
इतिहास की प्रवृत्ति है अपने को दुहराना, यह मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है; इतिहास के अंत की घोषणाओं के बारे में ही यह बात सबसे ज़्यादा खरी है. न्यू टेस्टामेंट से लेकर हेगल तक ऐसे मृत्यु-सन्देश अनेकों बार जारी किये गए हैं. इतिहास के अंत की घोषणा फ़कत हमारे पास पहले से मौजूद इतिहास में एक टुकड़ा और जोड़ देती है, इतिहास को जीवित रखने में मदद करती है और इस प्रकार अजीब ढंग से आत्मघाती साबित होती है.
पचास के दशक का तथाकथित विचारधारा का अंत आन्दोलन पिछले दिनों दिए गए इतिहास के, या साफ़-साफ़ कहें तो विचारधारा के निष्कासन के आदेशों में एक था. वियतनाम, ब्लैक पावर और आसन्न छात्र आन्दोलन के दौर में वह एकदम असंगत भविष्यवाणी साबित हुई. अब जबकि हमारे अपने समय में यह घोषणा दुहराई गई है, तो हमें वह बात याद करनी होगी जैसे उसकी ओर ध्यान ऑस्कर वाइल्ड ने दिलाया हो - इतिहास के अंत के बारे में एक बार गलत होना बदकिस्मती है, जबकि उसी बारे में दुबारा गलत होना निपट लापरवाही.
(टेरी ईगल्टन की पुस्तक "दि गेटकीपर: अ मेमो'आ" से, अंग्रेजी से अनुवाद: भारत भूषण तिवारी)