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Sunday, September 28, 2014

14 साल जेल में रहे आमिर की आपबीती



मेरे पूर्वजों ने इस ज़मीन को, एक धर्म-निरपेक्ष देश को चुना, गांधी को अपनाया, और जिस मिट्टी में वे पैदा हुए उसी में हम दम तोड़ेंगे। ये शब्द हैं मोहम्मद आमिर ख़ान के जिन्होंने 18 से 32 साल के बीच की अपनी उम्र, यानी अपनी भरी जवानी के साल जेल में बिताए और 14 साल बाद बेगुनाही साबित होने पर कोर्ट के आदेश पर रिहाई हासिल की। रोहतक की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘सप्तरंग’ द्वारा 28 सितम्बर को शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस पर मानवाधिकारों को केन्द्र में रखते हुए आयोजित एक कार्यक्रम में मोहम्मद आमिर ख़ान ने अपनी आप-बीती 100 से अधिक उपस्थित लोगों के बीच सुनाई। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें सादा कपड़ों में पुलिस ने 20 फ़रवरी 1998 को 18 साल की उम्र में दिल्ली, रोहतक और गाज़ियाबाद के इलाकों में बम धमाके करने के नाम पर गिरफ़्तार कर लिया था। असल में तो यह कानूनन गिरफ़्तारी नहीं बल्कि अपहरण था क्योंकि उन्हें तो सड़क पर चलते हुए एक जिप्सी में धकेल कर डाल लिया गया और सात दिन तक तीसरे दर्जे की यातनाएँ देने तथा भयभीत हालत में कोरे कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाने के पश्चात अदालत में पेश किया गया था। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने पाकिस्तान जा कर बम बनाने का प्रशिक्षण लिया और फिर यहाँ आ कर बम धमाके किये। जब कि असलियत यह है कि जिन बम धमाकों का उन पर इलज़ाम लगा वे सब उन के पाकिस्तान जाने से 2 महीने पहले हो चुके थे। पाकिस्तान वे अपनी बहन से मिलने गए थे।
निर्दोष होते हुए भी उन्हें ही नहीं, उन के परिवार को भी बहुत कुछ झेलना पड़ा। पिता का छोटा-मोटा व्यापार ठप्प हो गया, माता-पिता कर्ज़ में डूबते चले गए,  अब्बा गुज़र गये और माँ को लकवा मार गया। माँ अब बोल भी नहीं सकतीं, और आमिर के कान ‘बेटा’ शब्द सुनने को तरस गये हैं। पुलिस द्वारा उन्हें ऐसे खतरनाक आतंकवादी के रूप में पेश किया गया कि अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार सब बेगाने हो गये थे, सब परछाई से दूर भागने लगे थे। लेकिन माँ-बाप का उन पर भरोसा था। इन्साफ़-पसन्द लोगों का सहारा मिला, कुछ वकीलों ने बिना फ़ीस का लिहाज़ किये मदद भी की। मानव अधिकार संगठन पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीस से सम्बद्ध वरिष्ठ वकील एन. डी. पंचोली ने केस सम्भाला तथा रोहतक से श्री राजेश शर्मा ने न्याय-मित्र के रूप में पैरवी की। अपने जीवन के 14 बेशकीमती साल जेल की सलाखों के पीछे गुज़ार कर 2012 में रिहाई हुई। 19 में से 17 मुकदमों में वे कोर्ट द्वारा बेकसूर साबित हो चुके हैं और 2 मामले अभी उच्च न्यायालय में लम्बित हैं।
आमिर ने बताया कि 16 साल पहले मिली यातनाएँ अब भी उन्हें चैन से सोने नहीं देतीं और रात में वे कई बार चीख़ कर उठ बैठते हैं। लेकिन उन की आप-बीती सुनने वाले हैरान थे कि उन्होंने इतना कुछ झेल लेने के बाद भी किस प्रकार बिना किसी कड़वाहट के, बिना किसी पर आक्रोशित हुए, नर्म आवाज़ में अपनी बात रखी। आमिर ने बताया कि उन्होंने अपनी सोच को हमेशा सकरात्मक ही रखा क्योंकि वे बेकसूर थे और उन्हें अपने मुल्क के संविधान में विश्वास था। उन्होंने बल दे कर यह बात कही कि उन के पूर्वजों ने इस ज़मीन को चुना, गांधी को अपनाया, एक धर्म-निरपेक्ष देश में रहना तय किया और जिस मिट्टी में वे पैदा हुए उसी में दम भी तोड़ेंगे। वे मानते हैं कि पूरा पुलिस विभाग तो बुरा नहीं है लेकिन कई हैं जो अपने काम को ईमानदारी से अंजाम नहीं देते और अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हैं। आमिर ने यह सवाल उठाया कि क्या आज का हमारा देश हमारे शहीदों के सपनों का देश बन पाया है जहाँ प्रत्येक नागरिक समानता के बीच सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सके?
