Friday, July 2, 2010

नेरेटिव माध्यम होता है लक्ष्य नहीं: पंकज बिष्ट (लोकार्पण की रपट)

नेरेटिव माध्यम होता है लक्ष्य नहीं: पंकज बिष्ट

27 जून को राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित गीत चतुर्वेदी की कहानियों के दो संग्रहों सावंत आंटी की लड़कियां और पिंक स्लिम डैडी का विमोचन किया गया। इंडिया इंटरनेशन सेंटर में आयोजित समारोह में पुस्तकों का लोकार्पण जानेमाने मराठी उपन्यासकार भालचंद्र नेमाड़े ने किया। नामवर सिंह ने अध्यक्षता और पंकज बिष्ट मुख्य वक्ता थे।

पंकज बिष्ट ने अपने वक्तव्य की शुरूआत यह कहते हुए की कि बेहतर होता कोई आलोचक इन संग्रहों पर बोलता। रचनाकारों की रचनाओं को लेकर अपनी समझ होती है। इसलिए बहुत संभव है वह उस तरह की तटस्थता न बरत पायें जो किसी मूल्यांकन के लिए जरूरी होती है। उन्होंने अपनी स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि मैं दिल्ली से बाहर था और मुझे ये संग्रह 23 जून को ही मिले। गोकि मैंने इन में से कुछ कहानियां पहले भी देखी हुई थीं पर मुझे नये सिरे से उन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिला। फिर इस बीच मेरी व्यस्तता भी बहुत बढ़ जाती है। (उनका इशारा समयांतर की ओर था।) इसलिए मैंने उन दो कहानियों - ‘सावंत आंटी की लड़कियां’ और ‘पिंक स्लिप डैडी’ - पर अपने को केंद्रित किया है जिनके शीर्षकों पर ये संग्रह हैं। ये कहानियां एक तरह से उनकी विषयवस्तु के दो ध्रुव हैं। एक ओर मुंबई का निम्न मध्यवर्ग है और दूसरी ओर वहां की कारपोरेट दुनिया। उन्होंने कहा वैसे वह मुंबई पर लिखनेवाले हिंदी के पहले कथाकार नहीं हैं। इससे पहले शैलेश मटियानी ने मुंबई के उस जीवन की कहानियां लिखीं हैं जिसे अंडरबैली या ऐसी दुनिया कहा जाता है जो नजर नहीं आती।

उन्होंने आगे कहा गीत चतुर्वेदी का उदय हिंदी साहित्य के परिदृश्य में धूमकेतु की तरह हुआ है। वह कवि- कथाकारों की उस परंपरा से हैं जिस में अज्ञेय और रघुवीर सहाय आते हैं। हिंदी में लंबी कहानियां लिखनेवाले वे अकेले ऐसे कथाकार हैं जिसकी मात्रा छह कहानियों से दो संग्रह तैयार हुए हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा है। वह गद्य में चित्रकार हैं। कहीं वह यथार्थवादी लैंडस्केप पेंटर की तरह हैं तो कहीं इप्रैशनिस्टिक चित्रकार मतीस की तरह कम रेखाओं में बहुत सारी बात कह देते हैं। बिष्ट ने दोनों कहानियों से पढ़कर ऐसे अंश सुनाए भी। गीत की भाषा की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी भाषा में ऐसी सघनता और खिलंदड़ापन है जो समकालीन लेखन में बिरल है। वह एक तरह से भाषा के शिल्पी हैं। यानी वह अपने वाक्यों को गढ़ते हैं।

पिंक स्लिप डैडी को उन्होंने कारपोरेट जगत की ऐसी कहानी बतलाया जो हिंदी में अपने तरह की है। हाल की आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी हमें कारपोरेट जगत की उस व्यक्तिवादी दुनिया में ले जाती है जहां सफलता ही सब कुछ है। पर यह कहानी पूरी तरह पुरुष की दृष्टि से लिखी गई है जहां स्त्री केवल एक उपभोग्य वस्तु है। पूरी कहानी मैनेजमेंट के लोगों की नजर से ही लिखी गई है। इसमें वे लोग नहीं हैं जो लोग वास्तव में मंदी का शिकार हुए थे।

