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Thursday, April 18, 2019

उत्तरआधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) के बारे में नोट्स : शिवप्रसाद जोशी


हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है
 (उत्तरआधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) के बारे में नोट्स)
शिवप्रसाद जोशी

उत्तरआधुनिकता यह नहीं कहती कि तुम आधुनिकता के ऊपर से छलांग लगाकर एक नये भाषा उत्पात में अपनी सनसनी के साथ दाखिल हो जाओ. वह छलांग जैसी फ़ुर्तीली कार्रवाई है ही नहीं. वह तो बहुत धीरे धीरे आधुनिकता में आ चुकी दरारों से रिस कर अंदर आती है और आधुनिकता के वृक्ष को भीतर से सोखने की तिकड़में करती है.

उत्तरआधुनिकता उत्तर-सत्य की जननी है. वह धर्मबहुल महानता और प्रकांडता वाले प्राचीन संसार के गल्पों, नैरेटिवों, मिथकों की पुनर्रचना भी है. वह एक प्राचीनता का निर्माण करती है और उस प्राचीनता के मिथ का निर्वहन. वह धर्म को एक नितांत निजी वृत्त से खींचकर ले आने वाली रस्सी है. वह तोड़फोड़ नहीं है जैसा कि उसके बारे में बहुप्रचारित है, वह व्यवस्थाओं का विपर्यय भी नहीं है जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है. वह न बेचैनी है न उलझन न गड्डमड्ड. जैसा कि उसका ग्राफ़िक प्रेजेन्टेशन है. वह एक होशियार फ़ितरत है. मॉर्डेनिज़्म का वह विचलन है. जैसे वाम का उत्तर वाम. नया वाम नहीं. उसका उत्तर. लेकिन न दिशा न जवाब. बस पोस्ट. लेकिन आगे का भी नही, न अग्रिम, न आगामी. वह पीड़ित व्यक्ति की आह को बुझाने का उपक्रम करती प्यास है. वह प्यासों को पानी नहीं देती- उसकी अपरिहार्यता बताती रहती है, बाज़दफ़ा वो कहती है- अरे यह प्यास भ्रम है या यह असत्य है! या हो सकता है वो व्याकरण में पानी के पर्यायवाची खोजने चले जाएः जब तक मैं इसे जल न कहूं/ मुझे इसकी कल-कल सुनाई नहीं देती/ मेरी चुटिया इससे भीगती नहीं/ मेरे लोटे में भरा रहता है अंधकार. (असद ज़ैदी)

वह ख़ुद को, किसी निष्कर्ष पर न जाती हुई किसी लक्ष्य को असमर्पित, कहती है. लेकिन पोस्टमॉडर्निज़्म का लक्ष्य स्पष्ट है. वह मनुष्य की स्वाभाविकता का हरण है, एक अस्वाभाविक, सुन्न और मुग्ध मनुष्य की रचना उसका एक लक्ष्य है. नो मैन इज़ ऐन आईलैंड (कोई भी मनुष्य द्वीप नहीं है)- जॉन डोन्ने ने कहा था. नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड (कोई भी पाठ द्वीप नहीं है)- उत्तरआधुनिक कहते हैं. कोई भी पाठ अपने तई मुकम्मल या संपूर्ण नहीं है. हर पाठ अधूरा है. वो समस्त का अंश है. फिर वे ये भी कहते हैं कि हर पाठ का अपना अर्थ है. एक पाठ के कई अर्थ और आशय संभव है. सही तो कहते हैं, आप कहेंगे. इसमें कैसी परेशानी. सही तो कहते हैं लेकिन करते नहीं हैं. वे अधूरा कहते हैं. वे पाठों के सुनियोजित पुनर्पाठ के उतावले हैं. वे चुने हुए पाठ उठाते हैं. सेलेक्टड. उन्हें मनमाने ढंग से खोलते हैं और कहते हैं कि इस पाठ में यह कहां है और यह क्यों नहीं है. वे मार्क्स को उनकी जमीन से उखाड़ लेना परम समझते हैं. वे जानते हैं कि सत्य क्या है. लेकिन कुछ देर बाद वे कहेंगे कि सत्य कुछ और है. और नहीं सत्य अनेक हैं. इसे वह पाठ की गैर-रेखीयता कहते हैं. इस तरह बुनियादी सच्चाई उत्तरआधुनिक भंवरों में डूब जाती है या उलट कर कहें कि वहां सच्चाई की बुनियाद नहीं होती है. वह निर्वात में टंगा हुआ एक भ्रम है. इस तरह उत्तरआधुनिक सच्चाई के संहारक हैं और झूठ के प्रचारक- घोषित अघोषित. नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड उनकी ढाल है. फ़्रेडरिक जेमसन ने कहाः उत्तरआधुनिकता, हालिया (द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर) पूंजीवाद की सांस्कृतिक दलील है. ज़ियाउद्दीन सरदार ने कहाः उत्तरआधुनिकता पश्चिमी संस्कृति का नया साम्राज्यवाद है. उत्तरआधुनिक कंधे उचकाएंगें: ये महज़ उद्धरण हैं. वे ऐसा क्यों करेंगें. क्योंकि उत्तरआधुनिकता उद्धरणों से बचती फिरती चलती है. उद्धरण उसकी शिनाख़्त करते हैं. वह सिर्फ़ अपना उद्धरण धारण करती है. उसे लगता है उसका अपना कोट पर्याप्त है.

उदीयमान दक्षिणपंथी कहते हैं यह मार्क्सवाद की बला है. पहले वे पूछते थेः यह मार्क्सवाद क्या बला है. कुछ अन्य निरपेक्षतावादियों का मत है कि उत्तरआधुनिकता नहीं रही- वो विलुप्त हो चुकी है. इसके उलट जब जब आधुनिकता अपने को बेहतर कर रही होती है तब तब वह दोगुने वेग से उस पर प्रहार करने आ जाती है. वह यही हैं. अपनी कृत्रिमता में. लेकिन अपने मक़सद में फलतीफूलती. उत्तरआधुनिकता एक समकालीन ऐंठन है. कोई इस तक नहीं पहुंचता, यह अपने शिकार चिह्नित करती है और फिर उनका वरण और फिर उन्हें लपेट देती है. उत्तरआधुनिक व्यक्तित्व एक सर्पीला और कई घुमावों और खांचों वाली कील की तरह होता है. वहीं पूरा होता जाता घुमाव. अगर कवि है तो उसके किरदार में, अगर लेखक है तो उसके विचार में, नेता है तो उसकी ज़बान में यह कील होगी. लेकिन वह दुख नहीं होगाः वह क्य़ा है जो इस जूते में गड़ता है/ यह कील कहां से रोज़ निकल आती है/ इस दु:ख को क्यों रोज़ समझना पड़ता है?” (रघुबीर सहाय). उत्तरआधुनिकता के पास आत्मा से टकराते ऐसे प्रश्न नहीं हैं. वह दुःख नहीं जानती. दुःख का उत्सव जानती है. निराशा को वह आत्मरुदन में बदल देती है और पता भी नहीं चलता. करुणा की उसे परवाह नहीं. प्रेम के लिए उसके जखीरे में एक से एक वार हैं. उत्तरआधुनिकता बस प्रतीकों में अपना सफ़र तय करती है. या उन्माद में. राष्ट्रीय झंडे में फड़फड़ाहट या फिसलन की तरह चिपकी है. अस्थियों, विसर्जनों और श्रद्धांजलियों में गोंद की तरह या लोटों में गेंद की तरह. यह चित्र भी है और भाव भी और संदेश भी. प्रणब मुखर्जी भूतपूर्व राष्ट्रपति हैं. उससे पहले एक संदेश हैं. वह एक सिंबल भी हैं. उनके पास जो संदेश है वही मीडियम यानी माध्यम है. मीडियम इज़ द मैसेज वाले मैकलुहानी दिन गए, अब संदेश ही माध्यम बना दिया जाता है. नाना स्वरूपों में विचरण करती हुई उत्तरआधुनिकता राम को खंजर बना देती है हनुमान को प्रचंड. वॉट्सऐप से भीड़ के बीचोंबीच वही है जो बम की तरह फटती है. उत्तर आधुनिकता एक भीड़ है जो आधुनिक जीवन पर हिंसक उतावली है. भीमा कोरेगांव के यथार्थ में अरबन नक्सली का नैरेटिव उसी का सजाया हुआ है. स्पर्शों को घात में बदल देती है. उसे आज़माया ही जाता है इसलिए कि नागरिक लड़ाइयां देश तोड़ने का षडयंत्र पेश हो सकें. देश का और उसके वजूद का  इतना काल्पनिकीकरण और वॉट्सऐपीकरण वो कर देती है. उसी की कृपा है कि देशभक्ति भाव नहीं चाशनी है. हमारे चेहरे टपके हुए और लिथड़े हुए हैं. अस्मिताएं डरी हुई हैं. भय अब प्रछन्न नहीं है, वह नागरिक होने का एक लक्षण है. सत्ता के उपकरणों से उत्तरआधुनिकता एक नया क़िला बनाने की ओर उन्मुख  है जिसे वो आगे चलकर राष्ट्र कहेगी.

