Tuesday, December 15, 2009

व्यथा के भार से थका नागरिक (रघुवीर सहाय पर मनमोहन) अंतिम किस्त




(पिछली दो किस्तों से जारी) :

रघुवीर सहाय के काव्य संसार में यह चीज बड़ी आश्वस्त करने वाली रही है कि यहाँ हम अपनी उन अनेक बनी-अधबनी चीजों को देखते हैं जिन पर अभी काम चल रहा है और जिनकी जगहें या शक्लें अंतिम रूप से तय नहीं हो गयी हैं। कई महाकवियों के यहाँ जो `आलीशान सन्नाटा` खिंचा दिखायी देता है, जिसमें देखने-दिखाने वाली तमाम चीजें होती हैं जो नाप-तौलकर चमका-चमकाकर रख दी जाती हैं, जैसे वे आख़िरी बार रख दी गयी हों, वैसा यहाँ नहीं है। लगता है रघुवीर सहाय अपनी कविताएँ काफी मेहनत, सावधानी और मनोयोग से लिखते थे लेकिन वह उनके लिए शायद ऐसी किसी विराट और महत्वाकांक्षी परियोजना का रूप नहीं लेती थी कि जिसकी सफलता अनिवार्य हो। उनकी कविता पूरी तरह जीवन-आलोचना के उन सूत्रों में व्याप्त रहती है जो निरंतर सजग-सक्रिय उनकी कविता में हर तरफ फैले रहते हैं। अक्सर वह अपने कामधाम में इतनी व्यस्त दिखायी देती है कि शायद ही वहां `कविताई` के लिए अलग से कोई जगह बच पाती है।

रघुवीर सहाय यथार्थ के साथ खुला हुआ विकासशील सम्बन्ध बनाने वाले कवि हैं। ऐसा कवि जो हर बार यथार्थ की गति का धीरज, सादगी, विवेक और दिलचस्पी के साथ पीछा करता है, अधबीच में भटक जाये या थककर लौट आये तो अपने अधूरे अनुभव को बताने में शर्म महसूस नहीं करता लेकिन `कविता पकड़ने` के लालच में हरगिज नहीं फंसता। शायद इसीलिए रघुवीर सहाय की कविता सबसे कम दावा करने वाली और सबसे कम नाज-नखरे उठाने वाली कविता है। शायद यह भी एक वजह है कि बहुत से कलाविदों को उनकी कविताएँ इतनी कम कविताएँ या लगभग गैर-कविताएँ लगती हैं।

रघुवीर सहाय यह दिखाने के लिये भी याद किये जायेंगे कि कविता अलग से शिल्पकारिता या काव्यात्मकता का कतई कोई भार उठाये बिना भी सीधे-सीधे अपना काम संभाल सकती है और इस तरह नए शिल्प का आविष्कार ज्यादा स्वतंत्रतापूर्वक कर सकती है। उन्होंने कविता की शिल्पकारिता को पूरी तरह उसके काम में ही शामिल कर लिया था। ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने चीजों को बिना किसी सहारे या बहाने के सीधे उनके नाम से पुकारने की मुश्किल लेकिन कारगर शुरुआत की थी। यहाँ यह याद दिलाना शायद उपयोगी होगा कि भाषा की `प्रतीकात्मक जड़ता` को लगभग निर्णायक रूप से ध्वस्त करने का उनका उपक्रम (शायद जिसे हर महत्वपूर्ण कवि अपने ढंग से करता ही है) किसी नयी भाषिक तरकीब की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। वह कवि की `प्रयोगशीलता` या कोई नया शिल्पगत पूर्वग्रह नहीं था। यह उस फासले को कम करने (या शायद स्पष्ट करने) की कोशिश थी जो रचनाकार के संज्ञान और यथार्थ की गतिविधि के बीच सहज ही बन जाता है और जिसमें तमाम तरह के धोखे और स्वांग डेरे डाले रहते हैं। यह कोशिश दरअसल यथार्थ की छटाओं को, उनकी तमाम गतिविधियों और प्रपंचों को खुली आँखों, सादगी के साथ, उसकी स्वाभाविकता में, गद्यात्मकता और लौकिकता में देखने-जाने और उसी भाषा में रचने की योजना का ही हिस्सा थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि रघुवीर सहाय ने कवि के संज्ञान की विधि को कई तरह की रूढ़ियों और कर्मकांडों से आजाद कर दिया और उसकी सृजनशील कल्पना के क्षेत्र को भी काफी कुछ बदल दिया। इस नए मैदान में कविकर्म के लिये जहाँ ढेरों नयी (कई बहुत भारी) असुविधाएं हैं, वहीं यह तय है कि इससे रचना की बिलकुल विरल, व्यापक और वास्तविक संभावनाएं खुली हैं। आधुनिक कविता और मुक्तिबोध की परम्परा में यह एक चीज रघुवीर सहाय का अपना योगदान कही जा सकती है।

रघुवीर सहाय का निधन एक ऐसे समय हुआ है जब तमाम रचनाशील जनतांत्रिक तत्वों के बीच गहरे संवाद और एक नयी किस्म की एकता की जरूरत सबसे ज्यादा बन रही थी। रघुवीर सहाय इस संवाद का शायद सबसे जरूरी पक्ष थे।

पिछले दिनों से (खासकर पिछले दो संग्रहों की कविताओं में) रघुवीर सहाय अधिक अकेले दिखायी देते थे। वहां वह नागरिक दिखायी देता था जो व्यथा के भार से थक चला था, अपने अकेलेपन में जो अपने आपसे और अपने लोगों से इस तरह जुड़ गया था जैसे किसी अप्रत्याशित हमले का सामना करने के लिए सन्नद्ध हो रहा हो। मृत्यु की नीली रेखा जो जब-तब दिखायी देने लगी थी वह यकीनन अपनी मृत्यु की नहीं थी। शायद फासिस्ट घेराबंदी में घेरा जाता हुआ वह हमारा अपना वक्त ही था।
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5 comments:

वर्षा said...