सावंत आंटी की लड़कियां निम्नमध्यवर्ग की दुनिया की कहानियां हैं जहां परिवार अपनी बेटियों के विवाह को लेकर त्रस्त हैं। यह हिंदूओं की विवाह प्रथा की विकृतियों की ओर इशारा करती हैं। माता-पिता बच्चों को अपने जीवन साथी के चुनाव का अधिकार नहीं देना चाहते हैं और कहानी में लड़कियां इस अधिकार के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं। बड़ी बहन जो नहीं कर सकी उसे दूसरी बहन कर दिखाती है। पंकज बिष्ट ने कहानी का कथ्य बतलाते हुए कहा कि दूसरी बेटी अंततः उसी लड़के से शादी करती है जिसे पहले पिता चाहता था। पर पत्नी के दबाव में आकर वह तब बेटी की शादी दूसरी जगह करने को तैयार हो जाता है।
कहानी पर उनकी पहली आपत्ति उसके अंत को लेकर थी। स्वाभाविक तौर पर ऐसी स्थिति में कम से कम पिता को इतना विषाद नहीं होना चाहिए था, जितना कि दिखाया गया है। बहुत हुआ तो ट्रेजिक-कॉमिक स्थिति हो सकती थी। कुल मिला कर यह प्रोग्रेसिव कदम था। पर लेखक ने स्थिति से अन्याय किया है।

उनकी दूसरी आपत्ति थी कि यह कहानी दलित समाज की पृष्ठभूमि पर है जो कि जाति नामों से समझी जा सकती है। आखिर उन्होंने यहां हर लड़की को ऐसा क्यों दिखलाया है कि वह 13-14 वर्ष की हुई नहीं कि भागने को तैयार है। या उनका एकमात्रा काम आंखें लड़ाना है? क्या वहां जीवन का और कोई संघर्ष नहीं है। इस समाज में सिर्फ हंगामा ही होता रहता है।

पंकज जी ने कहा मैं नहीं जानता कि ऐसा जानबूझ कर हुआ है या अनजाने में पर अंबेडकर और नवबौद्धों तक के जो संदर्भ आये हैं वे कोई बहुत सकारात्मक नहीं है। उन्होंने कहा लेखकों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस तरह की स्थिति से सायास बचें।

उनकी आपत्ति विशेषकर ‘पिंक स्लिप डैडी’ के संदर्भ में अंग्रेजी शब्दों के अनावश्यक इस्तेमाल पर भी थी जिससे कि कहानी भरी पड़ी है। उन्होंने सवाल किया कि ऐसा क्यों है कि लेखक यौन संदर्भों का जहां-जहां खुलकर और अनावश्यक भी, वर्णन करता है पर उनमें जनेंद्रियों के लिए अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल है। लगता है जैसे वह स्वयं उन संदर्भों और शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अगर डर नहीं भी रहा है तो भी बहुत आश्वस्त नहीं महसूस कर रहा है और इसलिए अंग्रेजी की आड़ ले रहा है। जिन शब्दों को बोलने से लेखक को परहेज है उन्हें वह क्यों शामिल करना चाहता है। उनका उन्होंने कहा कम से कम मेरे जैसे आदमी को इस तरह के संदर्भों, अपशब्दों और गालियां का इस्तेमाल जरूरी नहीं लगता है। वैसे कला का मतलब जीवन की यथावत अनुकृति नहीं है। वह जो है और जो होना चाहिए उसके बीच की कड़ी होता है।

उन्होंने कहा कि लंबी कहानियों और उपन्यासों के बीच की सीमा रेखा बहुत पतली होती है। इस पर भी कहानी और उपन्यास में अंतर होता है। दुनिया में बहुत ही कम लेखक ऐसे हैं जिन्होंने लंबी कहानियां लिखी हैं। जो लिखीं हैं वह इक्की-दुक्की हैं। उदाहरण के लिए काफ्का की एक कहानी ‘मेटामौर्फसिस’ लंबी है। इसी तरह जैक लंडन की भी एक ही कहानी ‘एन ऑडसी आफ दि नार्थ’ लंबी है। हां, माक्र्वेज की एक से अधिक लंबी कहानियां नजर आ जाती हैं। लंबी कहानियों में विषय वस्तु की तारतम्यता को बनाए रखनेके लिए अक्सर अतिरिक्त वर्णन या नैरेटिव पर निर्भर रहना पड़ता है जो पठनीयता को बाधित करता है। हिंदी में भी कुछ बहुत अच्छी लंबी कहानियां लिखी गई हैं। इन में दो मुझे याद आ रही हैं। एक है संजय सहाय की ‘मध्यातंर ’ और दूसरी है नीलिमा सिन्हा की ‘कुल्हाड़ी गीदड़ और वो...’उन्होंने कहा कि बेहतर है कि गीत चतुर्वेदी उपन्यास लिखें जिनकी उनमें प्रतिभा है। वैसे भी उनकी कहानी ‘पिंक स्लिप...’ उपन्यास ही है। हिंदी में पिछले साठ वर्ष से कहानी-कहानी ही हो रही है। जिस भाषा में उपन्यास नहीं है उसकी कोई पहचान ही नहीं है।

