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Wednesday, June 20, 2018

मुक्तिबोध — उत्पीड़न और नायकत्व : असद ज़ैदी


('नया पथ' का मुक्तिबोध विशेषांक मुझे बहुत देरी से हासिल हो पाया। इस पत्रिका में छपा असद जी का यह लेख मुक्तिबोध के उत्पीड़न और हिंदी साहित्य व विचार की दुनिया में उनकी 'प्रधान उपस्थिति' का उल्लेख करते हुए 'नेहरू युग' को लेकर चली आ रही रुमानियत भरी छवि को भी ध्वस्त करता है,  'वामपंथी सांस्कृतिक धारा' की विडंबनाओं और को सामने लाता है और पुनर्विचार प्रोजेक्ट के नाम पर 'फ़ासिस्ट धमकी' से आगाह करता है। इस लेख में एक 'मर्मभेदी' ज़िक्र यह भी आया है कि मुक्तिबोध की एम्स में मृत्यु के बाद उनका शव उस शख़्स के सरकारी आवास पर रखा गया जिसने 'अंतरंग मित्र होते हुए उनके ख़िलाफ़ मुख़बिरी की थी'। उनकी स्मृति में पहली गोष्ठी भी इसी ठिकाने पर हुई। लेख में उस शख़्स का नाम नहीं आया है पर एक ज़माने में 'इंडिया टुडे' की साहित्य वार्षिकी के पाठक रहे लोगों को याद होगा कि अशोक वाजपेयी ने इस सिलसिले में प्रभाकर माचवे का नाम लिखा था। -एक ज़िद्दी धुन)

सन 1964 में गजानन माधव मुक्तिबोध की मृत्यु अाधुनिक भारतीय साहित्य की केन्द्रीय घटना है। हिन्दुस्तान के सांस्कृतिक जीवन में पिछली सदी में किसी मृत्यु का इतना असर नहीं पड़ा। इसकी तुलना सिर्फ़ 1974 में कलकत्ते में उस्ताद अमीर ख़ाँ की अप्रत्याशित मृत्यु से ही की जा सकती है। अपने अपने रचना-क्षेत्र में ये दो हस्तियाँ लोगों की सामूहिक चेतना ही नहीं अवचेतन का हिस्सा — एक प्रधान उपस्थिति — बन गईं। इस मृत्यु के बाद ही से वह दौर शुरू हुअा, जिसे क़ायदे से हिन्दी साहित्य और संस्कृति-चिंतन में मुक्तिबोध-युग कहा जाना चाहिए। इस युग को कुछ और नाम देना ऐतिहासिक और साहित्य के समाजशास्त्र के ऐतबार से सही नहीं होगा। अगर ऐसा अक्सर नहीं कहा जाता तो इसका संबंध हिन्दी की दुनिया की शक्ति संरचना से है, न कि मुक्तिबोध की स्वतःसिद्ध केन्द्रीयता से। नौकरीपेशा प्राध्यापकीय तबक़े, साहित्य के कारोबार को नियंत्रित करने वाली संस्थाएँ अौर साहित्य-संस्कृति के दस-बीस स्वघोषित संरक्षक-पुरोहित मुक्तिबोध को लेकर शुरू ही से असहजता और दुचित्तेपन का इज़हार करते रहे हैं। न तो यह दुचित्तापन अाज तक ख़त्म हुअा है, और न ही हिंदी ‘रचना-संसार’ के अवचेतन पर मुक्तिबोध की हुकूमत ख़त्म होती नज़र अाती है।

मध्यवर्गीय दुचित्तेपन और उसके निहितार्थों पर काम करने वाले पहले अादमी मुक्तिबोध ही थे। उन्हें अपने दौर के बिगाड़ का, हर विचलन का पता था। वह उस समय की पेचीदगियों को भी समझते थे। यह नेहरू युग की निर्माणकारी और विध्वंसकारी दोनों प्रक्रियाओं पर गहरी नज़र रखते थे। नेहरू का दौर एक तरफ़ लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवास्था के पल्लवन, नई संस्थाओं के निर्माण और राष्ट्रीय विकास की अाधार रचना का दौर था, वहीं दूसरी तरफ़ वह कम्युनिस्ट अान्दोलन के अापराधिक दमन और शीतयुद्धीय नीति के तहत हर जगह से उनके बहिष्कार का दौर था। लोग अाज कुछ भी कहें, यह एक ऐतिहासिक सचाई है। पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस संगठन पर दक्षिणपंथियों का क़ब्ज़ा था, और नेहरू के पास इस दक्षिणपंथ का सीधे सामना करने का न हौसला था, न ताक़त। केन्द्र से लेकर प्रांतों तक (संयुक्त प्रांत/उत्तर प्रदेश, मध्य भारत/मध्यप्रदेश, बम्बई, महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार) कांग्रेस में दक्षिणपंथी नेताओं का बोलबाला था। शिक्षा, संस्कृति और हिंदी प्रतिष्ठान पूरी तरह प्रतिक्रियावादी के क़ब्ज़े में था।

