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Wednesday, April 16, 2014

अमेरिका है साम्प्रदायिक-जनविरोधी ताकतों का संरक्षक : कमाल लोहानी




(बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और मशहूर संस्कृतिकर्मी कमाल लोहानी वहां के प्रसिद्ध भाषा आंदोलन और मुक्ति संग्राम के बड़े नामों में से हैं। स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र (बांग्लादेश रेडियो) के पहले निदेशक रहे लोहानी बांग्लादेश जर्नलिस्ट यूनियन, प्रेस इंस्टीट्यूट, शिल्पकला अकादमी आदि संस्थाओं का नेतृत्व भी कर चुके हैं। 80 बरस की उम्र में भी वे प्रगतिशील आंदोलन में सक्रिय हैं। वे `त्रिपुरा संस्कृति समन्वय केंद्र` के अधिवेशन (26-28 फरवरी, 2014) में शामिल होने के लिए अगरतला आए, तो उनसे यह संक्षिप्त बातचीत हुई।–धीरेश सैनी)

यह सही है कि बांग्लादेश के हालात फिलहाल बहुत बेहतर नहीं हैं। लेकिन यह मानकर चलना गलत होगा कि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति हर समय एक ही जैसी रही है। उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। रूढ़िवादी ताकतें सिर उठाती रही हैं, उन्होंने बवाल किए हैं लेकिन जनप्रतिरोध के सामने उन्हें मुंह की भी खानी पड़ी है। 1971 का मुक्ति संग्राम भी इन ताकतों के खिलाफ जनप्रतिरोध की जीत का गवाह रहा है। इन दिनों बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जमात-ए-इस्लामी जैसी ताकतें सियासत में ज्यादा से ज्यादा एकजुट हुई हैं और वे जनता के सामाजिक तानेबाने को तोड़ने पर आमादा हैं। दरअसल, इन कट्टरपंथी ताकतों के उभार के लिए अमेरिका और यूरोप के उसके मित्र देश जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ महीनों से बांग्लादेश में व्याप्त राजनीतिक अफरातफरी और उत्पात में अमेरिका और उसके पिट्ठू देशों के प्रतिनिधियों की भूमिका बेहद आपत्तिजनक रही है। इन देशों के राजनयिक हमारे देश की सियासत और हमारे अंदरूनी मामलों में खुलेआम दखल देने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे देश को क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, ये सब वे सार्वजिनक रूप से फैसला सुनाने के अंदाज में बताना चाहते हैं। लेकिन, देश की जनता ऐसी हरकतों से खुश नहीं है। देश के राजनीतिक चेतना वाले लोगों को कट्टरपंथी ताकतों का उभार और अमेरिका जैसे देशों की ये कारगुजारी कतई स्वीकार नहीं है।


हम 1971 में आज़ादी के लिए लड़े थे। इससे पहले 1952 का भाषा आंदोलन भी शानदार ढंग से लड़ा गया था। हमारा देश बहुत छोटा है पर इस लिहाज से हमारी जनसंख्या काफी ज्यादा है। 160 मिलियन की जनसंख्या वाले इस देश के मिजाज में नहीं है कि वह अमेरिका के संरक्षण में चल रहे कट्टरपंथी ताकतों के जनविरोधी आंदोलन को स्वीकार कर ले। हम नई पीढ़ी की तरफ उम्मीद के साथ देख रहे हैं। जो लोग सच्ची स्वाधीनता में विश्वास रखते हैं, वे खुद को और सेक्युलर संघर्षों की महान परंपरा को फिर से रिवाइव करना चाहते हैं। 2013 की 5 फरवरी को याद कीजिए। इंटरनेशल क्राइम ट्रिब्यूनल ने 400 से ज्यादा लोगों के हत्यारे युद्ध अपराधी क़ादिर मुल्ला को आजीवन कारवास का दंड़ सुनाया तो नवयुवकों ने ही जमात-ए-इस्लामी के इस पदाधिकारी के लिए फांसी की मांग को लेकर गण जागरण मंच बनाकर शहभाग से बड़े विरोध की पहल की। वे कभी आंदोलनों में शामिल नहीं रहे थे लेकिन उन्होंने सिद्ध किया कि वे देशभक्त हैं और जरूरत पड़ने पर चुप बैठने वाले नहीं हैं। इस समय भी सबसे बड़ी जरूरत सियासत और समाज को प्रभावित करने की कोशिशें कर रही इन दुष्ट साम्प्रदायिक शक्तियों को पराजित करना है।