जेल की अपनी यादें साझा करते हुए आमिर ने बताया कि किताबें और पेड़-पौधे जेल के उन के साथी रहे। ग्यारहवीं के बाद की अपनी पढ़ाई उन्होंने तिहाड़ जेल में रहते हुए इगनू के कोर्स के माध्यम से जारी रखी। गाज़ियाबाद जेल में रहते हुए उन्होंने गांधी जी पर आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में भाग लिया जिस में प्रदेश के अधिक नहीं तो 400 प्रतिभागी रहे होंगे और उन्हें इस में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। पिता की सलाह और हिदायत कि जेल में भी अच्छों में ही रहना और कोई अच्छा न मिले तो अकेले रहना का उन्होंने पालन किया और इस से उन्हें बहुत मदद मिली। रोहतक की जेल में गुज़रे अपने 6 महीनों को याद करते हुए उन्होंने यहाँ के लोगों की प्रशंसा की और बताया कि किस प्रकार साथी कैदी उन के साथ नर्मी से पेश आते थे।
जेल में कुरान, गीता और रामायण का अध्ययन करने वाले आमिर ने कहा कि उन के लिए तो मानवता ही सब से बड़ा धर्म है और गांधी उन के आदर्श हैं।
कार्यक्रम में आमिर की मदद करने वाले दिल्ली के वकील एवं पी.यू.सी.एल. (दिल्ली) के अध्यक्ष श्री एन.डी.पंचोली और रोहतक के वकील श्री राजेश शर्मा भी मौजूद थे। पंचोली साहब ने कहा कि अगर हमारे लोकतंत्र को सफल होना है तो हमें सामाजिक विषमताओं के विरोध में इकट्ठा होना होगा। कानून का शासन हमारे संविधान का आधार है और यह सवाल उठता है कि क्या हमारी पुलिस का व्यवहार संविधान के मुताबिक होता है? उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्यों 1981 से सिफ़ारिश किये गए पुलिस सुधार लागू नहीं किये जा रहे? पुलिस को निष्पक्षता से काम करना चाहिए लेकिन गैर-मुनासिब हस्तक्षेप के कारण यह नहीं हो पाता। पुलिस में सुधार तब ही हो सकता है जब नियुक्तियाँ सही ढंग से होंगी। आमिर के केस के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि यह अपनी तरह का अकेला मामला नहीं है। अनेक बेकसूर बिना किसी अपराध के साबित हुए, जेल में सड़ रहे हैं। इन में गरीब, बेसहारा, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की तादाद ज्यादा है। 
यह सवाल भी केंद्र में आया कि इस प्रकार के मामलों में सम्बद्ध अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती - और निर्दोष पाए गए व्यक्ति को अपना जीवन नए सिरे से शुरू करने के लिए सहायता क्यों नहीं दी जाती। झूठे केस लादने के लिये किसी की जिम्मेदारी तो तय होनी चाहिये।
रोहतक के वकील श्री राजेश शर्मा जो आमिर की रोहतक में कानूनी मदद कर रहे थे, भी बोले और उन्होंने कहा कि हमारे संविधान के मुताबिक हर इंसान तब तक बेकसूर है जब तक कि उस के विरुद्ध कोई जुर्म साबित न हो जाए। कोई भी व्यक्ति जिस पर केस चल रहा है, वित्तीय संसाधनों के अभाव में मुफ़्त कानूनी सलाह लेने का हकदार है। आमिर पर 2 केस रोहतक के थे जिन में उन्होंने उन की सहायता की। आमिर के विरुद्ध कोई सबूत नहीं था और वे बेकसूर साबित हुए। श्री राजेश शर्मा ने लीगल सर्विस अथॉरिटी एक्ट की जानकारियाँ भी साझा कीं।
‘सप्तरंग’ के प्रधान प्रिंसिपल (सेवानिवृत्त) महावीर शर्मा ने कार्यक्रम के अंत में सब का धन्यवाद किया और आमिर को इस बात पर बधाई दी कि उन्होंने इतना कुछ झेलने के बाद भी अपने मानवीय मूल्यों को नहीं त्यागा। साथ ही श्री एन.डी.पंचोली और श्री राजेश शर्मा का भी आभार प्रकट किया और कहा कि हमें ये सोचना होगा कि कैसे यह सुनिश्चित हो कि जो आमिर के साथ बीती है वह किसी के साथ न बीते। समता और भाईचारे के मूल्यबोध और एक संवेदनशील समाज के बिना जनतंत्र बेमानी है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आज इस आप-बीती को सुनने वाला हर व्यक्ति अपने स्तर पर और मिलजुल कर, दोनों तरीके से ऐसे प्रयास करेंगे कि हर किसी को न्याय मिले और किसी के साथ अन्याय न हो.
(सप्तरंग का प्रेस नोट)

