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Thursday, October 25, 2018

विष्णु खरे—स्मरण : असद ज़ैदी



पंद्रह नवम्बर २०१७ की शाम दिमाग़ में नक़्श है। लोदी रोड श्मशान में कुँवर नारायण के अंतिम संस्कार के वक़्त अचानक दो लोगों पर नज़र पड़ी−−दीवार के सहारे रखी एक बेंच पर विष्णु खरे  अौर केदारनाथ सिंह बैठे थे, नीम अँधेरे में। दोनों बहुत दुर्बल, पस्त अौर लगभग प्राणहीन लग रहे थे, जैसे वहाँ हों ही नहीं, अौर कहते हों कि हमें भी मरा ही जानो। ख़ामोश अभिवादन किया, उन्होंने बड़ी बेज़ारी से सर हिलाया जैसे सरहद पार कर चुके हों। मुझे लगा अब पता नहीं इन्हें दुबारा देख पाऊँगा या नहीं। साल भी न गुज़रा अौर अब वे इस दुनिया में नहीं है। 

लेकिन यह विष्णु खरे से अंतिम ‘संवाद’ न था। इस जून के महीने में यह ख़बर सुनकर कि वह अाम अादमी पार्टी के तहत अाने वाली दिल्ली हिन्दी अकादमी के उप सभापति मनोनीत किये गए हैं, अौर इस तरह वह अपने अज़ीज़ शहर में रहने वापस अा पाएंगे, मैंने उन्हें यह संक्षिप्त ई-मेल संदेश भेजा (२३ जून)−−

“क़िबला, कुछ ख़बर सुनी है। उम्मीद है सच ही निकलेगी। लिहाज़ा बधाई... अौर ख़ुदा ख़ैर करे!” 

जल्दी ही उनका मुख़्तसर जवाब अाया−−

“इसमें ‘ख़ुदा ख़ैर करे’ ही operative part [काम की बात] है।” 

कम से कम पिछले चालीस साल से हमारे दरमियान संवाद की यही शैली बरक़रार रही। उनसे ऐसी वाक़फ़ियत मेरी ख़ुशक़िस्मती अौर दोस्ती की यह हालत मेरा अभिमान रही। यह ऐसा रिश्ता था जिसमें हम एक दूसरे से बोले कम, नाख़ुश ज़्यादा रहे।

नौ सितम्बर को उन्होँने अपने नये कार्यकाल का पहला काव्यपाठ कराया, जिसमें मैं भी अामंत्रित था। क़रीब दो-ढाई घंटे का साथ रहा। कुछ ख़ामोश लेकिन पुरसुकून नज़र अाते थे। कार्यक्रम के बाद वे जल्द ही अपने अावास के लिए निकल पड़े। दो दिन बाद पता चला ब्रेन हैमरेज के बाद वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। शरीर के एक हिस्से को लकवा मार गया था। हफ़्ते भर की बेहोशी के बाद वह इस दुनिया से चले गए। बहुत सारी बातें अधूरी छूट गईं।

हम जब कविता या कहानी लिखते हैं तो ऐसे कुछ ज़रूरी चेहरे दिमाग़ में रहते हैं जिनके बारे में या तो हमें यक़ीन होता है कि वे हमारे लिखे को पढ़ेंगे या कुछ चिंता होती है कि वे अगर पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे। कहीं किसी जगह एक अादमी नज़र रखे हुए है। विष्णु खरे न सिर्फ़ मेरी पीढ़ी के बहुत से कवि-लेखकों के लिए, बल्कि हिन्दी मे सक्रिय बहुत सारे दूसरे लोगों के लिए भी,  ऐसा ही एक ज़रूरी चेहरा थे। वह कभी हमारे ख़यालों से दूर न रहे। उनका जाना एक , ज़रूरी अादमी का जाना अौर एक दुखद ख़ालीपन का अाना है। मेरी पीढ़ी ने एक अाधुनिक दिमाग़, तेज़ नज़र काव्य-पारखी, अालोचक, दोस्त, स्थायी रक़ीब अौर नई पीढ़ी ने अपना एक ग़ुस्सेवर लेकिन ममतालु सरपरस्त खो दिया है। इस रूप में वह हमारे सबसे क़ीमती समकालीन थे। 

चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर 
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच 
(मीर)

विष्णु खरे एक अौर घर ख़ाली कर गए हैं, वह घर जो सिर्फ़ उन्हीं के लिए बना था। उसमें कोई अौर नहीं रह सकेगा। कभी उस घर में मीर मेहमान होते थे, कभी मुक्तिबोध, कभी श्रीकांत अौर कभी रघुवीर सहाय। उस घर को बाहर से, उड़ती उड़ती नज़र से ही देखा गया, उस में दाख़िल होना सबके बूते की बात न थी। कविता के उस घर में अावाज़ें हैं, तस्वीरें हैं, बेचैन रूहें भटकती हैं, वहाँ विषाद है, अार्त्तनाद है, बार बार अपने ही से सामना है, जहाँ कल भी अाज है, अौर विस्मृति है ही नहीं। इस घर में बहुत जंजाल है, क्लेश है, पर कुछ भी अोझल अौर अमूर्त्त नहीं है। कुछ कमरे बंद पड़े हैं, जिन्हें खोलने से वह ख़ुद भी डरते थे, वो अब कभी नहीं खुलेंगे। वह इस मकान के मकीन होकर कम, पहरेदार होकर ज़्यादा रहे। इस घर का नक़्शा उनके जीवनीपरक ब्यौरों से कम उनकी कविताअों से ही झलकता रहेगा। 

वह अत्यंत भावुक, संवेदनशील अौर असुरक्षित व्यक्ति थे। अपने इस बुनियादी किरदार को, अपनी वेध्यता को, ढँकने के लिए उन्होंने एक रूखा, अाक्रामक अौर नाटकीय अंदाज़ अपनाया था। उनका यही सार्वजनिक रूप बन गया अौर इसी तर्ज़ के लिए वह जाने गए। उनके अंतरंग मित्र उनके इस स्वाभाव को समझते थे, लिहाज़ा उनकी बहुत सी बातों को नज़रअंदाज़ करते थे। सभी मित्र जहाँ तक बन पड़ता उनकी हिमायत में रहते थे, बेजा अाक्रमण से उनकी हिफ़ाज़त करते थे। वैसे भी विष्णु जी ने मुहब्बत अौर अदावत में कभी ज़्यादा फ़ासला न रखा। यह उन लोगों की कमनज़री है जिन्होंने उनकी ज़्यादतियाँ तो देखीं पर जो उनकी बेरुख़ी अौर ग़ुर्राहट में प्यार अौर हमदर्दी की झलक न देख सके। 

विष्णु खरे ने साहित्य जगत में एक तेज़-तर्रार विध्वंसक अालोचक की तरह प्रवेश किया अौर तत्काल ही अपनी प्रतिभा के लिए पहचाने गए। उनकी ताज़गी, खुले दिमाग़, ज़हानत अौर अध्यवसाय से लोग प्रभावित होते थे। वह अपेक्षाकृत युवा थे अौर उस दौर में युवा होना ख़ुशक़िस्मती की निशानी थी। ऐसा लगता था कि राजनीति, समाज, संस्कृति निर्णायक मोड़ पर है, जो बदलाव अाया चाहता है उसका कार्यभार १९४० के बाद जन्मी पीढ़ी पर है, उसमें अात्मविश्वास है, जोखिम उठाने का जज़्बा है, समस्या वही हल करेगी, उसके पास सारी चाबियाँ मौजूद हैं। १९६४ से १९७५ के बीच का काल भारतीय राजनीति अौर कलाअों में एक प्रकार का मुक्ति प्रसंग था अौर समाज की अंतरात्मा पर कई तरह की दावेदारियाँ सामने अा रही थीं। पहली बार संस्कृति में अवाँगार्द प्रवृत्तियाँ प्रधान प्रवृत्तियों की तरह स्थापित होने लगी थीं।  वाम में नव-स्फूर्ति अौर दूरगामी विघटन की प्रक्रियाएँ एक साथ चल रही थीं, गो यह बात उस वक़्त  इतनी स्पष्ट न थी। कालांतर में बहुत कुछ एक भोर का सपना ही साबित हुअा। वह दौर जिसे परिवर्तनकारी दौर की तरह देखा जा रहा था, एक लम्बे राष्ट्रीय दुखांत से पहले का अंतराल था। प्रतिभाशाली लोगों की यह पहली खेप नहीं थी जिसकी सामाजिक हस्तक्षेपकारी संभावनाएँ मूर्त्तिमान नहीं हो सकीं अौर उनकी अपनी क्षमता अौर ताक़त संस्थानों अौर प्रतिष्ठानों के भीतर ही जज़्ब होकर या अपना स्थान वहाँ बनाए रखने में ही ख़र्च होकर रह गई। विष्णु खरे इसका अपवाद न थे। 

