Tuesday, September 23, 2008

हमारे प्यारे आतंकवादी!

आतंकवादी दो तरह के होते हैं. एक वो जो मुसलमान होते हैं. (कहा तो यह भी जाता है कि मुसलमान होते ही आतंकवादी हैं) दूसरे वो जो हमारे अजीज हैं, आँखों के तारे हैं. वो आतंकवादियों की तरह छुपकर-दुबककर कुछ भी नहीं करते, जो करना होता है, खुलेआम करते हैं, डंके की चोट पे. कोई मस्जिद गिरानी हो, कोई बम फोड़ना हो, संविधान को गरियाना हो, कत्ले आम करने हों, पादरी-वादरी निपटाने हों, बस्तियां जलानी हों, जरूरत हो तो आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धरने-प्रदर्शन करने हों- वे सब कुछ शान के साथ करते हैं. वो कभी किसी एन्काउन्टर में मारे नहीं जाते. जो मारे जाते हैं, वे खानदानी आतंकवादी होते हैं. पुलिस और सरकार की कहानी में लाख झोल हों, पर उनका मारा जाना वाजिब ही होता है, क्योंकि कहा न, वो होते ही खानदानी आतंकवादी हैं. आख़िर वे मुसलमान होते हैं.

17 comments:

शायदा said...

ठीक कह रहे हो और चिंता भी जायज़ है लेकिन सेहत का भी ख़याल करो भाई।

Ratan Singh said...

आज दुनिया भर में आतंक मुसलमानों ने ही फेला रखा है तो कोई दूसरा क्या करे , जो बम फोड़ेगा वही पकड़ा जाएगा वरना पुलिस आपके घर तो नही आई | और आतंकी को आतंकी ही समझो उसे मुस्लमान नही , हमारी यही मानसिकता तो आतंकियों को परोक्ष सहयोग कर जाती है |

मिहिरभोज said...

kahe ko tension karte ho bhai jo encounter me mare the aapke rishtedar to nahi na the.

Udan Tashtari said...

आतंकी बस आतंकी होता है-हिन्दु या मुसलमान नहीं.

परेश टोकेकर 'कबीरा' said...

उडन तश्करी जी जो बात कहना चाहते है उसे हमारें हिन्दूत्ववादी साथी समझना ही नहीं चाहते है।
जितनी सांप्रदायिकता मजबुत होगी उतना ही आतंकवाद बढेंगा, जितना आतंकवाद बढेंगा उतनी ही सांप्रदायिकता भी बढेगी। कट्टर बहुसंख्यक समाज भाजपा जैसी मरणासन्न पार्टी के लिये आक्सीजन का काम करेगा। साथियों गोडसे तोगडिया जैसो को राष्ट्रभक्त का तमगा पहनाने की राजनिती देश को बर्बाद कर रही है।

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

तीसरे आतंकवादी वो होते है जो आतंकवादियो को हीरो बनाने वाली पोस्ट लिखते है..

वर्षा said...

हर धमाके के बाद बहस इस पर क्यों शुरू हो जाती है कि मुसलमान आतंकी नहीं। धमाके हुए, लोग मरे, हर दूसरे महीने एक सीरियल ब्लास्ट का तोहफा मिल रहा है, मुसलमान और ग़ैरमुसलमान के मुद्दे से ज्यादा तवज्जो अपराध और अपराधियों को दो।

सोतड़ू said...

सैणी साब,
दिक्कत ये है कि चीज़ें उतनी साफ़ नहीं जितनी दिख रही हैं, प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं। मुझे लगता है कि दुनिया को दो भागों में बांटकर अपने-अपने साइड तय कर लेने का आग्रह ख़तरनाक है। बाबरी मस्जिद विध्वंस ने ये किया था और अब ये धमाके भी यही कर रहे हैं। अचानक कई सारे लोग हिंदू या मुसलमान हो गए हैं। पहले सहकर्मी थे, पड़ोसी थे, दोस्त भी थे अब हिंदू-मुसलमान।
महसूस पहले भी किया है इस बार साफ़ हुआ कि आदमी वही मान रहा है जो वो मानना चाहता है। हिंदू कह रहे हैं कि भाई चाहे कुछ भी कहो- होते तो धर्मांध ही हैं (यानि कि आतंकवादी)।
मुसलमान कह रहे हैं कि पुलिस चुन-चुन कर टार्गेट बना रही है, सब निर्दोष हैं। ये सभी जानते हैं पुलिस किसी को भी- किसी भी केस में फंसा सकती है। हिंदू पुलिस पर सवाल नहीं उठा रहे- मुसलमान यकीन नहीं कर रहे।
इसमें राहत की बात सिर्फ़ इतनी है कि अब भी बहुत सारे लोग बीच के रास्ते में चल रहे हैं, (जी सर मुझे लगता है कि बीच का रास्ता होता है- बल्कि बीच में ही रास्ता होता है)ये लोग कुछ दिनों में फिर आदमियों की तरह जीने लगेंगे।
लेकिन आतंकवाद (दोनों की तरह का )आदमी को रास्ते से परे धकेल रहा है- कोनों में, रास्ते को सीमा बना रहा है और दोनों ओर के लोगों को दुश्मन

