Monday, March 16, 2009

सागरिका घोष सरदेसाई के लिए अछूत हैं मायावती?



तो क्या मीडिया को यह खतरा सताने लगा है कि मायावती इस बार प्रधानमंत्री बन सकती हैं? कुछ देर पहले एक टीवी चैनल पर इस बाबत हो रही बहस के एंकर (होस्ट) के बेचैनी भरे तेवर देखकर यही लगा। चैनल था सीएनन-आईबीएन और एंकर थीं सागरिका घोष सरदेसाई (जनाब राजदीप सरदेसाई की बीवी)। कहने को वे जानना चाह रही थीं कि क्या मायावती के पीएम बनने के सवाल पर देश का इलीट बायस है। लेकिन वे जानना कम चाह रही थीं बल्कि चीखकर बता ज्यादा रही थीं। वे मायावती को लेकर बार-बार धड़ल्ले से जिस फ्रेज़ का उपयोग कर रही थीं, वह था `अनटचेबल वूमन`। शायद अंग्रेजी में उनके मन की पूरी नहीं हो पा रही थी, इसलिए वे ज्यादा प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए `अछूत' भी कह दे रही थीं। जाहिर है कि वे खुद इलीट महिला हैं और इस नाते उनमें तमाम योग्यताएं हैं। इसीलिए उन्हें यह भी अधिकार है कि वे दलित तबके से आई एक लोकप्रिय नेत्री को संविधान और न्यूनतम मानवीय गरिमा की परवाह किए बगैर टेलीविजन पर अछूत-अछूत चिल्लाती रहें। उनके मन में यह सब भरा है तो वे बेकार ही मायावती की योग्यता, उनकी इंटलेक्चुअलिटी आदि को लेकर सवाल पूछ रही थीं। जवाब तो उनके पास पहले ही थे। हालांकि इस तरह वे देश के बाकी 'इलीट' तबके की तरह अपनी योग्यता और इंटलेक्चुअलिटी का ही परिचय दे रही थीं, जिसके प्रदर्शन में इस वर्ग को कभी शर्म भी नहीं रही।

पुनशचः आप किसी भी `योग्य और इलीट' से बात करें तो अंबेडकर, फुले, रैदास आदि के बारे में भी काफी ज्ञान बढ़ा सकते हैं।

Friday, March 13, 2009

जी, वही मुज़फ़्फ़रनगरी



मेरी पिछली पोस्ट पर एक बेनामी टिप्पणी आई है - 'वाह-वाह! क्या बात है! "वही धीरेश मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद"... (शमशेर जी से क्षमायाचना के साथ). ऐसे ही लिखते रहो प्यारे भाई. शमशेर जी ने यह पढा होता तो खुश होते. कुछ अपने बचपन की बातें बताते, कुछ तुम्हारा हाल पूछते...।'

लगता है कि बेनामी कोई परिचित ही हैं। नहीं जानता कि वे बेनामी क्यों बने। दरअसल मैं अक्सर 'जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद/वही धीरेश मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद' बोल दिया करता था और फिर शमशेर जी का सही शेर पढ़ता था, क्षमायाचना के साथ। दरअसल, अपने शहर बल्कि पूरे जिले की पहचान बेहद नकारात्मक वजहों से बना दी गई है। मुज़फ़्फ़रनगर यानी क्राइम केपिटल। यहां की सियासत यानी बूथ कैप्चरिंग, दबंगों की धींगामस्ती और सांप्रदायिक दंगे। समाज सेवा भी लगभग असामाजिक कृत्यों जैसी। मुद्दत पहले खंदरावली गांव में हुई प्रेमी युगल की हत्या की चर्चित वारदात पर कोई 'समाजसेवी' शर्मिंदा नहीं हुआ था। सामाजिकता के नाम पर प्रेमी जोड़ों की हत्याओं के कीर्तिमान गढ़ने का सिलसिला जारी ही है। गन्ने और गुड़ के उत्पादन में अगुआ इस जिले की किसान राजनीति भी ऐसी कि अति पछड़े और दलित थरथरा कर रह जाएं।

