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Wednesday, September 30, 2026

दिनमान ने क्या नहीं छापा था जेएनयू की दलितों-पिछड़ों की हत्यारी प्रवेश-नीति पर असरार खाँ का लेख

Asrar Khan


(असरार खान से परिचय फेसबुक के ज़रिये था और उनकी मौत की ख़बर भी आज सुबह फेसबुक से ही मिली। उनकी वॉल पर लाइक-कमेंट के लिहाज़ से रिश्ता नहीं के बराबर था लेकिन उनकी पोस्ट देखता था। वे हमेशा ज़ेहन में भी रहते थे। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से निकले पत्रकार और आख़िरश सुल्तानपुर जिले के किसान असरार खान सेकुलर इंसान थे। धार्मिक रूढ़ियों से टकराते रहने वाले और इस्लाम को लेकर भी कड़े आलोचनात्मक रुख वाले लेकिन ऐसे नहीं कि इस्लामोफ़ोबिक तत्वों को रास आएं। मुसलमानों से नफ़रत को आधार बनाकर देश में परवान चढ़ी हिन्दुत्ववादी सियासत के मुखर आलोचक और जन-संघर्षों के पैरोकार। कॉमरेड लेकिन ऐसे कि जेएनयू में इंदिरा गाँधी के ज़माने में विपिन चंद्रा के ज़रिये लाई गई नयी प्रवेश नीति जो एससी-एसटी, ओबीसी तबकों का गला घोंटती थी को लेकर वामपंथियों के रुख के भी मुखर आलोचक। उस समय यह मसला उन्होंने ही ज़ोर-शोर से उठाया था जिसे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री चौ. ब्रह्मप्रकाश ने अपनी पत्रिका में छापा था। लेकिन, दिनमान ने उसे दबा लिया था। यह लेख इसी बारे में है जो फेसबुक पर उनकी `पत्रकार होने का धर्म` शीर्षक से आईं पोस्ट्स के हिस्से हैं।-धीरेश सैनी)


एक साल के लिए नए दाख़लों पर रोक के बाद जब 1984 में जेएनयू दुबारा खुला तो वहां दाख़लों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जातियों को मिल रही सारी रियायतों को ख़त्म करके नई प्रवेश नीति को लागू कर दिया गया जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आधुनिक इतिहास के प्रसिद्ध प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा से तैयार कराया था। शोषित पीड़ित समाज विरोधी इस कार्य के लिए इंदिरा गांधी ने विपिन चंद्रा को कांग्रेस का इतिहास लिखने के लिए 1 लाख रुपए में अनुबंधित किया था।

जब मैं जेएनयू के एडमीशन सेल में नए दाख़लों का ब्यौरा मांगने पहुंचा तो मुझे पब्लिक रिलेशन आफीसर के पास भेज दिया गया। पीआरओ साहब कश्मीर से ताल्लुक़ रखते थे। वे बड़े ही सज्जन व्यक्ति प्रतीत हो रहे थे लेकिन मुझे कोई आंकड़ा नहीं देना चाहते थे। मैंने कहा, सर आप अगर आंकड़ा नहीं देंगे तो कहीं न कहीं से मुझे आंकड़ा तो मिल ही जाएगा और तब आपकी पोजीशन ख़राब होगी। उन्होंने कहा एक दिन का समय दीजिए।

दूसरे दिन `मिड डे` की एक ख]बर लिखकर दोपहर को जेएनयू पहुंच गया। पीआरओ साहब ने अपनी एक सहायिका को बुलाया और कहा कि आप एडमीशन का सारा आंकड़ा इन्हें दे दीजिए। मिस्टर खान एक पत्रकार हैं लेकिन जेएनयू के पूर्व छात्र हैं जो उचित समझेंगे लिखेंगे।


मैडम ने मुझे 1 घन्टे के भीतर सारे आंकड़े दे दिए जिसे देखकर मैं बेचैन हो उठा।

मुझे लगा कि इतना बड़ा इंजस्टिस कैसे हो सकता है। कई-कई सेंटरों में एक भी दलित और आदिवासी को दाख़ला नहीं मिल पाया था और यही सुलूक पिछड़ी जाति के छात्रों के साथ भी हुआ था। ग्रामीण पृष्ठिभूमि के छात्र भी एडमीशन पाने से वंचित रह गए थे। यह सब जानने के बाद मैं वहां से गुस्से में कांपता हुआ निकला और निश्चय किया कि कल ही इस घोर अन्याय के ख़िलाफ़ विस्तारपूर्वक लिखूंगा।