sanjayjumnani said...

KYO BHAI GODHRA TRAIN HADSE KE BAARE MAIN NAHIN LIKHA, KASHMERE PANDITON KE HALAT KE BARE MAIN NAHIN LIKHA MAU DANGE 2007 MAIN HUE THE (JISME SAKRON HINDU MARE GAYE THE ), NAHIN LIKHA .. . . . . . . KYON?SIRF ISLIYE KI ISME HINDU MARE GAYE THE AUR INKI ZINDAGI KI TO KUCH KIMAT HOTI NAHIN .

परेश टोकेकर 'कबीरा' said...

सोतडू साहब से सौ फीसद सहमत। दोस्त, सहकर्मी या पडोसी को हिन्दू-मुसलमान बनाने की साजिश चल रहीं है, जिसे परास्त किया जाना चाहिये। दोस्त, सहकर्मी या पडोसी अभी भले ही हिन्दू-मुसलमान बन रहे हो, लेकिन धुंध छटते ही हैं वो हिन्दू-मुसलमान से वापस दोस्त, सहकर्मी अथवा पडोसी बन जायेंगे।
संजय जी, गोधरा हादसे के बहाने गुजरात प्रोजेक्ट को अंजाम देने की प्रवृत्ति ही आतंकवाद को बढावा दे रही है। साहब काश्मीर पंडीतो के साथ गलत हुवा लेकिन आतंकवादी काश्मीरी मुसलमानो को भी कहा बख्श रहे है। सजंय जी जाकर हिन्दूत्व के ठेकेदारों से ये भी पूछे की काश्मीर के बटवारें व वहा के हिन्दू राजा की गद्दारी के दौर में उनका क्या रवैया रहा? आर एस एस व हिन्दू महासभा उस समय लालची हिन्दू राजा का समर्थन कर रहीं थी जो पाकिस्तान के सहारे अपनी गद्दी बचाने का प्रयास कर रहा था।
मौत आखिर मौत होती है, आप इंसान की मौत को भी हिन्दू मुसलमान में बाट उसकी कीमत तय करने का उपक्रम चला रहे है भाई ये कहा की इंसानियत है?

VAIBHAV said...

tum log kya baat karte ho? hindu bhi kabhi violent hota hai? kabhi-kabhi mass-murder kare, church jalaye, rape kare, dalit ko mare, mandir ke naam par property par kabja kare, scam kare to deshbhakti ke liye to ye karna padta hai bhai..kab samjhoge?

VAIBHAV said...

tum log kya baat karte ho? hindu bhi kabhi violent hota hai? kabhi-kabhi mass-murder kare, church jalaye, rape kare, dalit ko mare, mandir ke naam par property par kabja kare, scam kare to deshbhakti ke liye to ye karna padta hai bhai..kab samjhoge?

Dileepraaj Nagpal said...

badhiya sir...ye soorat badalni hi caahiye

varsha said...

आपकी तकलीफ जायज है .बहुत आश्चर्य होता है की इतनी सीधी सी बात को कितना जटिल बना दिया गया है

Anonymous said...