विष्णु खरे हरदम संस्कृति अौर साहित्य की दुनिया में रमे रहकर खप जाना चाहते थे। उनके दौर के हालात साज़गार नहीं थे, अौर न सिर्फ़ उनका स्वभाव बल्कि उनकी वैचारिक प्रेरणाएँ भी रास्ते में अाती थीं। लेकिन सांस्कृतिक परिदृश्य में केन्द्रीय अौर निर्णायक भूमिका निभाने की उनकी तीव्र इच्छा उन्हें एक ग़लत जगह ले गई। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हस्तिनापुर कॉलेज (अब मोतीलाल नेहरू कॉलेज) में अंग्रेज़ी अध्यापक की स्थायी नौकरी छोड़कर साहित्य अकादमी के उप-सचिव पद के लिए अावेदन देने की ठान ली। भारतभूषण अग्रवाल ने भी उन्हें इस काम के लिए प्रेरित किया। एक रोज़ उन्होंने अपनी जीवनसाथी कुमुद को स्कूटर पर बिठाया अौर दोनों ख़ुशी ख़ुशी भारतभूषण जी के पास गए अौर उन्हीं को अावेदन देकर अा गए। वह एक संभावनामय, सार्थक अौर उज्ज्वल भविष्य की अोर नहीं, बल्कि अँधेरे में छलाँग लगा रहे थे। १९७६ में वह साहित्य अकादमी के उप-सचिव तैनात हुए। उस समय उनकी उम्र ३६ साल थी। मैं बाईस तेईस साल का था अौर उद्दंडता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था। उसी साल या शायद उससे अगले साल एक रोज़ मैंने उनसे पूछा, “अापको संस्कृति प्रशासक बनने का इतना शौक़ कैसे पैदा हुअा? अध्यापकी में जो अाज़ादी अौर गरिमा है उसे लात मारकर कहाँ ये साहित्य अकादेमी में अा फँसे? अापको बहुत समझौते करने पड़ेंगे।” विष्णु खरे ने मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखा अौर एक क्रुद्ध साँड की तरह डकराए—“हुँह!” ज़ाहिर है उन्हें कोई मलाल न था। उन्होंने कुछ इस इस तरह की बात कही कि तुम्हें क्या लगता है मैं यहाँ क्या करने बैठा हूँ? मैंने कहा, खरे जी, यह जगह अौसतपन (मीडियॉक्रिटी) का गढ़ है। अाप नष्ट हो जाएँगे। बोले, तुम कह रहे हो मैं यहाँ अौसत काम करूँगा। मैंने कहा, देख लीजिएगा। उन्होंने कुछ स्नेह अौर कुछ नाराज़ी से कहा, “तुम्हें तुम्हारी ये काली ज़बान बहुत कष्ट देगी। तुम जे एन यू में हो। वहाँ वो नामवर भी है... उससे बचके रहना।”

मुझे अाज तक इस बातचीत पर अफ़सोस अौर ग्लानि है। अपनी धृष्टता पर, अौर इस बात पर कि मेरी ‘काली ज़बान’ से अनायास जो बात निकली थी वह एक तरह की भविष्यवाणी साबित हुई। साहित्य अकादेमी के कार्यक्रम प्रभारी वाले अपने कार्यकाल में उनके सम्पर्क अखिल भारतीय साहित्यिक अभिजन या श्रेष्ठिवर्ग अौर देशी विदेशी साहित्य संस्थानों अौर मंडलियों से अौर दूतावासों से बढ़े, अनुवाद का काम तलाशते बेरोज़गारों को छिटपुट काम दिला सके, छोटे प्रकाशकों अौर छापेख़ानों के मालिक उनके चक्कर लगाते थे, इस रुसूख़ की वजह से नए कवियों के कविता संग्रह छपाने में मददगार हुए, कविता-कहानी लिखने वाले प्रशासनिक सेवाअों में सक्रिय  नौकरशाहों से बराबरी से बात करने की सुविधा प्राप्त हुई। सबसे बड़ी बात यह हुई कि साहित्य अकादेमी की अाला अफ़सरी की वजह से हिन्दी के अाचार्यगण अौर पिछड़ी समझ के लेखक कवि अब उनकी कविता को कुछ मान्यता देने लगे। लेकिन कुल मिलाकर उनके जीवन के इतने सारे वर्ष वहाँ बरबाद ही हुए। एक बुद्धिजीवी, चिंतक अौर लेखक के रूप में उनका विकास अवरुद्ध हुअा। अौर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों का अौर हिन्दी की व्यावसायिक दुनिया से संबंधों का यह जाल मायाजाल ही साबित हुअा। ये सम्पर्क अौर लगातार विस्तारमान दिखती दुनिया अंततः कामकाजी दुनिया थी, वे संबंध भी कामकाजी अौर रस्मी ही थे। वह उनकी कॉन्स्टीटुएन्सी थी ही नहीं। जब तक महफ़िल गर्म थी, उन्हें अच्छा लगता रहा। अकादेमी से जब हटे तो यह दुनिया सिकुड़ गई। संस्कृति के महाबली बनने का उनका सपना कब का ख़त्म हो चुका था। मातहती उन्हें अाती न थी, बिना मातहती के अाज की दुनिया में महाबली कोई बन नहीं सकता।

उनकी दूसरी भूल थी यह समझना कि वह हिन्दी पत्रकारिता में कुछ परिवर्तन ला पाएँगे। टाइम्स ग्रुप में वह ऐसे समय नौकरी करने लगे जब अख़बार की दुनिया में समीर जैन-विनीत जैन का अभ्युदय हो चुका था, अौर पत्रकारिता एक बुद्धिविरोधी, मुजरिमाना दौर में प्रवेश कर चुकी थी। एक पेशे के रूप में भी पत्रकारिता का महत्त्व गिर रहा था, संपादकी का दरजा घट रहा था अौर काम की शर्तें पत्रकारों के विरुद्ध बदली जा रही थीं। कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लागू किया जा रहा था। ऐसे समय में मैनेजमेंट के साथ होना इस प्रक्रिया की पैरोकारी करना अौर इसमें मालिकान का हाथ बटाना ही था, जो काम (मुझे खेद है कि) सुरेन्द्रप्रताप सिंह जैसे संपादकों ने जमकर किया। इस दौर में बहुत से उपयोगी लफंगे पत्रकारिता में घुसे, अौर अख़बारों में उनका महत्त्व बढ़ता गया। ऐसे ही दौर में दिल्ली, लखनऊ, जयपुर में सम्पादकी करने के बाद विष्णु खरे पत्रकारिता से बाहर अाए। ज़िंदगी के इतने साल फिर से बरबाद करके। वह ख़ुद कहते थै ‘मॉय ट्रिस्ट विद जर्नलिज़्म वाज़ अ फ़िअास्को।’ अौर सही ही कहते थे।

