Thursday, November 28, 2013

अपने से डरा हुआ बहुमत : असद ज़ैदी



क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बन्दगी में मिरा भला न हुआ (ग़ालिब)

नमरूद बाइबिल और क़ुरआन में वर्णित एक अत्याचारी शासक था जिसने ख़ुदाई का दावा किया और राज्याज्ञा जारी की कि अब से उसके अलावा किसी की मूर्ति नहीं पूजी जाएगी। पालन न करने वालों को क़त्ल कर दिया जाता था। नरेन्द्र मोदी ने, जिनके नाम और कारनामे सहज ही नमरूद की याद दिलाते हैं, अब अपने आप को भारत का प्रधानमंत्री चुन लिया है। बस इतनी सी कसर है कि भारत के अवाम अगले साल होने वाले आम चुनाव में उनकी भारतीय जनता पार्टी को अगर स्पष्ट बहुमत नहीं तो सबसे ज़्यादा सीट जीतने वाला दल बना दें। इसके बाद क्या होगा यह अभी से तय है। पूरी स्क्रिप्ट लिखी ही जा चुकी है। इस भविष्य को पाने के लिए ज़रूरी कार्रवाइयों की तैयारी एक अरसे से जारी है । मुज़फ़्फ़रनगर में मुस्लिम जनता पर बर्बर हमला, हत्याएँ, बलात्कार, असाधारण क्रूरता की नुमाइश और बड़े पैमाने पर विस्थापन इस स्क्रिप्ट का आरंभिक अध्याय है। यह उस दस-साला खूनी अभियान का भी हिस्सा है जिसके ज़रिए हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ हिन्दुस्तानी राज्य और समाज पर अपने दावे और आधिपत्य को बढ़ाती जा रही हैं।

यह आधिपत्य कहाँ तक जा पहुँचा है इसकी प्रत्यक्ष मिसालें देना ज़रूरी नहीं है -- क्योंकि जो देखना चाहते हैं देख ही सकते हैं -- पर जो परोक्ष में है और भी चिंताजनक है। मसलन, लेखक कवियों और कलाकारों के बीच विमर्श को जाँचिए, उस स्पर्धा और घमासान को देखिए जो हमेशा उनके बीच होता ही रहता है, हिन्दी के अध्यापकों से बात कीजिए, और मुज़फ़्फ़रनगर का ज़िक्र छेड़िये तो लगेगा मुज़फ़्फ़रनगर में शायद कोई मामूली वारदात हुई है जो होकर ख़त्म हो गई। जैसे किसी को मच्छर ने काट लिया हो! मुज़फ़्फ़रनगर की बग़ल में, दिल्ली में, बैठे हुए किसी को सुध नहीं कि पड़ोस में क्या हुआ था और हो रहा है, बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, भोपाल, पटना, चंडीगढ़ और शिमला का तो ज़िक्र ही क्या! इक्के दुक्के पत्रकारों, चंद कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों की को छोड़ दें तो किसी लेखक-कलाकार को वहाँ जाने की तौफ़ीक़ नहीं हुई। उनमें से एक शरणार्थी कैम्प तो दिल्ली की सीमा ही पर है। मात्र एक ज़िले में क़रीब एक लाख लोग अपने गाँवों और घरों से खदेड़ दिये गए, शायद अब कभी वहाँ लौट नहीं पाएँगे, उनके भविष्य में असुरक्षा और अंधकार के सिवा कुछ नहीं, उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति साहित्य, कला, संस्कृति, पत्र-पत्रिका, अख़बार, सोशल मीडिया में सरसरी तौर से भी ठीक से दर्ज नहीं हो पा रही। ऐसे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। और जो अब हो रहा है वो भी नहीं हो रहा!

मामला इतने पर ही नहीं रुकता। संघ परिवार, नरेन्द्र मोदी और भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह का इस प्रसंग से जैसे कोई वास्ता ही नहीं! मीडिया को उनका नामोल्लेख करना ग़ैर-जायज़ लगता है। मामले को ऐसे बयान किया गया कि यह सिर्फ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की चुनावी चाल थी जो उल्टी पड़ गई। अगर कोई कहता है कि कैसे मुज़फ़्फ़रनगर में गुजरात का प्रयोग विधिवत ढंग से दोहराया गया है, और इस वक़्त वहाँ की दबंग जातियाँ, पुलिस और काफ़ी हद तक प्रशासन मोदी-मय हो रहा है, और यह कि मुज़फ़्फ्ररनगर क्षेत्र में संघ परिवार बहुत दिन से ये कारनामा अंजाम देने की तैयारी कर रहा था, तो आम बौद्धिक कहने वाले की तरफ़ ऐसे देखते हैं जैसे कोई बहुत दूर की कौड़ी लाया हो। हिन्दी इलाक़े के बौद्धिकों में -- जिनमें अपने को प्रगतिशील कहने वाले लोग भी कम नहीं हैं -- फ़ासिज़्म को इसी तरह देखा या अनदेखा किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले हिन्दी के एक पुराने बुद्धिमान ने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी पर ज़्यादा चर्चा से उसीका महत्व बढ़ता है; बेहतर हो कि हम मोदी को 'इगनोर' करना सीख लें। एक प्रकार से वह साहित्य की दुनिया में आज़माये फ़ार्मूले को राष्ट्रीय राजनीति पर लागू कर रहे थे। इतिहास में उन जैसे चिन्तकों ने पहले भी हिटलर और मुसोलिनी को 'इगनोर' करने की सलाह दी थी।

अगर यह नादानी या मासूमियत की दास्तान होती तो दूसरी बात होती। इसी तबक़े के लोगों ने यू आर अनंतमूर्ति प्रकरण में जिस मुस्तैदी और जोश से बहस में हिस्सा लिया वह कहाँ से आई? अनंतमूर्ति ने जब यह कहा कि वह ऐसे मुल्क में नहीं रहना चाहेंगे जहाँ मोदी जैसा आदमी प्रधानमंत्री हो, संघ परिवार द्वारा लोकतंत्र पर जैसी फ़ासीवादी चढ़ाई की तैयारी है, अगर वह सफल हो गई तो यह देश रहने लायक़ नहीं रह जाएगा, तो लगा जैसे क़हर बरपा हो गया! शायद ही वर्तमान या अतीत के किसी लोहियावादी को एक साथ संघ परिवार और हिन्दी के उदारमना मध्यममार्गी लोगों का ऐसा कोप झेलना पड़ा हो। अचानक साहित्य और पत्रकारिता के सारे देशभक्त जाग उठे और बुज़ुर्ग लेखक के 'देशद्रोह' की बेहूदा तरीक़े से निन्दा करने लगे। यह अनंतमूर्ति की वतनपरस्ती ही थी कि उन्होंने ऐसी बात कही। रंगे सियारों के मुँह से यह बात थोड़े ही निकलने वाली थी! कौन चाहेगा कि उसका वतन एक क़ातिल और मानवद्रोही के पंजे में आ जाए? क्या इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि हज़ारों, बल्कि लाखों बल्कि लोगों को, रोते और बिलबिलाते हुए, अपने वतन को अलविदा कहनी पड़ी? पिछली सदी में जर्मनी में और स्पेन में, और १९४७ के भारत में क्या हुआ था? हर तरह के फ़ासिस्ट और साम्प्रदायिक लोग क्या इसी को शुद्धिकरण और राष्ट्र-निर्माण का दर्जा नहीं देते थे? कुछ लोग तमाम जानकारी जुटा कर यह साबित करने पर तुल गए कि अनंतमूर्ति नाम का शख़्स कितना चतुर, अवसरवादी और चालबाज़ रहा है। मामला फ़ासिस्ट ख़तरे से फिसलकर एक असहमत आदमी के चरित्र विश्लेषण पर आ ठहरा। वे किसका पक्ष ले रहे थे? ऐसी ही दुर्भाग्पूर्ण ख़बरदारी वह थी जिसका निशाना मक़बूल फ़िदा हुसेन बने। कई बुद्धिजीवी और अख़बारों के सम्पादक हुसेन को देश से खदेड़े जाने और परदेस में भी उनको चैन न लेने देने के अभियान का हिस्सा बन गए थे।

