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Monday, September 21, 2026

नरेन्द्र जैन की कविताएँ

नरेंद्र जैन 


मेरे तईं नरेन्द्र जैन हिन्दी कविता के चित्तप्रसाद हैं क्योंकि उनकी कविता का विजुअल कॉन्टेंट वैसा ही सुस्पष्ट है और इम्पैक्ट उतना ही मर्मभेदी. उनकी कविता पढ़ना पिछले पचास सालों में  हिन्दी समाज और वृहत्तर भारतीय समाज के उल्लास और अवसाद, उत्थान और पतन की चित्रवीथिका से गुज़रना है. पिछले दो दशकों की उनकी कविता में सेंस ऑफ़ लॉस इतना गहरा है कि पाठक के मन में सालों तक बजता रहता है उस ‘उदास धुन’ की तरह ‘जिसे रईस अहमद क्लेरीनेट पर बजा रहे थे*’।-भारतभूषण तिवारी

(To me, Narendra Jain is the Chittoprasad of Hindi Poetry, for his poems have the same unmistakable visual content and impact, which is equally poignant. Reading his work is a stroll through a picture gallery of joys and despairs, the rise and fall of the Hindi world and Indian society at large. His poems from the last two decades carry a profound sense of loss that resonates in a reader’s mind for years like a ‘melancholy tune played by Rais Ahmed on his clarinet*’.-Bharatbhooshan Tiwari) 

 