अक्सर अच्छी चीजों पर टिप्पणी देना मेरे लिये मुश्किल होता है। रघुवीर सहाय की कविताओं की संग्रह की एक किताब मेरे पास है, तो पढ़ी हैं, कुछ हमेशा ज़ेहन में रहती हैं। मनमोहन की कविताएं-लेख भी आपके द्वारा पढ़े हैं। यहां दोनों का संगम है।

ali said...

"शायद फासिस्ट घेराबंदी में जाता हुआ वह हमारा अपना ही वक़्त था"
रघुवीर सहाय पर मनमोहन सिंह , प्रस्तुति के लिए आपका हार्दिक आभार !

अजित वडनेरकर said...

महत्वपूर्ण आलेख। पिछली कड़ियां पढ़नी होंगी। फिर लौटता हूं।

रंगनाथ सिंह said...

साहित्य इतिहास के मानचित्र पर दो बिन्दु चिन्हित करके उन्हें सीधी रेखा से जोड़ देने की कवायद नामवर सिंह ने शुरू की थी। खैर मनमोहन ने रघुवीर को मुक्तिबोध से जोड़ा है। नामवर जी तो आधुनिक कवियों को सीधे तुलसी या कबीर से जोड़ देते हैं। बीच का काव्य-इतिहास घलुआ समझो। नामवर जी की शैली का प्रभाव हम सब पर पड़ा है। जाने-अनजाने हम सब नामवर जी द्वारा प्रचलित किए गए स्थापत्य की जद में आ जाते हैं। काव्य-इतिहास के इतर दो कवियों में काव्य-कर्म की साम्यता को आधार बनाया जाए तो भी रघुवीर सहाय को सीधे-सीधे मुक्तिबोध से नहीं जोड़ा जा सकता। क्या हम भूल सकते हैं कि रघुवीर सहाय अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक भद्र कवि हैं। यह भद्रता मध्यवर्गीय संस्कारों को संरक्षित रखते हुए असहमति जताती है। रघुवीर सहाय मेरे प्रिय कवि रहे हैं। शायद समूचे मध्यवर्ग के प्रिय कवि रहे हैं। और शायद यही कारण हैं कि नामवर ंिसंह जैसे आलोचकों को राजकमल चैधरी और अन्य बिदकाते हैं। जबकि सहाय सुहाते हैं। कई लोगों को रघुवीर सहाय की कविता भयानक खबर की कविता लगती है। ऐसी खबर जो स़ड़क से चलकर वाया अखबार संसद तक का सफर तय करती है। और संसद में ही अपना दम तोड़ देती है। ऐसी खबर की पुष्टि रामदास जैसी अदभूत कविताओं द्वारा होती है। लेकिन संसद की जो समझ धूमिल को संसद से सड़क तक या फिर सुदामा पाण्डे का जनतंत्र में थी वह समझ रघुवीर सहाय के यहाँ नागरिक बोध में दब जाती है। किसी कवि का समेकित मूल्याकंन करने के लिए हम उसकी सिर्फ दो-चार कविताओं को आधार नहीं बना सकते। हमें उसे उसके आदि से अंत तक देखना होगा। मनमोहन ने इस लेख का शीर्षक सर्वाधिक अर्थप्रद रखा है। व्यथा के बोझ से दबा हुआ नागरिक-रघुवीर सहाय। यही सहाय की कविता की सीमा भी थी। नागरिक बोध के अंदर रह कर पनपने वाली परिवर्तनकामी भावना व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की अकाँक्षा रखने वाली भावना से कोई साम्य नहीं रखती। इसी ब्लाग पर प्रणय कृष्ण के नक्सलबाड़ी के संदर्भ में लिखे लेख में कई कविताओं के उद्धरण दिए गए हैं। उन टुकड़ों को सामने रख कर देखने से स्पष्ट होगा कि अपने समय के गवाह रहे दो कवियों के काव्य-अनुभवों में क्या फर्क है। निश्चय ही मैंने यहाँ विस्तार से अपनी बात नहीं रखी है। कारण आप सब समझ सकते हैं। कवितामय होते साहित्यजगत को देखकर कहना चाहुँगा कि कविता लिख कर रिक्त स्थानों को भरने के दायित्व से बचा जा सकता है। गद्य आपको यह अनुमति नहीं देता। रघुवीर सहाय को इस बात को एहसास था कि जहाँ बहुत अधिक कला हो वहाँ परिवर्तन की गुजांइश उतनी ही कम होती है। काव्य-कला के सिद्धों के लिए रघुवीर सहाय को इस संदर्भ में याद रखना चाहिए।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

मै रंगनाथ से सहमत हूं।

रघुवीर सहाय की पूरी कविता दृष्टि मुझे एक असहायता बोध से ग्रस्त लगती है। जहां कविता समकालीन संघर्षों से नज़र चुराकर बस अपनी खोल में सिमटी शिकायत सी करती रहती है। उनकी भाषा और शिल्प ने बाद में प्रगतिशील-जनवादी कविओं को काफ़ी प्रभावित किया और यह इस बात का भी द्योतक था कि बाद के दौर कि कविता भी बस शिकवे-शिकायत या भद्रलोक के जनतांत्रिक मनुष्य की उकताहट को ही शब्द देती रही।