Sunday, May 15, 2022

एक सुबुक आवाज़ की फैलती स्याही

 (अदनान कफ़ील दरवेश की कविताओं पर कुछ बातें)

शिवप्रसाद जोशी   



XV

We, the mortals, touch the metals, the wind, the ocean shores, the stones, knowing they will go on, inert or burning, and I was discovering, naming all these things:it was my destiny to love and say goodbye.

- Pablo Neruda (from Still Another Day) Trans. By William O’Daly

 

अदनान कफ़ील दरवेश की कविताओं को पढ़ते हुए उपरोक्त कविता के अलावा चिली के महाकवि पाब्लो नेरुदा का विख्यात नोबेल भाषण  भी याद हो आता है जिसमें उन्होंने लातिन अमेरिकी भूगोल, लातिन अमेरिकी समय और संस्कृति के परतदार बहुआयामों, उसकी बीहड़ताओं और स्वप्नों और रोमानो, पसीने धूल और गंध और ग्राम, नदी और पत्थरों पहाड़ों और चट्टानों का रास्तों का लोगों की ज़िंदगियों का एक व्यापक चित्र प्रस्तुत किया था. वो भाषण एक तरह से नेरुदा की कवि शख़्सियत को समझने की कुंजी भी है.

 

मेरा यक़ीन कीजिए

हर क्षण एक नया दृश्य उपस्थित हो रहा है

और मेरे आस-पास का भूगोल तेज़ी से बदल रहा है

जिसके बीच

मैं बस अपना घर ढूँढ रहा हूँ.

 

(मैं बस अपना घर ढूंढ रहा हूं, पृ. 61)

 

अदनान की कविताओं की किताब `ठिठुरते लैम्प पोस्ट` उनके कवि किरदार और शख़्सियत के बारे में बख़ूबी बता देती है. 175 पृष्ठों वाले अपने पहले कविता संग्रह की करीब 100 कविताओं के वितान से अदनान भी अपने कवि-पुरखों से जुड़ जाते हैं. और इस तरह पुरखों की आवाजाही से, स्मृति और प्रेम की और अनुभवों की आवाजाही से उनकी यह पुस्तक सम्पृक्त है, उससे रौशन है. `ठिठुरते लैम्प पोस्ट` के ज़रिए अदनान कविता के आंतरिक ताप की हिफ़ाज़त करते हैं. वह एक कांपती हुई सी रोशनी है, और अपनी डगमगाहट में भी बने रहने की ताब उसमें है. शांत और आहिस्ता. नाज़ुक सी है और जैसे मुंडेर पर आई चिड़िया की तरह एक मालूम-नामालूम से किसी अवर्णनीय सी स्पेस में स्थिर या उड़ान में लेकिन हमारी निगाह में स्थिर, अविचल. ‘तिल के भीतर भी एक जगह’ जैसी. "अंतःकरण के आयतन" की झलक दिखलाती रहती है. उसके बारे में बतलाती है. 

 

अब नींद में मुलायम संगीत नहीं

है एक सुबुक आवाज़ की

फैलती स्याही

एक धुंध का साम्राज्य है चारों तरफ़

जहाँ नमक की बोरियों से

रिसता रहता है ख़ून...

 

(चमकती कटार, पृ 57)

 

ब्रिटिश चिंतक जॉन बर्जर 2006 की अपनी किताब “कन्फ़ैब्यलेशन” में विज़ुअल भाषा से आगे शब्द की दृश्यात्मकता की अहमियत बताते हैं. बर्जर मानते हैं कि भाषा एक देह है, एक जीवित प्राणी...और इस प्राणी का निवास अव्यक्त भी है और व्यक्त भी. उनके मुताबिक विश्वसनीयता में एक अजीब तरह का द्वंद्व रहता है. किसी अनुभव की संदेहार्थकता और अनिश्चितता के प्रति, यहां तक कि वो निश्चितता का अनुभव ही क्यों न हो, उसके प्रति लेखक का खुलापन ही है जो लेखन को स्पष्टता और इसलिए एक क़िस्म का यक़ीन मुहैया कराता है. फ़ॉर्म और कंटेट एक दूसरे से गुंथे हुए हैं, इस तरह कि उनसे एक साथ ख़ून रिसता है. लेखन में प्रामाणिकता, अनुभव की संदेहार्थकता के प्रति वफ़ादारी से ही आती है.

अदनान ने एक व्यापक संसार की बैचेनियों और मामूली ख़ुशियों की कविताएं लिखी हैं. इस अकेले एक संग्रह में ही एक कवि के क़द का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. अदनान की कविता जीवन की कविता है. वो एक उदास, थकी हुई, मेहनत से पस्त, दुखों और झंझटों में लिथड़ी और अपने संघर्षों पर कभी हैरान तो कभी तैयार, आम नागरिक के अनुभवों के पर्यवेक्षण से तैयार कविता है. इस नाते कहना चाहिए, हालांकि इस कहने में भी दुस्साहस या अतिरंजना भी माना जा सकता है लेकिन ये ज़ोर देकर कहना ज़रूरी है कि हिंदी में नागरिक जीवन के बहुत मामूली और बहुत अदेखे से लेकिन अपनी संवेदनशीलता में बहुत तीक्ष्ण और गहन वृत्तांतों वाली कविता है जिसके यूं तो कई पुरोधा और शिरोमणि इधर भारतीय साहित्य के आसमान में चमकते रहे हैं. लेकिन इस आसमान को अपडेट की सख़्त ज़रूरत है.