इस वक़्त


इस वक़्त

पीली सुनहरी रोशनी है

घर में फड़फड़ाती अकेली


दीवारों पर डोलती है

चीज़ों की आधी परछाई

क़मीज़ की दो बाँहें

ख़ाली बोतलों के आसपास दुबका अंधकार


तस्वीरों की ख़ामोश आकृतियाँ

डूबी हैं अपने निर्जीव अंधकार में

बाहर, मटमैले आसमान में

भटके हुए यात्री जैसा आधा चाँद

आख़िरी नज़र डालता है सामने फैले

अंधकार पर


कैसी है यह दुनिया

जो रोज़ जिए चली जाती है


कैसा है यह मिट्टी का दीया

जो फैलाता है

इस विध्वंस के बीच पीली सुनहरी रोशनी


आह, आखि़री तिनके का सहारा

कितना मज़बूत है चट्टान की तरह



समर्थ लोग


साधारण लोगों के बारे में

थोड़ा बहुत कह सकता हूँ

समर्थ लोगों के बारे में

न पहले कुछ कहा मैंने

न अब कह पाऊँगा


उस रास्ते से गुज़रता हूँ

थके-हारे लोग जहाँ आते जाते हैं 

उनके खुरदरे हाथों और आशंकित चेहरों पर

पढ़ता हूँ कितनी ही कथाएँ


समर्थ लोग उदास होते नहीं देखे मैंने

इतने समर्थ देखे समर्थ लोग मैंने

जो पलक झपकते ही कर दिया करते हत्या

चाहे वह एक विचार हो या आदमी


हर बार खदेड़ दिया गया मैं इतनी दूर

की बँधी रही मेरी आखि़री उम्मीद

थके-हारे लोगों से


समझा जाए इसे ही

समर्थ लोगों के प्रति

मेरी घृणा का पर्याय



रंग


पहले चटख़ हुआ करते हैं

फिर धीरे धीरे रंग

उड़ना शुरू कर देते हैं

वे इतने धुँधले हो जाते हैं कि

पहचाने नहीं जाते

वे धब्बा भर बच जाते हैं

धूसर, बेमेल, अनाकर्षक

उन्हें देखकर कोई प्रसन्न नहीं होता


बाज़ मौके ऐसे आते हैं

चित्रकार इन्हीं धूसर रंगों से

बनाता है अपना चित्र




संशय


कल मैंने फिर स्वप्न देखा

कि मेरी ट्रेन छूट गई है

और हाथ में टिकट लिए मैं हताश

प्लेटफार्म पर खड़ा हूँ

रात के सन्नाटे में

आते जाते वाहनों से बचते बचाते

मैं उस क़स्बे में प्रवेश करता हूँ

जिसका नाम याद नहीं आता

सहसा उस अनजान जगह मुझे

अपना घर दिख जाता है

वही दीवारें, पुराने दरवाज़े, खिड़कियाँ

मैं दरवाज़ा खटखटाता हूँ

स्वप्न में एक शख़्स खोलता है दरवाज़ा

और कहता है कि

जो शख़्स रहा करता था यहाँ

अब अन्यत्र चला गया है



Three Essays collective से प्रकाशित।
कविता लिखे ज़माना हुआ


कविता लिखे ज़माना हुआ

अब जो लिखते हैं कभी

कविता है या कविता का पैरहन

या कविता की हमज़ाद या कविता का

अभिनय करती कोई कविता

ज़्यादातर तो वह कविता कोई

बहुरूपिया हुआ करती है

वह बोलती तो है लेकिन परदे के पीछे से

कोई दोहरा रहा होता है उसके संवाद

वह हाव भाव चाल ढाल और

शक़्ल सूरत से भी कविता दिखना चाहती है

आग का दरिया तो मुश्किल ठहरा

तीली की हल्की सी कौंध नहीं यहाँ

कविता के अकाल में लेकिन

चौतरफ़ सैलाब उतर आया है कविता का

शब्द और काग़ज़ चीखते हैं

हमें बख़्शो!


कविता लिखे ज़माना हुआ



यही हासिल ठहरा


जो बात

शीशे की तरह साफ़ थी

उसमें एक बात की परछाई उतर आई है

नदी बह रही है पूरे वेग से

छायाकार ठहरा एक उदास शाम का मेहमान

उसके कैमरे में

शव की तरह लेटा है एक दृश्य

और वह अभी

बाहर नहीं आया है


बर्बादशुदा जीवन का

यही हासिल ठहरा



इर्द गिर्द


वह पत्थरदिल ना हो

लेकिन पत्थर की तरह ठोस हो

जंग लगे लोहे से उसे कोई वास्ता न हो

लेकिन हो वह पिघलते फ़ौलाद की मानिंद

संरचना उसकी ऐसी हो जैसे

बाँधा जा रहा हो कहीं एक लंबा पुल

रेलगाड़ियों के पहियों के घर्षण से खास

लगाव हो उसे

सूने और व्यस्त प्लेटफार्मों पर

वह लगातार आती जाती हो

गुमशुदा लोगों के पोस्टर में लिखी

मार्मिक अपील जैसी हो वह

कभी कभार टपकते हो उसकी आँख से आँसू


कोई ऐसी कविता

यहीं कहीं

तुम्हारे इर्द गिर्द ही चाहिए



धूल


नहीं हुआ शामिल 

दौड़ में 

हमेशा पाया गया पीछे


लेकिन इस बेडौल दुनिया के प्रति

मेरी दिलचस्पी कम न हुई


धूल में रहा

पाया गया लिथड़ा

धूल में ही


शब्द वहीं से शुरू हुए

जहाँ तोड़ रहा था कोई

रोटी का पहला कौर


इस भयावह दौर में

भूख के प्रति किया प्रकट सम्मान

कविता ने


मेरे लिए यही

बहुत हुआ

---

* भारतभूषण तिवारी की यह टिप्पणी नरेन्द्र जैन की कविताओं के Three Essays collective से प्रकाशित संग्रह `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे` से ली गई है। यहाँ दी गईं कविताएँ इसी संग्रह से ली गई हैं। भारत की टिप्पणी में आई ‘उदास धुन’ ‘जिसे रईस अहमद क्लेरीनेट पर बजा रहे थे` 2012 में आधार प्रकाशन से छपे संकलन 'चौराहे पर लोहार' में शामिल ‘विदिशा डायरी सीरीज’ की एक कविता की पंक्ति है। 

