Thursday, March 26, 2009

पर यह वही दुनिया है : असद ज़ैदी


आज से तीस पैंतीस साल पहले के वक़्त को याद करते हुए लगता है कि वो कोई और ही दौर था. बार बार ध्यान बदलाव पर ही जाता है, निरंतरता पर नहीं. मन भी नैरन्तर्य को, बहाव को स्वीकार करने का नहीं होता, सिर्फ़ खंडित यथार्थ का ही हम रोना रोते रहते हैं. लेकिन अक़्ल जानती है कि यह सही नहीं है. जैसे सत्तर के दशक में यह अकल्पनीय था कि दुनिया एकध्रुवीय हो जाएगी, और समाजवादी विश्व -- सोवियत संघ, चीन, पूर्वी यूरोप, विएतनाम, उत्तरी कोरिया और कई देशों की अर्धसमाजवादी व्यवस्थाएं -- अपने दुश्मनों की कल्पनाओं के परे जाकर इतनी जल्दी टूटकर बिखर जाएंगी. क्यूबा एक अपवाद की तरह खडा रहेगा, समाजवादी विश्व के विघटन के बीस साल बाद भी.
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पर आज हम कुछ और ही हाल देख रहे हैं. विश्व पूंजीवाद चारों दिशाओं में जयघोष करने के बाद आज ख़ुद अपने ही पैदा किए ज़लज़लों की चपेट में है, यह उन्हीं पिछले हादसों का नतीजा है. समाजवादी विकल्प के कमज़ोर पड़ने और हालिया तौर पर ध्वस्त होने के बाद अमरीकी और पश्चिमी दुनिया को लगा कि अब दुनिया पूंजीवाद के लिए 'सेफ़' है : विकसित देशों की पूंजीवादी सरकारों ने एक एक करके वे सब कल्याणकारी नीतियाँ त्याग दीं जो समाजवादी विश्व से प्रतियोगिता के कारण उन्हें अपनानी पड़ीं थीं. अब पूंजीवाद बिना रंग रोगन के, बिना 'मानवीय चेहरे' के धड़ल्ले से राज कर सकता है. पिछले बीस सालों के आर्थिक 'नव-उदारवाद' और ग्लोबलाइज़ेशन ने जिस लूटमार और बर्बरता की शुरूआत की है वह इतिहास में बेमिसाल है.
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विश्व अर्थव्यवस्था एक ऐसे संकट में फँस गयी है कि बहुत जल्दी ग़रीब और निम्न मध्यवर्ग के लोगों को खाने के लाले पड़ जाएंगे. पीने तक का पानी दूभर हो जाएगा, आम बीमारियों का इलाज करना सबके लिए सम्भव न रह जाएगा, आम
सार्वजनिक सुविधाएं भी पैसे देने पर ही उपलब्ध होंगी. हमारा इतना बड़ा हिंदुस्तान देश एक पिद्दी और असुरक्षित से खित्ते की तरह अमरीका और इस्राइल जैसे देशों की सस्ती दलाली पर उतर आया है. यह भी पूंजी की इस बेलगाम और विचाररहीन 'प्रगति' का ही अंजाम है.
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'नव-उदारीकरण' के घोड़े पर बैठे हिन्दुस्तानी शासक वर्ग को इस का भी तजरुबा नहीं है कि पूंजीवाद की चरम अराजकता को कैसे सम्भाला जाए. हिन्दुस्तान में बहुत जगह ऐसी हालत आ रही है कि ज़मीन के चप्पे चप्पे का निजीकरण हो रहा है, बैठने के लिए जगह और चलने के लिए फ़ुटपाथ तक ग़ायब होते जा रहे हैं. पूरे मुल्क पर बस दस-पन्द्रह प्रतिशत लोगों का क़ब्ज़ा हो रहा है : ज़मीन, पानी, हवा, खनिज संपदा हर चीज़ बस इन्हीं चुने हुए लोगों के लिए है, बाक़ी लोग तो जैसे ग़ैर-ज़रूरी आबादी का हिस्सा हैं! लोकतंत्र एक एलीटिस्ट निज़ाम -- भद्रलोक-तंत्र -- में बदलकर रह गया है. अवाम का डर अब किसी को नहीं रहा. एक जन-बहुल देश में पूंजीवाद और व्यक्तिवाद की ऐसी शक्ल अंत में भयानक गृहयुद्ध , नरसंहार और फ़ासिज़्म की ही भूमिका बना सकती है. कई बार लगता है कि वह वक़्त भी आ ही गया.
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आज यह भी साफ़ है कि सत्तर के दशक में जो उम्मीदें और आरज़ुएं उभरी थीं, और हार-जीत का जो सिलसिला राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बना था, उससे लोगों के मन में आशा-निराशा के साथ साथ अगला क़दम उठाने, अपने को सही करने का जज़्बा पैदा होता था, न कि अपनी कार्यसूची को फेंक कर बैठ जाने और अपने को हालात के हवाले कर देने का. वियतनाम में अमरीका की शिकस्त ने एक पीढ़ी को साम्राज्यवाद-विरोध में दीक्षित किया, भारत में इंदिरा गांधी के आपातकालीन शासन ने राजनीतिक मदरसे का ही काम किया. इससे पहले बिहार आन्दोलन, रेल हड़ताल, नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने मुल्क की