ये कविताएं आठवें और नौवें दशक के कई कवियों की कविताओं से अलग मक़ाम रखती हैं. तो इसकी भी वजह है. हमें नहीं पता वे अध्ययन कहां होते हैं और कब होते हैं जब हिंदी में कविताओं की एक मुकम्मल, पारदर्शी छानबीन होती हो. या वही होता हो जैसा कि समरसेट मॉग्घम ने एक जगह लिखा था और जिसका ज़िक्र लेखक द्वारा अन्यत्र किया जा चुका है. ब्रिटिश उपन्यासकार और नाट्यकार विलियम समरसेट मॉग्घम “अ राइटर्स नोटबुक” में लिखते हैः “साहित्यिक फ़ैसलों में नेकनीयती हासिल करना कठिन होता है. ये लगभग असंभव है कि कोई व्यक्ति किसी रचना के बारे में किसी आलोचनात्मक या सामान्य मत के न्यूनतम प्रभाव में आए बगैर अपना कोई मत बना ले. इस कठिनाई को बढ़ाने वाली एक बात ये भी है कि महान स्वीकृत हो चुकी रचनाओं के संबंध में आम राय या साधारण मत से भी उनकी महानता का कुछ हिस्सा बनता है. कविता पढ़ने वाले पहले पाठक की नज़र से कविता पढ़ने की कोशिश करना एक लैंडस्केप को उस वातावरण के बिना देखने की कोशिश करना है जो उसका आवरण है.”       

तो आख़िरी लाइन की मदद से कहूं तो अदनान की कविता का पहला पाठ ही हमें उन कविताओं के आवरणविहीन लैंडस्केप के सामने खड़ा कर देता है. अदनान ने इस मामले में अपने पूर्ववर्तियों और अपने समकालीनों से एक अलहदा जगह हासिल की है. अदनान को आवरण से अपने मंतव्य को और अपनी कविता को और अपनी अमूर्तता को ढकने का न कोई इरादा नज़र आता है न कोई तरतीब. उसमें तो बसः

 

ऊपर पिघल रहा है आकाश

नीचे खदक रही है पृथ्वी

...और पीछे से

बस्ती के पर्दे को चीरती हुई

चली आ रही है

अजान की धुँधली आवाज़.

 

(एक नीरस शाम की सिम्फ़नी, पृ 50-51)

 

जैसे मुझे इस बात की ख़ुशी है कि एक कवि के तौर पर मैं खुद को उस लैंडस्केप का ही एक रहबर पाता हूं. और मानता हूं कि ये मेरी ही कविता है. वे मेरी ही लाइनें हैं जिन्हें कवि अपने संताप में और अपनी कुछ मीठी कुछ दर्द भरी कुछ बेकल कर देने वाली स्मृतियों में ढाल रहा है.

 

जिस दिन हमारे भीतर

लगातार चलती रही रेत की आँधी

जिसमें बनते और मिटते रहे

कई धूसर शहर

उस रोज़ मैंने देखा

ख़ौफ़नाक चीखती सड़कों पर

झुके हुए थे

बुझे हुए

ठिठुरते लैम्प पोस्ट...

 

(ठिठुरते लैम्प पोस्ट, पृ 65-66)

 

अदनान ने ग्राम्य और कस्बाई जीवन के इतने सूक्ष्म बिंबो को उकेरा है जो बहुत विरल हैं और वैसी तहकीकात कम नज़र आती है. तुलनाएं अपेक्षित नहीं हैं और ना ही हमारा ऐसा इरादा है. बल्कि हम ध्यान ये दिलाना चाहते हैं कि कविता में लालटेन के अलावा एक ढिबरी की याद भी है.

 

ये बात है उन दिनों की

जब रात का अँधेरा एक सच्चाई होता था

और रौशनी के लिए सीमित साधन ही मौजूद थे मेरे गाँव में

जिसमें सबसे इज़्ज़तदार हैसियत होती थी लालटेन की

जिसे साँझ होते ही पोंछा जाता

और उसके शीशे चमकाए जाते

हर रोज़ राजा बेटा की तरह माँ और बहनें तैयार करती थीं उसे

लेकिन मुझे तो वो बिल्कुल मुखिया लगता था

शाम को, घर के अँधेरों का.

 

बेशक “पहाड़ पर लालटेन” और “लालटेन की तरह जलना,” हमारे दो अत्यंत प्रिय कवियों मंगलेश डबराल और विष्णु खरे की अत्यंत महत्त्वपूर्ण, मानीख़ेज़ और लोकप्रिय कविताएं हैं लेकिन 21वीं सदी के दूसरे दशक के आख़िरी साल यानी 2019 में लिखी अदनान की ढिबरी कविता जैसे एक आख़िरी लौ की तरह जलती रहती है. यह ख्याति की विराट रोशनी में तब्दील नहीं हो जाती बल्कि ढिबरी ही बनी रहती है. एक कोने में सांस लेती हुई, हिलती कांपती हुई लौ. लेकिन अपने प्रिय कवि को अदनान लालटेन के हवाले से याद करते हैं. मंगलेश डबराल की याद में लिखी कविता “लालटेन और कवि” में वो कहते हैं- कवि नहीं मरते वे महज़ ओझल हो जाते हैं हमारी कमख़ाब नज़रों से.

अदनान की कविता की एक ख़ूबी ये भी है या एक साहस कह लीजिए कि वो अपनी बिरादरी अपने परिवार अपने समाज और अपनी क़ौम के आह्लाद, राग, दुख और बेचैनी के बारे में बताते हुए संकोच नहीं करते हैं. वे नमाज़ी की एक भावना को व्यक्त कर देते हैं जैसी कि वो है चाहे वो नन्हा नमाज़ी क्यों न हो जिसके लिए घर का बूढ़ा फाटक भी धीरे धीरे खुलने लगता है. अदनान उन्हें खोलकर आगे जाते हैं और खुलकर बताते हैं कि इस देश में नागरिक जीवन कितनी विविधताओं और कितने विविध क्लेशों और यातनाओं में व्याप्त है. “अपने गांव को याद करते हुए” शीर्षक से कविता इसका एक उदाहरण कही जा सकती है.