कार्यक्रम संयोजक  प्रोफेसर राजेन्द्र चौधरी,                                                                               
 रमणीक मोहन, सचिव, ‘सप्तरंग'.

Sunday, September 2, 2012

तन्हा कर देने वाली है इंसाफ की लड़ाई - तीस्ता सीतलवाड



गुजरात के नरोदा पाटिया केस में स्पेशल कॉर्ट के फैसले और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ी जा रही पूरी लड़ाई पर एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड से Tehelka की मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधुरी की बातचीत। 

इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि क्या है?

दोषियों की संख्या – 32 – जो अब तक सबसे अधिक है। और एक यह तथ्य कि छुटभैयों और आसपड़ोस के अपराधियों से आगे पॉलिटिकल मास्टरमाइंड और भड़काने वाले दोषी साबित हुए है, ऐसे लोग जो सर्वोच्च राजनीतिक संरक्षण का लुत्फ ले रहे थे।

क्या इससे बाहर यह संदेश गया है कि गुजरात में इसांफ मिल सकता है?

मैं समझती हूं कि इससे बाहर यह मजबूत संदेश गया है कि न्याय व्यवस्था काम कर सकती है बशर्ते कि इससे पहले की जरूरी अपेक्षाएं पूरी हों। मतलब कि सुप्रीम कॉर्ट केस को सावधानी के साथ मॉनिटर करता है, अपॉइंटमेंट्स में रुचि लेती हैं कि केस किस तरह संचालित किया जा रहा है और यह सुनिश्चित करती है कि केस को डीरेल नहीं किया जा रहा है। इस केस में स्पेशल कोर्ट गठित कर स्पेशल जज की नियुक्ति की गई थी। सभी पीड़ितों-गवाहों को केंद्रीय अर्द्धसनिक बलों की सुरक्षा मुहैया कराई गई थी। यह एक बेहद महत्वपूर्ण कारक है। फिर हमने पीडितों और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को रोजबरोज कानूनी सहायता मुहैया कराने का इंतजाम किया था। ये बेहद जटिल मामले हैं, आम आदमी के लिए कानूनी प्रक्रिया समझ पाना आसान नहीं है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप section 24 (8) के तहत पीड़ितों-गवाहों को उपलब्ध अपने निजी वकील के अधिकार, का इस्तेमाल करते हैं। हां, यदि ये सभी पूर्व-अपेक्षाएं पूरी हुई हैं तो बाहर एक मजबूत संदेश गया है कि इंसाफ किया जा सकता है। लेकिन, हम इस बारे में बहुत सतही नहीं हो सकते हैं। यह दुर्लभ है कि सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को मॉनिटर करे और पीड़ितों को उच्चतम स्तर की सुरक्षा मिले और आप उनके लिए कानूनी तौर पर किस तरह भावनात्मक व आर्थिक मदद की जिम्मेदारी ले पाएं।

आप इसमें क्यों शामिल हुईं?

