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Thursday, January 5, 2012

बहरहाल सुलह-सफाई : गो निराला बहस से बाहर ही रहे



वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने निराला को लेकर खुद पर लगी तोहमत पर नया मेल जारी किया है। उसका मजमून-

`निराला की अपाठ्यता का पटाक्षेप


मुझे एक क्षीण-सी आशा थी कि केदारजी इस मसले को लेकर अपनी ओर से कुछ न कुछ कहेंगे और वह सही सिद्ध हुई.वे इन्टरनेट और ब्लॉग-विश्व से अनभिज्ञ हैं और ई-मेल आदि भी नहीं करते, किन्तु इस प्रकरण को लेकर उनके कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें सूचना दी  और उन्होंने तत्काल आज सुबह मुझे  फोन किया और एक भावनापूर्ण बातचीत  में  अधिकृत किया है कि मैं नेट के ज़रिये उनकी तरफ से सभी हिंदी लेखकों और निराला-प्रेमियों को सूचित कर दूं कि उन्होंने अलाहाबाद के अपने भाषण में निराला की 'तुलसीदास',' राम  की शक्ति-पूजा' और 'महाराज शिवाजी का पत्र' सरीखी कविताओं को लेकर मेरी दृढ आपत्ति का उल्लेख अवश्य किया था किन्तु यह क़तई नहीं कहा था कि विष्णु खरे के लिए निराला "अपाठ्य" हैं.केदारजी का कहना है कि उनके उस वक्तव्य को असावधान और ग़ैर-जिम्मेदाराना ढंग  से प्रकाशित-अनूदित कर दिया गया है. इस प्रकरण पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए उन्होंने  मुझसे तथा अन्य सैकड़ों निराला-प्रेमियों से इस भ्रान्ति के लिए मार्मिक शब्दों में हार्दिक खेद व्यक्त किया है.केदारजी ने यह भी कहा है कि  वे उपयुक्त सार्वजनिक  अवसर और मंच पर भी इस ग़लतबयानी   का खंडन और निराकरण करेंगे.
हमारे वरिष्ठ और प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के इस स्पष्टीकरण और खेद-प्रकाश  के बाद,जो  उनके अनुमोदन के लिए उन्हें पढ़ कर सुना दिया गया था,मुझे उम्मीद है कि इस प्रसंग पर आगे कोई विवाद नहीं होगा.फिर भी इसे सत्यापित करने के लिए कोई चाहे तो उनसे उनके टेलीफोन 09868637566 पर संपर्क कर सकता है, किन्तु ध्यान रहे कि केदारजी की मा कलकत्ता में गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं.
विष्णु खरे
पुनश्च:    'रविवार','एक-जिद्दी-धुन' तथा 'भड़ास' के ब्लॉगमास्टरों से विशेष अनुरोध है कि इस पत्र को शीघ्रातिशीघ्र अवश्य  प्रकाशित  करें.धन्यवाद.   वि.ख.`

Wednesday, January 4, 2012

`कारनामा-ए-केदारनाथ सिंह` : निराला निंदा की तोहमत से आहत हैं खरे जी



वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने अपने मित्रों परिचितों को एक मेल सर्कुलेट किया है जो घूमता हुआ मुझ तक भी पहुंचा है। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह के हवाले से कहीं छपा है कि खरे जी महाकिव निराला को   अपाठ्य मानते हैं। इससे हैरान और आहत खरे जी की यह टिपण्णी उनका पक्ष भर ही नहीं है, यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि हिंदी की दुनिया में आखिर चल क्या रहा है। युवाओं पर जिस गैरजिम्मेदारी की तोहमत अक्सर लगती रही है, इसकी जड़ें पीछे ही तो नहीं हैं?