 

जब मुल्क की हवाओं में

चौतरफ़ा ज़हर घोला जा रहा है

ठीक उसी बीच मेरे गाँव में

अनगिनत ग़ैर-मुस्लिम माँएँ

हर शाम वक़्ते-मग़रिब

चली आ रही हैं अपने नौनिहालों के साथ

मस्जिद की सीढ़ियों पर

 

(पृ 18)

 

अदनान की कविताओ की एक नैसर्गिक ख़ूबी ये भी है कि वे अपनी सहजता, सहजबोध, साधारणता को एक पल के लिए भी नहीं गंवाती हैं. उनकी कविता अपने आसपास के मामूली जीवन को, उस जीवन के राग-रंग को  डॉक्युमेंट करती चलती है. वे विश्वसनीय और ऐतिहासिक कथाएँ हैं और इसीलिए उन्हें अपनी सब्जेक्टिविटी से भी परहेज नहीं हैं. वे वस्तुनिष्ठ होने की ‘शर्त’ को भी अनदेखा करने का माद्दा रखती है ऐसे समय में जबकि वस्तुनिष्ठता का भी हमें नहीं मालूम कि वो एक पक्ष के पक्ष में निष्ठावान हो चुकी है या नहीं.  इस मिलावटी या कृत्रिम ‘वस्तुनिष्ठता’ का आडंबर हम इधर लिबरलों और प्रगतिशीलों और वाम वर्चस्ववादियों की हरकतों और कारगुज़ारियों में देख ही चुके हैं, देख ही रहे हैं.

वेनेज़ुएला के अप्रतिम कवि और गद्यकार इयुखेनियो मोंतेहो (Eugenio Montejo, 1938-2008) ने कविताओं पर अपने नायाब छिटपुट नोट्स में एक जगह लिखा हैः “उस कविता से पहले, जो हर हाल में और लाज़िमी तौर पर हमारी अपनी कविता होती है, उससे पहले हम कमज़ोर होते हैं. एक सर्वोच्च शक्ति उसके भीतर निवास करती है. कविता को घुसपैठ के लिए कमज़ोरी की दरकार है, इसीलिए तर्क शक्ति या विचार शक्ति कमोबेश हमेशा ही उसके आगे एक अवरोध होती है. प्रामाणिक कवि इस प्रतिरोध को खाली कर देते हैं, उसे गिरा देते हैं (उसे लैस नहीं करते, जैसी कि साहित्यिक नियमावलियों की सलाह होती है), ऐसे कवि असहायता की प्रविधियों और प्रतिबिम्बों का सृजन करते हैं ताकि कविता उनमें अपनी घुसपैठ कर सके. इस लिहाज से सृजनात्मकता भी निश्चेष्ट तौर पर स्त्रैण या स्त्रियोचित है, वो जितनी निश्चेष्ट होगी उतना ही गहराई से वो  काव्यात्मक आवाज़ को जन्म देने में योगदान करेगी.”

इन दिनों जब पत्रकारिता में वस्तुनिष्ठ कहने की याद दिलाई जाती है जिसके मायने तटस्थ या निरपेक्ष रहने से भी बाज़दफ़ा होते हैं, तो कविता में भी इस ‘तटस्थता’ की लाभ उठाए जा रहे हैं और कविता से मज़े लिए जा रहे हैं, लगता है. ये उसका ‘नव-कौशल’ है. ज़ाहिर है यह कौशल कोई आज ही तो जन्म नहीं लेता, उसकी भी एक धारा, एक परंपरा और पदानुक्रम और पीढ़ी है. अदनान की सबसे महत्त्वपूर्ण कविताओं में से एक “तारीख़ी फ़ैसला” इसे फ़ाश करती है. 2019 में लिखी ये कविता बताती हैः

 

एक उदार सुब्ह

मुल्क की आलातरीन अदालत ने

जैसे ही अपना तारीख़ी फ़ैसला आम किया

मस्जिद का चौथा गुम्बद

आप ही बे-आवाज़ ज़मीन पर गिरा

जिसमें क़ैद थी मस्जिद की आख़िरी

लहूलुहान अज़ान

जो मुल्क के हर मज़लूमों-इंसाफ़पसन्द फ़र्द के भीतर

सत्तर बरस बाद गूँज उट्ठी

 

ये कैसा राज है मियाँ?

लोग बतलाते हैं

मस्जिद में तो केवल तीन गुम्बद थे.

 

(पृ 98)

 

जर्मन चिंतक वुल्फ़गांग आइज़र (1996-2007) ने साहित्यिक रचना पर ग़ौर फ़रमाने के तरीके सुझाते हुए कहा था कि न सिर्फ़ वास्तविक टेक्स्ट पर ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि उस टेक्स्ट के प्रतिक्रियास्वरूप होने वाले ऐक्शन को भी देखना चाहिए. “वुल्फ़गांग आइज़र के मूल सिद्धांत” नामक लेख में नसरुल्लाह माम्ब्रोल लिखते हैं कि आइज़र के मुताबिक साहित्यिक रचना के दो छोर हैः एक कलात्मक जो लेखक के रचित पाठ से बनता है, और दूसरा एस्थेटिक जिसका आकार पाठक बनाता है. पाठ और पाठ के वास्तविकीकरण से साहित्यिक रचना को नहीं पहचाना जा सकता बल्कि उन दोनों के बीच किसी स्थिति में ही उसे आंका जा सकता है. यानी ऐसी स्थिति जब पाठ और पाठक का विलय हो जाए. यानी रीडिंग अपने आप में एक सक्रिय और रचनात्मक प्रक्रिया है.

इन कविताओं को पढ़ते हुए मैं जैसे खुद के भीतर भी झांक रहा हूं और देख रहा हूं कि मैं ही तो हूं वो. और इन कविताओं में जो दुख, उदासी और आंतरिक वेदना से भीगा हुआ जो साहस है जो उत्तेजना है वो उन्हें और प्रखर बनाता है. यह समय में आवाजाही भर नहीं है, न समय यहां विभाजक रेखा है, बस जो है वो अंतर्तम है. “वहां जहां कहां” कविता में आख़िरी पंक्ति है- “मैं हूं वहां जहां मैं क़तई नहीं हूं...”