गुजरात से मेरा रिश्ता 1998 का है, जब मैंने बतौर पत्रकार यहां काम शुरू किया। पहले ही दिखाई देने लगा था कि कुछ नृशंस बन रहा है। हमें पहले ही 1992-93 के बंबई दंगों का अनुभव था और हम श्रीकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित कराने की कोशिश में जुटे थे। गुजरात दंगों ने मुझे गुस्से से भर दिया था, मैंने कहा, आओ देखते हैं कि क्या हम लड़ सकते हैं और क्या यह देश कभी पीड़ितों को इंसाफ दे सकता है। अप्रैल 2012 में हमने सिटीज़न फॉर जस्टिस एंड पीस (सीपीजे) गठित की क्योंकि हमें लगा कि मदद की जरूरत है। विजय तेंडुलकर हमारे संस्थापक अध्यक्ष थे और साथ में आईएम कादरी थे, एक समूह था – साइरस गुज़देर, राहुल बोस, अलीक़ पदमसी, ग़ुलाम पेश ईमान, जावेद और मैं। आपके पीछे एक ऐसे ग्रुप का होना जरूरी है ताकि आप निपट अकेले न हो जाएं क्योंकि इसके लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से बड़ी कीमत अदाकरनी होती है। खुद को बहुत सारे ऐसे आरोपों के लिए पेश करना पड़ता है जो कभी साबित नहीं होते लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में फैले रहते हैं।

एसआईटी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? नरोदा पाटिया केस में उसने अलग तरह काम किया जबकि ज़किया जाफरी केस जिसमें नरेंद्र मोदी पर व्यापक साजिश का आरोप है, में उसका रवैया ठीक अलग रहा।
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2002 में नरोदा पाटिया पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई करीब 16 एफआईआर में मायाबेन कोडनानी को नमजद कराया गया था। लेकिन मई 2002 में जांच गुजरात क्राइम ब्रांच के हाथ में आई तो इन्हें छोड़ दिया गया। एसआईटी का गठन हो जाने के बाद भी उसे आरोपी नहीं बनाया गया। 2009 में हम इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट गए कि ताकतवर लोगों को सजा नहीं दी जा रही है। शायद इसी से प्रेरित होकर अप्रेल 2010 में मायाबेन को आरोपी बनाया गया। संक्षेप में कहूं तो समग्र अन्वेषण के मामले में संभवतः एसआइटी २५-३० प्रतिशत सुधार ले आई है मगर (अलग-अलग) जाँचों में शत प्रतिशत सुधार लाने में वह बहुत पीछे रह गई है। गुलबर्ग सोसाइटी और ज़ाकिया जाफरी केस में वे पूरी तरह पीडितों के विरोधी रहे। एक जांच एजेंसी का ऐसी पॉजिशन लेना बेहद अजीब है। शायद बाधा यह रही कि इन मामलों में नरेंद्र मोदी पर बड़े पैमाने पर साजिश रचने का आरोप है। लेकिन एसआईटी की इन पॉजिशन्स पर से सवाल खत्म होने नहीं जा रहे हैं। इस केस में मायाबेन और बाबू बजरंगी को सजा हो चुकी है तो एसआईटी हमारी प्रोटेस्ट पिटीशन की सुनवाई में अपनी विरोधाभासी पॉजिशन का बचाव कैसे करेगी? ये दोनों ज़ाकिया केस में भी आरोपी हैं। इस तरह यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है।
     
कुछ बड़े अनुत्तरित सवाल क्या हैं?