खरेजी के मेल का मजमून :
यदि मामला  निराला से सम्बद्ध न होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण  टिप्पणी शायद न लिखी जाती.अनुरोध है कि संभव  और उचित हो तो कृपया अन्य साहित्य-जागरूक  मित्रों तक पहुँचाएँ.केदारजी से सार्वजनिक क्षमा चाहता हूँ.
सधन्यवाद,
विष्णु खरे



यदि वरिष्ठ कवि-आलोचक विजय कुमार का फोन न आता तो यह सब न लिखा जाता.पिछले एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने अपने किस लेख में कब लिखा है कि मैं निराला को अपाठ्य कवि मानता हूँ.मुझे उनके इस प्रश्न का सन्दर्भ कुछ याद तो आया किन्तु मैंने उनसे माजरा जानना चाहा.बोले कि गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी पत्रिका  में केदारनाथ सिंह का कोई अनूदित लेख या वक्तव्य प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि विष्णु खरे निराला को अपाठ्य मानता है.
मैंने विजयजी से यह नहीं पूछा कि वे वर्धा की बेहूदा और खरदिमाग ढंग से संपादित-प्रकाशित  कल्पनाशून्य  पत्रिकाएँ पढ़ते ही क्यों हैं – यद्यपि हिंदी में कूड़ा पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है - किन्तु मामले की गंभीरता से सजग हुआ.केदारजी ने शायद अलाहाबाद के अपने किसी भाषण में उस तरह का  कुछ कहा था जिसे किसी पत्रिका ने उद्धृत भी किया था किन्तु अधिकांश हिंदी अखबारों और साहित्यिक पत्रिकाओं में ऐसे भाषणों का जो अनर्गल चर्बा छपता है वह अविश्वसनीय और रद्दी  के लायक होता है.लेकिन पूरे भाषण या लेख का ऐसा हिस्सा ,भले ही आशंकित खराब अंग्रेज़ी अनुवाद में,कुछ तवज्जोह चाहता है.
केदारजी की प्रतिष्ठा ऐसी है कि उनके किसी भी वक्तव्य को,विशेषतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरीभाषी अंचल में, आर्षवाक्य मान लिया जाता है.यदि वह कथन विष्णु खरे को निराला का निंदक ठहराता हो तो कहना ही क्या - सैकड़ों विकलमस्तिष्कों  के मानस-मुकुल खिल-खिल जाते हैं.
हमारे यहाँ कोई यह पूछने या जानने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता कि अमुक बात यदि कही या लिखी गयी है तो कहाँ या कब ? उसके लिखित या दृश्य-श्रव्य सबूत  या गवाह क्या और कौन हैं ? स्वयं केदारजी ने कोई हवाला नहीं दिया है.इतने बड़े कवि तथा प्रोफ़ेसर-पीर से उसका मुत्तवल्ली-मंडल भला क्यों तफ्तीश करे – बाबा वाक्यं प्रमाणं.
सच क्या है ? मैं सार्वजनिक रूप से निराला पर कभी नहीं बोला हूँ – उन पर लिखी गयी अपनी दो टिप्पणियों को अवश्य मैंने संगोष्ठियों में पढ़ा है,एक को वर्षों पहले भारत भवन में और दूसरी को पिछले तीन वर्षों में कभी हिंदी अकादेमी के तत्त्वावधान में दिल्ली में.पहली में निराला की बीसियों प्रारंभिक कविताओं की सराहना और यत्किंचित विश्लेषण हैं और दूसरी में उनकी सिर्फ एक कविता – महगू महगा रहा - की लंबी व्याख्या,क्योंकि विषय वैसा ही था.दोनों मौकों पर कुल मिला कर ढाई-तीन सौ सुधी श्रोता तो रहे होंगे,भले ही केदारजी मौजूद न रहे हों.दोनों टिप्पणियाँ शायद आयोजकों द्वारा प्रकाशित भी की जा चुकी हैं या उनके रिकॉर्ड में होंगी.मेरे पास तो हैं ही.उनमें निराला की हल्की-सी भी आलोचना नहीं है – वे एक निर्लज्ज भक्ति-सरीखे भाव से भरी हुई हैं.