इस दौर के बाद का उनका जीवन एक फ़्री-लांसर का जीवन था, जो कि हिन्दी में कोई जीवन ही नहीं हैं। पेशेवरी के ऐतबार से अनुवादक का जीवन भी, जैसा कि सब जानते हैं, कोई जीवन नहीं है, अौर फ़िल्म समीक्षक या फ़िल्म अालोचक का जीवन भी कोई जीवन नहीं है। इस दौर में जो काम उन्होंने किये अच्छे ही किए, पर मुझे संदेह है कि अपनी प्राथमिकता से किए। इस सिलसिले में उन्होंने ऐसी अवांछनीय जिरहें भी कीं जो अगर वह न करते तो हिन्दी के एक रौशनख़याल, सेकुलर नज़रिए पर जीवन भर अडिग रहने वाले अादमी के रूप में उनकी छवि को नुक़सान न पहुँचता। मैं तो यही समझता हूँ कि पिछले पंद्रह बीस साल में उन्होंने साहित्यिक परिदृश्य, ख़ासकर काव्य परिदृश्य, में विराट हस्तक्षेप अौर कॉन्स्टीटुएन्सी बिल्डिंग की जो कोशिशें कीं, उनके पीछे कोई सुचिंतित ख़ाका, गहरी कल्पनाशीलता या गहन सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन न था। उनके व्यक्तित्त्व में एक मुक्तिबोधीय पहलू ज़रूर था, जिसकी मांग वह पूरी न कर सके। इसका उन्हें अहसास था, ऐसा मुझे लगता है।

मुझे उनको देखकर हमेशा श्रीकांत वर्मा की याद अाई। वही बेचैनी, वैसी ही महत्त्वाकांक्षा, वैसा ही फ़्रस्ट्रेशन। उन्हें ताक़त अाज़माना अाता था लेकिन ताक़त का माक़ूल इस्तेमाल नहीं कर सकते थे—उसके प्रदर्शन में ही उनका वक़्त निकल जाता था। न वह अच्छे बॉस थे, न अच्छे मातहत। पूरा जीवन संशय अौर दुविधा से भरा था पर वह कभी यह क़ुबूल नहीं करते थे।  ऐसा वक़्त भी था — अौर बीच बीच में अभी तक अाता रहा — जब विष्णु खरे को एक कम्युनिस्ट या मार्क्सवादी या सिक्काबंद वामपंथी की तरह देखा गया। अक्सर उन्हें ख़ुद भी शौक़ होता था कि उनको प्रतिबद्ध वामपंथी कहा जाए। पर इससे जो ज़िम्मेदारी अान पड़ती है उसे उठाना उनके बस में कभी न रहा। इन दोनों—श्रीकांत अौर विष्णु—पर मुक्तिबोध का साया पड़ा था। वह साया जीवन भर उनके साथ लगा रहा—वे जानते थे वे किसके प्रति जवाबदेह हैं। इनके अंतःकरण में मुक्तिबोध मौजूद थे। वे यह भी जानते है कि उनके लिए यह वरदान नहीं अभिशाप है। वे इसी अंतःकरण में मुक्तिबोधियन शाप झेलने को अभिशप्त हैं। यह कोई निन्दा नहीं, इनके व्यक्तित्त्व अौर कृतित्त्व के मर्म को समझने का प्रयास है। कम से कम विष्णु खरे को ख़ुद इस धारणा से ऐतराज़ न था। एक बार इसी ‘मुक्तिबोधियन कर्स’ पर कुछ बात हुई। वह अचानक विचलित हुए, ठंडी साँस भरकर बोले—‘हाँ भई…’ अौर चुप हो गए।

यह सब मैं इसलिए कहता हूँ कि १९७० के दशक में विष्णु खरे हिन्दी साहित्य अौर संस्कृति जगत के भावी अौर समर्थ नेता के रूप में देखे जाने लगे थे। ही वाज़ द नेक्स्ट बिग होप। वह मेरे  भी हीरो थे। वह एक अाला दर्जे का चिंतक, साहित्येतिहास लेखक, सिद्धांतकार हो सकते थे, किसी हद तक थे भी, लेकिन बेशतर काम वह किए बिना चल बसे। बेशक उनकी ये असफलताएँ या विवशताएँ हममें से बहुतों की सफलताअों से तो बेहतर ही हैं। उनकी समस्या यह थी कि वह सत्ता, रुतबे, सरपरस्ती या संस्थान से जुड़े बिना कुछ करना पसंद नहीं करते थे। सिर्फ़ अपने दम पर कुछ पहल लेने को वह अपने अात्मसम्मान के  ख़िलाफ़ समझते थै। एक तरह के विद्रोही होने के बावुजूद उन्हें सत्ता या इक़्तिदार का मोह भी था जो कि मेरी पीढ़ी के लोगों में भी कम नहीं हैं, अलबत्ता उनकी विष्णु खरे जैसी पहुँच नहीं है।  


यह मुहब्बतनामा कुछ जल्दी में लिखा गया है। अौर अच्छा ही है कि जल्दी ने कुछ लिखवा लिया अौर दुबारा ग़ौर करने का मौक़ा संपादक ने न दिया। बहरहाल मौसूफ़ ज़िंदा होते तो इसमें मीन मेख़ ज़रूर निकालते, पर कुल मिलाकर इसे मुहब्बतनामा ही जानते।








(‘समयान्तर’ में `एक और खाली घर` शीर्षक से प्रकाशित। वहीं से साभार)


Thursday, September 20, 2018

विष्णु खरे - अपनी तरह के अलहदा

कवि पंकज चतुर्वेदी ने विष्णु खरे की रामचंद्र शुक्ल और मुक्तिबोध को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी का ज़िक्र किया तो किसी ने इस वक़्त ऐसा न करने की नसीहत देकर एतराज़ किया। 'इस वक़्त' यह अजीब कुतर्क है। पता नहीं क्यों खरे जी के बारे में सोचते हुए मुझे केदारनाथ सिंह याद आ रहे थे। कई वजहों से। डर यही था कि 'इस वक़्त' की नसीहत वाले चले आएंगे। बहरहाल, कृष्ण कल्पित ने एक टिप्पणी में अभी इन दोनों कवियों का ज़िक्र किया - "केदारनाथ सिंह की अनुकृति करने की कोशिश में जितने युवा कवि नष्ट हुये उससे कुछ अधिक ही विष्णु खरे की कविता की नक़ल करके हुये होंगे । जो कवि जितने युवा कवियों को बरबाद कर सके - वह उतना ही बड़ा कवि होता है । इस लिहाज़ से केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे दोनों ही बड़े कवि ठहरते हैं - कुछ थोड़ा कम तो कुछ थोड़ा ज़्यादा !"

मुझे लगता है कि केदारनाथ सिंह कविता और साहित्य की राजनीति में फूंक-फूंक कर सधे हुए कदम रखने वाले शख़्स थे। उनकी कविता अपने साफ़-सुथरेपन और एथनिक से कलापन की वजह से भी लोकप्रिय थी जिसकी नक़ल करके बर्बादी के साथ उनसे बड़ा कवि बन जाने की गुंजाइश भी मौजूद है।

खरे जी की कविता की नक़ल बर्बाद ही कर सकती थी। क्योंकि वह नक़ल कविता की लंबाई की हो सकती थी, स्टाइल की हो सकती थी जिससे बर्बादी के अलावा कुछ हाथ लगना सम्भव नहीं। उनकी कविताओं जैसी कविताएँ लिखने की कोशिशें ख़ूब हुईं। वे नक़ल ही थीं।
खरे जी की संवेदना और लगाव की नक़ल संभव नहीं क्योंकि ये चीज़ें नक़ल से हासिल हो ही नहीं सकती। जिस संवेदना और लगाव के साथ वे जिन जगहों और जिंदगियों में पहुंच जाते थे, वह दुर्लभ है। उनकी कविताओं में जो हाहाकार है, वह इसी संवेदना और मज़बूत लगाव की वजह से है। वह पक्षधरता, मनुष्यता और बारीक़ नज़र उनके पास ही थी जो उनके जैसी कविता के लिए ज़रूरी थी।