जेएनयू के नए दाख़लों पर लेख लिखने में मुझे एक हफ़्ता लग गया। उसको लिखने में मित्र शम्भूनाथ सिंह से भी भाषा- शैली संबंधी मदद ली जो उन दिनों माकपा के मुखपत्र लोकलहर को एडिट करने का काम करते थे। खै़र एक छोटी ख़बर बनाकर मैंने `मिड डे` को दे दी, वह उसी दिन छप गई। इसके बाद नई प्रवेश नीति के जरिए अनुसूचित जाति- जनजाति पिछड़ों और ग्रामीणों के साथ हुई नाइंसाफ़ी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई।

जब मैं लेख लिखकर चौधरी ब्रह्मप्रकाश जी के पास वंदना हाउस पहुंचा तो उन्होंने कहा एक दो पैराग्राफ मैं पढ़ लूं फिर आपको हिंदी वाली मैगज़ीन के सम्पादक से मिलाता हूँ लेकिन चौधरी जी लेख को पूरा ही पढ़ गए जो मेरे हाथ से 10 पेज में लिखा हुआ था।

उन्होंने लेख को पढ़ने के बाद हिंदी के सम्पादक को अपने चैंबर में बुलाया।

नाटे से कद के धोती कुर्ता पहने हुए बुढ़ापे और अधेड़ आयु के बीच वाली उम्र में भी वे अपने हाव-भाव से एकदम जवान दिख रहे थे। बड़ी ही कड़क आवाज़ थी। चौधरी जी ने उनसे मेरा परिचय कराते हुए बताया कि जेएनयू को तो इंदिरा गांधी ने खुद ही ख़त्म कर दिया। देखिए असरार जी की  रिपोर्ट आप पढ़िए और इसे अगले अंक में मुख्य लेख बनाकर छापिए।

उन्होंने बताया ये नंद किशोर जी हैं पुराने समाजवादी फिर दाख़लों पर आते हुए बोले देखिए इसमें एससी\एसटी और पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों की बुरी तरह छंटनी की गई है। इस मामले को लेकर तो लड़ना होगा। बहुत ग़लत काम हुआ है। इंदिरा गांधी ने यह सब क्यों किया मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।

चाय आ गई तो चाय पीते हुए चौधरी जी ने नंद किशोर जी के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने बताया कि नंद किशोर जी 1957 में राय बरेली लोकसभा क्षेत्र से फ़िरोज़ गांधी के ख़िलाफ़ प्रजा सोसलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े थे। हार तो गए थे लेकिन बहुत वोट पाए थे।

इसके बाद नंद किशोर जी मुझे अपने कमरे में लेकर ले कर चले गए।


नंद किशोर जी ने मुझसे मेरे बारे में खू़ब जानकारी लिया और कहने लगे आप इस मैगज़ीन से जुड़ जाइए लेकिन लिखने का कोई पैसा नहीं मिल पाएगा क्योंकि यह मैगज़ीन चंदे से चल रही है। इसमें कोई विज्ञापन वगैरह नहीं छापा जाता।

मैंने बताया कि मुझे पैसों की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरे लिए यह मैगज़ीन बहुत मत्वपूर्ण है। मैं हर अंक में एक लेख  लिखा करूंगा। उन्होंने मुझसे कहा कि आप इसे अंग्रेजी में भी लिख डालिए। मैंने कहा ठीक है। उन्होंने चिश्ती साहब के कमरे में जाकर अंग्रेजी वाले अंक में भी इस लेख को प्रकाशित करने के बारे में बोल दिया। चिश्ती साहब ने लेख को ले लिया और पढ़ने लगे। नंद किशोर जी फिर अपने छोटे से कमरे में आकर बैठ गए तभी चौधरी जी उनके कमरे में आ गए और बोले, आप इस लेख को सभी पत्र पत्रिकाओं में छपने के लिए दीजिए इसे तो बड़ा मुद्दा बनाना पड़ेगा। मैं इंदिरा जी को ख़त भी लिखूंगा और चंद्रजीत यादव, केएन सिंह और चौधरी चरण सिंह से भी मिलकर इस पर बात करूंगा।

तभी मेरे मुँह से निकला सर चंद्रजीत यादव और चौधरी चरण सिंह के पास तो हम और विद्रोही जी उसी समय गए थे जब इंदिरा गाँधी ने पुरानी प्रवेश नीति को ख़त्म करने के लिए नई प्रवेश नीति को बनाने के लिए प्रोफे़सर विपिन चंद्रा कमेटी का गठन किया था।