बिष्ट ने कहा कि लेखक पर जादुई यथार्थवाद का जबर्दस्त प्रभाव है। यह अभिव्यक्तियों में भी है और उनके चरित्रों में भी। गीत के कई चरित्रा सनके हुए से हैं जैसे कि माक्र्वेज की रचनाओं में नजर आते हैं। उदाहरण के लिए ‘पिंक स्लिप डैडी’ की एक पात्रा पृशिला जोशी तो, जो तांत्रिक है, माक्र्वेज के एक कम चर्चित उपन्यास न्यूज ऑफ़ ए किडनैपिंग के नजूमी/तांत्रिक जैसी ही है। इसके अलावा सबीना, अजरा जहांगीर, नताशा, जयंत और चंदूलाल के व्यवहारों में भी यह सनकीपन साफ नजर आता है जो कि माक्र्वेज का ट्रेड मार्क है। इसी तरह तथ्यवाद की झलकियां भी देखी जा सकती हैं - इतने बज कर इतने मिनट और इतने सेकेंड या इतना फिट इतना इंच आदि।
अंत में उन्होंने कहा कलात्मकता रचनाओं के लिए जरूरी है पर अपने आपमें अंत नहीं है। नेरेटिव माध्यम है लक्ष्य नहीं। लेखन सिर्फ जो है वह भर नहीं है उसमें जो होना चाहिए वह भी निहित होता है। इसलिए हर रचना दृष्टि की मांग करती है।
उन्होंने गीत चतुर्वेदी की एक पताका टिप्पणी की अंतिम पंक्तियों को, जो कहानी के हर खंड में है, उद्धृत कियाः
‘‘ऐसे में लगता है, भ्रम महज मानसिक अवस्था नहीं, एक राजनीतिक विचारधारा होता है।
‘‘क्या हम श्रम के राग पर भ्रम का गीत गाते हैं?’’
और कहा, हमें इस पर रुककर सोचने की जरूरत है। वाक्य सुंदर हो सकते हैं, पर उनकी तार्किकता का जांचा जाना जरूरी है।

जानेमाने मराठी उपन्यासकार भालचंद्र नेमाड़े ने पंकज बिष्ट की बात का समर्थन करते हुए कहा कि कहानी पर ज्यादा समय खराब करने की जरूरत नहीं है। मराठी में भी कहानी का बड़ा जोर था। कहानी लिखना आसान होता है और उसकी कामर्शियल वेल्यु ज्यादा होती है। अखबारवाले उसे फौरन छाप देते हैं। पर वह जीवन को सही तरीके से नहीं पकड़ पाती। उन्होंने कहा मुंबई में कामगारों की जिंदगी के संघर्ष को आप कहानी में नहीं पकड़ सकते। मध्यवर्ग का लेखक अपनी खिड़की से बाहर जाती एक औरत को देखता है और फिर उसके अकेलेपन की कहानी गढ़ लेता है। उन्होंने मजाक में राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी से कहा कि वह कहानियां छापना बिल्कुल बंद कर दें। मराठी में हमने यही किया इसी वजह से अब वहां उपन्यास लिखे जा रहे हैं।

