Wednesday, January 20, 2010

संघ की `संस्कृति`



अभी-अभी दिल्ली से एक दोस्त का मेल मिला जिससे पता चला कि दिल्ली विश्वविद्यालय केम्पस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गुंडों ने जनचेतना की बुक वेन पर हमला कर तोड़फोड़ की। संघ और उनकी तरह की ताकतें ऐसा अक्सर करती हैं। राष्ट्रभक्ति और संस्कृति का राग अलापने वाली ये ताकतें भगत सिंह, प्रेमचंद जैसे लेखकों को दुश्मन मानती हैं। आर्ट गेलरियों, किताबों के स्टालों, नाटकों और किसी भी तरह के स्वस्थ सांस्कृतिक-सामाजिक अभियान से उन्हें डर लगता है। यह उनकी `संस्कृति` है जो नरसंहारों तक जाती है।

12 comments:

Dipak 'Mashal' said...

Hansi aur taras dono aate hain aapki soch par... kuchh upadraviyon dwara swayam ki swarthpoorti ke liye kiye gaye hamle ko aapne sangh ki sanskrati se jod diya...
jis din aap asli sangh ko samajh gaye mere bhai.. us din mujhe dar hai ki aap paani to chhodiye vashp na ban jayen. :)
Jai Hind...

अफ़लातून said...

इस कायराना हरकत की सूचना सन्दीप से मिली । यह निन्दनीय है तथा इसका मुँहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। ’संघ परिवार’ के राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद पर भी इस प्रदर्शनी में साहित्य होगा।

Dr. Amar Jyoti said...

जब तक फ़ासिस्टों को उन्हीं की भाषा में जवाब नहीं मिलता वे तो ऐसा करते ही रहेंगे।

शिरीष कुमार मौर्य said...

मुझे इस घटना की जानकारी अभी पंकज पराशर ने दी. अनुनाद परिवार की ओर से मैं इस कृत्य की निंदा करता हूँ. दरअसल ऐसे हमले ये बताते हैं कि हम सही हैं और हमें ऐसा ही बने rahana hai ....

आशुतोष कुमार said...

वे सब से ज्यादा डरते हैं , इस देश की जनता के दिमाग में बैठे उस के सब से प्रिय नायकों की छवियों से.ये छवियाँ जब तक ज़िंदा रहेंगी , तब तक वे अपने निपट देशद्रोह को देशभक्ति का मुखौटा पहना कर बेच पाने में नाकाम रहेंगे.इसीलिए वे भगत सिंह की किताबों पर हमला करते हैं. इसी लिए कल उन्हों ने गाँधी को गोली मारी थी . लेकिन , राम कसम , वे इस मुल्क के लोगों के दिमाग में गाँधी की जगह गुरूजी या गोडसे को न बिठा सकें हैं , न बिठा सकेंगे .भगत सिंह की जगह दीनदयाल को न दिला सके हैं , न दिला सकेंगे.रामजी उन्हें सन्मति दें. ..

रंगनाथ सिंह said...

इनकी यह हरकत शर्मनाक है। हालांकि एबीवीपी के लिए इसमें नया कुछ नहीं। लंपटई और कितबों से वैर इनकी पुरानी पहचान है।

सुशीला पुरी said...

बहुत ही खराब लग रहा है ये पढते हुए ...भारत में ऐसे फासिस्टों की कमी नही ...सचमुच उन्हें उन्ही की भाषा में जवाब देना होगा .

ali said...

वे डरे हुए हैं विचारों से / किताबों से !

Udan Tashtari said...

अफसोसजनक!!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

i condemn this in the strongest possible words.

Ashok Pande said...

संघ ने श्वानपालन का नया कारोबार शुरू किया हुआ है. वही बेरोजगार हरामज़ादे कहीं कुछ कहीं कुछ उपद्रव करते रहते हैं. मेरा तो मानना है जहां साला कोई एक भी सद्यः निर्मित संघी मिले उससे बात बाद में ससुरे की मुंडी पर जूता पहले ठोका जाए.

Arun Aditya said...

कायराना हरकत। इसका मुँहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए।