
भारत के मशहूर फिल्म निर्माता निर्देशक कुमार शाहानी पिछले सप्ताह कोची में एक सेमिनार में हिस्सा लेने आये थे। चाय के वक़्त मैंने उनसे यों ही बतियाने की कोशिश की। मैं जानना चाहता था कि आखिर `माया दर्पण`, `क़स्बा` `तरंग` और ऐसी ही कई यादगार फिल्में दे चुका शख्स खामोश क्यों है। उन्होंने कहा कि फिल्म के लिए एक टीम चाहिए और टीम के हर मेंबर को देने के लिए पैसा चाहिए। मैंने कहा कि २० साल दुनिया में बेइंतहा बदलाव के साल हैं और हिन्दुस्तान भी इस दौरान तरह-तरह के सितम झेलता रहा है। एक फिल्मकार के नाते आप इस बारे में क्या सोचते हैं और क्या आपको इस सब को अपनी विधा में दर्ज करने की बेचैनी नहीं होती। शाहानी के चेहरे पर दुःख छलक आया और वे बोले,
``मुझे अचरज होता है कि मैं जिंदा क्यों हूँ। रियली...। इतना redundant हो गए हैं। समझ नहीं आता क्यों जी रहे हैं।``
(शीर्षक विष्णु नगर और असद ज़ैदी के संपादन में छपी कविता की किताब से)