हमारे समय का धिनौना सच दिल्ली हदसा
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पिछले दिनों दिल्ली में जो कुछ हुआ उसे हम सबने खूब जाँचा-परखा। निर्णय यह लिया गया कि मुसलमानों ने तबाही मचा दी है। सिमी और न जाने क्या-क्या। लेकिन सिमी को वजूद में आने और पैदा करने में किसका हाथ है ? और भविष्य किस दिशा में है ? कहीं हम एक आँख के चश्में से पूरी पृथवी देखने की कोशिश तो नहीं कर रहै हैं ? मित्रों अगर आप मनुष्य हैं और अपने देश-समाज से प्रेम करते हैं तो समय का तकाजा है कि आप दोनों आँखों से खुद देखें और मीडिया को भयानक झूठ का पुलिंदा समझें। कुछ अपवादों को छोड़ कर। इसे भी पढ़ें और सोचें क्या दिल्ली, अहमदाबाद और दूसरी जगहों का सच ठीक वही है, जो हमे समझाया जा रहा है। मित्रों इन अमाननीय कृत्यों के पीछे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता है, जिसका धर्म है। धर्म मनुष्यता के खिलाफ संभव नहीं है। चाहे वह 1992 दिसम्बर का अयोध्या हो या आज की दिल्ली। कहीं नहीं है - धर्म। इन काम को करने वाले हिन्दू-मुसलमान नहीं हैं। सत्ता और पूँजी के आगे जीभ लपलपाते कुत्ते हैं। यह संस्कृति गुजरात में सर्वाधिक पोषित हुई है, और अब सारे देश में फैल रही है। पिछले दिनों जनसत्ता में छपा सुभाष गाताड़े का यह आलेख हमारी आँखों पर बंधी पट्टियों को खोलता है। इसे जरूर पढ़ें, और सबको पढ़वाऐं । -प्रदीप
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24 अगस्त की जन्माष्टमी के दिन कानपुर में जिस बड़ी साजिश का पर्दाफाश हुआ, उससे किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं। शिव शंकर मिश्रा नामक किन्हीं रिटायर्ड कर्मचारी द्वारा बने, एक निजी छात्रावास के एक कमरे में हुए प्रचंड बम विस्फोट में न केवल मिश्रा का अपना इकलौता बेटा राजीव तथा उसके दोस्तस भूपेंद्र सिंह की मौत हुई, बल्कि मौत का जितना सामान बरामद हुआ वह एक पुलिस अधिकारी की ज़बानी कहें तो ‘आधे कानपुर को तबाह कर सकता था’।

जैसा कि बताया जा चुका है कि इस भीषण विस्फोट में दो युवकों के चिथडे़ उड़ गये, कमरे की छत उड़ गयी और दीवारें चटख गयीं। मौके पर पुलिस ने ग्यारह जिंदा बम, इलेक्ट्रॉनिक घड़ियां, टार्च की बैटरियां और भारी मात्रा में बारूद बरामद किया। इसके अलावा वहां से बम बनाने की सामग्री के तौर पर तीन किलो लेड आक्साइड, 500 ग्राम रेड लेड, एक किलोग्राम पोटैशियम और अमोनियम नायट्रेट, 2 किलो बम की पिनें, बारह बल्ब, 50 मीटर तार मिला। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि समूचे शहर में सीरियल बम धमाकों के लिए पर्याप्त सामग्री वहां थी।

गौरतलब है कि भूपेंद्र सिंह, जिसकी अपनी फोटोग्राफी की दुकान मशहूर जेके मन्दिर के पास थी, वह कुछ साल पहले बजरंग दल का नगर संयोजक था और राजीव भी बजरंग दल से जुड़ा था। आधिकारिक तौर पर बजरंग दल की तरफ से यही कहा जा रहा है कि दोनों ‘पिछले कुछ समय से सक्रिय नहीं थे।’ दूसरी तरफ पुलिस की तरफ से अभी इस बारे में कुछ कहा नहीं जा रहा है। क्या यह माना जाए कि पुलिस किन्हीं दबावों में काम कर रही है, ताकि बमकांड के असली सूत्रधारों तक पहुंचने से बचा जा सके? यह बेवजह नहीं कि इस कांड में ‘बब्बर खालसा’ का नाम भी उछाल दिया गया है। एक अग्रणी अख़बार (जागरण, 24 अगस्त 2008) ने ‘आतंकवाद विरोधी दस्ते’ के हवाले से यह ख़बर उड़ायी है कि शहर में तबाही मचाने की इस साजिश में लगभग मृतप्राय हो चुके बब्बर खालसा का नाम आया है। यह भी जोड़ा जा रहा है कि भूपेंद्र का रिश्ताप बब्बर खालसा फोर्स से था।

एक ऐसे समय में जबकि आतंकवाद के साथ समुदाय विशेष का या विशिष्ट धार्मिक मान्यतावाले तबकों का नाम जान बूझ कर उछाला जाता रहा है, यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि इस मामले की तह तक हम कभी पहुंच सकेंगे।