हाल में हुए राष्ट्रीय चुनावों में बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी आदि 18 पार्टियों के गठबंधन ने भारी बवाल मचाया। हालांकि, देश की जनता पाकिस्तानी शासन के समय से ही एन्टी इस्टेबलिशमेन्ट प्रवृत्ति प्रदर्शित करती रही है। हो सकता था कि विपक्ष चुनाव में हिस्सा लेता तो बीएनपी-जमात गठबंधन जीत हासिल कर लेता। लेकिन, इस गठबंधन ने चुनाव आयोग पर झूठे आरोप लगाते हुए हिंसा का वातावरण पैदा कर दिया। उनके लोगों ने अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याएं कीं और उनकी दुकानें और घर फूंक दिए। अमेरिका और उसके पिट्ठू देशों के प्रतिनिधि सरकार से साफ-सुथरा चुनाव सुनिश्चित करने की मांग तो करते रहे लेकिन उन्होंने विपक्ष के हिंसक रवैये को रोकने के लिए कोई दबाव बनाना जरूरी नहीं समझा। ऐसे में सत्तारूढ़ अवामी लीग और सहयोगी पार्टियों का गठबंधन बिना किसी `विरोध` के सत्ता में बरकरार रह गया। वर्कर्स पार्टी (सीपाआईएम समर्थित) के छह और जाति समाजतांत्रिक दल के भी पांच-छह उम्मीदवार जीते हैं। सरकार का 43 प्रतिशत मतदान का दावा ठीक नहीं है तो अमेरिका आदि देशों का मात्र 10-15 प्रतिशत वोटिंग का दावा भी सही नहीं है। हिंसा के चलते बहुत जगहों पर वोटर घरों से निकल नहीं सके लेकिन उन्हें जहां भी मौका मिला, वे उत्सव की तरह मतदान केंद्रों पर पहुंचे भी। निश्चय ही इस तरह के चुनाव लोकतंत्र की दृष्टि से बेहतर नहीं कहे जा सकते। समस्या वही है कि अमेरिका जनतंत्र विरोधी शक्तियों को संरक्षण देना बंद नहीं कर रहा है। साउथ एशियन इलाके में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए वह सच्ची लोकतांत्रिक सरकारों को हटाकर अपनी पिट्ठू जनविरोधी सरकारें स्थापित करना चाहता है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे देशों में लूट-खसोट और चीन की शक्ति को नियंत्रित रखने, दोनों ही उद्देश्यों से उसकी दखलंदाजी बढ़ती ही जाती है।