अंतरात्मा को झकझोरा था. इस दौर में अवाम ने अपनी ताक़त का इस्तेमाल किया, लगा कि जनशक्ति ही आने वाले भारत की कार्यसूची तय करेगी.
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सत्तर के दशक में जवान हुए लोगों की ट्रेजेडी यही है कि उनमें से बहुत से लोग लड़े थे, उन्होंने बड़े सपने देखे थे, फिर उनमें से कुछ सिस्टम में जज़्ब हो गए, उसकी खाद बन गए, बाक़ी का अधिकांश क्रिकेट की भाषा में कहें तो 'रिटायर्ड हर्ट', यानी थक कर या चोट खाकर बैठ गया. उनके पास अगली पीढ़ी से कहने के लिए कुछ नहीं था. अगली पीढ़ी ने भी उनसे कुछ नहीं लिया, अगर लिया भी तो उत्तरकालीन अवसरवाद.
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हिन्दुस्तान में आज फासिस्ट ताक़तें सार्वजनिक जीवन में जगह बना चुकी हैं और हर तरफ़ दनदनाती फिरती हैं. यह पिछले दौरों की राजनीतिक और सामाजिक अदूरदार्शिताओं और हमारे लोकतांत्रिक निज़ाम के लंगड़ेपन का नतीजा हैं. कौन कह सकता है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर स्वर्गीय संजय गांधी की राजनीतिक वारिस नहीं हैं. इतिहास, या कहिये कि समय, पहले के अनदेखे सूत्रों को स्पष्टता से दिखा देता है. हर तरफ़ दलालों और सटोरियों की बन आई है. विचार, राजनीति, संस्कृति और मीडिया के क्षेत्र भी इन से मुक्त नहीं हैं, बल्कि कुछ मामलों में तो पहल इन्हीं की तरफ़ से होती है.
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जो लोग पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर सक्रिय थे उनके लिए आज के ज़माने में जीना एक शर्म के साथ जीना है (मैं उन मोटी खाल वाले बेशर्मों का ज़िक्र नहीं करता जो हर युग में मस्ती से जीना सीख लेते हैं). यहाँ तक कि वे संगठन, आन्दोलन और राजनीतिक तंजीमें जो बदलाव का परचम लेकर चलती थीं आज अपने ही अतीत से मुंह फेरे खड़ी हैं या हताश हैं, व्यक्तियों की तो बात ही क्या. पर ऐसा नहीं है कि आशा के सारे स्रोत सूख गए हैं. ये स्रोत आज के सामाजिक और नैतिक कबाड़ के बीच ही दबे हुए हैं. पूंजीवादी समाज की अपनी उथल पुथल इन स्रोतों का
रास्ता दिखा देगी. यह मेरा अक़ीदा है और इसकी जांच भी फ़ौरन हो जाएगी कि भारतीय राज्य बहुत जल्द ही – फ़ौरन से पेश्तर – अमरीकी साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिक फ़ासीवाद पर अपनी निर्भरता की महँगी क़ीमत चुकाएगा. व्यापक
अवामी प्रतिरोध ही मुल्क को उस गड्ढे से निकाल पाएगा. देखना यह है कि क्या आज बाएँ बाजू के जो संगठन मौजूद हैं वे इस प्रक्रिया को संभाल पाएंगे!
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मैं अपनी ही पीढ़ी की बात करूँ. मेरी सब से बड़ी मायूसी इस बात से है कि बहुत से प्रगतिकामी लोग, प्रतिरोध की राजनीति में विश्वास रखने वाले लोग, भी दौलत, सत्ता और ताक़त के केन्द्रों से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते. वे पता नहीं क्यों एक प्रकार की हीनता और नाकामी के अहसास के साथ जीते हैं, जैसे प्रतिरोध और संघर्ष से बने अपने अतीत को लेकर शर्मसार हों या भूलना चाहते हों. अपनी जिन बातों पर उन्हें गर्व करना चाहिए उन्हें छिपाते फिरते हैं. ऐसे लोग एक दोहरी यातना में जीते हैं, क्योंकि वे अपनी उपलब्धियों को बड़े सस्ते में लुटा दे रहे हैं. उनका सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वे आने वाले लोगों के लिए प्रेरणा बनने में असफल हैं.
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(यह "आज समाज" अखबार के 'यह दशक–वह दशक' नाम के स्तम्भ के लिए लिखा गया था, और जनवरी में किसी तारीख को छपा था.)
इसी ब्लॉग पर यह पुरानी पोस्ट भी देखें -
`बहनें और अन्य कविताएं` की भूमिका