मुज़फ़्फ़रनगर पर ख़ामोशी और अनंतमूर्ति के मर्मभेदी बयान पर ऐसी वाचालता दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इससे यह पता चलता है कि ज़हर कितना अन्दर तक फैल चुका है। फ़ासिज्‍़म लोगों की भर्ती पैदल सैनिक के रूप में लुम्पेन तबक़े से ही नहीं, बीच और ऊपर के दर्जों से भी करता है। उसका एक छोटा दरवाज़ा बायें बाज़ू के इच्छुकों के लिए भी खुला होता है। कुछ साल के अन्तराल से आप किसी पुराने दोस्त और हमख़याल से मिलते हैं तो पता चलता है वह बस हमज़बान है, हमख़याल नहीं। आपका दिल टूटता है, ज़मीन आपके पैरों के नीचे से खिसकती लगती है, अपनी ही होशमन्दी पर शक होने लगता है। वैचारिक बदलाव ऐसे ही चुपके से आते हैं। बेशक इनके पीछे परिस्थितियों का दबाव भी होता है, पर यही दबाव प्रतिरोध के विकल्प को भी तो सामने कर सकता है। ऐसा नहीं होता नज़र आता इसकी वजह है बहुमत का डर और वाम-प्रतिरोध की परंपरा का क्षय। मेरी नज़र में जब लोग लोकतंत्र के मूल्यों की जगह बहुमतवाद के सिद्धान्त को ही सर्वोपरि मानने लगें, और राजनीति-समाज-दैनिक जीवन सब जगह उसी की संप्रभुता को स्वीकार कर लें, बहुमतवाद के पक्ष में न होकर भी उसके आतंक में रहने लगें, अपने को अल्पमत और अन्य को अचल बहुमत की तरह देखने लगें और ख़ुद अपने विचारों और प्रतिबद्धताओं के साथ नाइन्साफ़ी करने लगें तो अंत में यह नौबत आ जाती है कि बहुमत के लोग ही बहुमत से डरने लगते हैं। बहुमत ख़ुद से डरने लगता है।आज हिन्दुस्तान का लिबरल हिन्दू अपने ही से डरा हुआ है, उसे बाहर या भीतर के वास्तविक या काल्पनिक शत्रु की ज़रूरत नहीं रही। फ़ासिज़्म का रास्ता इसी तरह बना है, इसी से फ़ासीवादियों की ताक़त बढ़ी है। यह वह माहौल है जिसमें प्रगतिशील आदमी भी सच्ची बात कहने से घबराने लगता है, साफ़दिल लोग भी एक दूसरे से कन्नी काटने लगते हैं। बाक़ी अक़्लमंदों का तो कहना ही क्या, उनके भीतर छिपा सौदागर कमाई का मौक़ा भाँपकर सामने आ जाता है और अपनी प्रतिभा दिखाने लगता है। अक़लमंद लोग अपनी कायरता को भी फ़ायदे के यंत्र में बदल लेते हैं।

१९८९ के बाद पंद्रह बीस साल ऐसे आए थे जब भारत का मुख्यधारा का वाम (संसदीय वामपंथ ) यह कहता पाया जाता था कि दुनिया भर में समाजवादी राज्य-व्यवस्थाएँ टूट रही हैं, कुछ बिल्कुल मिट चुकी हैं लेकिन हिन्दुस्तान में वाम की शक्ति घटी नहीं बल्कि इसी दौर में उत्तरोत्तर बढ़ी है। वाम संगठनों की सदस्यता में इज़ाफ़ा हुआ है और यह इसका प्रमाण है कि वाम दलों की नीतियाँ सही हैं, और यह कि हमारी वाम समझ ज़्यादा परिपक्व, ज़मीनी और पायेदार है। बूर्ज्वा पार्टियों का दिवालियापन अब ज़ाहिर होने लगा है। इस सूत्र को इसी दौर की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति से मिलाकर देखें तो पता चलता है कि वाम के एक हिस्से ने अपने लिए कितनी बड़ी मरीचिका रच ली थी, और यथार्थ के प्रतिकूल पक्ष की अनदेखी करना सीख लिया था। वाम दलों ने अपनी बनाई मरीचिका में फँसकर अपने ही हौसले पस्त कर लिए हैं। इसी दौर में संघ परिवार की ख़ूनी रथयात्राएँ और सामाजिक अभियान शुरू हुए जिनकी परिणति बाबरी मस्जिद के विध्वंस और मुम्बई और सूरत के नरसंहारों में हुई। यह दौर हिन्दुत्व के राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्रीय तथ्य बनने का है, पहले खाड़ी युद्ध के साथ पश्चिम एशिया पर अमरीकी साम्राज्य के हमलों का है, और भारत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के आत्मसमर्पण का है। इसी दौर में भारत स्वाधीन नीति छोड़कर अमरीका का मातहत और इज़राइल का दोस्त हुआ। इसी दौर में बंगाल की लम्बे अरसे से चली आ रही वाम मोर्चा सरकार ने अवाम के एक हिस्से का समर्थन खो दिया क्योंकि वाम सरकार और वाम पार्टियों के व्यवहार में वाम और ग़ैर-वाम का फ़र्क़ ही नज़र आना बंद हो गया था। यही दौर मोदी की देखरेख में गुजरात में सन २००२ का ऐतिहासिक नरसंहार सम्पन्न हुआ जिसमें राजसत्ता के सभी अंगों ने अभूतपूर्व तालमेल का परिचय दिया और भारत में भावी फ़ासिज़्म क्या शक्ल लेगा इसकी झाँकी दिखाई। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, निजीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण के तहत इसी हिन्दू फ़ासिस्ट मॉडल को विकास के अनुकरणीय आदर्श की तरह पेश किया जाता रहा है।

आज हिन्दुस्तान में संसाधनों की कारपोरेट लूट लूट नहीं राजकीय नीति के संरक्षण में क्रियान्वित की जाने वाली हथियारबंद व्यवस्था है। भारतीय राज्य का राष्ट्रवाद अवामी नहीं, दमनकारी पुलिसिया राष्ट्रवाद है, अर्धसैनिक और सैनिक ताक़त पर आश्रित राष्ट्रवाद है। यह अपनी ही जनता के विरुद्ध खड़ा राष्ट्रवाद है। वैसे तो सर्वत्र लेकिन उत्तरपूर्व, छत्तीसगढ़ और कश्मीर में सुबहो-शाम इसका असल रूप देखा जा सकता है। आर्थिक नीति, सैन्यीकृत राष्ट्रवाद और शासन-व्यवस्था के मामलों में कांग्रेस और भाजपा में कोई अन्तर नहीं है। फ़ासिज्‍़म के उभार में इमरजेम्सी के ज़माने से ही दोनों का साझा रहा है। हिन्दुस्तान में फ़ासिज़्म के उभार का पिछली सदी में उभरे योरोपीय फ़ासिज़्म से काफ़ी साम्य है। जर्मन नात्सीवाद के नक़्शे क़दम पर चल रहा है। वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा । बड़ा फ़र्क़ बस यह है कि भारतीय मीडिया और मध्यवर्ग इसी चीज़ को छिपाने में जी-जान से लगा है। फ़ासिज़्म फ़ासिज़्म न होकर कभी विकास हो जाता है कभी दंगा, गुजरात का नस्ली सफ़ाया गोधरा कांड की प्रतिक्रिया हो जाता है, मुज़फ़्फ़रनगर की व्यापक हिंसा जाट-मुस्लिम समुदायों की आपसी रंजिश का नतीजा या कवाल कांड की प्रतिक्रिया बन जाती है। हमारे बुद्धिजीवी विषयांतर में अपनी महारत दिखाकर इस फ़ासिज़्म को मज़बूत बनाए दे रहे हैं।

इस दुष्चक्र को तोड़ने का एक ही तरीक़ा है इन ताक़तों से सीधा सामना, हर स्तर पर सामना। और समय रहते हुए सामना। अपने रोज़मर्रा में हर जगह हस्तक्षेप के मूल्य को पहचानना। ऐसी सक्रिय नागरिकता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। सबसे ज़्यादा ज़रूरी है आज व्यवस्था के सताये हुए अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई), दलित और आदिवासी के साथ मज़बूती से खड़े होने की। अगर वाम शक्तियाँ और ग़ैर-दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी वर्ग प्रतिबद्धता से यह कर सकें तो फ़ासिज़्म की इमारतें हिल जाएँगी और उनके आधे मन्सूबे धरे रह जाएँगे। इस समय ज़रूरत है फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ व्यापक वाम और अवामी एकता की -- अगर यह एकता राजनीतिक शऊर और ज़मीर से समझौते की माँग करे तो भी। बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी का काम इससे बाहर नहीं है।
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 `प्रभात खबर` दीवाली विशेषांक से साभार

