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Thursday, June 17, 2021

ज़िंदा नहीं रहने दिया गया था आम्बेडकर से प्रभावित तिलक के बेटे को

 


(मशहूर बुद्धिजीवी सूरज येंगडे की किताब `कास्ट मैटर्स` से लिया गया टुकड़ा जिसका हिन्दी अनुवाद भारत भूषण तिवारी ने किया है।)

जानकर हैरत होगी, ऐसे आम्बेडकर के एक और सहयोगी थे श्रीधरपंत तिलक जो रूढ़िवादी बाल गंगाधरपंत तिलक के बेटे थे. आम्बेडकर की सामाजिक गतिविधियों में श्रीधरपंत ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 2 अक्टूबर 1927 को पूना में डिप्रेस्ड क्लास छात्रों की कांफ्रेंस की अध्यक्षता आम्बेडकर ने की और पी.एन.राजभोज और सोलंकी के अलावा तीसरे वक्ता श्रीधरपंत तिलक थे. कांफ्रेंस के बाद पूना के नारायण पेठ में गायकवाड़ वाड़ा में स्थित अपने निवास पर श्रीधरपंत तिलक ने आम्बेडकर के सम्मान में चाय पार्टी आयोजित की.

Babasaheb Amedkar (seated, front row, third from right) with members of the Samaaj Samata Sangh in Bombay in 1927. (Inset) Shridhar Balwant Tilak, son of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak. (HT PHOTO) यह फोटो और कैप्शन HT से साभार 


इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए श्रीधरपंत ने सहभोजन के लिए `अछूत` लड़कों के गायन समूह के लिए अपने घर के दरवाज़े खोल दिए. ऐसा उन्होंने समाज समता संघ की पहल का समर्थन करने के लिए किया जो गायकवाड़ वाड़ा में ही स्थित था. उन्हें आमंत्रित कर उन्होंने समूचे समुदाय ख़ासकर केसरी-मराठा ट्रस्ट के ब्राह्मण ट्रस्टियों के विरोध की परवाह न की. उनके घर लोकमान्य निवास में एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था ´चातुर्वर्ण्य विध्वंसक समिति´. इसकी वजह से भी उन्हें अपने रिश्तेदारों और ब्राह्मण समाज का रोष सहना पड़ा. श्रीधरपंत पर अत्यंत दबाव डाला गया और केसरी, जो उनके पिता द्वारा ही शुरू किया गया अख़बार था, में भी उनका निरंतर अपमान किया गया.


कट्टरपंथी ब्राह्मण समुदाय और केसरी-मराठा ट्रस्ट के रूढ़िवादी गुट, जिसने श्रीधरपंत को सात साल तक एक मुक़दमे में फँसाए रखा, के बढ़ते दबाव के कारण 25 मई 1928 को बॉम्बे-पूना एक्सप्रेस ट्रेन के सामने कूदकर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर ली. इस घटना के लिए आम्बेडकर ने केसरी के रूढ़िवादी सवर्ण हिन्दू गुट को दोषी ठहराया जिन्हें श्रीधरपंत गैंग ऑफ़ रास्कल्स कहा करते. आत्महत्या से पहले उन्होंने आम्बेडकर को सम्बोधित एक आखिरी पत्र लिखा था जिसकी प्रति 29 जून 1928 को समता में प्रकाशित हुई थी और नीचे दी जा रही है:



यह पत्र आपके हाथों में पड़े इससे पहले ही मेरे दुनिया छोड़कर जाने की ख़बर आपके कानों में पड़ चुकी होगी. समाज समता संघ के काम को आगे बढ़ाने के लिए पढ़ेलिखे और समाज सुधारवादी युवाओं को आन्दोलन की तरफ आकर्षित करना होगा. इस सिलसिले में आपके अथक प्रयासों को देखकर मैं बेहद प्रसन्न हूँ और मुझे भरोसा है कि ईश्वर आपको यश प्रदान करेंगे. महाराष्ट्रीय युवा अगर इस उद्देश्य का बीड़ा उठा ले तो छुआछूत की समस्या महज पाँच सालों में सुलझ जाएगी. उत्पीड़ित वर्गों के मेरे भाइयों के दुख-दर्दों को अपने इष्ट कृष्णदेव तक पहुँचाने मैं आगे जा रहा हूँ. मित्रों तक मेरा शुभकामनाएँ पहुँचाइएगा.