`उन लोगों ने क्या कहा था और आप लोग हमारे पास क्यों नहीं आए`, चौधरी जी ने पूछा।

मैंने बताया कि चौधरी चरण सिंह मिले और पूरी बात भी सुने लेकिन इसमें कोई मदद करने से इनकार कर दिए। उनके बाद हम दोनों हुमायूं रोड स्थित पूर्व केंद्रीय ऊर्जा एवं स्पात मंत्री चंद्रजीत यादव जी के घर गए। उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद कहा कि मुझे भी ऐसा लग रहा है कि इंदिरा जी जेएनयू की वर्तमान प्रवेश नीति को बदलने का मन बना चुकी हैं। वे प्रधानमंत्री भी हैं और यूनिवर्सिटी की चांसलर भी हैं। मुझे लगता है कि वे 1980 में कैम्पस के अंदर हुए अपने अपमान को भूल नहीं पा रही हैं। आप लोगों ने उन्हें कैम्पस में घुसने नहीं दिया था। असली वजह यही है।

चंद्रजीत यादव ने कहा मैं खु़द लड़ तो नहीं सकता लेकिन आप को अपने घर से काम करने के लिए कुछ जगह दे सकता हूँ। ऐसा कीजिए कि एक संगठन बना लीजिए जिसमें एससी\एसटी, बैकवर्ड कास्ट और अल्पसंख्यकों को शामिल कीजिए। उस पर आप मेरी कोठी का पता दे दीजिए।

उन्होंने मुझसे पूछा था कि एसएफआई का स्टैंड क्या है ?


मैंने बताया कि ऐसा लगता है कि एसएफआई इस मसले को निर्णायक लड़ाई नहीं बनाना चाहता। इसीलिए सीताराम यचूरी ने पुरानी प्रवेश नीति में कुछ मॉडिफिकेशन को स्वीकार कर लिया है।

मैंने बताया कि प्रवेश नीति को लेकर स्टूडेंट्स यूनियन ने एक आमसभा बुलाकर उसमें थोड़े बहुत सुधार की अनुमति दे दी है लेकिन मौलिक बदलाव के खिलाफ एसएफआई समेत सभी छात्र संगठन हैं। फ्रीथिंकर्स वाले खुलकर अपने स्टैंड को क्लियर नहीं कर रहे हैं। मूलतः वे एलीट कल्चर की सोच वाले हैं इसलिए उनके बारे में बात करने का कोई फ़ायदा नहीं।


ब्रह्म प्रकाश जी इतना लंबी बात खड़े खड़े सुनते रहे।


मेरी बात ख़त्म हुई तो लंबी सांस लेते हुए कहा, अच्छा! आपने तो बहुत मेहनत भी किया है।

चौधरी जी ने पूछा, आप किधर रहते हैं। मैंने बताया, मालवीय नगर में रहता हूँ। उन्होंने कहा, आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको वहां छोड़ दूँगा। आज मुझे एक शादी में मालवीय नगर जाना है।

कुछ देर बाद, ऑफिस के सभी लोग एक साथ बाहर निकले। चिश्ती साहब स्कूटर से चलते थे। नंद किशोर जी पैदल और डीटीसी की बसों में।

Ch Brahmprakash 


चौधरी साहब एक फिएट कार के पास जाकर खु़द ही उसे खोलने लगे तो मैंने सोचा कि शायद कोई ड्राइवर होगा जो उनकी गाड़ी को चलाता होगा। लेकिन, ऐसी कोई बात नहीं थी। उन्होंने मुझे बगल में बैठने के लिए इशारा किया और गाड़ी को स्टार्ट करके खु़द ही ड्राइव करते हुए चल पड़े।


मुझे यह देखकर अजीब सा लग रहा था कि दिल्ली के जाने माने लैंडलॉर्ड, पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व कृषि मंत्री -  इनके पास एक ड्राइवर भी नहीं है। आख़िर बात क्या है! मैं कुछ कुछ सहमा हुआ उनके बगल में बैठा हुआ था और दिल्ली का शेर कार चला रहा था।

10 किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद चौधरी साहब वसंत विहार की एक भव्य कोठी पर पहुंचे। गाड़ी को गैराज में लगाने के बाद मुझे साथ लेकर प्रथम तल पर पहुंचे तो वहां भी ताला खोलकर अंदर प्रवेश किए। तब मुझे लगा कि शायद अकेले ही रहते हों।