Monday, November 18, 2013

मुज़फ़्फ़रनगर के ओमप्रकाश वाल्मीकि


ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ़्फ़रनगर जिले के थे और इस तरह एक चलन की तरह मैं कह सकता हूं कि यह मेरी निजी क्षति है। कहने को मुज़फ़्फ़रनगर की `साहित्यिक?` संस्थाएं भी ऐसे बयान अखबारों के लोकल पन्नों पर छपवा सकती हैं कि यह उनकी और मुज़फ़्फ़रनगर की `अपूर्णीय क्षति` है। लेकिन, सच यह है कि वे दिल्ली-देहरादून राजमार्ग पर मुज़फ़्फ़रनगर जिला मुख्यालय के पास ही स्थित बरला गांव में पले-बढ़े होने के बावजूद न मुज़फ़्फ़रनगर के ताकतवर सामाजिक-सांस्कृतिक मिजाज का प्रतिनिधित्व करते थे और न खुद को साहित्य-संस्कृति की संस्था कहने वाले स्थानीय सवर्ण नेतृत्व वाले जमावड़ों का। ऊपर से कोई कुछ भी कहे, इन संस्थाओं के हालचाल, इनकी नातियों, एजेंडों और इनकी किताबों को देखते ही पता चल जाएगा कि वाल्मीकि जी बचपन के प्राइमरी स्कूल के त्यागी मास्टर की तरह इनके लिए भी `अबे चूहडे के` ही बने रहे। जिन संस्थाओं ने कवि सम्मेलनों के मंच पर ज़िंदगी भर अश्लील-फूहड़ चुटकुलेबाजी करने वाले सत्यदेव शास्त्री भोंपू को हास्यारसावतार बताकर उसकी पालकी ढ़ोई हो और जहां कभी जाति, वर्ग और दूसरे यथार्थवादी सवालों पर बहस आते ही इस्तीफों और निष्कासन की नौबत आ जाती हो, जिन संस्थाओं की सालाना किताबें फूहड़ ब्राह्मणवादी, स्त्री विरोधी और उन्मादी और दक्षिणपंथी सामग्री से भरी रहती हों, वहां वाल्मीकि जी को आयकन होना भी नहीं चाहिए था।

लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि से परिचय से पहले स्कूली दिनों मैंने शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा `अक्करमाशी` के बारे में किसी अखबार के इतवारी पन्ने पर पढ़ा था और किसी तरह दिल्ली पहुंचकर यह किताब हासिल भी कर ली थी। इस किताब ने दिल-दिमाग में तूफान खड़ा कर दिया था। जूठन चूंकि अपने ही आसपास की `कहानी` थी, उसे पढ़ने पर बेचैनी और ज्यादा बढ़ जाना स्वाभाविक था। मैंने कई लोगों को बड़ी बेशर्मी से यह कहते भी सुना कि मेलोड़्रामा पैदा कर किताब बेचने का यह बढ़िया तरीका है। इनमें एक सज्जन गाहे-बगाहे दलितों के प्रति भावभीने उद्गार सुनाने में प्रवीण थे। मैंने कहा कि कौन नहीं जानता कि इसमें लिखा एक-एक शब्द सही है और गांव का नाम बदलने और मास्टर से पहले त्यागी की जगह जाट, राजपूत वगैरहा ऐसा कोई दूसरा `ताकतवर शब्द` जोड़ देने से भी उतना ही सही रहता है।

1992 के बाद के किसी साल वाल्मीकि जी मुज़फ़्फ़रनगर के लेखकों के पास रुके होंगे। मुझे अगले दिन `अमर उजाला` में पहुंची `वाणी` नाम की एक संस्था की प्रेस विज्ञप्ति से यह पता चला। उन्होंने गोष्ठी में क्या कहा, स्थानीय लेखकों से उनकी क्या बातचीत हुई, इस बारे में विज्ञप्ति में कोई शब्द नहीं था। मैंने उनके कार्यक्रम की कोई पूर्व सूचना न देने और विज्ञप्ति में उनकी कही बातों का जिक्र तक न होने पर नाराजगी जताई तो वाणी के एक जिम्मेदार पदाधिकारी ने बताया कि वे तो बस यूं ही आए थे, मुलाकात हुई, कुछ बातें हुईं। पिछले साल इसी संस्था की सालाना किताब के संपादन की जिम्मेदारी एक दलित युवक को दी गई थी जिसने `समन्वय` उनवान को सार्थक बनाने के लिए पूरा समर्पण कर रखा था। तो भी संस्था के सवर्ण संचालकों को जाने क्या नागवार गुजरा कि इस बरस शर्त बना दी गई कि रचनाएं शोधपरक न हों और सद्भाव बिगाड़ने वाली न हों। तो मुझे लगता है कि उस दिन बाल्मीकि जी की बातें `सद्भाव की हिफाजत` करने के लिहाज से ही जारी नहीं की गई होंगी।

मेरे लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की `जूठन` मेरे `घर` के यथार्थ को सामने रखने वाली किताब थी और वे इस जिले की उन हस्तियों की तरह मेरे लिए गौरव की वजह थे जिन्हें मुख्यधारा या तो भुलाए रखती है या याद भी करती है तो इस तरह कि उनकी ज़िंदगी और उनके कामों के जिक्र से कथित सद्भाव में कोई खलल न पड़े। वाल्मीकि जी ने कई उल्लेखनीय कविताएं और कहानियां लिखीं पर `जूठन` के साथ कुछ ऐसा रहा कि वह मेरे पास कभी नहीं रह सकी। मैं इस किताब को हमेशा किसी को पढ़ने के लिए देता रहा और मौका लगते ही फिर-फिर खरीदता रहा। `अमर उजाला` ने करनाल भेज दिया तो वहां रंगकर्मी युवक अमित नागपाल ने `जूठन` के कुछ हिस्सों की अनेक बार एकल प्रस्तुति दी। तरह-तरह के तर्क देकर इस मंचन को रोकने की कोशिशें बार-बार की गईं। युवा महोत्सव में यह तर्क दिया गया कि एक अकेले कलाकार की प्रस्तुति को सामूहिकता दर्शाने वाले कार्यक्रम में नहीं होना चाहिए। कॉलेजों के ऐसे जाहिल और धूर्त मास्टरों-`कला-संरक्षकों` को उनकी असल चिढ़ का कारण बताकर हम लोगों ने हमेशा चुप भी कराया।

संयोग से वाल्मीकि जी से एकमात्र मुलाकात कुछ बरस पहले रोहतक में एक सेमिनार में हुई थी। उनकी कई बातों से मैं सहमत नहीं था बल्कि कई बातों से हैरान था। सीपीआईएम से जुड़े लोगों और बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड़े एक अध्यापक व उनके कार्यकर्ताओं के रवैये से सेमिनार में सवाल-जवाब का मौका भी नहीं मिल सका। मैं उनसे फिर कभी मिलकर विस्तार से बहुत सारी बातें करना चाहता था। उन्हें लम्बे समय से पसंद करने की अपनी वजहें एक आम कस्बाई पाठक की तरह बताना चाहता था और उनसे अपनी असहमतियों और सामने खड़े खतरों पर चर्चा करना चाहता था। इन दिनों जबकि मुज़फ़्फ़रनगर उन्हीं मनुवादी ताकतों की साम्प्रदायिक चालों का शिकार हो रहा हो, जिनके खिलाफ संघर्ष से उनका लेखन निकला था, ये बातें और भी ज्यादा जरूरी लग रही थीं। मुझे उम्मीद थी कि वे ठीक होकर फिर से सक्रिय होंगे।

`जनसंदेश टाइम्स` अखबार में आज 18 नवंबर को प्रकाशित।
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और मुज़फ़्फ़रनगर के ही रहने वाले कवि-मित्र परमेंद्र सिंह की फेसबुक पर इस पोस्ट पर आई टिपण्णी के बिना ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुज़फ़्फ़रनगर के साहित्यिक समाज के रिश्ते की यह गाथा अधूरी रह जाती। इसलिए वह टिपण्णी यहां भी साझा कर रहा हूं-`ओमप्रकाश वाल्मीकि का निधन एक बहुत बड़ी क्षति है पूरे हिंदी समाज के लिए. जहाँ तक मुज़फ्फरनगर से उनके सम्बन्ध का सवाल है, तो मुज़फ़्फ़रनगर की साहित्यिक संस्थाएं जिस तरह से अन्य मूर्धन्यों का नाम लेकर आत्मगौरव के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करती रही हैं, करती रहेंगी. ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ्फरनगर आये थे 'वाणी' संस्था के वार्षिक संकलन 'तारतम्य' (सम्पादक - नेमपाल प्रजापति) के विमोचन के लिए. समारोह में उनके वक्तव्य में प्रसाद, प्रेमचंद, पन्त पर की गयीं उनकी टिप्पणियों से अग्रिम पंक्ति में बैठे डिग्री कॉलेज के हिंदी विभागों के अध्यक्ष, रीडर, प्रोफेसर वगैरह जिन्होंने साहित्यकार होने का सर्टिफिकेट देने का ठेका उठा रखा ही, कैसे उछल-उछल पड़े थे तिलमिलाकर, देखते ही बनता था. प्रोफेसर साहिबान के कुछ शिष्यों ने तो बाकायदा नारेबाजी तक की थी. हम कुछ लोगों ने मिलकर उन उपद्रवी शिष्यों पर बामुश्किल काबू पाया था. उक्त संकलन में शामिल किया गया 'दलित खंड' ही दरअसल में उन लोगों की आँख की किरकिरी बन गया था, और बना भी रहा... हमारा यह प्रतिरोध बना रहा और अंततः हम तीन मित्रों ने उस संस्था से किनारा कर लिया... खैर, उस गोष्ठी के बाद भाई Ashwani Khandelwal के घर पर 'प्रोफेसरों के साथ चाय पर भी बड़ी गरमा-गरम बहस हुई... एक प्रोफेसर ने अंत में कहा - दलितों को बराबरी का दर्जा देते हुए हमारे संस्कार आड़े आते हैं.`

