Monday, December 14, 2009

व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन) दूसरी किस्त



(पिछली किस्त से जारी)

इसी तरह यह बात भी गौरतलब है कि उन्होंने अपने समय के इस शीतयुद्धीय सुझाव को अमान्य कर दिया था कि `जनतांत्रिक मूल्यों` या `मानव-मूल्यों`, व्यक्ति और `अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता` को अपनी जाहिल और निजी निर्विघ्न दुनिया की ढाल बनाकर खड़ा कर दिया जाय। अपने बहुत से समकालीनों से वे इस बात में महत्वपूर्ण भिन्नता लिए हुए थे कि उन्होंने अपनी आधुनिकता और अपने जनतांत्रिक आदर्शों को एक कहावत की तरह नहीं पा लिया था बल्कि उन्हें अपने रचनात्मक और सामाजिक व्यवहार से बार-बार खोजते, स्थिर करते, बरतते और बदलते हुए अर्जित किया था। एक तरह से रघुवीर सहाय पांचवें-छठे दशक की आधुनिकतावादी निर्मिति के सतही अंतर्विरोधों को बाहर लाकर उसकी स्वतः सम्पूर्णता को ध्वस्त करने वाले कवि भी कहे जा सकते हैं।

रघुवीर सहाय के रचनाशील व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी शायद उनकी संपन्न और आत्मप्रबुद्ध जनतांत्रिक संवेदनशीलता ही थी। लेकिन उनकी शक्ति इस बात में नहीं थी कि वे जनतांत्रिक मूल्यों के `पक्षधर`, उदघोषक या वकील थे बल्कि इस बात में थी कि उन्होंने इन मूल्यों को निर्दिष्ट और इनके पक्ष को परिभाषित मानकर इस तरफ़ से आँखें नहीं मूँद लीं। उन्होंने किसी जड़ अमूर्तता में इन्हें ग्रहण नहीं किया बल्कि ठोस सामजिक आलोचना करते हुए बार-बार परखा। यह निरंतर जाग्रत, सचेत, चीजों को उलटती-पलटती, खोजती, बचाती और नष्ट करती हुई कठोर आलोचनाशीलता ही रघुवीर सहाय की संवेदनशीलता की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है। जो विद्वान इसे `निरी आधुनिकता` (या नयी कविता की `बौद्धिकता`!) मानकर बड़ी आसानी से पल्ला झाड़ लेते हैं, वे यह नहीं देख पाते कि कवि ने इस विवेक को समाज के भीतर, मनुष्यों और संस्थाओं के आपसी संबंधों के भीतर; अत्याचार, अन्याय और पतन के अनगिन दृश्य-अदृश्य रूपों की वर्षों की व्यथा भरी मुश्किल छानबीन के दौरान विकसित किया था।

रघुवीर सहाय ने बहुत सारे मसलों पर जिस तरह अपना रुख तय किया उससे द्वंद्वों को पहचानने वाली उनकी आधुनिक और कुशाग्र आलोचनात्मक बुद्धि का परिचय मिलता है। शायद इसे वजह से वे कई तरह के उन फंदों से बचे रहे जो उनसे बहुत दूर नहीं थे। मसलन रघुवीर सहाय उन लोगों में शामिल नहीं हुए जिनको एक झटके में आधुनिक होने के लिए पहले `कास्मोपालिटन` होने की जरूरत हुई और फिर `भारतीय` होने के लिए `जड़ों`और `जातीय स्मृति` के अन्धकार में शरण लेना जरूरी लगा। `राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत` से भी उन्होंने कोई `मिथकीय तादाम्य` कायम नहीं किया कि वे उस विरासत का भारी मुकुट बस सर पर उठाये घुमते। इसके बजाय उन्होंने इस परम्परा के जीवित अंश को सामाजिक जीवन में पहचानने की कोशिश की। यह पता लगाया कि पहले की इन इन परम्पराओं को अलग-अलग सामाजिक शक्तियां किस तरह व्यवहार में ला रही हैं और यह कि इनके जीवन पोषक तत्वों की रक्षा आज किस तरह की जा सकती है। यह बात भी भुलाई नहीं जा सकती कि रघुवीर सहाय ने पश्चिमपरस्ती या पश्चिम-विरोध (या एक साथ दोनों) के कुटिल चक्र में फँसने के बजाय ठोस यथार्थ की सकारात्मक और विवेकपूर्ण आलोचना से ही अपनी दिशा तय की जबकि आधुनिकतावादी या `समाजवादी`चिंतन के प्रभाव में आने वाले अल्पविकसित मध्यवर्गीय तत्व अधिकतर इससे बच नहीं सके।

