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Monday, September 2, 2019

सत्याग्रही का साम्प्रदायिक इस्तेमाल : धीरेश सैनी



कल (इतवार) कई सालों बाद एनएसडी में जाकर कोई नाटक देखा। गाँधी पर केंद्रित यह नाटक `पहला सत्याग्रही` देखने जाने की एकमात्र वजह इसके लेखक रवीन्द्र त्रिपाठी रहे। वही इस कशमकश की वजह हैं कि नाटक ने जो निराशा और क्षोभ पैदा किया है, उसका ज़िक्र करुं, न करुं और करुं तो कैसे करुं। एक तरीक़ा यह सोचा कि नाटक की अच्छाइयों पर कुछ तबसरा करते हुए वह नागवार बात कहूं जो कहना चाहता हूँ। बार-बार लिखने और डिलीट करने के बाद लगा कि ऐसे में अपना जो ढंग है, वही काम आ सकता है। जो बात कहे जाने के लिए मजबूर कर रही है, उसे सीधे कहा जाए। नाटक गाँधी के जरिये सत्ता में बैठे लोगों के साम्प्रदायिक इरादों को प्रचारित करता है। हैरानी यह है कि इस नाटक के लेखक के रूप में रवींद्र त्रिपाठी जैसे उस पढ़े-लिखे शख़्स का नाम जुड़ा है जिसके प्रति आकर्षण की शुरुआत उसकी विष्णु खरे से हुसेन पर लिखे गए एक लेख (खरे के) को लेकर वैचारिक भिड़ंत थी।

एक घंटे 50 मिनट का यह नाटक जो निर्देशक सुरेश शर्मा के मुताबिक, गांधी से महात्मा बनने की गाथा है, दक्षिण अफ्रीका में गाँधी को रेल के प्रथम श्रेणी के कोच से बाहर फेंकने से उनकी हत्या तक जाता है। जहाँ तक गांधी से महात्मा बनने की गाथा की बात है, श्याम बेनेगल एक प्रभावी फिल्म The Making of the Mahatma बना चुके हैं। सत्ता के चरित्र को देखते हुए उसके अधीन आने वाले किसी संस्थान में खेलने के लिए गाँधी पर शायद कोई ऐसा नाटक तैयार किया जा सकता था जो पूरी तरह राजनीतिक गाँधी की राजनीति को छुए बिना आध्यात्मिक सी, भले मानुस की सी, देवता की सी छवि बनाकर काम चला लेता। जैसा कि निर्देशकीय में कहा गया है, ``मैं इस चक्कर में भी नहीं पड़ना चाहता था कि स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी का क्या-क्या योगदान रहा। उस समय के उनके समकालीन नेताओं के साथ उनके क्या-क्या संवाद हुए, कहां-कहां विचारों पर मतभेद, किन-किन नेताओं के विचारों के साथ उनकी सहमति थी इत्यादि।`` अफ़सोस कि यह दावा ठीक नहीं है।

यह नाटक बेहद सचेत ढंग से और बेहद सलेक्टिव ढंग से गाँधी के मतभेद पर फोकस करता है। भारतीय नेताओं से मतभेद के रूप में कई बार एक ही नाम आता है, वो जिन्ना का है या फिर मुस्लिम लीग का। इसके अलावा देश में कोई और राजनीतिक विचार, संगठन या शख़्स थे, जिससे गाँधी असहमत थे या जो गाँधी के ख़िलाफ़ थे, उनको लेकर नाटक ख़ामोशी ओढ़े रहता है। नाटक के बीच में आता है कि जिन्ना और मुस्लिम लीग विभाजन की मांग उठाते हैं। जिन्ना की वजह से नोआखाली हो जाता है।  नाटक के एक आख़िरी दृश्य में जो काफ़ी प्रभावी ढंग से रचा गया है जिसमें बूढ़े गाँधी दक्षिण अफ्रीका वाले युवा बैरिस्टर मोहन से संवाद कर रहे होते हैं तो भी अकेला नाम जिन्ना ही विभाजन के लिए जिम्मेदार होता है।

दक्षिण अफ्रीका की घटनाओं और चम्पारण के अलावा जिस घटना पर सबसे ज़्यादा फोकस किया गया है बल्कि सबसे ज़्यादा अग्रेसिव ढंग से किया गया है, वह है नोआखाली के दंगे। `जिन्ना के डाइरेक्ट एक्शन` से हुए दंगों की ख़बर पाकर व्यथित गाँधी वहाँ पहुंच जाते हैं। मुसलमानों को नसीहत देते हैं कि स्त्रियों का अपहरण और बलात्कार क़ुरान का अपमान है। हिंदुओं को अपने घरों में लौटने के लिए कहते हैं और पीड़ितों के लिए सेवा कार्य करते हैं। दंगों का लाइव करने में नाटक का लेखक या निर्देशक कौन अपनी रचनात्मकता के `शिखर` पर पहुंचता है, यह वे दोनों तय कर लें। गोल टोपियां पहने मुसलमान हिंदू स्त्रियों को घेरते हैं। पीले वस्त्रों वाले जोगी-जोगिन नोआखाली की व्यथा गाते हुए गुज़रते हैं। इस दौर में करियर के उज्जवल भविष्य के लिए और क्या चाहिए? बंगाल का हिंदू इलीट क्या कर रहा था, गाँधी की हत्या तक देश में जिन्ना के अलावा भी क्या कोई और ताक़तें थीं जो थोड़ा-बहुत साम्प्रदायिकता या देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार थीं, नाटक नहीं बोलता। हिन्दू महासभा, आरएसएस, आर्य समाज के लोग क्या कर रहे थे, नाटक नहीं बताता। क्या नोआखाली के अलावा भी दंगे हुए? हाँ, नाटक स्वीपिंग कमेंट स्टाइल में बताता है कि नोआखाली की प्रतिक्रिया में बिहार में। शायद कलकत्ते में भी। 1947 तक गाँधी दिल्ली तक में किस तरह जूझ रहे थे और पटेल तक से कैसे उन्हें उलझना पड़ रहा था, यह नाटक नहीं बताता। बस जिन्ना, मुस्लिम लीग और मुसलमान अपवाद हैं। इधर पंजाब में भी क्या हुआ और दिल्ली व आसपास भी क्या हो रहा था, उसे दिखाने की ज़रूरत होती तो रवींद्र त्रिपाठी और सुरेश शर्मा क्या लिखते-दिखाते? तब हत्यारों और बलात्कारियों के सिरों पर गोल टोपियों ही पहनाई जातीं या उनका रंग काला-पीला होता? अच्छा है, पंडितजी द्वय इस चक्कर में नहीं पड़े। गाँधी की हत्या दिखाई गई पर इस तरह कि नहीं दिखाई गई। अपनी मृत्यु के आभास का उल्लेख करते हुए गाँधी प्रार्थना सभा में मतलब मंच से ग्रीन रूम में चले जाते हैं और अँधेरे में गोलियां चलने की आवाज़ें आती हैं। वे कौन हैं जिन्होंने गाँधी को मारा, नहीं पता। दर्शक मान सकते हैं, नोआखाली वाले गोल टोपी वाले मुसलमान ही होंगे, नाटक में हत्यारे और बलात्कारी वही तो हैं।

(मुसलमानों का अभिनय कर रहे कलाकारों के पहनवावे की बात से नोआखाली गए गाँधी से प्रभावित होकर उनके अभियान में शामिल हुई ग़रीब बुर्के वाली औरत भी याद आ रही है। उन दिनों का पता नहीं, पर आज भी बुर्का बंगाल की महिलाओं का प्रतिनिधि पहनावा नहीं है। सूती साड़ी शायद वो असर न पैदा करती? गाँधी के अभिवादन के बदले बंगाली मुसलमान का नोमोस्कार के बजाय सलाम वालेकुम/“सलाम अलैकुम ज्यादा ऑथेंटिक होगा? हिन्दू गाँधी के हाथ पर बंधे कलावे के लिए भी तो तारीफ़ हो। यही छोटी-छोटी पकड़ तो लेखक और निर्देशक को 'विश्वसनीय' बनाती हैं।)

गाँधी को अगरबत्ती दिखाने के बाद उनके भजन से शुरू हुआ नाटक उनके भजन पर ही सम्पन्न हो जाता है। बा को `श्री रामचन्द्र क़ृपालु भजमन` पहले ही सुनाया जा चुका होता है। नाटक में और भी गीत हैं। एकला चला रे भी और कुछ लोकगीत शैली वाले भी। गाँधी की स्वच्छता अभियान वाली छवि भी है। और सर्व धर्म सद्भाव व दूसरी बहुत सारी अच्छी-अच्छी बातें हैं जिन्हें आप एनएसडी के सम्मुख सभागार में आज सोमवार शाम 6.30 बजे ख़ुद गाँधी के सहयोगी महादेव देसाई, प्यारे लाल, सोनिया शलेसिन, कैलिन बाख और जोसफ के. डोक के मुंह से सुनेंगे तो और अच्छी लगेंगी।

शुरू में ही मैंने उन रवींन्द्र त्रिपाठी का ज़िक्र किया था जिन्होंने विष्णु खरे के हुसेन पर लिखे का कड़ा प्रतिवाद किया था। याद है कि जनसत्ता में हुसेन पर छपे विष्णु खरे के लेख का तब सबसे पहला प्रतिवाद मैंने अपने ब्लॉग पर लिखकर किया था जिसका शीर्षक था - `हुसेन प्रकरण : क्या विष्णु खरे ने बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का `भार` उतार फेंका?` मैं किसी निर्देशक सुरेश शर्मा को नहीं जानता। अपने उसी प्रिय लेखक रवीन्द्र त्रिपाठी को ही जानता हूँ। सवाल है कि क्या रवींद्र त्रिपाठी ने भी अपने कन्धों से कुछ उतार फेंका है?

Saturday, February 2, 2013

द इंडियन आइडियोलॉजी : बदनसीब मुल्क़ के बदग़ुमान रहनुमा (अंतिम क़िस्त)

(पिछली पोस्ट से जारी)