एक ऐसी जगह जहां युवाओं के 'हीरो' माफिया और दबंग राजनीतिज्ञ हों, वहां जी को लगती खरी बात कहने वाला कोई शमशेर हुआ। यह बात कम से कम मुझे मुज़फ़्फ़रनगरी होने के गौरव का मौका देती है। वर्ना 1999 में अमर उजाला ने मुज़फ़्फ़रनगर से यमुनापार करनाल (हरियाणा) भेजा तो मुज़फ़्फ़रनगर का बाशिंदा होने के नाते कई लोगों ने कमरा किराए पर देने से मना कर दिया था। दूसरी ओर, एक प्रोफेसर अबरोल थे जो शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी वाला शेर सुनकर खुश हो गए। अलबत्ता उन्होंने शमशेर के मुज़फ़्फ़रनगरी होने और जाट परिवार से होने पर प्यार से चुटकी जरूर ली थी। अब ये शमशेर के इस शेर का कमाल ही था कि कई बड़े साहित्यकारों ने मुझे लगाव बख्शा। आलोक धन्वा ने तो बाकायदा वायदा लिया कि मैं मुज़फ़्फ़रनगर में शमशेर की याद में कुछ शुरू करुंगा। उन्होंने मुझे बीच में कई बार इस बारे में याद भी दिलाया। अचानक बीमारी ने बेहाल कर दिया और मैं हाल नवंबर में लौटकर बुद्धु की तरह गांव गया तो असद जैदी ने भी शमशेर के गांव जाने का कई बार सुझाव दिया। पर, मेरी हालत तेजी से बदतर होती गई और मैं ठंड़ से बचने के लिए केरल भाग लिया।

हर किसी के अपने शहर की तरह मुज़फ़्फ़रनगर मुझे बेहद अजीज़ है। एक शहर जो मेरी आरजुओं का शहर रहा, जहां मेरे खाब बनते-टूटते रहे और जहां मुझे मुहब्बतें और बदनामियां नसीब हुईं। ऐसे वतन की बुराइयां गिनाना वाकई बेवफाई है मगर मुझे लगता है कि इस बदहाली पर लानतें न भेजना और भी ज्यादा बेवफाई होगी। अर्ज यह कि मुज़फ़्फ़रनगर जिले के बाशिंदों को कोई अहसास दिलाए कि यहां किराना (जिले का कैराना कस्बा) जैसे संगीत घराने और अहसान दानिश जैसे शायरों की भी लंबी गौरवशाली परंपरा है। इसका मैं यदा-कदा उल्लेख भी करना चाहता हूं।

बहरहाल, अपने इस महान मुज़फ़्फ़रनगरी के ये शेर-


जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

आज फिर काम से लौटा हूँ बड़ी रात गए
ताक़ पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायद

मेरी बातें भी तुझे ख़ाबे-जवानी-सी हैं
तेरी आँखों में अभी नींद भरी है शायद!

