Monday, February 1, 2010

आरएसएस और शिव सेना यानी दो आदमखोर



आरएसएस और शिव सेना `आमने-सामने` हैं। शिवसेना और संघ दोनों आदमखोर हैं, दोनों सदियों पुराने दोस्त हैं और एक-दूसरे के दांव-पेंच या कहें कि नूरा कुश्ती लड़ना बखूबी जानते हैं। देखा जाए तो शिवसेना जिस महाराष्ट्र की उपज है, आरएसएस भी वहीं की पैदाइश है। आरएसएस का राष्ट्रविरोधी `राष्ट्रवाद` शिवसेना का भी हथियार है लेकिन आरएसएस इसका राष्ट्रव्यापी कामयाब इस्तेमाल कर चुकी है। शिवसेना इसका इस्तेमाल मुस्लिमों के प्रति घृणा फैलाने के लिए जमकर करती है। शाहरुख़ खान पर हमला इसका ताजा उदाहरण है। पर शिवसेना जानती है कि इस क्षेत्र में संघ का फैलाव व्यापक है और महाराष्ट्र में भीड़ को कब्जाए रखने के लिए महाराष्ट्र में रह रहे गैर मराठी भारतीयों पर हमला ही सबसे कारगर हथियार है (और यहाँ भी चाचा-भतीजा कम्पीटीशन है)।


यह आरएसएस भी जानता ही है कि बीजेपी के लिए अपने परंपरागत इलाके को लुभाने के लिए उत्तर भारतीयों (संघ का भारतीयता का जो भी परमिट हो) की शिवसेना से रक्षा का शिगूफ़ा जरूरी है। एक तो यह उत्तरभारत के अलावा दूसरे गैर मराठियों को भी रिझा सकता है और उससे भी पहले यह कि इससे शिवसेना से बीजेपी के गठबंधन पर उत्तर भारतीयों के गुस्से को कंट्रोल किया जा सकता है। बीजेपी चाहे तो इस मसले पर चुप रह सकती है क्योंकि आरएसएस ऐसे ही मौकों के लिए तो है। अब महाराष्ट्र में जहाँ शिवसेना से पिटा गैर मराठी मजबूरी में कांग्रेस या एनसीपी (जो इस मसले पर आखिरकार शिवसेना की ही चाल चलती हैं) के साथ जाता है, वो बीजेपी की झोली भर सकता है। आखिर यह नूरा कुश्ती दोनों आदमखोरों की लहू की प्यास का ही इंतजाम करेगी।


आरएसएस गुजरात और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को उनके उत्तर भारतीय विरोधियों के प्रति उगले जाने वाले जहर को लेकर दण्डित क्यों नहीं करता, ऐसे सवाल का जवाब सब जानते ही हैं। और कांग्रेस की बात - तो वह आरएसएस की नीतियों का ही अनुसरण करती रहती है।


पुनश्च : मुम्बई में उत्तर भारतीय लोगों (खासकर मध्य वर्ग व उच्च वर्ग के नागरिकों) पर हमले के दौरान यूपी और बिहार के शहरियों के सेंटिमेंट देखने लायक होते हैं। अपने गहरे नस्लवाद और जातिवाद को पोसते हुए वे ठाकरे को खूब गलियां निकालते हैं (अपने ब्लॉग में, अखबारों में और आपस में बातचीत में)। लेकिन ये लोग आईपीएल के बेशर्म रवैये पर ठाकरे से भी आगे निकल जाना चाहते हैं।

6 comments:

आशुतोष कुमार said...

संघ ने यह कहा की अगर उत्तर भारतीयों पर हमला हुआ तो वे उन की रक्षा करेंगे. यह नहीं की "अगर हम पर हमला हुआ तो हम उस का मुंहतोड़ जवाब देंगे"यानी संघ आज भी अपने को उत्तर भारतीयों का संगठन नहीं मानता. संघ के उत्तर भारतीय समर्थकों को इस पर सोचना चाहिए. चतुरसेन ने अपने उपन्यास में लिखा था की ' वयं रक्षामः ' रक्ष संस्कृति का नारा था. रक्ष संस्कृति यानी राक्षस संस्कृति. ये हम नहीं कहते, खुद चतुरसेन ने कहा था, जो की खुद एक संघी लेखक माने जातें हैं. या तो मार खा लो , या हमारी रक्षा कबूल करो. यही तो वे अल्पसंखकों से भी कहते हैं. मारेंगे या रक्षा करे.गे, दोनों का मतलब एक ही है .लाखों बिहारी पिटहै. कर अपना सब कुछ गवां कर बिहार लौट आयें हैं. पहले वे बिहार से मार कर भगाए गए, अब और जगहों से भगाए जा रहें हैं. नीतीश भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहें है , जो आज भी शिव- सेना की आधिकारिक सहयोगी पार्टी है, लेकिन नीतीश के बिहारी समर्थक उन से इस बाबत कोई सवाल नहीं करते. क्यों? क्यों की बिहार में भी दो बिहार हैं. एक उन का जो बिहार से लगातार खदेड़े जा रहें हैं, दूसरा उन का जो खदेड़ने वाले हैं. .

रंगनाथ सिंह said...

शिवसेना के सभी नेताओं पर रासुका या उसी जैसी कोई धारा लगा कर जेल में डालना चाहिए। अफसोस इस बात का है कि सभी दल मराठी-गैरमराठी मामले पर वोटबैंक की राजनीति करते दिख रहे हैं। यदि उत्तर भारतीयों के मसले पर भाजपा ने कोई रणनीति बना ली है तो इस मामले में पहल करने के उसे लाभ मिल सकता है। और यह हम सभी के लिए दुखद होगा।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

bilkul sahi nabz pakadi hai bhai..

IPL vale mudde ko maharastra ya australia se alag karke nahi dekha ja sakta.yah ek hi sikke ke alag-alag pahlu hain.

sangh kise bachayega? uttar bhaaratiyon ko ya uttar bhartiiy hinduon ko? UP ke chunav nazdiik hain to aisi nautanki honi hi thi!

सुशीला पुरी said...

ji han.......do aadamkhor aamne samne
....

ali said...

केवल एक आदमखोर जिस्म तो नहीं था , हिटलर ! ... इसीलिए मरा भी नहीं ! वह जीवित है कुछ और जिस्मों में 'घृणा' की विष बेल सा !

Parul said...

man ki keh di aapne..