समारोह के अध्यक्ष नामवर सिंह ने कहा कि गीत चतुर्वेदी धमाके के साथ हिंदी के परिदृश्य में उभरे हैं। उनकी चार किताबें एक साथ आई हैं। इन में दो कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह है जो इसी वर्ष के प्रारंभ में आया था। उन्होंने चौथी किताब के रूप में गीत चतुर्वेदी के उस साक्षात्कार को शामिल किया जो उन्होंने कुछ समय पहले एक वेबसाइट को दिया था और जिसे एक पुस्तिका के रूप में समारोह के अवसर पर निकाला गया था और श्रोताओं को मुफ्त बांटा गया। पंकज बिष्ट द्वारा कही बातों पर कोई टिप्पणी न कर के उन्होंने गीत चतुर्वेदी को एक महत्वपूर्ण लेखक मानते हुए अपनी बात को उनकी एक अन्य कहानी ‘सिमसिम’ तक ही सीमित रखा। कहानी की तारीफ करते हुए उन्होंने इसके एक उपशीर्षक ‘मेरा नाम मैं’ को समकालीन संवेदना की अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण बतलाया। नामवर सिंह ने कहानी का पक्ष लेते हुए यह जरूर कहा कि जो जिस विधा में चाहे लिखे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह कमोबेश भालचंद्र नेमाड़े और पंकज बिष्ट की इस बात से सहमत नहीं थे कि कहानी पर ज्यादा समय नहीं खराब किया जाना चाहिए।

(जनपक्ष से साभार)

Saturday, June 26, 2010

कबीर और नागार्जुन

बनारस से वाचस्पति जी ने फोन पर बताया कि आज बाबा नागार्जुन की जन्मशती शुरु हो रही है। बाबा से उनका आत्मीय रिश्ता रहा है. इच्छा यही थी कि वे ही कोई टुकड़ा यहाँ लिख देते पर तत्काल यह संभव नहीं था. इसी बीच किसी ने कबीर जयंती की बात बताई जिसकी मैंने तस्दीक नहीं की लेकिन यूँ ही लगा कि कबीर और नागार्जुन के बीच गहरा और दिलचस्प रिश्ता है.
मसलन दोनों का ही लोगों से बड़ा ही organic किस्म का जुड़ाव रहा या कहें कि दोनों ही जनता की organic अभिव्यक्ति हैं. दोनों प्रतिरोध के, हस्तक्षेप के कवि हैं. दोनों में गजब की लोकबुद्धि है, तीखापन है और दोनों ही व्यंग्य को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। जनशत्रुओं से दोनों की सीधी मुठभेड़ है और दोनों के लिए ही कविता कोई इलीट सी, शास्त्रीय सी, `पवित्र` सी चीज़ नहीं है.
कबीर के लिए अक्खड़-फक्कड़ जो भी विशेषण दी जाते हैं, वे नागार्जुन के लिए भी सटीक हैं। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी कही गयी है और घुमंतू नागार्जुन की भाषा भी पंजाबी, हरयाणवी, भोजपुरी जाने कहाँ-कहाँ ट्रेवल करती है. दोनों ही कविता से एक `जिहाद` लड़ते हैं, अपने समय के ताकतवर-उत्पीड़क के खिलाफ. कबीर के यहाँ तो ब्राह्मणवाद लड़ाई के केंद्र में ही रहा है. नागार्जुन के यहाँ भी इस बीमारी से मुसलसल मुठभेड़ है. दोनों ही अपने समय की प्रतिरोधी परम्परा से रिश्ता बनाते हैं, उससे ताकत पाते हैं और उसे मजबूत करते हैं. कबीर का रिश्ता नाथपंथियों से, सूफियों से बनता है और नागार्जुन का बुद्धिज़्म से, वामपंथ से.
यह भी दिलचस्प है कि शास्त्रीय परम्परा के विरोध के ये कवि शास्त्रीय आलोचना के लिए उपेक्षा करने लायक ही रहे गोकि दोनों ही लोगों की जुबान पर खूब चढ़े रहे। ब्राह्मणवादी आलोचना कबीर को कभी कवि मानने को तैयार नहीं हुई और उसने नागार्जुन को भी कभी महत्व नहीं दिया. उनकी कला आलोचकों के लिए कविता कहे जाने लायक नहीं थी और दोनों ही बहुत समय तक प्रचारक की तरह देखे जाते रहे. (अशोक वाजपेयी का यह कबूलनामा भी सिर्फ मजेदार है कि नागार्जुन को समझ न पाने की उनसे बड़ी भूल हुई.)