(नरेन्द्र जैन का फ़ोटो `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे` के बैक-कवर से लिया गया है। यह फोटो भारतभूषण तिवारी ने क्लिक किया है।)





Monday, May 14, 2018

बेटे के नाम चिट्ठी -चार्ल्स मंगोशी

Charles Mungoshi


।।बेटे के नाम चिट्ठी।।

अब कद्दू पक गए हैं.
साल की पहली मकई की फसल से हम
कुछ ही दिन दूर हैं.
यहाँ गाएँ भरपूर दूध दे रही हैं.
अगर तुम्हारे पिता की बात न हो तो
यह साल कोई ख़ास खराब नहीं रहा
तुम्हारे पिता की पीठ का दर्द दोबारा
लौट आया है और सारे कामकाज आ
पड़े हैं मेरे कन्धों पर.
तुम्हारे छोटे भाई-बहन स्कूल में ठीक-ठाक ही
पढ़ रहे हैं, सिर्फ़ रिंदई, तुम्हारी बहन,
समस्या बनती जा रही है. तुम्हें याद
होगा कि यह सब तुम्हें लिखा गया था.
क्या तुम्हें वह चिट्ठी मिली? - तुमने जवाब नहीं दिया।
अब देखो, जब से तुम्हारे पिता का पीठ दर्द शुरु हुआ तब से
हम तुम्हारी बहन रिंदई को स्कूल भेजने के लिए
पर्याप्त रुपये नहीं जुटा पाए हैं.
अपना
ज़्यादातर वक़्त रिंदई कुएँ के पास बैठी
रोकर गुज़ारती है और सिर्फ़ उसी की
वजह से यह चिट्ठी तुम्हें लिख रही हूँ.
मैंने सोचा था कि बीते क्रिसमस में
तुम हमारे संग होंगे, फिर मैंने सोचा कि
हो सकता है तुम बेहद व्यस्त हो और
शायद ईस्टर की छुट्टियों में आओ
और तभी तुम्हारे पिता लगभग हमें छोड़ कर चले ही गए थे, बेटे।
फिर मैंने सोचा कि सर्दियों से पहले
मैं तुम्हारे पास आऊँ. तुम्हें पता ही है कि साल
के उस मौसम में मुझे कितनी कोफ़्त होती है
लेकिन फिर तुम्हारे पिता ने बिस्तर पकड़
लिया और इस बार पहले से ज़्यादा
बदतर हालत हुई. हमने यह सोचना शुरु
कर दिया कि वे अगली बोवनी का मौसम
नहीं देख पाएँगे।

मैंने तुम्हारी बहन रिंदई
से कहा कि वह तुम्हें चिट्ठी लिखे लेकिन
तुम्हारे पिता ने साफ़ मना कर दिया। तुम्हें
पता है कि सारा दिन बिस्तर पर पड़े
वे कितने ज़िद्दी हो जाते हैं या जब उन्हें
वहम होता है कि हर एक उन्हें नज़रअंदाज़
किए जा रहा!
अब, टाम्बू, मेरे बेटे यह मत सोचना
कि मैं रुपयों की माँग कर रही हूँ
हालाँकि थोड़ा-बहुत हमें उनसे उधार लेना पड़ा
जो तुम्हारे पिता को अस्पताल ले गए थे
और तुम जानते हो कि कर्ज़ लेने से तुम्हारे पिता को कितनी घृणा होती है!
यही सब है जो मैं तुम्हें बतलाना चाहती थी.


मुझे उम्मीद है कि इस जुलाई में तुम हमारे संग होंगे।
तुम्हारा जवाब आए एक लम्बा अर्सा बीत गया
उम्मीद करती हूँ कि उसी पुराने पते पर यह चिट्ठी तुम्हें पाएगी।
सिर्फ वही एक पता है जो हमें मालूम है.

