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Monday, August 18, 2008

कब तक हिफाजत का वचन लेगी बहन

मेरी एक दोस्त का फ़ोन आया. एक संगठन में काम कर चुकी है और फिलहाल भी घर से दूर रहकर काम कर रही है. उसकी दिक्कत यह है कि उसकी सरकारी नौकरी लग गयी है और उसके परिवार ने भागदौड़ कर होम डिस्ट्रिक्ट में पोस्टिंग का जुगाड़ कर लिया है. मेरी दोस्त जानती है कि होम पोस्टिंग का मतलब है, पूरी तरह परिवार के ढांचे में जकड जाना. उसका भाई उसे प्यार करता है पर इस मामले में वो बाप के साथ है. मेरी दोस्त का फ़ोन राखी के त्यौहार वाले दिन आया था.
इसी दिन पता चला कि संतलेश को उसको देवर ने बेच दिया है. संतलेश के पति का कत्ल हो गया था और इस इल्जाम में उसे ही फंसा दिया गया था. उसके भाई हैं पर वे मुकदमे में पैसा खर्च नहीं करना चाहते. आख़िर संतलेश को उसके देवर ने इस शर्त के साथ छुडा दिया कि वो धरती में हिस्सा नहीं मांगेगी और एक आदमी के साथ रहने लगेगी. संतलेश के भाई का कहना है कि बहन ने उसकी नाक कटवा दी है और वह उसके लिए मर गयी है.
मेरी एक मौसी है. मौके-बेमौके उसे भाई के घर से कपड़े-लत्ते और दूसरे उपहार मिलते रहे हैं. अब यह सिलसिला बंद हो गया है. उसे खतरनाक विशेषणों से नवाजा जा रहा है. उसका कसूर सिर्फ़ यह है कि उसने पिता की संपत्ति से अपने हिस्सा मांगने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है.
मेरे पिता आदर्शवादी हैं. घोर संकटों में भी पैसे का मोह नहीं किया. बेटियों को पढाया-लिखाया. वकील भी हैं पर पिता की संपत्ति में बेटी के हिस्से की बात उन्हें नागवार गुजरती है.
अधिकतर ऐसा ही है. भाई अपनी बहनों पर कुर्बान रहते हैं. उनकी शादी में खूब धूम करने को तत्पर. शादी के बाद उपहार देने या गले मिलकर रोने को भी. संपत्ति में हिस्से की बात चले तो बहन के कत्ल को तैयार. बहन प्यार कर ले या अपनी मर्जी से शादी करे तो भी उसकी खैर नहीं. हमारे महापुरुषों का भी इन मसलों पर यही रुख रहा है, भारतेंदु जैसे लेखकों का भी.
असल में ये हमारी महान परम्परा है. राखी के त्यौहार की यह भी अजीब बात है कि बहन राखी बांधे और हिफाजत का वचन ले. ऐसा क्यों नही कि बहन अपनी हिफाजत लायक ख़ुद बने. खुदमुख्तार हो, अपने फैसले ख़ुद ले. लेकिन यह हमारी परम्परा के खिलाफ है.
यहां तो राखी का त्योहार भी रस्म है और फिर `ऑनर` के नाम पर उन्हीं बहनों का कत्ल भी।