कुछ ही देर बाद एक औरत आई और बर्तन वगैरह साफ़ करके चली गई। फिर चौधरी साहब ने खु़द चाय बनाई और चाय पीने के बाद जब चलने के लिए तय्यार हुए तब तक एक हिमाचली लड़का अंदर आया और गाड़ी की चाभी मांगकर ले गया।

वह लड़का मुझे ड्राइवर जैसा लगा। मेरा अनुमान सही था।


29 नम्बर की फिएट में वे खुद आगे ही बैठे। मुझे पीछे बैठा दिया। शादी में पहुंचे तो देखा कि बहुत सारे लोग चौधरी जी के स्वागत में दौड़ पड़े। वे वीवीआईपी की तरह गाड़ी से उतरे और जिसकी बेटी की शादी थी उनसे मुझे भी मिलवाया। वे चौधरी साहब के पूर्व सरकारी अतिरिक्त निजी सचिव थे। मुझसे कहा कि आप खाना खाकर जाइएगा।


`बुनियादी संघर्ष` के हिंदी-अंग्रेजी दोनों अंकों में एक साथ जेएनयू की नई प्रवेश नीति के तहद हुए दाख़लों में जिस तरह से ग्रामीण इलाकों और दलित एवं पिछड़ों को अर्स से फ़र्श पर बैठा दिया गया था वह एक दम से साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा था।


उस छपे हुए लेख को पढ़कर खुद मुझे भरोसा होने लगा कि जेएनयू अब आम आदमी के लिए नहीं रह गया बल्कि पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले आभिजात्य वर्ग के लोगों तक सीमित कर दिया गया है। मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथी  संगठनों पर आता था जो लोग भूगोल के विख्यात प्रोफ़ेसर मुनीस रज़ा, इतिहास के प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा, हिंदी के विश्वविख्यात प्रोफ़ेसर नामवर सिंह, राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर सीपी भांवरी, इतिहास के प्रोफेसर हरबंश मुखिया, इतिहास की विश्वविख्यात प्रोफेसर रोमिला थापर जैसे इस कैम्पस के शिक्षकों का गुणगान करते थे।


वामपंथी प्रगतिशील और सामाजिक न्याय के ये शिक्षक योद्धा चूहों की तरह किन बिलों में घुस गए थे, पता ही नहीं चला और अरावली की पथरीली पहाड़ियां एक झटके में ही शर्मिंदा होकर इस कदर ज़मीदोज़ हो गईं जितना हज़ारों साल में नहीं धंसी रही होंगी। कभी वहां से हिमालय दिखता था लेकिन 84 में वहां से दिल्ली का धौलाकुआं भी नहीं देखा जा सकता था।


प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा ने प्रवेशनीति में किए गए बदलाव के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया था कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने स्टूडेंट्स की अंग्रेजी अच्छी नहीं होती इसलिए जेएनयू अपने लक्ष्य को हासिल करने में बाधा महसूस कर रहा है।

उनके इस कुतर्क को ख़ारिज करने के लिए जब मैं बेचैन होकर घूम रहा था तभी मुझे पीएचडी का एक छात्र मिला उसे मेरे लिखने के बारे में जानकारी थी, बहुत खु़श था डूइंग वेल असरार, कहते हुए गंगा हॉस्टल के बस स्टैंड पर बैठकर कहने लगा कि तुम ज़ाकिर हुसैन सेंटर के मिस्टर पटनायक को जानते हो। हाँ जानता हूँ। बहरहाल, जब मैं पटनायक से मिला तो उन्होंने मुझे चौंकाने वाला आंकड़ा दिखाया। उन्होंने पब्लिक एंड नान पब्लिक स्कूलिंग बैकग्राउंड के स्टूडेंट्स पर यह अध्ययन किया था कि रूरल अर्बन डायकोटोमी की वर्तमान स्थिति में किन स्टूडेंट्स ने बेहतर  परिणाम दिया है और नेहरू जी इस तरह की यूनिवर्सिटी को क्यों खोलने का सपना देख रहे थे जिसे उनकी पुत्री ने प्रधानमंत्री बनने के बाद खोला।


पटनायक ने अपने मास्टर आफ फिलॉसफी (M Phil) के डिजरटेसन में इस धारणा को ख़ारिज कर दिया था कि पब्लिक स्कूलों से आकर पढ़ने वाले, ग्रामीण इलाकों से आने वाले स्टूडेंट्स से बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