बहुत सारे हैं। राहुल शर्मा और आरबी श्रीकुमार जैसे गुजरात के सीनियर पुलिसकर्मियों द्वारा उपलब्ध कराए गए क्रिटिकल साक्ष्य कोर्ट में समय पर क्यों पेश नहीं किए गए? यदि 2006 में राहुल शर्मा की सीडी (उन संहारक दिनों की कॉल रेकॉर्ड्स के साथ) की सीबीआई जांच होती और इसे विश्वसनीयता मिलती तो इससे बहुत सामग्री उपलब्ध होती। लेकिन इसका विश्लेषण एनजीओज पर छोड़ दिया गया। पहले जन संघर्ष मोर्चा ने कुछ विश्लेषण किया और फिर जब हमें पता चला कि मोदी और दूसरों के फोन रेकॉर्ड जांच में शामिल नहीं किए गए तो हमने विश्लेषण की कमियों को दूर किया।

मोदी के फोन रेकॉर्ड का विश्लेशषण क्या बताता है?
हमने उसके घर के नंबर, दफ्तर के नंबर, मुख्यमंत्री कार्यालय और उनसे जुड़े अफसरों का विश्लेषण किया। इनसे साफ होता है कि कई दिशाओं में जांच की जानी चाहिए। मसलन, 28 फरवरी को दोपहर 12 बज से तीसरेपहर तीन बजे के बीच जब गुलबर्ग सोसाइटी और नरोदा पाटिया जल रहे थे, बेहद हैरत की बात है कि तब डीजीपी पी. सी. पांडे अपने कमरे से, जोकि इन दोनों जगहों से महज आधेक किलोमीटर दूरी पर है, बाहर ही नहीं निकले। उन्होंने बाहर निकलकर संकट का मुआयना नहीं किया अलबत्ता इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय से 15 फोन कॉल रिसीव कीं। किसी भी जांच एजेंसी को यह पूछना चाहिए कि ये कॉल किस बारे में थीं। अगर वे उन्हें अपना काम करने के लिए कह रहे थे, तो वे काम क्यों नहीं कर रहे थे या फिर वे उन्हें अपना काम करने से रोक रहे थे? लेकिन इस बारे में एसआईटी और कॉर्ट दोनों की ही स्पष्ट खामोशी है, दोनों ही मोदी, पांडे या सीएम कार्यालय के अफसरों से इस बारे में सवाल नहीं पूछ रही हैं। ये न्यायिक व्यवस्था और जांच एजेंसी में बड़ी खामियों की तरह हैं। हमें हर मुद्दे पर हर तरीके से दबाव बनाना पड़ा। और हर बार जब आप दबाव बनाते हैं तो आप खुद को और ज्यादा उत्पीड़न व आरोपों के लिए पेश कर रहे होते हैं।

नरोदा पाटिया केस में न्याय मिलने में `तहलका` के स्टिंग `ऑपरेशन कलंक` की क्या भूमिका रही?