अच्छी बात यह है कि बांग्लादेश के लोगों में कला-संस्कृति के प्रति रुझान बरकरार है। अमेरिका और उसके मित्र देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैसे और दूसरे प्रलोभनों के जरिए जिस तरह हमारे नेताओं को खरीदना चाहते हैं, हमारे कवियों-कलाकारों को भी खरीद लेना चाहते हैं। और इस तरह देश की नई पीढ़ी को भ्रष्ट करने का षड़यंत्र चल रहा है। बहुत से कवि-कलाकार भ्रमित हुए हैं पर सांस्कृतिक आंदोलन की धारा मजबूत है और इसकी बागडोर उदार-लोकतांत्रिक हाथों में है। `सम्मिलित सांस्कृतिक जुट` एक ऐसा ही बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन है। प्रगतिशील विचारधारा का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन `उदीची` है जिसकी देश भर में 303 शाखाएं हैं और लंदन, पेरिस, टोक्यो, न्यूयॉर्क आदि 10 विदेशों शहरों में भी इसकी इकाइयां हैं। वाम, प्रगतिशील, जनतांत्रिक और सुरुचिपूर्ण सारवस्तु के कार्यक्रम लेकर `उदीची` के कलाकार जनता के बीच लगातार सक्रिय हैं। कविता, थियेटर, लोकनृत्य और जात्रा जैसी परंपरागत विधाओं के जरिए नवजागरण में जुटे इस सांस्कृतिक आंदोलन के 10 कार्यकर्ता कट्टरवादी शक्तियों के हाथों शहीद हो चुके हैं। जासेर में संगठन के वार्षिक अधिवेशन में ग्रेनेड से हमला किया गया था। नेतरोकोना और दूसरी जगहों पर भी संगठन के कार्यक्रमों व प्रदर्शनों के दौरान हमले होते रहे हैं।

यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि मुक्ति संग्राम को डेमोक्रेसी, सेक्युलरिज़्म और सोशलिज़्म के जिन मूल्यों को आधार बनाकर लड़ा गया था, स्वाधीनता के बाद उन मूल्यों के सार को हम अपेक्षित रूप से संस्थाओं में परिवर्तित नहीं कर सके। स्वाधीनता के बाद जो संविधान प्रस्तुत किया गया, उसमें लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के साथ बंगाली राष्ट्रवाद भी जोड़ दिया गया। भाषा आंदोलन और स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बंगाली राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा में हमारा विश्वास कभी नहीं था लेकिन स्वाधीनता के बाद इसे संविधान में एक स्तंभ की तरह खड़ा कर दिया गया। पहाड़ियों पर रहने वाले आदिवासियों ने दोनों आंदोलनों में भागीदारी की थी। बांग्ला को अकेली राष्ट्रभाषा नहीं होना था बल्कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं को भी समान अधिकार दिया जाना था। लेकिन, 42 सालों बाद भी ऐसा नहीं हो सका।

यह ठीक है कि मुक्ति संग्राम का नेतृत्व सेक्युलर लोगों के हाथों में था और सेक्युलरिज़्म एजेंडे में प्रमुखता से शामिल था। लेकिन, यह कहना गलत होगा कि ऐसे सफल सेक्युलर संघर्ष के बाद अचानक धार्मिक कट्टरता का प्रश्न आकर खड़ा हो गया। उसके बीज हमेशा से वहीं पड़े हुए थे। सेक्युलरिज़्म का स्लोगन एक अलग बात है और हर किसी का उसे जीवन मूल्य की तरह स्वीकार करना अलग। यह संसदीय राजनीति की सीमाओं और उसे पूंजी व भावनात्मक प्रश्नों से प्रभावित कर लिए जाने की संभावनाओं का भी मसला है। पश्चिम बंगाल में भी वाम के लंबे शासन का अंत होते ही जिस तरह की चीजें हो रही हैं, उसका एक कारण यही है।


त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश का एक जीवंत सांस्कृतिक संबंध है और इस तरह यह दो पड़ोसी देशों के लिए बेहतर बात है। बांग्लादेश और इन दोनों भारतीय राज्यों के प्रगतिशील, डेमोक्रेटिक लोगों, कलाकारों व संस्कृतिकर्मियों की निरंतर आवाजाही का बड़ा महत्व है। यह रिश्ता कट्टरपंथी शक्तियों की आंखों में चुभता रहता है। हमें `हिंदुस्तान का दलाल` कहकर निशाने पर रखने की कोशिशें की जाती हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी थीं तो हमारे यहां कहा गया कि वे मित्रतापूर्ण रहेंगी लेकिन तीस्ता आदि मुद्दों पर उनकी राजनीति ऐसी नहीं रही। हिंदुस्तान में साम्प्रदायिक शक्तियों का बढ़ता प्रभाव पूरे उपमहाद्वीप के सेक्युलर व जनतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए खतरे की घंटी की तरह है। नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं (जैसी हम उम्मीद नहीं करते हैं) तो निश्चय ही बांग्लादेश में सेक्युलर व डेमोक्रेटिक ताकतों के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी। जहां तक अमेरिकापरस्ती का सवाल है तो हिंदुस्तान की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भी आर्थिक मोर्चे पर उसके प्रभाव में है लेकिन बांग्लादेश से संबंधों को लेकर उसमें एक लोच बरकरार है जो मोदी के आने से (पीएम बनने से) नहीं रह पाएगी।
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(समयांतर के अप्रैल अंक से साभार)