बड़े कवि तो खरे के आसपास हमेशा ही अनेक रहे। कुँवरनारायण और देवताले तो कुछ समय पहले ही विदा हुए। केदारनाथ सिंह भी। खरे किसी से बड़े कवि नहीं थे। केदारनाथ सिंह से तो कतई नहीं जिन्होंने अपना वैभव, ओरा और शिष्य संसार काफी बड़ा बनाया था। खरे तो अपनी कविताओं के बारे में न कभी ख़ुद कोई चर्चा आयोजित कर सकते थे और न प्रायोजित। पुराने और नये लेखकों-कवियों से उनके गहरे रिश्ते थे पर वे तोड़फोड़, फटकारना और फटकार खाना इतना करते थे कि कोई स्थायी मठ बनना उनके व्यक्तित्व में शामिल ही नहीं था। लेकिन, वे बड़ों से बड़े कवि इस तरह थे कि उन्होंने कविता में अपना एक नितांत नया रास्ता बनाया। रघुवीर सहाय जिस अति कला को छोड़कर शुष्क कही जाने वाली यथार्थवादी राह पर थे, उससे भी ज्यादा शुष्क गद्य सी राह। पर ऐसी शुष्क कि पाठक की आँखें और हृदय संवेदना से रो पड़ते हैं। एक सच्ची कविता ही ऐसा कर सकती है। जैसा कि कल्पित जी ने उन्हें मुक्तिबोध से जोड़ते हुए एक बात कही और जैसा कि असद जी अक्सर खरे जी की कविताओं पर बात करते हुए मुक्तिबोध के उस 'अपराध बोध' का जिक्र किया करते हैं, मुझे भी यही लगता है कि वे मुक्तिबोध और सहाय के वारिस थे। पर अपनी तरह के अलहदा।

Thursday, January 5, 2012

बहरहाल सुलह-सफाई : गो निराला बहस से बाहर ही रहे



वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने निराला को लेकर खुद पर लगी तोहमत पर नया मेल जारी किया है। उसका मजमून-

`निराला की अपाठ्यता का पटाक्षेप


मुझे एक क्षीण-सी आशा थी कि केदारजी इस मसले को लेकर अपनी ओर से कुछ न कुछ कहेंगे और वह सही सिद्ध हुई.वे इन्टरनेट और ब्लॉग-विश्व से अनभिज्ञ हैं और ई-मेल आदि भी नहीं करते, किन्तु इस प्रकरण को लेकर उनके कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें सूचना दी  और उन्होंने तत्काल आज सुबह मुझे  फोन किया और एक भावनापूर्ण बातचीत  में  अधिकृत किया है कि मैं नेट के ज़रिये उनकी तरफ से सभी हिंदी लेखकों और निराला-प्रेमियों को सूचित कर दूं कि उन्होंने अलाहाबाद के अपने भाषण में निराला की 'तुलसीदास',' राम  की शक्ति-पूजा' और 'महाराज शिवाजी का पत्र' सरीखी कविताओं को लेकर मेरी दृढ आपत्ति का उल्लेख अवश्य किया था किन्तु यह क़तई नहीं कहा था कि विष्णु खरे के लिए निराला "अपाठ्य" हैं.केदारजी का कहना है कि उनके उस वक्तव्य को असावधान और ग़ैर-जिम्मेदाराना ढंग  से प्रकाशित-अनूदित कर दिया गया है. इस प्रकरण पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए उन्होंने  मुझसे तथा अन्य सैकड़ों निराला-प्रेमियों से इस भ्रान्ति के लिए मार्मिक शब्दों में हार्दिक खेद व्यक्त किया है.केदारजी ने यह भी कहा है कि  वे उपयुक्त सार्वजनिक  अवसर और मंच पर भी इस ग़लतबयानी   का खंडन और निराकरण करेंगे.
हमारे वरिष्ठ और प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के इस स्पष्टीकरण और खेद-प्रकाश  के बाद,जो  उनके अनुमोदन के लिए उन्हें पढ़ कर सुना दिया गया था,मुझे उम्मीद है कि इस प्रसंग पर आगे कोई विवाद नहीं होगा.फिर भी इसे सत्यापित करने के लिए कोई चाहे तो उनसे उनके टेलीफोन 09868637566 पर संपर्क कर सकता है, किन्तु ध्यान रहे कि केदारजी की मा कलकत्ता में गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं.
विष्णु खरे
पुनश्च:    'रविवार','एक-जिद्दी-धुन' तथा 'भड़ास' के ब्लॉगमास्टरों से विशेष अनुरोध है कि इस पत्र को शीघ्रातिशीघ्र अवश्य  प्रकाशित  करें.धन्यवाद.   वि.ख.`

Wednesday, January 4, 2012

`कारनामा-ए-केदारनाथ सिंह` : निराला निंदा की तोहमत से आहत हैं खरे जी



वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने अपने मित्रों परिचितों को एक मेल सर्कुलेट किया है जो घूमता हुआ मुझ तक भी पहुंचा है। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह के हवाले से कहीं छपा है कि खरे जी महाकिव निराला को   अपाठ्य मानते हैं। इससे हैरान और आहत खरे जी की यह टिपण्णी उनका पक्ष भर ही नहीं है, यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि हिंदी की दुनिया में आखिर चल क्या रहा है। युवाओं पर जिस गैरजिम्मेदारी की तोहमत अक्सर लगती रही है, इसकी जड़ें पीछे ही तो नहीं हैं?

खरेजी के मेल का मजमून :
यदि मामला  निराला से सम्बद्ध न होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण  टिप्पणी शायद न लिखी जाती.अनुरोध है कि संभव  और उचित हो तो कृपया अन्य साहित्य-जागरूक  मित्रों तक पहुँचाएँ.केदारजी से सार्वजनिक क्षमा चाहता हूँ.
सधन्यवाद,
विष्णु खरे



