Monday, March 9, 2009

उन स्त्रियों का वैभव

एक महिला साथी ने अपने ब्लॉग पर पाठकों से पूछा है कि वे उन तीन स्त्रियों के नाम बताएं, जिनसे वे सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं। उन्होंने ऐसे तीन पुरुषों के नाम बताने का भी आग्रह किया है। सेलिब्रेटीज से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं और वे तपाक से कोई तीन नाम गिना देते हैं जिनमें प्रायः पहले नाम के रूप में मां बोला जाता है।
मैं यूं ही सोचते-सोचते बचपन में लौटने लगा। धुंधली सी यादों में बहुत से धूसर से, बेनाम से चेहरे तैरने लगे। मैले-कुचैले कपड़ों वाली किसान-मजदूर स्त्रियां जो अक्सर चाची, ताई और कोई-कोई बुआ होती थी, बहुत सी युवा लड़कियां जो मां के आग्रह पर मुझे अपने साथ रामलीला ले जाती थीं, इन चेहरों में थीं। अचानक पड़ोस की एक काली लड़की बेहद याद आई जिसने एक भरी दुपहरी मुझे अपने चौबारे में बुलाया और अपने दिल की बातें एक कागज़ पर लिखवा दीं - `मैं तेरी मोहब्बत में मर जाऊंगी, अक्षय।' फ़कत एक लाइन लिखा दी थी और फिर नीचे अपना नाम लिखने के लिए कहा था। उसने मुझ तीसरी कक्षा के मासूम से बच्चे पर भरोसा कर यह चिट्ठी अक्षय तक पहुंचाने का वादा भी लिया। मेरे गांव की उसी पुरानी मनुहार भरी बोली में - `बाई बी मेरा'। अक्षय उस साल रामलीला में राम का पाठ खेल रहा था। उस जमाने में जब टीवी नहीं था तो लड़कियों में ही नहीं, गांव के भले और शोहदे लोगों में भी रामलीला के एक्टरों का भारी क्रेज हुआ करता था।
मुझे जाने क्या सूझा कि मैंने वह चिट्ठी अपनी मां को जा थमाई और कोई बड़ा रहस्य खोल देने के कारनामे के गौरव से भर गया। और मेरी मां ने यह चिट्ठी उस लड़की की मां को थमा दी और फिर वह उसके पिता तक जा पहुंची। गो के न उस लड़की को और न उसके मां-बाप को कोई एक हरुफ पढ़ना आता था पर चिट्ठी का मजमून तो मां ने उन्हें रटवा ही दिया था।
फिर एक ऐसी ही सूनी दोपहर में उस लड़की ने मुझे अपने घर के आगे पकड़ लिया। मैं शर्म और डर से कांप रहा था। वो मुझे अपने किवाड़ के पीछे ले गई। फिर बेहद बेबस से भाव से मेरी ओर देखकर बोली, 'बाई, तुझे क्या मिला?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उसी कातर दृष्टि के साथ उसने फिर कहा, `तुझे पता, मेरे चाच्चा ने मुझे कितना पिट्टा?' (उस जमाने में मेरे गांव में बहुत से लोग पिता को चाच्चा ही कहते थे।)फिर उसने अपनी टांगों से सलवार थोड़ा ऊपर उठाया और कहा, `देख सारे गात पर लील ही लील पड़रे।' मुझे काटो तो खून नहीं था। मुझे लगा कि वाकई मैंने बहुत बड़ा धोखा किया है। मैं किसी तरह वहां से चला आया पर एक रात, दो रात और कितनी ही रात ढंग से सो नहीं सका।
उस दिन के बाद अचानक वह लड़की जो अपने रंग-रूप की वजह से मुहल्ले भर में बेहद उपेक्षित थी, मुझ बच्चे को बेहद सुंदर लगने लगी। मैं उसके उस सपने में जिसने चिट्ठी की शक्ल अख्तियार की थी, अक्सर घूमता और फिर शर्मिंदा सा लौट आता। अचानक रात में नींद खुलती और मैं सोचता कि मैं किसी तरह उस लड़की से माफी मांग लूंगा।
कोई बेहतरीन कहानी हम पर कई बार गहरा असर करती है और हम चीजों को मानवीय ढंग से देखने लगते हैं। सच बताऊं, इस घटना से उपजे अपराधबोध का असर भी मुझ पर ऐसा ही हुआ। कुछ दिनों बाद उस लड़की का ब्याह हो गया। संयोग यह कि हम फिर कभी मिल भी नहीं पाए। इस बात को जमाने गुज़र गए हैं पर उसकी कातर सी आंखें और उसका सवाल आज तक मेरा पीछा करते हैं। काश मैं बता पाता कि मुझे क्या तहज़ीब और तमीज मिली उससे।
गांव की बेढ़ब ज़िंदगी में ऐसे ही कई और स्त्री चेहरे मुझे याद आ रहे हैं। जिनका जिक्र बेहद निजी को सार्वजनिक करने जैसा लगता है। ये साधारण स्त्री चेहरे गहरे संकटों में मेरे मनुष्य को बचा लेते हैं।
.....काफी देर सोचते रहने के बाद न जाने क्यों मुझे आलोक धन्वा की यह कविता याद आने लगी -

चौक
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उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा
जिन्‍होंने मुझे चौक पार करना सिखाया।

मेरे मोहल्‍ले की थीं वे
हर सुबह काम पर जाती थीं
मेरा स्‍कूल उनके रास्‍ते में पड़ता था
माँ मुझे उनके हवाले कर देती थीं
छुटटी होने पर मैं उनका इन्‍तज़ार करता था
उन्‍होंने मुझे इन्‍तज़ार करना सिखाया

कस्‍बे के स्‍कूल में
मैंने पहली बार ही दाख़िला लिया था
कुछ दिनों बाद मैं
ख़ुद ही जाने लगा
और उसके भी कुछ दिनों बाद
कई लड़के मेरे दोस्‍त बन गए
तब हम साथ-साथ कई दूसरे रास्‍तों
से भी स्‍कूल आने-जाने लगे

लेकिन अब भी
उन थोड़े से दिनों के कई दशकों बाद भी
जब कभी मैं किसी बड़े शहर के
बेतरतीब चौक से गुज़रता हूँ
उन स्त्रियों की याद आती है
और मैं अपना दायाँ हाथ उनकी ओर
बढा देता हूँ
बायें हाथ से स्‍लेट को संभालता हूँ
जिसे मैं छोड़ आया था
बीस वर्षों के अख़बारों के पीछे।

Saturday, March 7, 2009

अंतहीन श्रृंखला

इस समय तो भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे पक्षी पाल लेता है, उपयोग के लिए गाय या घोड़ा पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालित पशु-पक्षियों के समान ही वह उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है। हमारे समाज के पुरुष के विवेकहीन जीवन का सजीव चित्रण देखना हो तो विवाह के समय गुलाब सी खिली हुई स्वस्थ बालिका को पांच वर्ष बाद देखिए। उस समय उस असमय प्रौढ़ा, कई दुर्बल संतानों की रोगिणी पीली माता में कौन सी विवशता, कौन सी रुला देनी वाली करुणा न मिलेगी?
-महादेवी वर्मा (श्रृंखला की कड़ियां में संकलित एक निबंध से)

पेटिंग- अमृता शेरगिल

Monday, March 2, 2009

सुदीप बनर्जी की ग़ैरहाज़िरी -असद ज़ैदी

कवि, विचारक, योजनाकार और जन-सेवक सुदीप बनर्जी (1946–2009) पिछले कुछसमय से मौत के घेरे में थे. बड़ी हिम्मत और ज़ब्त के साथ उन्होंने अपनीबीमारी – कैंसर – का सामना किया. उनके जाने से बहुत सी जगहों में एकसूनापन पैदा हुआ है जो एक लंबे अरसे तक बना रहेगा. वह ऐसे मित्र नहीं थेजिन्हें आप भूले रहें. जिनसे उनकी मुलाक़ात कम-कम होती थी – और ऐसे लोगहज़ारों में हैं – उनके यहाँ भी उनकी मौजूदगी का अहसास हमेशा बना रहताथा. दोस्ताना पैदा कराने का उनका ख़ामोश अंदाज़ और शरीफ़ाना तरीक़े सेलोगों के दिल और दिमाग़ में एक हस्तक्षेपकारी रोल हासिल कर लेना उन्हेंआता था. तमाम उम्र उन्होंने इस हुनर को माँजा. इससे उनकी बुनियादी फ़ितरतऔर इंसानी महत्वाकांक्षा का पता चलता है. वह इस बात की इजाज़त नहीं देतेकि आप उन्हें एक नेक और दर्दमंद इंसान के अलावा किसी और रूप में यादकरें.

वह अपने कैरियर की शुरूआत से ही से भारतीय प्रशासनिक सेवा के एकअवाम-दोस्त अफ़सर के रूप में मशहूर होने लगे थे. जैसे जैसे वक़्त बिगड़तागया और भारतीय राजनीति पर दक्षिणपन्थी साये गहराने लगे और सिविल सर्विसनेहरू-युगीन परम्पराओं को लात मारकर तत्परता से एक आत्मकेंद्रित, भ्रष्टऔर जन-विमुख संस्थान में बदलने लगी, सुदीप जैसे अफ़सर की यह अवाम-दोस्तशोहरत ज़्यादा पुख्ता और जोखिम-भरी होती गयी. नौकरशाही हलक़ों मेंवामपंथी के रूप में उनकी ख्याति दरअसल एक दुधारी तलवार थी और लोगों कोपहले ही से आगाह करने का ज़रिया थी. इस स्थिति ने सुदीप को बहुत सावधानआदमी तो बनाया, पर उनका ईमान कभी नहीं बदला.

वह मूलतः उन संकल्पों के प्रति वफ़ादार रहे जिनके साथ आज़ाद हिन्दुस्तानने अपना लोकतांत्रिक-संवैधानिक सफ़र शुरू किया. वह हमेशा स्थापित नियमोंकी अधिकतम प्रगतिशील और जनहितकारी व्याख्या की गुंजाइश निकालते रहते थे. आजहालत यह है कि कोई इतना न करे, बस हुकूमत और अफ़सरशाही निज़ाम केनियम-क़ायदों के भीतर रहते हुए जन-हित में काम कर दे तो ऐसे अफ़सर कोतत्काल फ़रिश्ते का दर्जा हासिल हो जाता है. सुदीप के ऊपर फ़रिश्ता होनेके अलावा एक साधारण, विनम्र और अच्छे इंसान होने का भार भी था. इस दोहरेभार को लिए हुए ही वह विदा हुए हैं.
अपने प्रशासनिक जीवन के पहले हिस्से में उन्हों ने मध्यप्रदेश मेंआदिवासी और ग़रीब जनों के कल्याण की जो योजनाएं बनाईं और क्रियान्वितकिया वे आज भी याद की जाती हैं. मसलन मध्यप्रदेश की तेंदू-पत्ता नीति औरस्लम-निवासियों को आवासीय पट्टे दिलाने में उनकी भूमिका. भोपाल गैस काण्डके लिए ज़िम्मेदार अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड को घेरने और उसकेख़िलाफ़ पक्के सबूत मुहैया कराने में सुदीप का हाथ था. शायद बहुत लोगोंको यह मालूम न हो कि अर्जुन सिंह के राज्यपाल वाले कार्यकाल के दौरानपंजाब समझौते (राजीव-लोंगोवाल समझौते) का आधार तैयार करने वाले अधिकारीसुदीप ही थे. उन्हीं ने मध्यप्रदेश में मलखान सिंह और फूलन देवी कोआत्मसमर्पण के लिए राज़ी किया था. अपने कैरियर के उत्तरार्ध में उन्होंनेशिक्षा के क्षेत्र में यादगार काम किए. राष्ट्रीय साक्षरता मिशन केमहानिदेशक के रूप में उन्होंने साक्षरता अभियान में जान डालने, इसेव्यापक बनाने और बुद्धिजीवी वर्ग को – लेखकों, फ़िल्मकारों औरसमाज-विज्ञानियों को – इसमें खींचकर लाने का काम किया. बाद में जब वहउच्च-शिक्षा सचिव बने तो कई ऐसे क़दम उठाए जिनका महत्त्व आने वाले वक़्तमें साफ़ हो जाएगा. दिल्ली का जामिया मिल्लिया अगर आज एक ज़्यादा जीवंत,रौशन और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है या होता नज़र आता है तो इसका मुख्यश्रेय सुदीप बनर्जी को ही जाना चाहिए.

सुदीप को शायद ही कभी फुरसत देखने को मिली हो. उनके असमय निधन का एकमार्मिक पहलू यह भी है कि अपनी बीमारी के आख़िरी दौर में उनका ध्यान शायदपहली बार इतनी शिद्दत के साथ जीवन की मामूली खुशियों और छोटे छोटे शग़लोंकी तरफ़ जाने लगा था. बड़े अरमान के साथ एक रोज़ अचानक बोले कि अगरसिर्फ़ पलुस्कर (शास्त्रीय गायक दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर) को सुनने केलिए एक जीवन जीना पड़े तो वह जीना सार्थक और काफ़ी होगा. उनके कमरे मेंएक सी डी प्लेअर रखा था जो उनका बेटा गौरव किसी वक़्त अपने लिए लायाहोगा. अब वह बाजा काम न करता था. मेरे और मंगलेश डबराल के आग्रह परउन्होंने किसी को बुलाकर उस बाजे को सुधरवाया और कुछ दिन तक उसपर संगीतसुना. शायद अब्दुल करीम खां को सुनते रहे. कुछ दिन तक चलने के बाद वहबाजा फिर ख़राब हो गया. तब तक वह ख़ुद भी इतने बीमार हो गए थे कि कि कुछऔर करने की हालत में नहीं रह गए थे.

उन्हें आभास था कि उनकी बीमारी आसानी से जाएगी नहीं, और शायद घातक हीहोगी. तीन चार महीने पहले आल इंडिया इन्स्टिट्यूट के प्राइवेट वार्ड मेंमैं उनसे मिलने गया. वह बहुत कमज़ोर हो गए थे और एक ख़ाके या रेखाचित्रकी तरह लग रहे थे. कहा कि मैं तो खुशक़िस्मत हूँ कि यहाँ हूँ, और इतनीअच्छी देख-भाल हो रही है, अपनी ज़िंदगी को लंबा खींचने की कोशिश कर सकताहूँ. ज़्यादातर लोग तो दवा-इलाज की पहली स्टेज पर ही हार जाते हैं,उन्हें तो संसाधनों की कमी ही मार डालती है. राजकीय सेवा में होने की वजहसे मुझे यह सब मयस्सर है. फिर इस ज़िक्र से थक कर बोले: बताओ क्या ख़बरहै? दोस्त लोग क्या कर रहे हैं? मैंने सोचा कि हो सकता है इस हालत मेंउन्हें यह बताने की किसी को सूझी न हो इसलिए मैं ही बता दूँ : किज्ञानरंजन ने 'पहल' को बंद करने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा :अरे...! फिर बोले : कहीं शरारत में तो नहीं कह रहे हो? मैंने कहा : काशऐसा ही होता! कुछ देर बाद बोले : अभी मेरी साँस चढ़ी हुई है, बाद में शामको या कल ज्ञान को फ़ोन करूंगा. वह ऐसा नहीं करें. मेरी बात मान जाएँगे.कुछ दिन बाद बताया कि उन्होंने दो-तीन बार कोशिश की, एक बार नंबर मिल भीगया पर ख़ाली घंटी जाती रही, किसी ने उठाया नहीं.

सुदीप को वह सामान्य जीवन मयस्सर नहीं हुआ जिसमें आदमी कुछ काम करता है,कुछ ठाला बैठता है, बे-इरादा टाइमपास, कुछ मटरगश्ती, कुछ अनियोजितमनोरंजन और फ़ालतू मेल-जोल वग़ैरा करता है, जिसमें फ़राइज़ को पूरा करनेका बोझ भी होता है और उनसे फ़रार की ख़्वाहिश भी और जिसमें डिस्ट्रैकशनभरे होते हैं. जो फ़ुरसत उन्हें मिलती भी, जिसमें वह मित्र-मिलन औरपुर-लुत्फ़ गुफ़्तगू में गुज़ारना चाहते तो भी पूरी तरह नहीं गुज़ार सकतेथे – या तो देश-समाज की बात निकल आती थी, या मित्र लोग अपनी समस्याएँ औरबदनसीबियाँ बताने लगते, और सुदीप अपने स्वभाव के मुताबिक़ उन समस्याओं काहल सोचने लगते. रही सही कसर उनका साहित्य-प्रेम पूरा कर देता था. इसप्रकार सुदीप ने एक भरा पूरा जीवन जिया – काम, ज़िम्मेदारी और उपलब्धिसे भरा जीवन, और हज़ारों लोगों का उन्हें प्यार मिला. पर एक दूसरे जीवन,मामूली जीवन, और उसके हर्ष और विषाद को उन्होंने अपने मित्रों, परिचितोंके जीवन के आईने में ही देखा. उसको जीने का वक़्त उन्हें नहीं मिला.

उनकी कविता की अपनी जगह है. चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, विनोद कुमारशुक्ल, लीलाधर जगूड़ी और ऋतुराज के बाद और आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल सेपहले के अंतराल के सबसे अच्छे हिन्दी कवि निःसंदेह सुदीप ही हैं. पर तमामशोहरे और इज़्ज़त के बावुजूद सुदीप समकालीन हिन्दी कविता के सबसेउपेक्षित और अल्पज्ञात कवियों में हैं. मुझे याद नहीं आता कि मैंने उनकेकृतित्व पर कोई अच्छी समीक्षा, आलेख या टिप्पणी पढ़ी हो. सुदीप ऐसे अकेलेकवि नहीं हैं. (हमारे सामने के लोगों में यह क़िस्सा बहुत से संजीदाकवियों के साथ घटित हुआ है.) पर यह हमारी साहित्यिक अंतरात्मा को खटकनेवाली बात ज़रूर है. यह एक मिथ है कि सुदीप की अपनी कविता के प्रतिनिस्संगता ही इसका एक कारण है. वह बहुत गहरे ढंग से अपने लेखन से, ख़ासकरकविता से, लगाव रखते थे, और उसे लेकर चिंतित भी रहते थे. वह साहित्य-समाजकी उदासीनता और ख़ामोशी से मायूस भी होते थे. कविता लिखकर उसे छपाने,मित्रों को सुनाने और व्यापक पाठक समाज की राय जानने की व्यग्रता उनमेंबहुत थी. अब सुदीप चले गए हैं तो हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि उनकेकृतित्व का खुले दिमाग़ से आकलन करें.
--असद ज़ैदी
बी-957 पालम विहार, गुड़गाँव 122017
फ़ोन 09868126587
(श्री सुदीप बनर्जी का निधन १० फरवरी २००९ को हुआ था. स्वास्थ्य कारणों से इन दिनों केरल में होने की वजह से मुझे यह खबर नहीं मिल सकी. फोन पर श्री असद ज़ैदी से इस बारे में पता चला. उन्होंने अनुरोध करने पर अपनी यह टिप्पणी भी मेल कर दी जो तत्काल श्रद्धांजलि के रूप में 'आज समाज' के लिए लिखी गयी थी. - धीरेश)

Thursday, February 19, 2009

आपकी पॉलिटिक्स क्या है, कॉमरेड?

१७ फरवरी २००९ मंगलवार को The Hindu में एक कोने में सिंगल कॉलम खबर पढ़ी कि सीपीआईएम ने सिक्किम में बीजेपी से हाथ मिला लिया है. खबर चूंकि The Hindu में थी सो यह कहकर इसे उड़ा देना मुमकिन नहीं था कि यह दक्षिणपंथी मीडिया की शरारत है. खबर का टेक्स्ट इस तरह है-

CONGRESS, BJP, CPI(M) join hands in Sikkim

GANGTOK: Seting aside ideological differences, the CONGRESS, the BJP and the CPI(M) joined hands in Sikkim to fight Chief Minister Pawan Kumar Chamling`s Sikkim Democratic Front in the Assembly elections to be held later this year.
The alliance between the three national parties and two regional parties - Sikkim Himali Rajya Parishad Party and Sikkim Gorkha Prajatantrik Party - has been named the united Democratic Front (UDF), according to K.N. Upreti, Congress leader and UDF chiefcordinator. Mr. Upreti told journalsts here that there would be a direct contest between the SDF and the UDF in all 32 seats.- PTI

जाहिर है कि यह खबर दिल-दिमाग में तूफ़ान मचाती रही. अगले दिन 18 फरवरी 2009 को The Hindu में ही फिर इसी साइज़ की खबर के शीर्षक पर नज़र पड़ी तो यह जानकर राहत मिली कि ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन यह राहत पलों में काफूर हो गयी. भीतर टेक्स्ट में जो था, आप भी पढ़िए-

CPI(M) not part of Sikkim alliance
Special Correpondent
-------
NEW DELHI : The communist Party of India (Marxist) on Tuesday denied that it is partof an alliance comprising the Congress and the Bhartiya Janta Party in Sikkim.
The CPI(M) was reacting to news reports from Gangtok that it has joined hands to fight Chief Minister Chamling`s Sikkim Democratic Front in the Assembly elections to be held later this year.
''The person who attended the meeting, where the decision was announced the views of the Sikkim committii of the party,'' the Polit Bureau said in a statement.

दिल्ली में बैठा पोलित ब्यूरो यह नहीं कह पा रहा कि खबर मनघडंत है, वो गोलमोल सफाई भर दे पा रहा है. वो कह रहा है कि जिस मीटिंग में निर्णय हुआ (गठबंधन का), उसमें जो शख्स उपस्थित था (सीपीआईएम का), वह पार्टी की सिक्किम इकाई की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता. यानी पोलित ब्यूरो मान रहा है कि गठबंधन का निर्णय बाकायदा सीपीआईएम नेता की मौजूदगी में बैठक में हुआ. शायद किरकिरी के बाद आनन-फानन में दिल्ली से सफाई दी गयी. तो क्या यह सब दिल्ली के इशारे पर ही हुआ था? अगर नहीं तो उस बैठक में जाने वाले नेता (वो कौन था, क्या सिक्किम पार्टी सेक्रेट्री?) के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? वैसे भी पोलित ब्यूरो का काम आजकल शायद राज्यों में पथभ्रमित (या कम्युनिज़म से उलटी राह पकड़ने वाले) नेताओं (बुद्धदेव या पिनारय विजयन जैसे) को जेनुइन ठहराना ही हो गया है.अब कोई प्रकाश करात से पूछे कि `आपकी पॉलिटिक्स क्या है, कॉमरेड?`

Sunday, February 15, 2009

जय श्री राम



ये फोटो राउरकेला का है जहाँ १४ फरवरी को कुछ बजरंगी गुंडे (पुलिस की मौजूदगी में) एक प्रेमी जोड़े को राखी बाँधने पर मजबूर कर रहे हैं। वैसे मौजूद बजरंगबली भी हैं पर फोटो में उनके कच्छा और टांगें ही (पूँछ भी) नज़र आ रही हैंै।
माइथोलजी के मुताबिक बजरंग बली तब की श्री राम सेना के प्रमुख सेनापति थे ै। कहते हैं कि लंगोट का पक्का रहने की ठान ली थी पर आखिरकार एक मछली के बेटे के बाप बन गए थे। आज की श्री राम सेना के कुंठा के मारे बजरंगी इन दिनों ऐसे कारनामे कर रहे हैं।
(फोटो द हिन्दू से)

Wednesday, January 28, 2009

घेरेबंदी...इस बार पूरी कविता


इससे पहले इस कविता का एक अंश पोस्ट किया था। अब ये पूरी कविता आपके सामने है, कविता लंबी है, लेकिन एक बार पढ़ना शुरू करें तो फिर अंत पर ही सांस ठहरती है। फिलिस्तीन पर हमले पर महान कवि महमूद दरवेश की यह कविता 'घेरेबंदी' 2002 में लिखी गई थी जब वे रामल्ला में खुद भी इज़राइली सेनाओं से घिरे हुए थे। उस घिराव की गवाही देती हुई ये लंबी कविता फिलस्तीनी ज़िंदगी की ही तरह यातना, हिंसा, कत्लोगारत, गोलीबारी, विलाप, हताशा के वर्तमान और कोमलता, ख़ुशी, प्रेम, इंसानियत और भविष्य की कल्पना का एक कटा-फटा, छितरा और छलनी हुआ कोलाज है। हिंदी के वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल का ये अनुवाद अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित है।

वक़्त है मेहरबान
जब इन पहाड़ी ढलानों पर होती है शाम
तहस-नहस इन बाग़ीचों में जिनके साये भी छिन गये
हम करते हैं क़ैदियों सरीखा काम
करते हैं बेरोज़गारों सरीखा काम
हम बोते हैं उम्मीद
*

अपनी सुबह का सामना करने को तैयार इस धरती पर
हम बने और भी मूर्ख,
जब भी हमने अपनी जीत की आंख से मिलायी आंख
धमाकों से दमकती हमारी लंबी रातों में नहीं है कोई रात
जागते हैं देर रात तक हमारे दुश्मन
वे हमारी गुफाओं की काली अंधेरी खंदकों को
आग लगाकर करते हैं रोशन
*

यहां जोब1 की शायरी का संसार
इसके बाद अब क्या किसका इंतज़ार
*

यहां मिट चुका है 'मैं'
यहां आदम याद करता है उस मिट्टी को
जिससे पैदा हुआ था वह
*

घेरेबंदी जारी रहेगी तब तक
हम अपने दुश्मनो को अपनी बेहतरीन शायरी
नहीं सिखा पायेंगे जब तक
*

दिन चढ़ते तक सीसे जैसा है आसमान
रात को वह धधक उठता लपटों में
और यहां हमारे दिल हैं गोया क़रीने से सजे हुए गुलाब
*

यहां, घेरेबंदी के बीच ज़िंदगी देती है वक़्त का साथ
उसकी शुरुआत को याद करने
और उसके ख़त्म होने को भूलने के बीच
*

ज़िंदगी- चाहे जी गयी हो भरपूर या हो चुकी हो बर्बाद
अब भी पड़ोस के सितारों को देती है पनाह,
अब भी बटोरती है दूर, पनाह लेने जाते हुए बादलों को
मगर यहां तो ज़िंदगी पूछती है सवाल:
उसे फिर से ज़िंदा करें किस तरह?
*

वह कहता है मौत के कगार पर:

कुछ नहीं खोने के लिए मेरे पास-
मैं हूं आज़ाद, आख़िरी आज़ादी के बहुत पास,
तक़दीर है मेरी मेरे हाथ
मैं अपनी ज़िंदगी को पैदा करूंगा जल्द-
आज़ाद ही जन्मा मैं, न कोई मां न कोई बाप,
मैं आसमानी नीले हरुफ़ों में लिखूंगा अपना नाम
*

यहां धुएं का हार पहने हुए पहाड़ियों के नीचे,
घर की दहलीज़ पर,
वक़्त के लिए नहीं बचा है वक़्त
तब क्या करते हैं हम-
वही जो करते हैं अपने सायों से बेदख़ल लोग
हम भूलते हैं अपना दर्द
*

दर्द यानी एक बीवी जो धुले हुए कपड़े बाहर नहीं फैला सकती
सूखने के लिए,
जिसे कुछ नहीं सूझता एक बेदाग़ परचम फैलाने के सिवा
*

यहां होमर2 की कोई गूंज नहीं
हम जब चाहते हैं दस्तक देते चले आते हैं मिथक दरवाज़े पर
यहां होमरनुमा कुछ भी नहीं है
हर कोई लाशों को खोदने में लगा है
गहरे सोये हुए एक मुल्क के मलबे से
जो धंसा है भविष्य के ट्रॉय के खंडहर में
*

फौज़ी मापते हैं हमारे वजूद
और ला-वजूद के बीच की जगह
टैंक की दूरबीन पर बने निशान से
*

हम मापते हैं अपने और गोलीबारी के
बीच की जगह
सिर्फ अपनी छठी हिस से
*

अरे, दहलीज़ तक आये हुए तुम-भीतर आओ,
और अरबी काफ़ी पियो हमारे साथ,
तब शायद तुम महसूस करो हमारी तरह तुम भी हो इंसान,
वहां दहलीज़ पर आये हुए तुम-
हमारी सुबहों से बाहर चले जाओ,
तब शायद हम महसूस करें तुम्हारी तरह हम भी हैं इंसान
*

हमें चाहिए वक़्त आराम के लिए, अपनी कला के लिए,
ताश खेलने के लिए, अख़बार पढ़ने के लिए-
हमें सहलाने चाहिए कल की ख़बरों में दर्ज अपने घाव,
हमें देखनी चाहिए अपनी-अपनी राशियां
सब दो हज़ार दो के साल में
-कैमरा उन पर चमकेगा जो पैदा हुए हैं
घेरेबंदी की राशि में
*

जब कभी झांकता है बीता हुआ कल,
मैं कहता हूं- अभी नहीं जाओ,
और आना आनेवाले कल
*

एक तंज़निगार ने मुझसे यों कहा:
'अगर शुरू में ही मुझे इस दास्तान के ख़ात्मे का पता होता,
तो मैंने एक लफ्ज़ भी कभी न लिखा होता'
*

हरेक मौत,
भले ही वह रही हो तयशुदा,
एक पहली मौत है हमेशा
आख़िर कैसे मान लूं कि एक-एक चांद
सो रहा है एक-एक पत्थर के नीचे
*

बेकार ही धुनता हूं मैं अपना सर
मुझ सरीखा कोई
सामने की पहाड़ियों में तीन हज़ार साल से
ख़ाक छानता हुआ
क्या खोजकर लायेगा ऐसे मौक़े पर?
यह ख़्याल ही एक तकलीफ़ है-
मगर यह मेरी याद्दाश्त को करता है कुछ तेज़
*

जहाज़ जब उड़कर चले जाते हैं
तब उड़कर वापस आते हैं कबूतर-
खड़िये जैसे सफ़ेद कबूतर,
अपने बेरोक परों से आसमान को
धोते-पोंछते हुए,
रोशनी पर फिर से हक़ जमाते हुए,
आज़ाद बहती ख़ुशनुमा हवा को फिर से संजोते हुए,
ऊंची और ऊंची उड़ान भरते हुए,
कपास जैसे कबूतर
'काश, अगर वह आसमान वाक़ई ऐसा होता',
एक आदमी ने कहा मुझसे मेरे घर के क़रीब गुज़रते हुए
दो धमाकों के बीच
*


जन्नत में लगी हुई आग, मेरा जलता हुआ दिमाग़,
और आसमान से गिरती बिजलियां
क्या फ़र्क़ है इसके बीच?
मैं जान लूंगा जल्द ही अगर यह कविता हो उठी ज़िंदा
-मेरे दोस्त जान लेंगे जल्द अगर कवि हो गया ख़त्म

आलोचक से:

मेरे लफ़्ज़ मत मापो कॉफी के चम्मचों से
उन्हें मत टांगो पिन चुभोकर छटपटाते हुए दीवाल पर
रात में लफ़्ज़ घेर डाल देते हैं मुझ पर
मुझे लिखते हैं वे लफ्ज़ जो मैंने कभी कहे नहीं
फिर मुझे नींद के बीच भटकता हुआ छोड़ देते हैं
कठोर तलछटों तक, मेरे सपनों के कटे-फटे आख़िरी छोर
*

फौज़ियों के पीछे शाहबलूत के पेड़
मीनारों की मानिंद आसमान को देते हैं टेक
फ़ौज़ी पेशाब करते हैं तारों की बाड़ के पीछे
एक टैंक तैनात है उनकी हिफ़ाजत में
शरद की मुकम्मल दुपहर
अपना सुनहरा चक्कर लगाती है सड़कों पर
जो ख़ामोश हैं किसी गिरजाघर की तरह
इतवार की इबादत के बाद
*