तुम्हारी माँ


(अंग्रेज़ी से अनुवाद- नरेन्द्र जैन) 

चार्ल्स मंगोशी Charles Mungoshi जिम्बाबवे के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उन्होंने अंग्रेजी और अपनी नेटिव लेंग्वेज Shona दोनों में प्रचुर लेखन किया है।

नरेन्द्र जैन हिंदी के कवि हैं। उनकी ख़ासियत यह है कि वे `सेलिब्रिटी हुए बग़ैर` हिंदी के बड़े कवि हैं। इन दिनों उज्जैन में रहते हैं।

Tuesday, April 10, 2012

नरेन्द्र जैन की कविताएं और असद ज़ैदी की टिपण्णी

वरिष्ठ कवि नरेन्द्र जैन के नए कविता संग्रह `चौराहे पर लोहार` (आधार प्रकाशन) से कुछ कविताएं

चौराहे पर लोहार

विदिशा का लोहाबाज़ार जहाँ से शुरू होता है
वहीं चौराहे पर सड़कें चारों दिशाओं की ओर
जाती हैं
एक बांसकुली की तरफ़
एक स्टेशन की तरफ़
एक बस अड्डे
और एक श्मशानघाट
वहीं सोमवार के हाट के दिन
सड़क के एक ओर लोहार बैठते हैं
हँसिये, कुल्हाड़ी, सरौते और
खुरपी लेकर
कुछ खरीदने के लिये हर आने-जाने वाले से
अनुनय करते रहते हैं वे
शाम गये तक बिक पाती हैं
बमुश्किल दो-चार चीज़ें
वहीं आगे बढ़कर
लोहे के व्यापारी
मोहसीन अली फख़रूद्दीन की दुकान पर
एक नया बोर्ड नुमायां है
`तेज़ धार और मज़बूती के लिये
ख़रीदिये टाटा के हँसिये`
यह वही हँसिया है टाटा का
जिसका शिल्प वामपंथी दलों के चुनावी
निशान
से मिलता जुलता है
टाटा के पास हँसिया है
हथौड़ा है, गेहूँ की बाली और नमक भी है
चौराहे पर बैठे लोहार के पास क्या है
एक मुकम्मिल भूख के सिवा?
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जोधपुर डायरी सीरीज से एक कविता

क़िले में अब
तोप, तमंचों, बंदूकों
तलवारों, गुप्तियों
बघनखों, लाठियों और
बल्लमों की भरमार है
महाराजा की शान में
पेश की गयी तलवार पर
अंकित है प्रशस्ति का वाक्य
और लिखा है नाम
उसे पेश करने वाले ग़ुलाम का
क़िले के झरोखों से उड़ता है
पक्षियों का गोलबंद झुंड
और तलवारों में कंपकंपी पैदा करता
क़िले के पार चला जाता है
क्यूरियो शॉप में
290 वर्ष पुरानी शराब की ख़ाली बोतल का दाम रुपये
दो हजार एक सौ ठहरा
लुभाने के लिए बहुत हैं अतीत के नाचते खण्डहर.
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अतियथार्थ

जैसे भागते-भागते किसी तेज़ गति के संग
किसी के हाथ से छूट जाता है
रेल का डिब्बा
या खाई से गिरते हुए नीचे
छूट जाता है रस्सी का अंतिम सिरा
या
विस्फोट के मुहाने तक
पहुँचते ही बुझ जाती है दियासलाई
हममे से
हर किसी के हाथ से
कुछ न कुछ छूट गया है
कहीं रखी होती है
ऐसी भी थाली
जिस पर रोटी का चित्र बना होता है
एक भूखे आदमी के हाथ का कौर
वहीं छूट जाता है हाथ से
इस काली सफ़ेद पुरानी तस्वीर में
यह शख़्स
ऐसा दिखलाई दे रहा
जैसे अभी-अभी भरपेट खाकर
थाली से उठा ही हो
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इधर