मुक्तिबोध के बाद संभवतः वे पहले कवि हैं जिन्होंने हमारे समय के गंभीर और सर्वव्यापी संकट की ऐतिहासिकता को इतनी सम्पूर्णता के साथ सामने रखा है। इस संकट का वर्णन बहुत से कवि करते हैं लेकिन रघुवीर सहाय की कविता एक तरह से इस संकट की प्रखर और विस्तृत आलोचना प्रस्तुत करती है जो यह बताती चलती है कि आखिर क्या-क्या दाँव पर लगा हुआ है और अभी बचा हुआ है।

एक सरलचित्त,सहजविश्वासी कवि अक्सर अपनी सदाशयता से कई तरह के काम चला लेता है। अक्सर इस सदाशयता में एक बौद्धिक आलस्य छिपा रहता है जो कवि के सामने कोई असुविधाजनक स्थिति खड़ी हो इससे पहले ही बच निकलने का रास्ता दिखा देता है। रघुवीर सहाय उन सरलचित्त कवियों में न थे। वे ऐसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने से वितृष्णापूर्वक परहेज करते थे। इसके बजाय पूरी चुनौती स्वीकार करने का रास्ता उन्हें ज्यादा आकर्षित करता था। बल्कि हम जानते हैं कि रचना के बीच में ऐसे चोर दरवाजों को ढूंढ़-ढूंढ़कर पकड़ना और बंद करना उन्हें अलग से प्रिय था।

भारतीय समाज और राज्यव्यवस्था के फासीवादी पुनर्गठन की भूमिका ख़ास तौर पर पिछले बीस वर्षों में जिस तरह बनकर सामने आयी है, रघुवीर सहाय की कविता की एक नज़र लगातार उसकी क्रियाविधि पर रही है। इस कठिन दौर में अपमान और व्यथा का भार उठाये हुए भी वह इसकी अन्तरंग कथा को खोलकर कहती रही है। आने वाले दिनों में रघुवीर सहाय हमारे समय के इस उदीयमान फासीवाद के उन पूर्व प्रतिरूपों और विधियों की पहचान की एक साहसिक और बड़ी पहल करने वाले कवि के रूप में जाने जायेंगे जिन्हें पिछले दिनों हमारे सामाजिक जीवन में, रिश्तों में, देखने, महसूस करने,सोचने-समझने के तौर तरीकों में बड़े कपटपूर्ण और रहस्यमय ढ़ंग से शामिल किया गया है। आज जबकि और माध्यमों की तरह कविता की भाषा भी अभिव्यक्ति के इन झूठे साँचों की व्यूह रचना के भीतर चक्कर लगाने में ही परिपूर्ण हो जाती है, रघुवीर सहाय की कविता इन साँचों को तोड़कर बार-बार हमें हमारे वक्त के मनुष्य का जीवन, उसकी जीती-जागती वास्तविकता,उसकी तमाम सुन्दरता और क्रियाशीलता दिखला जाती है। कई बार ऐसे दुर्लभ कोण से, जहाँ से उसे बिना क्षति के पूरा देखा जा सकता है। ऐसा कई बार होता है कि वे एक सधे हुए, मेहनती, कुशल सर्जन की तरह मानवीय स्थितियों को,खासकर उनमें निहित ज्यादा नाजुक और कीमती चीजों को तमाम तरह के खतरों से खेलते हुए बचाकर निकाल लाते हैं। ऐसा अनुभव उनकी अनेक कविताएँ (मसलन `दयाशंकर`) पढ़कर होता है।

(जारी)

5 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

हाँ ...इसका इंतज़ार था.

Udan Tashtari said...

आभार इस आलेख का!

ali said...

और आगे भी पढ़ लें ! इन्तजार है !

रंगनाथ सिंह said...

पहले यह लेख पढ़ा नहीं था सो लेख पूरा आ जाए तो ही कुछ कहा जा सकता है।

शरद कोकास said...

अच्छा लग रहा है इसे पढ़ना ..जारी रखें ।