अपनी सुबह के लिए तैयार होती इस धरती पर
कोई विवाद नहीं होगा
मरे हुओं की क़ब्रों की बाबत-
यहां हर इंसान है बराबर-
घास रोपी जायेगी सब जगह बराबर
ताकि हम एक सी लय में चल सकें साथ-साथ
*

हमें प्यार है अगले कल से
और जब वह आयेगा
हम ज़िंदगी से करेंगे प्यार जैसी भी हो वह-
सीधी-सपाट या पेचीदा,
सुस्त या रंगों से भरपूर
नहीं चाहिए पुनर्जन्म,
बीत चुका है फ़ैसले का दिन
और तब हमारे जश्न
करेंगे देहों और दिलों को रोशन
एक बार ख़ुसी का काटा हुआ हिचकता नहीं दूसरी बार
*

एक क़ातिल से

तुमने ज़रा अपने शिकार की आंख से मिलायी होती आंख,
शायद तुम्हें याद आती गैस चैंबर में अपनी मां,
शायद अपना इरादा बदल देते तुम
और भूल जाते बंदूक का इंसाफ़
इसके सिवा और क्या है अपने वजूद को पाने का उपाय
*

दूसरे क़ातिल से

अगर तुम उस अजन्मे बच्चे को रहने देते
तीस और दिनों तक मां के पेट में,
ज़रा सोचो, तब क्या होता
क़ब्ज़ा ख़त्म हो जाता, वह बच्चा
घेरेबंदी को याद भी न करता,
तंदरुस्त और मज़बूत पलता-बढ़ता
कॉलेज में पढ़ता एशिया का प्राचीन इतिहास
तुम्हारी ही बेटियों में से किसी के साथ,
मुमकिन था वे आपस में करते प्यार,
उनकी एक नन्ही सी बेटी होती, जन्म से यहूदिन
देखो, यह तुमने क्या कर दिया
अपनी ही बेटी को बना दिया विधवा,
अपनी बेटी को कर दिया अनाथ
देखो तुमने कैसे अपने आनेवाले कुनबे को किया तबाह
देखो तुमने कैसे मार डाला तीन परिंदों को एक ही गोली से
*

फ़ालतू हैं सब तुक-तान
जब छिड़ते ही न हों सुर
और दर्द हो बेहिसाब
*

कितनी मोटी घनी काली बारूद
एक अंधेरा जिसे सिर्फ़ नारंगियां छील सकती हैं
या फिर कोई होनहार औरत
*

तनहाई से लबालब
हम पियेंगे अकेलेपन के जाम तलछटों तक-
जब तक वह इंद्रधनुष न उतर आये ज़मीन पर
*

अगर- अभले ही दूर से, भले ही कुछ लम्हों के लिए-
हम उछल पड़ते हैं ख़ुशी से
तो क्या हम किसी को चोट पहुंचाते हैं,
किसी मुलक का
होता है इससे नुकसान?
*

घेरबंदी खड़ी है,
जैसे कोई सीढ़ी खड़ी हो आंधी के सामने
*

हमारे बिरादर हैं इन पहाड़ियों पर
नेक बिरादर जो तहे दिल से हमें करते हैं प्यार,
हमें देखते हैं और रोते हैं,
गुपचुप कहते हैं खुद से-
अगर हम भी गिरे हुए होते तो हम...तो हम...
-मगर फिर वे चुप हो जाते हैं, रोते हैं-
हमें अकेले मत छोड़ो मेहरबान,
हमें छोड़ मत दो मेहरबाहन-
*

क़बीले अब साइरस से मिलने नहीं जाते,
न सीज़र की ख़िदमत करते हैं
न खलीफ़ाओं से झगड़ते हैं
इन दिनों ये सब चलता है एक ही कुनबे के भीतर
आधुनिकता पर फ़िदा एक कुनबा
जिसने अपने तमाम ऊंट बेचकर खरीद लिया है एक जेट जहाज़
*

किसी को पुचकारता हूं मैं अपनी तनहाई में
दुनिया की निगाह में मर चुके लोगों को जगाने के लिए नहीं,
सिर्फ़ इस क़ैदे-तनहाई से खुद को बाहर धकेलने के लिए
*

मैं आखिरी हूं उन शायरों में
जो दुश्मनों की परेशानी से ख़ुद होते हैं परेशान
शायद इतनी छोटी है दुनिया
कि उसमें समा नहीं पाते मार तमाम लोग
और उनके ख़ुदा तमाम
*

इतिहास जमा होता है हमारे भीतर एक जगह
अच्छा इतिहास, ख़राब इतिहास, कई क़िस्म का इतिहास
इतने सारे पापों के बग़ैर
कुछ छोटी हो सकती थी बाइबिल
इतने सारे बहकावों के बग़ैर
और भी तेज़ी से पूरा होता
निजात की राह पर पैग़ंबरों का सफ़र
अबद को करने दो अपना कारोबार
मैं कहता रहूंगा परछाइयों से यह बात

*
अगर इस जगह के इतिहास में इतनी भीड़ न होती
पोपलार पर हमारे गीत दूर-दूर तक होते मशहूर
*

हमारे रोज़मर्रा के विनाश का यह है हिसाब
दो से आठ लोग हुए क़त्ल
दस और घायल
बीस पर नेस्तनाबूत
पचास पेड़ जैतून तहस-नहस
और न भूलें कि यह पूरी तरह इसी तरह है बर्बाद
कविता, नाटक और अधूरी तस्वीर को छिपाती हुई
*

हम सुराहियों में बंद कर देते हैं अपनी तकलीफ़
ताकि फौज़ी इसे काम में न ला सकें
घेरेबंदी का जाम उठाने के लिए,
हम उसे छिपा देते हैं बुरे वक़्त के लिए
उस वक़्त के लिए एक धरोहर
जब ऐसा कुछ होगा जिसका गुमान भी न हो
जब ज़िंदगी पटरी पर लौट आयेगी
हम सब की तरह मनायेंगे मातम,
रोयेंगे अपनी-अपनी बदबख़्तियों पर
उन चीज़ों पर जो सुर्ख़ियों में आने से रह गयीं
कल जब रफ़ू कर दी जायेगी हर चीज़
तब आख़ीर में खुल पड़ेंगे धीरे-धीरे हमारे घाव
*

ज़िला वतनी की रोशनी से भरी एक गली में
हवाओं के चौराहे पर तनी है एक क़नात
दक्खिन से कभी नहीं बहती हवा
पूरब एक पच्छिम है सूफी अंदाज़ में डूबा हुआ
पश्चिम फेंकता है एक हत्यारा जंगबंदी
अमन के सिक्के ढालता हुआ
दूर हवाओं के उत्तरी मुकाम की बात करें
तो वहां ख़ुदाई है आपसी बातचीत में मशगूल,
हवाओं को अपनी दिशाओं से भटकाती हुई
*

वह उससे कहता है-
मेरा इंतज़ार करना, नरक के कगार पर
वह उससे कहती है-हां, आ जाओ- मैं ही हूं नरक
*

एक औरत ने एक बादल से कहा-
मेहरबानी करके छिपा लो मेरे प्यार को
मेरे कपड़े तो भीगे हैं उसके ख़ून से
*

अगर तुम बारिश न बन सको,
मेरे लाल
तो एक पेड़ बनना
एक पेड़ ख़ूब हरा-भरा, बनना एक पेड़
और अगर तुम पेड़ न बन सको, मेरे लाल,
तो एक चट्टान बनना
एक चट्टान ओस से भीगी हुई बनना एक चट्टान
और अगर तुम चट्टान न बन सको, मेरे लाल
तो चांद बनना,एक चांद
प्रेमी जिसका ख़्वाब देखें,बनना एक चट्टान
यह कहा मां ने अपने बेटे से
उसे दफ़नाये जाने के वक़्त
*

रात से
तुम जितना भी ग़ैरजानिब होने का दावा करो,
सबके लिए एक जैसा है तुम्हारा सब कुछ
ख्वाब देखनेवालों के लिए
और उनके ख़्वाब क़ैद करने वाले
पहरेदारों के लिए
कुछ नहीं बचा है एक टूटे हुए चांद के सिवा
ख़ून कभी बदल नहीं पायेगा तुम्हारी कमीज़ का रंग
*

क़त्ल हुए एक बेटे के बाप को
ढाढ़स बंदाते हुए कहते हैं हम-
उसे जन्नत में जगह मिलेगी,वग़ैरह
कुछ ही देर बाद, हम उसे देते हैं बधाई
अभी-अभी पैदा हुए उसके बच्चे की खातिर
*

मौत से

हम पहचानते हैं उस टैंक को जिसने तुम्हें भेजा है
हम जानते हैं तुम ठीक ठीक क्या चाहती हो
तो जहां से आयी हो वहीं वापस जाओ
सिर्फ़ शादी की एक अंगूठी कम होगी तुम्हारे पास,
फ़ौजियो से कहा माफ़ करें,
अफ़सरों से कहो माफ़ करें,
उससे कहो कि नये शादीशुदा जोड़े ने
तुम्हें देख लिया था जब तुम उन्हें देख रही थीं
तुम घबरा गयीं
फिर अकेली दुल्हन को वापस घर पहुंचा आयीं- रोती हुई
*

या ख़ुदा, मेरे ख़ुदा,
तुमने मुझे क्यों छोड़ दिया
मैं तो बच्चा ही हूं अभी
मेरी परख होनी बाक़ी है अभी
*

मां ने कहा-

मुझे पता नहीं चला कि वह अपने ख़ून में भीगा हुआ है
मुझे पता नहीं चला कि फ़र्श पर ख़ून बिखरा है
वह दीवार से टिककर खड़ा था बनूना की पत्तियों की चाय पी रहा था
बता रहा था उसे क्या करना है कल

मौत से

हम पहचानते हैं उस टैंक को जिसने तुम्हें भेजा है
हम जानते हैं तुम ठीक ठीक क्या चाहती हो
तो जहां से आयी हो वहीं वापस जाओ
सिर्फ़ शादी की एक अंगूठी कम होगी तुम्हारे पास,
फ़ौजियो से कहा माफ़ करें,
अफ़सरों से कहो माफ़ करें,
उससे कहो कि नये शादीशुदा जोड़े ने
तुम्हें देख लिया था जब तुम उन्हें देख रही थीं
तुम घबरा गयीं
फिर अकेली दुल्हन को वापस घर पहुंचा आयीं- रोती हुई

मां ने कहा-
पहले तो मैं समझी ही नहीं क्या है यह मामला
उन्होंने मुझसे कहा- उसने अभी-अभी ब्याह कर लिया है
मैं ख़ुशी के मारे बिलखने लगी
मैं रातभर नाचती रही
जब सब चले गये और रह गयी बस फूलों की सजावट
तब मैंने पूछा कहां हैं दूल्हा-दुल्हन
किसी ने कहा , वे जन्नत में हैं,
दो फ़रिश्ते जिन्होंने अभी-अभी एक दूजे की क़सम खायी है
मैं फिर बिलखने लगी,
नाचते-नाचते अपंग हो गयी
और फटी हुई आवाज़ में गाती रही
बोलो, मेरे बेटे,
कब ख़त्म होगी यह सुहागरात

*
घेरेबंदी चलती रहेगी तब तक
जब तक घिरे हुए लोगों की ही तरह
घेरा डालनेवालों को भी यह पता नहीं चलेगा
कि ऊबना भी इंसान होना है आख़िर
*

तुम जागते हो देर रात तक
क्या तुम आजिज़ नहीं आ गये
हमें आपस में नमक बांटते हुए देखकर
क्या तुमने बहुत ज्यादा गुलाब नहीं देख लिए
हमारे ज़ख़्मों से फूटते हुए
क्या तुम बुरी तरह थके नहीं
रात भर पहरे पर तुम,
क्या तुमने खाना नहीं खाया अभी तक
*

हम यहां खड़े हैं, हम यहां बैठे हैं, हम यहां हैं, हमेशा हैं
ज़िंदगी का मक़सद है एक, सिर्फ होना
इसके सिवा हर चीज़ पर है हमारी मुख़्तलिफ राय
मसलन, क़ौमी झंडा
(मेरे लोगो, बेहतर होगा तुम गधे को बना लो अपना निशान)
या पिर क़ौमी तराने के अल्फाज़
(बेहतर होगा अगर तुम प्रेम करते दो कबूतरों का गीत गाओ),
या औरतों की हैसियत
(बेहतर होगा एक औरत को सौंप दो हिफ़ाजत का जिम्मा)
फीसद के सवाल पर भी हमारा नहीं है इत्तेफ़ाक़
और सब कुछ पर हैं असहमत
लेकिन इस बात पर हम सब एक हैं-
सिर्फ होना
जिसके बाद
वक़्त ही वक़्त होगा
आपसी झगड़ों का मज़ा लेने के लिए
*

धरती की गहराई में
अधूरी क्रिया
अपने जोड़े बनाती रहेगी
इस वाक्य के पूरा होने तक
*

जेल जाते हुए उसने मुझे कहा
जब मैं छूटकर आऊंगा तो यही पता चलेगा
कि अपने मुल्क की तारीफ करना अपने मुल्क पर लानत भेजने की तरह है,
दूसरे किसी काम जैसा ही काम
*

अपनी सुबह के लिए तैयार होती इस धरती पर चलो,
अपने घोड़ी की ज़ीन कसो
दूर-दराज़ पहाड़ों को लांघों
पर उन पर चढ़ते हुए ख़्याल रखो
तुम्हें पकड़ते हैं अपने ख़्वाब
फिर कुछ देर कर सकते हो आराम
अगर आसमान तुम्हें नीचे उतार दे
आहिस्ता हिलते किसी पत्थर पर
*

मैं कैसे रहूं अपनी आज़ादी के साथ
क्या मेरी आज़ादी रह सकेगी मेरे साथ
हम शादी करेंगे तो रहेंगे कहां
और क्या कहूंगा मैं उससे सुबह-सुबह
क्या तुम्हें नींद आयी मेरी बग़ल में सोते हुए
क्या तुम्हें ख़्वाब में दिखे जन्नत के मैदान
ख़्वाब में तुमने जो कुछ किया क्या वह तुम्हें अच्छा लगा
और क्या तुम बिस्तर पर दाहिनी तरफ जातीं
क्या तुम चाय पीना चाहोगी
या क्रीमवाली कॉफ़ी
तुम्हें फलों का रस पसंद है या चुंबन
(मैं अपनी आज़ादी को किस तरह करूं आज़ाद)
ऐ अजीब औरत
शायद मैं ही नहीं हूं तुम्हारे लायक
मेहरबानी करके सो जाओ आराम से मेरे बिस्तर पर
छोड़ दो कोई संकोच-हिचक
गुलाब की पंखुडी दर पंखुड़ी मुझे उड़ा दो
मेरी प्यारी आज़ादी
मुझे ज़रा ठीक से देखने को अपनी मुस्कान
ले चलो मुझे सारी रुहानियत के पार
जहां एक के भीतर दो समा जायें हम
मैं कैसे रहूं उसमें
वह कैसे रहे मुझमें
उसे अपने वश में कैसे रखूं
जब मैं ख़ुद ही रहता हूं उसके वश में
मैं कैसे रखूं अपनी आज़ादी को आज़ाद
ख़ुद को बिलकुल अकेला किये बग़ैर
*

अनंत नीलेपन की
एक बूंद ही काफी है
इस वक़्त को रोशनी में बदलने के लिए
इस जगह का तमाम मर्ज़ मिटाने के लिए
*

चलती रहेगी घेरेबंदी तब तक
हमारे डॉक्टर और पादरी तमाम
पेड़ों के जर्राह नहीं बनेंगे जब तक
*

चलती रहेगी घेरेबंदी
और चलता रहेगा मेरे अलामती घिराव
जब तक नहीं पा लेता मैं दरवेशों सरीखा धीरज
मेरे आगे रो रहा है लिली का नन्हा फूल
मेरे पीछे रो रहा है लिली का नन्हा फूल
वक़्त निशानदेही करता है वक़्त की
उसे घरूती है गूंगी-डरी यह ज़मीन
*

मेरी रूह को चलने दो चुपचाप
बगल में आहिस्ता-आहिस्ता
मेरा हाथ थामे हुए, पुराने दोस्तों की तरह
चलो रोटी खायें साथ-साथ
जाम उठायें साथसाथ
चलों जायें अगल-बगल
जब तक ज़ुदा न हो जाये हमारी राह
मेरा रास्ता जाता है दुनिया से बाहर की तरफ़
जो कि रूह पालथी मारे बैठी रहती है
सबसे ऊंचे एक कंगूरे पर
*

एक कवि से

जब ग़ैर मौजदूगी छोड़ दे तुम्हें
तो सुकून पाओ तनहाई का
बनो महरूमियत की रूह
ख़ुद ही बनो अपना क़सद
ग़ैर मौजूदगी है सबस मुमुम्मिल मौजूदगी
*

कविता से

अपनी घेरेबंदी को
करो घेरेबंद
*

गद्य से

जुटाओ किताबों के इल्म की सदियों के सभी सबूत
जुड़ो दबी-कुचली हक़ीकत से
गवाही दो धूल से उठकर भी
*

कविता और कहानी से 

उड़ो साथ-साथ अबाबील के परों की तरह
बसंत की मुनादी करते हुए
*

जैसे ही बीस सतरें लिखता हूं प्रेम की बाबत
आता है ख़्याल यह घेरेबंदी
चली गयी है बीस क़दम दूर
*

मज़ाक करने का वक़्त

फोन कभी बजता नहीं
दरवाज़े की घंटी कभी बजती नहीं
फिर तुम्हें कैसे पता चलता है कि नहीं हूं घर में
*

गीत गाने का वक़्त
करता हूं तुम्हारा इंतज़ार,
गोया कर नहीं सकता इंतज़ार
दोस्तोयेव्स्की नहीं पाया मुझे बांध
बर्दाश्त नहीं होती मारिया काला3सया उम्म कुल्दुम4 की आह
करता हूं तुम्हारा इंतज़ार
गोया नहीं कर सकता इंतज़ार
घड़ी की सुइयां मेरी घूम रहीं उलटी तरफ
उस वक़्त की जानिब जिसकी नहीं कोई जगह
करता हूं तुम्हारा इंतज़ार
गोया कर नहीं सकता इंतज़ार
इंतजा़र का अबद नहीं कर सकता इंतज़ार
*

वह पूछता है उससे-
क्या है तुम्हारा पसंदीदा फूल
वह कहती है उससे
कार्नेशन, काले कार्नेशन
वह पूछता है उससे
काले कार्नेशन के साथ कहां ले चलोगी मुझे तुम
वह कहती है उससे
अपने भीतर वहां वहां जहां रोशनी है
और वह फिर कहती है उससे
गहरे अपने भीतर... गहरे... और गहरे... और गहरे

*

ओ प्यार, ओ अज्ञात के परिंदे
चलो, क़ायनात के नीलेपन में छोड़ दें ख़ुद को
बस एक बार, भूल जायें हम ग़ैरमौजूदगी का बुख़ार
और तुम आज रात खाने पर क्यों नहीं चले आते इधर
मैं पकाऊंगा खाना
तुम तैयार कर सकते हो जाम और पसंदीदा संगीत चला सकते हो
धधकती हुई रूह के बारे में कोई आसान सी चीज़
अगर कोई कहे कि तुम एक राक्षस हो
तो यह सही है
अगर कोई कहे कि तुम एक बीमारी हो
तो यह सही है
मगर मैं देख सकता हूं तुम्हारे आरपार
देखो,तुम यहां मेरी रसोई में हो
चुपचाप लहसुन छीलते हो
और जब हम खाना खा लेंगे
तो तुम चुनो अपनी पसंद की कोई पुरानी रूमानी फ़िल्म
और मुझे बतलाओ आख़िर कैसे होता है यह
कि वहां वे दो प्रेमी कर दिये जाते हैं ख़त्म
*

घेरेबंदी ख़त्म होगी तो अगली सुबह
एक लड़की अपने प्रेमी से मिलने जायेगी
नीली जींस और फूलों के छापेवाली कमीज़ पहने हुए
मार्च में चेरी के पेड़ों की तरह ख़ुश और बेपरवाह
अब यह हमारा वक़्त है, मेरे प्यार, यह समूचा वक़्त
इसलिए देर मत करो, आओ
इससे पहले कि काला कौआ मेरे कंधे पर उतर आये
आओ, इससे पहले कि सेब खा लिया जाये
प्रेमी का इंतज़ार करती वह करती है उम्मीद का इंतज़ार
और मुमकिन है वह कभी, कभी भी लौटकर आये नहीं
*

या तो वह या मैं
ऐसे शुरू होती है जंग
और ख़त्म होती है एक साथ उसके और मेरे
दर्दनाक एहसास पर
*

मैं हर हमेश होऊंगा उसके साथ
ऐसे शुरू होती है मुहब्बत
और ख़त्म होती है उसके और मेरे
दर्दनाक बिछोह पर
मुझे तुमसे न मुहब्बत है न नफ़रत
क़ैदी ने कहा ज़िरह करनेवाले से
मेरा दिल है उससे लबालब जिसका तुमसे नहीं कोई मतलब
मेरा दिल है दानिशमंद की ख़ुशबू से भरपूर
मेरा दिल है मासूम रोशन और लबालब
तुम्हारे सवालों के लिए नहीं है उसमें कोई जगह
देखो, तुम ज़रा भी मेरी तरह नहीं
तुम कौन हो जो मेरे क़रीब होना चाहते हो
क्या मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हो तुम
क्या तुम शाम की चाय हो सुरीली बजाती कोई बांसुरी
कोई गीत हो मेरी पसंद का
होगी इस क़ैद से मुझे नफ़रत, मगर तुमसे नहीं है नफ़रत
कहा क़ैदी ने ज़िरह करने वाले से
मेरा दिल है दानिशमंद की ख़ुशबू से भरपूर
मेरा दिल है मासूम रोशन और लबालब
तुम्हारे सवालों के लिए नहीं है उसमें कोई जगह
देखो, तुम ज़रा भी मेरी तरह नहीं
तुम कौन हो जो मेरे क़रीब होना चाहते हो
क्या मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हो तुम
क्या तुम शाम की चाय हो या सुरीली बजती कोई बांसुरी
क्या गीत हो मेरी पसंद का
होगी इस  से मुझे नफ़रत
मगर तुमसे नहीं है नफ़रत
कहा क़ैदी ने जिरह करने वाले से
मेरे एहसासों से तुम्हें क्या सरोकार
मेरी अपनी रातें है मेरे एहसास
मेरी आज़ादी है मेरे एहसास
मेरे एहसास हैं बेतुके तर्क-वितर्क से आज़ाद
*

यह घेरेबंदी चलती रहेगी तब तक
ओलिंपस पर बैठे हुए देवता
फिर से इलियड नहीं लिखेंगे जब तक
*

एक बच्चे ने लिया है जनम
यहां मौत की गली में
ठीक एक बजे सुबह
*

एक बच्चा चार रंगों की पतंग से खेल रहा है
काला और सफ़ेद, हरा और लाल
फिर वह धमाके से फट पड़ता है सितारों के बीच
*

अपनी तक़दीर से मीलों दूर बैठे हैं हम
बनाते हैं घोंसले चिड़ियों की तरह
बुतों की दरारों में चिमनी की नलियों में,
या तंबुओं में जो तने हैं सड़क के किनारे
जहां से घुड़सवार राजकुमार जाता है शिकार खेलने
*

एक संतरी से
 
मैं तुम्हें सिखाऊंगा कैसे पहरा दिया जाये
टल चुकी एक मौत के दरवाज़े पर
चुपचाप बैठो
धीरज रखो
कुछ ही देर में तुम्हें ऊब होने लगेगी मुझसे
तुम अपना साया हटा लोगे मेरी पीठ से
और निकल भागोगे रात में ही
आख़िरकार मेरे साये से आज़ाद
*

दूसरे संतरी से

मैं तुम्हें सिखाऊंगा कैसे पहरा दिया जाये
एक कैफ़े के दरवाज़े से सटे हुए
अपने दिल की धड़कन को सुनो जब वह थमती है
फिर अचानक ज़ोरों से उछलती है
और तुम मारे फ़ के कांपते हो, मेरी ही तरह
शांत रहो
मेरे साथ-साथ मुंह से सीटी बजाते हुए निकालो एक उदास धुन
जोदूर अदालूसिया से आयी है बरास्ते फ़ारस
ऐसे ही चमेली की खुशबू तोड़ देगी तुम्हारा दिल
और फिर तुम चल दोगे मुझे छोड़कर
*

तीसरे संतरी से

मैं तुम्हें सिखऊंगा कैसे पहरा दिया जाये
पत्थर की बेंच पर बैठकर
अगर हम आपस में नाम बदल देते तो तुम जानते
हम दोनों में एक जैसा है कितना कुछ
तुम्हारी शायद कोई मॉम होगी
मेरी भी अम्मी है एक,
एक जैसी बारिश में भीगते हैं हम
सपने में देखते हैं एक ही चांद
और एक मेज़ से थोड़ी ही दूरी पर बैठे हैं हम
*

सुबह हरे हो उठते हैं साये
और शेर लेटा हुआ है भेड़ के साथ
देखता है ख़्वाब, जैसे देखता हूं मैं, अपने सरपरस्त फ़रिश्ते की तरह
कि ज़िंदगी यहीं है और कहीं नहीं
*

एक मामूली ख़लल के बावजूद
मिथक टस से मस नहीं होंगे
जहाज़ चाहे धंस जायें
किसी बियावान में,
फैंटेसी और हक़ीक़त गडमड हो जायें
मगर हिलिंगे नहीं नक्शे
धरती पर बिछी हमारी हक़ीक़त
कुचल दी जाती है
तब भी सचाई नंगी चल पड़ेगी एक दिन
*

एक अधूरे पूरबवादी से

मान लें कि तुम सही कहते हो
मान लें मैं बेवकूफ हूं, मंदबुद्धि, नालायक़
मान लें मुझे गोल्फ़ खेलना कभी नहीं आयेगा
या सीख नहीं पाऊंगा ऊंची तकनीक
उड़ा नहीं पाऊंगा जहाज़
क्या इसी वजह से तुम कब्ज़ा करते मेरी ज़िंदगी पर
अगर मैं कोई और होता
अगर तुम कोई और होते
तो शायद हम हो सकते थे दोस्त
दोनों आपस में कहते कैसे अनाड़ी हैं हम
आखिर शायलॉक जैसे मूर्खों के भी होता है दिल
उन्हें भी चाहिए रोटी
उनकी आंखों में भी रहते हैं आंसू
*

घेरेबंदी के बीच
वक़्त एक जगह है
अपनी जगह पर
घेरेबंदी के बीच
जगह एक वक़्त है
वक़्त से बाहर
*

हर जगह की है अपनी एक ख़ुशबू
जब भी मुझे याद आता है अपना गांव
मेरे एहसासों में समा जाता है उसकी ख़ुशबू का दिल
दब उठता है फिर से घर लौटने का दर्द
*

धरती ऊंची हो या नीची
पाक हो या नापाक
ख़ूबियों-खराबियों पर सोचना है बेकार
एक रोज़ शायद खुलेंगे सातों आसमान
और फैल जायेंगे एक नक्शे में
*

शिकार झिंझोड़ता है मुझे
कहता हुआ रोज़ ब रोज़
तुम थे कहां
जो एक दफा तुमने दिये थे हमें
उन लफ़्जों को भेज दो वापस शब्दकोशों में
उनकी सद ख़लल पैदा करती है
यहां सोचे हुओं के ख़्वाब में
*

शिकार कहता है मुझसे
 
मुझे ज़रा भी परवाह नहीं रही
कुंवारी हूरों से भरपूर जन्नत की
या अमरता के सुकून की
धरती पर मैंने प्यार किया ज़िंदगी से
अंजीर के पेड़ों और चीड़ के पेड़ों के बीच
मगर मुझ से छीन ली गयी वह जन्नत
तब भी मैंन उसे पाने की कोशिश करता रहा
अपनी रग़ों में ख़ून की आख़िरी बूंद तक
*

शिकार सिखाता है मुझे
कला मुमकिन नहीं है
मेरी आज़ादी के बग़ैर
*

शिकार चेतावनी देता है मुझे
मुझे दफ़नाने के वक्त उनके विलाप पर मत करना यक़ीन
बल्कि देखना मेरे अब्बा की तरफ़
जब वे सीने से मेरी तस्वीर सटाये हुए सिसक रहे हों
तुमने मेरी जगह क्यों ले ली, मेरे लाल
पहले मुझे जाना था मुझे जाना चाहिए था पहले
*

शिकार कहता है

कुछ नहीं बदला नहीं
सिर्फ़ मेरा घर बदल गया है
और मेरा पुराना फर्नीचर
अब एक हिरन सिमटा हुआ सोता है मेरे बिस्तर पर
और मेरी उंगली पर उतरा आधा चांद
देता है मुझे सुकून
*

शिकार कहता है

तुम अगर मेरे दोस्त नहीं हो
तो मत आना मेरे कफन-दफन के वक़्त
मुझे मंज़ूर नहीं चापलूसी की तकरीर
*

घेरेबंदी और कसती जायेगी
जब तक हम यह मंजूर नहीं कर लेते
इस ग़लीज़ गुलामी में कितनी ख़ूबियां हैं-
और उसे चुनने की आज़ादी भी है, पूरी तरह
*

जूझने का मतलब है यह देखना
कि तुम्हारा दिल और तुम्हारे अंडकोष अब भी धड़क रहे हैं
और तुम्हारे भीतर ज़िंदा है वह पुराना मर्ज़
जिसे कहते हैं उम्मीद
*

जो कछ बचा-खुचा है सुबह का
वहां मैं टहलता हूं अपने शरीर से बाहर
जो कुछ बचा-खुचा है रात का
वहां मेरे ही क़दमों की आहट सुनाई देती है मेरे भीतर
*

मुहब्बत अगर पड़ेगी बीमार
तो उसे लतीफ़ों से हंसाकर करूंगा ठीक
मुहब्बत अगर पड़ेगी बीमार तो गीत से करूंगा उसे ठीक
यह जतलाये बगैर कि उसे गा रहा है कौन
*

मैं था एक गायक
घेरेबंदी ने तब्दील कर दिया मुझे
वायलिन के छठे तार में
*

एक पाठक से

शायरी पर यक़ीन मत करो-
वह है लावज़ूद की एक सच्ची दास्तान
न कोई सनक है न कोई तसव्वुर
है फ़क़त एक ख़ात्मे का एहसास
*

लेखन एक पालतू कुत्ता है
जब भी वह कुछ ख़त्म होता है वह भूंकता है
लेखन कर सकता है घायल
मगर ख़ून निकालने में नहीं रखता यक़ीन
*
मेरी विदाई की तैयारी कर रहे हैं मेरे दोस्त
बांज के दरख़्त की छांह में एक आरामदेह क़ब्र
और संगमरमर से तराशा हुआ क़ब्र का पत्थर अबद तक
मगर मैं हूं कि जनाज़ों में पहुंचता हूं सबसे पहले
हैरत में डूबा मुझसे पहले रुख़सत हुआ मेरा कौन दोस्त
*

क़त्ल हुई औरत क़त्ल हुई एक औरत की बेटी है
क़त्ल हुए एक आदमी की पोती
क़त्ल हुए एक लड़के की बहन
क़त्ल हुई एक लड़की की चाची
एक दादी अम्मा की बहू जिसके बेटे का क़्तल हुआ
(जो रिश्ते में एक दूसरी क़त्ल हुई औरत की पोती है),
और एक मृतक के चाचा की एकदम पड़ोसी...
मगर पश्चिम की दुनिया इस पर है ख़ामोश
दरिंदगी रही भी और चली गयी
चल रही है बेहतर ज़िंदगी
कोई नहीं है- वह औरत
और सचाई इस शिकार की ही तरह आपस में जुड़ी हुई है आख़िरकार
*