`ऑपरेशन कलंक` की बहुत बड़ी भूमिका रही। 2007 में जब यह जांच सार्वजनिक की गई तो इससे सभी को धक्का पहुंचा। ज़ाकिया जाफरी केस हाई कॉर्ट में  इन्साफ़ का मुन्तज़िर था। हमने तुरंत ज़ाकिया आपा के हलफनामे के जरिए हाई कॉर्ट से `ऑपरेशन कलंक` पर गौर करते हुए जांच का आदेश जारी करने का अनुरोध किया। जज ने प्रार्थनापत्र को खारिज कर दिया। हम सुप्रीम कॉर्ट गए लेकिन शुरू में वहां भी इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। मैं बहुत चिंतित थी। हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास गए। आयोग ने मेरे प्रार्थना पत्र पर फुल बेंच ऑर्डर पारित करते हुए तहलका टेप्स में सीबीआई जांच का आदेश दे दिया। गुजरात सरकार ने यह कहते हुए इसका विरोध किया कि आयोग ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकता है। आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस राजेंद्र बाबू ने तमाम कानूनी किताबों से उद्धरण पेश करते हुए कहा कि आयोग के पास सीबीआई को जांच सौंपने का अधिकार है। आयोग के इस कदम से तहलका टेप्स को विश्वसनीयता हासिल हुई। यदि टेप्स सीधे राघवन की अध्यक्षता वाली एसआईटी के पास पहुंचते तो उनमें छेड़छाड़ मुमकिन थी।
मुझे लगता है कि साम्प्रदायिक हिंसा के इतिहास में इस तरह की सामग्री पहली बार उपलब्ध हो सकी। भागलपुर दंगों, 1984 के सिख दंगों या 1992-93 के बंबई दंगों में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी. लेकिन गुजरात मामले में हमारे पास ऐसी तमाम अंदरूनी जानकारियां थीं, मसलन- राहुल शर्मा की दंगों के दौरान मिसिंग कॉल रेकॉर्ड वाली सीडी, आरबी श्रीकुमार का हलफनामा और साक्ष्यों को मजबूती देने वाले तहलका टेप्स से मिलीं बेहद कीमती सामग्री। मैंने फौजदारी के जितने भी वकीलों से बात की, उन सभी ने यही कहा कि तहलका जांच एक्सट्रा-जुडिशल लीगल कन्फेशन्स है। यह प्राथमिक साक्ष्य नहीं हो सकता है लेकिन यदि किसी व्यक्ति के अपराध में शामिल होने के पहले से ही साक्ष्य हैं और टेप्स को विश्वसनीयता हासिल होती है तो यह अपराध को साबित करने में सबसे ज्यादा मजबूत साक्ष्य होगा। लेकिन एसआईटी ने इस सामग्री को लेकर उत्साह दिखाने के बजाय क्या किया?
उन्होंने श्रीकुमार को यह कहकर अविश्वसनीय बताने की कोशिश की कि यह अफसर सिर्फ प्रोन्नति से इंकार कर दिए जाने की वजह से बोल रहा है। यह तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि उन्होंने अपने पहले दो हलफनामे प्रोन्नति प्रकरण से पहले जमा कर दिए थे। यही वे हलफनामे हैं जिनमें अपराध साबित कर पाने वाले साक्ष्य और स्टेट इंटेलीजेंस ब्यूरो के आंकड़े हैं। केवल तीसरे-चौथे हलफनामे में ही उनकी अपनी राय शामिल है। लेकिन राघवन का अनंत टालमटोल वाला रवैया रहा कि श्रीकुमार का रजिस्टर वैध है भी या नहीं।
तहलका टेप्स पर भी उनका रवैया अजीब और विरोधाभासी रहा। नरोदा-पाटिया केस में उन्होंने टेप्स को स्वीकार किया और हमारे पास आशीष खेतान का 120 पेज का मूल्यवान बयान (deposition) है। लेकिन ज़ाकिया जाफरी केस में, जहां नरेंद्र मोदी मुख्य आरोपी है, साक्ष्य बेकार और प्रेरित बता दिया गया। किसी भी तर्कशील मनुष्य के लिए यह बात समझ से परे है। हम इन सारे विरोधाभासों को पकड़ सकते हैं और इन पर प्रतिक्रया सिर्फ इसलिए दे पाते हैं क्योंकि हम इन सभी मुकदमों में शामिल हैं। लेकिन यह आपको पागल कर देता है।

इंसाफ की तलाश की इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा विपरीत पहलू क्या रहा?