Saturday, March 21, 2009

Thursday, March 19, 2009

वरुण गांधी जैसी भाषा बोलता ब्लॉग


आप गौर करें इन दिनों एक ब्लॉग संचालक व उस पर अवतरित हो रहे `हिंदी साहित्यकारों ' की भाषा और वरुण गांधी की भाषा में कोई फर्क नहीं मिलेगा। यह ऐसी कुटिल भाषा है जो अपनी लफंगई और बेशर्मी का लाभ चाहती है। इनमें से एक तो बाकायदा नवजागरण के `पुरोधा' है, `क्रांतिकारी' हैं पर उनके साथ ये विशेषण वैसे ही हैं जैसे वरुण के साथ गांधी शब्द चिपका है। एक साहित्यकार हैं जो कुछ वक्त पहले खुद युवा लेखन पर एक टिप्पणी को लेकर बुरी तरह पिट रहे थे। हालांकि अपना मानना यही रहा है कि उस टिप्पणी में उनके कुछ जेनुइन कंसर्न थे जिन पर गौर करने के बजाय उन पर लफंगई ढंग के हमले शुरू कर दिए गए थे। हैरानी की बात यह है कि अब वे खुद ऐसी भाषा पर उतर आए हैं। एक पत्रकार महोदय हैं, जिनके लिए साहित्य महज किसी खबरी तड़के की तरह है। हालांकि पिछले दिनों वे खुद शर्मनाक आरोपों से घिरे हुए थे। हिंदी पट्टी का यह घोर दुर्भाग्य ही है।
अपने प्रिय कवि-विचारक मंगलेश डबराल पर किए जा रहे घटिया हमलों की निंदा करते हुए मैं अपने मित्रों के साथ उनकी कुछ कविताएं ही पढ़ना चाहता हूं -

अभिनय
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एक गहन आत्मविश्वास से भरकर
सुबह निकल पड़ता हूँ घर से
ताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँ
एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ
वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी
एक से तपाक से हाथ मिलाता हूँ
वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत
एक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँ
वह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते हो
जिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखा
वे कहते हैं अरे आप टीवी पर दिखे थे एक दिन


बाज़ारों में घूमता हूँ निश्शब्द
डिब्बों में बन्द हो रहा है पूरा देश
पूरा जीवन बिक्री के लिए
एक नई रंगीन किताब है जो मेरी कविता के
विरोध में आई है
जिसमें छपे सुन्दर चेहरों को कोई कष्ट नहीं
जगह जगह नृत्य की मुद्राएँ हैं विचार के बदले
जनाब एक पूरी फ़िल्म है लम्बी
आप ख़रीद लें और भरपूर आनन्द उठाएँ


शेष जो कुछ है अभिनय है
चारों ओर आवाज़ें आ रही हैं
मेकअप बदलने का भी समय नहीं है
हत्यारा एक मासूम के कपड़े पहनकर चला आया है
वह जिसे अपने पर गर्व था
एक ख़ुशामदी की आवाज़ में गिड़गिड़ा रहा है
ट्रेजडी है संक्षिप्त लम्बा प्रहसन
हरेक चाहता है किस तरह झपट लूँ
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार ।
(1990)


पत्तों की मृत्यु
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कितने सारे पत्ते उड़कर आते हैं
चेहरे पर मेरे बचपन के पेड़ों से
एक झील अपनी लहरें
मुझ तक भेजती है
लहर की तरह कांपती है रात
और उस पर मैं चलता हूं
चेहरे पर पत्तों की मृत्यु लिए हुए

चिड़ियां अपने हिस्से की आवाज़ें
कर चुकी हैं लोग जा चुके हैं
रोशनियां राख हो चुकी हैं
सड़क के दोनों ओर
घरों के दरवाज़े बंद हैं
मैं आवाज़ देता हूं
और वह लौट आती है मेरे पास.
(1979)


कविता
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कविता दिन-भर थकान जैसी थी
और रात में नींद की तरह
सुबह पूछती हुई :
क्या तुमने खाना खाया रात को?
(1978)


Fascism Grows in Black Rain Painting by Adam Gillespie

Monday, March 16, 2009

सागरिका घोष सरदेसाई के लिए अछूत हैं मायावती?



तो क्या मीडिया को यह खतरा सताने लगा है कि मायावती इस बार प्रधानमंत्री बन सकती हैं? कुछ देर पहले एक टीवी चैनल पर इस बाबत हो रही बहस के एंकर (होस्ट) के बेचैनी भरे तेवर देखकर यही लगा। चैनल था सीएनन-आईबीएन और एंकर थीं सागरिका घोष सरदेसाई (जनाब राजदीप सरदेसाई की बीवी)। कहने को वे जानना चाह रही थीं कि क्या मायावती के पीएम बनने के सवाल पर देश का इलीट बायस है। लेकिन वे जानना कम चाह रही थीं बल्कि चीखकर बता ज्यादा रही थीं। वे मायावती को लेकर बार-बार धड़ल्ले से जिस फ्रेज़ का उपयोग कर रही थीं, वह था `अनटचेबल वूमन`। शायद अंग्रेजी में उनके मन की पूरी नहीं हो पा रही थी, इसलिए वे ज्यादा प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए `अछूत' भी कह दे रही थीं। जाहिर है कि वे खुद इलीट महिला हैं और इस नाते उनमें तमाम योग्यताएं हैं। इसीलिए उन्हें यह भी अधिकार है कि वे दलित तबके से आई एक लोकप्रिय नेत्री को संविधान और न्यूनतम मानवीय गरिमा की परवाह किए बगैर टेलीविजन पर अछूत-अछूत चिल्लाती रहें। उनके मन में यह सब भरा है तो वे बेकार ही मायावती की योग्यता, उनकी इंटलेक्चुअलिटी आदि को लेकर सवाल पूछ रही थीं। जवाब तो उनके पास पहले ही थे। हालांकि इस तरह वे देश के बाकी 'इलीट' तबके की तरह अपनी योग्यता और इंटलेक्चुअलिटी का ही परिचय दे रही थीं, जिसके प्रदर्शन में इस वर्ग को कभी शर्म भी नहीं रही।