मुक्तिबोध ने स्पष्ट रूप से नेहरू युग के समझौते, अवसरवाद और जनद्रोह की प्रवृत्तियों को पनपते हुए देखा था।  वह जानते थे कि भारतीय राजनीति का वह दौर दरअसल एक तरफ़ कांग्रेस के भीतर नेहरू धड़े की अाधुनिक, उदार प्रगतिशील वृत्ति और दूसरी तरफ़ ज़्यादा वर्चस्वशाली कठोर दक्षिणपंथी धड़ों की विचारधारा के बीच सुलह और समन्वय पर टिका है। लिहाज़ा ‘नेहरू युग’ को एकतरफ़ा ढंग से सेकुलर राजनीति, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक विवेक से संचालित समाज और राष्ट्रनिर्माण का दौर कहना एक रोमानी और ग़लत क़िस्म की समझ का नतीजा है। नेहरू युग का जो अर्थ अाज हम लेते हैं, उस अर्थ में वह नेहरू युग था ही नहीं, न मुक्तिबोध ने उसे इस तरह देखा था।  नेहरू ख़ुद कितने ही प्रगतिशील और अंतर्राष्ट्रीयतावादी रहे हों, और समाजवादी देशों में उनकी जितनी भी स्वीकृति रही हो, भारतीय वामपंथी संगठनों के उतने ही दुश्मन थे जितना कि हिन्दू महासभा और अार एस एस के। कोई भी तन्ज़ीम जो कांग्रेस के बाहर प्रगतिशील काम करती हो, उसे वह कांग्रेस का, और देश का दुश्मन ही समझते थे।

ख़ुद साम्यवादी — अाज के साम्यवादी — भूल गए हैं कि नेहरू-युग में एक साम्यवादी का जीवन कितना कठिन था। जब कोई संकट में पड़ता था उस समय जाति, रिश्तेदारी, मित्रता या पहुँच कुछ काम न अाती थी। वामपंथियों को लेकर नेहरू सरकार की गृह और अांतरिक सुरक्षा नीति मैकार्थीवादी नीति थी, जिसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ पटेल जैसे लोग ही न थे, वह पूरी राज्य-व्यवस्था भी थी जो अंग्रेज़ों ने सप्रेम उन्हें सौंप दी थी।  कोई साम्यवादी न होगा जिसपर राज्य की, पुलिस की और मुख़बिरों की नज़र न हो,  जो राजकीय कोप का शिकार न हुअा हो। मुक्तिबोध का अपना जीवन इसकी मिसाल है। लगभग सभी कम्युनिस्टों ने समाज में लम्बे अरसे तक पर्सीक्यूशन झेला जिसकी छाया उनकी जीविका पर, उनके परिवारों पर, और उनकी अगली पीढ़ियों तक पड़ी। इस दौर में एक प्रगतिशील के लिए छिपने की एक ही जगह थी, कि वह कांग्रेसियों से सम्पर्क में रहे, अपनी वफ़ादारी साबित करे और कांग्रेस में अा मिले, और ज़िल्लत की रोटी खाकर गुज़ारा करे। लेकिन यह विकल्प भी सबके लिए उपलब्ध न था। नेहरू का लोकतंत्र कम्युनिस्टों के लिए नहीं बना था। कांग्रेस के बाहर का परिदृश्य और भी ख़राब था जहाँ या तो रामराज्य परिषद, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी जैसी घोर प्रतिक्रियावादी पार्टियाँ थीं या फिर ग़ैर कांग्रेसवाद के पैरोकार लोहिया और उनका समाजवादी दल जो हरदम कांग्रेस के विरुद्ध सबको एकजुट करने के पक्षधर थे, लेकिन कम्युनिस्टों के जानी दुश्मन थे। मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म-विरोध का जो काम दक्षिण और धुर दक्षिण किया करते हैं, वह भारत में लोहियावादियों ने जी-जान से सम्पन्न किया।

मुक्तिबोध ने अपनी प्रगतिशीलता  इन कठिन परिस्थिति में अर्जित की थी, और एक असुरक्षित जीवन की क़ीमत पर उसकी अाबरू बनाए रखी। वह इसी युग में चल बसे, और अागे अाने वाली और भी टेढ़ी और संदिग्ध परिस्थितियों को न देख सके। उनकी छवि एक शहीद की सी छवि की तरह अाज तक बहुत लोगों के दिलो-दिमाग़ में है। उनका जीवन और चिंतन अाज उतना ही प्रासंगिक है जितना नेहरू युग में था।