लोगों को याद होगा कि कुछ समय पहले ही मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने कई साक्षात्कारों में इस बात को दोहराया था कि ‘उनके पास इस बात के सबूत हैं कि संघ परिवार के लोग बम बनाने की घटनाओं में संलिप्त रहते हैं।’ और ऐसा नहीं कि वह यह बात पहली दफा कह रहे थे। पिछले साल भी उन्होंने मध्यप्रदेश के श्यामपुर, सिहोर आदि स्थानों से संघ परिवारी समर्थकों के घरों से बरामद बमों और अन्य विस्फोटक सामग्री के बारे में अपने साक्षात्कार में उजागर किया था। (भास्कर, 19 जुलाई 2007) ‘संघ भेजता है गुप्ती, बम तलवारें’ शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में यह बात भी उजागर की गयी थी कि इसके अचानक बाद ही पास के नरसिंहपुर में साम्प्रदायिक घटनाओं में तेजी के समाचार मिले थे। इस सिलसिले में प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम भेजे अपने पत्र में उन्होंने सिहोर के पुलिस अधीक्षक के उस पत्र का भी हवाला दिया था कि पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद गिरफ्तार दो व्यक्तियों ने उन स्रोतों का उल्लेख नहीं किया था जहां से उन्हें हथियार मिले थे।

कानपुर में बजरंग दल से सम्बद्ध दो लोगों के बम विस्फोट में मरने और एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश होने से बरबस दो साल पहले महाराष्ट्र के नांदेड के उस चर्चित घटनाक्रम की याद ताजा होती है जब सिंचाई विभाग के रिटायर्ड कर्मचारी जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध थे -लक्ष्मण राजकोंडवार- के यहां हुए बम विस्फोट में उनका बेटा नरेश और बजरंग दल का स्थानीय नेता हिमांशु वेंकटेश पानसे मारे गए थे और चार लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे। इस घटना के बाद जब मृतकों के घरों पर छापा डाला गया था तब पुलिस को इलाके में मस्जिदों के नक्शे तथा क्षेत्र के मुसलमानों द्वारा पहने जानेवाले ड्रेस और नकली दाढ़ी आदि सामान मिला था। पकड़े गए लोगों ने पुलिस को बताया था कि नांदेड की औरंगाबाद मस्जिद के सामने जुम्मे की नमाज के वक्त़ बम विस्फोट करने की उनकी योजना थी। बाद में यह बात भी उजागर हुई थी कि पिछले कुछ सालों में परभरणी, जालना आदि स्थानों पर महाराष्ट्र में मस्जिदों पर जुम्मे की नमाज के वक्त जो बम हमले हुए थे, उसमें इन्हीं लोगों का हाथ था। पहले मामले की तहकीकात में पुलिस ने आनाकानी की थी, लेकिन जब दबाव पड़ा तब उन्हें सीबीआई से जांच करवानी पड़ी थी। यह बात समझ से परे लगती है कि इतने बड़े कांड में शामिल होने के बावजूद सभी अभियुक्त अभी जमानत पर हैं। उसी नांदेड में फरवरी 2007 में शास्त्रीनगर इलाके में एक दूसरा विस्फोट हुआ था, जिसमें भी हिन्दूवादी संगठनों के दो लोग मारे गए थे। पहले पुलिस ने कहा कि बिजली के शार्टसर्किट से यह हादसा हुआ, लेकिन जब मानवाधिकार संगठनों ने इस बात को उजागर किया कि इस गोदाम में कोई बिजली कनेक्शन नहीं था, तब पुलिस को अपनी जांच की दिशा बदलनी पड़ी थी।

यह बात महत्वपूर्ण है कि हर 6 अप्रैल को बजरंग दल के कार्यकर्ता नांदेड में पटाखे छोड़ कर ‘शहीद दिवस’ मनाते हैं, और एक तरह से अपने ‘शहीदों’ को याद करते हैं जो मस्जिद के बाहर रखने के लिए बम बनाने के दौरान मारे गए थे। (द मेलटुडे, 26 अगस्त 2008)