भवदीय

श्रीधर बलवंत तिलक

25/5/28


श्रीधरपंत की मृत्यु के बारे में सुनकर आम्बेडकर ने 26  मई 1928 को जलगाँव कांफ्रेंस में उनके योगदान को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया. अपने सम्पादकीय में उन्होंने श्रीधरपंत की मृत्यु पर शोक प्रगट किया: ¨मैं श्रीधरपंत से बहुत बड़े कार्य की उम्मीद कर रहा था लेकिन अब वे नहीं हैं.¨ समाज समता संघ के साथ श्रीधरपंत का जुड़ाव बढ़ने के बाद से आम्बेडकर उनके करीब आ गए थे. बहुत जल्द ही श्रीधरपंत आम्बेडकर के नज़दीकी मित्र समूह में शामिल हो गए थे. जब  भी वे मुम्बई जाते, आम्बेडकर से ज़रूर मिलते और अगर आम्बेडकर पुणे में होते तो तो उन्हें गायकवाड़ वाड़ा में स्थित अपने निवास पर लाने की कोशिश करते. श्रीधरपंत और उनके भाई रामभाऊ तिलक का केसरी-मराठा ट्रस्ट के साथ संघर्ष बेहद बढ़ गया. दोनों भाई अपने उदारवादी नज़रिये और सामाजिक सुधारवादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे. तिलक बंधुओं और केसरी-मराठा ट्रस्ट के बीच के क़ानूनी झगडे में रामभाऊ ने वकील के तौर पर आम्बेडकर की सहायता लेने पर ज़ोर दिया था. मगर दीगर कारणों की वजह से आम्बेडकर यह ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं कर पाए.


1धनंजय कीर, डॉ. आम्बेडकर: लाइफ एंड मिशन, पृष्ठ 93-94

2शत्रुघ्न जाधव, श्रीधरपंत तिलक और बाबासाहेब आम्बेडकर (नई दिल्ली: सम्यक 

प्रकाशन, 2012), पृ. 36.

3समता, 29 जून 1928, जाधव द्वारा लिखित श्रीधरपंत तिलक और बाबासाहेब आम्बेडकर में पृ 108 पर उद्धृत

!


(सूरज येंगड़े की पुस्तक ´कास्ट मैटर्स´ के चैप्टर ´ब्राह्मिन्स अगेंस्ट ब्राह्मिनिज़्म´ सब-चैप्टर ´ब्राह्मिनएक्शन´ से उद्धृत) 

 

    


Saturday, April 21, 2018

सैम हैमिल, वाइट हाउस से भिड़ जाने वाला कवि



9 May 1943 – 14 April 2018
दोस्त विक्टर इन्फान्ते की पोस्ट से मालूम हुआ कि सैम हैमिल नहीं रहे। उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक पोएट्स अंगेस्ट दि वॉर (अब याद नहीं कहाँ की) पब्लिक लाइब्रेरी से पुरानी किताबों की सेल में मैंने शायद दसेक साल पहले ख़रीदी थी। `वाइट हाउस` से भिड़ जाने वाले इस एक्टिविस्ट कवि से यह मेरा पहला परिचय था। वह वाक़या तो अब, जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं, `स्टफ़ ऑफ़ लेजंड` है।
2003 में मोहतरमा लॉरा बुश ने `वाइट हाउस` में कवियों की एक संगोष्ठी आयोजित करने का ऐलान किया; निमंत्रण भेजे गए। सैम हैमिल ने न केवल वह निमंत्रण ठुकराया बल्कि इराक़ युद्ध की मुख़ालफ़त में पोएट्स अगेंस्ट दि वॉर नाम की वेबसाइट शुरू की जो एक वैश्विक आंदोलन में बदल गई। इस वेबसाइट पर लगभग बीस हज़ार प्रतिरोध की कविताएँ संकलित हैं। इन्हीं में से कुछ कविताएँ पुस्तकाकार छापी गईं जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है।
हमारे देश में जब चाटुकारिता और सत्ता के पिछलग्गूपन के नए अध्याय रचे जा रहे हैं, सैम हैमिल का जाना और भी तकलीफ़देह है। उन्हें और उनके जज़्बे को सलाम करते हुए उनकी तीन कविताएँ (मूल अंग्रेज़ी से अनुदित) पेश हैं।
-भारत भूषण तिवारी