Monday, March 9, 2009

उन स्त्रियों का वैभव

एक महिला साथी ने अपने ब्लॉग पर पाठकों से पूछा है कि वे उन तीन स्त्रियों के नाम बताएं, जिनसे वे सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं। उन्होंने ऐसे तीन पुरुषों के नाम बताने का भी आग्रह किया है। सेलिब्रेटीज से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं और वे तपाक से कोई तीन नाम गिना देते हैं जिनमें प्रायः पहले नाम के रूप में मां बोला जाता है।
मैं यूं ही सोचते-सोचते बचपन में लौटने लगा। धुंधली सी यादों में बहुत से धूसर से, बेनाम से चेहरे तैरने लगे। मैले-कुचैले कपड़ों वाली किसान-मजदूर स्त्रियां जो अक्सर चाची, ताई और कोई-कोई बुआ होती थी, बहुत सी युवा लड़कियां जो मां के आग्रह पर मुझे अपने साथ रामलीला ले जाती थीं, इन चेहरों में थीं। अचानक पड़ोस की एक काली लड़की बेहद याद आई जिसने एक भरी दुपहरी मुझे अपने चौबारे में बुलाया और अपने दिल की बातें एक कागज़ पर लिखवा दीं - `मैं तेरी मोहब्बत में मर जाऊंगी, अक्षय।' फ़कत एक लाइन लिखा दी थी और फिर नीचे अपना नाम लिखने के लिए कहा था। उसने मुझ तीसरी कक्षा के मासूम से बच्चे पर भरोसा कर यह चिट्ठी अक्षय तक पहुंचाने का वादा भी लिया। मेरे गांव की उसी पुरानी मनुहार भरी बोली में - `बाई बी मेरा'। अक्षय उस साल रामलीला में राम का पाठ खेल रहा था। उस जमाने में जब टीवी नहीं था तो लड़कियों में ही नहीं, गांव के भले और शोहदे लोगों में भी रामलीला के एक्टरों का भारी क्रेज हुआ करता था।
मुझे जाने क्या सूझा कि मैंने वह चिट्ठी अपनी मां को जा थमाई और कोई बड़ा रहस्य खोल देने के कारनामे के गौरव से भर गया। और मेरी मां ने यह चिट्ठी उस लड़की की मां को थमा दी और फिर वह उसके पिता तक जा पहुंची। गो के न उस लड़की को और न उसके मां-बाप को कोई एक हरुफ पढ़ना आता था पर चिट्ठी का मजमून तो मां ने उन्हें रटवा ही दिया था।
फिर एक ऐसी ही सूनी दोपहर में उस लड़की ने मुझे अपने घर के आगे पकड़ लिया। मैं शर्म और डर से कांप रहा था। वो मुझे अपने किवाड़ के पीछे ले गई। फिर बेहद बेबस से भाव से मेरी ओर देखकर बोली, 'बाई, तुझे क्या मिला?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उसी कातर दृष्टि के साथ उसने फिर कहा, `तुझे पता, मेरे चाच्चा ने मुझे कितना पिट्टा?' (उस जमाने में मेरे गांव में बहुत से लोग पिता को चाच्चा ही कहते थे।)फिर उसने अपनी टांगों से सलवार थोड़ा ऊपर उठाया और कहा, `देख सारे गात पर लील ही लील पड़रे।' मुझे काटो तो खून नहीं था। मुझे लगा कि वाकई मैंने बहुत बड़ा धोखा किया है। मैं किसी तरह वहां से चला आया पर एक रात, दो रात और कितनी ही रात ढंग से सो नहीं सका।
उस दिन के बाद अचानक वह लड़की जो अपने रंग-रूप की वजह से मुहल्ले भर में बेहद उपेक्षित थी, मुझ बच्चे को बेहद सुंदर लगने लगी। मैं उसके उस सपने में जिसने चिट्ठी की शक्ल अख्तियार की थी, अक्सर घूमता और फिर शर्मिंदा सा लौट आता। अचानक रात में नींद खुलती और मैं सोचता कि मैं किसी तरह उस लड़की से माफी मांग लूंगा।
कोई बेहतरीन कहानी हम पर कई बार गहरा असर करती है और हम चीजों को मानवीय ढंग से देखने लगते हैं। सच बताऊं, इस घटना से उपजे अपराधबोध का असर भी मुझ पर ऐसा ही हुआ। कुछ दिनों बाद उस लड़की का ब्याह हो गया। संयोग यह कि हम फिर कभी मिल भी नहीं पाए। इस बात को जमाने गुज़र गए हैं पर उसकी कातर सी आंखें और उसका सवाल आज तक मेरा पीछा करते हैं। काश मैं बता पाता कि मुझे क्या तहज़ीब और तमीज मिली उससे।
गांव की बेढ़ब ज़िंदगी में ऐसे ही कई और स्त्री चेहरे मुझे याद आ रहे हैं। जिनका जिक्र बेहद निजी को सार्वजनिक करने जैसा लगता है। ये साधारण स्त्री चेहरे गहरे संकटों में मेरे मनुष्य को बचा लेते हैं।
.....काफी देर सोचते रहने के बाद न जाने क्यों मुझे आलोक धन्वा की यह कविता याद आने लगी -