Monday, March 17, 2014

अस्सी के काशीनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी


`धर्म और जाति को अबकी मुझे लगता है कि बनारस की जनता एक ठेंगा दिखाएगी और कहीं न कहीं मोदी के पक्ष में लोग जाएंगे।`-काशीनाथ सिंह

अब इस पंक्ति में कितना भी स्वच्छ और उदार हृदय लगाएं या कितना भी पवित्र या लंपट तर्क करें, क्या यह कहने की कोई गुंजाइश बचती है कि काशीनाथ जनता जैसा सोच रही है, वैसा बता रहे हैं? यहां तो वे सीधे कह रहे हैं कि अबकी बनारस की जनता धर्म और जाति को ठेंगा दिखाकर मोदी के पक्ष में जाएगी। याद रखिए कि वे यह नहीं कह रहे हैं कि जनता धर्म के नाम पर बेवकूफ बनेगी, उसका ध्रुवीकरण होगा। यह पंक्ति तो उन्होंने यह कहते हुए ही कही कि पहले ओटों का ध्रुवीकरण होता था, अबकी मोदी के आने से जनता धर्म और जाति को ठेंगा दिखाएगी। तो मोदी के पक्ष में जाना धर्म के नाम पर हो रही साम्प्रदायिक सियासत को ठेंगा दिखाना हुआ?
बहरहाल, बहुत से साथी मैसेज इनबॉक्स में कह रहे हैं कि बीबीसी का लिंक सुनने में नहीं आ रहा है तो सभी की सुविधा के लिए बीबीसी और काशीनाथ की बातचीत को टाइप करके दे रहा हूं। पढ़िएगा-
बीबीसी- वाराणसी से नरेंद्र मोदी के प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भाजपा के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश नज़र आ रहा है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वाराणसी का महत्व तो है ही, यह शहर एक खास अंदाज के लिए भी जाना जाता है। तो नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी को लेकर एक आम बनारसी क्या सोचता है, इस बारे में मैंने बात की वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह से।
काशी- देखिए ऐसा है कि पंड़ित कमलापति त्रिपाठी के बाद जो कांग्रेस के थे, 1970 के बाद इस नगर को ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय प्रचार दे या इस नगर के प्रचार के लिए कुछ करे। ज्यादातर 1990 के बाद बीजेपी के सांसद रहे हैं और नगर का न तो विकास हो सका है और न इसकी कोई छवि बन सकी है बाहर, देश या विदेश में। जबकि मैंने स्वयं कहा है लिखा है कि यह बिहार और उत्तर प्रदेश का लाइन ऑफ कंट्रोल है, एक केंद्र है जहां से बिहार भी प्रभावित होता है और उत्तर प्रदेश भी प्रभावित होता है। तो इस नगर की एक छवि है वो छवि के नाम पर और राजनीति के लिए राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान के लिए एक छटपटाहट रही है इस नगर में। मोदी बाहरी जरूर हैं, आ रहे हैं लेकिन नगर में ज्यादातर लोगों का सोच ये है के इस बहाने इस नगर को, सिर्फ हिन्दुस्तान का क्या होगा, ये तो बाद की बात है, नगर का विकास होगा।
बीबीसी- जो एक खांटी बनारसी अंदाज जिसकी अक्सर चर्चा होती है, जिसके लिए बनारस जाना जाता है, वहां के लोग, बनारसी लोग क्या मोदी को आत्मसात कर पाएंगे और क्या मोदी खुद बनारस के लोगों से जुड़ पाएंगे, कितनी संभावना आप इसकी देख रहे हैं?
