Saturday, January 8, 2011

फ़ैज़ पर कुछ नोट्स : दूसरी और अंतिम किस्त


फ़ैज़ अपने उस्ताद के साथ शतरंज खेलना नहीं भूलते. बल्कि यह भी उनका प्रिय व्यसन है. ग़ालिब कहते हैं : 'बुलबुल के कारोबार पे है खंदा-हाए गुल / कहते हैं जिसे इश्क ख़लल है दिमाग़ का'. फ़ैज़ की बाज़ी कुछ और है : 'गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले / चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले.' ऐसी मिसालेंबेशुमार हैं.
फ़ैज़ ग़ालिब के मज़मून पर इस तरह काम करते हैं और उसमें से ऐसी सूरतें निकलते रहते हैं जैसी कि सूरत मिक्लोश यांचो ने एलेक्त्रा के यूनानी मिथक पर काम करते हुए अपनी अमर फ़िल्म 'एलेक्त्रा माई लव' में निकाली थी.
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उर्दू में यह बात रही है कि ग़ज़ल के श्रोता और पाठक हमेशा दौरे हाज़िर के शाइरों पर ही तवज्जो देते रहे हैं, पुरानों की तरफ़ उनका ख़याल ज़्यादा नहीं रहता.इसकी वजह शायद यह होगी कि ग़ज़ल परफोर्मिंग ट्रेडीशन की तरह ज़्यादा लोकप्रिय रही. मसलन ज़ौक़, ग़ालिब और मोमिन के दौर में उनकी धूम थी,लखनऊ में अनीसो-दबीर का शोहरा था, फिर दाग़ की धूम हुई, एक दौर इक़बाल का आया, जिगर और हसरत और फ़िराक़ का ज़माना आया. एक मीर ही थे जिन्हें हर दौर में याद किया गया. ग़रज़ ये कि तरक्कीपसंद तहरीक (प्रगतिशील आन्दोलन) के ज़माने में ही यह संभव हो पाया कि ग़ालिब या मीर या या नज़ीर को पुरानों की तरह देखने के बजाए प्रासंगिक समकालीनों की तरह देखा जाए और उनसे सीधा संवाद स्थापित किया जाए.
फ़ैज़ को अपने आरंभिक दौर में ग़ालिब की कड़ी ज़रूरत पड़ी और यह रिश्ता जीवन-पर्यंत चला. फैज़ के यहाँ मीर तक़रीबन ग़ायब हैं. सिर्फ़ 1954 में जब फ़ैज़ मोंटगोमरी जेल में क़ैद थे उन्हें कुछ मीर की याद आई. दो ही ग़ज़लें ऐसी हैं जहाँ मीर की सोहबत झलकती है ('कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं', और 'कुछ मुहतसिबों की खल्वत में कुछ वाइज़ के घर जाती है'). मीर की तरफ़ इक़बाल ने भी कम ही देखा था, और ग़ौर करें तो 1947 से पहले पंजाब सूबे में मीर की ज़्यादा पूछ नहीं रही. उपमहाद्वीप के बटवारे के बाद सबको मीर याद आये और बुरी तरह छा गए. नासिर काज़मी और इब्ने इंशा जैसे दो अलग अलग मिज़ाज के शाइर मीर की ही मजलिस में रहे.
उर्दू जैसी भी बदक़िस्मत ज़बान हो उसे जिलाए रखने में पुराने बड़े मददगार रहते हैं. वह अपनी समकालीनता खोते नहीं दीखते. आज फ़ैज़ भी उन्हीं पुरानों में शामिल हैं.
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उर्दू शायरी में निस्वानी आवाज़ (स्त्री स्वर) के लिए जगह बनाने और उसे स्थापित करने में प्रगतिशीलों का, उनमें भी सबसे ज़्यादा फ़ैज़ का रोल है, इसमें मुझे कोई शक नहीं है. इसके लिए फ़ैज़ ने अलहदा से कुछ नहीं किया, उनकी उपस्थिति मात्र से ही यह राह खुल गयी. फ़ैज़ ने परम्परा का जो ख़ामोश लेकिन मूलगामी आधुनिकीकरण किया उसी में स्वरों के एक वास्तविक और लोकतांत्रिक विस्तार और सह-अस्तित्व की ज़मीन मौजूद थी. ग़ज़ल और नज़्म में कवयित्रियाँ पता नहीं कब से लगभग मर्दाने लिबास में मर्दानी बोली बोलते हुए पेश होती रही हैं! जैसे पुराने नाटकों में, जहां औरतों की भूमिकाएँ पुरुष ही निभाया करते थे, शाइरी में भी 'स्त्री-स्वर' पर शाइर का ही एकाधिकार था, शाइरा के लिए वह वर्जित ही था. हिंद-फ़ारसी काव्य परम्परा की यह एक पुरानी समस्या है और तसव्वुफ़ की कुछ 'खूबियों' में एक यह खूबी गौर करने लायक़ है. कथा साहित्य में भले ही रशीद