माउंटबेटन के आगमन के साथ भारत में धार्मिक फूट को लेकर साम्राज्यवादी नीति का एक चक्र पूरा हुआ। 19 वीं सदी के दूसरे उत्तरार्ध में अंग्रेज़ी राज को यह शक़ था कि ग़दर में पेशकदमी करने वाले मुसलमान थे और हिन्दुओं को ज़्यादा भरोसेमंद समझा जाता था। बीसवीं सदी के पहले उत्तरार्ध में यह पसंदगी तब बदल गई जब हिन्दू राष्ट्रवाद ज़्यादा आग्रही हो गया और उसे रोकने के लिए मुस्लिम महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दिया गया। अब अपने अंतिम चक्र में लन्दन ने ज़बर्दस्त झटका देते हुए बहुसंख्यक समुदाय को अपना विशेषाधिकृत सम्भाषी चुन लिया। 1947 में इस भारी परिवर्तन की जज़्बाती शिद्दत उभरी थी  विचारधारारणनीति और शख्सियत के अचानक हुए संगम से। ब्रिटेन की लेबर पार्टी हुकूमत के लिए उनके अपने दृष्टिकोण से सबसे निकटतम भारतीय पार्टी काँग्रेस थीनेहरू के साथ जुड़ी फेबियन कड़ियाँ काफी पुरानी थीं। राष्ट्रीय स्वाभिमान जा कर भावनात्मक अपनेपन से मिल गया। ब्रिटेन ने एक छितरे हुए उपमहाद्वीप को इतिहास में सर्वप्रथम एक एकल राजनीतिक क्षेत्र बना डाला था। सही समझ वाले सारे अंग्रेज़ देशभक्तजिनमें सिर्फ एटली जैसे साम्राज्यवादी शिक्षा के उत्पाद ही शामिल नहीं थे,इस बात को बड़े गर्व के साथ अपने साम्राज्य की सबसे उत्कृष्ट सृजनात्मक उपलब्धि मानते। और उनकी रवानगी के वक़्त उस में दरारें पड़ना उस उपलब्धि पर सवालिया निशान लगने जैसा होता। ब्रिटेन को अगर भारत छोड़ना है तो भारत को वैसे ही रहना होगा जैसा कि अंग्रेज़ों ने उसे गढ़ा था। ब्रिटेन के पास तब भी सिर्फ मलाया ही नहीं बल्कि एशिया में भी कीमती मिल्कियतें थीं -उनके सबसे फायदेमंद उपनिवेश जो जल्द ही कम्युनिस्ट विद्रोह की रंगभूमि बन जाने वाले थे और जिन्हें छोड़ने की ब्रिटेन को कोई जल्दी नहीं थी। उसी समय उत्तर-पश्चिम सीमा से थोड़ी ही दूर अंग्रेज़ी राज का पारंपरिक हौवा बैठा हुआ था जो अब सोवियत संघ के रूप में और भी भयंकर था। आला अफ़सरान इस बात पर एकमत थे कि उपमहाद्वीप के विभाजन से रूसियों को ही फायदा पहुँचेगा। अगर दक्षिण एशिया के दरवाज़ों को साम्यवाद के खिलाफ़ मज़बूती के साथ बंद किया जाना था तो न सिर्फ ब्रिटेन बल्कि पश्चिम के भी रणनीतिक हितों को संयुक्त भारत के परकोटे की दरकार थी।
ये सारी बातें इसी तरफ इशारा कर रही थीं कि मुस्लिम लीगजो कभी अंग्रेज़ी राज का नीतिगत साधन हुआ करती थीअब उसके मामलों के यथेष्ट निपटारे में एक प्रमुख अड़चन थी और उसका साक्षात रूप जिन्ना थे। काँग्रेस के नेता ब्रिटेन द्वारा उन्हें सौंपे जाने वाले विरसे की अखंडता का झंडा उठाये हुए थे और जिन्ना यह उम्मीद नहीं कर सकते थे कि उनके साथ समतुल्य बर्ताव किया जाएगा। मगर इस ढांचागत विषमता में एक व्यक्तिगत आत्म्श्लाघिता का असंतुलन मिलाया गया और यह सम्मिश्रण घातक साबित हुआ। 'वह झूठा,बौद्धिक रूप से सीमित और चालबाज़ शख्स' - माउंटबेटन के इस अमिट पोर्ट्रेट के लिए हमें एंड्रयू रॉबर्ट्स का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की सेना के प्रतीकात्मक कमांडर के तौर पर कोलम्बो में अपनी कैडिलैक की पिछली सीट पर बैठे-बैठे ख़याली कारनामों में डूबे हुए माउंटबेटन जब दिल्ली आये तो इस बात से बेइंतहा खुश थे कि उन्हें लगभग दिव्य शक्तियों से नवाज़ा गया है। मैंने महसूस किया कि मुझे दुनिया का सबसे ताक़तवर आदमी बना दिया गया है।माउंटबेटन पहनावे और समारोह सम्बन्धी आडम्बर का विकृत रूप थे और झंडों और झालरदार सूटों को लेकर उनका जूनून अक्सर राज्य के मामलों पर तरजीह पा जाता। उनके दो सर्वोपरि सरोकार थे: अंग्रेज़ी राज के अंतिम शासक के तौर पर एक ऐसी हस्ती बनना जो हॉलीवुड को शोभा दे और ख़ासकर यह सुनिश्चित करना कि भारत राष्ट्रमंडल के अंतर्गत का ही एक राज्य बना रहे: विश्व में प्रतिष्ठा और रणनीति दोनों को लेकर यूनाईटेड किंगडम के लिए यह अत्यधिक महत्त्व की बात होगी।'