इसे भले ही आत्मश्लाघा समझा जाए लेकिन मैं हिंदी के शायद उन कुछ लोगों में से हूँ जिन्होंने निराला की एक-एक कविता एकाधिक बार पढ़ रखी है.नंदकिशोर नवल द्वारा क़ाबिलियत से संपादित ‘निराला रचनावली’ के पहले दोनों – कविता – खण्डों में मेरे बीसियों पेन्सिल-निशान हैं और शेष छः खण्ड भी लगभग पूरे पढ़े हुए हैं.यह स्पष्ट ही होगा कि मैंने निराला को अपाठ्य मानकर पूरा का पूरा तो पढ़ा न होगा.
निराला से मेरी ताज़िन्दगी वाबस्तगी का एक ताज़ा उदाहरण देना चाहता हूँ.निराला के सभी समर्पित पाठक जानते हैं कि नेहरू-परिवार से,विशेषतः विजयलक्ष्मी पंडित से,उनके जटिल रागात्मक सम्बन्ध थे.उनकी कुछ कविताओं में इसके साक्ष्य हैं.यह सुविदित है कि आज़ादी के बाद निराला की बदहाली को जानकर जवाहरलाल नेहरू ने उनके लिए एक नियमित आर्थिक सहायता का प्रबंध किया था.हाल नवंबर में संयोगवश मेरी भेंट विजयलक्ष्मी की बेटी और सुपरिचित भारतीय-अंग्रेज़ी लेखिका नयनतारा सहगल से हुई, जो अब स्वयं चौरासी वर्ष की हैं.अपने बदतमीज़ दुस्साहस में मैंने उनसे निराला और उनकी मा के विषय में पूछा,और यह भी कि क्या विजयलक्ष्मीजी के मृत्योपरांत कागज़ात में निरालाजी के कोई पत्र मिलते हैं,जिनका हवाला उनकी कविताओं में है ? मुझे लगा कि मेरे इस प्रश्न से नयनताराजी अपने-आप में लौट गईं और उन्होंने मुझे अजीब ढंग से देखकर – शायद यह  मेरी कल्पना ही हो - सिर्फ इतना कहा कि ऐसे कोई पत्र नहीं हैं.मैंने तब बात को आगे नहीं बढ़ाया.लेकिन हमारे स्वनामधन्य मतिमंद हिंदी प्राध्यापकों को ऐसी चीज़ों से भला क्या लेना-देना ?
निराला का मेरे लिए क्या अर्थ है इसे ज़्यादा तूल न देते हुए मैं सिर्फ अपनी तीन कविताओं  का हवाला देना चाहूँगा.एक का शीर्षक है सरोज-स्मृति जो एक अलग तरह की सरोज की अलग तरह की स्मृति है.यह अभी प्रकाशित नहीं हुई है.दूसरी है जो मार खा रोईं नहीं जो दो बच्चियों की उनके पिता द्वारा पिटाई को लेकर है और संग्रह सबकी आवाज़ के परदे में छपी है.तीसरी कूकर है जो खुद अपनी आँख से में संकलित है और जिसकी कुछ प्रासंगिक अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं :
कबीर निराला मुक्तिबोध के नाम का जाप आजकल शातिरों और जाहिलों में जारी है
उन पागल संतों के कहीं भी निकट न आता हुआ सिर्फ उनकी जूठन पर पला
छोटे मुँह इस बड़ी बात पर भी उनसे क्षमा माँगता हुआ
मैं हूँ उनके जूतों की निगरानी करने को अपने खून में
अपना धर्म समझता हुआ भूँकता हुआ.
निराला की और भी प्रकट-प्रच्छन्न उपस्थितियाँ मेरी कविताओं में होंगी और होती रहेंगी.उनकी एक कविता मेरे लिए बतौर कवि अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और मेरे और उसके बीच एक लंबा कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध चल रहा है. अपने गद्य में मुझे निराला का चमरौंधे वाला जुमला बहुत उपयोगी और मुफीद लगता है और उनका द्याखौ चुतिया कौ, हमहीं से पूछत है हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि कौन है तो अपनी नकली खीझ-भरी सैंस ऑफ़ ह्यूमर में अद्वितीय है और कभी-कभी मेरे काम आता है.