चौक
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उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा
जिन्‍होंने मुझे चौक पार करना सिखाया।

मेरे मोहल्‍ले की थीं वे
हर सुबह काम पर जाती थीं
मेरा स्‍कूल उनके रास्‍ते में पड़ता था
माँ मुझे उनके हवाले कर देती थीं
छुटटी होने पर मैं उनका इन्‍तज़ार करता था
उन्‍होंने मुझे इन्‍तज़ार करना सिखाया

कस्‍बे के स्‍कूल में
मैंने पहली बार ही दाख़िला लिया था
कुछ दिनों बाद मैं
ख़ुद ही जाने लगा
और उसके भी कुछ दिनों बाद
कई लड़के मेरे दोस्‍त बन गए
तब हम साथ-साथ कई दूसरे रास्‍तों
से भी स्‍कूल आने-जाने लगे

लेकिन अब भी
उन थोड़े से दिनों के कई दशकों बाद भी
जब कभी मैं किसी बड़े शहर के
बेतरतीब चौक से गुज़रता हूँ
उन स्त्रियों की याद आती है
और मैं अपना दायाँ हाथ उनकी ओर
बढा देता हूँ
बायें हाथ से स्‍लेट को संभालता हूँ
जिसे मैं छोड़ आया था
बीस वर्षों के अख़बारों के पीछे।

Saturday, March 7, 2009

अंतहीन श्रृंखला

इस समय तो भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे पक्षी पाल लेता है, उपयोग के लिए गाय या घोड़ा पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालित पशु-पक्षियों के समान ही वह उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है। हमारे समाज के पुरुष के विवेकहीन जीवन का सजीव चित्रण देखना हो तो विवाह के समय गुलाब सी खिली हुई स्वस्थ बालिका को पांच वर्ष बाद देखिए। उस समय उस असमय प्रौढ़ा, कई दुर्बल संतानों की रोगिणी पीली माता में कौन सी विवशता, कौन सी रुला देनी वाली करुणा न मिलेगी?
-महादेवी वर्मा (श्रृंखला की कड़ियां में संकलित एक निबंध से)

पेटिंग- अमृता शेरगिल

Monday, March 2, 2009

सुदीप बनर्जी की ग़ैरहाज़िरी -असद ज़ैदी

कवि, विचारक, योजनाकार और जन-सेवक सुदीप बनर्जी (1946–2009) पिछले कुछसमय से मौत के घेरे में थे. बड़ी हिम्मत और ज़ब्त के साथ उन्होंने अपनीबीमारी – कैंसर – का सामना किया. उनके जाने से बहुत सी जगहों में एकसूनापन पैदा हुआ है जो एक लंबे अरसे तक बना रहेगा. वह ऐसे मित्र नहीं थेजिन्हें आप भूले रहें. जिनसे उनकी मुलाक़ात कम-कम होती थी – और ऐसे लोगहज़ारों में हैं – उनके यहाँ भी उनकी मौजूदगी का अहसास हमेशा बना रहताथा. दोस्ताना पैदा कराने का उनका ख़ामोश अंदाज़ और शरीफ़ाना तरीक़े सेलोगों के दिल और दिमाग़ में एक हस्तक्षेपकारी रोल हासिल कर लेना उन्हेंआता था. तमाम उम्र उन्होंने इस हुनर को माँजा. इससे उनकी बुनियादी फ़ितरतऔर इंसानी महत्वाकांक्षा का पता चलता है. वह इस बात की इजाज़त नहीं देतेकि आप उन्हें एक नेक और दर्दमंद इंसान के अलावा किसी और रूप में यादकरें.