 

हृदय

एक सहमा प्रदेश

जिसके असंभव दिगंत में

लटकी है धूल से बनी तुम्हारी तस्वीर

 

मेरी तिरछी टोपी के असम्भव द्वार में खुँसे हैं

तुम्हारे भेंट किए हुए पिछली सर्दियों के मुरझाये फूल

 

मैं हूँ वहाँ जहाँ मैं क़तई नहीं हूँ...

 

(वहाँ जहाँ कहाँ, पृ 120) 

 

एक अच्छी कविता का बुनियादी गुण उसमें निहित ईमानदारी नहीं तो और क्या है. फिर ये बात कविता ही नहीं तमाम विधाओं पर भी लागू होगी. फिर विधाएं और कलाएं ही क्यों, मनुष्य पर भी तो यही लागू होगा. तो इस बुनियादी गुण के थ्रेड के सहारे देखें कि वो कविता से लेकर मनुष्य होने तक और मनुष्य से कविता तक जाता है. दूसरे शब्दों में कविता में निहित ईमानदारी में रचनाकार ही रिफ़लेक्ट होगा. या रचनाकार का ईमान कविता में रिफ़लेक्ट होगा. हिंदी की महत्त्वपूर्ण कवि कात्यायनी की एक कविता के हवाले से एक अहम बात को याद करें-  फ़िलहाल कुछ निराशा-भरी कविताएँ/ लिखी जानी चाहिए/ और ग़लत समझे जाने का जोखिम/ मोल लिया जाना चाहिए/ ईमानदारी एक बार फिर कविता की/ बुनियादी शर्त बनाई जानी चाहिए.

अदनान के इस संग्रह में ऐसी कविताएँ हमें पढ़ने को मिलती है जो अपने अतीत अपने घर गांव देहात और मां और अब्बा और बच्चों और ग्राम्य संसार की कोमल, मर्मस्पर्शी स्मृतियों का स्वप्नलोक सी बुनती है. और इसकी एक स्वप्नकथा भी है जिसमें वो कहते हैं- घर एक सूखा पत्ता जो रात भर खड़खड़ाता है मेरे सिरहाने...यह लंबी कविता अपने अंतर्निहित सौंदर्य से नहीं अपने संगीत से भी हमें हैरान करती रहती है. एक घर की कथा एक जीवन और स्मृतियों का एक जीवंत समुच्चय जैसे यातना और ख़ुशी का एक मिलाजुला गान है, जिसमें कई तानें निबद्ध हैं. एक दूसरे को ओवरलैप करती हुई. एक दूसरे में गुम होती हुई और फिर से प्रकट होती हुई. और फिर हमें सुनाई देती है एक नीरस शाम की सिम्फ़नी.

 

एक नीरस शाम की सिम्फ़नी बज रही है जैसे

अँधियारा, जूँ बिहान का धोखा दे रहा है...

(पृ 50)

 

अदनान की अपने अब्बा की स्मृति में लिए लिखी “छाता” कविता पढ़ते हुए एक देहरी पर दीवार के सहारे रखा मक़बूल फ़िदा हुसैन का ‘छाता’ यादा आ जाता है और याद ही क्यों वह खुलने लगता है और अपने ज़माने की बेरहमी पर तना काला छाता बन जाता है. इसी तरह हमारा साबका एक और असाधारण कविता से होता है. जिसका शीर्षक है “गमछा.” ऐसे समय में जब पराजित, हताश, कुछ घोषित-अघोषित समझौतों की ओर बढ़ती, बदली हुई मनःस्थितियों के सेमेन्टिक्स, संकेत और प्रकट व्यवहार, साहित्यिक-सांस्कृतिक मुख्यधारा में सघन होने लगे हैं, तब अदनान की 2015 में लिखी की ये कविता एक ख़ास याददिहानी की तरह आती है. जिसकी आख़िरी लाइनों में वो कहते हैं-

 

गांव से हज़ारों मील दूर

इस महानगर में

जब कभी बाहर धूप में निकलता हूँ

तो उदास और कड़े दिनों के साथी

अपने गमछे को उठाता हूँ

और उसे ओढ़ लेता हूं

क्यूँकि मुझे यक़ीन है

इस गमछे पर

इसके एक-एक रेशे पर

जिसमें मेरा ही नमक जज़्ब है

 

और सच कहूँ

तो एक पुरबिहा के लिए गमछा

महज़ एक कपड़े का टुकड़ा भर नहीं है

बल्कि उसके कंधों पर

बर्फ़ की तरह जमा

उसका समय भी है.

(पृ 17)

अदनान के काव्यात्मक स्वर की ईमानदारी का निर्माण करने वाले तत्व आख़िर कौन से हैं. बहुत सारी कविताओं से भरे इस संग्रह को बार बार उलटने पलटने कविताओं को बार बार देखने के बाद ये तत्व हमें नज़र आते हैं- सबसे पहला है साहस, मासूमियत, सच्चाई को बयान करने का हुनर, अपनी पहचान के प्रति एक अटूट ज़िद, अपने मुलुक अपने देस अपनी मिट्टी के प्रति गहरा प्रेम, गहरी अंतर्दृष्टि, एक व्यापक समझ, भाषा की सादगी और विचार की दृढ़ता. एक अदद ईमानदारी का निर्माण हंसी-ठट्ठा नहीं है, अनगिनत अणुओं से उसकी रचना होती है. वे अणु जो शब्द, भाव, दृष्टि, बोध और विवेक में निहित होते हैं. और वे उन अलग अलग तत्वों के निर्माता होते हैं जिनमें से कुछ का उल्लेख ऊपर किया गया हैं. कविता में ईमानदार हो पाना बहुत पेचीदा बहुत कठिन सा काम है और लिहाज़ा दुर्लभ भी. अदनान को इस लिहाज़ से सचेत भी रहना चाहिए और होशमंद भी कि वे इस दुर्लभ भूगोल के चुनिंदा कवि-नागरिकों में से एक हैं. उनके रास्ते और चक्करदार होंगे और इम्तहान और कड़े. फिर एक रोज़ वह क्षण कला का प्रकाशित हो उठेगा जैसे हमारे प्यारे हमारे वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी अपनी एक कविता “कोरा काग़ज़” में बताते हैं- आज कवि नहीं रहा मनुष्य बन गया/ साधारण हो गया हो गया सादा/ कोरा कागज रह गया.