उत्तरआधुनिकता एक महा-स्वप्न से उभरी क्रिटिकल धाराओं से पीछा छुड़ाने चली थी. उसे बहुत काम करने थे. भाषा और कला को पांडित्य से छुटकारा और दबेछिपे सांप्रदायिक मंतव्यों को फ़ाश करना था. उसे और इतालो काल्विनो बनाने थे और यथार्थ और स्मृति के नायाब शहरों में लेखक की तरह भटकना था. मिशेल फ़ूको को उसने क्या से क्या बना दियाः एक घाघ  नॉर्मेटिविस्ट (युर्गेन हाबरमास ने कहा). वह ऐन इस दुष्कर हिंदी पट्टी से एदुआर्दो गालियानो और टैरी एगल्टन की तलाश करती, उन्हें पहचानती. वोअपार ख़ुशी का घराना” (मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस) क्यों नहीं बना पाई जो इतने सारे नैरेशन में गुंथा हुआ है और जिन थरथराहटों से भरा हुआ है, वो उत्तरआधुनिकों को समझ क्यों न आईं? बाढ़ एक कुदरती फ़िनोमेना है, कुदरती आफ़त नहीं.’ लेकिन उत्तरआधुनिकता एक ग़ैर कुदरती आफ़त है, क्योंकि वह एक ग़ैर कुदरती फ़िनोमेना है. वह चालाकी से देरिदां के विखंडन में जा मिली, वहां उसका देर टिकना नामुमकिन था, उत्तर संरचना में दाख़िल हुई. वह उत्तरऔपनिवेशिक होकर प्रतिरोध, दमन, हाशिया, एलजीबीटी पर मुखर हुई, वह दलितों और उत्पीड़ितों के लिए आई थी लेकिन वह उत्तर इतिहास बनाने लगी और उत्तर सत्य गढ़ने लगी. उत्तरआधुनिकता ख़ुद को सबऑल्टर्न साबित करने कहां नहीं उतरी. लेकिन गायत्री स्पीवाक ने सही कहा कि अपने लिए जगह हासिल करने यानी सांस्कृतिक वर्चस्व में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेने वाली जद्दोजहद, सबऑल्टर्न होना नहीं है. उत्तरआधुनिकता का लंबी लड़ाई से वास्ता नहीं. उसमें उपलब्ध जीवन को ठुकराने’ (मंगलेश डबराल) की ताब नहीं है. और न ही उस दृश्य को बचाने का साहस जो चारों तरफ़ अदृश्य हुआ जाता है. आगे और आगे जाने की, ऊंचा और ऊंचा होने की, नया और नया होने की उसकी लालसा एक विकरालता में तब्दील हो गई. वह बाड़ों को गिराना चाहती थी- ठीक था, नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड- उसका कहना बनता था, वह भाषा की देहरियां ड़ना चाहती थी- ठीक था, वह ज़िद और साहस के नये प्रतिमान गढ़ना चाहती थी- ठीक था, वह मुख्यधारा नहीं मानती थी- ठीक था, वह नये मनुष्य के निर्माण को प्रतिबद्ध बताई जाती थी- ठीक था. लेकिन यह क्या. उत्तर आधुनिकता, तुम जो निशान मिटाती जाती हो, जो हुंकार और अहंकार तुमसे उठता है, जो धूल तुम उड़ाती हो- यह तो किसी बर्बरता के प्रवेश के संकेत हैं- तुम आततायी की आंधी क्यों बनी. 

दुनिया के वैचारिक, साहित्यिक, कला आंदोलनों में उत्तरआधुनिकता को एक अवस्था या एक चरण या एक दर्शन के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिशें भी जारी हैं. और ये काम आज से नहीं, 20वीं सदी के चौथे दशक से चला आ रहा है. जब दूसरा विश्व युद्ध ढलान पर था, बंटवारे हो चुके थे, हिंसाओ ने नरसंहार कर दिए थे, चार्ली चैप्लिन और सार्त्र पिकासो आदि से लेकर अपने यहां फैज और मुक्तिबोध तक आधुनिक मनुष्य की चीखें और संताप, आगामी लड़ाइयों की रूपरेखा बना रहे थे, आगे चलकर और अंदर दाखिल होकर भाषाओं में जाएं और अपनी हिंदी में जाएं तो लेखक कवि कहानीकार अपनी रचनाओं में एक उद्विग्न और जूझते मनुष्य के संकटों की शिनाख्त कर रहे थे, हां बेशक यही वह दौर भी था जब उत्तरआधुनिक अपनी छटाओं और प्रशस्ति बेलाओं के साथ आसपास मुखर थे. वे हरगिज़ नहीं चाहते थे कि भाषा और विचार की आधुनिकता अपना स्पेस बनाए. लेकिन ऐसा कहां होता है. ऐसा भी कहां होता है कि सच्चाई को लड़ना ही न पड़े. उत्तरआधुनिकता दरअसल एक थोपी हुई वैचारिकता है, वह चीज़ों का नुकसान करने आई है. हम अपने स्वप्न बना रहे होते हैं और वो इस स्वप्न को एक चटपटा विलास या एक आतुर याचना बना देती है. हिंदी जैसी भाषाओं में यह संकट आया है. गद्य और कविता में यह संकट दिखता है. प्रयोगों पर उत्तरआधुनिकता का कब्ज़ा तो खासा चिंताजनक है. और यह उतरकर सामाजिक व्यवहारों में भी दाखिल हो रहा है- भयावह है. आधुनिक मनुष्य की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि अभी 21वीं सदी में भी उसकी लड़ाइयां जबकि जारी हैं और कठिन हैं, उसे उत्तरआधुनिक का लबादा पहनाकर शिथिल किया जा रहा है. इस विंडबना को तोड़ना भी उसका मौजूदा कार्यभार होना चाहिए. 

एक सच्चे, सजग और साहसी नागरिक के लिए तीन लड़ाइयां हैं. ख़ुद से लड़ना और दुष्टताओं से लड़ना है. आधुनिक मनुष्य को उत्तरआधुनिकता के कभी नाज़ुक कभी सख़्त आघातों से भी बचना है. उत्तरआधुनिकता नहीं जानती लेकिन इस तरह एक तत्पर और मुस्तैद नागरिक के निर्माण के काम आती है जैसे तानाशाह के भेस में हमारा चार्ली अपना विख्यात भाषण देने जाता है और उम्मीद पर उदास होता हुआ विकल मनुष्यता में पुकारता हैः बर्बरों की नहीं हमारी है यह दुनिया. अपनी विख्यात आत्मकथा में चैप्लिन ने कहाः ग़ैर-नात्सी होने के लिए यहूदी होना ज़रूरी नहीं है. एक नॉर्मल, डीसन्ट मनुष्य होना काफ़ी है. उन शब्दों को थोड़ा बदलकर कह सकते हैं: प्रतिबद्ध होने के लिए उत्तरआधुनिक होना ज़रूरी नहीं है. इस फ़िल्म से ठीक पहले साहित्य में उत्तरआधुनिकता को प्रस्थापित किया जा रहा था. कला और संगीत में वो पहले आ चुकी थी. उत्तरआधुनिकता झपटने आई थी. लेकिन....वे ऐतिहासिक पुकारें थीं, कठिन और जानलेवा समयों की. दक्षिण एशिया का भूगोल देखिएः मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहीं / सँवारती हुई मुझे / उठी सहास प्रेरणा. (मुक्तिबोध) दशक वही चालीस. या शायद कुछ ज़रा पहले नक्श-ए-फ़रियादीः अरसा-ए-दहर की झुलसी हुयी वीरानी में / हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है / अजनबी हाथों के बे-नाम गरांबार सितम / आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है...(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

उत्तरआधुनिकता अतीत में लौट नहीं सकती है. लौटना उसका लक्षण नहीं है. उसे गवारा नहीं है. लौटेगी तो वह अपनी परिभाषा से उतर जाएगी. ऐसा वह भला क्यों करेगी. वह अतीत से सीखती नहीं है उसे सोखती है. अतीत उसकी कामनाओं का कंकाल है. टकराव और वैमनस्य के नैरेटिवों में वह अतीत का विद्रूप कर उलीच देती है. चालीस का दशक आया ही चाहता था जब वह कला और संगीत में घुसपैठ करने पहुंची. पसीने, संघर्ष, ख़ून और जद्दोजहद से तरबतर आधुनिकता के रचनाकार जब नये संसार का स्वप्न देखते थे तब वह साहित्य पर अपना चोला डालने पहुंच गई थी.

उत्तरआधुनिकता हमारे स्वप्नदर्शियों के बीच से, हमारे साधारण जन के बीच से तुम जाओ, तुम बेशक राख उड़ाओ, अपनी भव्यताओं से हैरान करो, अपने ज्ञान और और मानमर्दन की अपनी ध्वंस-शक्ति पर उत्सव करो या अवैज्ञानिकता को अपने प्रणाम पर भयानक गदगद हो उठो- हमें बख़्श दो. हमें तुमसे भय नहीं है. हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है. अपनी आधुनिकता की विकृतियां दूर कर उसे बेहतर बनाना है, हिफ़ाज़त हर हाल में करनी है. मार्क्स ने कहाः “Mein Verhältnis zu meiner Umgebung ist mein Bewußtsein. (माइन फरहेल्टनिज त्सू माइनर उमगेबुंग इस्त माइन बिवुस्स्टज़ाइन) हिंदी रूपांतरण कुछ इस तरह से कि अपने पर्यावरण से मेरा संबंध ही मेरी चेतना है.इस आधुनिकतम विचार को फांद पाना उत्तरआधुनिकता के लिए मुमकिन नहीं. इसलिए नहीं कि यह दीवार है इसलिए कि यह बुलंदी है.