तो क्या जब केदारजी यह कहते हैं कि विष्णु खरे निराला को अपाठ्य मानता है तो वह एक अनुत्तरदायित्वपूर्ण,शरारती प्रलाप है ? नहीं. वह मयपरस्ती से पैदा हुई एक अतिरंजित स्मृतिभ्रष्ट गलतबयानी है.
मैं केदारजी को अपना मित्र समझने की मुँहचाटू गुस्ताखी तो नहीं कर सकता लेकिन हाँ, वे बहुत प्यारे इंसान हैं,मुझे बर्दाश्त कर लेते हैं और उनकी सोहबतों की सौगातें मुझे मिलती  रही  हैं .उनकी संगत बहुत पुरलुत्फ,जीवंत,शेर-ओ-सुखन व ज़बरदस्त सैंस ऑफ़ ह्यूमर से मालामाल होती और करती है.श्लेषों और ज़ूमानियत की आवाजाही  लगातार  बनी  रहती  है.वे बराहे मयपरस्ती खूब खुल भी लेते हैं.साक़ी,हमप्यालों और पैमानों  पर  एक ही गर्दिश रहती है कि केदारजी को जितना शौक़ मुँह की लगी हुई से है,उसके एक-दो कश के बाद ही वे एक उतने ही खूबसूरत सुरूर में दाखिल हो जाते हैं और दो-तीन के बाद तो, अल्लाह झूठ न बुलवाए,खुद पर एक क़लन्दराना हाल-नुमा तारी कर लेते हैं.फिर उन्हें या तो मौक़-ए-वारदात पर ही आरामफ़र्मा किया जाता है या किसी गुलगोथने,नींद में मुस्कुराते हुए नौज़ाईदा की मानिंद निहायत एहतियात से हाथों-हाथ उनके दौलतख़ाने ले जाया जाता है.अगली सुबह और उसके बाद उनकी कैफियत ‘इक याद रही इक भूल गये’ की रहती है.
बात कुछ वर्षों पहले शायद बिलासपुर,छत्तीसगढ़ की है.केदारजी और मैं एक साहित्यिक आयोजन में वहाँ आमंत्रित थे.रात जवान होते-होते होटल के कमरे में अदब और बादे का दोस्ताना इजलास शुरू हुआ और बात निराला तक पहुँची.जब ‘तुलसीदास और ‘राम की शक्ति-पूजा’ सरीखी उनकी कविताओं का चर्चा हुआ तो मेरा निवेदन यह था कि मैं निराला की ऐसी पुनरुत्थानवादी,वर्णाश्रमधर्मी,मृदु-हिन्दुत्ववादियों के द्वारा इस्तेमाल की जा सकने वाली रचनाओं को सराह नहीं सकता और उनके पाठ्यक्रमों में रखे जाने के सख्त खिलाफ़ हूँ.केदारजी का निराला की ऐसी कविताओं को लेकर अपने तरह का बचाव रहा होगा किन्तु मैं तब भी सिर्फ निराला ही नहीं,मैथिलीशरण गुप्त,जयशंकर प्रसाद और अन्य कवियों की ऐसी कविताओं का विरोधी था, अब भी हूँ और रहूँगा.उनकी ऐसी रचनाएँ,जो सौभाग्य से बहुत कम हैं, दुर्भाग्यपूर्ण हैं किन्तु वे तब भी हमारे महान और कालजयी कवि हैं.
मुझे हैरत इस बात की है कि बिलासपुर की उस पुरजोश शाम के बाद हालाँकि केदारजी से बीसियों बार तर-ओ-खुश्क मुलाकातें नसीब हुई हैं लेकिन उन्होंने कभी निराला का न तो ज़िक्र छेड़ा न उस सरसरी बहस को आगे बढ़ाया,उलटे वैसा एकतरफ़ा,बेबुनियाद और निराला (के लिए बहुत कम) व मेरे लिए (काफी) नुकसानदेह बयान दे डाला.यदि वह वैसा न करते तो मैं भी यह सब लिखने को मजबूर न होता.नामवर सिंह जैसे लबार यहाँ-वहाँ अनर्गल प्रलाप करते घूमते रहते हैं किन्तु उन्हें बरसों से कुछ चिरकुट-चेलों और प्रलेस के उनके मतिमंद क्रीतदासों के सिवा कोई गंभीरता से नहीं लेता.जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से संबद्ध होने के बावजूद केदारनाथ सिंह की सार्वजनिक प्रतिष्ठा अब भी बची हुई है और मुझ सरीखे लोग उनकी स्नेहिल कद्र भी करते हैं, लिहाज़ा उनसे उम्मीद और इल्तिज़ा की जाती है कि वे अतिरेक में ऐसी गैर-जिम्मेदाराना गलतबयानी से बचेंगे.