Friday, November 15, 2013

ख्वाजादास के पद वाया मृत्युंजय



पिछले कुछ दिनों से वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी पर महाकवि ख्वाजादास की कृपा बनी हुई है। खुशी की बात यह है कि अब वे हमारे एक और बेहतरीन हिंदी कवि मृत्युंजय पर भी नाजिल हुए हैं। उन्होंने जो फरमाया, वह मृत्युंजय भाई की ही जुबानी-
 


[ख्वाजादास से असद जी ज़ैदी साहब ने तआररूफ़ करवाया था। असद जी की साखी पर मुझ नाचीज पर भी उनकी अहेतुक कृपा बरसी।]

[क]
सुबकत-अफनत ख्वाजादास !
नैहर-सासुर दोनों छूटा टूटी निर्गुनिये से आस
लतफत लोर हकासल चोला बीच करेजे अटकी फांस
गगने-पवने, माटी-पानी, अगिन काहु पर नहिं बिस्वास
थहकल गोड़ रीढ़ पर हमला जुद्धभूमि में उखड़ी  सांस  
सुन्न सिखर पर जख्म हरियरा फूलन लागे चहुंदिस बांस 
जेतने संगी सब मतिभंगी नुचड़ी-चिथड़ी दिखे उजास
बिरिछे बिरिछे टंगी चतुर्दिक फरहादो शीरीं की लाश

[ख]
ख्वाजादास पिया नहिं बहुरे !
नैनन नीर न जीव ठेकाने कथा फेरु नहिं कहु रे
यह रणभूमि नित्यप्रति खांडा गर्दन पे लपकहु रे 
ज़ोर जुलुम तन-मन-धन लूटत, जेठे कभु कभु लहुरे
कवन राहि तुम बिन अवगाहों खाय मरो अब महुरे
जहर तीर बेधत हैं तन-मन अगिन कांट करकहु रे
तुम्हरी आस फूल गूलर कै मन हरिना डरपहु रे
नाहिं कछू, हम कटि-लड़ि मरबों पाछे जनि आवहु रे

[ग]
ख्वाजा का पियवा रूठा रे !
भीतर धधकत मुंह नहिं खोलत दुबिधा परा अनूठा रे
आवहु सखि मिलि गेह सँभारो गुरु के छपरा टूटा रे
कोही कूर कुचाली कादर कुटिल कलंकी लूटा रे  
जप तप जोग समाधि हकीकी इश्क कोलाहल झूठा रे
पछिम दिसा से चक्रवात घट-पट-पनघट सब छूटा रे
मन महजिद पे मूसर धमकत राई-रत्ता कूटा रे   
सहमा-सिकुड़ा-डरा देस का पत्ता, बूटा-बूटा रे  

[घ]
ख्वाजा, संत बजार गये !
बधना असनी रेहल माला सब कुछ यहीं उतार गये
जतन से ओढ़ी धवल कामरी कचड़ा बीच लबार गये 
जनम करम की नासी सब गति करने को व्योपार गये
छोड़ि संग लकुटी-कामरि को हाथ लिये ज्योनार गये
नेम पेम जप जोग ज्ञान सब झोंकि आगि पतवार गये
हड़बड़ तड़बड़ लंगटा-लोटा बीच गली में डार गये
नये राज की नयी नीत के सिजदे को दरबार गये
 
[ङ]
ख्वाजा कहा होय अफनाये !
राजनीति बिष बेल लहालह धरम क दूध पियाये
देवल महजिद पण्य छापरी पंडित - मुल्ला छाये
सतचितसंवेदन पजारि के कुबुधि फसल उपजाये
देस पीर की झोरी - चादर साखा मृग नोचवाये
मन भीतर सौ-सौ तहखाना घृणा प्रपंच रचाये
दुरदिन दमन दुक्ख दरवाजे दंभिन राज बनाये
सांवर सखी संग हम रन में जो हो सो हो जाये

(ऊपर पेटिंग जाने-माने चित्रकार मनजीत बावा की है।)

Saturday, November 2, 2013

सुधीश पचौरी की उत्तर आधुनिक बेशर्मी



वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल कैंसर से जूझ रहे हैं, पूरी ज़िंदादिली के साथ। उनके दोस्तों और उन्हें चाहने वालों ने अपने इस प्यारे कवि को पिछले दिनों एक कार्यक्रम आयोजित कर दिल्ली बुलाया था। जाने क्यों यह बात सुधीश पचौरी को हज़म नहीं हुई और उन्होंने `हिन्दुस्तान` अख़बार में में वमन कर डाला। जनवाद के नाम पर मलाई चाटने के बाद वक़्त बदलते ही `आधुनिक-उत्तर आधुनिक` होकर वामपंथ को कोसने और हर बेशर्मी को जायज ठहराने के धंधे में जुटे शख्स की ऐसी घिनौनी हरकत पर हैरानी भी नहीं है। `समयांतर` के `दिल्ली मेल` स्तंभ में इस बारे में एक तीखी टिप्पणी छपी है जिसे यहां साझा किया जा रहा है। 


शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता
पहले यह टिप्पणी देख लीजिए:
''एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले वह उन थोड़े से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई। फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाज पुरसी की ओर आ गई। थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी व शरारत अब भी वैसी ही है। (क्या गजब 'फेस रीडिंग` है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर)। हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों से सुना, तो लगा कि यार ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं तो क्या वे बुजुर्ग चमचे आप के डाक्टर हैं जो दवा दे रहे हैं। लेकिन 'चमचई` में ऐसे सवाल पूछना मना है।``
यह टुकड़ा 'ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!` शीर्षक व्यंग्य का हिस्सा है जो दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को छपा था। इस व्यंग्य की विशेषता यह है कि यह एक ऐसे व्यक्ति को निशाना बनाता है जो एक दुर्दांत बीमारी से लड़ रहा है। हिंदी के अधिकांश लोग जानते हैं कि वह कौन व्यक्ति है। दुनिया में शायद ही कोई लेखक हो जो बीमार पर व्यंग्य करने की इस तरह की निर्ममता, रुग्ण मानसिकता और कमीनापन दिखाने की हिम्मत कर सकता हो।
पर यह कुकर्म सुधीश पचौरी ने किया है जिसे अखबार 'हिंदी साहित्यकार` बतलाता है। हिंदीवाले जानते हैं यह व्यक्ति खुरचनिया व्यंग्यकार है जिसकी कॉलमिस्टी संबंधों और चाटुकारिता के बल पर चलती है।
इस व्यंग्य में उस गोष्ठी का संदर्भ है जो साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित सबसे महत्त्वपूर्ण समकालीन जन कवि वीरेन डंगवाल को लेकर दिल्ली में अगस्त में हुई थी। वह निजी व्यवहार के कारण भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि कवि के रूप में। वीरेन उन साहसी लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी बीमारी के बारे में छिपाया नहीं है। वह कैंसर से पीडि़त हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। पिछले ही माह उनका आपरेशन भी हुआ है।
हम व्यंग्य के नाम पर इस तरह की अमानवीयता की भत्र्सना करते हैं और हिंदी समाज से भी अपील करते हैं कि इस व्यक्ति की, जो आजीवन अध्यापक रहा है,  निंदा करने से न चूके। यह सोचकर भी हमारी आत्मा कांपती है कि यह अपने छात्रों को क्या पढ़ाता होगा। हम उस अखबार यानी हिंदुस्तान और उसके संपादक की भी निंदा करते हैं जिसने यह व्यंग्य बिना सोचे-समझे छपने दिया। हम मांग करते हैं कि अखबार इस घटियापन के लिए तत्काल माफी मांगे और इस स्तंभ को बंद करे।
पर कवि वीरेन डंगवाल पर यह अक्टूबर में हुआ दूसरा हमला था। ऐन उसी दिन जनसत्ता में 'पुरस्कार लोलुप समय में` शीर्षक लेख छपा और उसमें अकारण वीरेन को घसीटा गया कि उन्हें किस गलत तरीके से साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। लेखक यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया कि वह इसके लायक नहीं थे। पर अरुण कमल और लीलाधर जगूड़ी जैसे अवसरवादियों को यह पुरस्कार क्यों और किस तरह मिला इस पर कोई बात नहीं की गई(क्योंकि वे अकादेमी के सदस्य हैं)। पर सबसे विचित्र बात यह है कि इस लेख के लेखक ने यह नहीं बतलाया कि साहित्य अकादेमी के इतिहास में अब तक का सबसे भ्रष्ट पुरस्कार अगर किसी को मिला है तो वह उदय प्रकाश को मिला है जो तत्कालीन उपाध्यक्ष और वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कारण दिया गया। यह पुरस्कार यही नहीं कि रातों-रात एक खराब कहानी को उपन्यास बनाकर दिया गया बल्कि इसे लेने के लिए गोरखपुर के हिंदू फासिस्ट नेता आदित्यनाथ के दबाव का भी इस्तेमाल किया गया।
इस के दो कारण हो सकते हैं। पहला वामपंथियों पर किसी न किसी बहाने आक्रमण करना और दूसरा लेखक ही नहीं बल्कि अखबार का संपादक भी अकादेमी के टुकड़ों से लाभान्वित होता रहता है और अगले चार वर्षों तक होता रहेगा।
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समयांतर के नवंबर, 2013 अंक से साभार