नांदेड की घटना को अगर ‘हिन्दू आतंकवाद’ का चर्चित आगाज़ कहा जा सकता है तो विगत दो सालों में ऐसी कई घटनाएं दिखती है जहां खुल्लमखुल्ला अतिवादी हिन्दू युवा आतंकी कार्रवाइयों में मुब्तिला दिखते हैं। तमिलनाडु के तेनकासी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर हुआ बम हमला (24 जनवरी 2008) इसकी एक नायाब मिसाल कहा जा सकता है जिसमें रवि पांडियन, ,स कुमार और वी नारायण शर्मा जैसे हिन्दू मुन्नानी के कार्यकर्ता पकड़े गए थे। ‘द हिन्दू’ (6 फरवरी 2008) के मुताबिक पुलिस ने इन लोगों से बम और विस्फोटक भी बरामद किए। हिन्दू मुन्नानी के इन कार्यकर्ताओं ने समूचे इलाके में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के मकसद से इस घटना को अंजाम दिया था।

फरवरी और मई-जून में महाराष्ट्र के पनवेल (20 फरवरी 2008) में जोधा अकबर के प्रदर्शन के दौरान और वाशी में विष्णुदास भावे आडिटोरियम (31 मई 2008) और ठाणे में गडकरी रंगायतन (4 जून 2008) में ‘आम्ही पाचपुते’ नामक चर्चित नाटक के प्रदर्शन के दौरान हुए बम विस्फोटों को इसी सिलसिले की अगली कड़ी कहा जा सकता है। महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने बहुत पेशेवर ढंग से काम करते हुए अंततः इन बम विस्फोटों के लिए जिम्मेदार ‘सनातन संस्था’ और ‘हिन्दू जनजागृति समिति’ के कार्यकर्ताओं को गिरतार कर जेल भेज दिया है।

निष्कर्ष के तौर पर यह अवश्य पूछा जा सकता है कि क्या कानपुर, तेनकासी, ठाणे, नांदेड में हिदू अतिवादियों द्वारा अंजाम दी गई इन घटनाओं को एक-दूसरे के साथ जोड़ कर देख सकते हैं या नहीं ?

यह सहज ही आकलन किया जा सकता है कि हिंदू राष्ट्र के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करने वाली इन जमातों ने अपनी रणनीति में बारीक बदलाव किया है और अब जगह-जगह ऐसी आतंकी कार्रवाइयां करने की योजना बनाई है, ताकि वह उन्हीं के बहाने अल्पसंख्यकों का दमन कर सकें।

दरअसल, अब वक्त आ गया है कि हम उत्तर-औपनिवेशिक भारत में आतंकवाद की परिघटना की नए सिरे से पड़ताल करें और समुदाय विशेषों को बदनाम करने के सिलसिले पर निगाह डालें। शायद तभी हम उस सहजबोध को खारिज कर सकेंगे, जिसके तहत आतंकवाद और धर्म-विशेष में गहरा रिश्ता ढूंढ़ लिया जाता है।
from-
http://pradeepindore.blogspot.com/

फ़िरदौस ख़ान said...

वो आतंकवादियों की तरह छुपकर-दुबककर कुछ भी नहीं करते, जो करना होता है, खुलेआम करते हैं, डंके की चोट पे. कोई मस्जिद गिरानी हो, कोई बम फोड़ना हो, संविधान को गरियाना हो, कत्ले आम करने हों, पादरी-वादरी निपटाने हों, बस्तियां जलानी हों, जरूरत हो तो आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धरने-प्रदर्शन करने हों- वे सब कुछ शान के साथ करते हैं. वो कभी किसी एन्काउन्टर में मारे नहीं जाते. जो मारे जाते हैं, वे खानदानी आतंकवादी होते हैं. पुलिस और सरकार की कहानी में लाख झोल हों, पर उनका मारा जाना वाजिब ही होता है, क्योंकि कहा न, वो होते ही खानदानी आतंकवादी हैं. आख़िर वे मुसलमान होते हैं.

सही कहा आपने.


हमने अपने ब्लॉग में आपके ब्लॉग का लिंक दिया है...

nidhi said...

akhbaar btaate hai itne hindu maare gye itne sikh itne musalmaan ,akhbaar nhi btaate kitne insaan maare gye.ye humaari hi bnaayi duniya hai,har bum or mot ke jimmedaaro me hum shaamil hain.aantakvaadi bnena 1 din ki baat nhi.phir news ek trfaa hai.dhun tum sach me bhut jiddi ho.itni hi jiddi rhna humesha ki jidd ki hi ab jaroorat hai.