Friday, August 6, 2010

रंग हिरोशिमा - लाल्टू की एक कविता



रंग हिरोशिमा


ब्लैक ऐंड ह्वाइट फोटोग्राफ में गुलाबी
जो भाप बन कर उड़ गया

आँखें फाड़ हम देखते हैं रंग हिरोशिमा
जानते हैं कि हमारे चारों ओर फैला रंग अँधेरा

हिबाकुशा रंग है जीवन का
स्लाइड शो से परे सीटों पर से उड़ते हुए
हमारे प्यार के रंगीन टुकड़ों का

हमारे ही जैसे दिखते हैं दानव
जिनका कोई देश नहीं, नहीं जिनकी कोई धरती
वाकई रंगहीन वे जो धरती से छीन लेना चाहते हैं हरीतिमा
रुकते ही नहीं सवाल
अनजाने ही रंगे गए हमारी चितकबरी चाहतों से
देर तक बहती है हिरोशिमा की याद
एक नितांत ही अँधेरे कमरे में फैलती
भोर की सुनहरी उमंग।

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मार्मिक

सुशीला पुरी said...

ओह !

रवि कुमार, रावतभाटा said...

वाकई रंगहीन वे जो धरती से छीन लेना चाहते हैं हरीतिमा...

बेहतरीन...

वर्षा said...

वाकई रंगहीन वे जो धरती से छीन लेना चाहते हैं हरीतिमा