(इस बारे में HT media ltd की चेयरपर्सन शोभना भरतिया को पत्र मेल कर भेजकर विरोेध भी जताया गया था।)

Wednesday, October 30, 2013

विचारधारा ही ज़बान और बयान को तय करती है - असद ज़ैदी


`प्रभात खबर` अख़बार में छपा वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी का इंटरव्यू

‘कविता’ आपके लिए क्या है?

कविता समाज में एक आदमी के बात करने का तरीक़ा है। पहले अपने आप से, फिर दोस्तों से, तब उनसे जिनके चेहरे आप नहीं जानते, जो अब या कुछ बरस बाद हो सकता है आपकी रचना पढ़ते हों। कविता समाज को मुख़ातिब करती बाहरी आवाज़ नहीं, समाज ही में पैदा होने वाली एक आवाज़ है। चाहे वह अंतरंग बातचीत हो, उत्सव का शोर हो या प्रतिरोध की चीख़। यह एक गंभीर नागरिक कर्म भी है। एक बात यह भी है कि कविता आदमी पर अपनी छाप छोड़ती है - जैसी कोई कविता लिखता है वैसा ही कवि वह बनता जाता है और किसी हद तक वैसा ही इन्सान।


लेखन की शुरुआत स्वत: स्फूर्त थी या कोई प्रेरणा थी?

खुद अपने जीवन को उलट पुलटकर देखते, और जो पढ़ने, सुनने और देखने को मिला है उसे संभालने से ही मैं लिखने की तरफ़ माइल हुआ। घर में तालीम की क़द्र तो थी पर नाविल पढ़ने, सिनेमा देखने, बीड़ी सिगरेट पीने, शेरो-शाइरी करने, गाना गाने या सुनने को बुरा समझा जाता था। यह लड़के के बिगड़ने या बुरी संगत में पड़ने की अलामतें थीं। लिहाज़ा अपना लिखा अपने तक ही रहने देता था। पर मिज़ाज में बग़ावत है, यह सब पर ज़ाहिर था।


आपने शुरुआत कहानी से की थी फिर कविता की ओर आये. कविता विधा ही क्यों?

शायद सुस्ती और कम लागत की वजह से। मुझे लगता रहता था असल लिखना तो कविता लिखना ही है। यह इस मानी में कि कविता लिखना भाषा सीखना है। कविता भाषा की क्षमता से रू-ब-रू कराती है, और उसे किफ़ायत से बरतना भी सिखाती है। कविता एक तरह का ज्ञान देती है, जो कथा-साहित्य या ललित गद्य से बाहर की चीज़ है। वह सहज ही दूसरी कलाओं को समझना और उनसे मिलना सिखा देती है। हर कवि के अंदर कई तरह के लोग - संगीतकार, गणितज्ञ, चित्रकार, फ़िल्मकार, कथाकार, मिनिएचरिस्ट, अभिलेखक, दार्शनिक, नुक्ताचीन श्रोता और एक ख़ामोश आदमी - हरदम मौजूद होते हैं।


अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएं.

मैं अक्सर एक मामूली से सवाल का जवाब देना चाहता हूँ। जैसे : कहो क्या हाल है? या, देखते हो? या, उधर की क्या ख़बर है? या, तुमने सुना वो क्या कहते हैं? या, तुम्हें फ़लाँ बात याद है? या, यह कैसा शोर है? जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, मेरे प्रस्थान बिंदु ऐसे ही होते हैं। कई दफ़े अवचेतन में बनती कोई तस्वीर या दृश्यावली अचानक दिखने लगती है जैसे कोई फ़िल्म निगेटिव अचानक धुलकर छापे जाना माँगता हो। मिर्ज़ा ने बड़ी अच्छी बात कही है - 'हैं ख़्वाब में हनोज़ जो जागे हैं ख़्वाब में।'

दरअसल रचना प्रक्रिया पर ज़्यादा ध्यान देने से वह रचना प्रक्रिया नहीं रह जाती, कोई और चीज़ हो जाती है। यह तो बाद में जानने या फ़िक्र में लाने की चीज़ है। यह काम भी रचनाकार नहीं, कोई दूसरा आदमी करता है - चाहे वह उसी के भीतर ही बैठा हो - जो रचना में कोई मदद नहीं करता।

मुक्तिबोध से बेहतर चिंतन इस मामले में किसी ने नहीं किया, वह इन मामलात की गहराई में गए थे। 'कला का तीसरा क्षण' निबंध और 'बाह्य के आभ्यंत्रीकरण' और 'अभ्यन्तर के बाह्यकरण' का चक्रीय सिद्धान्त जानने और समझने की चीज़ें हैं। लेकिन मुझे यक़ीन है कवि के रूप में मुक्तिबोध 'तीसरे क्षण' के इन्तिज़ार में नहीं बैठे रहते थे।


अपनी रचनाशीलता का अपने परिवेश, समाज और परिवार से किस तरह का संबंध पाते हैं?

संबंध इस तरह का है कि 'दस्ते तहे संग आमदः पैमाने वफ़ा है' (ग़ालिब)। मैं इन्ही चीज़ों के नीचे दबा हुआ हूँ, इनसे स्वतंत्र नहीं हूँ। लेकिन मेरे लेखन से ये स्वतंत्र हैं, यह बड़ी राहत की बात है।


क्या साहित्य लेखन के लिए किसी विचारधारा का होना जरूरी है?

पानी में गीलापन होना उचित माना जाए या नहीं, वह उसमें होता है। समाज-रचना में कला वैचारिक उपकरण ही है - आदिम गुफाचित्रों के समय से ही। विचारधारा ही ज़बान और बयान को तय करती है, चाहे आप इसको लेकर जागरूक हों या नहीं। बाज़ार से लाकर रचना पर कोई चीज़ थोपना तो ठीक नहीं है, पर नैसर्गिक या रचनात्मक आत्मसंघर्ष से अर्जित वैचारिक मूल्यों को छिपाना या तथाकथित कलावादियों की तरह उलीचकर या बीनकर निकालना बुरी बात है। यह उसकी मनुष्यता का हरण है। और एक झूटी गवाही देने की तरह है।


आप अपनी कविताओं में बहुत सहजता से देश और दुनिया की राजनीतिक विसंगतियों को आम आदमी की जिंदगी से जोड़ कर एक संवाद पेश करते हैं. क्या आपको लगता है कि मौजूदा समय-समाज में कवि की आवाज सुनी जा रही है?