काशी- इसमें एक चीज़ है के बीजेपी का नेटवर्क सारी पार्टियों की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली है, काम करने वाले ज्यादातर, वो आरएसएस के लोग हैं और ये लोग हमारा ख्याल है कि उस स्थिति में मुझे याद आ रहा है बहुत पहले का इतिहास जब रुस्तम सेटिन लड़ते थे सीपीआई से और उनके समानांतर कोई होता था और जो चुनाव होता था, वो बहुत ही कांटे का हुआ करता था, पिछले चालीस वर्षों से ऐसी शख्सियत कोई आई ही नहीं जहां चुनाव कांटे का हो। केवल एक ध्रुवीकरण होता था और हिन्दू वोटों का होता था, मुस्लिम ओटों में से जो लोग लड़ते रहे हैं, वे ज्यादातर माफिया किसिम के लोग हैं, लड़ते रहे हैं, उधर झुकाव नहीं हो सका है, वे जीत नहीं सके। धर्म और जाति को अबकी मुझे लगता है कि बनारस की जनता एक ठेंगा दिखाएगी और कहीं न कहीं मोदी के पक्ष में लोग जाएंगे। गंगा जिस तरह से मैली होती हुई चली जा रही है, नगर जिस तरह से जाम में फंसा हुआ है, जो नगर का विकास ठप है और यहां लोगों के मन में चाह है कि किसी तरह से के इसी बहाने नगर का विकास तो होगा।
बीबीसी- आपने बात की ध्रुवीकरण की, नरेंद्र मोदी की वजह से तो ये आशंका जताई जा रही है, ये बातें हो रही हैं कि पूरे देश में एक तरह से वोटों का ध्रुवीकरण हो रहा है और उस ध्रुवीकरण का केंद्रबिंदु मोदी, वही बनारस से लड़ रहे हैं, तो क्या इस बार आपको नहीं लगता है कि वहां भी मतों का ध्रुवीकरण होगा और बड़े पैमाने पर होगा?
काशी-देखिए, मतों का ध्रुवीकरण तो होगा, इसमें दोराय नहीं है। लेकिन अगर ध्रुवीकरण होगा तो वहां क्योंकि इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर भाजपा ने मोदी को बनारस से भेजा है लड़ने के लिए। क्योंकि पूर्वांचल की स्थिति या पश्चिमी बिहार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है, यही सोचकर तो भेजा जा रहा है और मोदी हमारा ख्याल है कि इसमें बहुत कुछ इफेक्टिव हो सकते हैं, उनके काम के हो सकते हैं, सिद्ध हो सकते हैं।
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हालांकि, इसे सुनने में जो बात है, काशीनाथ और उनकी अपनी काशी, अपनी गंगा, अपनी जनता और अपने विकास के सपने के जो हिलोरें हैं, वे पढ़ने में वैसी कहां!
इस बीच एक शख्स विशाल विक्रम सिंह ने काशीनाथ सिंह से बातचीत करके फेसबुक पर एक पोस्ट लगाई है, उनके मुताबिक काशीनाथ ने कहा, " नरेंद्र मोदी के समर्थन का सवाल ही पैदा नहीं होता। नरेंद्र मोदी घनघोर हिंदुत्ववादी और हिंसक साम्प्रदायिक राजनीति के नायक हैं। वे फासीवादी हैं और तानाशाह भी। उन्होंने गुजरात में जो किया है, भारत उसे कभी भून नहीं सकता। वे भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। मैं किसी भी स्थिति में उनके या बीजेपी के समर्थन की कल्पना भी नहीं कर सकता। मुझसे पूछा गया था कि मोदी की उम्मीदवारी पर क्या जनप्रतिक्रिया है? इस प्रश्न के जवाब में मैंने कहा कि जनता यह सोच सकती है कि मोदी भले ही राष्ट्र के लिए खतरनाक हों परन्तु बनारस के विकास के लिए ठीक हो सकते हैं। यह मेरा मत नहीं है। संभावित जन-प्रतिक्रिया हो सकती है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैंने फासीवादी नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं किया है।"