वह अपने कैरियर की शुरूआत से ही से भारतीय प्रशासनिक सेवा के एकअवाम-दोस्त अफ़सर के रूप में मशहूर होने लगे थे. जैसे जैसे वक़्त बिगड़तागया और भारतीय राजनीति पर दक्षिणपन्थी साये गहराने लगे और सिविल सर्विसनेहरू-युगीन परम्पराओं को लात मारकर तत्परता से एक आत्मकेंद्रित, भ्रष्टऔर जन-विमुख संस्थान में बदलने लगी, सुदीप जैसे अफ़सर की यह अवाम-दोस्तशोहरत ज़्यादा पुख्ता और जोखिम-भरी होती गयी. नौकरशाही हलक़ों मेंवामपंथी के रूप में उनकी ख्याति दरअसल एक दुधारी तलवार थी और लोगों कोपहले ही से आगाह करने का ज़रिया थी. इस स्थिति ने सुदीप को बहुत सावधानआदमी तो बनाया, पर उनका ईमान कभी नहीं बदला.

वह मूलतः उन संकल्पों के प्रति वफ़ादार रहे जिनके साथ आज़ाद हिन्दुस्तानने अपना लोकतांत्रिक-संवैधानिक सफ़र शुरू किया. वह हमेशा स्थापित नियमोंकी अधिकतम प्रगतिशील और जनहितकारी व्याख्या की गुंजाइश निकालते रहते थे. आजहालत यह है कि कोई इतना न करे, बस हुकूमत और अफ़सरशाही निज़ाम केनियम-क़ायदों के भीतर रहते हुए जन-हित में काम कर दे तो ऐसे अफ़सर कोतत्काल फ़रिश्ते का दर्जा हासिल हो जाता है. सुदीप के ऊपर फ़रिश्ता होनेके अलावा एक साधारण, विनम्र और अच्छे इंसान होने का भार भी था. इस दोहरेभार को लिए हुए ही वह विदा हुए हैं.
अपने प्रशासनिक जीवन के पहले हिस्से में उन्हों ने मध्यप्रदेश मेंआदिवासी और ग़रीब जनों के कल्याण की जो योजनाएं बनाईं और क्रियान्वितकिया वे आज भी याद की जाती हैं. मसलन मध्यप्रदेश की तेंदू-पत्ता नीति औरस्लम-निवासियों को आवासीय पट्टे दिलाने में उनकी भूमिका. भोपाल गैस काण्डके लिए ज़िम्मेदार अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड को घेरने और उसकेख़िलाफ़ पक्के सबूत मुहैया कराने में सुदीप का हाथ था. शायद बहुत लोगोंको यह मालूम न हो कि अर्जुन सिंह के राज्यपाल वाले कार्यकाल के दौरानपंजाब समझौते (राजीव-लोंगोवाल समझौते) का आधार तैयार करने वाले अधिकारीसुदीप ही थे. उन्हीं ने मध्यप्रदेश में मलखान सिंह और फूलन देवी कोआत्मसमर्पण के लिए राज़ी किया था. अपने कैरियर के उत्तरार्ध में उन्होंनेशिक्षा के क्षेत्र में यादगार काम किए. राष्ट्रीय साक्षरता मिशन केमहानिदेशक के रूप में उन्होंने साक्षरता अभियान में जान डालने, इसेव्यापक बनाने और बुद्धिजीवी वर्ग को – लेखकों, फ़िल्मकारों औरसमाज-विज्ञानियों को – इसमें खींचकर लाने का काम किया. बाद में जब वहउच्च-शिक्षा सचिव बने तो कई ऐसे क़दम उठाए जिनका महत्त्व आने वाले वक़्तमें साफ़ हो जाएगा. दिल्ली का जामिया मिल्लिया अगर आज एक ज़्यादा जीवंत,रौशन और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है या होता नज़र आता है तो इसका मुख्यश्रेय सुदीप बनर्जी को ही जाना चाहिए.