मौजूदा वक़्त ख़राब है, और शायद इससे भी ख़राब वक़्त आने वाला है। यह कविता के लिए अच्छी बात है। कविकर्म की चुनौती और ज़िम्मेदारी, और कविता का अंतःकरण इसी से बनता है। अच्छे वक़्तों में अच्छी कविता शायद ही लिखी गई हो। जो लिखी भी गई है वह बुरे वक़्त की स्मृति या आशंका से कभी दूर न रही। जहाँ तक कवि की आवाज़ के सुने जाने या प्रभावी होने की बात है, मुझे पहली चिन्ता यह लगी रहती है कि दुनिया के हंगामे और कारोबार के बीच क्या हमारा कवि ख़ुद अपनी आवाज़ सुन पा रहा है? या उसी में एबज़ॉर्ब हो गया है, सोख लिया गया है? अगर वह अपने स्वर, अपनी सच्ची अस्मिता, अपनी नागरिक जागरूकता को बचाए रख सके तो बाक़ी लोगों के लिए भी प्रासंगिक होगा।


आपके एक समकालीन कवि ने लिखा है (अपनी उनकी बात: उदय प्रकाश) आपके साथ ‘हिंदी की आलोचना ने न्याय नहीं किया.’ क्या आपको भी ऐसा लगता है? इसके पीछे क्या वजहें हो सकती हैं?

मैं अपना ही आकलन कैसे करूँ! या क्या कहूँ? ऐसी कोई ख़ास उपेक्षा भी मुझे महसूस नहीं हुई। मेरी पिछली किताब मेरे ख़याल में ग़ौर से पढ़ी गई और चर्चा में भी रही। कुछ इधर का लेखन भी। इस बहाने कुछ अपना और कुछ जगत का हाल भी पता चला।


लेखन से जुड़े पुरस्कारों को कितना अहम मानते हैं एक लेखक के लिए?

मुझे अपने मित्र पंकज चतुर्वेदी की कविता 'कृतज्ञ और नतमस्तक' की याद आ रही है। यह कालजयी रचना बहुत थोड़े शब्दों में वह सब कह देती है जो इस मसले पर कहा जा सकता है।


कृतज्ञ और नतमस्तक
पंकज चतुर्वेदी

सत्ता का यह स्वभाव नहीं है
कि वह योग्यता को ही
पुरस्कृत करे
बल्कि यह है
कि जिन्हें वह पुरस्कृत करती है
उन्हें योग्य कहती है

अब जो पुरस्कृत होना चाहें
वे चाहे ख़ुद को
और पूर्व पुरस्कृतों को
उसके योग्य न मानें
मगर यह मानें
कि योग्यता का निश्चय
सत्ता ही कर सकती है

अंत में योग्य
सिर्फ सत्ता रह जाती है
और जो उससे पुरस्कृत हैं
वे अपनी-अपनी योग्यता पर
संदेह करते हुए
सत्ता के प्रति
कृतज्ञ और नतमस्तक होते हैं
कि उसने उन्हें योग्य माना


आप अपनी सबसे प्रिय रचना के तौर पर किसका जिक्र करना चाहेंगे?

इस बारे में राय बदलता रहता हूँ, किसी समय कोई कविता ठीक लगती है किसी और समय दूसरी। मेरे दोस्तों से पूछिए तो कहेंगे मेरी ज़्यादातर रचनाएँ अप्रिय रचनाएँ हैं। यह भी ठीक बात है। उन लोगों को जो पसन्द हैं - या सख़्त नापसंद हैं - वे कविताएँ हैं : बहनें, संस्कार, आयशा के लिए कुछ कविताएँ, पुश्तैनी तोप, दिल्ली दर्शन, कविता का जीवन, अप्रकाशित कविता, सामान की तलाश, आदि।


इन दिनों क्या नया लिख रहे हैं? और लेखन से इतर क्या, क्या करना पसंद है?

कुछ ख़ास नहीं। वही जो हमेशा से करता रहा हूँ। मेरी ज़्यादातर प्रेरणाएँ और मशग़ले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं, लेकिन मेरा दिल साहित्य में भी लगा रहता है। समाजविज्ञानों से सम्बद्ध विषयों पर "थ्री एसेज़" प्रकाशनगृह से किताबें छापने का काम करता हूँ। और अपना लिखना पढ़ना भी करता ही रहता हूँ। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, ख़ासकर ख़याल गायकी, सुनते हुए और विश्व सिनेमा देखते हुए एक उम्र गुज़ार दी है।


ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ़ने के बाद ज़ेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?

चलते चलते ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते। मैं पुराना पाठक हूँ। जवाब देने बैठूँ तो बक़ौल शाइर - 'वो बदख़ू और मेरी दास्ताने-इश्क़ तूलानी / इबारत मुख़्तसर, क़ासिद भी घबरा जाए है मुझसे।' कुछ आयतें जो बचपन में रटी थीं और अन्तोन चेख़व की कहानी 'वान्का' जो मैंने किशोर उम्र में ही पढ़ ली थीं ज़ेहन में नक़्श हो गईं हैं। इसके बाद की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है।
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`प्रभात खबर ` में इस बातचीत के कुछ पैराग्राफ नहीं हैं।

Saturday, October 19, 2013

हिटलर के यातना शिविर हैं ये गांव- शंबूक

देसां म्हैं देस हरियाणा जित......