स्टेट ऑफ़ दि यूनियन, 2003

यरूशलम मैं कभी नहीं गया,
लेकिन शिर्ली बात करती है बमों की.
मेरा कोई ख़ुदा नहीं, पर मैंने देखा है बच्चों को
दुआ माँगते कि बमबारी रुके. वे दुआ माँगते हैं अलग-अलग खुदाओं से.
ख़बर अब फिर वही पुरानी ख़बर है,
जो दुहराई जाती एक बुरी आदत, सस्ते तम्बाखू, सामाजिक झूठ की तरह.

बच्चों ने इतनी अधिक मृत्यु देख ली है
कि अब उनके लिए मृत्यु का कोई अर्थ नहीं.
वे रोटी के लिए क़तार में हैं.
वे पानी के लिए क़तार में हैं.
उनकी आँखें मानों काले चन्द्रमा हैं जिनमें से झाँकता है खालीपन.
हमने उन्हें हज़ारों बार देखा है.
कुछ ही देर में राष्ट्रपति भाषण देंगे.
उनके पास कहने लिए कुछ न कुछ होगा बमों के बारे में
आज़ादी के बारे में
हमारी जीवन पद्धति के बारे में.
मैं टीवी बंद कर दूँगा. हमेशा करता हूँ.
क्योंकि मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर है
उनकी आँखों के स्मारकों को निहार पाना.




जेम्स ओस्को अनामरिया की मौत पर

जब उसकी लाश उन्हें
अबानकाइ में
पचाचाका ब्रिज के पास
कचरे के ढेर में मिली,

कौन कह सकता था
कि किसने
उखाड़े थे उसके नाख़ून,

किसने पैर तोड़े,
नोंच ली आँख किसने,
किसने अंततः उसका गला रेता.

कौन कह सकता था
किसने उसे कचरे में फेंक दिया
बोतल में बंद सन्देश की तरह.

कौन कह सकता था
कि वह कौन था
और क्यों

मगर कोई तो है जिसे पता है
कि किसका हाथ गर्दन पर है
और किसका बन्दूक पर.

युवा कवि ने ऐसा क्या कहा था
जो उसे मरना पड़ा?
क्या मौत का दस्ता था
इस ट्रेजेडी का लिखने वाला?

जिसे सीआईए ने प्रशिक्षण दिया हो?
कह नहीं सकते.

कोई तो जानता था
उसकी ज़ुबां के नाज़ुक स्पर्श को
क्योंकि वह कविता के हर स्वर
और हर व्यंजन में
जान फूँक देती.

लोर्का की मृत्यु पर बोलते हुए
उसकी आँख में छलका आँसू
कोई याद करता है
और जन पर बात करते हुए
उसकी आवाज़ की लय

कोई याद करता है उसके ख़्वाब
एंडीज़ के सायों में
एक लोकतांत्रिक संगीत के;
पंखों वाली कविता के.

बेशक, युवा कवि को पता था
कि कविता प्रेम है
और इस दुनिया में,
प्रेम एक ख़तरनाक शै है.


इराक़ में चल रही लड़ाई के तीन साल पूरे होने पर हेडन करूथ के नाम एक ख़त

लगभग चालीस साल हुए
उन सब जंगों के ख़िलाफ कविता लिखने के बारे में
तुमने कविता लिखी थी, हारलन काउंटी से लेकर इटली
और स्पेन. जब तुम्हारी चुनी हुई कविताएँ
आज मिलीं, उनमें से एक यह कविता थी जिसे
फिर पढ़ते हुए मैं ठिठका.

हम तबसे लगातार युद्धरत हैं.
मैं महायुद्ध के दौरान पैदा हुआ
और मैंने भी अपने सारे दुखदायी दिनों में
उस ख़ास अहमकपन
और बेमतलब और लाचार दर्द को जिया
और उसके खिलाफ लिखा है.
क्या उससे एक जान भी बच पाई?
कौन बता सकता है?
बजाय इसके कि ऐसा करने से
मेरी अपनी जान बची.

