाज में) कहने से नहीं चूकते थे। बादशाह फ़रुख़शियर के शासन की आलोचना कर दी, फिर माफी नहीं मांगी, मौत ईनाम में मिली। मनमोहन ने ही बताया था कि अलीगढ़ में नईम ने उन पर काम किया था जो शायद अप्रकाशित है। बहरहाल नया पथ के ताजा अंक में अली जावेद ने उन पर लिखा है और उनकी कुछ रचनाएं भी दी हैं। उन्हीं में से एक-

दर बयाने क़नाअत
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दिला दर मुफ्लिसी सबसे अकड़ रह
ब आलम बेकसी सबसे अकड़ रह
चिकन और ज़र का चीरा पश्म कर बोझ
फटी१ पग बांध कर सबसे अकड़ रह
न कर ख़ाहिश तू जामा बाफ्ते२ का
कोहन3 दुगला4 पहन सबसे अकड़ रह
अगर शलवर न बाशद कसको ग़म है
लंगोटा खींचकर सबसे अकड़ रह
जो कुछ भी हाथ लगा छिप छिपाकर
खुशी हो डंड कर सबसे अकड़ रह
अगर ये भी मुयस्सर जो न होवे
अकेला जूं अलिफ़ सबसे अकड़ रह
१-पगड़ी, २-सूत या रेशम या सूत से बना कपड़ा ३- पुराना, ४- रुईदार लिबास

7 comments:

Ashok Pande said...

बहुत सुन्दर पोस्ट मेरे दोस्त. इन जनाब का लिखा और कैसे मिलेगा भाई!

Udan Tashtari said...

एक शानदार पोस्ट.

परेश टोकेकर said...

कोहन दुगला पहन सबसे अकड़ रह।
भाई जिद्दी मिया एक के बाद एक शानदार पोस्ट शाया कर अकडे रह।

Anonymous said...

jafar ji ko jaan dene ka shauk tha. is shahedana andaz ko kya kahiyega (pagalpan?)

neetu said...

bahut khoob

वर्षा said...

अकड़ गए

वर्षा said...

अकड़ गए