विष्णु खरे
(निराला का यह मशहूर चित्र प्रभु जोशी के ब्रश से)

Tuesday, February 19, 2008

वादे के मुताबिक ये कविता - `ब्रेष्ट और निराला`

ब्रेष्ट और निराला
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सपने में देखा कोई घर
थाघर क्या टूटाफूटा-सा कमरा एक
कुर्सियाँ रखी हुई थीं बहुत पुरानी
बैठे थे उन पर बेर्टोल्ट ब्रेष्ट और निराला
वैसे ही जैसे अपनी-अपनी तस्वीरों में दिखते थे
निराला अस्तव्यस्त बालों में गहरी ऑंखें कहीं दूर देखतीं
ब्रेष्ट उसी गोल चश्मे में दो दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी
और आँखें जैसे काफी दुनिया देख चुकी हों
सुना रहे थे कविता एक-दुसरे को
अभी कुछ और सुनाओ कहते
दोनों बीच-बीच में दुनिया के रंगढंग पर अचरज करते
कहा ब्रेष्ट ने मैं एक अँधेरे युग में रहता हूँ
निराला बोले मैं इसी अँधेरे का ताला खोलने को कहता हूँ
फिर कहा निराला ने चारों ओर घना है दुःख का जंगल
बोले ब्रेष्ट मैं रहा खोजता इस दुःख का कारण
निराला बोले मैं लड़ा कुलीनों से ब्राहमण के घर के व्यंजन छोड़े
जो असली जान हैं समाज के महंगू और झींगुर जैसे
या इलाहाबाद के पथ की वह मजदूरिन
उन पर जब लिखा मैंने
आलोचक बरसे मुझ पर कईयों ने कहा मुझे पागल
मरा हूँ हजार मरण
कहा ब्रेष्ट ने पूंजी और ताकत की निर्मम चालों पर
मैंने भी कलम चलायी उनके व्यवहारों को बारीकी से देखा
समाज की तलछट में रहनेवाले मुझे भी भले लगे
साधारण की हिम्मत और अच्छाई को दर्ज किया
अत्याचारी से बचने की तरकीबें खोजीं कई देश बदले
किसी तरह बच गया मृत्यु और यातना शिविरों से
जगह-जगह खोजता रहा शरण
कहा निराला ने जनता की ही तरह कविता की मुक्ति ज़रूरी है
बोले ब्रेष्ट जनता की मुक्ति में कविता बची हुई है
दो महाकवि गले मिले बोले फिर मिलते हैं
सपने में जाते दिखते दोनों ऐसे
जैसे जीवन में साथ रहा हो बरसों से
-मंगलेश डबराल