(नोटः इस निबंध में उत्तरआधुनिकता को शब्द द्वय की तरह नहीं लिखा गया है. यानी यहां उत्तर और आधुनिकता के बीच कोई हाइफ़न यानी समास चिन्ह नहीं रखा गया है. इसलिए कि इसे आधुनिकता की निरतंरता में आगे की कोई स्थिति या चरण या अवस्था मानने की अपेक्षा लेखक का मानना है कि यह आधुनिकता के समांतर एक प्रवृत्ति एक वैचारिक सैद्धांतिक और सामरिक पोज़ीशन है. वह उत्तरआधुनिक इसलिए नहीं है कि आधुनिकता के बाद उसका आना हुआ है, कि उसका कोई ऐतिहासिक काल है, वह उत्तरआधुनिक इसलिए है कि वह आधुनिकता की वैचारिक ज़मीन पर क़ब्ज़े की नीयत से कला, साहित्य, संस्कृति, दर्शन में लाई गई प्रविधि है. वह नयेपन का छद्म है.  इसकी सबसे अधिक चोट राजनीतिक चेतना पर पड़ रही है. यही चिंता है. हालांकि उत्तरआधुनिकता को लेकर ऐसे संदेहों या चिंताओं को कॉन्सपिरेसी थ्योरी से पीड़ित ग्रंथि बता देने का चलन है लेकिन आधुनिकों को हर तरह के हमले के लिए तैयार रहना चाहिए और भाषा और विचार और राजनीति में शैलीगत और व्यवहारिक परिवर्तनों का स्वागत एक सचेत आधुनिक की तरह करना चाहिए. इतालो काल्विनो ने जब एक अद्भुत भाषा और अद्भुत संरचना की तलाश की तो उन्होंने नहीं कहा कि वह उत्तरआधुनिक हैं, उत्तरआधुनिकों ने कहा कि वह उत्तरआधुनिक भाषा है. जबकि काल्विनो का गद्य, भाषा और विचार की महान आधुनिकता ही थी. और ऐसे काल्विनो अकेले लेखक नहीं थे. भारत समेत दक्षिण एशिया, लातिन अमेरिका, यूरोप- साहित्यिक सांस्कृतिक भूगोलों की यह लिस्ट बहुत लंबी तो नहीं लेकिन इतनी छोटी भी नहीं कि उत्तरआधुनिकता के कोट में समा जाए.)
-शिवप्रसाद जोशी

(समयांतर, अप्रैल 2019 में प्रकाशित)

Wednesday, April 25, 2018

त्रिपुरा: यह किसकी हार है? - धीरेश सैनी


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हिंदुस्तान का नैशनल मीडिया त्रिपुरा का जिक्र पहले शायद ही कभी करता हो लेकिन एक-दो साल से वह भारतीय जनता पार्टी के `ऑपरेशन त्रिपुरा` का हिस्सा था तो वहां की खास एंगल की खबरें भी अखबारों और चैनलों पर दिखाई देने लगी थीं। शेष भारत के लिए इस छोटे से गुमनाम राज्य में लंबे समय से सरकार चला रही बाद माकपा की अगुआई वाले लेफ्ट फ्रंट की हार के बाद मीडिया सीधे-सीधे भाजपा के जश्न में शामिल हो गया था।

इस उपेक्षित किए जाते रहे छोटे से खित्ते की जीत को भाजपा और मीडिया इतना ज्यादा महत्व दे रहे थे तो इसकी वजह भी साफ थी। भाजपा और कॉरपोरेट मीडिया दोनों को इसमें कोई संदेह नहीं रहा है कि देश और राज्यों के स्तर पर उसकी विपक्षी पार्टियां कहने को भले ही कांग्रेस व कई क्षेत्रीय पार्टियां हों पर वास्तव में विचार और नीतियों के लिहाज से कोई विपक्ष है तो वह सिर्फ वाम है। तो त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार की हार को वाम के सफाये के तौर पर पेश किया गया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तो इस हार के आधार पर दावा किया कि वामपंथियों को देश में कोई पसंद नहीं करता है।

मीडिया में बार-बार जिस शोर को दोहराया गया, वह यह था कि वाम मोर्चा सरकार ने इतने बरसों के शासन में त्रिपुरा को विकास से दूर रखा। विकास इन दिनों जिस शै का नाम है, उस आधार पर यह आलोचना की जाती तो बात अलग थी पर बार-बार इस बात पर जोर दिया गया कि त्रिपुरा में न इलाज की सुविधा है, न शिक्षा की। यह भी दोहराया जाता रहा कि त्रिपुरा में गांवों तक न सडकें पहुंची हैं और न बिजली-पानी। कई बार तो यह तोहमत त्रिपुरा की राजधानी अगरतला पर भी थोपी गई। जो त्रिपुरा में रहे हैं और जिन्होंने हवा के रुख के हिसाब से अपनी राय बदलना नहीं सीखा है, वे कहेंगे कि यह झूठ है। 2013 तक कई साल अगरतला में रहते हुए और इस दौरान त्रिपुरा के विभिन्न इलाकों में जाने के अवसर के मद्देनज़र मेरे अनुभव इस लिहाज से भिन्न रहे हैं। सबसे पहले तो उस छोटे से सुंदर और प्यारे से शहर की सादगी भरी छवि ही मन में उभरती है जो दूसरी कई राजधानियों की तरह आतंकित करने के बजाय सहज रिश्ता बनाता है। बेंगलुरु में रहकर लंदन और मुंबई में रहकर न्यूयॉर्क के लिए तडपने वाले बीमारों की इस शहर में कुछ भी न मिल पाने की झूठी शिकायतों पर क्या कहा जा सकता है?  

स्वास्थ्य क्षेत्र का सत्य 

जैसा मुझे याद आ रहा है, अगरतला शहर में दो सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं गोविंद बल्लभ पंत हॉस्पिटल एंड अगरतला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (जीबी के नाम से मशहूर) और दूसरा त्रिपुरा मेडिकल कॉलेज। दोनों में मुझे जाना पड़ा। शहर के बीच में स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल हॉस्पिटल में भी मैं इलाज के लिए गया। भारी भीड़ के बावजूद इन अस्पतालों में डॉक्टर और स्टाफ हमेशा ड्यूटी पर दिखाई दिए। त्रिपुरा सरकार डॉक्टरों को एनपीए (नॉन प्रैक्टिसिंग अलॉएंस) नहीं दे पाती थी इसलिए डॉक्टर शाम के वक़्त गैर ड्यूटी टाइम में प्राइवेट क्लीनिक चलाने के लिए स्वतंत्र होते थे। जाहिर है कि इस तरह शहर में फीस लेकर भी विशेषज्ञ डॉक्टर बड़ी संख्या में उपलब्ध थे। हालांकि जिन राज्यों में सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों को एनपीए मिलता है, वहां भी उनमें से अनेक के प्राइवेट प्रैक्टिस और प्राइवेट नर्सिंग होम्स चलते ही हैं। इस मामले में केंद्रीय सरकार की सेवा में काम करने वाले डॉक्टर (दिल्ली तक में) अपवाद नहीं हैं। अंतर यह है कि अगरतला में एनपीए न मिलने की वजह से प्राइवेट प्रैक्टिस की छूट का अर्थ यह नहीं था कि डॉक्टरों को सरकारी ड्यूटी में कोताही बरतने की छूट हो। यही बात उन्हें नाराज करती थी।
त्रिपुरा के राजधानी से दूरस्थ इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों तक डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की ड्यूटी सुनिश्चित की गई। डॉक्टरों को शुरुआती चार साल ग्रामीण इलाकों में सेवा करने के लिए बाध्य किया गया। अपने इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाली देख चुके हमारे जैसे लोगों के लिए खुशी की इस बात पर वहां डॉक्टर और नर्स हमेशा नाराज रहे। यह जरूर था कि अगरतला में मेदांता मेडिसिटी नहीं था। लेकिन, अगरतला में प्राइवेट नर्सिंग होम तो थे। कलकत्ते के डॉक्टर भी वहां उसी तरह आते थे जैसे शिलॉन्ग में गुवाहाटी के और मेरठ में दिल्ली के डॉक्टर खास दिनों में आते हैं।
यूं वहां फाइव स्टार होटल क्लचर का भी एक अस्पताल खुल चुका था और कम से कम हमारे अनुभव उसे लेकर बहुत खराब रहे थे। बच्चे को फिट्स आने पर हम वहां के न्यूरोलोजिस्ट की लिखी दवाएं उसके निर्देश के मुताबिक तुरंत शुरू कर चुके होते, अगर डॉ. रामप्रकाश अनत और लालटू जी सख्ती से यह सलाह नहीं देते कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टर की सलाह के बाद ही कोई दवा दी जाए। औऱ हम हैरान थे कि अगरतला के जीबी पंत से लेकर बेंगलुरू के निम्हान्स और दिल्ली के एम्स तक यही कहा गया कि बच्चे को किसी दवा पर लाना, उसे जीवन भर अंतहीन समस्याएं सौंप देना होता। इस विश्वास की वाजह ही थी कि एक साल से भी कम उम्र का बच्चा मेरी लापरवाही की वजह से बुरी तरह चोट खा बैठा था तो उसके ऑपरेशन के लिए जीबी जाने का फैसला लेने में जरा भी झिझक नहीं हुई थी। लेकिन, जिन लोगों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं चौपट कर मेदांता मेडिसिटी जैसे होटलनुमा हस्पतालों को तरजीह देना ही विकास का पैमाना हुआ करता है, उन्हें तो यह समझाना संभव नहीं है कि ऐसे अस्पतालों का जाल फैल जाने के बावजूद उत्तर भारत में मामूली बुखार तक से मरने वालों का सिलसिला टूटता नहीं है।


