Monday, December 7, 2009

रोटी और तारे : ओक्तई रिफ़त



गोद में रखी है रोटी
और सितारे बहुत दूर
मैं अपनी रोटी खाता हूँ सितारों को तकते हुए
ख़यालों में इस कदर गुम कि कभी कभी
मैं गलती से खा जाता हूँ एक सितारा
रोटी के बजाए

(इस तुर्की कविता का अनुवाद असद ज़ैदी का है. इसे ८० के दशक की पत्रिका कथ्य से लिया गया है जिसका सिर्फ एक अंक निकला था पर शानदार निकला था.)

10 comments:

tanu sharma.joshi said...

उम्दा...बेहतरीन...

Udan Tashtari said...

वाह!!

बहुत आभार इसे यहाँ प्रस्तुत करने का.

ali said...

आह.....अदभुत !

Dheeraj Pandey said...

Cute.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह अंक बहुत पहले एक मित्र के यहां देखा था…काश कि फोटोकापी करा लिया होता।

शनदार कविता

रंगनाथ सिंह said...

छोटी और प्यारी कविता। मेरी पसंदीदा चीज।

गौतम राजरिशी said...

आह!

अनिल कान्त : said...

वाह!!

सुभाष नीरव said...

बहुत उम्दा कविता! छोटी मगर असरदार !

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
Email- sanjay.kumar940@gmail.com