सुदीप को शायद ही कभी फुरसत देखने को मिली हो. उनके असमय निधन का एकमार्मिक पहलू यह भी है कि अपनी बीमारी के आख़िरी दौर में उनका ध्यान शायदपहली बार इतनी शिद्दत के साथ जीवन की मामूली खुशियों और छोटे छोटे शग़लोंकी तरफ़ जाने लगा था. बड़े अरमान के साथ एक रोज़ अचानक बोले कि अगरसिर्फ़ पलुस्कर (शास्त्रीय गायक दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर) को सुनने केलिए एक जीवन जीना पड़े तो वह जीना सार्थक और काफ़ी होगा. उनके कमरे मेंएक सी डी प्लेअर रखा था जो उनका बेटा गौरव किसी वक़्त अपने लिए लायाहोगा. अब वह बाजा काम न करता था. मेरे और मंगलेश डबराल के आग्रह परउन्होंने किसी को बुलाकर उस बाजे को सुधरवाया और कुछ दिन तक उसपर संगीतसुना. शायद अब्दुल करीम खां को सुनते रहे. कुछ दिन तक चलने के बाद वहबाजा फिर ख़राब हो गया. तब तक वह ख़ुद भी इतने बीमार हो गए थे कि कि कुछऔर करने की हालत में नहीं रह गए थे.

उन्हें आभास था कि उनकी बीमारी आसानी से जाएगी नहीं, और शायद घातक हीहोगी. तीन चार महीने पहले आल इंडिया इन्स्टिट्यूट के प्राइवेट वार्ड मेंमैं उनसे मिलने गया. वह बहुत कमज़ोर हो गए थे और एक ख़ाके या रेखाचित्रकी तरह लग रहे थे. कहा कि मैं तो खुशक़िस्मत हूँ कि यहाँ हूँ, और इतनीअच्छी देख-भाल हो रही है, अपनी ज़िंदगी को लंबा खींचने की कोशिश कर सकताहूँ. ज़्यादातर लोग तो दवा-इलाज की पहली स्टेज पर ही हार जाते हैं,उन्हें तो संसाधनों की कमी ही मार डालती है. राजकीय सेवा में होने की वजहसे मुझे यह सब मयस्सर है. फिर इस ज़िक्र से थक कर बोले: बताओ क्या ख़बरहै? दोस्त लोग क्या कर रहे हैं? मैंने सोचा कि हो सकता है इस हालत मेंउन्हें यह बताने की किसी को सूझी न हो इसलिए मैं ही बता दूँ : किज्ञानरंजन ने 'पहल' को बंद करने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा :अरे...! फिर बोले : कहीं शरारत में तो नहीं कह रहे हो? मैंने कहा : काशऐसा ही होता! कुछ देर बाद बोले : अभी मेरी साँस चढ़ी हुई है, बाद में शामको या कल ज्ञान को फ़ोन करूंगा. वह ऐसा नहीं करें. मेरी बात मान जाएँगे.कुछ दिन बाद बताया कि उन्होंने दो-तीन बार कोशिश की, एक बार नंबर मिल भीगया पर ख़ाली घंटी जाती रही, किसी ने उठाया नहीं.