यदि वरिष्ठ कवि-आलोचक विजय कुमार का फोन न आता तो यह सब न लिखा जाता.पिछले एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने अपने किस लेख में कब लिखा है कि मैं निराला को अपाठ्य कवि मानता हूँ.मुझे उनके इस प्रश्न का सन्दर्भ कुछ याद तो आया किन्तु मैंने उनसे माजरा जानना चाहा.बोले कि गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी पत्रिका  में केदारनाथ सिंह का कोई अनूदित लेख या वक्तव्य प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि विष्णु खरे निराला को अपाठ्य मानता है.
मैंने विजयजी से यह नहीं पूछा कि वे वर्धा की बेहूदा और खरदिमाग ढंग से संपादित-प्रकाशित  कल्पनाशून्य  पत्रिकाएँ पढ़ते ही क्यों हैं – यद्यपि हिंदी में कूड़ा पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है - किन्तु मामले की गंभीरता से सजग हुआ.केदारजी ने शायद अलाहाबाद के अपने किसी भाषण में उस तरह का  कुछ कहा था जिसे किसी पत्रिका ने उद्धृत भी किया था किन्तु अधिकांश हिंदी अखबारों और साहित्यिक पत्रिकाओं में ऐसे भाषणों का जो अनर्गल चर्बा छपता है वह अविश्वसनीय और रद्दी  के लायक होता है.लेकिन पूरे भाषण या लेख का ऐसा हिस्सा ,भले ही आशंकित खराब अंग्रेज़ी अनुवाद में,कुछ तवज्जोह चाहता है.
केदारजी की प्रतिष्ठा ऐसी है कि उनके किसी भी वक्तव्य को,विशेषतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरीभाषी अंचल में, आर्षवाक्य मान लिया जाता है.यदि वह कथन विष्णु खरे को निराला का निंदक ठहराता हो तो कहना ही क्या - सैकड़ों विकलमस्तिष्कों  के मानस-मुकुल खिल-खिल जाते हैं.
हमारे यहाँ कोई यह पूछने या जानने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता कि अमुक बात यदि कही या लिखी गयी है तो कहाँ या कब ? उसके लिखित या दृश्य-श्रव्य सबूत  या गवाह क्या और कौन हैं ? स्वयं केदारजी ने कोई हवाला नहीं दिया है.इतने बड़े कवि तथा प्रोफ़ेसर-पीर से उसका मुत्तवल्ली-मंडल भला क्यों तफ्तीश करे – बाबा वाक्यं प्रमाणं.
सच क्या है ? मैं सार्वजनिक रूप से निराला पर कभी नहीं बोला हूँ – उन पर लिखी गयी अपनी दो टिप्पणियों को अवश्य मैंने संगोष्ठियों में पढ़ा है,एक को वर्षों पहले भारत भवन में और दूसरी को पिछले तीन वर्षों में कभी हिंदी अकादेमी के तत्त्वावधान में दिल्ली में.पहली में निराला की बीसियों प्रारंभिक कविताओं की सराहना और यत्किंचित विश्लेषण हैं और दूसरी में उनकी सिर्फ एक कविता – महगू महगा रहा - की लंबी व्याख्या,क्योंकि विषय वैसा ही था.दोनों मौकों पर कुल मिला कर ढाई-तीन सौ सुधी श्रोता तो रहे होंगे,भले ही केदारजी मौजूद न रहे हों.दोनों टिप्पणियाँ शायद आयोजकों द्वारा प्रकाशित भी की जा चुकी हैं या उनके रिकॉर्ड में होंगी.मेरे पास तो हैं ही.उनमें निराला की हल्की-सी भी आलोचना नहीं है – वे एक निर्लज्ज भक्ति-सरीखे भाव से भरी हुई हैं.
इसे भले ही आत्मश्लाघा समझा जाए लेकिन मैं हिंदी के शायद उन कुछ लोगों में से हूँ जिन्होंने निराला की एक-एक कविता एकाधिक बार पढ़ रखी है.नंदकिशोर नवल द्वारा क़ाबिलियत से संपादित ‘निराला रचनावली’ के पहले दोनों – कविता – खण्डों में मेरे बीसियों पेन्सिल-निशान हैं और शेष छः खण्ड भी लगभग पूरे पढ़े हुए हैं.यह स्पष्ट ही होगा कि मैंने निराला को अपाठ्य मानकर पूरा का पूरा तो पढ़ा न होगा.
निराला से मेरी ताज़िन्दगी वाबस्तगी का एक ताज़ा उदाहरण देना चाहता हूँ.निराला के सभी समर्पित पाठक जानते हैं कि नेहरू-परिवार से,विशेषतः विजयलक्ष्मी पंडित से,उनके जटिल रागात्मक सम्बन्ध थे.उनकी कुछ कविताओं में इसके साक्ष्य हैं.यह सुविदित है कि आज़ादी के बाद निराला की बदहाली को जानकर जवाहरलाल नेहरू ने उनके लिए एक नियमित आर्थिक सहायता का प्रबंध किया था.हाल नवंबर में संयोगवश मेरी भेंट विजयलक्ष्मी की बेटी और सुपरिचित भारतीय-अंग्रेज़ी लेखिका नयनतारा सहगल से हुई, जो अब स्वयं चौरासी वर्ष की हैं.अपने बदतमीज़ दुस्साहस में मैंने उनसे निराला और उनकी मा के विषय में पूछा,और यह भी कि क्या विजयलक्ष्मीजी के मृत्योपरांत कागज़ात में निरालाजी के कोई पत्र मिलते हैं,जिनका हवाला उनकी कविताओं में है ? मुझे लगा कि मेरे इस प्रश्न से नयनताराजी अपने-आप में लौट गईं और उन्होंने मुझे अजीब ढंग से देखकर – शायद यह  मेरी कल्पना ही हो - सिर्फ इतना कहा कि ऐसे कोई पत्र नहीं हैं.मैंने तब बात को आगे नहीं बढ़ाया.लेकिन हमारे स्वनामधन्य मतिमंद हिंदी प्राध्यापकों को ऐसी चीज़ों से भला क्या लेना-देना ?
निराला का मेरे लिए क्या अर्थ है इसे ज़्यादा तूल न देते हुए मैं सिर्फ अपनी तीन कविताओं  का हवाला देना चाहूँगा.एक का शीर्षक है सरोज-स्मृति जो एक अलग तरह की सरोज की अलग तरह की स्मृति है.यह अभी प्रकाशित नहीं हुई है.दूसरी है जो मार खा रोईं नहीं जो दो बच्चियों की उनके पिता द्वारा पिटाई को लेकर है और संग्रह सबकी आवाज़ के परदे में छपी है.तीसरी कूकर है जो खुद अपनी आँख से में संकलित है और जिसकी कुछ प्रासंगिक अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं :
कबीर निराला मुक्तिबोध के नाम का जाप आजकल शातिरों और जाहिलों में जारी है
उन पागल संतों के कहीं भी निकट न आता हुआ सिर्फ उनकी जूठन पर पला
छोटे मुँह इस बड़ी बात पर भी उनसे क्षमा माँगता हुआ
मैं हूँ उनके जूतों की निगरानी करने को अपने खून में
अपना धर्म समझता हुआ भूँकता हुआ.
निराला की और भी प्रकट-प्रच्छन्न उपस्थितियाँ मेरी कविताओं में होंगी और होती रहेंगी.उनकी एक कविता मेरे लिए बतौर कवि अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और मेरे और उसके बीच एक लंबा कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध चल रहा है. अपने गद्य में मुझे निराला का चमरौंधे वाला जुमला बहुत उपयोगी और मुफीद लगता है और उनका द्याखौ चुतिया कौ, हमहीं से पूछत है हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि कौन है तो अपनी नकली खीझ-भरी सैंस ऑफ़ ह्यूमर में अद्वितीय है और कभी-कभी मेरे काम आता है.
तो क्या जब केदारजी यह कहते हैं कि विष्णु खरे निराला को अपाठ्य मानता है तो वह एक अनुत्तरदायित्वपूर्ण,शरारती प्रलाप है ? नहीं. वह मयपरस्ती से पैदा हुई एक अतिरंजित स्मृतिभ्रष्ट गलतबयानी है.
मैं केदारजी को अपना मित्र समझने की मुँहचाटू गुस्ताखी तो नहीं कर सकता लेकिन हाँ, वे बहुत प्यारे इंसान हैं,मुझे बर्दाश्त कर लेते हैं और उनकी सोहबतों की सौगातें मुझे मिलती  रही  हैं .उनकी संगत बहुत पुरलुत्फ,जीवंत,शेर-ओ-सुखन व ज़बरदस्त सैंस ऑफ़ ह्यूमर से मालामाल होती और करती है.श्लेषों और ज़ूमानियत की आवाजाही  लगातार  बनी  रहती  है.वे बराहे मयपरस्ती खूब खुल भी लेते हैं.साक़ी,हमप्यालों और पैमानों  पर  एक ही गर्दिश रहती है कि केदारजी को जितना शौक़ मुँह की लगी हुई से है,उसके एक-दो कश के बाद ही वे एक उतने ही खूबसूरत सुरूर में दाखिल हो जाते हैं और दो-तीन के बाद तो, अल्लाह झूठ न बुलवाए,खुद पर एक क़लन्दराना हाल-नुमा तारी कर लेते हैं.फिर उन्हें या तो मौक़-ए-वारदात पर ही आरामफ़र्मा किया जाता है या किसी गुलगोथने,नींद में मुस्कुराते हुए नौज़ाईदा की मानिंद निहायत एहतियात से हाथों-हाथ उनके दौलतख़ाने ले जाया जाता है.अगली सुबह और उसके बाद उनकी कैफियत ‘इक याद रही इक भूल गये’ की रहती है.
बात कुछ वर्षों पहले शायद बिलासपुर,छत्तीसगढ़ की है.केदारजी और मैं एक साहित्यिक आयोजन में वहाँ आमंत्रित थे.रात जवान होते-होते होटल के कमरे में अदब और बादे का दोस्ताना इजलास शुरू हुआ और बात निराला तक पहुँची.जब ‘तुलसीदास और ‘राम की शक्ति-पूजा’ सरीखी उनकी कविताओं का चर्चा हुआ तो मेरा निवेदन यह था कि मैं निराला की ऐसी पुनरुत्थानवादी,वर्णाश्रमधर्मी,मृदु-हिन्दुत्ववादियों के द्वारा इस्तेमाल की जा सकने वाली रचनाओं को सराह नहीं सकता और उनके पाठ्यक्रमों में रखे जाने के सख्त खिलाफ़ हूँ.केदारजी का निराला की ऐसी कविताओं को लेकर अपने तरह का बचाव रहा होगा किन्तु मैं तब भी सिर्फ निराला ही नहीं,मैथिलीशरण गुप्त,जयशंकर प्रसाद और अन्य कवियों की ऐसी कविताओं का विरोधी था, अब भी हूँ और रहूँगा.उनकी ऐसी रचनाएँ,जो सौभाग्य से बहुत कम हैं, दुर्भाग्यपूर्ण हैं किन्तु वे तब भी हमारे महान और कालजयी कवि हैं.
मुझे हैरत इस बात की है कि बिलासपुर की उस पुरजोश शाम के बाद हालाँकि केदारजी से बीसियों बार तर-ओ-खुश्क मुलाकातें नसीब हुई हैं लेकिन उन्होंने कभी निराला का न तो ज़िक्र छेड़ा न उस सरसरी बहस को आगे बढ़ाया,उलटे वैसा एकतरफ़ा,बेबुनियाद और निराला (के लिए बहुत कम) व मेरे लिए (काफी) नुकसानदेह बयान दे डाला.यदि वह वैसा न करते तो मैं भी यह सब लिखने को मजबूर न होता.नामवर सिंह जैसे लबार यहाँ-वहाँ अनर्गल प्रलाप करते घूमते रहते हैं किन्तु उन्हें बरसों से कुछ चिरकुट-चेलों और प्रलेस के उनके मतिमंद क्रीतदासों के सिवा कोई गंभीरता से नहीं लेता.जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से संबद्ध होने के बावजूद केदारनाथ सिंह की सार्वजनिक प्रतिष्ठा अब भी बची हुई है और मुझ सरीखे लोग उनकी स्नेहिल कद्र भी करते हैं, लिहाज़ा उनसे उम्मीद और इल्तिज़ा की जाती है कि वे अतिरेक में ऐसी गैर-जिम्मेदाराना गलतबयानी से बचेंगे.