सबसे मुश्किल बात यह है कि यह एक बेहद अकेली लड़ाई है। हमारे ग्रुप में हर कोई बेहद शानदार है पर फिर भी यह बेहद, बेहद तन्हा कर देने वाली है। आपको सार्वजनिक रूप से झूठे आरोप लगाकर जलील किया जाता है। लड़ाई में बड़ा तबका शामिल होता तो इससे बहुत ताकत मिलती। हम जानते हैं कि अच्छे लोग सभी जगहों पर हैं जो हमारे काम की सराहना करते हैं लेकिन ऐसे बहुत कम हैं जो व्यवस्था के खिलाफ आगे आकर खतरा मोल लें। आप किसी व्यवस्था से जूझते हुए ही उसके खिलाफ लड़ाई लड़ सकते हैं लेकिन ऐसे में आप ही सबसे ज्यादा खतरे में होते हैं। व्यवस्था आपको थकाकर बाहर फेंक देती है, इंसाफ नहीं देती। आप दृढ़निश्चयी और किस्मत वाले हैं तो आप सर्वाइव कर जाते हैं, किस्मत वाले नहीं हैं तो नहीं।  
ये सभी इल्जाम - कि गवाहों को मैंने सिखा दिया या हमारे पूर्व कर्मचारी रईस ख़ान का मामला- गुजरात कॉर्ट निराधार करार दे चुकी है। लेकिन फिर भी यूट्यूब पर ऐसी बकवास फैली हुई हैं। मैंने इस बारे में जवाब देना बंद कर दिया है। अगर लोग वाकई जानना चाहते हैं तो वे सच तक पहुंच जाएंगे। पर मैं नहीं जानती कि मैं यह सब दोबारा कर पाऊंगी। इसकी कीमत बहुत बड़ी है। आपको खुद को बताना पड़ता है कि आप अपनी ज़िंदगी के 10-20 बरस किसी एक चीज के लिए न्यौछावर कर देंगे। यह बहुत मुश्किल है। आप इसके बाद सामान्य नहीं रह पाते।
http://www.tehelka.com से साभार।  (मूल अंग्रेजी से अनुवाद)