पुनशचः आप किसी भी `योग्य और इलीट' से बात करें तो अंबेडकर, फुले, रैदास आदि के बारे में भी काफी ज्ञान बढ़ा सकते हैं।

Friday, March 13, 2009

जी, वही मुज़फ़्फ़रनगरी



मेरी पिछली पोस्ट पर एक बेनामी टिप्पणी आई है - 'वाह-वाह! क्या बात है! "वही धीरेश मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद"... (शमशेर जी से क्षमायाचना के साथ). ऐसे ही लिखते रहो प्यारे भाई. शमशेर जी ने यह पढा होता तो खुश होते. कुछ अपने बचपन की बातें बताते, कुछ तुम्हारा हाल पूछते...।'

लगता है कि बेनामी कोई परिचित ही हैं। नहीं जानता कि वे बेनामी क्यों बने। दरअसल मैं अक्सर 'जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद/वही धीरेश मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद' बोल दिया करता था और फिर शमशेर जी का सही शेर पढ़ता था, क्षमायाचना के साथ। दरअसल, अपने शहर बल्कि पूरे जिले की पहचान बेहद नकारात्मक वजहों से बना दी गई है। मुज़फ़्फ़रनगर यानी क्राइम केपिटल। यहां की सियासत यानी बूथ कैप्चरिंग, दबंगों की धींगामस्ती और सांप्रदायिक दंगे। समाज सेवा भी लगभग असामाजिक कृत्यों जैसी। मुद्दत पहले खंदरावली गांव में हुई प्रेमी युगल की हत्या की चर्चित वारदात पर कोई 'समाजसेवी' शर्मिंदा नहीं हुआ था। सामाजिकता के नाम पर प्रेमी जोड़ों की हत्याओं के कीर्तिमान गढ़ने का सिलसिला जारी ही है। गन्ने और गुड़ के उत्पादन में अगुआ इस जिले की किसान राजनीति भी ऐसी कि अति पछड़े और दलित थरथरा कर रह जाएं।

एक ऐसी जगह जहां युवाओं के 'हीरो' माफिया और दबंग राजनीतिज्ञ हों, वहां जी को लगती खरी बात कहने वाला कोई शमशेर हुआ। यह बात कम से कम मुझे मुज़फ़्फ़रनगरी होने के गौरव का मौका देती है। वर्ना 1999 में अमर उजाला ने मुज़फ़्फ़रनगर से यमुनापार करनाल (हरियाणा) भेजा तो मुज़फ़्फ़रनगर का बाशिंदा होने के नाते कई लोगों ने कमरा किराए पर देने से मना कर दिया था। दूसरी ओर, एक प्रोफेसर अबरोल थे जो शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी वाला शेर सुनकर खुश हो गए। अलबत्ता उन्होंने शमशेर के मुज़फ़्फ़रनगरी होने और जाट परिवार से होने पर प्यार से चुटकी जरूर ली थी। अब ये शमशेर के इस शेर का कमाल ही था कि कई बड़े साहित्यकारों ने मुझे लगाव बख्शा। आलोक धन्वा ने तो बाकायदा वायदा लिया कि मैं मुज़फ़्फ़रनगर में शमशेर की याद में कुछ शुरू करुंगा। उन्होंने मुझे बीच में कई बार इस बारे में याद भी दिलाया। अचानक बीमारी ने बेहाल कर दिया और मैं हाल नवंबर में लौटकर बुद्धु की तरह गांव गया तो असद जैदी ने भी शमशेर के गांव जाने का कई बार सुझाव दिया। पर, मेरी हालत तेजी से बदतर होती गई और मैं ठंड़ से बचने के लिए केरल भाग लिया।

हर किसी के अपने शहर की तरह मुज़फ़्फ़रनगर मुझे बेहद अजीज़ है। एक शहर जो मेरी आरजुओं का शहर रहा, जहां मेरे खाब बनते-टूटते रहे और जहां मुझे मुहब्बतें और बदनामियां नसीब हुईं। ऐसे वतन की बुराइयां गिनाना वाकई बेवफाई है मगर मुझे लगता है कि इस बदहाली पर लानतें न भेजना और भी ज्यादा बेवफाई होगी। अर्ज यह कि मुज़फ़्फ़रनगर जिले के बाशिंदों को कोई अहसास दिलाए कि यहां किराना (जिले का कैराना कस्बा) जैसे संगीत घराने और अहसान दानिश जैसे शायरों की भी लंबी गौरवशाली परंपरा है। इसका मैं यदा-कदा उल्लेख भी करना चाहता हूं।

बहरहाल, अपने इस महान मुज़फ़्फ़रनगरी के ये शेर-


जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

आज फिर काम से लौटा हूँ बड़ी रात गए
ताक़ पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायद

मेरी बातें भी तुझे ख़ाबे-जवानी-सी हैं
तेरी आँखों में अभी नींद भरी है शायद!

