Thursday, June 9, 2011

हम भारत के लोग और हमारा एक नागरिक हुसैन -शिवप्रसाद जोशी




इस देश के लिए इस वक्त की सबसे बडी शर्म क्या होगी कि जब देश का सबसे बडा चित्रकार इस दुनिया से विदा हुआ तो टीवी मीडिया और हमारे इस विराट मध्यवर्ग का ध्यान हरिद्वार और दिल्ली के बीच एक बहुत ही अजीब और जुगुप्सा भरी बहस पर टिका था जिसके सूत्रधार धर्म और राजनीति के बाबा सूरमा थे.

कैसी विचलित कर देने वाली खबर नौ जून 2011 की है कि मकबूल फिदा हुसैन नहीं रहे. देश से दूर कर दिए गए और कतर की नागरिकता लेने के लिए विवश कर दिए गए हुसैन हिन्दुस्तान लौटना चाहते थे. बाबाओं और ध्वज पताकाओं और विजय जुलूसों, ललकारों, नकली किस्म के अनशनों, नाना किस्म की प्रेस कॉफ्रेंसों भगवा और न जाने कौन से साजिश भरे रंगों से लोटती पोटती घबराती उखडती सरकारों उनके नुमायंदों सौदेबाज गुटों नक्कालों की रंगीनियों और रंगबाजियों के बीच सहसा तमाम रंगों से ऊपर उठता हुआ गहरी निराशा उदासी और अवसाद का रंग फनां हो गया. जैसे ये मानो कई रंग ही न हो. जैसे अफसोस का एक बहुत बडा छाता खुल गया हो और वो हमारे ऊपर से नहीं हटेगा.

हुसैन के लिए देश में रहना दूभर कर दिया गया था और देश से बाहर रहना उनके लिए दूभर था. वो गांव देहात के हिंदुस्तान के बेटे थे. उनकी कला इस देश की मिट्टी और तहजीब में घुली मिली थी. हिंदू हिंदू चिल्लाने वाली जमात क्या अब अपने कपडे फाडेगी कि हुसैन वहीं चले गए हैं जहां तमाम आराध्य रहते हैं.
हुसैन बाहर नहीं रहना चाहते थे. वो अपनी जिद से एक काम करने के लिए कतर की नागरिकता लेकर रहने भले लगे थे लेकिन वे एक जगह रहते कहां थे. पर उनका मन देश पर अटका हुआ था. देश के लिए उनकी तडप उनकी वेदना ने उन्हें कमजोर करना शुरू कर दिया था. वो हैरान थे कि आखिर वे लोग उनके और उनकी कला के बीच में कहां से आ गए जो तय करते थे कि कौन देश में रहेगा कौन नहीं. वे हैरान थे कि उन्हें किस आसानी से किस सामरिक रणनीति के साथ बाहर ठेल दिया गया.

नवउदारवाद के राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक जुनूनों के आगे नतमस्तक हो जाने वाली सरकारें हुसैन को देश नहीं वापस बुला पाईं. केंद्र सरकार की कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि हुसैन के खिलाफ जो अजीबोगरीब मुकदमे पूरे देश भर में न जाने कहां कहां दर्ज हैं उन्हें रद्द कराए, कोर्ट में दलीले दें और अपने सबसे बडे चित्रकार देश के सबसे बुजुर्ग रचनाधर्मी को मान सम्मान दे पाए.

एक बेशर्म और खतरनाक किस्म की चुप्पी है. टीवी पर लाइव है सुब्होशाम और हरिद्वार से बाबा लोग और मीडिया चीख रहे हैं. भगवा रंगों से टीवी स्क्रीन पटे हुए हैं. या वहां खादी के संदेहास्पद बना दिए गए रंग हैं. हुसैन के रंग इस पाताल से कोसों दूर है. ऐसा लगता है ये जगह अनैतिकता के मलबे से भरी हुई है.
आज जब हुसैन नहीं रहे और 96 साल की उम्र देहांत के लिए अस्वाभाविक नहीं है जाहिर है इसके लिए रोने पीटने की जरूरत भी नहीं है फिर भी फिर भी न जाने कुछ ऐसा लगता है कि हम जमीन के नीचे और गड गए हैं. हम भारत के लोग. हम ये कैसी हो गईं जिंदा कौमें.
-शिवप्रसाद जोशी

5 comments:

नीरज बसलियाल said...

http://timesofindia.indiatimes.com/india/I-have-not-fled-India-said-Husain-in-his-last-interview/articleshow/8791202.cms

Anonymous said...

Read this
http://www.thehindu.com/news/national/article2091413.ece?homepage=true

हमारीवाणी said...

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manav said...

hum srminda hain is baat pr lekin mujhe bda afsos bhi hai ke jb hussain ko mjburn desh chodna pda tha us wqt hmare sbhi klakar or klapremi ek ajib dhng se chup the ya yu khe k wo ekjut ho kr hussain ka smrthn na kr ske..main hmesa is swal se preshan bhi rhta hu k aakhir kb tk in chuninda ptakadhario se hmara desh dra rhega ya hm inke dr se kb tk chup rhenge..
ab hum hussain ke maamle me hmesa afsos hi jahir kr skte hai.

वर्षा said...

सचमुच शर्मनाक है ये कि हम उन्हें देश वापस नहीं ला सके और इस बात पर शर्मिंदा भी नहीं होते।