30 मार्च, शनिवार तक़रीबन शाम साढ़े 5 बजे के आस-पास का बात है, जब मदीना गांव, भैराण रोड़ नहर पर दबंग जाति के लोगों द्वारा खेतों में मेहनत-मजूरी करके लौट रहे दलितों के साथ जमकर ख़ून की होली खेली गई। ताक़तवर दबंग जाति के ये बिगड़े हुए शोहदे बकायदा योजनाबद्ध तरीके से, हथियारों से लैस होकर, नहर के पास झाड़ियों में घात लगाए बैठे थे। दलित मज़दूरों में महिलाएं भी थीं और बच्चे भी। दिन भर की कड़ी मेहनत और पसीने से रवां शरीर, मज़दूरी ख़त्म होने के बाद जब शाम को सूरज ढल रहा होता है, दोबारा से नई ताज़गी हासिल कर लेता है। क्योंकि इस बात का इत्मीनान होता है कि आाज का काम ख़त्म। चेहरे पर मेहनत की लकीरें चुहलबाज़ी करने लगती हैं और हल्की-फुल्की चुटकियां लेते मज़दूर घर को लौटने लगते हैं। इसी वक़्त परींदे भी अपने घोंसलों को लौटते हैं। ये दलित परीवार भी इसी तरह अपने घर को लौट रहा था। इस बात से अनभिज्ञ कि नहर पर मौत उनका इंतज़ार कर रही है।
जैसे ही दलितों की बुग्गी नहर पर पहुंची, बदमाशों ने हमला बोल दिया। अंधाधुंध फायरिंग कर दी। एक 10 साल के बच्चे के सिर में गोली लगी और बच्चा ख़ून से लथपथ तड़पने लगा। एक नौजवान की छाती में गोली लगी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। एक नौजवान की जांघ में गोली लगी जो आज भी मेडिकल में ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है। महिलाओं और लड़कियों ने खेतों में भागकर, छिपकर अपनी जान बचाई।
हादसे का कारण ये है कि दलितों ने बस्ती में महिलाओं के साथ बदसलूकी करने वाले दबंग जाति के इन बदमाशों को टोक दिया था। ये घटना कोई 8-9 महीने पहले की है। दबंग जाति के ये नौजवान एक मरतबा रात को जबरन एक दलित परिवार के घर में घुस गये अैर महिलाओं के साथ बदतमीज़ी करने लगे तो दलितों ने उसकी जमकर पिटाई की। गौरतलब है कि दलित बस्ती में गांव के सरपंच ने अपना अड्डा बना रखा है जहां दिन-रात लफंगे पड़े रहते है। शराब पीते हैं, अय्याशी करते हैं और कहीं भी खड़े होकर पेशाब करने लगते हैं। पानी भरने या अन्य किसी काम से भीतर-बाहर जाने वाली लड़कियों के साथ बदतमीज़ी करते हैं। शौच के लिये बाहर जाना पड़ता है, इस वक़्त महिलाओं को तंग किया जाता है और जोर-जबरदस्ती तक की नौबत आ जाती है। इन लफंगों ने पहले भी कई बार बस्ती में महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की है और कहासुनी हुई है। ये मामला 8-9 महीने पुराना है। इस दरम्यान पुलिस थाने में भी कई बार इतिल्ला दी गई लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नही की। आज गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है और दलित ख़ौफ के साये में हैं।
ऐसा ही सन्नाटा उस वक़्त पसरा था जब दलितों ने दबंग जाति के नौजवान की पिटाई की थी। तब जाटों ने योजना बनाई थी कि दलितों को गांव से खदेड़ दिया जाये। लेकिन गांव के ही एक पूर्व चेयरमैन और ज़िला प्रशासन के हस्तक्षेप से बड़ा हादसा टल गया था। बहरहाल उसी मौके पर लड़के ने भरी पंचायत में ऐलान कर दिया था कि मैं जेल से छूटते ही इन (दलित) लोगों को क़त्ल करूंगा। अभी कुछ दिन हुये ये लड़का जेल से छूटकर आया था। इसने आते ही अन्य बदमाशों को इकठ्ठा किया, गैंग बनाया और दलितों की बर्बरतापूर्ण हत्या कर दी। गांव के लोंगों का मानना है कि अगर पुलिस समय रहते कार्रवाई करती तो ये हादसा टल सकता था।
गौरतलब है कि हरियाणा में ये कोई पहली घटना नही है और ना ही मदीना में पहली घटना है। मदीना में पहले भी दबंगों ने एक दलित की हत्या की थी और पंचायत आदि करके मामले को रफा-दफा कर दिया गया था। जाटों ने पीड़ित परिवार को मुआवज़ा देने की बात तय की थी लेकिन गांव गवाह है कि आज तक कोई मुआवज़ा नही दिया गया। इसके अलावा गाहे-बगाहे दलितों के साथ मारपीट आम है। एक बार एक दबंग जाति के किसान ने दलितों की ‘चैहनी’ शमशानघाट पर कब्ज़ा कर लिया था और मात्र थोड़ी सी ज़मीन छोड़ दी। दलित बस्ती के लोग इकठ्ठा होकर तुरंत मौके पर पहुंचे तब शमशान घाट पर बाड़ की जा रही थी। दलितों ने ऐतराज़ जताया तो उन्होंने बहुत बेहूदा और घटिया अंदाज़ में कहा था कि ‘‘के सारे चूड़े कठ्ठे मरोगे, जो इतना बड़ा शमशान घाट चाहिये।’’
रविदास जयंति पर मदीना गांव में ही कुछ दबंग जाति के नौजवान जानबूझकर बार-बार महिलाओं में घुस रहे थे। वहीं पर पास में कढ़ाई चढा रखी थी, प्रसाद के लिये। कुछ नौजवान वहां बैठकर सब्ज़ी काट रहे थे, आलू वगैरह छील रहे थे। इन दलित नौजवानों ने जब उन लफंगों को टोका तो उन्होंने चाकू से हमला कर दिया। जिसमें तीन नौजवान घायल हुए। एक नौजवान का ज़ख़्म आज तक नही भरा है। इसके अलावा वाल्मीकि जाति के नौजवान पंकज को सर्दियों में दबंगों ने तक़रीबन जान से मार दिया था। ख़ुदा की ख़ैर है कि वो बच गया लेकिन छः महीने तक खाट भुगती। सर्दियों की बात है, सुबह 6-7 बजे के आस-पास पंकज शौच आदि से निवृत्त होकर घर लौट रहा था। कोल्हू के पास दबंग जाति के नौजवान छिपे हुये थे। उन्होंने गुड़ बनाने वाले गरम पलटों से हमला बोल दिया....। मात्र मदीना ही नही बल्कि हर गांव में दलित उत्पीड़न के महाकाव्य हैं।
हरियाणा के गांव हिटलर के यातना शिविर बने हुए हैं। हर गांव में बर्बर हादसे सिर दबाये बैठे हैं। ये हर रोज़ गर्दन निकालते हैं और दलित ख़ून का घूंट पीकर, अपमान झेलकर, माफी आदि मांगकर इन हादसों को दो क़दम दूर ठेल देते हैं। रोजमर्रा के स्वाभाविक काम मसलन भीतर-बाहर आना-जाना, बच्चों का स्कूल जान, पानी लाना, दुकान से सौदा लाना, टट्टी-पेशाब जाना आदि अत्यंत अपमान से गुजरकर अंजाम पाते है। अगर कोई व्यक्ति ये स्वाभाविक क्रियाएं करने के लिये भी सौ बार सोचे तो आप समझ सकते हैं कि क्या स्थिति है। ग़रीबों का पूरा कुनबा खटता है तब पेट भरता है। दिहाड़ी-मजूरी करनी ही पड़ती है। दिहाड़ी के लिये इन्हीं के खेतों में जाना होता है। मजूरी के पैसे के लिये झगड़े होते हैं। ईंधन लेने जाने वाली महिलाओं के पीछे दबंग जाति के ये तथाकथित इज़्ज़तदार लोग और इनके सुपुत्र कपड़े निकाल कर भाग पड़ते हैं। अैसी कई घटनाएं सामने आई हैं। गुजारे के लिये कुछ परिवार पशुपालन करते हैं मसलन एकाध मुर्गी, बकरी या सुअर पालते है। इन पशुओं को लेकर दलितों को आये दिन धमकाया जाता है, पीटा जाता है। कई मरतबा पषुओं को ज़हर दे दिया जाता है। गांव में गुजारा कैसे हो? गांव में गुजारे के साधन यही हैं- ज़मीन, पशुपालन या फिर दिहाड़ी-मजूरी। ज़मीन चाहे खेती योग्य हो या शामलाती, सब जगह वे ही पसरे पड़े हैं। जातिगत उत्पीड़न का ताल्लुक़ ज़मीन से सीधा है। हरियाणा में भूमि सुधार लागू किया जाना चाहिये और बेज़मीनी दलित परिवारों को भूमि आवंटित की जानी चाहिये।
दलित महिलाएं ताक़तवर तबकों के निशाने पर हैं। हरियाणा में पिछले दिनों हुई सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में ज़्यादातर शिकार दलित लड़कियां हैं। दलित महिलाओं के साथ छेड़खानी, बलात्कार करना दबंग जाति के ये लफंगे अपना अधिकार समझते हैं। शायद गाम-राम, मौज़िज़ लोग, पुलिस और प्रशासन भी। तभी तो कोई कार्रवाई नही होती। उल्टा अगर दलित ऐतराज़ ज़ाहिर करते हैं, महिलाएं विरोध करती हैं तो सबमें कभी खुली तो कभी छिपी प्रतिक्रिया होती है। मात्र मदीना ही नही तक़रीबन हर गांव में दलित बस्ती को इन लफंगों ने अपनी चारागाह बना रखा है। अगर कोई टोक दे तो मारपीट, क़त्ल, दंगा, आगजनी।
कितने अैसे मामले हैं जिनमें टोकने पर दलितों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया और पंचायत में माफी भी मंगवाई और बेइज़्ज़त भी किया। सवाल उठता है कि ये असामाजिक तत्व इतना बेख़ौफ़ क्यों है? जवाब स्पष्ट है कि पुलिस, क़ानून, कोर्ट किसी बात का डर नही है। क्योंकि इन सब ने बार-बार दलित और महिला उत्पीड़न के मामलों में इन ताकतवर जातियों और लफंगों के साथ ही प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है। गौरतलब है कि दुलीना में पुलिस चौकी के अंदर पांच दलितों की पीट-पीट कर हत्या की गई थी, गोहाना में पुलिस की मौजूदगी में दलित बस्ती को आग लगाई और मिर्चपुर के दलित जब न्याय के लिये प्रतिरोध कर रहे थे तब उन पर लाठियां भांजी गई। सामूहिक बलात्कारों और यौन हिंसा के खि़लाफ रोहतक में प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर लाठीचार्ज किया गया। प्रदर्शन में पीड़ित लड़कियां, उनके परिजन और पूर्व सांसद वृंदा करात भी थी। इन असामाजिक तत्वों को दूसरी ताक़त मिलती है जात से, ज़मीन से, दलाली से आयी नई पूंजी से, खाप पंचयतों से, पुरूष होने के दंभ से। हरदम ग़रीबों की जान हलक़ में अटकाये रखने वाले ये बदमाश हरियाणा की राजनीति को चलाने के महत्वपूर्ण क़िरदार हैं। इनको बकायदा राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। क्योंकि दलित, अल्पसंख्यक, महिलाओं के साथ मनमर्ज़ी करना, अपमान करना, बेगार कराना इन बातों को सामाजिक स्वीकार्यता है, हरियाणा के दंभी समाज में।
इसलिये इस तरह की घिनौनी हरकतों को टोल बनाकर, गैंग बनाकर भीड़ बनाकर अंज़ाम दिया जाता है। इसके कई फायदे हैं ताकत तो बढ़ती ही है, इसके अलावा क़ानूनी चोर दरवाज़ों की मदद भी मिलती है। चाहे दुलीना का मामला हो, चाहे मिर्चपुर हो, हरसौला हो या फिर गोहाना हो या फिर मदीना हो, टोल बनाकर, इकठ्ठे होकर ये लोग अपनी ताकत का झण्डा कमजोरों की छाती में गाड़ते हैं। परिणामस्वरूप केस ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ दर्ज़ होता है। इस बात पर और अधिक प्रतिक्रिया होती है। यहां तक कि कई संवेदनषील व समझदार लोग भी ‘बेक़सूरों’ को बचाने की दुहाई देने लगते हैं। ये फिनोमिना की तरह सामने आया है। मिर्चपुर में ‘बेक़सूरों’ को बचाने के लिये पंचायतें हुई। प्रगतिषील लोगों ने भी सुर में सुर मिलाया। आॅनर किलिंग के मामलों में भी अैसी बात सामने आई और अब मदीना में भी 1 अप्रैल को जाटों की पंचायत हुई। जिसमें यही बात सामने आई कि ‘बेक़सूरों’ के नाम भी लिखे गये हैं। मदीना कांड मामले की जांच कर रहे एसपी राजेष दुग्गल का कहना है कि ‘‘मामला गंभीर है और बेक़सूरों को सजा नही मिलनी चाहिये।’’ कमाल है बिना किसी कार्रवाई, पूछताछ, जांच, गिरफ्तारी के इन्हें कैसे मालूम पड़ जाता है कि कौन बेक़सूर है। दलित उत्पीड़न के केस में ये अधिकारी जांच करने की बजाय अंतर्यामी बन जाते हैं। गौरतलब है कि गांव के सरपंच जितेन्द्र के ख़िलाफ भी एफआईआर है। लेकिन वो गांव में खुला घूम रहा है और उसी ने गांव में पहलकदमी करके समानांतर पंचायत का आयोजन किया। जिसमे दलितों के किसी प्रतिनिधि और पीड़ित परीवार को पक्ष रखने के लिये षरीक तक नही किया गया। इससे साफ पता चलता है कि इस तरह की पंचायतों के क्या रूझान हैं। जिस पर गुजरी है वो ढंग से एफआईआर भी नही करा सकता। ये सुनिष्ति करना बहुत ज़रूरी है कि पीड़ितों के द्वारा दर्ज़ कराई गई एफआईआर को ही जांच का आधार बनाया जाये और भविष्यवाणी के आधार पर स्वयंभू न्यायधीष बनने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
इन गांवों की रोजमर्रा की ज़िंदगी में फासीवाद पसरा पड़ा है। प्रतिदिन का अपमान और उत्पीड़न, थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद बर्बर हमले और उसके बाद न्याय की लड़ाई। न्याय की प्रक्रिया और भी कष्टकारी है। क्येंकि बाद में धमकियों का दौर षुरू हो जाता है। डराया जाता है, कर्ज़ वापसी का दबाव बनाया जाता है, स्कूलों से बच्चों को निकाल दिया जाता है, दुकानों से सामान नही लेने दिया जाता मतलब पूरी ज़िंदगी अस्त-व्यस्त। हरियाणा में कितनी ही बार दलित विस्थापन की नौबत आई है। 200-250 परिवार, बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे, पषु वगैरह खुले आसमान के नीचे मौसम की मार खाते हैं। मिर्चपुर के ज़्यादातर परिवार अभी गांव से बेदखल हैं।
प्रष्न ये उठता है कि पुलिस, नौकरषाह, राजनेता, न्यायपालिका क्या अफीम खाये बैठे हैं। कब तक महिला सषक्तिकरण और दलित उत्थान के गूंगे ढोल पीटते रहेंगे। हरियाणा में दलित आयोग का गठन क्यों नहीं किया जा रहा है। ये सुनिश्चित किया जाये कि आयोग में ऐसे लोग हों जो सामाजिक न्याय और जातिगत मसलों पर संवेदनशील हों, जिनका इन मसलों पर संघर्ष करने का रिकार्ड हो। वर्ना महिला आयोग की तरह ही खानापूर्ति होगी। जगजाहिर है कि हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष ने लड़कियों के लिये ‘ड्रैस कोड’ की वकालत की थी। यूं तो 6-7 महीने पहले ही हरियाणा में मानवाधिकार आयोग बनाया गया है, जो ख़ुद दयनीय हालत में है। आयोग के नाम पर बेहूदा मज़ाक। ये और भी ज़्यादा भयानक बात है क्योंकि उत्पीड़ित तबकों के हक़ों, मान-सम्मान और सुरक्षा के लिये बनी महत्वपूर्ण एजेंसी प्रहसन बन जाती है। उत्पीड़ितों के बचे-खुचे एकाध सहारे भी छीन लिये जाते हैं, उनका अपहरण कर लिया जाता है।
जिस भी इलाके में जातिगत हिंसा होती है वहां पर कार्रवाई ना करने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को दोषी करार दिया जाये, सजा मिले। चुने हुये प्रतिनिधियों की जवाबदेही ‘फिक्स’ की जाए। इस तरह के मामलों पर उल-जुलूल बयान देने वाले राजनेताओं और पंचायतियों पर भी कार्रवाई की जाये। केस के दौरान होने वाली पंचायतों पर अंकुश लगे जो गुण्डों को बचाने के भोंडे तर्क देते हैं। पीड़ितों पर दबाव बनाते हैं और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। दलित उत्पीड़न के केसों में पीड़ितों के द्वारा बार-बार जोर दिये जाने के वजूद भी एससीएसटी एक्ट नही लगाया जाता। मात्र पुलिस ही नही बल्कि आमतौर पर समाज में भी जातिगत हिंसा को आम झगड़े व अपराध की तरह देखने का रुझान है। दुख और हैरानी की बात ये है कि संवेदनशील लोग भी इस रुझान की चपेट में आ जाते हैं। असल में एफआईआर दर्ज़ कराना ही महाभारत है और अगर हो भी जाये तो साधारण मारपीट, झगड़े आदि के केस बनाये जाते हैं। एफआईआर दर्ज़ करने की प्रक्रिया सुगम बने और कार्यरत प्रभारी कर्मियों की मनमानी पर अंकुश लगाने और उन्हें मॉनीटर करने का प्रबंध किया जाये। एफआईआार दर्ज़ ना करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो। असल में विडम्बना ये है कि बदमाशों के पास आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक ताकत है, साथ ही औपचारिक और अनौपचारिक ढांचे भी कहीं न कहीं इन्हें ही सर्पोट मुहैया कराते हैं। ग़रीब, दलित और महिलाओं के मदद, सुरक्षा और न्याय के लिये बनी एजेंसियों मसलन थानों आदि तक से ये तबके तौबा करते हैं, डरते हैं। ये बड़ा प्रश्न है कि कानूनों को व्यवहारिक तौर पर अमल में कैसे लाया जाये? थाने, तहसील, कोर्ट, पुलिस, प्रशासन को अपना क़िरदार बदलना होगा। ताकि पीड़ित लोग बेहिचक अपनी शिकायतें दर्ज़ करा पाएं और बदमाशों के आत्मविष्वास को ढीला किया जाये। वर्ना एफआईआर, शिकायत तो दूर की बात, अभी तो हालत ये है कि आपका कलेजा निकाल लें और रोने भी ना दें।