और आख़िर में अदनान के संग्रह “ठिठुरते लैम्प पोस्ट” की पहली कविता “फ़जिर” की चंद लाइनें उस अज़ान के नाम जिसके बारे में कभी सुदीप बैनर्जी ने लिखा था कि समतल नहीं होगा कयामत तक/ पूरे मुल्क की छाती पर फैला मलबा/ ऊबड़-खाबड़ ही रह जाएगा यह प्रसंग/ इबादतगाह की आख़िरी अज़ान/ विक्षिप्त अनंत तक पुकारती हुई.

 

फ़ज़िर की अज़ान

बस होने ही वाली है

और मैं सोच रहा हूँ

कि ऐसा कब से है

और क्यूँ है

कि मेरे गाँव के तमाम-तमाम लोगों की घड़ियाँ

आज भी

फ़ज़िर की अज़ान से ही शुरू होती हैं.

***

 

  

शिवप्रसाद जोशी   
कवि-पत्रकार-विचारक शिवप्रसाद जोशी देहरादून में रहते हैं।

Wednesday, December 15, 2021

शैलेन्द्र के सवर्ण हिमायती: हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमां क्यूं हो


 

"शैलेन्द्र को मैं हिन्दी फिल्मों का सबसे बड़ा गीतकार मानता हूँ। हिन्दी फिल्मों में गीत रचयिता के रूप में बहुत बड़े-बड़े नाम हैं जैसे- मजरूह, साहिर, कैफ़ी आज़मी और मख़्दूम के भी कुछ गीत हैं लेकिन शैलेन्द्र की स्थिति इस मामले में कुछ अलग है। शैलेन्द्र को आप हिन्दी का भी कह सकते हैं, उर्दू का भी कह सकते हैं। शैलेन्द्र ने फिल्मों में गीत लिखते समय एक ऐसी भाषा का, एक ऐसी जबान का प्रयोग किया है जो किताबी नहीं है। आम आदमी मोहब्बत के समय जिस जबान का प्रयोग करता है, करीब-करीब उसी जबान में शैलेन्द्र ने हिन्दी फिल्मों के गीत लिखे। उनका बड़ा मशहूर गीत है, 'आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ' या 'मेरा जूता है जापानी,...फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी'। यह जो भाषा है, साहित्यिक भाषा नहीं है। न आप उसे केवल हिन्दी कह सकते हैं न ही उर्दू। हिंदुस्तान का मामूली से मामूली आदमी अपनी जिंदगी में जिस तरह से अभिव्यक्त करता है, शैलेन्द्र ने उसी भाषा को अपने गीतों का आधार बनाया।" - विश्ववनाथ त्रिपाठी

('साहित्यिक स्तर से भी बहुत बड़े हैं शैलेन्द्र के फिल्मी गीत' लेख में। 'शैलेन्द्र तू प्यार का सागर है' किताब में संकलित।)

 

त्रिपाठी के लेख का यह शुरुआती पैरा है। कुल मिलाकर बात ठीक-ठाक लगती है कि शैलेन्द्र के पास एक आमफ़हम भाषा है या आम लोगों की भाषा है। लेकिन क्या त्रिपाठी यही कहना चाह रहे हैं? क्या है जो लेख की शुरुआत में ही अखरता है और उनकी नीयत पर संदेह पैदा करता है? जिस तरह कहा जाता है कि किसी बात को समझने के लिए किसी एक वाक्य से अर्थ निकालने के बजाय उसके आगे-पीछे लिखी गई बातें पढ़ना ज़रूरी है, उसी तरह यह भी ज़रूरी है कि भली-भली सी लगने वाली किसी बात में छुपी बातों को समझने के लिए उसे तोड़कर परखा जाए।

 


"शैलेन्द्र को मैं हिन्दी फिल्मों का सबसे बड़ा गीतकार मानता हूँ। हिन्दी फिल्मों में गीत रचयिता के रूप में बहुत बड़े-बड़े नाम हैं जैसे- मजरूह, साहिर, कैफ़ी आज़मी और मख़्दूम के भी कुछ गीत हैं लेकिन शैलेन्द्र की स्थिति इस मामले में कुछ अलग है। शैलेन्द्र को आप हिन्दी का भी कह सकते हैं, उर्दू का भी कह सकते हैं।" लेख के शुरू के इन तीन वाक्यों को देखिए। त्रिपाठी कुछ प्रग्रेसिव गीतकारों को छोटा-बड़ा बनाकर बात शुरू करते हैं। वे जो नाम ले रहे हैं, उनमें से कोई भी प्रदीप टाइप हिन्दूवादी या साम्प्रदायिक मानसिकता वाला लोकप्रिय गीतकार नहीं है। तीनों नाम वे हैं जो हिन्दी सिनेमा के गीतों को मक़ाम देते हैं और उसे सेकुलर बनाए रखते हैं। शैलेन्द्र की ही तरह। मजरूह, साहिर, कैफ़ी और शैलेन्द्र, ये चारों कम्युनिस्ट हैं। तुलनात्मक अध्ययन तो किसी का भी होता है पर क्या यहाँ त्रिपाठी का उद्देश्य ऐसा कुछ है। नहीं, वे एक स्वीपिंग से कमेंट के ज़रिए अपनी साम्प्रदायिक या टिपिकल सवर्ण ब्राह्मणवादी मानसिकता को संतुष्ट करते हैं। न वे शैलेन्द्र को लेकर गंभीर हैं, न प्रगतिशीलता को। जाति, धर्म, भाषा वगैराह को लेकर उनका एक संकीर्ण नज़रिया है और वे जो भी कहते-लिखते या देखते-दिखाते हैं, इसी संकीर्ण फ्रेमवर्क के ज़रिए मुमकिन होता है। एक तरह यह उनकी सुविधा भी है और उद्देश्य भी। मुसलमान या उर्दू को लेकर उनकी अपनी समस्या है। वरना, सबसे पहली बात तो यही कि जब बात फिल्मों की हो रही है तो हिन्दी से उनका क्या आशय है। उस सिनेमा की तो भाषा ही वह रही है जिसे आप हिन्दी कहें तो वह त्रिपाठी जैसे आचार्यों की हिन्दी नहीं, आम लोगों के सहकार की हिन्दी जिसे हिंदुस्तानी कह सकते हैं, जिसे इस तरह हिन्दी और उर्दू में छीला नहीं गया। हाँ, यह ज़बान उर्दू वालों की मेहनत, लगन और प्रतिभा से विकसित हुई है।