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मुक्तिबोध के वैचारिक और रचनात्मक विकास का दौर शीतयुद्ध का दौर था। हिन्दी में  अज्ञेयवाद, प्रयोगवाद, नई कविता अौर लोहियावादी संस्कृति चिंतन का बोलबाला था। इन प्रवृत्तियों से स्वस्थ बहस के लिए मुक्तिबोध हमेशा तैयार अौर व्याकुल रहते थे। लेकिन यही दौर हिन्दी के वामपंथी साहित्य चिंतन के भीतर बढ़ते परम्पराप्रेम और दक्षिणोन्मुखता का दौर भी था, जिसे कम्युनिज़्म की शब्दावली में संशोधनवाद का दौर भी कहा जाता है। इस दौर में मुक्तिबोध को एक वैचारिक अौर रचनात्मक अकेलेपन में काम करना पड़ा। कोई बराबरी की संगत न थी। उनका मन वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ताअों, छात्रों, वामपंथी पत्रकारों, कुछ साथी शिक्षकों के बीच लगता तो था, लेकिन साहित्य, संस्कृति अौर मार्क्सवाद से जुड़े मसलों पर गहन बहस करें ऐसे जानकारों की कमी थी। उनकी कुछ गहरी दोस्तियाँ थीं, जिनमें से एक दोस्त तो ऐसे थे जो उनके ख़िलाफ़ मुख़बिरी किया करते थे, उनकी गतिविधियों की जानकारी सरकार को भेजा करते थे। मुक्तिबोध को इसकी जानकारी हो गई थी अौर उनका दिल बहुत टूटा था। फिर भी वह ख़ुशक़िस्मत थे कि अपने कुछ अौर अंतरंग मित्रों अौर उनसे प्रेरित युवकों को रंग बदलने और अपने निश्चयों के ख़िलाफ़ व्यवस्था में घुल-मिल जाने के करुण दृश्य देखने से बच गए।

वामपंथी सांस्कृतिक  धारा के भीतर मुक्तिबोध की स्वीकृति और अस्वीकार दोनों शुरू ही से मौजूद रहे हैं। रामविलास शर्मा और उनकी शिष्य परम्परा में उनका कोई सम्मान या सही पहचान दूर दूर तक देखने को नहीं मिलती। उनके समकालीन वामपक्षीय लेखकों में हरिशंकर परसाई और शमशेर बहादुर सिंह ही उनके सबसे महत्वपूर्ण हिमायती थे। शमशेर जी ने एक बार धीमे से कहा था कि मुक्तिबोध की मृत्यु में ही उनके पुनर्जीवन की (हिन्दी की दुनिया में) चाबी मौजूद है। जब मैंने इस का अाशय जानना चाहा तो वह बोले, “वी अाल शेयर हिज़ अाफ़्टरलाइफ़।”

मुक्तिबोध के जीवन की विडम्बना दो मर्मभेदी घटनाअों के ज़रिए सामने अाती है। 11 सितंबर 1964 के  दिन अखिल भारतीय अायुर्विज्ञाना संस्थान में जब उनकी मृत्यु हुई तो अंत्येष्टि से पहले उनके शव को दिल्ली में उसी शख़्स के सरकारी अावास पर लाकर रखा गया जिसने अंतरंग मित्र होते हुए उनके ख़िलाफ़ मुख़बिरी की थी। कुछ ही दिन बाद उनकी याद में दिल्ली में पहली गोष्ठी उनके मित्रों और प्रशंसकों ने की, वो भी उसी अादमी के अावास पर हुई! अफ़सोस की बात यह है कि किसी को भी यह अापत्तिजनक न लगा। उस अादमी के दामन का दाग़ किसी को दिखाई न दिया! न तब, न बाद में। दूसरा वाक़या मक़बूल फ़िदा हुसेन से जुड़ा है। हुसेन मुक्तिबोध की अंतिम यात्रा में शरीक थे। वह उनके मित्रों के मित्र थे और मुक्तिबोध के महत्व से कुछ हद तक वाक़िफ़ थे। शवयात्रा में चलते हुए उनके दिल में ख़याल अाया कि इतना बड़ा लेखक और बुद्धिजीवी कितने अभाव, उपेक्षा और लगभग गुमनामी की हालत में दुनिया से रुख़सत हो रहा है, और हम उसके लिए कुछ न कर सके। उन्होंने वहीं अपने जूते छोड़ दिये और तमाम रास्ते श्मशान तक नंगे पाँव चले। हुसेन का कहना था, “मुझे लगा कि इतना तो मैं कम-अज़-कम कर ही सकता हूँ।” उनके नंगे पाँव चलने में  पश्चात्ताप, शोक और अक़ीदत का मिला-जुला जज़्बा था। हुसेन साहब ने ख़ुद मुझसे कहा कि जिस चीज़ को (यानी नंगे पैर चलने को) उनकी एक जानी-पहचानी ‘अदा’ कहा जाता है, उसकी शुरुअात मुक्तिबोध की मौत के सदमे से हुई थी। ये दो मामूली घटनाएँ मुझे नेहरू युग की गहरी नैतिक फाँक का प्रतिनिधि रूपक लगती हैं।


