Thursday, February 19, 2009

आपकी पॉलिटिक्स क्या है, कॉमरेड?

१७ फरवरी २००९ मंगलवार को The Hindu में एक कोने में सिंगल कॉलम खबर पढ़ी कि सीपीआईएम ने सिक्किम में बीजेपी से हाथ मिला लिया है. खबर चूंकि The Hindu में थी सो यह कहकर इसे उड़ा देना मुमकिन नहीं था कि यह दक्षिणपंथी मीडिया की शरारत है. खबर का टेक्स्ट इस तरह है-

CONGRESS, BJP, CPI(M) join hands in Sikkim

GANGTOK: Seting aside ideological differences, the CONGRESS, the BJP and the CPI(M) joined hands in Sikkim to fight Chief Minister Pawan Kumar Chamling`s Sikkim Democratic Front in the Assembly elections to be held later this year.
The alliance between the three national parties and two regional parties - Sikkim Himali Rajya Parishad Party and Sikkim Gorkha Prajatantrik Party - has been named the united Democratic Front (UDF), according to K.N. Upreti, Congress leader and UDF chiefcordinator. Mr. Upreti told journalsts here that there would be a direct contest between the SDF and the UDF in all 32 seats.- PTI

जाहिर है कि यह खबर दिल-दिमाग में तूफ़ान मचाती रही. अगले दिन 18 फरवरी 2009 को The Hindu में ही फिर इसी साइज़ की खबर के शीर्षक पर नज़र पड़ी तो यह जानकर राहत मिली कि ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन यह राहत पलों में काफूर हो गयी. भीतर टेक्स्ट में जो था, आप भी पढ़िए-

CPI(M) not part of Sikkim alliance
Special Correpondent
-------
NEW DELHI : The communist Party of India (Marxist) on Tuesday denied that it is partof an alliance comprising the Congress and the Bhartiya Janta Party in Sikkim.
The CPI(M) was reacting to news reports from Gangtok that it has joined hands to fight Chief Minister Chamling`s Sikkim Democratic Front in the Assembly elections to be held later this year.
''The person who attended the meeting, where the decision was announced the views of the Sikkim committii of the party,'' the Polit Bureau said in a statement.

दिल्ली में बैठा पोलित ब्यूरो यह नहीं कह पा रहा कि खबर मनघडंत है, वो गोलमोल सफाई भर दे पा रहा है. वो कह रहा है कि जिस मीटिंग में निर्णय हुआ (गठबंधन का), उसमें जो शख्स उपस्थित था (सीपीआईएम का), वह पार्टी की सिक्किम इकाई की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता. यानी पोलित ब्यूरो मान रहा है कि गठबंधन का निर्णय बाकायदा सीपीआईएम नेता की मौजूदगी में बैठक में हुआ. शायद किरकिरी के बाद आनन-फानन में दिल्ली से सफाई दी गयी. तो क्या यह सब दिल्ली के इशारे पर ही हुआ था? अगर नहीं तो उस बैठक में जाने वाले नेता (वो कौन था, क्या सिक्किम पार्टी सेक्रेट्री?) के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? वैसे भी पोलित ब्यूरो का काम आजकल शायद राज्यों में पथभ्रमित (या कम्युनिज़म से उलटी राह पकड़ने वाले) नेताओं (बुद्धदेव या पिनारय विजयन जैसे) को जेनुइन ठहराना ही हो गया है.अब कोई प्रकाश करात से पूछे कि `आपकी पॉलिटिक्स क्या है, कॉमरेड?`

4 comments:

Arun Aditya said...

क्या सचमुच विचारधाराओं के अंत का समय आ गया है?

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

समय आ नहीं गया है, विचारधाराओं का अंत कब का हो चुका है अरुण जी, भारतीय राजनीति में. यह उसी दिन हो गया था जिस ख़ुद को मार्क्सवादी कहने वाले सन्सद के को
ठे पर चढे.

कपिल said...

धीरेश भाई, करात की पॉलिटिक्‍स तो दशकों पहले तय हो चुकी है। सबसे पहले 1948 में तेलंगाना-पुनप्रा-वायलार के किसानों ने बगावत कर दी थी, तत्‍कालीन सीपीआई की जिला कमेटी इसे नेतृत्‍व दे रही थीं। लेकिन कायर केंद्रीय नेतृत्‍व ने हजारों किसानों से गद्दारी करके उनसे नाता तोड़ लिया। वहां हजारों किसानों का कत्‍लेआम हुआ। 1956 में अमृतसर अधिवेशन में सीपीआई ने बकायदा ऑन पेपर क्रान्ति से अपना रिश्‍ता खत्‍म कर लिया था। 1976-77 में बंगाल में किसानों-मजदूरों-छात्रों के कत्‍लेआम में सबसे बड़ा हाथ सीपीएम का था। दुर्भाग्‍य की बात है कि भारतीय कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन के इतिहास से लोग अभी भी परिचित नहीं हैं और सहज क्रान्तिकारी और वर्ग भावना से एक नकली लाल झंडे के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इस भ्रम से जितना जल्‍दी छुटकारा पा‍ लिया जाए अच्‍छा है। तमाम सरकारी कम्‍युनिस्‍ट जनता के लिए सिर्फ आस्‍तीन के सांप हैं
। इसलिए अब नये क्रान्तिकारी विकल्‍प के बारे में सोचना-समझना शुरू कर देना चाहिए।

अंशुमाली said...

इस मुद्दे पर अरुण आदित्य का प्रश्न सही है। विचारधारा का अंत न सिर्फ राजनीति बल्कि साहित्य-समाज में भी हो चुका है। जिस विचार को हम या वो लेकर चल रहे हैं वो बाजार से प्रभावित है।
वैसे इस खबर को मैंने दो-तीन दिन हुए जनसत्ता में पढ़ लिया था। मार्क्सवादी हर कहीं और हर किसी से हाथ मिला सकते हैं। उनका मार्क्सवाद समाजवाद से अलग अपने-अपने हित साधने का माध्यम भर है।
बहरहाल, इस खबर को यहां देने के लिए बधाई।