 

एक हिन्दूवादी मार्क्सवादी लेखक को समझने की शर्त ही यही है कि उसके लिखे को उसकी नीयत पर शक़ करते हुए परखा जाए। हिन्दी के बहुत से सवर्ण लेखकों को प्रायः उनकी ज्ञात और मनोनुकूल मक्कारियां कवर करने के लिए उन पर मासूमियत, संतई, ऋषि स्वभाव वगैराह विशेषताओं का मुलम्मा चढ़ाया जाता है। यह निर्मम नज़र रखनी होगी कि उनकी मासूमियत में शामिल मक्कारी को पहचाना जा सके। नहीं तो आपको लगेगा कि पंडिज्जी यहाँ शैलेन्द्र की किसी ख़ासियत का बयान कर रहे हैं जबकि उनका उद्देश्य किसी और का शिकार करना है। उनका लिखा 'हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास' पढ़ने वाले उनकी समस्या से परिचित ही होंगे। 


कुछ महीने फहले साहिर पर 'समयांतर' के लिए लिखते हुए मुझे बेसाख़्ता शैलेन्द्र याद आए थे। आएंगे ही। आने ही चाहिए। मैंने लिखा था - ""मेरे ख़्याल से इस बात में कोई दो-राय नहीं होनी चाहिए कि फ़िल्मी गीतों के ज़रिये समाज के बेहतर बदलाव के लिए प्रतिबद्ध आर्टिस्टों में साहिर सिरमौर हैं। उनके सिने-गीतों का ही कभी ईमानदारी से अध्ययन हुआ तो वे अवाम में पहुँच और असर में अदबी आन्दोलनों से ज़्यादा ही ठहरेंगे। प्रतिबद्ध सेकुलर हिन्दी गीतकारों में ऐसे उदाहरण के रूप में शैलेंद्र का ज़िक्र ज़रूरी है। यह दिलचस्प है कि ये दोनों ही वाम धारा से आए। यह भी कि इनमें से एक धार्मिक अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि से आया और एक दलित पृष्ठभूमि से। क्या एक बेहतर समाज के लिए उनके गीतों में मौजूद इंटेंसिटी की वजह यह भी है कि हिन्दुस्तान में लोकतंत्र, समाजवाद, बराबरी, इंसानी गरिमा की चाह-परवाह इन्हीं तबकों के भीतर सबसे ज़्यादा है?"


पिछले दिनों कंवल भारती ने कुछ ऐसी टिप्पणी की थी कि सवर्णों (शायद ब्राह्मणों) की कोई सामाजिक समस्या ही नहीं है तो वे कविता क्यों लिखते हैं। इस टिप्पणी से सवर्ण लेखकों को आग लग गई थी। लेकिन, क्या यह सही नहीं है कि साहिर या शैलेन्द्र के गीतों में जिस बराबरी या इंसानी गरिमा की चाह-परवाह है, वह सवर्ण लेखकों की समस्या है ही नहीं? लोकतंत्र उनकी ज़रूरत ही नहीं है। उनका काम हद से हद 'कम क्रूर शहर' की मांग से चलता है। वे प्यार, सहज भाषा, समाजवाद, मार्क्सवाद, किसान, मज़दूर, ग़रीब वगैराह जुमले दोहराकर उस पृष्ठभूमि या उस ज़रूरत पर परदा डालना चाहते हैं जो साहिर को साहिर बनाती है, शैलेन्द्र को शैलेन्द्र। उनकी पृष्ठभूमि उनकी चेतना की वैसी तामीर नहीं करती जैसी कि सवर्ण हिन्दू लेखकों की चेतना का निर्माण उनकी पृष्ठभूमि करती है। कि वे जब चाहें तुलसीवादी हो जाएं, जब चाहें कबीरवादी, जब चाहें साम्प्रदायिक बातें करने लगें, जब चाहें सेकुलर, जब चाहें उदात्तता पर ज़ोर देने लगें, जब चाहें अश्लील बातें करने लगें।

 

बे-वजह नहीं है कि शैलेन्द्र की दलित पृष्ठभूमि पर बात करने से हिन्दू सवर्ण लेखकों को परेशानी होती है। आरएसएस के नायक प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय की महिमा-गान के लिए चर्चित रविभूषण (जन संस्कृति मंच के कार्यकारी अध्यक्ष) लिखते हैं - "शैलेन्द्र को दलित कवि के रूप में चिह्नित करना गलत है। वे किसानों और मज़दूरों के कवि हैं, निर्धनों के कवि हैं, उनकी कविताओं में जो वंचित, दुखी, तिरस्कृत, अपमानित हैं, उन्हें वाणी दी गई है। बम्बई में वर्कशाप के मशीनों के शोर से कम नहीं था उनके भीतर का शोर, उनके भीतर की आग सदैव जलती रही।" 