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अाज विभिन्न प्रकार के सैद्धान्तिक दूर-दूर ही से मुक्तिबोध को रहस्यवादी, खंडित चेतना का चितेरा इत्यादि कहते रहते हैं, या कुछ ज़्यादा निर्लज्ज तत्व बार-बार उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि (महाराष्ट्रियन ब्राह्मण) में ही उनकी मूल सृजनात्मक चेतना का उत्स देखते हैं अौर उन्हें वामपंथियों से ‘मुक्त’ करके अपना लेना चाहते हैं। उधर वामपंथ के कई पहरेदारों ने भी (ख़ासकर रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने) मुक्तिबोध को डिसओन किया हुअा है। मुक्तिबोध के इस अपहरण, ‘लिबरेशन’ या बरख़ास्तगी की योजना का दिलचस्प पक्ष यह है कि मुक्तिबोध के घर पर कोई पहरा तो है नहीं, द्वार खुले हैं और मुक्तिबोध वहाँ मौजूद हैं — संगत को तैयार। सवाल यह है कि क्या मुक्तिबोध के ये अपहरणकर्ता उनकी बग़ल में बैठने को तैयार हैं? क्या उनकी सोहबत इन्हें गवारा होगी?

हिंदी के साहित्यिक दक्षिणपंथी और उनकी देखादेखी कुछ उदारवादी मुक्तिबोध पर पुनर्विचार की बात किया करते हैं।  विचारशील लोगों को विचार अथवा 'पुनर्विचार' के लिए किसी ऐलान या आयोजन की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। विचार अपने में एक जारी सिलसिला है जो इन्सान की ज़ेहनी फ़िज़ा और बौद्धिक कार्यव्यापार को आन्दोलित किये रहता है। हर नए विचार, अकुलाहट या आकलन को पुनर्विचार कहा भी नहीं जाता। यह अधकचरापन और ख़ामख़याली है। अनुभव, प्रयोग, दिमाग़ी मेहनत, और संवाद की मंज़िलों से गुज़रकर और अपने वक़्त के हालात से मानूस होकर, उनसे गहरी जद्दो-जहद करते हुए कभी कभी लोगों का सामूहिक आलोचनात्मक श्रम और रचना-कर्म अपने कुल जमा (कुमुलेटिव) असर से पुनर्विचार की ज़मीन तैयार करता है। साहित्य और कलाओं की दुनिया में बड़े परिवर्तन साल में दो बार, ख़ुद से और इतनी आसानी से, नहीं आते। मुक्तिबोध पर 'पुनर्विचार' एक संदेहास्पद अकुलाहट का नतीजा लगती है। कुछ लोग विचार से पहले पुनर्विचार के लिए बेताब है। सौवाँ साल (२०१७) पूरा हो रहा है। यानी अगले तीन-चार साल मुक्तिबोध पर सघन ‘पुनर्विचार’ के साल होंगे। चूँकि उसी साल रूसी क्रांति की सौंवी सालगिरह भी पड़ रही है, तो लाज़िम है कि यह एक दोहरा पुनर्विचार हो। इन पुनर्विचारकों के विचार वही हैं जो वे दशकों से — शीतयुद्ध काल से — बताते आ रहे हैं, वे बस नए सिरे से धावा बोलने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें लगता है परिस्थिति अब ज़्यादा अनुकूल है। कोशिश है कि फिर से मरहूम पर दावा पेश किया जाए और मुक्तिबोध जन्म शताब्दी वर्ष के आते आते भारतीय वाम-परंपरा के इस महान विचारक, कवि और लेखक की स्मृति पर नरम दक्षिण-अति दक्षिण गठबंधन के तहत एक भगवा-श्वेत दुरंगा फहरा दिया जाए। प्रतिगामिता कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ती। उसे भगत सिंह की 'घर वापसी' चाहिए और गजानन माधव मुक्तिबोध की भी। भारत में पूँजी हर जगह अपनी ताक़त दिखा रही है। दूसरी ही तरह के ‘पुनर्विचार’ के युग में हम आ गये हैं। पिछले संसदीय चुनाव में सिक्काबन्द हिन्दुत्ववादी राजनीतिक गठबंधन की जीत के बाद उनके सांस्कृतिक प्रवक्ताओं ने सार्वजनिक मंचों से बोलकर भी और लिखकर भी ऐलान कर दिया है कि शिक्षा, संस्कृति, नागरिक आचार और अधिकार व्यवस्था, लोगों के रंग-ढंग और जीवन शैली हर चीज़ पर पुनर्विचार और उसके आमूल-चूल पुनर्गठन का वक़्त आ गया है, और यह कि अब उन्हें जनादेश प्राप्त है। यह पुनर्विचार नहीं, समाज के फ़ासिस्ट पुनर्गठन की माँग और धमकी है। मुक्तिबोध का वाक़या भी अजीब है। उनके मरणोपरांत जिन लोगों ने उनके साहित्यिक उद्धार का ज़िम्मा लिया, उनके हाथ से वह मरहूम बहुत जल्दी छूट निकले। उनमें से जो उद्धारक बचे रह गए हैं आज तक हाथ मलते हैं। अब नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में फ़िज़ा साज़गार हुई है। उन्हें अपनी ‘जागीर’ वापस चाहिए।
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Saturday, February 2, 2013