Tuesday, February 28, 2012

गुलबर्ग सोसाइटी




"गोधरा में ट्रेन जलाये जाने के बारे में जब सुना तब मेरे बच्चे ट्यूशन में थे. घर पर टीवी चल रहा था पर उस समय मैंने ज़्यादा तवज्जो नहीं दी. मेरे पति ने, जो फिल्म प्रोजेक्शनिस्ट हैं, अपने ऑफिस से फ़ोन करके बताया कि हिंसक वारदातें होने की खबर है और हम लोग सावधान रहें. मैं अपने बच्चों को घर ले आई. फिर हमने अपने पड़ोसियों को चिंतित अवस्था में बाहर निकलते देखा. हमारी कालोनी छोटी और घेरेबंद सी है और अपने फ्लैट से मैं पास की छतों पर लोगों को इकठ्ठा होते देख रही थी. तभी मैंने हाथ में गुप्ती लिए एक आदमी को हमारी ओर इशारा करते देखा- मुझे फ़िक्र हुई."
"हम लोग जाफ़री साहब के घर पर इकठ्ठा होना शुरू हुए. वे सांसद थे और हमें यकीन था कि वे मदद जुटा लेंगे. एकाएक सैकड़ों आदमी दीवारें खरोंच रहे थे और सोसायटी में घुस रहे थे. उनके पास केमिकल्स की सैकड़ों छोटी-छोटी शीशियाँ थीं - जो नेल पॉलिश की शीशियों जैसी लग रही थीं, और जो उन्होंने हमारे घर में फेंकीं. ज़मीन पर पड़ते ही शीशियाँ आग की लपटें उगलते हुए फट पड़तीं. भीड़ ने बड़ी चतुराई से ऊपर लगी टंकियों से हो रही पानी की सप्लाई काट डाली ताकि हम किसी भी तरह आग न बुझा पाएँ. उन लोगों ने जाफ़री साहब के घर का घेराव करना शुरू किया और उन्हें बाहर आने को कहने लगे. हम 30-40 लोग छुपे हुए थे, और हमने गैस सिलेंडरों को छुपाने की कोशिश की ताकि केमिकल्स उनसे न टकरा जाएँ. वे दीवारें उड़ाने के लिए सिलेंडरों का इस्तेमाल कर रहे थे. इस बीच बाहर भीड़ हमारे पड़ोसियों को क़त्ल कर रही थी. हमें औरतों के चीखने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं- बाद में पता चला कि उनमें से कई औरतों के साथ बलात्कार किया गया."
"शाम तक लगभग हर कमरे में आग लग चुकी थी. घर के पीछे छत पर जाने के लिए एक सीढ़ी लगी थी. बाहर निकलने का रास्ता खोजते  हम सीढ़ी चढ़ने लगे. धुएँ की वजह से तब तक कई लोग अचेत हो गए थे. मैंने जाफ़री साहब को कहते हुए सुना, 'अगर तुम्हारी जान बच जाती है तो मर जाने दो मुझे.' वह हमने सुना हुआ उनका आखिरी वाक्य था. उन्हें भीड़ ने मार डाला. उस वक़्त मेरे दोनों बच्चे मेरे साथ थे. उस हो-हल्ले में मैं गिर पड़ी. "
"गिरते वक़्त मैं मेरी बेटी को चिल्लाते हुए सुना - मम्मी उठो, मम्मी उठो. जितनी देर हम जाफ़री साहब के घर छुपे हुए थे मेरी बेटी ने मेरे बेटे अज़हर का हाथ थाम रखा था. मुझे बचाने के लिए उसे अज़हर का हाथ छोड़ना पड़ा. जब मैं उठी तो केवल अपनी बेटी  बिनइफ़र को देखा, अज़हर नहीं था. हम चिल्लाते रहे अज्जू! अज्जू! पर वह नहीं मिला. आख़िरकार हम छत पर चढ़ गए पर वहां भी अज़हर नहीं मिला. मैं वापिस नीचे जाने लगी मगर हर किसी ने कहा कि भीड़ मुझे मार डालेगी. ज़कियाबेन ने फिर भी कहा, 'उसे जाने दो- वह एक माँ है.' आखिर जब मदद पहुंची तो हमें बताया गया कि अज़हर से मिलते-जुलते हुलिए वाला एक बच्चा साईबाग पुलिस स्टेशन में है. मैं अज्जू! अज्जू! चिल्लाते हुए पुलिस स्टेशन में घुसी पर वह लड़का अज्जू नहीं था. तब से अब तक मैंने उसे खोजना नहीं छोड़ा."
"हम लगभग दो हफ़्तों बाद गुलबर्ग सोसाइटी वापिस गए. पूरी कालोनी जला दी गई थी. विडम्बना यह कि हमारा घर सही-सलामत था. शायद इसलिए कि दीवार पर माता की एक तस्वीर थी और उन्होंने सोचा होगा कि यह एक हिन्दू का घर है. कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर हमने अपना घर नहीं छोड़ा होता तो हम सलामत होते और अज़हर भी मेरे पास होता."

गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड के बारे में रूपा (तनाज़) मोदी की फ्रंटलाइन से बातचीत, राहुल ढोलकिया की फिल्म 'परज़ानिया'  उनके अनुभवों पर आधारित है.
हिन्दी अनुवाद भारतभूषण तिवारी का है।

Tuesday, September 23, 2008

हमारे प्यारे आतंकवादी!

आतंकवादी दो तरह के होते हैं. एक वो जो मुसलमान होते हैं. (कहा तो यह भी जाता है कि मुसलमान होते ही आतंकवादी हैं) दूसरे वो जो हमारे अजीज हैं, आँखों के तारे हैं. वो आतंकवादियों की तरह छुपकर-दुबककर कुछ भी नहीं करते, जो करना होता है, खुलेआम करते हैं, डंके की चोट पे. कोई मस्जिद गिरानी हो, कोई बम फोड़ना हो, संविधान को गरियाना हो, कत्ले आम करने हों, पादरी-वादरी निपटाने हों, बस्तियां जलानी हों, जरूरत हो तो आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धरने-प्रदर्शन करने हों- वे सब कुछ शान के साथ करते हैं. वो कभी किसी एन्काउन्टर में मारे नहीं जाते. जो मारे जाते हैं, वे खानदानी आतंकवादी होते हैं. पुलिस और सरकार की कहानी में लाख झोल हों, पर उनका मारा जाना वाजिब ही होता है, क्योंकि कहा न, वो होते ही खानदानी आतंकवादी हैं. आख़िर वे मुसलमान होते हैं.