यह चेतना की सीमा का मसला भर नहीं है बल्कि सुचिंतित ज़िद है कि रविभूषण या दूसरे सवर्ण हिन्दू प्रगतिशील लेखक यह न मानें कि उनके प्रभुत्व वाले समाज में और हिन्दू धर्म व्यवस्था में जन्म के आधार पर तय अपमान की आग हमेशा धधकती रहती है।

रविभूषण अपनी इस टिप्पणी से पहले उद्धरण देते हैं -

शैलेन्द्र का वास्तविक नाम शंकर दास राव था। पिता केसरी लाल राव एक कांट्रेक्टर थे। रमा भारती ने 'अंदर की आग' की भूमिका 'ज़िन्दगी मैंने देखी है' में यह लिखा है कि शैलेन्द्र का संबंध आरा (बिहार) जिला के घुसपुर गाँव के दलित परिवार से था....गाँव के लिए एक कहावत मशहूर थी 'जसपुर नगरी घुसपुर गाँव, वहाँ के बसिया रावत राव'....हॉकी खेलते हुए कुछ छात्रों की जातिवादी टिप्पणी थी-अब ये लोग भी खेल खलेंगे, जिससे खिन्न होकर स्वयं अपनी हॉकी स्टिक तोड़ दी और कलम-काग़ज़ से मैत्री स्थापित की" और "30 अगस्त 1966 को केन्द्रीय मंत्री जगजीवन राम ने शैलेन्द्र के जन्म-दिन पर एक बधाई-संदेश में यह कहा था कि 'संत रविदास के बाद शैलेन्द्र हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय हरिजन कवि हैं``। `अंदर की आग` पुस्तक का लोकार्पण नामवर सिंह ने किया था और उन्होंने ``शैलन्द्र को संत रैदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण एससी कवि बताया`` (विनोद विप्लव, फॉरवर्ड प्रैस, फरवरी 2016)।


इस उद्धरण पर रविभूषण की प्रतक्रिया बताती है कि सवर्ण बुद्धिजीवी किस हद तक संकीर्ण और संवेदनहीन होते हैं। जिस ने जातिवादी टिप्पणी से आहत होकर ही हॉकी स्टिक तोड़कर कलम-कागज़ से दोस्ती की हो, उस कवि-गीतकार की चेतना और पीड़ा में, उसके व्यक्तित्व और रचनाशीलता में क्या इस बात का असर नहीं रहा होगा? 

विनोद विप्लव ने लिखा है -``कुछ समय पहले हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र की जाति सार्वजनिक किये जाने को लेकर अच्छा खासा विवाद और विरोध हुआ। शैलेन्द्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेन्द्र ने `अंदर की आग` नाम से अपने पिता की कविताओं का एक संग्रह तैयार किया था, जो राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसकी भूमिका में दिनेश शैलेन्द्र ने खुले तौर पर अपने पिता की सामाजिक पृष्ठभूमि (बिहार की धुसिया चर्मकार जाति) का उल्लेख किया था। इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने शैलेन्द्र को संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि बताया। लेकिन कई साहित्यकारों एवं लेखकों ने शैलेन्द्र की जाति का खुलासा किये जाने पर आपत्ति जतायी। एक लेखक तेजिन्दर शर्मा ने सोशल मीडिया में अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए यहां तक कह दिया कि डॉ. नामवर सिंह ने न केवल शैलेन्द्र का बल्कि सभी साहित्यप्रेमियों का भी अपमान किया है। सवाल यह है कि कोई महान शख्सियत अगर दलित हो तो उसकी जाति के उजागर होने में क्या दिक्कत है? जब ब्राह्मण या अन्य सवर्ण विभूतियों की जातियों का खुलेआम प्रचार किया जाता है तब तो किसी को आपत्ति नहीं होती। लेकिन किसी दलित विभूति की जाति को उजागर किये जाने का विरोध होने लगता है।`` (विनोद विप्लव, फॉरवर्ड प्रैस, फरवरी 2016)।

यहाँ नामवर सिंह की टिप्पणी को लेकर कोई भ्रम नहीं रखना चाहिए। माहौल देखकर इस तरह की टिप्पणी करके तालियाँ बजवा लेने में वे माहिर रहे हैं। किसी को मीर-कबीर, किसी को मुक्तिबोध, किसी को ग़ालिब कहकर निकल लेना उनकी भाषणबाजी की अदा में शुमार किया जाता है। इससे यह साबित नहीं होता था कि वे जो बोल रहे होते थे, उसे लेकर कितने गंभीर या ईमानदार होते थे। सभी जानते हैं कि दलित विरोध और साम्प्रदायिकता उनके व्यक्तित्व में सहज रूप से शामिल थी जिसका वे सचेत रूप से प्रदर्शन भी करते थे। लगता है, शैलेन्द्र को लेकर उन्होंने जगजीवन राम की पंक्ति को हरिजन शब्द बदलकर उड़ा लिया!