द इंडियन आइडियोलॉजी : बदनसीब मुल्क़ के बदग़ुमान रहनुमा (अंतिम क़िस्त)

(पिछली पोस्ट से जारी)


माउंटबेटन के आगमन के साथ भारत में धार्मिक फूट को लेकर साम्राज्यवादी नीति का एक चक्र पूरा हुआ। 19 वीं सदी के दूसरे उत्तरार्ध में अंग्रेज़ी राज को यह शक़ था कि ग़दर में पेशकदमी करने वाले मुसलमान थे और हिन्दुओं को ज़्यादा भरोसेमंद समझा जाता था। बीसवीं सदी के पहले उत्तरार्ध में यह पसंदगी तब बदल गई जब हिन्दू राष्ट्रवाद ज़्यादा आग्रही हो गया और उसे रोकने के लिए मुस्लिम महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दिया गया। अब अपने अंतिम चक्र में लन्दन ने ज़बर्दस्त झटका देते हुए बहुसंख्यक समुदाय को अपना विशेषाधिकृत सम्भाषी चुन लिया। 1947 में इस भारी परिवर्तन की जज़्बाती शिद्दत उभरी थी  विचारधारारणनीति और शख्सियत के अचानक हुए संगम से। ब्रिटेन की लेबर पार्टी हुकूमत के लिए उनके अपने दृष्टिकोण से सबसे निकटतम भारतीय पार्टी काँग्रेस थीनेहरू के साथ जुड़ी फेबियन कड़ियाँ काफी पुरानी थीं। राष्ट्रीय स्वाभिमान जा कर भावनात्मक अपनेपन से मिल गया। ब्रिटेन ने एक छितरे हुए उपमहाद्वीप को इतिहास में सर्वप्रथम एक एकल राजनीतिक क्षेत्र बना डाला था। सही समझ वाले सारे अंग्रेज़ देशभक्तजिनमें सिर्फ एटली जैसे साम्राज्यवादी शिक्षा के उत्पाद ही शामिल नहीं थे,इस बात को बड़े गर्व के साथ अपने साम्राज्य की सबसे उत्कृष्ट सृजनात्मक उपलब्धि मानते। और उनकी रवानगी के वक़्त उस में दरारें पड़ना उस उपलब्धि पर सवालिया निशान लगने जैसा होता। ब्रिटेन को अगर भारत छोड़ना है तो भारत को वैसे ही रहना होगा जैसा कि अंग्रेज़ों ने उसे गढ़ा था। ब्रिटेन के पास तब भी सिर्फ मलाया ही नहीं बल्कि एशिया में भी कीमती मिल्कियतें थीं -उनके सबसे फायदेमंद उपनिवेश जो जल्द ही कम्युनिस्ट विद्रोह की रंगभूमि बन जाने वाले थे और जिन्हें छोड़ने की ब्रिटेन को कोई जल्दी नहीं थी। उसी समय उत्तर-पश्चिम सीमा से थोड़ी ही दूर अंग्रेज़ी राज का पारंपरिक हौवा बैठा हुआ था जो अब सोवियत संघ के रूप में और भी भयंकर था। आला अफ़सरान इस बात पर एकमत थे कि उपमहाद्वीप के विभाजन से रूसियों को ही फायदा पहुँचेगा। अगर दक्षिण एशिया के दरवाज़ों को साम्यवाद के खिलाफ़ मज़बूती के साथ बंद किया जाना था तो न सिर्फ ब्रिटेन बल्कि पश्चिम के भी रणनीतिक हितों को संयुक्त भारत के परकोटे की दरकार थी।
ये सारी बातें इसी तरफ इशारा कर रही थीं कि मुस्लिम लीगजो कभी अंग्रेज़ी राज का नीतिगत साधन हुआ करती थीअब उसके मामलों के यथेष्ट निपटारे में एक प्रमुख अड़चन थी और उसका साक्षात रूप जिन्ना थे। काँग्रेस के नेता ब्रिटेन द्वारा उन्हें सौंपे जाने वाले विरसे की अखंडता का झंडा उठाये हुए थे और जिन्ना यह उम्मीद नहीं कर सकते थे कि उनके साथ समतुल्य बर्ताव किया जाएगा। मगर इस ढांचागत विषमता में एक व्यक्तिगत आत्म्श्लाघिता का असंतुलन मिलाया गया और यह सम्मिश्रण घातक साबित हुआ। 'वह झूठा,बौद्धिक रूप से सीमित और चालबाज़ शख्स' - माउंटबेटन के इस अमिट पोर्ट्रेट के लिए हमें एंड्रयू रॉबर्ट्स का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की सेना के प्रतीकात्मक कमांडर के तौर पर कोलम्बो में अपनी कैडिलैक की पिछली सीट पर बैठे-बैठे ख़याली कारनामों में डूबे हुए माउंटबेटन जब दिल्ली आये तो इस बात से बेइंतहा खुश थे कि उन्हें लगभग दिव्य शक्तियों से नवाज़ा गया है। मैंने महसूस किया कि मुझे दुनिया का सबसे ताक़तवर आदमी बना दिया गया है।माउंटबेटन पहनावे और समारोह सम्बन्धी आडम्बर का विकृत रूप थे और झंडों और झालरदार सूटों को लेकर उनका जूनून अक्सर राज्य के मामलों पर तरजीह पा जाता। उनके दो सर्वोपरि सरोकार थे: अंग्रेज़ी राज के अंतिम शासक के तौर पर एक ऐसी हस्ती बनना जो हॉलीवुड को शोभा दे और ख़ासकर यह सुनिश्चित करना कि भारत राष्ट्रमंडल के अंतर्गत का ही एक राज्य बना रहे: विश्व में प्रतिष्ठा और रणनीति दोनों को लेकर यूनाईटेड किंगडम के लिए यह अत्यधिक महत्त्व की बात होगी।'