सड़क-पानी

इस झूठ पर कि त्रिपुरा में गांवों को सड़कें और बिजली-पानी मयस्सर नहीं हैं, यही कह सकता हूं कि त्रिपुरा के सुदूर गांवों तक की सड़कों पर मैं घूमा हूँ। टिन शेड के घरों में भी बल्ब की रोशनी और पानी देती टोटियां देखी हैं। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि विकसित हरियाणा जैसे राज्यों में आज तक महिलाओं के सिरों से पानी भरी टोकनियां और घडे नहीं उतरे हैं। यह भी कि पानी उत्तर के दोआबे के गांवों में गहराई पर चला गया है और इतना जहरीला हो गया है कि कैंसर फैलाने का कारण बन गया है।

शिक्षा का सच

त्रिपुरा की निवर्तमान वाम मोर्चा सरकार पर गांवों खासकर जनजातीय लोगों तक शिक्षा न पहुंचाने के आरोप के शोर में सबसे पहले तो यही सवाल बनता है कि भाजपा की सत्ता वाले आदिवासी बहुल राज्यों ही नहीं, कथित मुख्यधारा वाले विकसित राज्यों में पिछले कुछ सालों में नए सरकारी स्कूल खुलना तो दूर, कितने स्कूल बंद किए जा चुके हैं। उच्च शिक्षा का जिस तरह निजीकरण किया जा रहा है, उसके दुष्परिणाम कुकुरमुत्ते की तरह उग आए इंजीनियरिंग कॉलेजों के रूप में भी देख सकते हैं। विश्वविद्यालयों की जो दुर्गति की जा रहा है और जेएनयू जैसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों को जिस तरह निशाना बनाया जा रहा है, किसी से छिपा नहीं है। मीडिया अपने इस शोर के बीच जरा त्रिपुरा की साक्षरता दर पेश करने का साहस भी दिखाता और बताता कि कोई राज्य जहां की सरकार `शिक्षा विरोधी` वाम मोर्चा चला रहा हो, कैसे साक्षरता में अव्वल ठहरता है। त्रिपुरा में जनजातियों के बीच शिक्षा के अधिकार के लिए वाम मोर्चा का योगदान ऐतिहासिक रहा है। वहां की राजशाही से लेकर लोकतंत्र स्थापित हो जाने के बाद तक दशरथ देब, हेमंत देबबर्मा, सुधन्वा देबबर्मा और अघोर देबबर्मा जैसी शख्सियतों के नेतृत्व में चलाई गई जनशिक्षा समिति की मुहिम में वाम शामिल था।
हकीकत तो यह है कि त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार ने सीमित संसाधनों के बावजूद दूर-दराज के इलाकों तक स्कूल और उनमें शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित की। स्थिति तो यह है कि वाम मोर्चे की हार की समीक्षा करते वाम नेताओं को भी लगता है कि राज्य में शिक्षा के प्रसार से जिस तरह शिक्षित युवाओं की संख्या बढी, उस लिहाज से उन्हें उपयुक्त रोजगार नहीं दिया जा सका। नया शिक्षित वर्ग परंपरागत कामों में खपा नहीं रह सकता था और इतने रोजगार पैदा कर पाना राज्य सरकार के बूते की बात नहीं थी। भाजपा ने वादा किया कि त्रिपुरा में उसकी सरकार आई तो हर घर में रोजगार दिया जाएगा। गौरतलब है कि भाजपा की यह वादाबाजी नई नहीं है। उसने केंद्र में सरकार बनाने के लिए 2014 के लोकसभ चुनाव में हर साल दो करोड रोजगार देने का वादा किया था और तीन साल के बाद उसी पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री ने पकौडे बेचने को रोजगार की संज्ञा दे दी है। त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव के दौरान ही केंद्र सरकार के प्रतिनिधि सरकारी नौकरी को गुलामी और भीख भी करार दे रहे थे। यहां तक कि केंद्र सरकार ने अपनी असफलता छिपाने के लिए यह तक ऐलान कर दिया था कि रोजगार के आंकडे बताए नहीं जाएंगे। सवाल है कि रोजगार को लेकर इस हद तक झूठ बोलने वाली भाजपा पर त्रिपुरा के युवाओं ने यकीन क्यों किया!
वाम पर एक बेशर्मी भरा आरोप लIता रहा है कि वह गरीबी पर फलती-फूलती है। गरीबों के लिए योजनाओं और पहलकदमी की बात करें तो त्रिपुरा की वाम सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह आम गरीब लोगों की न्यूनतम जरूरतों को ध्यान में रखकर चल रही योजनाओं के क्रियान्वयन के मामले में भी बेहतरीन रही है। मनरेगा और दूसरी योजनाओं का पैसा रिलीज करने में केंद्र के निराशाजनक रवैये के बावजूद त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार ने गरीब तबके से मुंह नहीं मोडा। बंगाल की हार के बावजूद वाम मोर्चा ने त्रिपुरा में पिछले चुनाव में जीत का सिलसिला बरकरार रखा था तो इस बात के लिए माणिक सरकार और त्रिपुरा के वाम नेताओं की प्रशंसा हुई थी कि उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने रास्ते से समझौता नहीं किया। माकपा के केंद्रीय नेताओं ने भी कहा था कि विकास का अगर कोई जनपक्षधर मॉडल है तो वह त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार की नीतियों वाला मॉडल ही है।

गरीब बनाम नया मध्यवर्ग

सवाल यह है कि त्रिपुरा में इस हार के बाद माकपा जैसी वाम पार्टियों का अपनी `गरीब परवर` वाली छवि पर कितना भरोसा रह पाएगा। लगता है कि यह सवाल माकपा के भीतर ही काफी हलचल मचाए हुआ है। हार के नतीजों के बाद माकपा से जुडे रहे कुछ बुद्धिजीवियों ने इस तरह के संकेत भी दिए। एक ने लिखा कि बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य को विकास के लिए फ्री हैंड नहीं दिया गया था, जिसके नतीजों से सबक नहीं लिया गया। दिलचस्प यह है कि बुद्धदेव ने नये मध्यवर्गीय युवाओं की आकांक्षाओं को तुष्ट करने के लिए कथित विकास की तरफ बेहद तेज कदम बढाए थे। इस तरह कि माकपा का भरोसा रखने वाला वंचित तबका बुरी तरह निराश हुआ था। बंगाल में न खुदा ही मिला, विसाले सनम की स्थिति झेल चुकने के बावजूद इस तरह की बातें चौंकाने वाली हैं। दरअसल, त्रिपुरा में भी माकपा के भीतर से यह बात उठ रही है कि गरीबों के बीच चलाई गई योजनाओं से नया शिक्षित व नया मध्य वर्ग पैदा हुआ है जिसकी आकांक्षाएं समझने या पूरा कर पाने में पार्टी सफल नहीं हुई है। मध्य वर्ग की आकांक्षाएं नई आर्थिक नीतियों से पैदा हो रहे भ्रष्टाचार और लालच के आकर्षण से संचालित हैं, उन्हें समझ भी लिया जाता तो क्या उन्हें साकार करने में जुटा जा सकता था?
वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन नहीं मिल पाने की राज्य कर्मचारियों की नाराजगी तो कोई छुपी बात नहीं थी। लेकिन, यह भी छुपा हुआ नहीं था कि ये सिफारिशें लागू होतीं तो इसकी कीमत भी कमजोर तबकों को ही चुकानी पडती। पिछले चुनाव में भी यह मुद्दा था पर तब माकपा यह समझाने में सफल रही थी कि कसूर केंद्र का है। केंद्र ने राज्य की मांग के मुकाबले 500 करोड़ रुपये कम दिए। वाम सरकार का जोर यह समझाने पर भी था कि वेतन के रुपयों से ज्यादा महत्वपूर्ण कर्मचारियों की गरिमा और सरकारी विभागों की सुरक्षा है जिसके लिए वह प्रतिबद्ध है। माणिक सरकार यह समझाने पर जोर देते थे कि त्रिपुरा में न सरकारी विभाग खत्म किए जा रहे हैं, न छंटनी की जा रही है और न कर्मचारियों को उत्पीडन का शिकार बनाया जा रहा है और हर हाल में महीने की पहली तारीख को वेतन का भुगतान किया जा रहा है। बहरहाल, इस बार वाम मोर्चा की हार के बाद त्रिपुरा की नई सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए एक तीन सदस्यीय समीक्षा पैनल गठित कर दिया है। क्या होगा, किसे लाभ होगा और किसे खमियाजा भुगतना होगा, यह बाद में पता चलेगा पर फिलहाल यह जानना दिलचस्प होगा कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए गठित किए गए समीक्षा पैनल के काम में यह भी शामिल है कि ग्रुप डी की नौकरियां बनी रहनी चाहिए या नहीं।