जहाँ, इस्मत, कुर्रतुल ऐन हैदर के लिए (या दूसरी तरह के लेखन में सफ़िया अख्तर और अनीस किदवाई जैसी रचनाकारों के लिए) यह समस्या नहीं रही हो, पर शाइरी का रास्ता पकड़ने वाली औरत की बड़ी मुश्किल रही है. कुछ कुछ हाली के दौर से, पर ख़ास तौर पर फ़ैज़ की आमद के बाद से यह संभव हो सका कि उर्दू शाइरी में स्त्री स्त्री की तरह पेश होने लगीं और कवयित्रियाँ प्रथम पुरुष स्त्रीलिंग का बेधड़क इस्तेमाल करने लगीं. यही वजह होगी कि सारा शिगुफ्ता, परवीन शाकिर, फ़हमीदा रियाज़ और किश्वर नाहीद जैसी कवयित्रियों को पढ़ते हुए फ़ैज़ और मजाज़ तो याद आते हैं, नून मीम राशिद, मीराजी, अहमद नदीम क़ासिमी, नासिर काज़मी और अख्तरुल ईमान याद नहीं आते. जोश--फ़िराक़ की तो बात ही छोड़िए.
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फ़ैज़ जैसा प्रतिबद्ध और नैचुरल अंतर्राष्ट्रीयतावाद आज उर्दू कविता में दुर्लभ है. हिन्दी में मुक्तिबोध और शमशेर को छोड़ दें तो वह कम-कम ही था -- और ये भी उसी पीढ़ी के नुमाइंदे हैं. आज के शाइर/कवि की आफ़ाकियत निस्बतन अप्रतिबद्ध, अमूर्त और हल्की मालूम होती है -- वह अक्सर प्रगतिशील अंतर्राष्ट्रीयवाद और वर्तमान दौर के प्रतिक्रियावादी भूमंडलीकरण के बीच तमीज़ करना भूल जाता है. यह आफ़ाकियत कम, आफ़ाकियत का दावा ज़्यादा है -- असल में यह अपने यहाँ की हक़ीक़त से फ़रार का ही एक रूप है.
यहीं यह ख़याल भी आता है कि दुश्चक्रों में फँसे, अपेक्षाकृत छोटे देशों का आदमी ही सबसे ज़्यादा अंतर्राष्ट्रीयतावादी हो सकता है. उसे वैश्विक परिदृश्य, उसमें अपने समाज की लोकेशन और सामाजिक-राजनीतिक दुर्दशा से इन चीज़ों के ताल्लुक़ का तीव्र अहसास होता है. उसके लिए देश का बदल विदेश नहीं हो सकता-- जो बैरूनी है वही अंदरूनी को निर्धारित या प्रभावित करता है. हिन्दुस्तान जैसे बड़े देश में सच्चा अंतर्राष्ट्रीयतावादी होना इसीलिए मुश्किल और चुनौती भरा हैकि देश ही पूरी दुनिया नज़र आता है. अंदरूनी का इतना विस्तार है कि बैरून बहुत दूर की चीज़ लगती है. भारत से बाहर जो है विदेश है. पाकिस्तान या क्यूबा या अफ़गानिस्तान के बाहर जो भी है सिर्फ़ बहुत पास है बल्कि बुरी तरह ग़ालिब है. एक अच्छा पाकिस्तानी बुद्धिजीवी सिर्फ़ पाकिस्तान या पाकिस्तानी नियति के बारे में सोचता नहीं रह सकता. उरुग्वे, चीले, आर्हेंतीना, पेरू या निकारागुआ के लेखक अपने अपने देशों से कहीं ज़्यादा पूरे लातीनी अमरीकी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यही बात वहाँ के क्रांतिकारियों पर लागू होती है. लगभग यही बात अरब दुनिया के बारे में सही है.
यही वजह है कि पाकिस्तान ने पिछले पचास साल में इक़बाल अहमद, हमज़ा अलवी, तारिक़ अली और फ़ैज़ जैसी आलमी शख्सियतें पैदा कीं (भले ही पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान में उनकी कोई क़द्र हो) पर हमारे पास बताने के लिए बमुश्किल अमर्त्य सेन जैसा ग़ैर-रैडिकल नाम है जो अंतर्राष्ट्रीयतावादी कम,उदारवादीवादी मानवतावाद के प्रवक्ता ज़्यादा लगते हैं