विष्णु खरे
(निराला का यह मशहूर चित्र प्रभु जोशी के ब्रश से)

Tuesday, July 27, 2010

`लेकिन वे बड़े कवि हैं`


`इधर हिंदी-पट्टी में कुछ घुमंतू स्वयम्भू “फिल्म-समारोह-निदेशक” कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं जो अपने फटीचर झोलों में दो-तीन पुरानी पाइरेटेड चिंदी सीडिओं के बल पर निरीह दर्शकों को बहका कर कस्बाई सिने-बजाज बने कमा-खा रहे।`

ये लाइनें ईरानी फिल्मकार जफ़र पनाही पर लिखे विष्णु खरे के लेख से ली गई हैं जो कादम्बिनी के जुलाई अंक में छपा था।

दुनिया तेजी से बदल रही है। देखते-देखते झोला लटकाए किसी मकसद के लिये घूमते-फिरना अपमान का सबब मान लिया गया है। झोला फटीचर हो और उसमें पुरानी चिंदी चीजें हों तो आपकी खैर नहीं। कमबख्त गली के कुत्ते भी उसे ही भौंकते हैं। लेकिन हिन्दी का `मार्क्सवादी` कवि-आलोचक भी ऐसे लोगों को फटकारने लगे तो समझना चाहिए कि दुनिया वाकई बदल गई है या फिर नफा-नुकसान भांपकर हमारे `बुद्धिजीवी` बदल गए हैं। एक अखबार के संपादक के पास हजारों फिल्मों की सीडी हैं और वे अक्सर अपने इस प्रिविलेज का प्रदर्शन भी करते हैं लेकिन इससे उनकी राजनीति ज्यादा प्रोग्रेसिव नहीं हो जाती। ऐसे बहुत से लेखक हैं जो आज अचानक अपने ज्यादा पढ़े-लिखे होने का ढिंढोरा खुद पीट रहे हैं और अहंकार में अपने से पहले की पीढी को बेपढ़ा और मूर्ख घोषित करते रहते हैं,लेकिन उनके सरोकार उतने ही ज्यादा नंगे होते जाते हैं।

मैं जिन कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में रहता हूँ वहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास बेहद कम किताबें है, हालाँकि उनमें किताबों की भूख बेहद ज्यादा है। जिनके पास बेहद सस्ती हो जाने के बावजूद न डीवीडी है, न सीडी और न टीवी। फिर भी उनके सरोकार बेहद साफ़-सुथरे हैं और वे आज भी साइकलों पर फटे झोलों में चाँद किताबें लिये, छोटे-छोटे गाँवों में मीटिंगें करते हैं, नाटक जत्थे चलाते हैं और बेहतर दुनिया का ख्वाब ही नहीं देखते, अपने तईं उसके लिये संघर्ष भी करते हैं।

लेकिन विष्णु खरे निश्चय ही बड़े, बेहद बड़े कवि, आलोचक,फिल्म और विविध कलाओं के समीक्षक हैं। कुछ दिनों पहले तक उन्हें भी `कुछ फटीचर झोलों में दो-तीन पुरानी पाइरेटेड चिंदी सीडिओं` के सहारे हिन्दी पट्टी में प्रतिरोध का सिनेमा दिखाने का दावा करने वालों के साथ देखा जाता था। ठीक ही है जो उन्होंने अपने रुतबे को आगे ऐसे `फटीचरों` के साथ बेआबरू होने से बचा लिया है। मालूम नहीं कि यह सब उन्होंने हुसेन प्रकरण में एक `नागवार` लेख छपने के बाद महसूस किया या फिर `कादम्बिनी` वाली पंक्तियाँ पहले ही छपचुकी थीं।

जाहिर है एक `बड़े` आदमी को हक़ है कि वो जब चाहे जिसे फटकार लगाए, फिर वो हुसेन हों, असहमति जताने वाले रवीन्द्र त्रिपाठी हों या किसी कार्यक्रम के श्रोता हों (जसम के गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुए एक कार्यक्रम में उनका फट पड़ना ज्यादा पुरानी घटना नहीं है)। यह उनके `बड़े` होने का ही कमाल है कि जब वे हुसेन प्रकरण में खालिस संघी स्याही से पन्ने के पन्ने रंग रहे थे तो एक वरिष्ठ (खरे जी से वरिष्ठ नहीं) कवि बेबसी से कह रहे थे- `लेकिन वे बड़े कवि हैं।` अब भी कोई क्या बोले?

