Thursday, February 18, 2010

लाल्टू की चार कविताएँ उनके नये संग्रह से



मिडिल स्कूल

ऊँची छत
नीचे झुके सत्तर सिर
तीस बाई तीस के कमरे में

शहतीरें अँग्रेज़ी ज़माने की
कुछ सालों में टूट गिरेंगीं
सालों लिखे खत
सरकारी अनुदानों की फाइलें बनेंगीं

जन्म लेते ही ये बच्चे
उन खातों में दर्ज हो गए
जिनमें इन जर्जर दीवारों जैसे
दरारों भरे सपने हैं

कोने में बैठी चार लड़कियाँ
बीच बीच हमारी ओर देख
लजाती हँस रही हैं
उनके सपनों को मैं अँधेरे में नहीं जाने दूँगा
यहाँ से निकलने की पक्की सड़कें मैं बना रहा हूँ

ऊबड़-खाबड़ ब्लैक बोर्ड पर
चाक घिसते शिक्षक सा
पागल हूँ मैं ऐसा ही समझ लो

मेरी कविता में इन बच्चों के हाथ झण्डे होंगे
आज भी जलती मशालें मैं उन्हें दूँगा
हाँ, खुला आसमान मैं उन्हें दूँगा.


घर और बाहर

घर के आज़ाद तनाव में बाहर नहीं आ सकता
घर ही घर पकती खिचड़ी, होते विस्फोट, खेल-खेल में खेल
बाहर घर में एक ओर से आकर दूसरी ओर से निकल जाता है

घर बचा रहता अकेला, सिमटा हुआ
सिमटते हुए उसे दिखता बाहर
घर ही घर दिखती दुनिया रंगीन मटमैली

बाहर बसन्त
घर कभी गर्म, कभी ठण्डा
सही गलत के निरन्तर गीत गाए जाते घर में.

कभी कभी धरती अपनी धुरी से ज़रा सी भटकती है, विचलित होता है घर
कभी ज़मीं से ऊपर सोचने को कितना कुछ है उसके पास
घर ऊब चुका होता है नियमबद्ध दिनचक्र से
घर चाहता है, एकबार सही हो ताण्डव, दिन बने रात, रात में चौंधियाए प्रकाश

बाहर घर को छोड़ देता है उसकी उलझनों में
घर ही घर लिखे जाते हैं रात और दिनों के समीकरण
फिर कालबैसाखी के बादल आ घेरते घर को
गहरे समुद्र में डुबकियाँ लगाता सोचता घर
वह कितना होना चाहता है आज़ाद.


कविता नहीं

कविता में घास होगी जहाँ वह पड़ी थी सारी रात.
कविता में उसकी योनि होगी शरीर से अलग.

कविता में ईश्वर होगा बैठा उस लिंग पर जिसका शिकार थी वह बच्ची.
होंगीं चींटियाँ, सुबह की हल्की किरणें, मंदिरों से आता संगीत.

कविता इस समय की कैसे हो.
आती है बच्ची खून से लथपथ जाँघें.
बस या ट्रेन में मनोहर कहानियाँ पढ़ेंगे आप सत्यकथा उसके बलात्कार की.

हत्या की.
कविता नहीं.


सफ़र हमसफ़र

ऐसा ही होगा यह सफ़र
कभी साथ होंगे
कभी नहीं भी
रास्ते में पत्थर होंगे
पत्थरों पर सिर टिकाकर सोएँगे

होंगे नुकीले ही पत्थर ज़्यादा
पत्थरों पर ठोकर खा रोएँगे.

जो सहज है
वही यात्रा होगी जटिल कभी
जैसे स्पर्श होगा अकिंचन
बातें होंगी अनर्गल
उन सब बातों पर
जिन पर बातें होनी न थीं.

बातों के सिवा पास कुछ है भी नहीं
यह भी सच कि
दुनिया बातों से नहीं चलती
अमीर नहीं होते कला, साहित्य के गुणी.

फिर भी सफ़र में
गलती से आ ही जाता है वह पड़ाव
जब सोचते हैं
कि अब साथ ही चलेंगे
जब डर होता है
कि कभी बातें याद आएँगीं
और बातें करने वाले न होंगे

डर होता है
कभी सब जान कर भी
आँखें घूमेंगीं
ढूँढेंगीं हमसफ़र.



लोग ही चुनेंगे रंगः लाल्टू
प्रकाशकः शिल्पायन, 10295, लेन नम्बर-1, वैस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032

(इस संग्रह की कुछ और कविताएँ यहाँ पढ़ी जा सकती हैं)

10 comments:

सुशीला पुरी said...

aabhar!!!!!! itni sudar kavitaon ke liye.

डिम्पल said...

मिडिल स्कूल..best one

शिरीष कुमार मौर्य said...

मेरे प्रिय कवि को संग्रह की बधाई.

गौतम राजरिशी said...

"मिडिल स्कूल" पढ़कर उम्मीद की मुस्कुराहट लिये नीचे उतरा तो "कविता नहीं" ने पस्त कर दिया।

फिर कुछ पढ़ने की हिम्मत नहीं हुई।

लाल्टू सर को नमन!

वर्षा said...

सब अच्छी, अच्छी कविताएं बेचैनी भी पैदा कर देती हैं।

"अर्श" said...

अचंभित हूँ कुछ रचनाएँ पढ़ कर ... बधाई दूँ आभार कहूँ या चुप रहूँ...


अर्श

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह संकलन आ गया है मेरे पास
परेशान करने वाली कवितायें…देर तक झकझोरतीं है and everything doesnt remain same!!

रवि कुमार, रावतभाटा said...

झकझोरती हुई कविताएं...

अजेय said...

कविताऑं में लड़्कियाँ........

ana said...

kavitao ka sangaraha kamaal ka hai