बहरहाल नागार्जुन की यह कविता -

शासन की बंदूक

खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक

Monday, June 14, 2010

कविता का कठिन रास्ता : संजय कुंदन



विष्णु नागर हिंदी के ऐसे विरले रचनाकार हैं जिन्होंने रोजमर्रा जीवन की एकदम मामूली दिखने वाली चीजों, प्रसंगों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। वह अपनी कविताओं की शुरुआत बहुत छोटी या साधारण बातों से करते हैं पर अचानक हमारा साक्षात्कार जीवन की किसी बड़ी विडम्बना से होता है या फिर हम अनुभव के एक असाधारण संसार में पहुंच जाते हैं। अक्सर एक जाने-पहचाने चित्र में हमारा एकदम अनजाना प्रतिरूप या समाज का कोई अछूता पहलू नजर आ जाता है या अनदेखा-अनचीन्हा सच सामने आ जाता है। जो बात कहने के लिए दूसरे कवि विवरणों का जाल फैलाते हैं या बोझिल व्याख्याओं-वक्तव्यों से पाठकों को आक्रांत कर देते हैं, उसे विष्णु नागर चुटकी लेते हुए रोचक अंदाज में कम से कम शब्दों में कह देेते हैं। उनमें खिलंदड़पन है। वह शब्दों के साथ खेलते भी हैं पर केवल खेलने के लिए नहीं बल्कि एक खास अर्थ तक पहुंचने के लिए। उनके खिलंदड़पन में एक इशारा रहता है जिसे पाठक जल्दी ही पकड़ लेता है। विष्णु नागर दरअसल प्रतिरोध के कवि हैं। प्रतिरोध का एक तरीका यह भी है कि स्थितियों या चरित्रों के विद्रूप को सामने लाया जाए और उसे एक्सपोज कर दिया जाए। इसमें व्यंग्य सबसे ज्यादा सहायक होता है। मनुष्य विरोधी या शोषणमूलक व्यवस्था पर हंसना प्रतिरोध का एक कारगर हथियार हो सकता है। लेकिन इस सिस्टम पर हंसते हुए उसके चीथड़े करते हुए विष्णु नागर आम आदमी की पीड़ा को पूरी मार्मिकता के साथ सामने लाते हैं। यानी उनकी कविता कॉमडी और ट्रैजेडी के स्वरों को साथ लेकर एक अलग ही रूपाकार ग्रहण करती है जिसमें जीवन अपनी पूरी जटिलता के साथ सामने आता है। इसकी एक बानगी देखिए:
पद पर बैठा शेर

वह तब भी शेर था, जब जंगल में रहता था
वह तब भी शेर था, जब पिंजड़े में आ गया
वह अब भी शेर है, जब मर चुका है

मेरी तरह नहीं कि पद पर हैं तो शेर हैं
और शेर हैं तो पिंजड़े को भी जंगल मान रहे हैं
और जब मर गये हैं तो न तो कोई आदमी मानने को तैयार है न शेर

गनीमत है कि कोई कु्त्ता नहीं मान रहा!

सरल विधान में जटिल यथार्थ की ऐसी अभिव्यक्ति करने वाले कवि हिंदी में बेहद कम हैं। उनसे पहले नागार्जुन ऐसा करते रहे हैं। एक तरह से विष्णु नागर शहरी नागार्जुन लगते हैं। लेकिन यह जोखिम भरा रास्ता है। कविता में महान बातें करके महान बने रहना आसान है लेकिन आम आदमी के जीवन को उसके पूरे अनगढ़पन के साथ सरल भाषा में सामने लाना बेहद कठिन। हिंदी में कविता के बने चौखटों में कई बार ऐसी कविताएं `फिट` नहीं बैठतीं। लेकिन विष्णु नागर की कविताओं का इस सांचे मे मिसफिट होना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। विष्णु नागर जैसे कवि किसी सांचे में समा जाने के लिए नहीं बल्कि आम आदमी के सुख-दुख को व्यक्त करने की अपनी प्रतिबद्धता के तहत कविता लिखते हैं। इसलिए उन्होंने अपना अलग रास्ता चुना है।
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यह पोस्ट वरिष्ठ कवि विष्णु नागर की षष्टिपूर्ति १४ जून के मौके पर।

Tuesday, June 8, 2010

दस कविताएं : मनमोहन

नींद
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दक्षिण दिशा में
गया है एक नीला घोड़ा