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मेरा (धीरेश का) निवेदन- काशीनाथ सिंह, आपने अब मोदी को लेकर जो विचार जताए हैं, बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उसकी लेशमात्र परछाई तक नहीं पड़ने दी है। आपने जिस भाव-विह्वलता के साथ जो कुछ बोला है, वह बनारस की आपकी जनता और आपके अपने दिल-दिमाग का अच्छा सा ऐसा सम्मिश्रण है, जहां दोनों को अलग-अलग करना मुमकिन नहीं रह जाता। लेकिन, कोई संदेह की गुंजाइश न रह जाए, इसलिए आप ऐसे स्पष्ट वाक्य भी बोलते हैं, जिनमें तकनीकी रूप से सिर्फ और सिर्फ आपकी ही बात होती है, जनता वहां होती ही नहीं। और जहां आप जन-प्रतिक्रिया मात्र की बात कह रहे हैं, वहां आप एक भी शब्द ऐसा नहीं लगाते कि लगे कि जनता की ऐसी सोच पर आप दुखी हैं या आपको अफसोस है। आप कहीं कोई दुर्भाग्य से या साम्प्रदायिक चालों से जनता ऐसा सोचने लगी है, जैसी कोई बात नहीं करते। और जनता तो वह आपके लिए सिर्फ हिंन्दू संघ समर्थक जनता है। आप बनारस के मुसलमानों और कम ही सही दूसरी पार्टियों के मतदाताओं और बिल्कुल कम ही सही सेक्युलर लोगों को भी बनारस की अपनी मोदी समर्थक जनता में ही शामिल करके बोलते चले जाते हैं। और अंततः आप कह देते हैं कि पहले ध्रुवीरण होता था मगर इस बार धर्म और जाति को ठेंगा दिखाकर बनारस की जनता मोदी के पक्ष में जाएगी। यह महान वाक्य आपकी राय में क्या है?
और जहां तक मुस्लिम माफिया उम्मीदवारों का जिक्र आपने किया तो ज्यादा बहस किए बिना मेरा अनुरोध है कि यदि मुख्तार अंसारी के बजाय वहां से शबनम हाशमी या शबाना आजमी या कोई `भला-शरीफ` मुसलमान उम्मीदवार होता तो उसकी तरफ `आपका और जनता का` झुकाव होता और वे जीत जाते। और क्या कत्लोगारत करने और संविधान की धज्जियां उड़ाकर देश के लिए खतरा बने बीजेपी के लोग आपके तईं शरीफ-भले लोग होते हैं। मोदी किस श्रेणी में हैं, क्या उनका समर्थन उनकी शराफत और विकास के सपने की वजह से है या मुसलमानों को ठिकाने लगाने के उनके कारनामों की वजह से? आपने मोदी के जो गुण अब बताए हैं, बीबीसी से बातचीत में उनका जरा भी जिक्र करना आप भूल गए हैं। लेकिन, आपने अब उन्हेें फासीवादी, तानाशाह वगैरा जो कहा है, उसका मैं फिर भी स्वागत करता हूं और उम्मीद करता हूं कि आप लीपापोती के बजाय कहेंगे कि बीबीसी पर मैंने जो बोला, वह निंदनीय था, मैं गलती मानता हूं। आखिर मैं भी इसी जहरीली होती जा रही आबोहवा में सांस लेने वाला प्राणी हूं।
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So called leftist writer Kashinath Singh, who belongs to dominant upper caste, from Banaras speaking in favor of...
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