स्थिरता, शांति और विकास   
2012 में इस रिपोर्टर की जंपुई हिल्स (त्रिपुरा) की यात्रा
नयी दुनिया में अमीरों के मन में ही नहीं बल्कि निम्न मध्य वर्ग तक में गरीबों के प्रति नफरत बेहद बढ चुकी है। शहरी बंगाली तबका पहले ही वाम को गरीबों की हमदर्द या विकास विरोधी मानते हुए दिल से पसंद नहीं करता था। इस चुनाव में इलीट बंगाली और नया मध्य वर्ग भारतीय जनता पार्टी का उत्साह से टूल बना और वंचित तबका भी आक्रामक प्रचार का शिकार हुआ। ऐसे में मामला ज्यादा पेंचीदा है: कि माकपा की अगली रणनीति किस लाइन पर भरोसा जताएगी? कि क्या कोई प्रग्रेसिव राज्य सरकार सिर्फ सब्सिडी का वितरण सुनिश्चित करके दमनकारी केंद्र की इच्छा के विरुद्ध सर्वाइव कर सकती है? हालांकि, त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार की उपलब्धियों को सिर्फ यहीं तक सीमित कर देखना ज्यादती ही होगी। एक बुरी तरह डिस्टर्ब रहे उपेक्षित राज्य जहां पर्यटकों की आवाजाही भी नहीं थी, को केंद्र की सरकारों के विरोध के बावजूद स्थिरता, शांति और विकास के रास्ते पर ले जाने का वाम मोर्चा सरकार का कारनामा ऐतिहासिक है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि भौगोलिक रूप से त्रिपुरा दूसरे राज्यों की तरह सडक और रेल से जुडा हुआ नहीं था। कुछ सालों पहले तक अगरतला पहुंचने के लिए एक छोटी रेलवे लाइन पर निर्भर रहना पडता था जो गुहावाटी से अगरतला तक बेहद लंबे रास्ते से पहुंचती थी। गुहावाटी से अगरतला पहुंचने वाला सडक मार्ग भी बेहद लंबा और कठिन है। कोलकाता और अगरतला के बीच बांग्लादेश पडता है। पहले कोलकाता से अगरतला पहुंचने का जो सुगम मार्ग था वह अब बांग्लादेश का हिस्सा है। ऐसे में अगरतला से कोलकाता के बीच यातायात का आसान रास्ता वायुमार्ग ही है जिसकी अपनी सीमाएं हैं।
इन्हीं परिस्थितियों में त्रिपुरा सामाजिक सूचकांकों के लिहाज से आगे ही रहा। प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से वह उत्तर पूर्व के राज्यों में शीर्ष पर पहुंचा। फल, सब्जी, दूध आदि के उत्पादन में आत्मनिर्भर इस राज्य से कभी किसानों की आत्महत्या की खबरें नहीं आईं, न ही भूख से मौत की। अकारण नहीं है कि नई सरकार के विकास के शोर के बीच ये आशंकाएं भी शुरु हो गई हैं कि आने वाले दिनों में यह राज्य भी किसानों की आत्महत्या के मामले में अपवाद नहीं रहेगा। सोशल मीडिया पर पी साईंनाथ के नाम से इस आशंका वाला बयान काफी वायरल भी हुआ है।

प्राकृतिक संसाधनों पर नज़र 

यह भी याद रखना होगा कि त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार ने जो कुछ किया, राज्य के वन और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की यथासम्भव रक्षा करते हुए किया। नए मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब इसी उपलब्धि को शिकायत के तौर पर गिनाते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में संसाधनों की कमी न होने के बावजूद विकास नहीं हुआ है। गौरतलब है कि त्रिपुरा में जंगल का मतलब सिर्फ चीड़ के जंगल नहीं हैं बल्कि वहां साल, सागौन आदि दूसरे पेड़ों के वन भी मौजूद हैं तो इसलिए कि रबर की खेती को बढ़ावा देने के बावजूद परंपरागत वनों व पहाड़ों के अंधाधुंध दोहन को रोकने के लिए वाम मोर्चा सरकार यथासंभव प्रतिबद्ध रही। तेल, गैस आदि खनिज संपदा हासिल करने के लिए भी गेल जैसी सरकारी संस्थाओं का ही सहारा लिया गया। अब विकास के नाम पर वनों और खनिज संपदा के दोहन में देसी-विदेशी कंपनियों को छूट की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। भाजपा शासित दूसरे आदिवासी बहुल राज्यों के लूट-खसोट और दमन के अनुभव हमारे सामने हैं।


केंद्र का रवैया

बंगाल की ज्योति बसु सरकार में वित्त मंत्री रहे अर्थशास्त्री और लेखक अशोक मित्र का दशकों पहले का यह कथन भारतीय गणतंत्रात्मक व्यवस्था की आज भी पोल खोल रहा है कि राज्य सरकारें बहुत हुआ तो डिग्नीफाइड म्यूनिस्पेलिटीज हैं। केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा की सरकार आने के बाद तो यह विश्लेषण भी बेकार हो गया है। यहभी नहीं कहा जा सकता है कि किसी राज्य में गैर भाजपाई सरकार की डिग्निटी भी सुरक्षित रह सकती है। ऐन दिल्ली में केजरीवाल सरकार को लगातार रौंदने और अपमान की कोशिशों यह तो समझा हही जा सकता है कि त्रिपुरा में वामपंथी सरकार को गिराने के लिए क्या नहीं किया गया होगा। इसी साल गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री माणिक सरकार का संदेश रिकॉर्ड कर लेने के बाद दूरदर्शन ने प्रसारित करने से इंकार कर दिया जाना तो एक बानगी भर था।

ट्राइबल और बंगाली
असल में माकपा के लिए भी यह चुनाव ऐसा पहला अनुभव रहा होगा। चुनाव से पहले ही राज्य को जबरन हिंसा में झोंक दिया गया था। माणिक सरकार ने अपने गणतंत्र दिवस के संदेश में यही आशंका जाहिर की थी और फासिस्टों से चौकन्ना रहने की अपील की थी। `ट्राइबल बनाम बंगाली` यह मुद्दा त्रिपुरा में बेहद संवेदनशील रहा है। त्रिपुरा ने इसी मसले को लेकर भयंकर रक्तपात और आतंक के दौर भी देखे हैं। त्रिपुरा में बंगाली लोग पहले अंग्रेजों के साथ और फिर विभाजन के वक्त पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित होकर आए हैं और यहां की सत्ता और संस्कृति पर हावी हुए हैं। दमन के आरोपों के बावजूद एक बडा सच यह है कि माकपा ने ही इस खाई को यथासंभव पाटने की भरसक कोशिशें की हैं। त्रिपुरा में सीएम पद तक पहुंचे एकमात्र ट्राइबल दशरथ देब भी माकपा से ही थे। राज्य में माकपा की पहली सरकार बनी थी तो केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार व राज्य के चरमपंथी संगठनों के विरोध के बावजूद त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (एडीसी) का गठन किया गया था। ट्राइबल्स के जंगल-जमीन के अधिकार सुनिश्चित करने जैसे कामों के चलते भी ट्राइब्लस एरिया में माकपा का आधार मजबूत था। लेकिन पिछले चुनाव में ट्राइबल एरिया में 20 में से 19 सीटें जीतने वाला वाम मोर्चा इस बार एक भी सीट नहीं जीत सका। भाजपा ने अलग ट्राइबल राज्य के लिए संघर्षरत रहे एक विवादास्पद `चरमपंथी` संगठन से चुनावी गठबंधन किया था। चुनाव से पहले ही हिंसक हालात पैदा कर दिए गए थे जो भाजपा की जीत के बाद और भयावह शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। वाम मोर्चा अनचाही परिस्थितियों में फंस चुका था। ट्राइबल्स की बोली कोरबरोक की लिपि को लेकर चले आ रही नाराजगी और अलग राज्य की मांग वाले संगठन के असर को माकपा भांप पाने में भी नाकाम रही। आतंक के दौर को याद दिलाने वाले भाषण ग्रामीण बंगाली समाज के बीच भी बेअसर रहे। जिस पीढी ने उस भयावह दौर को देखा ही नहीं था, उस पर ऐसे भाषण बेअसर रहने ही थे। लेकिन, कमाल की बात यह रही कि बंगाली समाज ने भाजपा के चुनावी गठबंधन को भी आसानी से पचा लिया। शायद उसी प्रचार और समझ के चलते जिससे हिंदी प्रदेशों का `हिंदू` अभिभूत रहता आया है और तमाम विरोधाभासों के बावजूद भाजपा की झोली में चला जाता है।