ऐसा माना गया था कि अगर ब्रिटिश राज का बँटवारा होना ही है तो बड़ा हिस्सा- जितना बड़ा उतना अच्छा - ब्रिटिश उद्देश्यों के लिए महत्त्व रखता है। उपमहाद्वीप के भविष्य की योजना बनाने में काँग्रेस अब पसंदीदा सहयोगी क्यों थी इस बात के पीछे के राजनीतिक कारणों में एक व्यक्तिगत कारण भी जुड़ गया था। नेहरू के रूप में माउंटबेटन को एक दिलचस्प साथी मिल गया थाएक से स्वभाव वाले वे दोनों ही सामाजिक तौर पर भी समकक्ष थे। गांधी ने अंग्रेज़ों के साथ हमेशा अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना चाहा था। गांधी द्वारा नेहरू को उत्तराधिकारी चुने जाने का अंशतः कारण यह था कि वे अंग्रेज़ों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने के लिए सांस्कृतिक तौर पर सुसज्ज थे जबकि पटेल और अन्य उम्मीदवारों में वह चीज़ न थी। सारे सम्बंधित लोगों के लिए यह तसल्ली की बात थी कि कुछ ही हफ़्तों में नेहरू वायसराय के न केवल ख़ास दोस्त बन गए बल्कि जल्द ही उनकी बीवी के साथ हमबिस्तर भी हो गए। इस सम्बन्ध को लेकर भारतीय राज्य इतना संकोची रहा आया है कि पचास सालों के बाद भी वह इस विषय को छूने वाली एक अमरीकी फिल्म का प्रदर्शन रोकने में दखल दे रहा था। भारतीय राज्य के इतिहासकार भी इस विषय के बगल से चुपचाप निकल जाते हैं। दिल के मामले कदाचित ही हुकूमत के मामलों पर असर डालते हैं। मगर इस मामले कम-अज़-कम यह इमकान न था कि त्रिकोण के शेहवानी ताल्लुकात ब्रिटिश नीति को लीग के पक्ष में झुका देते। राजनयिकों को सस्ते में चलता कर दिया जाता है।
फिर भी एक ऐसे दौर में जब ब्रिटेन प्रकट रूप से भारत में विभिन्न दलों को एक साथ लाने की कोशिश कर ही रहा था और काँग्रेस एकीकृत देश को आज़ादी की तरफ ले जाने की कोशिश कर रही थीगौरतलब है कि तब जिन्ना के बारे में माउंटबेटन और नेहरू कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे और एटली उसमें सुर मिला रहे थे। माउंटबेटन के लिए जिन्ना एक 'पागल', घटिया आदमीऔर 'मनोरोगी केसथेनेहरू के लिए वे एक 'हिटलरी नेतृत्व और नीतियोंवाली पार्टी की अगुआई कर रहे पैरेनोइड थे और एटली के लिए वे 'गलतबयानी करने वालेथे। 
माउंटबेटन जब आये तो पंजाब में सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे। एक महीने के अन्दर-अन्दर उन्होंने फैसला कर लिया कि विभाजन अपरिहार्य है क्योंकि काँग्रेस और लीग के बीच का गतिरोध दूर नहीं हो पा रहा है। मगर समूचे इलाके का बँटवारा कैसे होना थाअनिवार्यतः बात पाँच सवालों पर आकर टिक गई। बंगाल और पंजाब इन दो प्रमुख प्रान्तों का क्या होगा जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक तो थे मगर उनका संख्याबल उतना ज़बरदस्त नहीं थारजवाड़ों के शासन वाले अंचलों कोजहाँ काँग्रेस और लीग दोनों की ही उपस्थिति नगण्य थीकैसे आवंटित किया जाएगाविभाजन के सिद्धांत के बारे में या सरहद कहाँ खड़ी की जायेगी इस बात को लेकर क्या जनता की राय पूछी जायेगीविभाजन की प्रक्रिया का पर्यवेक्षण कौन करेगाइस पर अमल कितनी समयावधि में किया जाएगा?