उन्होंने भारत के विकास संबंधी रिसर्च के साथ साथ आइएएस (IAS जैसी कथित प्रतिष्ठित नौकरशाही की सबसे बड़ी नौकरियों में क़ामयाबी की जो तुलना किया था उसमें ग्रामीण स्टूडेंट्स, शहरी पब्लिक स्कूल के शहरी स्टूडेंट्स से कोसों आगे थे।


यह लेख छप गया तो एक दिन शाम को जब मैं वंदना भवन की आठवीं मंज़िल तक सीढ़ियों से ही चढ़ता जा रहा था तो उधर से एक बहुत खू़बसूरत युवा लीडर अपने ढेर सारे समर्थकों के साथ सीढ़ियों से नीचे आ रहे थे। मैंने उनको देखा तो देखता ही रह गया। कुछ ही माह पहले राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन दोनों की जोड़ी बहुत मशहूर हो गई थी। देखने में दोनों सगे भाई जैसे लगते थे उतना ही आकर्षक शारीरिक बनावट ऊपर से मुस्कुराता हुवा विनम्र चेहरा... योग्यता भी उसी अनुपात में हो तो सहज ही कोई भी कह सकता था ऐसे व्यक्तित्व दीन दुखियों के ही नहीं अमीरों के भी रहनुमा बन जाएं तो हर कोई सहर्ष स्वीकार कर लेगा।

ललित माकन ट्रेड यूनियन के उभरते नेता थे जो उन  वामपंथी और सोसलिस्ट ट्रेड यूनियनों के लिए नई चुनौती बनते जा रहे थे जिन्होंने कामरेड बीटीआर और जार्ज जैसे शीर्ष ट्रेड यूनियन लीडरों को दिया था। दुर्भाग्य से ललित माकन की उनके घर पर सुबह सुबह हत्या हो गई जिससे दिल्ली दहल गई थी। उन्हीं की बहन अंजली दूरदर्शन पर ख़बरें पड़ती थीं और बहुत लोकप्रिय थीं। उनके भतीजे अजय माकन दिल्ली छात्र संघ का अध्यक्ष पद का चुनाव जीते और बाद में केंद्रीय मंत्री भी बने।


`बुनियादी संघर्ष` के ऑफिस में पहुंचा तो वहां केवल चिश्ती साहब ही मिले। उन्होंने कहा, आप मेरे साथ चलिएगा मैं ग्रीनपार्क में रहता हूँ। आपको मालवीय नगर छोड़ दूंगा।

उन्होंने बताया कि जेएनयू वाले लेख को देश की अनेकों क्षेत्रीय भाषाओं में छपने के लिए भेजा जा रहा है। पंजाबी के एक अख़बार में तो जालंधर से आज छप भी गया है। उसकी कॉपी आएगी तो आपको दूंगा, देखिएगा।


चिश्ती साहब स्कूटर पर बैठाकर मुझे हौजख़ास के कोने पर इसेक्स फार्म की दुकान के अंदर ले गए और वहां चिकन ख़रीदे, कुछ प्रॉसेस्ड क़बाब भी। कहने लगे, जनाब, आज मेरे घर चलिए और खाना खा कर जाइएगा। मैं उनके साथ जब उनके निवास पर पहुंचा जो एक शानदार कोठी थी जिसके आधे भाग में वे परिवार सहित रहते थे, बाकी आधे में नर्सेज की यूनिनन का कार्यालय था जिसमें रहने के लिए भी कुछ कमरे थे।


चिश्ती साहब के साथ उनके बड़े से ड्राइंग रूम में बैठकर बातें शुरू हो गईं। नर्सों की समस्याओं के बारे में 1 घन्टे तक बातें होती रहीं। तब तक खाना भी तैयार हो गया। उनकी पत्नी आईं और उन्होंने हम लोगों से डायनिंग टेबल पर आने के लिए कहा। चिश्ती साहब ने बताया कि ये मेरी पत्नी हैं सुमित्रा जी। वे मुस्कुराईं और मुझसे मेरा परिचय पूछने लगीं ।बड़ी ढीट थीं। मैं तो उनकी प्रतिभा से बिल्कुल अनभिज्ञ था। चिश्ती साहब ने यह भी नहीं बताया कि उनकी वाइफ साउथ इंडियन हिन्दू हैं और जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफ़ेसर और सेंटर फॉर डिसआर्मामेंट की चेयरमैन हैं। यह सब मुझे तब पता चला जब वे बड़ी बेबाकी से मेरा परिचय पूछ रही थीं तो मैंने भी उचित समझा कि खुद ही पूछ लूं मैडम क्या करती हैं।