Wednesday, March 10, 2010

हुसेन प्रकरण : क्या विष्णु खरे ने बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का `भार` उतार फेंका? - धीरेश सैनी



विष्णु खरे को उनके `मित्र` ज़िद की हद तक सेक्युलर कवि-चिन्तक बताते रहे हैं। `लालटेन जलाना` समेत उनकी दो किताबें (कविता की) मैंने पढ़ी हैं और वाकई मुझ पर उनकी कई कविताओं का गहरा असर हुआ है। मसलन दिल्ली में मुसलमानों की हत्या के प्रसंग को लेकर उनकी एक कविता का। लेकिन इतवार (7 march, 2010 page 6)को जनसत्ता में चित्रकार हुसेन पर उनका लेख `अपने और पराये` पढ़ने के बाद मैं लगातार सोच रहा हूँ कि यह कविता क्या उसी विष्णु खरे ने लिखी है जिस विष्णु खरे ने यह लेख लिखा है या ये दोनों खरे कोई दो हमनाम लोग हैं या फिर इनमें से बाद वाला हमेशा से पहले वाले के भीतर ही रहता रहा है।

खरे अपने इस विशाल आकार वाले लेख की शुरुआत क़तर को (उस क़तर को जिसने हुसेन को नागरिकता दी है) उसकी औकात बताने से करते हैं कि उसकी औकात खरे के मौजूदा शहर दिल्ली के मयूर विहार इलाके से भी और कच्छ जिले से भी मामूली है। वो धनवान है पर उसकी हालत ऐसे इस्लामी धनपशु की है जो कला, प्रजातंत्र आदि मूल्यों से विहीन है और हुसेन के मुस्लिम होने के नाते किसी भी मुस्लिम देश का उन पर फ़िदा होना स्वाभाविक है। तो इस तरह विष्णु खरे प्रस्तावना से ही पाठक का दिमाग एक गहरी मुस्लिम घृणा से भर देना चाहते लगते हैं। इसके बाद वे बताते हैं -
`निसंदेह भारत में हुसेन पर संकट था और है- था इसलिए कि हिन्दू देवी-देवताओं और `भारतमाता` पर बनाए गए उनके चित्रों को लेकर जो धार्मिक दुर्भावनाएं भड़काई गईं और जो सैकड़ों मुक़दमे दायर किये गए उनमें बहुत कमी आई है- दुर्भावनाएं शायद कुछ ठंडी पड़ी हैं और मुकदमे कुल तीन बच रहे हैं। उच्चतर न्यायालयों ने हुसेन की कलाकृतियों पर लगातार एक उदार, सहिष्णु और प्रबुद्ध रुख अपनाया है। देश के सैकड़ों लेखकों, बुद्धिजीवियों, मीडियाकर्मियों, कलाकारों, सक्रियतावादियों और वामपंथी पार्टियों ने हुसेन का बचाव और समर्थन किया है। हुसेन के वकील अदालतों में मौजूद हैं, लेकिन संकट अब भी इसलिए है कि अपनी विवादित कृतियों में हुसेन हमेशा भारत में हैं और उन पर आपत्ति करने वाले, कभी भी, कोई भी आन्दोलन खड़ा कर सकने वाले साम्प्रदायिक तत्व तो इस देश में रहेंगे ही।`
तो यह चतुर शैली इस पूरे लेख की खासियत है जिसमें हुसेन के लिए भी और उनके किए पर भी पर एक साथ अफ़सोस किया जाता है। मतलब खरे यह नाप लेते हैं कि हुसेन के प्रति दुर्भावनाओं में कमी आ गयी है, शायद वे संघ प्रमुख के उस बयान से मुतमईन हों जिसमें उसने कहा है कि हुसेन के भारत लौटने पर उसे एतराज नहीं है। नरसिम्हा राव भी बाबरी मस्जिद पर इस जमात के बयान से पूरी तरह मुतमईन थे (मुझे नहीं पता कि खरे ने सोनिया, अर्जुन सिंह आदि की तरह राव को भी अपनी किसी कविता से निहाल किया हो) । खरे बताते हैं कि मुक़दमे कुल तीन रह गए हैं और पूरा बुद्धिजीवी समाज हुसेन के `बचाव` में मुस्तैद है। हालाँकि जिस हिंदी में खरे लिखते हैं, उसके ही बुद्धिजीवियों और अखबारों ने हुसेन के खिलाफ निरंतर अभियान चलाये हैं और इस घृणित मुहिम में वे `समाजवादी` भी शामिल रहे हैं जिनके नेता राम मनोहर लोहिया के कहने पर हुसेन ने राम और भारतीय मिथकों पर पेंटिंग्स की सीरीज शुरू की थी। क्या इस समय भी `बुद्धिजीवियों` के हुसेन विरोधी लेख और सम्पादकीय जारी नहीं हैं। दरअसल यह पैरा इस लेख में बाद में आये इस निष्कर्ष को प्रतिपादित करने के लिए है कि हुसेन भगौड़े हैं। बकौल खरे,` खुद हुसेन बौद्धिक रूप से कुछ दुर्बल, दुविधाग्रस्त और दोमुंहे लगते हैं`। ऐसा कुतर्क करने वाले कई लोग हैं जो इस आधार पर हुसेन का पक्ष लेना उचित नहीं मानते कि वे खुद `संघर्ष` नहीं कर रहे हैं। तो क्या अगर कोई शख्स `क्रांतिकारी` नहीं है तो उस पर साम्प्रदायिक हमला वाजिब हो जाता है। हुसेन जैसे विश्वप्रसिद्ध कलाकार तो क्या किसी भी सामान्य व्यक्ति पर किसी भी फासीवादी हमले का विरोध सेक्युलरिज्म या मनुष्यता की शर्त की तरह ही है। एक बार हबीब तनवीर ने कुछ ऐसा कहा था कि बेशक मैं सांप्रदायिक ताकतों से कला और सड़क दोनों जगह लड़ता रहा हूँ। हुसेन सड़क पर नहीं लड़ते तो उन पर हमले वाजिब नहीं हो जाते।

खरे हुसेन के कुछ `विवादित` चित्रों का जिक्र करते हुए कहते है - `दुर्भाग्यवश, न तो खुद हुसेन ने कोई स्पष्टीकरण दिया है और न ही उनके प्रशंसकों-निंदकों ने उनसे पूछा है.` मानो हुसेन के स्पष्टीकरण के बाद या उनकी `माफी` के बाद मामला सुखद हो जाता. मानो बाबरी मस्जिद पर दावा (जो कितना बचा है?) छोड़ने के बाद साम्प्रदायिक ताकतें मुस्लिम प्रेम में डूब जातीं. मानो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद खरे हुसेन की मंशा को लेकर संतुष्ट हो गए हों. हालांकि खुद खरे भी इसका जवाब जानते हैं और इसी लेख में एक जगह वे कहते हैं, `हम जानते हैं कि हुसेन के क्षमा मानने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि एक ओर वे अपनी विवादित कृतियों को सिर्फ़ `रिग्रेट` करते हैं और दूसरी ओर हिन्दू साम्रदायिक तत्व एन-केन-प्रकारेण इस मसले को पुनर्जीवित करते रहेंगे.`

लेकिन बात इतनी सी नहीं है, पूरा लेख बार-बार हुसेन को कठघरे में खड़ा करता है और हुसेन को सीमा तय करने की नसीहत देता है. खरे कहते हैं, `कोई मुस्लिम भी हिन्दू देवी-देवताओं के अर्द्धनग्न चित्र देखना-दिखाना नहीं चाहेगा. पश्चिमी समाजों में भी नग्नता की एक आपत्तिजनक सीमा होती है. `कामसूत्र` और खजुराहो आदि की दुहाई देना व्यर्थ और हास्यास्पद है. ......अर्द्धनग्नता भले ही हमारे अखबारों और टैबलोइड्स में बिछी पड़ी हो, भले पश्चिमी मोडेल्स की उद्दीपक तस्वीरों में, हमारे किसी भी धर्म को मानने वाले समाज में उसकी स्वीकृति कहाँ है? यह प्रश्न अलग है कि हमें वैसा करना चाहिए या नहीं, लेकिन क्या हमने `कलात्मक` नग्नता को आम भारतीय को कभी समझाया? कलाओं या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाइयां देकर हम देश को उसकी सदियों की नैतिक, सामाजिक, धार्मिक वर्जनाओं से रातोंरात मुक्त नहीं कर सकते.` लेखक की मुसलमानों और हुसेन से घृणा बार-बार छलछलाती है. वे हिन्दू कट्टरवाद को बाकायदा `नैतिक` आधार देने को उतावले हैं -` विडंबना यह है कि `खुलेपन` की वह हिन्दू `संस्कृति` भारत में इस्लाम के आने के कारण ही लुप्त हुई- जब हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व या `आम जनता` हुसेन पर हमला करते हैं तो वे एक तरह से इस्लाम की ताईद ही कर रहे होते हैं`.