सवर्ण प्रगतिशील अपने लिखने-बोलने में जिस भ्रष्ट भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसका असर बहुत बार वंचित तबकों से आने वाले लेखकों पर भी पड़ता है। सवर्ण प्रगतिशील तबका सचेत रूप से भी वंचित तबकों से ताल्लुक़ रखने वाले अपने प्रभाव के लोगों की कंडीशनिंग करता है। लीलाधर मंडलोई ऐसे ही असर में शैलेन्द्र को तुलसी से जोड़ने की बदमाशी करते हैं। वे कहते हैं, ``शैलेंद्र ने तुलसी की तरह अपने गीतों में लोकमंगल की बात कही लेकिन आलोचकों को उनका लोकमंगल नज़र नहीं आया।`` (गीतकार शैलन्द्र तू प्यार का सागर है/संपादक इंन्द्रजीत सिंह)। तुलसी घृणा से भरे विशुद्ध ब्राह्मणवादी कवि हैं। उनके हिसाब से तो शैलेन्द्र ताड़न के अधिकारी ठहरते हैं। उनके भयानक लोकमंगल के प्रचारक रामचन्द्र शुक्ल हैं और हिन्दी का प्रगतिशील सवर्ण प्राय: तुलसी-शुक्लादि की मानस संतान। इनका न मजरूह, साहिर, कैफ़ी से कोई रिश्ता बनता है, न शैलेन्द्र से।

-धीरेश सैनी

 

    

Wednesday, November 3, 2021

पता नहीं चलता कि कब किस ने पाला बदल लिया है



प्रिय कवि लाल्टू का नया कविता संग्रह `कौन देखता है कौन दिखता` परिकल्पना प्रकाशन से छप कर आया है। इस संग्रह से कुछ कविताएँ यहाँ देते वक़्त इंटरनेट पर घूमते हुए प्रिय कवि नरेंद्र जैन की यह टिप्पणी मिली। उसे भी यहाँ दोहरा  रहा हूँ।

 “लाल्टू की कविताओं से रूबरू होते हुए ऐसे कवि से साक्षात्कार होता है जो सत्ता और व्यवस्था की कौंध से दूर जैसे अज्ञातवास में डूबा इस बुरे वक़्त को रेखांकित कर रहा है। ...कवि कर्म की सबसे बुनियादी और प्रामाणिक कसौटी वह निभा रहा है...जहाँ जीवन, कर्म और कविता, दोनों ही एक-दूसरे के पर्याय हैं। ...अपनी प्रेम कविताओं में भी वे घोर राजनैतिक होते हैं...। लाल्टू की कविताएँ बाज़वक़्त हमें अपना सही चेहरा भी दिखलाती हैं...। एक ऐसी कविता जहाँ विचार, अनुभव, कल्पना और अतियथार्थवाद का अद्भुत सम्मिलन है, इसमें हम लाल्टू को आर-पार और सरापा देख सकते हैं। लाल्टू का काम एक दुर्लभ अनुभव की तरह हमारे साथ जी रहा है...।” - नरेन्द्र जैन

लक्षणा व्यंजना का जुनून


लिखे गए लफ़्ज़

बूढ़े हो जाते हैं

सफल कवियों की संगत में पलते हैं सफल कवि

अकेला कहीं कोई मुग़ालते में लिखता रहता है


घुन हुक्काम-सी लफ़्ज़ों को कुतर डालती है

जैसे बुने गए इंक़लाब और कभी पहने नहीं गए

एक दिन सड़क पर फटेहाल घूमता है असफल कवि

एक फ़िल्म बनाकर सब को भेज देता है

कि इंक़लाबी लफ़्ज़ चौक पर

बुढ़ापे में काँपते थरथराते सुने गए


बरसों बाद कभी इन लफ़्ज़ों को

एक सफल कवि माला सा सजाता है

और कुछ देर लक्षणा व्यंजना का जुनून

दूर तक फैल जाता है।


चिड़ियाघर


किसका घर और किसका क़ैदखाना

सोचता

भीड़ में क़ैद शख़्स खड़ा है

ज़हन का कमाल है

या हैवानियत

बसा देते हैं चिड़ियाघर

अपने अंदर इस तरह के सवाल


गिरियाता है जिस्म के तिलिस्म में

मरियल अफ्रीकी बब्बर शेर

नसों में दौड़ती है

साइबेरिया के सारस की चीख

देर रात जगा हुआ

ढूँढता है घासफूस या कि गोश्त

यही सच है

कायनात के इस कोने में

पिंजड़ों में चकराते हैं हम

सूरज तारे हमें देखने आते हैं

अपने पुच्छल बच्चों के साथ

कौन देखता है

कौन दिखता है।


बच्चों सा खेल


तुमने देखा?

उन्होंने तोड़ डाले खिड़कियों के काँच

जैसे बच्चों सा खेल खेल रहे हों

वे एक नई कला के झंडाबरदार हैं

सुंदर को चुनौती दे रहे हैं

गर्व से शैतान का कलमा पढ़ रहे हैं


उनकी भी धरती है,

उनका अपना आस्मां है

सृजन के अपने पैमाने हैं

ज़हनी सुकून के शिखर पर होते हैं

जब किसी का क़त्ल करते हैं

या कहीं आग लगा देते हैं


बड़े लोग समझाते हैं कि रुक जाओ

सब कुछ तबाह मत करो

ऐसा कहते हुए कुछ लोग उनके साथ हो लेते हैं

पता नहीं चलता कि कब किस ने पाला बदल लिया है


टूटे काँचों को

समझाया जाता है

विकास, परंपरा, इतिहास जैसे शब्दों से

इसी बीच कुछ और क़त्ल हो जाते हैं

कुछ और उनके साथ हो जाते हैं

दिव्य-गान सा कुछ गूँजता रहता है


तुमने देखा?


डर-1


मैं सोच रहा था कि उमस बढ़ रही है 

उसने कहा कि आपको डर नहीं लगता

मैंने कहा कि लगता है

उसने सोचा कि जवाब पूरा नहीं था

तो मैंने पूछा - तो।

बढ़ती उमस में सिर भारी हो रहा था

उसने विस्तार से बात की -

नहीं, जैसे ख़बर बढ़ी आती है कि 

लोग मारे जाएँगे।

मैंने कहा - हाँ।

मैं उमस के मुखातिब था

यह तो मैं तब समझा जब उसने निकाला खंजर

कि वह मुझसे सवाल कर रहा था।


डर-2


दिल्ली में हूँ तो अमदाबाद

और अमदाबाद में दिल्ली

कहीं मेरठ, कोलकाता, दीगर शहर

ढूँढता हूँ अपने अंदर


डरता हूँ ख़ुद ही से

इतना पी चुका ज़हर।

***

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