Monday, March 9, 2009

उन स्त्रियों का वैभव

एक महिला साथी ने अपने ब्लॉग पर पाठकों से पूछा है कि वे उन तीन स्त्रियों के नाम बताएं, जिनसे वे सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं। उन्होंने ऐसे तीन पुरुषों के नाम बताने का भी आग्रह किया है। सेलिब्रेटीज से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं और वे तपाक से कोई तीन नाम गिना देते हैं जिनमें प्रायः पहले नाम के रूप में मां बोला जाता है।
मैं यूं ही सोचते-सोचते बचपन में लौटने लगा। धुंधली सी यादों में बहुत से धूसर से, बेनाम से चेहरे तैरने लगे। मैले-कुचैले कपड़ों वाली किसान-मजदूर स्त्रियां जो अक्सर चाची, ताई और कोई-कोई बुआ होती थी, बहुत सी युवा लड़कियां जो मां के आग्रह पर मुझे अपने साथ रामलीला ले जाती थीं, इन चेहरों में थीं। अचानक पड़ोस की एक काली लड़की बेहद याद आई जिसने एक भरी दुपहरी मुझे अपने चौबारे में बुलाया और अपने दिल की बातें एक कागज़ पर लिखवा दीं - `मैं तेरी मोहब्बत में मर जाऊंगी, अक्षय।' फ़कत एक लाइन लिखा दी थी और फिर नीचे अपना नाम लिखने के लिए कहा था। उसने मुझ तीसरी कक्षा के मासूम से बच्चे पर भरोसा कर यह चिट्ठी अक्षय तक पहुंचाने का वादा भी लिया। मेरे गांव की उसी पुरानी मनुहार भरी बोली में - `बाई बी मेरा'। अक्षय उस साल रामलीला में राम का पाठ खेल रहा था। उस जमाने में जब टीवी नहीं था तो लड़कियों में ही नहीं, गांव के भले और शोहदे लोगों में भी रामलीला के एक्टरों का भारी क्रेज हुआ करता था।
मुझे जाने क्या सूझा कि मैंने वह चिट्ठी अपनी मां को जा थमाई और कोई बड़ा रहस्य खोल देने के कारनामे के गौरव से भर गया। और मेरी मां ने यह चिट्ठी उस लड़की की मां को थमा दी और फिर वह उसके पिता तक जा पहुंची। गो के न उस लड़की को और न उसके मां-बाप को कोई एक हरुफ पढ़ना आता था पर चिट्ठी का मजमून तो मां ने उन्हें रटवा ही दिया था।
फिर एक ऐसी ही सूनी दोपहर में उस लड़की ने मुझे अपने घर के आगे पकड़ लिया। मैं शर्म और डर से कांप रहा था। वो मुझे अपने किवाड़ के पीछे ले गई। फिर बेहद बेबस से भाव से मेरी ओर देखकर बोली, 'बाई, तुझे क्या मिला?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उसी कातर दृष्टि के साथ उसने फिर कहा, `तुझे पता, मेरे चाच्चा ने मुझे कितना पिट्टा?' (उस जमाने में मेरे गांव में बहुत से लोग पिता को चाच्चा ही कहते थे।)फिर उसने अपनी टांगों से सलवार थोड़ा ऊपर उठाया और कहा, `देख सारे गात पर लील ही लील पड़रे।' मुझे काटो तो खून नहीं था। मुझे लगा कि वाकई मैंने बहुत बड़ा धोखा किया है। मैं किसी तरह वहां से चला आया पर एक रात, दो रात और कितनी ही रात ढंग से सो नहीं सका।
उस दिन के बाद अचानक वह लड़की जो अपने रंग-रूप की वजह से मुहल्ले भर में बेहद उपेक्षित थी, मुझ बच्चे को बेहद सुंदर लगने लगी। मैं उसके उस सपने में जिसने चिट्ठी की शक्ल अख्तियार की थी, अक्सर घूमता और फिर शर्मिंदा सा लौट आता। अचानक रात में नींद खुलती और मैं सोचता कि मैं किसी तरह उस लड़की से माफी मांग लूंगा।
कोई बेहतरीन कहानी हम पर कई बार गहरा असर करती है और हम चीजों को मानवीय ढंग से देखने लगते हैं। सच बताऊं, इस घटना से उपजे अपराधबोध का असर भी मुझ पर ऐसा ही हुआ। कुछ दिनों बाद उस लड़की का ब्याह हो गया। संयोग यह कि हम फिर कभी मिल भी नहीं पाए। इस बात को जमाने गुज़र गए हैं पर उसकी कातर सी आंखें और उसका सवाल आज तक मेरा पीछा करते हैं। काश मैं बता पाता कि मुझे क्या तहज़ीब और तमीज मिली उससे।
गांव की बेढ़ब ज़िंदगी में ऐसे ही कई और स्त्री चेहरे मुझे याद आ रहे हैं। जिनका जिक्र बेहद निजी को सार्वजनिक करने जैसा लगता है। ये साधारण स्त्री चेहरे गहरे संकटों में मेरे मनुष्य को बचा लेते हैं।
.....काफी देर सोचते रहने के बाद न जाने क्यों मुझे आलोक धन्वा की यह कविता याद आने लगी -