खरे यह भी याद दिलाते हैं कि `हुसेन सिर्फ़ शिया नहीं हैं, उनमें भी बोहरा उप-सम्प्रदाय से हैं, जिसकी आलोचना बोहरा बुद्धिजीवी असगर अली इंजीनियर करते रहे है और उन पर जानलेवा हमले हो चुके हैं. हुसेन अपने बोहरा सम्प्रदाय के वर्तमान दाइल मुतलक सैयदना मुहम्मद बुरहानुद्दीन की शबीह भी शायद नहीं बनाना चाहते. लेकिन अपनी एक फिल्म में अभिनेत्री तब्बू द्वारा अभिनीत किरदार को `नुरुन्न्लानूर` कहलवा कर, जो कुरान में अल्लाह का एक संबोधन है, वे अपनी उँगलियाँ जला चुके हैं और उन्हें मुस्लिम समाज से माफी मांगनी पड़ी है.` इस तरह खरे वे तमाम बातें करते हैं जो संघ और दूसरे हुसेन विरोधी करते ही रहे हैं. सीता और हनुमान के चित्र की वे बाकायदा विस्तार से बेहद-बेहद भड़काने वाली व्याख्या करते हैं और पूछते हैं - `क्या इसके लिए इन्साफ माँगना `अकलात्मक`, `हिन्दुत्ववादी`, `सावरकारी` फासीवाद है?` तुर्रा यह कि एक जगह वे यह भी जोड़ते हैं, `हुसेन का अधिकांशत: पक्ष लिया ही जाना चाहिए...`. उनका एक और मजेदार (?) वाक्य है, `बदकिस्मती यह भी है कि हमारे समाज में आधुनिक प्रबुद्धों और जनसाधारण के बीच एक लगभग अपार बौद्धिक खाई है...`. पूरा लेख पढ़कर यह बदकिस्मती शब्द ऐसा ही लगता है जैसा बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आडवाणी के मुंह से कोई ऐसा ही पर्यायवाची निकला था.

वही बात फिर से कि इस लेख में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जो हुसेन के प्रति नफरत फैलाने वाले कह न चुके हों, नया सिर्फ़ यह है कि यह उस बुद्धिजीवी ने लिखा है जो सेक्युलर जाना जाता है और जलेस और जसम जैसे संगठनों के मंच से आग उगलता रहता है. उसके मित्र उसे एक मसीहा बुद्धिजीवी के रूप में `खरे जी- खरे जी` मन्त्र पढ़ते हुए यहाँ-वहाँ उल्लेखित करते रहते हैं. शुरू में किया गया वही सवाल मुझे परेशान करता है कि यह खरे अचानक प्रकट हुआ है या खरे जी के भीतर हमेशा से था और वे बड़ी व्यथा के साथ सेक्युलर बने रहते आए हैं. अगर ऐसा है तो बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का भार ढोते रहने की ज्यादती भरी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए जैसे कि ९५ बरस के बूढ़े चित्रकार से अदालत दर अदालत धक्के खाने और कट्टरवादी ताकतों से गुत्थमगुत्था होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए.

कुछ मित्रों का यह भी ख्याल है कि खरे के वामपंथी मित्रों के पास अब उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है और वक़्त की नजाकत को भांपकर उनकी `खोज` युवतर लेखक भी बाएं चलने का हुनर बताते-बताते दायें चलने लगे हैं तो खरे के लिए भी अपनी उपलब्द्धता विज्ञापित करना जरूरी था. अशोक वाटिका अपने गमले में सजने को उत्सुक पुराने पेड़ों को बोनसाई बना लेने में अक्सर गुरेज नहीं करती. यहाँ तो इस लेख में पांचजन्य तक को लुभा लेने की क्षमता है. खरे जी को शुभकामनाएं.

Thursday, February 14, 2008

प्यार - कुछ रचनाएँ


``गर रोयी हूँ ज़िन्दगी में अब तक की तो सिर्फ़ एक के ही लिए``

तेरी ख़ामोश सुबकियाँ तेरे भीतर गिरते आँसू
और बड़ी-बड़ी सूनी आँखें
उस शाम के घिरते अँधियारे के साथ
मुझ तक पहुँचते हैं अब तक
ए अपने वीरान बरामदे में खड़ी अकेली लड़की

हमेशा यह होता है
जब किसी को बेख़ुदी की हद तक चाहना
एक बेहतरीन सपने की तरह टूट जाता है
लेकिन सत्रह बरस की तू भला इसे क्या जानती थी

आख़िर हुआ क्या था यह पूछना
उस असह तकलीफ़ को सस्ता बना देता है
जिसे ठीक-ठीक बयान नहीं किया जा सकता
हज़ारों वजहें बन जाती हैं दिल टूटने की
वह भी पहले प्रेम में

न बता तू न बता इसे रहने दे एक दफ़नायी हुई बेहद निजी पीर
कितनी ख़ुशियाँ कहीं की नहीं रहतीं
कितनी कल्पनाएँ कितने भविष्य
बेरहम परछाइयाँ बन जाते हैं जिन्हें बाँधा नहीं जा सकता
इतनी सारी शादमानी लेकर क्यों आती है चाहत पहली बार
कि उसका न रहना बेजान कर जाता है समूचे वजूद को

कितनी ज़िन्दगी तेरी बीती थी उस वक़्त तक
चंद दिनों पहले ही तुझे अहसास हुआ होगा
कि ज़िन्दगी किसे कहते हैं जिसमें तूने ख़ुद को ख़ुद
बनते हुए शायद पहचाना होगा
लेकिन प्रेम में पड़ते ही ज़िन्दगी पहाड़ जैसी लगने लगती है ज़िन्दगी बनती हुई

यह पहली बार किस-किस भेष में और लौटेगा?
और यह रोना किसी एक के लिए?
क्या तू फिर नहीं रोयेगी
हर बार उसी तरह लेकिन हमेशा दूसरी तरह?

ऐसा बहुत होता है लड़की
क़िस्मत और इन्सान सिर्फ़ एक बार नहीं देते फ़रेब
हो सके तो किसी ऐसे लम्हे का ख़्वाब देख
जो आये तो तुझे लगे कि तू भूल गयी है
अपना वह पहली बार रोना
और याद आये भी तो तू हौले से हँसे अकेले में
उस दुखियारी लड़की के बालापन पर
जो अपनी बड़ी-बड़ी भीगी आँखों से तक रही थी
अपने वीरान बरामदे का अँधियारा उस शाम
-विष्णु खरे
 ***

``लगता है प्रेम सफल हो या असफल, वह जीवन की दिशा, उसकी गतिकी और उसकी त्रिज्या को हमेशा बदल देता है।``
-उदय प्रकाश की यह टिपण्णी एक उदास कवि को लेकर लिखे गए उनके लेख में थी।
***


तुम्हारा प्यार

यह स्त्री डरी हुई है
इस तरह
जैसे इसी के नाते
इसे मोहलत मिली हुई है

अपने शिशुओं को जहां-तहां छिपा कर
वह हर रोज़ कई बार मुस्कुराती
तुम्हारी दूरबीन के सामने से गुज़रती है

यह उसके अंदर का डर है
जो तुममें नशा पैदा करता है

और जिसे तुम प्यार कहते हो
-मनमोहन
***


एक परिंदा उड़ता है

एक परिंदा उड़ता है
मुझसे पूछे बिना
मुझे बताये बिना
उड़ता है परिंदा एक
मेरे भीतर
-मनमोहन
***


प्रेम


वह कोई बहुत बड़ा मीर था
जिसने कहा प्रेम एक भारी पत्थर है
कैसे उठेगा तुझ जैसे कमज़ोर से

मैंने सोचा
इसे उठाऊँ टुकड़ों-टुकड़ों में

पर तब ह कहाँ होगा प्रेम
वह तो होगा एक हत्याकांड।
-मंगलेश डबराल
***