सेक्युलर संस्कृति

उस्ताद राशिद खान के साथ माणिक और उनकी पत्नी पांचाली (नज़रुल कला केंद्र)
गौरतलब है कि देश के बंटवारे के दौरान विस्थापित होकर भारत आए पंजाबियों की तरह त्रिपुरा का विस्थापित हिंदू बंगाली भी साम्प्रदायिकता का बेहद संभावित लक्ष्य था। लेकिन, यह वाम मोर्चा सरकार की सांस्कृतिक मुहिम का ही कारनामा था कि त्रिपुरा का बंगाली समुदाय उस तरह आक्रामक साम्प्रदायिक दिखाई नहीं देता था या कम से कम पिछले सात दशक में वह इस संकीर्णता का उस तरह शिकार नहीं था जिस तरह विस्थापित होकर आया उत्तर भारत का पंजाबी समुदाय। बांग्लादेश की सीमाओं पर बाघा बोर्डर जैसे उन्मादी माहौल के बजाय सहज स्थिति का श्रेय भी वाम मोर्चा सरकार की सांस्कृतिक मुहिम को दिया जा सकता है। दोनों देशों और विभिन्न समुदायों-संस्कतियों के बीच आदान-प्रदान वाले सुरुचिपूर्ण सांस्कतिक उत्सव आम बात थी और इनमें मुख्यमंत्री (अब पूर्व)
माणिक सरकार की उपस्थिति भी। लेकिन, लगता है कि संघ के लंबे अभियानों और देश में सरकार के चलते भाजपा की आक्रामक नीतियों ने त्रिपुरा की इस सांस्कृतिक परंपरा में सेंध लगा दी है। आशंका यही है कि त्रिपुरा में नयी सरकार के बाद इस परंपरा पर निर्णायक हमले होंगे।

निर्ममता, नाउम्मीदी और हताशा?

यह भी गौर करना चाहिए कि क्या यह वाकई कोई लोकतांत्रिक चुनाव था और यह कि लोकतंत्र भारत में सचमुच के चुनावों के लिए कितनी गुंजाइश बची है। माणिक सरकार की सीट के मतों की गिनती के दौरान हुए ड्रामे और ईवीएम की विश्वनसीयता पर सवालों को छोड भी दें तो जरा चुनाव से पहले के घटनाक्रम पर नजर डालते हैं। पूरी की पूरी कांग्रेस हाईजैक की जा चुकी थी। क्या सत्ता और पैसे के दुरुपयोग के बिना यह संभव था? सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति में क्या सत्ता परिवर्तन की राजनीति में सफलता की गुंजाइशें बची रह जाती हैं। चुनाव में उतरने वाली वाम पार्टियां पहले ही यह आलोचना झेलती रही हैं कि उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन की जगह सत्ता परिवर्तन को लक्ष्य बना लिया है और बुर्जुआ व्यवस्था में उनकी ऐसी नियति सुनिश्चित है। स्वाभाविक है कि त्रिपुरा के नतीजों के बाद फिर यह बात उठ रही है कि संसदीय प्रणाली हर क्रांतिकारी राजनीतिक दल को अंततः बर्जुआ रेडिकल पार्टी बनाकर आत्मसात करने में देर नहीं लगाती है और धीरे-धीरे उसके कैडर को भ्रष्ट करती है। उसके नेताओं को भी  कामप्लिसेंट (व्यवस्था अनुवर्ती) बनाने में देर नहीं लगाती।
त्रिपुरा में वाम मोर्चा सरकार की हार के बाद निर्मम आलोचनाओं और विश्लेषणों से गुरेज नहीं होना चाहिए। जो हुआ, उसकी आशंकाएं तो पिछली जीत के बावजूद छुपी हुई नहीं थी जिनसे पार पा न पाने की नाकामी से वाम मोर्चा इंकार नहीं कर सकता है। सबसे बडी नाकामी तो यह भी है कि माकपा माणिक सरकार का विकल्प पेश नहीं कर सकी। त्रिपुरा के पिछले चुनाव के बाद समयांतर में ही छपे अपने लेख का यह वाक्य दोहराना जरूरी लग रहा है- ``तमाम चुनौतियों के साथ लेफ्ट की सबसे बड़ी चुनौती इस वक्त यह है कि वह वृद्ध हो रहे माणिक सरकार जैसा तपा-तपाया ईमानदार, कल्पनाशील और यर्थावादी नेता कमान संभालने के लिए तैयार रखे।`` त्रिपुरा में वाम मोर्चा ने नृपेन चक्रवर्ती के बाद दशरथ देब और उनके बाद माणिक सरकार जैसे मुख्यमंत्री दिए जिनकी अपनी छवि लेजेंड्री रही। हालांकि खुद माणिक सरकार अपनी छवि को बहुत महत्व दिए जाने को खारिज करते रहे हैं। 2013 के चुनाव की जीत के बाद उन्होंने कहा था, ``इतिहास में व्यक्ति की एक भूमिका तो होती है, लेकिन व्यक्ति की भूमिका इतिहास से बड़ी नहीं होती है। जनता का संगठित आंदोलन ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है और मैं भी उसी आंदोलन का हिस्सा हूं।`` लेकिन यह भी सच है कि नेता के व्यक्तित्व जो उसके विचारों और कामों से ही बनता है, का बडा महत्व होता है। अब जबकि शानदार विजय अभियानों के बाद यह काफी निर्णायक किस्म की हार भी माणिक सरकार के नेतृत्व के खाते में ही जाती है तो मुडकर उनकी, उनके समकालीनों और पूर्ववर्ती सहयोगियों, नेताओं की और अंतत: वाम मोर्चा सरकार की अविश्वसवनीय सी लगने वाली उपलब्धियों को आवेग या निराशा में आंखें मूंदकर भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।     
समीक्षाओं और विश्लेषणों के बीच कई प्रगतिशील व उदार बुद्धिजीवियों की ऩफरत भरी मुहिम का जिक्र भी बतौर याददिहानी जरूरी है। जब प्रदेश भर में वाम कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा जारी थी, लेनिन की मूर्तियां गिराई जा रही थीं और राज्यपाल तक विवादास्पद बयान दे रहे थे तो कई प्रगतिशील और उदार कहे जाने वाले बुद्धिजीवी भी इसकी निंदा करने के बजाय वाम मोर्चा की ही निंदा करने में जुटे हुए थे। यहां तक कि माणिक सरकार की ईमानदार और सादगीपूर्ण छवि पर हमले में भी वे आरएसएस से पीछे नहीं थे। जबकि एक सवाल तो यही था कि क्या माणिक सरकार जैसे नेतृत्व की हार किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म का कारण नहीं है। यह मूलत: मूल्यों और ईमानदारी की हार है। अव्वल तो यह लोकतंत्र की हार है और इस बात का प्रमाण है कि भारत में लोकतंत्र के नाम पर आगे क्या होने जा रहा है। ऐसे में जरा ठहरकर यह महसूस करने के बजाय भ्रष्ट शासक वर्ग की दृष्टिहीनता और उसकी भाषा के उन्माद के उत्सव में शामिल हो जाना विचलित करने वाली स्थिति थी। वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने इस पर टिप्पणी भी की थी, ``जिन लोगों के मन में लड्डू फूट रहे हैं, उनका हाल अजीब है। उनके लहजे की चहक, आंखों की चमक, चेहरे के बदलते रंग छिपाए नहीं छिप रहे। अभी वे फुर्ती से कुछ खा, चबा और पी रहे हैं। यह मध्यांतर है। वे फिर से खेल शुरू होने के इन्तिज़ार में हैं।``

(समयांतर, अप्रैल 2018 अंक में प्रकाशित)

Saturday, September 9, 2017

रामचंद्र छत्रपति : पब्लिक इंटेलक्चुअल जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट

रामचंद्र छत्रपति : एक रोशन मशाल
`असहमति का साहस और सहमति का विवेक`
`सच और झूठ के बीच कोई तीसरी चीज़ नहीं होती और मैं सच के साथ हूँ।`` मैं अपनी बात पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के अखबार ``पूरा सच`` के इस मोटो से शुरु करना चाहता था पर अचानक रामचंद्र छत्रपति पर लिखे गए एक अन्य लेख पर नज़र पड़ी जिसकी शुरुआत इसी पंक्ति से थी तो लगा कि अब यह नकल करने वाली बात होगी। लेकिन इस पंक्ति को छोड़कर आगे बढ़ पाना संभव नहीं हो सका। ``बीच का रास्ता नहीं होता`` - यह पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश की मशहूर पंक्ति है जो उनके एक काव्य संग्रह का भी नाम है। क्या यह मात्र संयोग है कि रास्ता चुनने को लेकर दोनों के बीच ऐसी स्पष्टता थी और दोनों को ही गोलियों का सामना करते हुए शहीद होना पड़ा? पाश की हत्या भी धर्म के नाम पर खालिस्तान की मांग के समर्थक आतंकवादियों ने कर दी थी तो छत्रपति को ``डेरा सच्चा सौदा` के नाम पर धर्म की आड़ में आतंक का पर्याय बने गुरमीत राम रहीम के गुर्गों ने मार दिया था। फिलहाल गुरमीत अपने डेरे की साध्वियों के साथ रेप के अपराध में जेल पहुंच चुका है और उस पर हत्या के मामलों में फैसला आना बाकी है। इसके बावजूद यह अपराधी और उसका डेरा अभी भी ताकतवर है तो समझ सकते हैं कि उस समय तो उसकी कारगुजारियों को लेकर मुंह खोलने का साहस प्राय: किसी में नहीं था।
 