चौक
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उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा
जिन्‍होंने मुझे चौक पार करना सिखाया।

मेरे मोहल्‍ले की थीं वे
हर सुबह काम पर जाती थीं
मेरा स्‍कूल उनके रास्‍ते में पड़ता था
माँ मुझे उनके हवाले कर देती थीं
छुटटी होने पर मैं उनका इन्‍तज़ार करता था
उन्‍होंने मुझे इन्‍तज़ार करना सिखाया

कस्‍बे के स्‍कूल में
मैंने पहली बार ही दाख़िला लिया था
कुछ दिनों बाद मैं
ख़ुद ही जाने लगा
और उसके भी कुछ दिनों बाद
कई लड़के मेरे दोस्‍त बन गए
तब हम साथ-साथ कई दूसरे रास्‍तों
से भी स्‍कूल आने-जाने लगे

लेकिन अब भी
उन थोड़े से दिनों के कई दशकों बाद भी
जब कभी मैं किसी बड़े शहर के
बेतरतीब चौक से गुज़रता हूँ
उन स्त्रियों की याद आती है
और मैं अपना दायाँ हाथ उनकी ओर
बढा देता हूँ
बायें हाथ से स्‍लेट को संभालता हूँ
जिसे मैं छोड़ आया था
बीस वर्षों के अख़बारों के पीछे।

Saturday, March 7, 2009

अंतहीन श्रृंखला

इस समय तो भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे पक्षी पाल लेता है, उपयोग के लिए गाय या घोड़ा पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालित पशु-पक्षियों के समान ही वह उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है। हमारे समाज के पुरुष के विवेकहीन जीवन का सजीव चित्रण देखना हो तो विवाह के समय गुलाब सी खिली हुई स्वस्थ बालिका को पांच वर्ष बाद देखिए। उस समय उस असमय प्रौढ़ा, कई दुर्बल संतानों की रोगिणी पीली माता में कौन सी विवशता, कौन सी रुला देनी वाली करुणा न मिलेगी?
-महादेवी वर्मा (श्रृंखला की कड़ियां में संकलित एक निबंध से)

पेटिंग- अमृता शेरगिल

Monday, March 2, 2009

सुदीप बनर्जी की ग़ैरहाज़िरी -असद ज़ैदी

कवि, विचारक, योजनाकार और जन-सेवक सुदीप बनर्जी (1946–2009) पिछले कुछसमय से मौत के घेरे में थे. बड़ी हिम्मत और ज़ब्त के साथ उन्होंने अपनीबीमारी – कैंसर – का सामना किया. उनके जाने से बहुत सी जगहों में एकसूनापन पैदा हुआ है जो एक लंबे अरसे तक बना रहेगा. वह ऐसे मित्र नहीं थेजिन्हें आप भूले रहें. जिनसे उनकी मुलाक़ात कम-कम होती थी – और ऐसे लोगहज़ारों में हैं – उनके यहाँ भी उनकी मौजूदगी का अहसास हमेशा बना रहताथा. दोस्ताना पैदा कराने का उनका ख़ामोश अंदाज़ और शरीफ़ाना तरीक़े सेलोगों के दिल और दिमाग़ में एक हस्तक्षेपकारी रोल हासिल कर लेना उन्हेंआता था. तमाम उम्र उन्होंने इस हुनर को माँजा. इससे उनकी बुनियादी फ़ितरतऔर इंसानी महत्वाकांक्षा का पता चलता है. वह इस बात की इजाज़त नहीं देतेकि आप उन्हें एक नेक और दर्दमंद इंसान के अलावा किसी और रूप में यादकरें.

वह अपने कैरियर की शुरूआत से ही से भारतीय प्रशासनिक सेवा के एकअवाम-दोस्त अफ़सर के रूप में मशहूर होने लगे थे. जैसे जैसे वक़्त बिगड़तागया और भारतीय राजनीति पर दक्षिणपन्थी साये गहराने लगे और सिविल सर्विसनेहरू-युगीन परम्पराओं को लात मारकर तत्परता से एक आत्मकेंद्रित, भ्रष्टऔर जन-विमुख संस्थान में बदलने लगी, सुदीप जैसे अफ़सर की यह अवाम-दोस्तशोहरत ज़्यादा पुख्ता और जोखिम-भरी होती गयी. नौकरशाही हलक़ों मेंवामपंथी के रूप में उनकी ख्याति दरअसल एक दुधारी तलवार थी और लोगों कोपहले ही से आगाह करने का ज़रिया थी. इस स्थिति ने सुदीप को बहुत सावधानआदमी तो बनाया, पर उनका ईमान कभी नहीं बदला.