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फ़ैज़ के बाद : फ़ैज़ के बाद गुलशन का कारोबार कितना बदल गया है. बाद का दौर दक्षिण एशिया में युद्ध, गृहयुद्ध, साम्प्रदायिक हिंसा, धर्मान्धता, साम्राज्यवादी लूट, समाज और अर्थव्यवस्थाओं पर नव-उदारवादी हमलों और लोकतंत्र के पीछे हटने का दौर है. राज्य द्वारा हर तरह के प्रतिरोध का दमन, जनक्षेत्र पर निजी पूँजी का नियंत्रण हमारे दौर की सचाइयाँ हैं. पाकिस्तान का हाल हिन्दुस्तान से भी ख़राब हुआ है. वहाँ जल्दी सुधार की कोई सूरत नज़र नहीं आती. फ़ैज़ के बाद के पाकिस्तान के बुद्धिजीवी और लेखक आज हद से हद हिन्दुस्तान-जैसी 'डेमोक्रेसी' और हिन्दुस्तान जैसी 'आज़ादी' चाहते हैं -- फ़ैज़ के वंशजों के सपने अब बहुत छोटे सपने हैं. फ़ैज़ की धरोहर अब बस भारत-पाक सुलह, सिविलियन सरकार और नारी-अधिकार के अभियान में काम आती है. पाकिस्तान में समानतावादी समाज की परियोजना का कोई ज़िक्र नहीं जिससे फ़ैज़ की कविता इतनी प्रेरित थी, जिसकी वजह से फ़ैज़ ने कोई सात-आठ साल जेल में और कई साल आत्म-निर्वासन में गुज़ारे.
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फ़ैज़ के यहाँ इस्लाम के आरंभिक इतिहास और कुरानी आयतों की अनुगूँजें मिलती हैं. वह इन 'इस्लामी' सन्दर्भों का हमेशा बा-मक़सद, सेकुलर और पारदर्शी इस्तेमाल करते हैं. उनकी आवाज़ थियोलोजी में रंगी, धार्मिकता में भीगी हुई कम्पित आवाज़ नहीं है. वह किसी मज़हबी चाशनी में डूबे हुए कवि नहीं हैं. वह हिन्दी के उन प्रोग्रेसिवों की तरह हैं जिनकी दो या तीन पीढ़ियाँ ऐसी तुलसी-मय रहती आई हैं कि कोई और रंग उन पर चढ़ता ही नहीं, वे उर्दू के उन जदीदियों (आधुनिकतावादियों) की तरह हैं जो जवानी में अराजकतावाद की हदों से गुज़रकर अब तसबीह हाथ में लिए रहते हैं. उनकी मशहूर नज़्म 'हम देखेंगे' लगभग पूरी की पूरी कुरान, तसव्वुफ़, और इस्लाम के कुछ ऐतिहासिक प्रसंगों पर टिकी हुई है, लेकिन उसका किसी भी तरह का धार्मिक दुरुपयोग नहीं किया जा सकता.पहले वह जनरल ज़ियाउल हक़ के फ़ौजी शासन के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में अवामी बग़ावत का मुख्य प्रतीक बनती है, फिर इक़बाल बानो की आवाज़ में एक इन्किलाबी तराने का रूप ले लेती है -- एक ऐसे वक़्त में जब सभी धार्मिक रूढ़िवादी तत्व ज़िया शासन का खुला समर्थन करते थे.
कुरान में ईश्वरीय प्रकोप की चेतावनी और दैवी गर्जना यहाँ सामाजिक क्रांति का महान यूटोपियन आह्वान बन जाती है -- 'वो दिन कि जिसका वादा है / जो लौहे-अज़ल पे लिक्खा है'. 'फ़ैसले का दिन' इन्किलाबी सत्तापलट का दिन हो जाता है, जब ज़ुल्मो-सितम के भारी पहाड़ 'रूई की तरह' उड़ जाएंगे, जब'तख्तो-ताज' उछाले जाएंगे, जब शासितों के 'पाँव-तले यह धरती धड़-धड़' धड़केगी, जब 'अनल हक़' का नारा बलंद होगा, जब 'खल्क़े-खुदा' राज करेगी, 'जो तुम भी हो और मैं भी हूँ'. मैं अक्सर सोचता हूँ कि कौन सा इस्लामी प्रतिष्ठान इस नज़्म को अपने साहित्य में दाखिल करेगा, कौन वाइज़ इसे अपने वाज़ का हिस्सा बनाएगा! क्या यह कभी जुमे के रोज़ किसी मस्जिद के मिम्बर से पढ़ी जाएगी? अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं है, और मुझे नहीं लगता कि ऐसा कभी होगा.
इस पर कभी गौर नहीं किया गया कि फ़ैज़ तसव्वुफ़ (सूफ़ी दर्शन) को इस्लामी परम्परा के नैरन्तर्य में देखते हैं, उसके विरोध या प्रतिरोध में नहीं. जो बात इस्लाम के सन्दर्भ से नहीं कही जा सकती वह तसव्वुफ़ के सन्दर्भ से बहुत सफलता से कही जा सकती है ऐसा फ़ैज़ नहीं समझते. उनके लिए सूफ़ी मत इस्लाम का विकल्प नहीं है. अव्वल तो फ़ैज़ के यहाँ तसव्वुफ़ भी कोई विकल्प नहीं है. वह उनके लिए विचारधारा या जीवन दर्शन का रूप नहीं ले सकता. तसव्वुफ़ उनके लिए एक उपलब्ध मुहावरा और ज़बान है, जैसे वह ग़ालिब के लिए भी था. फ़ैज़ उतने ही 'आध्यात्मिक' हैं जितने महमूद दर्वीश या एडवर्ड सईद.
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(नया पथ के फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक से साभार)