नोटः- गौरतलब है कि मदीना काण्ड में 18 लोगों के खि़लाफ एफआईआर दर्ज़ है लेकिन अब तक मात्र चार लोगों को ही गिरफ्तार किया गया है। इसी दरम्यान पबनावा कैथल में भी जातिगत उत्पीड़न का गंभीर मामला सामने आ चुका है। हिसार ज़िला के कल्लर भैणी गांव में 15 साल के बच्चे से दबंगों ने पानी का बर्तन छीन लिया, बर्तन का पानी उड़ेला और पीने के पानी के बर्तन में पेषाब किया। लड़के के मामा ने विरोध किया तो जातिसूचक गालियां दी, लाठियों और बल्लम से उस पर हमला बोल दिया। यहां भी दबंग जाति के इन लफंगों ने दलित बस्ती को अपना अड्डा बना रखा है।
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(मार्च 2013 में मदीना कांड के बाद दिल्ली से वहां गए एक दलित युवक ने ये बातें मेल के जरिये भेजी थीं। तब से जींद में दलित युवती के साथ रेप और उसकी हत्या समेत जाने कितनी वारदातें हो चुकी हैं। उन सभी को इस मेल की रोशनी में देखा जा सकता है कि हर बार सरकार और उसकी मशीनरी का रवैया वही रहता है। चाहें तो हरियाणा के पड़ोसी राज्यों और देश के बाकी हिस्सों के गांवों को भी इस मेल की रोशनी में देख-समझ सकते हैं। इसीलिए इस पुराने मेल को इतने दिन बाद भी पूरी तरह प्रासंगिक पाकर यहां चिपका रहा हूं।-धीरेश)