आह, मैं बता पाता तुम्हें बची हुई जानों
के बारे में. सित्का में थी
वह एक जवान ख़ूबसूरत औरत
जिसके पति ने, जो उसकी कविता से ईर्ष्या
करता था, उसके दोनों पैर
एक रस्सी से बाँध दिए और
फेंक दिया अपनी नाव से.
दक्षिण-पूर्वी अलास्का के उन पानियों में
आपके पास ज़िन्दगी के लगभग १२ मिनट होते हैं.

या ऊटा की दादी अम्मा
जो छंदबद्ध, रूमानी सॉनेट लिखा करती
और एक दिन रात गए
मुझे मोटेल में फ़ोन किया क्योंकि
उसका जबड़ा टूटा हुआ था, और उसकी नाक,
और वह अब भी पी रहा था. या मैं तुम्हें
एलेक्स के बारे में बता सकता हूँ, जो ड्रग्स
से जुड़े जुर्म में उम्रक़ैद काट रहा था
और क्लासिक्स से रूबरू होने पर उसकी आँखें
कैसे चमक उठीं.

हाँ, कविता ज़िंदगियाँ बचाती है.
सारी जंगें घर से ही शुरू होती हैं
युद्धरत आत्म के भीतर.
ना, हमारी कविताएँ नहीं रोक सकतीं
जंग, ना यह जंग और ना कोई और
बल्कि वह जो
अपने अंदर धधकती है.
जो पहला और एकमात्र कदम है.
यह एक
पाक यकीन है, एक कर्तव्य
कवि का शगल.
हम लिखते हैं कविता जो हमें लिखनी चाहिए.


नोट्स:

  1. स्टेट ऑफ़ दि यूनियन: अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्र के नाम दिया जाने वाला सालाना अभिभाषण
  2. दूसरी कविता का सन्दर्भ है प`रू देश के जेम्स ओस्को अनामरिया नामक कवि और एक्टिविस्ट की दिसम्बर 2005 में टॉर्चर के बाद की गई हत्या। प`रू में अबानकाइ एक शहर है जो पचाचाका नदी पर बसा है।
  3. हेडन करूथ (1921-2008): अमेरिका के एक और रेडिकल कवि जिनसे सैम हैमिल प्रभावित रहे।



Saturday, January 28, 2012

थियो एंजोलोपॉलस : `अतीत कभी अतीत नहीं होता`


महान ग्रीक फिल्मकार थियो एंजोलोपॉलस का 24 जनवरी 2012 मंगलवार को एथेंस में सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। 76 वर्षीय एंजोलोपॉलस के निधन की जानकारी कम से कम मुझे हिंदी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल से मिली। यहां असद जी की उसी पोस्ट का भारतभूषण तिवारी द्वारा किया गया अनुवाद दिया जा रहा है-


थियो एंजेलोपॉलस नहीं रहे. पता नहीं कैसे वर्णन किया जाए इस क्षति का: वे हमारे समय की सबसे अनमोल फ़िल्म शख्सियत थे. उनकी काव्यात्मक दृष्टि, ऐतिहासिक फैलाव, राजनीतिक सरोकार, और परिवर्तन, निर्वासन और पराजय इन विषयों से उनकी सतत भिड़ंत उन्हें सिनेमा की दुनिया में एक अद्वितीय हस्ती बनाते हैं. उन्हें ग्राम्शियन ढंग का फ़िल्मकार भी कहा जा सकता है. 
उनकी कार्य पद्धति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बड़े सामान्य ढंग से कहा, "मैं फ़िल्म वैसे ही शूट करता हूँ जैसे साँस लेता हूँ. "

उनके एक साक्षात्कार से लिए गए कुछ उद्धरण:

"दुनिया से जो मुझे मिल रहा है, मैं उसका संवेदनशील राजप्रतिनिधि बनने का प्रयास करता हूँ. यहाँ तक कि ऐतिहासिक विषय वस्तु पर बनाई गई मेरी फिल्में भी उस बुनियाद को ज़ाहिर करती हैं जिन पर हमारा आज तामीर है. यहाँ की तानाशाही की समस्या से मैं क्यों अक्सर मुखातिब होता हूँ? यह इस समस्या की जड़ और उसकी फ़ितरत को बयां करने की कोशिश है. मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि अगर कोई लेखक/कलाकार आज को समझने की जद्दोजहद में है, तो उसके लिए अतीत का अन्वेषण करना और वहां किसी न किसी परिघटना के कारणों को ढूंढना अपरिहार्य होगा."
...
"बहुत से लोगों का कोई अतीत नहीं होता. व्यक्तिगत तौर पर मैं उन में दिलचस्पी रखता हूँ जिनका अतीत है. इसके अलावा, अतीत कभी अतीत नहीं होता. वह वर्तमान और भविष्य दोनों में होता है. जब मैं फ़िल्म बना रहा होता हूँ, तब मैं किसी चीज़ की बुनियाद रखने की कोशिश कर रहा होता हूँ न कि उसे बर्बाद करने की. बर्बादी से बर्बादी ही होती है. जो मेरे आसपास हो रहा है मैं उस से रहित नहीं हो सकता. नागरी कर्तव्य और ज़िम्मेदारी कलाकार के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों में से एक है."
...
"मैं न तो निराशावादी हूँ, और न आशावादी. आशावादी होने का मतलब है तथ्यों को साफ़-साफ़ न देखना. कुछ कुछ मतलब यह कि इंसान दुनिया में बेहद सार्थक परिवर्तन के लिए हस्तक्षेप नहीं दे सकता. निराशावादी होने का मतलब है बेहतर दुनिया के सपने को, संभावना को छोड़ देना, तज देना. दोनों ही संकल्पनाओं में गतिरोध आ जाता है. व्यक्तिगत तौर पर मैं तर्कपूर्ण ढंग से सोचने की, साफ़-साफ़ देखने की कोशिश करता हूँ."
...
"जो उन दिनों हमारे भविष्य के प्रति निराशाजनक संभावनाओं का सिलसिला नज़र आती थीं, हर उस चीज़ की अब पुष्टि हो रही है. मैं उस पीढ़ी का हूँ जो सोचती थी कि हम दुनिया को बदल डालेंगे. 2000 के आसपास ऐसा लगा कि सपना टूट गया है."

Wednesday, January 18, 2012

थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ


भारत भूषण तिवारी के ब्लॉग अबे कस्बाई मन! पर घूमते-घूमते `थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ` के बारे में पढ़ा। नाना पाटेकर के डर से फिल्म देखने से बचना चाह रहा था लेकिन देख ही डाली। खूबसूरत फिल्म। भारत भाई की ही वही पुरानी पोस्ट शेयर किए दे रहा हूँ- 



थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ

'थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ' याद है? अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित सपनों और हकीकत की यह लिरिकल दास्तान पहली बार दूरदर्शन पर बहुत पहले देखी थी. हॉलीवुड म्यूजिकल के अंदाज़ में बनाई गयी यह अनूठी फ़िल्म मन के किसी कोने में धँस गयी. अभी दो-तीन सालों पहले अपने जर्सी सिटी वाले गुजराती भाई की वीडियो लाइब्रेरी से लाकर यह फ़िल्म फिर देखी. और चार-छः महीनों पहले यूट्यूब के सौजन्य से टुकडों-टुकडों में देखी.

भयंकर गर्मी से झुलसा हुआ बारिश के लिए तरसता मध्य भारत का एक पहाड़ी क़स्बा, एक 'ज़रा-हटके' या पारम्परिक सन्दर्भों में अति-साधारण लड़की जो शादी की उम्र पार करने को है, एक सम्वेदनशील मगर चिन्तित पिता, एक बिलकुल 'बड़े भैया टाइप' बड़े भैया, एक जवान होता छोटा लड़का जिसे बड़े भैया बच्चा ही मानते हैं. फिर एंट्री होती है 'धृष्टधुम्न पद्मनाभ प्रजापति नीलकंठ धूमकेतु बारिशकर' की. यह बड़बोला ठग उनके घर में घुस आता है और पाँच हज़ार रुपयों के बदले मात्र 48 घंटों में बारिश करवाने की गारण्टी देता है. बड़े भैया और बिन्नी उसे झूठा और मक्कार कहते हैं मगर पापा और छोटा बेटा मानते हैं कि ट्राई करने में क्या हर्ज़ है. और उस एक गर्मी की रात में बारिशकर बिन्नी को उसके अन्दर की सुन्दरता से परिचित करवाता है, उसे अपने सपनों में विश्वास करना सिखाता है. जवान होते लड़के में वह इतना आत्म-विश्वास भर देता है कि ज़रुरत पड़ने पर बड़े भैया को घूँसा भी मार सके.