3 comments:

ssiddhant said...

फैज़ की ज़बां ने हमेशा हमें उद्वेलित किया है, साफ़ और समझ-भरी भाषा का बादशाह फैज़ को बेशक़ कहा जा सकता है. सबसे ज़रूरी बात वह है जिसमें ग़ालिब का प्रभाव फैज़ की शाइरी में मिलता है. इश्क़ और आन्दोलन को उसकी असल रौ तक पहुँचाने में फैज़ की शाइरी बहुत ज़्यादा हद तक सफल साबित होती है. असद जी का शुक्रिया इस 'नोट' के लिए.

वर्षा said...

कहते हैं जिसे इश्क़, ख़लल है दिमाग़ का
एक किताब की तरह पढ़ा, लगता है

Dheeraj Pandey said...

ये रचना संकलनीय है .तरक्की पसंदगी का फैज़ से अच्छा उदाहरण शायद कहीं नहीं मिलेगा.ऐसा क्यों होता है जब भी कोई आवाज़ को बुलंद करने वाला चुप कराया जाता है तो फैज़ ही याद आते हैं,पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के गवर्नोर सलमान तासीर की हत्या के बाद वहां के लिबरल की चुप्पी और सहमी से,फैज़ जैसे शख्सियत की कमी महसूस होती है.ऐसा लगता है जुल्मों सितम के कोहे गरां,कोहे गरां ही बने रहेंगे.'अब कहाँ रस्म घर लुटाने की' फैज़ ने शायद सही कहा था.मुझे याद है जब मैं छोटा था तो मजदूर फिल्म का गाना 'हम मेहनतकश इस दुनिया से सुना था'जो की फैज़ की मूल रचना का ही सरल रूप है .इस गाने को सुन के अजीब सी फीलिंग आती थी.फिर मैंने जब सालों बाद 'हम देखेंगे' सुना तो वाकई रोंगटे खड़े हो गए.काश की फैज़ को और भी ज्यादा लोग पढ़ते और समझते.शुक्रिया धीरेश भइया! फैज़ से पहला परिचय आपने ही कराया था