जेएनयू की बात उठी मैंने खू़ब आलोचना की। वे मेरी बात को बड़ी गंभीता से सुनती रहीं। धीरे-धीरे डिनर शुरू हो रहा था। सूप की बारी थी उसे ख़त्म किया तब तक पहली मंजि़ल से बड़ी तेज़ी से एक लड़की को उतरते देखा। उनकी चप्पलों की तेज़ आवाज़ ने एकदम ने उनकी तरफ़ देखने को विवश कर दिया।

लड़की आई और डायनिंग टेबल पर बैठ गई। चिश्ती साहब ने परिचय कराया, ये सीमा हैं, 12वीं की स्टूडेंट हैं। उनसे मिलने के बाद मैंने सोचा, हो सकता है परिवार में और भी कोई हो। लेकिन, बस यही 3 लोगों का परिवार था और सभी अपने अपने में बहुत खु़श नज़र आ रहे थे। मैंने सीमा से पूछा कि इंटर के बाद आप किस क्षेत्र में जाएंगी। उन्होंने कहा, मैं जर्नलिस्ट बनूंगी।


काफ़ी दिनों के बाद एक दिन सुबह-सुबह जैसे ही मैंने `टाइम्स ऑफ इंडिया` को पढ़ने के लिए उठाया तो पहले ही पेज पर एक लड़की की तस्वीर को देखकर सोचने लगा कि इसको तो मैंने पहले भी कहीं देखा है। कटे हुए घुंघराले बाल, चेहरा भरा हुआ और रोबीला, कहीं कोई गहना गुरिया का नामो निशान नहीं, न नाक में, न कान में, एकदम आधुनिक लड़की। कैप्शन में लिखा था सीबीएसई (CBSE) टॉपर सीमा चिश्ती। मैं ख़बर पढ़ने लगा। पहले ही पैराग्राफ में लिखा था - सीमा चिश्ती अपने पत्रकार पिता मिस्टर अनीस चिश्ती साहब को अपना आदर्श मानती हैं और आगे चलकर वे एक पत्रकार बनना चाहती हैं।.


जएएनयू वाले प्रकाशित लेख में कुछ और सुधार करते हुए मैंने उसे दिनमान में दे दिया जो उन दिनों हिंदी का नम्बर-1 साप्ताहिक हुआ करता था। रघुवीर सहाय जैसे साहित्यकार और पत्रकार इसी मैगजीन के संपादक रह चुके थे अर्थात इसकी प्रतिष्ठा में कोई कमी नहीं थी। लेख को देने से पहले मैंने इसके सम्पादक सतीश झा से बात की थी। उन्होंने कहा था, विस्तार से लिखिए इसे छपना चाहिए।


`टाइम्स ऑफ इंडिया` ग्रुप की यह मैगज़ीन दरियागंज से निकलती थी। इसका मुख्यालय `टाइम्स ऑफ इंडिया` की बहादुर शाह जफ़र रोड वाली काले शीशे की भव्य बिल्डिंग थी। हिंदी का `नवभारत टाइम्स` यहीं से निकलता था।

लेख के बारे में जानने के लिए मैंने एक दिन दिनमान के ऑफिस फोन किया। संयोग से फोन उठाने वाला मेरा यार जसविंदर सिंह था। उसने कहा, अरे असरार भाई! कहां हो आओ, तुम्हें ठर्रा पिलाऊंगा। मैं दूसरे दिन दरियागंज गया तो जसविंदर ने मेरे लेख के बारे में पहले से ही इकट्ठा की गई जानकारी दी, बताया कि बस अगले किसी भी अंक में छपने वाला है, चूंकि लेख काफी बड़ा है इसलिए देरी हुई है।


दो दिन बाद दिनमान का नया अंक मिला तो उसके कवर पेज पर ही मेरे लेख के अगले अंक में छपने का विज्ञापन था। मुझे बहुत खु़शी हुई इसलिए भी क्योंकि अब यह लेख भारत के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले देशव्यापी साप्ताहिक में छपने वाला था जिसके बाद मुझे किसी को बताना नहीं पड़ता कि जेएनयू में क्या हुआ।

हिंदी के सबसे बड़े आलोचक नामवर सिंह,  प्रोफ़ेसर केदार नाथ सिंह, मैनेजर पांडेय ये सभी वामपंथी सियासत से जुड़े हुए लोग थे।