फ़िल्म के बिलकुल असली लगने वाले पात्र ,काव्यमय संवाद और छोटे-छोटे मधुर गीत इसे अद्भुत 'फेअरी टेल' का रूप देते हैं.'पोएट्री इन मोशन' शायद इसे ही कहते होंगे. फ़िल्म के अंत में बड़ी साफगोई से अमोल पालेकर ने यह बता दिया कि इस फिल्म की कथा अंग्रेजी फिल्म/नाटक ' दि रेनमेकर' से ली गयी है.
इसीलिए बड़े दिनों से 'दि रेनमेकर' देखने का मन था; कल रात वो भी देख ली. 1956 में बनी, जोसफ अन्थोनी द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है केथरीन हेपबर्न और बर्ट लैन्कस्टर. यह फ़िल्म भी अच्छी लगी, विशेषकर केथरीन हेपबर्न का शानदार अभिनय. वैसे अपने देसी संस्करण में अनीता कँवर ने बहुत अच्छा अभिनय किया है, परन्तु हिन्दी उच्चारण की त्रुटियों को नज़र अंदाज़ कर दिया जाए तो यह फिल्म नाना पाटेकर की है. एक लवेबल लम्पट की भूमिका उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ निभाई है. मगर 'फेअरी टेल' शायद अपनी भाषा में ज्यादा मोहक लगती है. यह अंग्रेजी फ़िल्म देखकर फिर एक बार अमोल पालेकर को सैल्यूट करने का मन हुआ. लगा कि हॉलीवुड फ़िल्मों की कॉपी करने की अमोल पालेकर जैसी कला (और ईमानदारी भी) अन्य निर्देशकों में भी आ जाये.
हिन्दी फ़िल्म का टाइटल गीत बहुत मधुर है और बोल भी उतने ही आकर्षक है. यूट्यूब पर बानगी देखिये (वीडियो में तस्वीर शायद इसे अपलोड करने वाले सज्जन की ही है). वैसे तो पूरी फिल्म ही यूट्यूब पर उपलब्ध है.

Friday, November 18, 2011

दो अमरीकी कविताएँ







अभी नहीं

ज़रा धीरे, उन्होंने कहा.
इतनी जल्दी भी नहीं, वे बोले.
अभी नहीं.
इंतज़ार करो.

हम आपसे सहमत हैं, उन्होंने कहा, पर यह ठीक वक़्त
नहीं है.

दासता समाप्त करने के लिए.
नवीनतम युद्ध रोकने के लिए.
सही चीज़ करने के लिए.

अभी से इतनी आज़ादी दे देने से तो
अनर्थ हो जायेगा, वे कहते हैं. ज़रूरत है लोगों को सिखाने की
कि आज़ादी को कैसे बरता जाए.

हम पूछते हैं, वक़्त कब ठीक होगा?
कब होगी वह मुकम्मल स्थिति,
न ज्यादा कच्ची, न अधिक पकी?

और कैसे हमें पता चलेगा कि आ गया है वह सुनहरा क्षण
कहता हुआ, "लो, आखिर मैं आ ही गया, जिसके आने की भविष्यवाणी की गई थी
मैं वही हूँ. कानून और हथियारों के बल पर मेरा भरोसा दिलवाओ बेझिझक."

और हम अब तक यहाँ हैं, अपनी खाली कलाई घड़ियों को थपथपाते
उस फ्रीडम ट्रेन के लिए पटरियों पर यहाँ से वहाँ नज़र दौड़ते.
पटरियों से उतर गई होगी किसी वजह...