ख़ामोश बराय मेहरबानी ख़ामोश
फ़ौजियों को सुनाते हैं वे गीत
जिन्हें शिकार सुन रहे थे मारे जाने के वक़्त
और जो अब भी उतने ही ताज़ा हैं
जितना उनकी सांसों में कॉफी के आख़िरी प्याले का स्वाद
*

जंगबंदी जंगबंदी तो ज़रा देखें क्या यह सच है
कि जंगी जहाज़ को तोड़कर हम बना लें हल के फाल
हमने जंगबंदी की गुज़ारिश की थी- उसकी नीयत भांपने के लिए
सिर्फ़ यह देखने के लिए
कि हमारे भीतर सचमुच लौट सकता है अमन-चैन
कि हम अपनी शायरी से ही एक बारगी जीत सकते हैं जंग
मगर उन्होंने कहा- क्या तुम्हें नहीं पता ख़ुद से ही
शुरू होती है अमन की हल
क्या होगा अगर हमारी ऊंची दीवारों को ढहा दे तुम्हारा संगीत
और हमने कहा- हां, इसमें क्या ग़लत है, और क्यों न हो ऐसा
*

हमारी ताज़ा कॉफी, शोर मचाती गौरैया,
पेड़ों के घने पत्तों की छांह में नहाती घास,
हिरन की मानिंद दीवारों पर उछलकूद करती धूप
बचे खुचे हमारे आसमान में तेज़ उड़ते बादल
और भी बहुत कुछ जो हमारी याद है और हमारा प्यार है
मगर वसंत की इस चमकती हुई सुबह भी
जिसमें भूलने के लिए हम किये गये हैं मजबूर
ऐसी छोटी नियामतें ही ज़िंदगी को बनाती हैं जीने के लायक़
*

अपनी सुबह के लिये तैयार होती धरती पर
कुछ ही देर में
सितारे सो जायेंगे शायरी की तर्ज़ पर
हम इस मुश्किल रास्ते को अलविदा कहेंगे
और पूछेंगे- अब चलें किधर

कुछ ही देर में
हम पहाड़ों की नरगिस के जवान फूलों से कहेंगे
तुम मुरझा जाओगे जब हमारी नौजवान औरतें गुजरेंगी उधर
*

मैं उठाता हूं जाम
उनके नाम जो मेरी तरह देखते हैं
एक तितली के ख़ुशनुमा सात रंग
ख़त्म न होनेवाली रात की इस सुरंग़ में
*

मैं उठाता हूं जाम
उसके नाम जो मेरे साथ उठाता है जाम
इस घनी स्याह रात में
इतनी घनी रात कि एक दूसरे को देखना भी मुहाल
उठाता हूं जाम अपने साये के नाम
*

अमन क्या है उस तरफ के एक सफ़री के लिए
बस, इक मुसाफ़िर को सुनना खुद से कहते हुए

अमन कुछ नहीं एक आवाज़ है कबूतर की उड़ते हुए
दो अजनबी खड़े हैं साथ-साथ जिसको सुनते हुए
*

अमन दो दुश्मनों की एक चाहत है
कि ख़ुद में ही क़ैद वे मर जायें ऊब कर
*

अमन दो प्रेमियों का नाम है
जो तैरते हैं चांदनी की झील पर
*

अमन एक माफ़ीनामा है
कमज़ोर के नाम ताक़तवर का
जो करता हो मंज़ूर
कि ताक़तवर है वह जिसके दिल में भरे हों ख़्वाब
अमन का मतलब है
ख़ूबसूरती के क़दमों में रख देना सारे हथियार-
ओस में भीगता हुआ लोहा जंग खाता है आख़िरकार
*

अमन का मतलब है इस बात का खरा-सच्चा इक़बाल
क्या किया गया क़त्ल हुए इंसान के साये का हाल
*

अमन का मतलब है फिर से अपने बाग़ीचों में होना
और फिर से अपनी पसंद की फ़सलों को बोना
*

अमन एक दर्द है
अंदालूसिया के संगीत से उठता हुआ
एक गिटार के दिल से रोता हुआ7
*

अमन एक मर्सिया है उस नौजवां के लिए
छलनी हो गया जिसका धड़कता दिल
न गोली लगी न था कोई बम
यह था महज़ उसकी माशूक़ा का तिल
*

अमन गाता है ज़िंदगी का गीत, यहां ज़िंदगी के बीच
आज़ाद दौड़ती है हवा लहलहाते गेहूं के खेतों के बीच

(रामल्ला 2002 में लिखा गया)
1-जोब (एक ईसाई संत, जो घोर ग़रीबी के प्रतीक माने जाते हैं, जोब्स टर्की जैसे कई मुहावरे उन्हें लेकर प्रचलित हैं।)
2-होमर- इतालवी महाकवि, इलियड के रचनाकार
3-मारिया कालास- एक मशहूर अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री
4-उम्म कुल्दुम- मिस्र में जन्मी मशहूर अरब गायिका
5-अंदालूसिया- स्पने की वह जगह जहां स्पानी कवि लोर्का का जन्म हुआ था
6-शायलॉक, शेक्सपीयर के नाटक मर्चेंट ऑफ वेनिस का सौदागर पात्र
7- लोर्का की एक प्रसिद्ध कविता का संदर्भ जिसमें गिटार के रुदन का उल्लेख है

(`पहल` के एक पुराने अंक से साभार)

Friday, January 16, 2009

घेरेबंदी


फिलिस्तीनी हमले पर महमूद दरवेश की ये कविता 'घेरेबंदी'2002 में लिखी गई थी जब वे रामल्ला में खुद भी इज़राइली सेनाओं से घिरे हुए थे। उस घिराव की गवाही देती हुई ये लंबी कविता फिलस्तीनी ज़िंदगी की ही तरह यातना, हिंसा, कत्लोगारत, गोलीबारी, विलाप, हताशा के वर्तमान और कोमलता, ख़ुशी, प्रेम, इंसानियत और भविष्य की कल्पना का एक कटा-फटा, छितरा और छलनी हुआ कोलाज है। मंगलेश डबराल का ये अनुवाद अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित है।

वक़्त है मेहरबान
जब इन पहाड़ी छलानों पर होती है शाम
तहस-नहस इन बाग़ीचों में जिनके साये भी छिन गये
हम करते हैं क़ैदियों सरीखा काम
करते हैं बेरोज़गारों सरीखा काम
हम बोते हैं उम्मीद
*
अपनी सुबह का सामने करने को तैयार इस धरती पर
हम बने और भी मूर्ख,
जब भी हमने अपनी जीत की आंख से मिलायी आंख
धमाकों से दमकती हमारी लंबी रातों में नहीं है कोई रात
जागते हैं देर रात तक हमारे दुश्मन
वे हमारी गुफाओं की काली अंधेरी खंदकों को
आग लगाकर करते हैं रोशन
*
यहां जोब1 की शायरी का संसार
इसके बाद अब क्या किसका इंतज़ार
*
यहां मिट चुका है 'मैं'
यहां आदम याद करता है उस मिट्टी को
जिससे पैदा हुआ था वह
*
घेरेबंदी जारी रहेगी तब तक
हम अपने दुश्मनो को अपनी बेहतरीन शायरी
नहीं सिखा पायेंगे जब तक
*
दिन चढ़ते तक सीसे जैसा है आसमान
रात को वह धधक उठता लपटों में
और यहां हमारे दिल हैं गोया क़रीने से सजे हुए गुलाब
*
यहां, घेरेबंदी के बीच ज़िंदगी देती है वक़्त का साथ
उसकी शुरुआत को याद करने
और उसके ख़त्म होने को भूलने के बीच
*
ज़िंदगी- चाहे जी गयी हो भरपूर या हो चुकी हो बर्बाद
अब भी पड़ोस के सितारों को देती है पनाह,
अब भी बटोरती है दूर, पनाह लेने जाते हुए बादलों को
मगर यहां तो ज़िंदगी पूछती है सवाल:
उसे फिर से ज़िंदा करें किस तरह?
*
वह कहता है मौत के कगार पर:

कुछ नहीं खोने के लिए मेरे पास-
मैं हूं आज़ाद, आख़िरी आज़ादी के बहुत पास,
तक़दीर है मेरी मेरे हाथ
मैं अपनी ज़िंदगी को पैदा करूंगा जल्द-
आज़ाद ही जन्मा मैं, न कोई मां न कोई बाप,
मैं आसमानी नीले हरुफ़ों में लिखूंगा अपना नाम
*

यहां धुएं का हार पहने हुए पहाड़ियों के नीचे,
घर की दहलीज़ पर,
वक़्त के लिए नहीं बचा है वक़्त
तब क्या करते हैं हम-
वही जो करते हैं अपने सायों से बेदख़ल लोग
हम भूलते हैं अपना दर्द
*

दर्द यानी एक बीवी जो धुले हुए कपड़े बाहर नहीं फैला सकती
सूखे के लिए,
जिसे कुछ नहीं सूझता एक बेदाग़ परचम फैलाने के सिवा
*

यहां होमर2 की कोई गूंज नहीं
हम जब चाहते हैं दस्तक देते चले आते हैं मिथक दरवाज़े पर
यहां होमरनुमा कुछ भी नहीं है
हर कोई लाशों को खोदने में लगा है
गहरे सोये हुए एक मुल्क के मलबे से
जो धंसा है भविष्य के ट्रॉय के खंडहर में
*

फौज़ी मापते हैं हमारे वजूद
और ला-वजूद के बीच की जगह
टैंक की दूरबीन पर बने निशान से
*

हम मापते हैं अपने और गोलीबारी के
बीच की जगह
सिर्फ अपनी छठी हिस से
*

अरे, दहलीज़ तक आये हुए तुम-भीतर आओ,
और अरबी काफ़ी पियो हमारे साथ,
तब शायद तुम महसूस करो हमारी तरह तुम भी हो इंसान,
वहां दहलीज़ पर आये हुए तुम-
हमारी सुबहों से बाहर चले जाओ,
तब शायद हम महसूस करें तुम्हारी तरह हम भी हैं इंसान
*

हमें चाहिए वक़्त आराम के लिए, अपनी कला के लिए,
तास खेलने के लिए, अख़बार पढ़ने के लिए-
हमें सलहाने चाहिए कल की ख़बरों में दर्ज अपने घाव,
हमें देखनी चाहिए अपनी-अपनी राशियां
सब दो हज़ार दो के साल में
-कैमरा उन पर चमकेगा जो पैदा हुए हैं
घेरेबंदी की राशि में
*