बहुत घने मुलायम अयाल हैं

और आँखें हैं गहरी
काली और सजल

नंगी है उसकी पीठ

पर्वतों से गुजरता
वह दक्षिण दिशा के

बादलों में दाखिल
हो चुका है
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बारिश
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कपास के फूलों से
लदी नौकाओ

कई कोनों से आओ

और एक जगह इकट्ठी हो जाओ
भींगने के लिए
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घड़ी
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घड़ी चुग रही है
एक एक दाना

घड़ी पी रही है
बूँद बूँद पानी

कभी न थकने वाली

गौरेया घड़ी
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धरती
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धरती को याद है
अनगिन कहानियां

धरती के पास है
एक छुपी हुई पोटली

नाक पर लटकी है
रुपहली गोल ऐनक

पोपले मुँह में
जर्दा रखे धीमे चिराग में
तमाम रात कथरी में पैबन्द लगाती

झुर्रियों वाली बूढ़ी
नानी है धरती
***


गेंद
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झन से गिरा शीशा

एक गेंद दनदनाती आई

खिड़की की राह मेज पर
टिप्पा खाया दवात
गिराई और
चट पट चारपाई के
नीचे भाग गई

एक जाना पहचाना सितार
कितने बरस बाद
मैं सुनता हूँ
***


नदी
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नदी मुझे बुलाती है
नदी मुझे पुकारती है

बांहें खोले दूरे से दौड़ी
आती है नदी
मैं नदी से डरता हूँ
लेकिन नदी मेरी माँ है
***


जीवित रहना
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माँ के पीछे है एक
और माँ
पिता के पीछे एक
और पिता
साथियों में छिपे हैं साथी
जिनके लिए मैं जीवित रहता हूँ
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एक परिन्दा उड़ता है

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एक परिन्दा उड़ता है
मुझसे पूछे बिना
मुझे बताए बिना
उड़ता है परिन्दा एक
मेरे भीतर
मेरी आँखों में
***


बूढ़ा माली
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बूढ़ा माली गाता है
ये जो पत्ते गाते हैं
बूढ़ा माली हंसता है
ये क्यारियां जो खिलखिलाती हैं

मिट्टी की नालियों में
बहुत दूर से
पानी बनकर आता है
बूढ़ा माली
***


पत्र
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एक रसोई है
कालिख में नहाई
मटमैली रसोई

थकी हुई बूढ़ी गाय
जैसी आँखों वाली एक औरत
दहलीज पर आकर खड़ी होती है
और पसीने से सरोबार चेहरे को
आंचल से पोंछती है

यहां मैं कलम उठाता हूँ
और मेरी उम्र
हो जाती है नौ साल
***

मनमोहन की ये कविताएं `इसलिए` पत्रिका के मई 1979 अंक में प्रकाशित हुई थीं।

Monday, May 24, 2010

इतिहास का अंत


इतिहास की प्रवृत्ति है अपने को दुहराना, यह मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है; इतिहास के अंत की घोषणाओं के बारे में ही यह बात सबसे ज़्यादा खरी है. न्यू टेस्टामेंट से लेकर हेगल तक ऐसे मृत्यु-सन्देश अनेकों बार जारी किये गए हैं. इतिहास के अंत की घोषणा फ़कत हमारे पास पहले से मौजूद इतिहास में एक टुकड़ा और जोड़ देती है, इतिहास को जीवित रखने में मदद करती है और इस प्रकार अजीब ढंग से आत्मघाती साबित होती है.
पचास के दशक का तथाकथित विचारधारा का अंत आन्दोलन पिछले दिनों दिए गए इतिहास के, या साफ़-साफ़ कहें तो विचारधारा के निष्कासन के आदेशों में एक था. वियतनाम, ब्लैक पावर और आसन्न छात्र आन्दोलन के दौर में वह एकदम असंगत भविष्यवाणी साबित हुई. अब जबकि हमारे अपने समय में यह घोषणा दुहराई गई है, तो हमें वह बात याद करनी होगी जैसे उसकी ओर ध्यान ऑस्कर वाइल्ड ने दिलाया हो - इतिहास के अंत के बारे में एक बार गलत होना बदकिस्मती है, जबकि उसी बारे में दुबारा गलत होना निपट लापरवाही.

(टेरी ईगल्टन की पुस्तक "दि गेटकीपर: अ मेमो'आ" से, अंग्रेजी से अनुवाद: भारत भूषण तिवारी)

Wednesday, May 12, 2010

लौट आ, ओ धार!