इस बीच, हमें किसी न किसी स्वर्ग की टिकटें
बेचने वाला, हमारे अपने इतिहास में प्रवेश के लिए
हमसे पैसे लेना वाला अमीर आदमी--
उसके लिए अभी क्या बजा है?

मज़े की बात है कि  उन घड़ियों पर
वक़्त हमेशा रुका हुआ होता है, या जा रहा होता है पीछे की ओर..

हमेशा वक़्त से बहुत पहले.
हमेशा वक़्त से बहुत बाद.

इब्तिदा का वक़्त हमेशा अभी होता है.



--रॉबर्ट एडवर्ड्स


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बड़ा आदमी, छोटा कुत्ता

शहर के व्यवसायिक इलाके में फुटपाथ पर
एक बहुत बड़ा आदमी एक बहुत छोटे कुत्ते को सैर करा रहा है
वह या तो पोस्ट ऑफिस जा रहा होगा या स्टोर से अचार का डिब्बा खरीदने
और इसी चक्कर में निबटा रहा है कुत्ते की आज की सैर

कसी हुई ज़ंजीर के एक तरफ वह छोटा कुत्ता है ऊर्जा और मुस्तैदी से भरपूर
कान खड़े, चुस्त, बड़े ध्यान से चारों ओर देखता
ज़ंजीर के दूसरे सिरे पर आदमी टहलते हुए परेशान सा लगा रहा है
उसकी  हवाइयन शर्ट फूली है उसकी तोंद से जो फुटपाथ को निहार रही है

शायद वह आदमी चरमराती अर्थव्यवस्था के बारे में सोच रहा है
या उसकी नौकरी छूट गई है शायद और वह सोच रहा है कि
कब तक उसे दूसरी नौकरी मिल पाएगी
और कैसे वह कुत्ते के लिए खाना खरीद पायेगा, कैसे किराया चुका पाएगा

या वह सोच रहा है मौसम के बारे में और यह कि क्यों कर
नवम्बर के आखिरी हफ्ते का यह दिन इतना गर्म है, धूप भी खिली है और न बारिश हुई है
जबकि हर हिसाब से इस दिन को होना चाहिए ठंडा, उदास और गीला
जब एक के बाद एक तूफ़ान नदी-नालों और तालाबों को भर देते हैं लबालब

यहाँ से पास ही जो खाड़ी है वहाँ लौटती हैं सैमन मछलियाँ हर बरस
और जहाँ स्थानीय लोग जाते हैं धारा में बहती मछलियों को देखने और वाहवाही करने
फेंक देते हैं अपने आप को प्रवाह के विरुद्ध
झरनों से और सीढ़ियों से

या हो सकता है कि वह मन ही मन हिसाब लगा रहा है  इराक़ और अफगानिस्तान में हुई मौतों का
हमारे मोबाइल फ़ोनों के लिए कांगो में जमा होती लाशों का
संभव है वह गाज़ा की भुखमरी के बारे में सोच रहा है
या नवाजो दादी-अम्माओं को महापर्वत से बेदखल किये जाने के बारे में

कुत्ता बेशक अर्थव्यवस्था और ग्लोबल वार्मिंग के बारे में नहीं जानता कुछ भी
वह नहीं जानता कब्जों और छद्म-युद्धों और बर्बर घेरेबंदियों और नरसंहारों के बारे में
पर उसे अंदाज़ा है कि कुछ गड़बड़ तो है जिसकी वजह से उसका मित्र तकलीफ में है
इसलिए बहुत छोटा कुत्ता बहुत बड़े आदमी को सैर करा रहा है
क्योंकि कुत्ता समझता है निराशा से हार न मानना कितना ज़रूरी है
कितना ज़रूरी है रोज़ घर से बाहर निकलना और खुली हवा का आनंद लेना
तथ्यों को सूंघ निकालना, खोद निकालना सच को, बड़े कुत्तों का सामना करना
और सारी दुनिया को यह बताना कि आप जिंदा हैं और भौंक रहे हैं

--बफ़ व्हिटमन-ब्रॅडली



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'शुक्रवार' (11 से 17 नवम्बर) से साभार, अंग्रेज़ी से अनुवाद: भारत  भूषण तिवारी