सुदीप को वह सामान्य जीवन मयस्सर नहीं हुआ जिसमें आदमी कुछ काम करता है,कुछ ठाला बैठता है, बे-इरादा टाइमपास, कुछ मटरगश्ती, कुछ अनियोजितमनोरंजन और फ़ालतू मेल-जोल वग़ैरा करता है, जिसमें फ़राइज़ को पूरा करनेका बोझ भी होता है और उनसे फ़रार की ख़्वाहिश भी और जिसमें डिस्ट्रैकशनभरे होते हैं. जो फ़ुरसत उन्हें मिलती भी, जिसमें वह मित्र-मिलन औरपुर-लुत्फ़ गुफ़्तगू में गुज़ारना चाहते तो भी पूरी तरह नहीं गुज़ार सकतेथे – या तो देश-समाज की बात निकल आती थी, या मित्र लोग अपनी समस्याएँ औरबदनसीबियाँ बताने लगते, और सुदीप अपने स्वभाव के मुताबिक़ उन समस्याओं काहल सोचने लगते. रही सही कसर उनका साहित्य-प्रेम पूरा कर देता था. इसप्रकार सुदीप ने एक भरा पूरा जीवन जिया – काम, ज़िम्मेदारी और उपलब्धिसे भरा जीवन, और हज़ारों लोगों का उन्हें प्यार मिला. पर एक दूसरे जीवन,मामूली जीवन, और उसके हर्ष और विषाद को उन्होंने अपने मित्रों, परिचितोंके जीवन के आईने में ही देखा. उसको जीने का वक़्त उन्हें नहीं मिला.

उनकी कविता की अपनी जगह है. चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, विनोद कुमारशुक्ल, लीलाधर जगूड़ी और ऋतुराज के बाद और आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल सेपहले के अंतराल के सबसे अच्छे हिन्दी कवि निःसंदेह सुदीप ही हैं. पर तमामशोहरे और इज़्ज़त के बावुजूद सुदीप समकालीन हिन्दी कविता के सबसेउपेक्षित और अल्पज्ञात कवियों में हैं. मुझे याद नहीं आता कि मैंने उनकेकृतित्व पर कोई अच्छी समीक्षा, आलेख या टिप्पणी पढ़ी हो. सुदीप ऐसे अकेलेकवि नहीं हैं. (हमारे सामने के लोगों में यह क़िस्सा बहुत से संजीदाकवियों के साथ घटित हुआ है.) पर यह हमारी साहित्यिक अंतरात्मा को खटकनेवाली बात ज़रूर है. यह एक मिथ है कि सुदीप की अपनी कविता के प्रतिनिस्संगता ही इसका एक कारण है. वह बहुत गहरे ढंग से अपने लेखन से, ख़ासकरकविता से, लगाव रखते थे, और उसे लेकर चिंतित भी रहते थे. वह साहित्य-समाजकी उदासीनता और ख़ामोशी से मायूस भी होते थे. कविता लिखकर उसे छपाने,मित्रों को सुनाने और व्यापक पाठक समाज की राय जानने की व्यग्रता उनमेंबहुत थी. अब सुदीप चले गए हैं तो हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि उनकेकृतित्व का खुले दिमाग़ से आकलन करें.
--असद ज़ैदी
बी-957 पालम विहार, गुड़गाँव 122017
फ़ोन 09868126587
(श्री सुदीप बनर्जी का निधन १० फरवरी २००९ को हुआ था. स्वास्थ्य कारणों से इन दिनों केरल में होने की वजह से मुझे यह खबर नहीं मिल सकी. फोन पर श्री असद ज़ैदी से इस बारे में पता चला. उन्होंने अनुरोध करने पर अपनी यह टिप्पणी भी मेल कर दी जो तत्काल श्रद्धांजलि के रूप में 'आज समाज' के लिए लिखी गयी थी. - धीरेश)

Thursday, February 19, 2009

आपकी पॉलिटिक्स क्या है, कॉमरेड?