जब कभी झांकता है बीता हुआ कल,
मैं कहता हूं- अभी नहीं जाओ,
और आना आनेवाले कल
*
एक तंज़निगार ने मुझसे यों कहा:
'अगर शुरू में ही मुझे इस दास्तान के ख़ात्मे का पता होता,
तो मैंने एक लफ्ज़ भी कभी न लिखा होता'
*
हरेक मौत,
भले ही वह रही हो तयशुदा,
एक पहली मौत है हमेशा
आख़िर कैसे मान लूं कि एक-एक चांद
सो रहा है एक-एक पत्थर के नीचे
*
बेकार ही धुनता हूं मैं अपना सर
मुझ सरीखा कोई
सामने की पहाजड़ियों में तीन हज़ार साल से
ख़ाक छानता हुआ
क्या खोजकर लायेगा ऐसे मौक़े पर?
यह ख़्याल ही एक तकलीफ़ है-
मगर यह मेरी याद्दाश्त को करता है कुछ तेज़
*
जहाज़ जब उड़कर चले जाते हैं
तब उड़कर वापस आते हैं कबूतर-
खड़िये जैसे सफ़ेद कबूतर,
अपे बेरोक परों से आसमान को
धोते-पोंछते हुए,
रोशनी पर फिर से हक़ जमाते हुए,
आज़ाद बहती ख़ुशनुमा हवा को फिर से संजोते हुए,
ऊंची और ऊंची उड़ान भरते हुए,
कपास जैसे कबूतर
'काश, अगर वह आसमान वाक़ई ऐसा होता',
एक आदमी ने कहा मुझसे मेरे घर के क़रीब गुज़रते हुए
दो धमाकों के बीच
*

जन्नत में लगी हुई आग,मेरा जलता हुआ दिमाग़,
और आसमान से गिरती बिजलियां
क्या फ़र्क़ है इसके बीच?
मैं जान लूंगा जल्द ही अगर यह कविता हो उठी ज़िंदा
-मेरे दोस्त जान लेंगे जल्द अगर कवि हो गया ख़त्म

आलोचक से:

मेरे लफ़्ज़ मत मापो कॉफी के चम्मचों से
उन्हें मत टांगो पिन चुभोकर छटपटाते हुए दीवाल पर
रात में लफ़्ज़ घेर डाल देते हैं मुझ पर
मुझे लिखते हैं वे लफ्ज़ जो मैंने कभी कहे नहीं
फिर मुझे नींद के बीच भटकता हुआ छोड़ देते हैं
कठोर तलछटों तक, मेरे सपनों के कटे-फटे आख़िरी छोर
*
फौज़ियों के पीछे शाहबलूत के पेड़
मीनारों की मानिंद आसमान को देते हैं टेक
फ़ौज़ी पेशाब करते हैंतारों की बाड़ के पीछे
एक टैंक तैनात है उनकी हिफ़ाजत में
शरद की मुकम्मल दुपहर
अपना सुनहरा चक्कर लगाती है सड़कों पर
जो ख़ामोश हैं गकिसी गिरजाघर की तरह
इतवार की इबादत के बाद
*
अपनी सुबह के लिए तैयार होती इस धरती पर
कोई विवाद नहीं होगा
मरे हुओं की क़ब्रों की बाबत-
यहां हर इंसान है बराबर-
घास रोपी जायेगी सब जगह बराबर
ताकि हम एक सी लय में चल सकें साथ-साथ
*
हमें प्यार है अगले कल से
और जब वह आयेगा
हम ज़िंदगी से करेंगे प्यार जैसी भी हो वह-
सीधी-सपाट या पेचीदा,
सुस्त या रंगों से भरपूर
नहीं चाहिए पुनर्जन्म,
बीत चुका है फ़ैसले का दिन
और तब हमारे जश्न
करेंगे देहों और दिलों को रोशन
एक बार ख़ुसी का काटा हुआ हिचकता नहीं दूसरी बार
*

एक क़ातिल से

तुमने ज़रा अपने शिकार की आंख से मिलायी होती आंख,
सायद तुम्हें याद आती गैस चैंबर में अपनी मां,
शायद अपना इरादा बदल देते तुम
और भूल जाते बंदूक का इंसाफ़
इसके सिवा और क्या है अपने वजूद को पाने का उपाय
*

दूसरे क़ातिल से

अगर तुम उस अजन्मे बच्चे को रहने देते
तीस और दिनों तक मां के पेट में,
ज़रा सोचो, तब क्या होता
क़ब्ज़ा ख़त्म हो जाता, वह बच्चा
घेरेबंदी को याद बी न करता,
तंदुरुस्त और मज़बूत पलता-बढ़ता
कॉलेज में पढ़ता एशिया का प्राचीन इतिहास
तुम्हारी ही बेटियों में से किसी के साथ,
मुमकिन था वे आपस में करते प्यार,
उनकी एक नन्ही सी बेटी होती, जन्म से यहूदिन
देखो, यह तुम्हें क्या कर दिया
अपनी ही बेटी को बना दिया विधवा,
अपनी बेटी को कर दिया अनाथ
देखो तुमने कैसे अपने आनेवाले कुनबे को किया तबाह
देखो तुमने कैसे मार डाला तीन परिंदों को एक ही गोली से
*

फ़ालतू हैं सब तुक-तान
जब छिड़ते ही न हों सुर
और दर्द हो बेहिसाब
*

कितनी मोटी घनी काली बारूद
एक अंधेरा जिसे सिर्फ़ नारंगियां छील सकती हैं
या फिर कोई होनहार औरत
*

तनहाई से लबालब
हम पियेंगे अकेलेपन के जाम तलछटों तक-
जब तक वह इंद्रधनुष न उतर आये ज़मीन पर
*

अगर- अभले ही दूर से, भले ही कुछ लम्हों के लिए-
हम उछल पड़ते हैं ख़ुशी से
तो क्या हम किसी को चोट पहुंचाते हैं,
किसी मुलक का
होता है इससे नुकसान?
*

घेरबंदी खड़ी है,
जैसे कोई सीढ़ी खड़ी हो आंधी के सामने
*

हमारे बिरादर हैं इन पहाड़ियों पर
नेक बिरादर तजो तहे दिल से हमें करते हैं प्यार,
हमें देखते हैं और रोते हैं,
गुपचुप कहते हैं खुद से-
अगर हम भी गिरे हुए होते तो हम...तो हम...
-मगर फिर वे चुप हो जाते हैं, रोते हैं-
हमें अकेले मत छोड़ो मेहरबान,
हमें छोड़ मत दो मेहरबाहन-
*

क़बीले अब साइरस से मिलने नहीं जाते,
न सीज़र की ख़िदमत करते हैं
न खलीफ़ाओं से झगड़ते हैं
इन दिनों ये सब चलता है एक ही कुनबे के भीतर
आधुनिकता पर फ़िदा एक कुनबा
जिसने अपने तमाम ऊंट बेचकर खरीद लिया है एक जेट जहाज़
*

किसी को पुचकारत हूं मैं अपनी तनहाई में
दुनिया की निगाह में मर चुके लोगों को जगाने के लिए नहीं,
सिर्फ़ इस क़ैदे-तनहाई से खुद को बाहर धकेलने के लिए
*

मैं आखिरी हूं उन शायरों में
जो दुश्मनों की परेशानी से ख़ुद होते हं परेशान
शायद इतनी छोटी है दुनिया
कि उसमें समा नहीं पाते मार तमाम लोग
और उनके ख़ुदा तमाम
*

इतिहास जमा होता है हमारे भीतर एक जगह
अच्छा इतिहास,ख़राब इतिहास, कई क़िस्म का इतिहास
इतने सारे पापों के बग़ैर
कुछ छोटी हो सकती थी बाइबिल
इतने सारे बहकावों के बग़ैर
और भी तेज़ी से पूरा होता
निजात की राह पर पैग़ंबरों का सफ़र
अबद को करने दो अपना कारोबार
मैं कहता रहूंगा परछाइयों से यह बात

*
अगर इस जगह के इतिहास में इतनी भीड़ न होती
पोपलार पर हमारे गीत दूर-दूर तक होते मशहूर
*

हमारे रोज़मर्रा के विनाश का यह है हिसाब
दो से आठ लोग हुए क़त्ल
दस और घायल
बीस पर नेस्तनाबूत
पचास पेड़ जैतून तहस-नहस
और न भूलें कि यह पूरी तरह इसी तरह है बर्बाद
कविता,नाटक और अधूरी तस्वीर को छिपाती हुई
*

हम सुराहियों में बंद कर देते हैं अपनी तकलीफ़
ताकि फौज़ी इसे काम में न ला सकें
घेरेबंदी का जाम उठाने के लिए,
हम उसे छिपा देते हैं बुरे वक़्त के लिए
उस वक़्त के लिए एक धरोहर
जब ऐसा कुछ होगा जिसका गुमान भी न हो
जब ज़िंदगी पटरी पर लौट आयेगी
हम सब की तरह मनायेंगे मातम,
रोयेंगे अपनी-अपनी बदबख़्तियों पर
उन चीज़ों पर जो सुर्ख़ियों में आने से रह गयीं
कल जब रफ़ू क दी जायेगी हर चीज़
तब आख़ीर में खुल पड़ेंगे धीरे-धीरे हमारे घाव
*

ज़िला वतनी की रोशनी से भरी एक गली में
हवाओं के चौराहे पर तनी है एक क़नात
दक्खिन से कभी नहीं बहती हवा
पूरब एक पच्छिम है सूफी अंताज़ में डूबा हुआ
पश्चिम पेंकता है एक हत्यारा जंगबंदी
अमन के सिक्के ढालता हुआ
दूर हवाओं के उत्तरी मुकाम की बात करें
तो वहां ख़ुदाई है आपसी बातचीत में मशगूल,
हवाओं को अपनी दिशाओं से भटकाती हुई
*

वह उससे कहता है-
मेरा इंतज़ार करना, नरक के कगार पर
वह उससे कहती है-हां, आ जाओ- मैं ही हूं नरक
*

एक औरत ने एक बादल से कहा-
मेहरबानी करके छिपा लो मेरे प्यार को
मेरे कपड़े तो भीगे हैं उसके ख़ून से
*

अगर तुम बारिश न बन सको,
मेरे लाल
तो एक पेड़ बनना
एक पेड़ ख़ूब हरा-भरा, बनना एक पेड़
और अगर तुम पेड़ न बन सको, मेरे लाल,
तो एक चट्टान बनना
एक चट्टान ओस से भीगी हुई बनना एक चट्टान
और अगर तुम चट्टान न बन सको, मेरे लाल
तो चांद बनना,एक चांद
प्रेमी जिसका ख़्वाब देखें,बनना एक चट्टान
यह कहा मां ने अपने बेटे से
उसे दफ़नाये जाने के वक़्त
*

poori kavita agli post mein...