यह बात साफ करता चलूं कि छत्रपति की महान शहादत को उनके महिमामंडन का जरिया न मान लिया जाए। उनका व्यक्तित्व और सचाई के प्रति उनकी ज़िद उनकी हत्या की गारंटी की तरह जरूर थी पर यह हादसा पेश नहीं आता तो भी वे इसी सम्मान से लिखे जाने के हकदार थे। यह जरूर है कि हम उन्हें उनकी शहादत की वजह से ही जान पाए। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम का फैसला रोकने के लिए जिस तरह कोर्ट पर दबाव बनाया गया और जिसके लिए कोर्ट ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व उनकी सरकार को फटकार भी लगाई, उससे भगवान होने का स्वांग रचने वाले इस अपराधी की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां तक कि इस फेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। गुरमीत को जैसे ही पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने साध्वियों के यौन शोषण का दोषी करार दिया, प्रदेश सरकार का संरक्षण पाकर इकट्ठा हुए कथित श्रद्धालुओं ने हिंसा और आगजनी शुरु कर दी। इस उपद्रव में पंचकूला व दूसरी कई जगहों पर निजी और सरकारी संपत्तियों के भारी नुकसान के साथ 36 लोगों की मौत हुई। गुरमीत राम-रहीम और उसके अनुयायियों की तरह उसके जलवे को जानने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह अविश्वसनीय था कि धर्म का कवच पहने बैठे इस अपराधी को इस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। इस संघर्ष में अडिग रही दोनों साध्वियों, सीबीआई के ईमानदार अधिकारियों, जज जगदीप सिंह सहित जिन कुछ लोगों की प्रतिबद्धता की वजह से यह संभव हो सका, उनमें एक नाम पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का भी है।
छत्रपति उसी सिरसा शहर के रहने वाले थे जहां `डेरा सच्चा सौदा` का मुख्यालय है। छत्रपति सांध्य दैनिक `पूरा सच` निकालते थे। 1948 में शाह मस्ताना द्वारा शुरु किए गए `डेरा सच्चा सौदा` की गद्दी 1990 में गुरमीत सिंह ने हासिल कर ली थी और उसने अपने नाम के साथ राम रहीम भी जोड़ लिया था। 1998 में डेरे की जीप से कुचले गए बेगू गांव के एक बच्चे की मौत को लेकर हुए विवाद की खबर सिरसा के एक सांध्य दैनिक `रमा टाइम्स` ने छाप दी थी तो डेरे के अनुयायियों ने अखबार के दफ्तर पर जाकर पत्रकार विश्वजीत शर्मा को धमकी दी थी। तब पत्रकारों की एकजुटता के सामने डेरा प्रबंधन को लिखित माफी मांगनी पड़ी थी लेकिन देखते-देखते यह तय हो गया था कि डेरे की अनियमितताओं, अराजकता और भयंकर करतूतों के बारे में मुंह खोलना मौत को दावत देना है। 30 मई 2002 को छत्रपति ने अपने अखबार में डेरे की साध्वी की उस चिट्ठी को प्रकाशित किया था जिससे डेरे में साध्वियों के यौन शोषण की जानकारी पहली बार सार्वजनिक तौर पर दर्ज होकर लोगों में फैल गई थी। चिट्ठी बेनामी थी जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायलय को भेजी गई थी। शायद यह अखबारों के दफ्तरों में भी पहुंची थी पर इसे जगह `पूरा सच` में ही मिल सकी थी। दरअसल 30 मई को सिरसा के रोडी बाजार में डेरे के एक कार ड्राइवर की एक पुलिस अधिकारी से झड़प हो गई थी। पुलिस अधिकारी ने डेरे की साध्वी की ओर से लिखी गई चिट्ठी का जिक्र आम लोगों के बीच कर दिया था। छत्रपति ने अपने अखबार में एक खबर ``कार चालक के हठ ने खोल दिया धार्मिक डेरे का कच्चा चिट्ठा`` शीर्षक से प्रकाशित की थी और ``धर्म के नाम पर किए जा रहे साध्वियों के जीवन बर्बाद`` शीर्षक से बॉक्स में उस चिट्ठी के मजमून का खुलासा किया था। इस खबर के छपते ही डेरा प्रमुख बौखला उठा था।
 
डेरे की ओर से फोन कर छत्रपति को धमकियां दी गईं। बौखला गए डेरे ने एक के बाद एक गुंडागर्दी की कई घटनाओं का अंजाम दिया। साध्वी की उस अनाम चिट्ठी की किसी ने फोटोस्टेट प्रतियां रोडी बाजार में बांट दी थीं। डेरे के गुंडों ने एक चाय विक्रेता प्यारे लाल सेठी को उठाकर प्रताड़ित किया। इस चिट्ठी की चर्चा को लेकर रतिया में भी फोटोस्टेट की दुकान चलाने वाले दो लोगों पर हमले से हंगामा खड़ा हुआ। पत्रकार आरके सेठी ने फतेहाबाद से निकलने वाले अपने सांध्य दैनिक `लेखा-जोखा` में 7 जून को चिट्ठी के बारे में जांच की मांग को लेकर खबर छापी तो उसी दिन इस अखबार के दफ्तर पर हमला कर दिया गया। पहले तो पुलिस ने डेरे के चार अनुयायियों का गिरफ्तार कर लिया पर बाद में डेरे के अनुयायियों की भीड़ के दबाव में संपादक सेठी को ही गिरफ्तार कर लिया। छत्रपति ने 7 जून को ही इस गुंडागर्दी के खिलाफ भी विस्तार से खबर छापी। इसी चिट्ठी के सिलसिले में डेरे से जुड़े लोगों ने 27 जून को डबवाली में एक वकील से बदतमीजी की और उनके चैम्बर का ताला तोड़ने की कोशिश की। `पूरा सच` ने डेरे के इस उपद्रव की खबर भी छापी। डबवाली में ही 14 जुलाई को डेरे के लोगों ने एक स्कूल में चल रही तर्कशीलों की बैठक पर हमला कर मारपीट की। डेरे को शक था कि तर्कशीलों की बैठक में साध्वी की चिट्ठी को लेकर कोई योजना बनाई जा रही थी। इस गुंडागर्दी को लेकर भी छत्रपति ने तथ्यों के साथ समाचार प्रकाशित किया। आखिरकार डेरे के प्रतिनिधिमंडल ने सिरसा के उपायुक्त से मिलकर मांग की कि `पूरा सच` अखबार में डेरे से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगाई जाए।
 
इस बीच 20 जुलाई को `डेरा सच्चा सौदा` की प्रबंधन समिति के सदस्य रहे कुरुक्षेत्र के रणजीत सिंह की हत्या कर दी गई। रणजीत सिंह और उनकी साध्वी बहन डेरे से निकल गए थे। माना जाता है कि डेरा प्रमुख को शक था कि चिट्ठी रणजीत सिंह ने ही लिखवाई थी और उसी ने चिट्ठी व डेरे से जुड़ी जानकारियां रामचंद्र छत्रपति को दी हैं। इसी साल 2002 में 24 सितंबर को हाई कोर्ट ने साध्वियों के यौन शोषण से जुड़ी बेनामी चिट्ठी का संज्ञान लेते हुए डेरे की सीबीआई जांच के आदेश दिए। 24 अक्तूबर 2002 को रामचन्द्र छत्रपति को घर से बाहर बुलाकर पांच गोलियां मारी गईं। दो हमलावरों को मौके पर ही पकड़ लिया गया। ``पूरा सच`` के मुताबिक, हमलावरों को डेरा प्रमुख के आदेश पर डेरा प्रबंधक किशन लाल ने भेजा था। बुरी तरह घायल छत्रपति ने 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दम तोड़ दिया था।

गौरतलब है कि उस दौरान हरियाणा में इनेलो-बीजेपी गठबंधन की सरकार थी और केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी। डेरे का मुख्यालय सिरसा तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का भी गृह जिला है और उनके पिता पूर्व उप प्रधानमंत्री चौ. देवीलाल के जमाने से ही यहां इस परिवार का भी प्रभाव रहा है। चौटाला ने छत्रपति के परिवार को इंसाफ दिलाने का वादा किया था जिस पर वह कायम नहीं रह सके। मुख्यमंत्री ने इस मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति के अनुरोध को भी अनसुना कर दिया। इस बारे में सिरसा में तमाम तरह की चर्चाएं रही हैं। पीड़ित परिवार का कहना था कि पुलिस उनकी मदद करने के बजाय आरोपी को बचाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश और केंद्र सरकारों के रवैये से निराश होकर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति ने जनवरी 2003 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम पर हत्या का आरोप लगाते हुए इस केस की सीबीआई से जांच कराने का अनुरोध किया। रणजीत सिंह के पिता भी बेटे की हत्या की सीबीआई जांच की मांग लेकर हाई कोर्ट पहुंचे थे। हाई कोर्ट ने हत्या के दोनों मामलों में सीबीआई जांच शुरु करा दी।