ऐसा माना गया था कि अगर ब्रिटिश राज का बँटवारा होना ही है तो बड़ा हिस्सा- जितना बड़ा उतना अच्छा - ब्रिटिश उद्देश्यों के लिए महत्त्व रखता है। उपमहाद्वीप के भविष्य की योजना बनाने में काँग्रेस अब पसंदीदा सहयोगी क्यों थी इस बात के पीछे के राजनीतिक कारणों में एक व्यक्तिगत कारण भी जुड़ गया था। नेहरू के रूप में माउंटबेटन को एक दिलचस्प साथी मिल गया थाएक से स्वभाव वाले वे दोनों ही सामाजिक तौर पर भी समकक्ष थे। गांधी ने अंग्रेज़ों के साथ हमेशा अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना चाहा था। गांधी द्वारा नेहरू को उत्तराधिकारी चुने जाने का अंशतः कारण यह था कि वे अंग्रेज़ों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने के लिए सांस्कृतिक तौर पर सुसज्ज थे जबकि पटेल और अन्य उम्मीदवारों में वह चीज़ न थी। सारे सम्बंधित लोगों के लिए यह तसल्ली की बात थी कि कुछ ही हफ़्तों में नेहरू वायसराय के न केवल ख़ास दोस्त बन गए बल्कि जल्द ही उनकी बीवी के साथ हमबिस्तर भी हो गए। इस सम्बन्ध को लेकर भारतीय राज्य इतना संकोची रहा आया है कि पचास सालों के बाद भी वह इस विषय को छूने वाली एक अमरीकी फिल्म का प्रदर्शन रोकने में दखल दे रहा था। भारतीय राज्य के इतिहासकार भी इस विषय के बगल से चुपचाप निकल जाते हैं। दिल के मामले कदाचित ही हुकूमत के मामलों पर असर डालते हैं। मगर इस मामले कम-अज़-कम यह इमकान न था कि त्रिकोण के शेहवानी ताल्लुकात ब्रिटिश नीति को लीग के पक्ष में झुका देते। राजनयिकों को सस्ते में चलता कर दिया जाता है।
फिर भी एक ऐसे दौर में जब ब्रिटेन प्रकट रूप से भारत में विभिन्न दलों को एक साथ लाने की कोशिश कर ही रहा था और काँग्रेस एकीकृत देश को आज़ादी की तरफ ले जाने की कोशिश कर रही थीगौरतलब है कि तब जिन्ना के बारे में माउंटबेटन और नेहरू कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे और एटली उसमें सुर मिला रहे थे। माउंटबेटन के लिए जिन्ना एक 'पागल', घटिया आदमीऔर 'मनोरोगी केसथेनेहरू के लिए वे एक 'हिटलरी नेतृत्व और नीतियोंवाली पार्टी की अगुआई कर रहे पैरेनोइड थे और एटली के लिए वे 'गलतबयानी करने वालेथे। 
माउंटबेटन जब आये तो पंजाब में सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। एक महीने के अन्दर-अन्दर उन्होंने फैसला कर लिया कि विभाजन अपरिहार्य है क्योंकि काँग्रेस और लीग के बीच का गतिरोध दूर नहीं हो पा रहा है। मगर समूचे इलाके का बँटवारा कैसे होना थाअनिवार्यतः बात पाँच सवालों पर आकर टिक गई। बंगाल और पंजाब इन दो प्रमुख प्रान्तों का क्या होगा जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक तो थे मगर उनका संख्याबल उतना ज़बरदस्त नहीं थारजवाड़ों के शासन वाले अंचलों कोजहाँ काँग्रेस और लीग दोनों की ही उपस्थिति नगण्य थीकैसे आवंटित किया जाएगाविभाजन के सिद्धांत के बारे में या सरहद कहाँ खड़ी की जायेगी इस बात को लेकर क्या जनता की राय पूछी जायेगीविभाजन की प्रक्रिया का पर्यवेक्षण कौन करेगाइस पर अमल कितनी समयावधि में किया जाएगा?