अगले अंक का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से कर रहा था लेकिन  आने वाले अंक में लेख नहीं छपा। मैंने फिर जसविंदर को फोन किया। उसने कहा, पता करता हूँ क्या बात है। कुछ देर बाद बोला, अगले कुछ हफ़तों में छप जाएगा। इसी तरह हफ़्ते गुज़रते गए लेकिन लेख नहीं छपा। एक दिन जसविंदर से बात करते करते पता चला कि लेख को प्रकाशित नहीं किया जाएगा। मैंने पूछा, क्यों भाई ऐसी क्या बात हो गई जो अनाउंस करने के बाद भी रोक लिया गया।

जसविंदर नया नया पत्रकार बन रहा था। वह भी चाहता था कि लेख छपे लेकिन उसने बताया कि लेख को उदय प्रकाश ने रोक दिया है। फि़लहाल वही इंचार्ज हैं मैं क्या करूँ यार?

Jasvinder Singh


जसविंदर बहुत लड़ाका लड़का था 1978 में मैंने जब उसे पहली बार एडुकेशन मिनिस्ट्री का घेराव करते हुए एसएफआई के प्रदर्शन में देखा था तभी से मैं उसका बहुत सम्मान करता था। तब वह दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में वामपंथी इतिहासकार प्रोफे़सर इरफ़ान हबीब के खि़लाफ़ की गई युनिवर्सिटी अथॉरिटी की तानाशाही के विरोध में प्रदर्शन का मौक़ा था। उन दिनों इरफ़ानुल्लाह छात्र संघ के अध्यक्ष थे उनके खि़लाफ़ भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी ऑथॉरिटी ने कार्रवाई कर दी थी। उनके लिए कुछ स्लोगन लगाए जा रहे थे। बाद में वही इरफ़ानुल्लाह जनता दल और सबसे आखि़र में ओखला से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार थे लेकिन वे चुनाव हार गए। केजरीवाल ने उनकी जगह पर अमानतुल्लाह खान को टिकट देने का फै़सला किया और वह 60 हजार से भी अधिक वोटों से `आप` के विधायक बने लेकिन उससे पहले वाला चुनाव अमानतुल्लाह खान, पासवान की लोजपा से लड़े थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। शिक्षा मंत्रालय पर प्रदर्शन के समय मैं जेएनयू का छात्र नहीं था लेकिन उस समय जेएनयू आया हुआ था तो प्रदर्शन में मैं भी चला गया था।


मेरे लेख के बारे नकारात्मक ख़बर देते वक़्त जसविंदर बहुत दुःखी था। मैंने कहा कि मैं सतीश जी से बात करूं तो उसने बताया कि वह तो अमेरिका गए हुए हैं, छुट्टी पर हैं, यही उदय प्रकाश इस समय मालिक है।


लेख नहीं छपा कोई बात नहीं लेकिन एकसाथ तीनों पत्रकार जेएनयू के ही छात्र रहे थे, फिर भी ऐसा क्यों हुआ? सतीश जी सिर्फ जेएनयू से ही नहीं जाने जाते थे बल्कि जनसत्ता के को-फाउंडर भी थे। मैं इस प्रकरण की गहराई में जाने लगा तो मुझे पता चला कि उदय प्रकाश ने लेख को छपने से इसलिए रोक दिया क्योंकि वे हिन्दी के जिस एलीट समाज में बैठते थे उन्हें यह जानने नहीं देना चाहते थे कि जेएनयू के दाख़लों में गाँव व क़स्बों से आने वाले सवर्ण लड़के-लड़कियों को भी कुछ अतिरिक्त पॉइंट्स मिल जाते हैं जैसे पिछड़े जिले का आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के सर्टिफ़िकेट से अर्थात सभी लोग तहसील से ऐसा आय प्रमाण पत्र बनवा लेते थे कि मेरिट - कम मीन्स एवं प्रथम ग्रेजुएट के फलस्वरूप दाख़ला भी हो जाता था और स्कालरशिप भी मिल जाती थी। बहुत से लोग इसी लिए जेएनयू में पढ़कर प्रोफ़ेसर साहित्यकार और नौकरशाह बन गए। उन दिनों 5 साल की MA जो विदेशी भाषाओं में होती था उन्हें 110 रुपये जबकि एमए 2 साल वालों को 125 रुपया मिलता था फ़ीस और हॉस्टल फ़ीस दोनों माफ़ हो जाती थी और मेस बिल 90 रुपए के अंदर ही आया करता था।