साध्वियों के यौन शोषण के केस में गुरमीत उर्फ राम-रहीम अदालत के फैसले से जेल पहुंच चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि छत्रपति की हत्या समेत दूसरे मामलों में भी अदालत गुरमीत को सजा सुनाएगी। एक अपराजेय लगने वाली अन्यायी शक्ति से लोहा लेते हुए रामचंद्र छत्रपति शहीद हुए थे तो राष्ट्रीय मीडिया ने खबर को समुचित सम्मान नहीं दिया था। इन दिनों अपराजेय सी मानी जा रही बीजेपी की सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद राम-रहीम को जेल जाना पड़ा तो राष्ट्रीय मीडिया को रामचंद्र छत्रपति की शहादत की याद आ रही है। हालांकि, छत्रपति की हत्या को जनता ने खामोशी से नहीं गुजर जाने दिया था। उनकी हत्या के विरोध में सिरसा अभूतपूर्व रूप से बंद रहा था। छत्रपति की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। छोटा सा स्थानीय सांध्य अखबार चलाने वाले शख्स के लिए जितनी जनता उमड़ी थी, सिरसा में कभी भी उतनी जनता किसी प्रभावी से प्रभावी शख्स की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुई थी। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं थी कि मर्डर में स्वयंभू `भगवान` का हाथ होने से यह केस बेहद चर्चा में आ चुका था। दरअसल, छत्रपति उस शहर के आम लोगों के लिए बंद कोठरी में रोशनी की तरह थे। यह आम शोहरत थी कि जिसकी सुनने वाला कोई नहीं है, उसकी सुनने के लिए छत्रपति है। मार खाए सताए गरीब-गुरबा ही नहीं, शहरी मध्य वर्ग या संपन्न वर्ग भी जानता था कि वह अपने से ज्यादा ताकत वालों की टेढ़ी नज़र का शिकार हो तो उसकी बात को छापने का साहस सिर्फ और सिर्फ `पूरा सच` में है। यह एक लोकप्रिय पत्रकार के लिए शोकाकुल जनसमूह था। बेशक, इसमें ऐसा तबका भी था जो डेरे के उत्पीड़न का शिकार था या समाज में उसके आतंक को पसंद नहीं करता था। इस पत्रकार-एक्टिविस्ट की मृत्यु ने भी उनकी खबरों की तरह यह यह संदेश दिया था कि किसी भी आततायी सत्ता के सामने समर्पण के बजाय मुखर होना एकमात्र रास्ता है और फर्ज भी। वोटों के लालच और अनैतिक सांठगांठ की वजह से डेरे के मामलों में चुप रहने वाले राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी छत्रपति के अंतिम संस्कार और शोकसभा में शामिल हुए थे हालांकि बाद में वे डेरे के ही साथ खड़े होते नज़र आए थे।

छत्रपति की ताकत सिर्फ यह नहीं थी कि वे निर्भीक पत्रकार थे। अगर वे सिर्फ इतना ही होते तो भी कम बड़ी बात न होती। छत्रपति सच के सामने खड़े होने वाले मुफस्सिल पत्रकार थे जिनका हर तरह की सत्ता से बैर था। डेरे के अलावा भी उनके अखबार ने कई बड़े नेताओं के कारनामों का खुलासा किया था। अपनी पुश्तैनी खेती-बाड़ी पर आश्रित इस संपादक-पत्रकार के लिए रोज अखबार छापना हर तरह `घर फूंक तमाशे` की तरह था। विज्ञापनों के लिए दर-दर गुहार लगाना न उनके स्वभाव में शामिल था और न उनका अखबार किसी भी तरह की सत्ताओं को खुश रखना जानता था। एक सच्चा पत्रकार हर तरह की सत्ता का प्रतिरोध होता है, प्राय: सिर्फ बोले जाने वाला यह वाक्य सहज रूप से उनके जीवन का हिस्सा था। वे पत्रकार थे, एक्टिविस्ट थे और शहर के लिखने-पढ़ने वालों को प्रेरित करने वाले कवि-लेखक-बुद्धिजीवी थे, किसी शहर के लाइट हाउस की तरह। यह एक ऐसी चीज़ थी जो उन्हें किसी सत्ता से टकरा जाने वाले महज ज़िद्दी पत्रकार से अलग करती थी। असल में वे एक `पब्लिक इंटेलक्चुअल जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट` थे। इस बात को समझना हमें उनके महत्व को ठीक-ठीक समझने के लिए भी जरूरी है। इस एक बात पर गौर करना किसी कस्बे-शहर में सत्ताओं के प्रतिरोध में लगभग निष्कवच खड़े होने वाले पत्रकार के लिए भी जरूरी है।
छत्रपति प्रगतिशील लेखक संघ की सिरसा इकाई के उपाध्यक्ष थे। सिरसा के लिखने-पढ़ने वाले मित्र उनकी स्मृति में हर साल एक बड़ा सेमिनार आयोजित करते हैं और उनके नाम पर किसी बुद्धिजीवी को सम्मानित भी करते हैं। छत्रपति सम्मान पाने वालों में गुरदयाल सिंह, प्रो. अजमेर औलख, कुलदीप नैयर, प्रो. जगमोहन, रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी जैसे जाने-माने बुद्धिजीवी-पत्रकार शामिल हैं। सिरसा के शिक्षक-बुद्धिजीवी परमानंद शास्त्री बताते हैं कि शहर का कवि-लेखक, बुद्धिजीवी वर्ग छत्रपति को गणेश शंकर विद्यार्थी की परंपरा के पत्रकार के रूप में याद करता है। उस युग में भी जबकि देश और समाज के लिए सब कुछ उत्सर्ग कर देने की एक परंपरा थी और उसका सम्मान भी था, विद्यार्थी जी एक विरल व्यक्तित्व थे। छत्रपति का जमाना वह जमाना नहीं था। बड़े घरानों के अखबार जनपक्षधरता के दिखावे तक से पल्ला झाड़ चुके थे। लोकल अखबारों की छवि प्राय: ब्लेकमेलिंग और मांगने-खाने के धंधे की बन गई थी। ऐसे दौर में उन्होंने धारा के विपरीत चलकर एक सांध्य दैनिक के जरिये पत्रकारिता की विश्वसनीयता और जनपक्षधरता की मिसाल कायम की।

छत्रपति हरियाणा पत्रकार संघ की सिरसा इकाई के जिला प्रधान भी थे और इस वजह से उनका लकब प्रधानजी ही पड़ गया था। उनके निधन पर हरियाणा भर में पत्रकारों ने प्रदर्शन किए थे। सिरसा में पत्रकारों ने डेरे की खबरें नहीं छापने का फैसला भी लिया था जो कई साल जारी रहा पर बाद में यह बरकरार नहीं रह सका। इसकी एक वजह `बड़े` अखबारों का प्रबंधतंत्र भी रहा। डेरे की तरफ से पत्रकारों को कोई बहुत बड़े विज्ञापन या एकाध अपवाद को छोड़कर कोई बड़े निजी लाभ दिए जाते हों,ऐसा भी नहीं रहा। अखबारों से डेरे के संबंध डेरे के लोगों की अकड़ और शर्तों पर ही चलते रहे हैं। डेरे के खिलाफ पड़ने वाली बड़ी खबरें भी अक्सर सिरसा के बजाय चंडीगढ़ डेटलाइन से ही छपती रहीं। इन परिस्थितियों में सिरसा के पत्रकार किसी बड़े प्रतिरोध की परंपरा को भले ही कायम नहीं रख सके पर वे छत्रपति को हमेशा सम्मान के साथ याद करते हैं। छत्रपति को चाहने वालों को यह भी याद रखना होगा कि छत्रपति की तरह हमेशा ही कुछ लोग होते हैं जो आततायियों के सामने डटकर खड़े होते हैं। जैसे कि अंशुल ने एनडीटीवी पर लेखराज ढोंट, अश्विनी बख्शी, आरएस चीमा और राजेंद्र सच्चर जैसे वकीलों को याद किया कि कैसे उन लोगों ने बिना पैस लिए उनका केस लड़ा और जैसे कि सीबीआई के अफसर मुलिंजा नारायणन और सतीश डागर। शायद यह संयोग हो कि छत्रपति की मृत्यु के बाद उनके हत्यारों के खिलाफ संघर्ष से न भागने वाला उनका साथी पत्रकार भी एक स्थानीय अखबार का संपादक ही है। फतेहाबाद से निकलने वाले सांध्य दैनिक `जन सरोकार` के संपादक आरके सेठी जो खुद 1998 में डेरे के हमले का शिकार हुए थे, छत्रपति हत्याकांड में सीबीआई के गवाह हैं। उनका कहना है कि खतरा बरकरार है पर बात सिर्फ यह नहीं कि हो क्या रहा है या होगा क्या। बड़ी बात यह है कि इन सब हालात से सबको डरना छोड़ देना चाहिए।
(लेख में डेरे की कारगुजारियों से जुड़ी घटनाओं का विवरण `पूरा सच` ब्लॉग से लिया गया है।)
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`समयांतर` के सितंबर 2017 अंक में `सच के लिए बीच का रास्ता नहीं होता` शीर्षक से प्रकाशित।
फोटो में स्पेशल इफेक्ट : अनुराग अन्वेषी