इस मौके पर आकर काँग्रेस और लीग का हिसाब अदल-बदल हो गया। सारे राष्ट्र की नुमाइंदगी करने का काँग्रेस का दावा 1920 के दशक से ही उसकी विचारधारा का केंद्र रहा था। मुस्लिम निर्वाचन मंडल में लीग द्वारा अपनी ताक़त दिखाए जाने पर यह दावा धराशायी हो गया था। मगर अपनी नई-नवेली ताक़त का लीग क्या करने वाली थीलाहौर प्रस्ताव के छह साल बीत जाने पर भी जिन्ना को हिन्दू-बहुल प्रान्तों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के संरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बाहुल्य वाले प्रान्तों की सार्वभौमिकता के लिए कोई संभाव्य समाधान नहीं मिला था।  बस इतना भर हुआ था कि पाकिस्तान का नाराजिसे उन्होंने 1943 में खारिज कर दिया थामुसलमानों के बीच इतना मकबूल साबित हुआ कि बिना किसी स्पष्टीकरण के जिन्ना ने उसे अपना लिया और यह दावा किया कि लाहौर प्रस्ताव में 'राज्यकी जगह 'राज्योंमुद्रण की अशुद्धि के कारण आया था। शायद उन्होंने यह हिसाब लगाया था कि चूँकि अंग्रेज़ों के सामने लीग और काँग्रेस के परस्पर विरोधी उद्देश्य हैंवे आखिरकार अपने हिसाब से समय लगाकर दोनों पक्षों पर अपनी पसंद का परिसंघ थोप देंगे। उस परिसंघ में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बाहुल्य वाले इलाके स्वशासी होंगे और केंद्रीय सत्ता न इतनी मज़बूत होगी कि उन पर चढ़ सके और न ही इतनी कमज़ोर कि स्वशासी हिन्दू-बहुल प्रक्षेत्रों में मुसलमान अल्पसंख्यकों की रक्षा भी न कर सके। अंततः कैबिनेट मिशन ने जो योजना तैयार की वह जिन्ना की विजन के काफी करीब थी।
मगर काँग्रेस पार्टी ने हमेशा से एक शक्तिशाली केंद्रीकृत राज्य की आरज़ू की थी और नेहरू का मानना था कि भारतीय एकता को बचाए रखने के लिए ऐसा ज़रूरी है। इसलिए ऐसी कोई स्कीम नेहरू के लिए विभाजन से भी खराब थी क्योंकि वह उनकी पार्टी को उस शक्तिशाली केंद्रीकृत राज्य से महरूम कर देती। राष्ट्रीय वैधता के ऊपर अपनी इजारेदारी पर काँग्रेस ने शुरू से ज़ोर दिया था। यह दावा अब बिलकुल स्वीकार नहीं किया जा सकता था। लेकिन अगर बुरी से बुरी स्थिति भी हुई तो भारत के बड़े हिस्से में सत्ता के अबाधित एकाधिकार के मज़े लेना अविभाजित भारत में उस सत्ता को बाँटकर बँधे पड़े रहने से बेहतर था। इसलिए जब लीग तकसीम की बात कर रही थी तो जिन्ना परिसंघ के बारे में सोच रहे थेऔर जब काँग्रेस संघ की बात कर रही थीतो नेहरू बँटवारे की तैयारी कर रहे थे। कैबिनेट मिशन योजना की लुटिया हस्बे-दस्तूर डुबो दी गई।   
सारी निगाहें अब इस बात पर आ टिकीं कि लूट का बँटवारा कैसे होगा। अंग्रेज़ अब भी राजा थे: बँटवारा माउंटबेटन करेंगे। नेहरू इस बात से निश्चिन्त थे कि उन पर इनायत ज़रूर होगीमगर कितनी इसका अंदाज़ा पहले से होना मुश्किल था। ब्रिटिश राज से जो भी राज्य उभरेंगे उन्हें पुनर्नामित ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत बनाये रखना माउंटबेटन के लिए सबसे अहम बात थी। इसका मतलब था कि उन राज्यों को आज़ादी एक स्वतंत्र-उपनिवेश (डोमिनियन) के तौर पर स्वीकार करनी होगी। मुस्लिम लीग को इस से कोई आपत्ति नहीं थी। मगर लन्दन में चलने वाली जालसाज़ियों के आगे भारत के नतमस्तक होने को काँग्रेस 1928 से ही सिद्धांततः खारिज करती आई थी और इसमें डोमिनियन वाली बात भी ज़ाहिरन शामिल थी। तो जिस छोटी कौम को माउंटबेटन विभाजन के लिए ज़िम्मेदार मानते थेउसी कौम के राष्ट्रमंडल का सदस्य बन जाने की अवांछनीय संभावना माउंटबेटन के सामने इस कारण आ खड़ी हुई। वहीं बड़ी कौम जो उनके अनुसार न केवल अपेक्षाकृत दोषरहित थी बल्कि रणनीतिक और वैचारिक तौर पर अधिक महत्त्वपूर्ण भी थीराष्ट्रमंडल से बाहर रहने वाली थी। इस पहेली को कैसे सुलझाया जाना था?