वह मूलतः उन संकल्पों के प्रति वफ़ादार रहे जिनके साथ आज़ाद हिन्दुस्तानने अपना लोकतांत्रिक-संवैधानिक सफ़र शुरू किया. वह हमेशा स्थापित नियमोंकी अधिकतम प्रगतिशील और जनहितकारी व्याख्या की गुंजाइश निकालते रहते थे. आजहालत यह है कि कोई इतना न करे, बस हुकूमत और अफ़सरशाही निज़ाम केनियम-क़ायदों के भीतर रहते हुए जन-हित में काम कर दे तो ऐसे अफ़सर कोतत्काल फ़रिश्ते का दर्जा हासिल हो जाता है. सुदीप के ऊपर फ़रिश्ता होनेके अलावा एक साधारण, विनम्र और अच्छे इंसान होने का भार भी था. इस दोहरेभार को लिए हुए ही वह विदा हुए हैं.
अपने प्रशासनिक जीवन के पहले हिस्से में उन्हों ने मध्यप्रदेश मेंआदिवासी और ग़रीब जनों के कल्याण की जो योजनाएं बनाईं और क्रियान्वितकिया वे आज भी याद की जाती हैं. मसलन मध्यप्रदेश की तेंदू-पत्ता नीति औरस्लम-निवासियों को आवासीय पट्टे दिलाने में उनकी भूमिका. भोपाल गैस काण्डके लिए ज़िम्मेदार अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड को घेरने और उसकेख़िलाफ़ पक्के सबूत मुहैया कराने में सुदीप का हाथ था. शायद बहुत लोगोंको यह मालूम न हो कि अर्जुन सिंह के राज्यपाल वाले कार्यकाल के दौरानपंजाब समझौते (राजीव-लोंगोवाल समझौते) का आधार तैयार करने वाले अधिकारीसुदीप ही थे. उन्हीं ने मध्यप्रदेश में मलखान सिंह और फूलन देवी कोआत्मसमर्पण के लिए राज़ी किया था. अपने कैरियर के उत्तरार्ध में उन्होंनेशिक्षा के क्षेत्र में यादगार काम किए. राष्ट्रीय साक्षरता मिशन केमहानिदेशक के रूप में उन्होंने साक्षरता अभियान में जान डालने, इसेव्यापक बनाने और बुद्धिजीवी वर्ग को – लेखकों, फ़िल्मकारों औरसमाज-विज्ञानियों को – इसमें खींचकर लाने का काम किया. बाद में जब वहउच्च-शिक्षा सचिव बने तो कई ऐसे क़दम उठाए जिनका महत्त्व आने वाले वक़्तमें साफ़ हो जाएगा. दिल्ली का जामिया मिल्लिया अगर आज एक ज़्यादा जीवंत,रौशन और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है या होता नज़र आता है तो इसका मुख्यश्रेय सुदीप बनर्जी को ही जाना चाहिए.

सुदीप को शायद ही कभी फुरसत देखने को मिली हो. उनके असमय निधन का एकमार्मिक पहलू यह भी है कि अपनी बीमारी के आख़िरी दौर में उनका ध्यान शायदपहली बार इतनी शिद्दत के साथ जीवन की मामूली खुशियों और छोटे छोटे शग़लोंकी तरफ़ जाने लगा था. बड़े अरमान के साथ एक रोज़ अचानक बोले कि अगरसिर्फ़ पलुस्कर (शास्त्रीय गायक दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर) को सुनने केलिए एक जीवन जीना पड़े तो वह जीना सार्थक और काफ़ी होगा. उनके कमरे मेंएक सी डी प्लेअर रखा था जो उनका बेटा गौरव किसी वक़्त अपने लिए लायाहोगा. अब वह बाजा काम न करता था. मेरे और मंगलेश डबराल के आग्रह परउन्होंने किसी को बुलाकर उस बाजे को सुधरवाया और कुछ दिन तक उसपर संगीतसुना. शायद अब्दुल करीम खां को सुनते रहे. कुछ दिन तक चलने के बाद वहबाजा फिर ख़राब हो गया. तब तक वह ख़ुद भी इतने बीमार हो गए थे कि कि कुछऔर करने की हालत में नहीं रह गए थे.