इस मौके पर आकर काँग्रेस और लीग का हिसाब अदल-बदल हो गया। सारे राष्ट्र की नुमाइंदगी करने का काँग्रेस का दावा 1920 के दशक से ही उसकी विचारधारा का केंद्र रहा था। मुस्लिम निर्वाचन मंडल में लीग द्वारा अपनी ताक़त दिखाए जाने पर यह दावा धराशायी हो गया था। मगर अपनी नई-नवेली ताक़त का लीग क्या करने वाली थीलाहौर प्रस्ताव के छह साल बीत जाने पर भी जिन्ना को हिन्दू-बहुल प्रान्तों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के संरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बाहुल्य वाले प्रान्तों की सार्वभौमिकता के लिए कोई संभाव्य समाधान नहीं मिला था।  बस इतना भर हुआ था कि पाकिस्तान का नाराजिसे उन्होंने 1943 में खारिज कर दिया थामुसलमानों के बीच इतना मकबूल साबित हुआ कि बिना किसी स्पष्टीकरण के जिन्ना ने उसे अपना लिया और यह दावा किया कि लाहौर प्रस्ताव में 'राज्यकी जगह 'राज्योंमुद्रण की अशुद्धि के कारण आया था। शायद उन्होंने यह हिसाब लगाया था कि चूँकि अंग्रेज़ों के सामने लीग और काँग्रेस के परस्पर विरोधी उद्देश्य हैंवे आखिरकार अपने हिसाब से समय लगाकर दोनों पक्षों पर अपनी पसंद का परिसंघ थोप देंगे। उस परिसंघ में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बाहुल्य वाले इलाके स्वशासी होंगे और केंद्रीय सत्ता न इतनी मज़बूत होगी कि उन पर चढ़ सके और न ही इतनी कमज़ोर कि स्वशासी हिन्दू-बहुल प्रक्षेत्रों में मुसलमान अल्पसंख्यकों की रक्षा भी न कर सके। अंततः कैबिनेट मिशन ने जो योजना तैयार की वह जिन्ना की विजन के काफी करीब थी।
मगर काँग्रेस पार्टी ने हमेशा से एक शक्तिशाली केंद्रीकृत राज्य की आरज़ू की थी और नेहरू का मानना था कि भारतीय एकता को बचाए रखने के लिए ऐसा ज़रूरी है। इसलिए ऐसी कोई स्कीम नेहरू के लिए विभाजन से भी खराब थी क्योंकि वह उनकी पार्टी को उस शक्तिशाली केंद्रीकृत राज्य से महरूम कर देती। राष्ट्रीय वैधता के ऊपर अपनी इजारेदारी पर काँग्रेस ने शुरू से ज़ोर दिया था। यह दावा अब बिलकुल स्वीकार नहीं किया जा सकता था। लेकिन अगर बुरी से बुरी स्थिति भी हुई तो भारत के बड़े हिस्से में सत्ता के अबाधित एकाधिकार के मज़े लेना अविभाजित भारत में उस सत्ता को बाँटकर बँधे पड़े रहने से बेहतर था। इसलिए जब लीग तकसीम की बात कर रही थी तो जिन्ना परिसंघ के बारे में सोच रहे थेऔर जब काँग्रेस संघ की बात कर रही थीतो नेहरू बँटवारे की तैयारी कर रहे थे। कैबिनेट मिशन योजना की लुटिया हस्बे-दस्तूर डुबो दी गई।   
सारी निगाहें अब इस बात पर आ टिकीं कि लूट का बँटवारा कैसे होगा। अंग्रेज़ अब भी राजा थे: बँटवारा माउंटबेटन करेंगे। नेहरू इस बात से निश्चिन्त थे कि उन पर इनायत ज़रूर होगीमगर कितनी इसका अंदाज़ा पहले से होना मुश्किल था। ब्रिटिश राज से जो भी राज्य उभरेंगे उन्हें पुनर्नामित ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत बनाये रखना माउंटबेटन के लिए सबसे अहम बात थी। इसका मतलब था कि उन राज्यों को आज़ादी एक स्वतंत्र-उपनिवेश (डोमिनियन) के तौर पर स्वीकार करनी होगी। मुस्लिम लीग को इस से कोई आपत्ति नहीं थी। मगर लन्दन में चलने वाली जालसाज़ियों के आगे भारत के नतमस्तक होने को काँग्रेस 1928 से ही सिद्धांततः खारिज करती आई थी और इसमें डोमिनियन वाली बात भी ज़ाहिरन शामिल थी। तो जिस छोटी कौम को माउंटबेटन विभाजन के लिए ज़िम्मेदार मानते थेउसी कौम के राष्ट्रमंडल का सदस्य बन जाने की अवांछनीय संभावना माउंटबेटन के सामने इस कारण आ खड़ी हुई। वहीं बड़ी कौम जो उनके अनुसार न केवल अपेक्षाकृत दोषरहित थी बल्कि रणनीतिक और वैचारिक तौर पर अधिक महत्त्वपूर्ण भी थीराष्ट्रमंडल से बाहर रहने वाली थी। इस पहेली को कैसे सुलझाया जाना था?