लौट आ, ओ धार!
टूट मत ओ साँझ के पत्थर
हृदय पर।
(मैं समय की एक लंबी आह!
मौन लंबी आह!)
लौट आ, ओ फूल की पंखडी!
फिर
फूल में लग जा।
चूमता है धूल का फूल
कोई, हाय!!
***

आज शमशेर जी की पुण्य तिथि है. उनकी यह तस्वीर जापान के क्योटो से लक्ष्मीधर मालवीय से वाया असद ज़ैदी प्राप्त हुई है.

Saturday, May 8, 2010

कसाब के बहाने उन्माद का जश्न

अदालत ने कसाब को फांसी की सजा सुना दी है। दुनिया ने भारतीय न्याय प्रक्रिया में मुल्क की डेमोक्रेसी को देखा जो मुल्क के बाहरी और भीतरी दुश्मनों को रास नहीं आती है। लेकिन मीडिया अदालत के फैसले का इंतज़ार करने के पक्ष में नहीं था।उसने फैसला आने से पहले ही उन्माद का जश्न परोसना शुरू कर दिया था। अखबारों के क्षेत्रीय संस्करणों के लोकल पन्ने भी इस बारे में परिचर्चाओं से रंगे पड़े थे। परिचर्चा क्या थी, सवाल और जवाब सब पहले से ही तैयार। जो जितना `जोशीला` बोले, उतना बड़ा देशभक्त। आरएसएस आखिर ऐसे ही `राष्ट्रवाद` की ज़मीन तैयार करता रहता है जो संविधान और अदालत का काम अपने हाथों में लेकर ही मजबूत होता है। अब तो कांग्रेस भी इस अभियान में खुलकर शामिल हो गयी है। सो, एक आवाज मुख्य थी कि कसाब पर मुकदमा क्यूँ चलाया, कानूनी प्रक्रिया पर पैसा क्यों ख़र्च किया, अदालत ने इतना लम्बा समय (हालांकि यह सबसे तेज सुनवाई थी) क्यूँ लिया। और यह भी कि कसाब को सरेआम सड़क पर क्यूँ नहीं लटका दिया जाता। जाहिर है कि बीजेपी का `राष्ट्रवाद` ऐसी ही फासीवादी और बर्बर कारगुजारियों का नाम है। (आरएसएस गांधी की हत्या से लेकर गुजरात में नरसंहार तक सरेआम कत्लो-गारत का `अनुष्ठान` करता भी रहा है।)

लेकिन कोई ऐसी सेंसिबल आवाज क्यूँ नहीं सुनायी दी कि हिन्दुस्तान को किसी आतंकवादी हमले से नहीं तोडा जा सकता है, बल्कि उसकी डेमोक्रसी को बेमानी करके ही यह काम किया जा सकता है? आरएसएस गांधी की हत्या से लेकर गुजरात में नरसंहार तक सरेआम कत्लो-गारत का `अनुष्ठान` करता भी रहा है। लेकिन उसकी दिक्कत यह है कि तमाम हमलों के बावजूद हिन्दुस्तान में लोकतंत्र आधा-अधूरा ही सही, उसके मंसूबों में बाधक भी बन जाता है।

इस दौरान हिन्दुवाद के नाम पर खड़े किये गए आतंकवादी संगठनों के खिलाफ भी लगातार सबूत मिल रहे हैं। जाहिर है कि इन कारगुजारियों के लिये भी न्याय प्रक्रिया के तहत ही कठोरतम सजा मिलनी चाहिए। जो नागरिक मुल्क और उसके लोकतंत्र में आस्था रखते हैं, उन्हें निश्चय ही उन्माद में बहने के बजाय विवेकपूर्ण ढ़ंग से लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरे को टालने के लिये संघर्ष करना चाहिए। उन्माद फैलाकर ही साम्प्रदायिक राजनीति करना आसान होता है और उन्माद फैलाकर ही आदिवासियों की जमीन पूंजीपतियों को लुटाने के लिये सैनिक अभियान चलाना सुगम हो जाता है। उन्माद फैलाकर ही यह काम आसान होता है कि किसी भी न्यायप्रिय , डेमोक्रेटिक, देशभक्त आवाज़ को पाकिस्तान या नक्सलवाद समर्थक करार दे दिया जाय।