तब मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि कुछ लोग अपनी झूठी  प्रतिष्ठा के लिए कितना बड़ी बड़ी सम्भावनाओं की हत्या कर देते हैं। वर्तमान की खू़बियों के साथ साथ उसके काले धब्बे को भी सामने नहीं आने देते।


मैंने उदय प्रकाश को फोन किया और खू़ब सुनाया। मैंने कहा मेरे लेख को वापस कर दीजिए। फिर अगले दिन अपने छोटे भाई शकील और उनके एक मित्र विद्यार्थी जी को दरियागंज भेज कर लेख को वापस मंगा लिया।


जसविंदर ऐसे माहौल में टिक नहीं सकता था। उसे हिंदी, इंग्लिश, पंजाबी और स्पेनिश भाषा का बड़ा अच्छा ज्ञान था। जल्द ही उसका सेलेक्शन बीबीसी रेडियो की हिंदी सेवा में हो गया। उसकी आवाज़ हिंदी के पितामह कमेंटेटर जसदेव सिंह से मिलता थी। देखते ही देखते जसविंदर सिंह पूरे एशिया का, साथ ही अंग्रेजी सेवा का भी इंचार्ज हो गया। इस होनहार पत्रकार से मेरी अंतिम मुलाक़ात 1993 में बसपा के केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली के रकाबगंज में हुई थी। उस रोज़ सपा-बसपा की सरकार के गठन की बात चल रही थी और 425 में से दोनों पार्टियों को 175 सीटें मिली थी। बाबरी मस्जिद को ढहाने के बाद भी भाजपा को बहुमत नहीं मिला था। उसने जोड़-तोड़ करने की कोशिश भी नहीं की। रास्ता बिल्कुल साफ़ नहीं था लेकिन जनता दल के पास 25 विधायक थे और 4 सीट माकपा-भाकपा ने भी जीत ली थीं।

बसपा सुप्रीमो के केंद्रीय कार्यालय पर दर्जन भर से ज़्यादा पत्रकार इकठ्ठा थे लेकिन कांशीराम जी किसी को भी मिलने का समय नहीं दे रहे थे। हाथ मे एक छोटा टेपरिकार्डर लिए जसविंदर भी बाहर खड़े थे। हमारे बीच दुआ-सलाम हुई। मैं सीधा कोठी के अंदर घुसने लगा। स्वागत के अंदाज़ में मुझे एक लड़का अंदर ले गया और मुझे सीधा कांशीराम जी के पास बैठा दिया।


कांशीराम मुझे देखते ही मुस्कुराए और बोले देखिए क्या हो गया। मैंने कहा, सर मुबारक हो। मैंने कहा, बाहर बहुत पत्रकार खड़े हैं। उनसे बात कर लीजिए। उन्होंने कहा, नहीं मैं किसी से नहीं मिलूंगा। आप जाइए और आज मेरी तरफ़ से जो छापना चाहते हैं, छाप दीजिए। मैंने कहा, सर बाहर बीबीसी का संवाददाता भी खड़ा है। उन्होंने कहा, बुलवा लेता हूँ। जसविंदर आया तो चढ़ कर बात करने लगा। कांशीराम जी उसे भी थोड़ा बहुत व्यक्तिगत तौर पर जानते थे। कांशीराम ने कहा आप को बताने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है। मैंने तो विदेशी मीडिया के नाते इनके कहने पर आप को बुला लिया। जसविंदर ने कहा, मुझे यह बताने की इच्छा हो रही है कि असरार आपके साथ है तो इससे बड़ा असेट आप के पास और कुछ नहीं है। कांशीराम ने मुझसे कहा कि मध्यप्रदेश में भी मेरे 13 विधायक हैं। मेरा अध्यक्ष और कुछ विधायक अंदर बैठे हैं। मैं उन्हें आपसे मिलाना चाहता हूँ।

अंदर जाते-जाते मैंने कहा सर कम्युनिस्ट पार्टियां बिना मांगे ही आप की बनने वाली सरकार को समर्थन दे रही हैं, उनको धन्यवाद दे दीजिए। लेकिन, कांशीराम मेरी इस बात पर कुछ नहीं बोले।


कुछ साल बाद मेरा दोस्त जसविंदर गोवा में समुद्र के अंदर डूब कर हमेशा के लिए दुनिया को छोड़ गया। कई लोगों का कहना था कि जसविंदर ने बहुत ज़्यादा पी रखी थी। सुध-बुध खो बैठा और डूब गया।

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