इसे सुलझाया उस घड़ी के तारणहार वी पी मेनन ने। अंग्रेज़ों की नौकरशाही में केरल के उच्च-पदस्थ हिन्दू अधिकारी मेनन माउंटबेटन के व्यकिगत अमले का हिस्सा थे और काँग्रेस के सांगठनिक बाहुबली सरदार पटेल के मित्र भी।  क्यों न विभाजन सीधे-सीधे इस तरह हो कि काँग्रेस को बहुत बड़ा क्षेत्र और आबादी हासिल हो जाए जिसकी हकदार वह मज़हब के आधार पर थी हीऔर तो और अंग्रेज़ी राज की पूँजी और सैनिक एवं नौकरशाही तंत्र का भी बड़े से बड़ा हिस्सा मिल जाए- और इसके बदले में माउंटबेटन से राष्ट्रमंडल में भारत के प्रवेश का वायदा किया जाएइतना ही नहींमुँह मीठा करने के लिएमेनन ने रजवाड़ों को भी थाली में परोसने की सलाह दी जिस से कि जिन्ना को मिलने वाले हिस्से की क्षतिपूर्ति हो जाए। कुल मिलाकर रजवाड़े क्षेत्रफल और आबादी में भावी पाकिस्तान के बराबर थे और उस समय तक काँग्रेस ने उन्हें अलंघ्य मान रखा था। नेहरू और पटेल को मनाने में कोई मुश्किल नहीं हुई। अगर मालमत्ता दो महीनों के अन्दर-अन्दर हस्तांतरित हो जाती हैतो सौदा पूरा। इस ब्रेकथ्रू की सूचना मिलने पर माउंटबेटन फूले नहीं समाये और फिर मेनन को उन्होंने लिखा: 'बड़ी खुशकिस्मती रही कि आप मेरे स्टाफ में रिफार्म्स कमिश्नर रहेऔर इस तरह हम बहुत शुरूआती दौर में ही एक दूसरे के करीब आ गएक्योंकि आप वह पहले आदमी थे जो डोमिनियन स्टेटस के मेरे विचार से पूर्णतः सहमत थेऔर आपने ने वह हल ढूंढ निकाला जिसके बारे में मैंने सोचा भी नहीं थाऔर उसे सत्ता के अति शीघ्र हस्तांतरण से पहले ही स्वीकार्य बना दिया। उस निर्णय की इतिहास हमेशा बेहद कद्र करेगाऔर इस बात के लिए मैं आपका मशकूर हूँ।इतिहास उतना कद्रदान नहीं साबित हुआ जितनी उन्हें उम्मीद थी।
आखिरी घड़ी में एक गड़बड़ हो गई। स्वतंत्रता और विभाजन का लन्दन द्वारा स्वीकृत मसौदा शिमला में सभी पक्षों के आगे रखने से पहले माउंटबेटन को पूर्वबोध हुआ कि औरों के देखने से पहले उन्हें वह मसौदा गुप्त रूप से नेहरू को दिखा देना चाहिए। उसे देखकर नेहरू आग-बबूला हो गए: मसौदे में यह बात पर्याप्त रूप से साफ़ नहीं की गई थी कि भारतीय संघ अंग्रेजी राज का उत्तराधिकारी राज्य होगा और इस वजह से वे सारी चीज़ें जो उसे हासिल होंगी और यह भी कि पाकिस्तान उस से अलग हो रहा है। माउंटबेटन ने अपने अंतर्ज्ञान के लिए किस्मत का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि अगर वे मसौदा नेहरू को नहीं दिखाते तो खुद वे और उनके आदमी 'देश की सरकार के सामने निरे अहमक साबित हो जाते कि उन्होंने सरकार को इस खुशफहमी में रखा था कि नेहरू मसौदा स्वीकार कर लेंगे ' और 'डिकी माउंटबेटन बर्बाद हो गए होते और अपना बोरिया-बिस्तर बाँध चुके होते'. मेनन का अमूल्य साथ तो था हीऔर मुश्किल टल गई जब उन्होंने नेहरू की पसंद वाला मसौदा तैयार किया। जून के पहले हफ्ते में माउंटबेटन ने घोषणा की ब्रिटेन 14 अगस्त को सत्ता का हस्तांतरण कर देगाउस तारीख को बाद में उन्होंने स्वयं ही 'हास्यास्पद रूप से जल्दबाज़बताया था। इस जल्दबाज़ी की वजह साफ़ थीऔर वह बताने में माउंटबेटन ने कोई गोलमाल नहीं किया। 'हम क्या कर रहे हैं?  प्रशासकीय तौर पर एक पक्की इमारत बनाने और एक झोंपड़ी या तम्बू तानने में फर्क है। जहाँ तक पाकिस्तान की बात हैहम एक तम्बू तान रहे हैं। इस से ज़्यादा हम कुछ नहीं कर सकते।'
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यह टुकड़ा `थ्री एसेज़ कलेक्टिव` से आई किताब `द इंडियन आइडियोलॉजी` से लिया गया है। हिंदी अनुवाद - भारतभूषण तिवारी।

(समयांतर, जनवरी 2013 से साभार)