उन्हें आभास था कि उनकी बीमारी आसानी से जाएगी नहीं, और शायद घातक हीहोगी. तीन चार महीने पहले आल इंडिया इन्स्टिट्यूट के प्राइवेट वार्ड मेंमैं उनसे मिलने गया. वह बहुत कमज़ोर हो गए थे और एक ख़ाके या रेखाचित्रकी तरह लग रहे थे. कहा कि मैं तो खुशक़िस्मत हूँ कि यहाँ हूँ, और इतनीअच्छी देख-भाल हो रही है, अपनी ज़िंदगी को लंबा खींचने की कोशिश कर सकताहूँ. ज़्यादातर लोग तो दवा-इलाज की पहली स्टेज पर ही हार जाते हैं,उन्हें तो संसाधनों की कमी ही मार डालती है. राजकीय सेवा में होने की वजहसे मुझे यह सब मयस्सर है. फिर इस ज़िक्र से थक कर बोले: बताओ क्या ख़बरहै? दोस्त लोग क्या कर रहे हैं? मैंने सोचा कि हो सकता है इस हालत मेंउन्हें यह बताने की किसी को सूझी न हो इसलिए मैं ही बता दूँ : किज्ञानरंजन ने 'पहल' को बंद करने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा :अरे...! फिर बोले : कहीं शरारत में तो नहीं कह रहे हो? मैंने कहा : काशऐसा ही होता! कुछ देर बाद बोले : अभी मेरी साँस चढ़ी हुई है, बाद में शामको या कल ज्ञान को फ़ोन करूंगा. वह ऐसा नहीं करें. मेरी बात मान जाएँगे.कुछ दिन बाद बताया कि उन्होंने दो-तीन बार कोशिश की, एक बार नंबर मिल भीगया पर ख़ाली घंटी जाती रही, किसी ने उठाया नहीं.

सुदीप को वह सामान्य जीवन मयस्सर नहीं हुआ जिसमें आदमी कुछ काम करता है,कुछ ठाला बैठता है, बे-इरादा टाइमपास, कुछ मटरगश्ती, कुछ अनियोजितमनोरंजन और फ़ालतू मेल-जोल वग़ैरा करता है, जिसमें फ़राइज़ को पूरा करनेका बोझ भी होता है और उनसे फ़रार की ख़्वाहिश भी और जिसमें डिस्ट्रैकशनभरे होते हैं. जो फ़ुरसत उन्हें मिलती भी, जिसमें वह मित्र-मिलन औरपुर-लुत्फ़ गुफ़्तगू में गुज़ारना चाहते तो भी पूरी तरह नहीं गुज़ार सकतेथे – या तो देश-समाज की बात निकल आती थी, या मित्र लोग अपनी समस्याएँ औरबदनसीबियाँ बताने लगते, और सुदीप अपने स्वभाव के मुताबिक़ उन समस्याओं काहल सोचने लगते. रही सही कसर उनका साहित्य-प्रेम पूरा कर देता था. इसप्रकार सुदीप ने एक भरा पूरा जीवन जिया – काम, ज़िम्मेदारी और उपलब्धिसे भरा जीवन, और हज़ारों लोगों का उन्हें प्यार मिला. पर एक दूसरे जीवन,मामूली जीवन, और उसके हर्ष और विषाद को उन्होंने अपने मित्रों, परिचितोंके जीवन के आईने में ही देखा. उसको जीने का वक़्त उन्हें नहीं मिला.

उनकी कविता की अपनी जगह है. चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, विनोद कुमारशुक्ल, लीलाधर जगूड़ी और ऋतुराज के बाद और आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल सेपहले के अंतराल के सबसे अच्छे हिन्दी कवि निःसंदेह सुदीप ही हैं. पर तमामशोहरे और इज़्ज़त के बावुजूद सुदीप समकालीन हिन्दी कविता के सबसेउपेक्षित और अल्पज्ञात कवियों में हैं. मुझे याद नहीं आता कि मैंने उनकेकृतित्व पर कोई अच्छी समीक्षा, आलेख या टिप्पणी पढ़ी हो. सुदीप ऐसे अकेलेकवि नहीं हैं. (हमारे सामने के लोगों में यह क़िस्सा बहुत से संजीदाकवियों के साथ घटित हुआ है.) पर यह हमारी साहित्यिक अंतरात्मा को खटकनेवाली बात ज़रूर है. यह एक मिथ है कि सुदीप की अपनी कविता के प्रतिनिस्संगता ही इसका एक कारण है. वह बहुत गहरे ढंग से अपने लेखन से, ख़ासकरकविता से, लगाव रखते थे, और उसे लेकर चिंतित भी रहते थे. वह साहित्य-समाजकी उदासीनता और ख़ामोशी से मायूस भी होते थे. कविता लिखकर उसे छपाने,मित्रों को सुनाने और व्यापक पाठक समाज की राय जानने की व्यग्रता उनमेंबहुत थी. अब सुदीप चले गए हैं तो हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि उनकेकृतित्व का खुले दिमाग़ से आकलन करें.
--असद ज़ैदी
बी-957 पालम विहार, गुड़गाँव 122017
फ़ोन 09868126587
(श्री सुदीप बनर्जी का निधन १० फरवरी २००९ को हुआ था. स्वास्थ्य कारणों से इन दिनों केरल में होने की वजह से मुझे यह खबर नहीं मिल सकी. फोन पर श्री असद ज़ैदी से इस बारे में पता चला. उन्होंने अनुरोध करने पर अपनी यह टिप्पणी भी मेल कर दी जो तत्काल श्रद्धांजलि के रूप में 'आज समाज' के लिए लिखी गयी थी. - धीरेश)