इसे सुलझाया उस घड़ी के तारणहार वी पी मेनन ने। अंग्रेज़ों की नौकरशाही में केरल के उच्च-पदस्थ हिन्दू अधिकारी मेनन माउंटबेटन के व्यकिगत अमले का हिस्सा थे और काँग्रेस के सांगठनिक बाहुबली सरदार पटेल के मित्र भी।  क्यों न विभाजन सीधे-सीधे इस तरह हो कि काँग्रेस को बहुत बड़ा क्षेत्र और आबादी हासिल हो जाए जिसकी हकदार वह मज़हब के आधार पर थी हीऔर तो और अंग्रेज़ी राज की पूँजी और सैनिक एवं नौकरशाही तंत्र का भी बड़े से बड़ा हिस्सा मिल जाए- और इसके बदले में माउंटबेटन से राष्ट्रमंडल में भारत के प्रवेश का वायदा किया जाएइतना ही नहींमुँह मीठा करने के लिएमेनन ने रजवाड़ों को भी थाली में परोसने की सलाह दी जिस से कि जिन्ना को मिलने वाले हिस्से की क्षतिपूर्ति हो जाए। कुल मिलाकर रजवाड़े क्षेत्रफल और आबादी में भावी पाकिस्तान के बराबर थे और उस समय तक काँग्रेस ने उन्हें अलंघ्य मान रखा था। नेहरू और पटेल को मनाने में कोई मुश्किल नहीं हुई। अगर मालमत्ता दो महीनों के अन्दर-अन्दर हस्तांतरित हो जाती हैतो सौदा पूरा। इस ब्रेकथ्रू की सूचना मिलने पर माउंटबेटन फूले नहीं समाये और फिर मेनन को उन्होंने लिखा: 'बड़ी खुशकिस्मती रही कि आप मेरे स्टाफ में रिफार्म्स कमिश्नर रहेऔर इस तरह हम बहुत शुरूआती दौर में ही एक दूसरे के करीब आ गएक्योंकि आप वह पहले आदमी थे जो डोमिनियन स्टेटस के मेरे विचार से पूर्णतः सहमत थेऔर आपने ने वह हल ढूंढ निकाला जिसके बारे में मैंने सोचा भी नहीं थाऔर उसे सत्ता के अति शीघ्र हस्तांतरण से पहले ही स्वीकार्य बना दिया। उस निर्णय की इतिहास हमेशा बेहद कद्र करेगाऔर इस बात के लिए मैं आपका मशकूर हूँ।इतिहास उतना कद्रदान नहीं साबित हुआ जितनी उन्हें उम्मीद थी।
आखिरी घड़ी में एक गड़बड़ हो गई। स्वतंत्रता और विभाजन का लन्दन द्वारा स्वीकृत मसौदा शिमला में सभी पक्षों के आगे रखने से पहले माउंटबेटन को पूर्वबोध हुआ कि औरों के देखने से पहले उन्हें वह मसौदा गुप्त रूप से नेहरू को दिखा देना चाहिए। उसे देखकर नेहरू आग-बबूला हो गए: मसौदे में यह बात पर्याप्त रूप से साफ़ नहीं की गई थी कि भारतीय संघ अंग्रेजी राज का उत्तराधिकारी राज्य होगा और इस वजह से वे सारी चीज़ें जो उसे हासिल होंगी और यह भी कि पाकिस्तान उस से अलग हो रहा है। माउंटबेटन ने अपने अंतर्ज्ञान के लिए किस्मत का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि अगर वे मसौदा नेहरू को नहीं दिखाते तो खुद वे और उनके आदमी 'देश की सरकार के सामने निरे अहमक साबित हो जाते कि उन्होंने सरकार को इस खुशफहमी में रखा था कि नेहरू मसौदा स्वीकार कर लेंगे ' और 'डिकी माउंटबेटन बर्बाद हो गए होते और अपना बोरिया-बिस्तर बाँध चुके होते'. मेनन का अमूल्य साथ तो था हीऔर मुश्किल टल गई जब उन्होंने नेहरू की पसंद वाला मसौदा तैयार किया। जून के पहले हफ्ते में माउंटबेटन ने घोषणा की ब्रिटेन 14 अगस्त को सत्ता का हस्तांतरण कर देगाउस तारीख को बाद में उन्होंने स्वयं ही 'हास्यास्पद रूप से जल्दबाज़बताया था। इस जल्दबाज़ी की वजह साफ़ थीऔर वह बताने में माउंटबेटन ने कोई गोलमाल नहीं किया। 'हम क्या कर रहे हैं?  प्रशासकीय तौर पर एक पक्की इमारत बनाने और एक झोंपड़ी या तम्बू तानने में फर्क है। जहाँ तक पाकिस्तान की बात हैहम एक तम्बू तान रहे हैं। इस से ज़्यादा हम कुछ नहीं कर सकते।'
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यह टुकड़ा `थ्री एसेज़ कलेक्टिव` से आई किताब `द इंडियन आइडियोलॉजी` से लिया गया है। हिंदी अनुवाद - भारतभूषण तिवारी।

(समयांतर, जनवरी 2013 से साभार)