१७ फरवरी २००९ मंगलवार को The Hindu में एक कोने में सिंगल कॉलम खबर पढ़ी कि सीपीआईएम ने सिक्किम में बीजेपी से हाथ मिला लिया है. खबर चूंकि The Hindu में थी सो यह कहकर इसे उड़ा देना मुमकिन नहीं था कि यह दक्षिणपंथी मीडिया की शरारत है. खबर का टेक्स्ट इस तरह है-

CONGRESS, BJP, CPI(M) join hands in Sikkim

GANGTOK: Seting aside ideological differences, the CONGRESS, the BJP and the CPI(M) joined hands in Sikkim to fight Chief Minister Pawan Kumar Chamling`s Sikkim Democratic Front in the Assembly elections to be held later this year.
The alliance between the three national parties and two regional parties - Sikkim Himali Rajya Parishad Party and Sikkim Gorkha Prajatantrik Party - has been named the united Democratic Front (UDF), according to K.N. Upreti, Congress leader and UDF chiefcordinator. Mr. Upreti told journalsts here that there would be a direct contest between the SDF and the UDF in all 32 seats.- PTI

जाहिर है कि यह खबर दिल-दिमाग में तूफ़ान मचाती रही. अगले दिन 18 फरवरी 2009 को The Hindu में ही फिर इसी साइज़ की खबर के शीर्षक पर नज़र पड़ी तो यह जानकर राहत मिली कि ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन यह राहत पलों में काफूर हो गयी. भीतर टेक्स्ट में जो था, आप भी पढ़िए-

CPI(M) not part of Sikkim alliance
Special Correpondent
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NEW DELHI : The communist Party of India (Marxist) on Tuesday denied that it is partof an alliance comprising the Congress and the Bhartiya Janta Party in Sikkim.
The CPI(M) was reacting to news reports from Gangtok that it has joined hands to fight Chief Minister Chamling`s Sikkim Democratic Front in the Assembly elections to be held later this year.
''The person who attended the meeting, where the decision was announced the views of the Sikkim committii of the party,'' the Polit Bureau said in a statement.

दिल्ली में बैठा पोलित ब्यूरो यह नहीं कह पा रहा कि खबर मनघडंत है, वो गोलमोल सफाई भर दे पा रहा है. वो कह रहा है कि जिस मीटिंग में निर्णय हुआ (गठबंधन का), उसमें जो शख्स उपस्थित था (सीपीआईएम का), वह पार्टी की सिक्किम इकाई की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता. यानी पोलित ब्यूरो मान रहा है कि गठबंधन का निर्णय बाकायदा सीपीआईएम नेता की मौजूदगी में बैठक में हुआ. शायद किरकिरी के बाद आनन-फानन में दिल्ली से सफाई दी गयी. तो क्या यह सब दिल्ली के इशारे पर ही हुआ था? अगर नहीं तो उस बैठक में जाने वाले नेता (वो कौन था, क्या सिक्किम पार्टी सेक्रेट्री?) के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? वैसे भी पोलित ब्यूरो का काम आजकल शायद राज्यों में पथभ्रमित (या कम्युनिज़म से उलटी राह पकड़ने वाले) नेताओं (बुद्धदेव या पिनारय विजयन जैसे) को जेनुइन ठहराना ही हो गया है.अब कोई प्रकाश करात से पूछे कि `आपकी पॉलिटिक्स क्या है, कॉमरेड?`

Sunday, February 15, 2009

जय श्री राम



ये फोटो राउरकेला का है जहाँ १४ फरवरी को कुछ बजरंगी गुंडे (पुलिस की मौजूदगी में) एक प्रेमी जोड़े को राखी बाँधने पर मजबूर कर रहे हैं। वैसे मौजूद बजरंगबली भी हैं पर फोटो में उनके कच्छा और टांगें ही (पूँछ भी) नज़र आ रही हैंै।
माइथोलजी के मुताबिक बजरंग बली तब की श्री राम सेना के प्रमुख सेनापति थे ै। कहते हैं कि लंगोट का पक्का रहने की ठान ली थी पर आखिरकार एक मछली के बेटे के बाप बन गए थे। आज की श्री राम सेना के कुंठा के मारे बजरंगी इन दिनों ऐसे कारनामे कर रहे हैं।
(फोटो द हिन्दू से)