(विध्वंस : बाबरी मस्ज़िद)
कुछ कालिख
यहाँ वहाँ हाथों पर
चेहरे पर
शब्दों पर
कुछ कालिख
साज़ों पर बजती धुन पर
इधर सबसे ज़्यादा
आँखें चुरायी बच्चों से मैंने
हुआ तब्दील
शर्म के
जीते जागते जीवाश्म की शक्ल में
मार गया पाला
इधर आवाज़ को
इधर हुआ शर्मसार
दिवंगत् कवियों के समक्ष
इधर
और ज़्यादा
थक गया मैं
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विदिशा डायरी सीरीज से एक कविता

जिन घरों में बड़े भाई की कमीज़
छोटे भाई के काम आ जाती है
इसी तरह जूते, चप्पल और पतलून तक
साल-दर साल उपयोग में आते रहते हैं
वे कभी-कभार आते हैं बांसकुली
पतलून कमर से एक इंच छोटी करवाने
या घुटने पर फटे वस्त्र को रफू करवाने
अक्सर इन घरों में यदि पिता हुए तो
वे बीसियों बारिश झेल चुकी जैकिट पहनते हैं
और फ़लालैन की बदरंग कमीज़
जिन्हें सूत के बटन भी अब मयस्सर नहीं होते
रफ़ूगर की दुकान से
दस कदम आगे रईस अहमद
पुराने वाद्य-यंत्रों के बीच बैठे
क्लेरनेट पर बजाते रहते हैं कोई उदास धुन
यह धुन होती है कि
अपने चाक वक़्त को रफ़ू कर रहे होते हैं वे
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इससे पहले 2010 में आधार प्रकाशन से ही छपे नरेन्द्र जैन के कविता संग्रह `काला सफ़ेद में प्रविष्ट में होता है` की कविताएं और उस संग्रह पर छपी वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की टिपण्णी भी याद आ रही हैं। इस पोस्ट के साथ वह टिपण्णी भी यहां दे रहा हूं। -

`नरेन्द्र जैन की कविता को हम क़रीब 35 साल से जानते हैं. वक़्त के साथ इस जान-पहचान में पुख्तगी भी आई है. वह अपनी पीढ़ी के उन चंद खुशनसीब कवियों में हैं जिनकी कविता ने अपने समय की रचनाशीलता से एक ऐसा पायेदार रिश्ता बनाया है जिसमें कभी कोई अधीरता या बेजा आग्रह नहीं रहा : एक रचनात्मक तन्मयता, फ़िक्रमंदी लेकिन अपनी कविता के कैरियर से एक हद तक बेनियाज़ी नरेन्द्र का वह दुर्लभ गुण है जो उन्हें अपने समकालीनों के बीच आदर और प्यार का पात्र बनाता है।

नरेन्द्र जैन सहज ही अपने काव्य व्यक्तित्व और अनुभव-जगत की सम्पूर्णता के साथ अपनी कविता में मौजूद रहते हैं.हर नई कविता के लिए नुक्ता ढूँढ़ने और उसके इर्द-गिर्द अपनी काव्यकला को माँजने (या हथियार की तरह भाँजने) की ज़रूरत उन्हें कभी नहीं होती. एक आंतरिक संगीत, अक्षय रागदारी और नागरिक हयादारी की लौ उनकी कविताओं में हरदम मौजूद रहती है. अपने हमअस्रों के बीच उनकी शख्सियत इन्हीं चीज़ों की जुस्तजू से बनी है. वह अपनी गहन निजता और आन्तरिकता को भी अपने नागरिक और सामाजिक मन के माध्यम से ही पाने के हामी हैं. उनकी कविताएँअपने तग़ाफ़ुल में भी बहुत सी चीज़ों की ख़बर एक साथ रखती हैं – समाज, राजनीति, देश-विदेश, आसपास, कवि का अंतर्मन. यहाँ ऐसी सम्पूर्णता है जिसका सम्बन्ध लिखे जाने से कम, जिए जाने और घटित होने से ज़्यादा है.ज़िम्मेदारी और अकेलापन. दरअसल तनहाई की सच्ची गरिमा और अर्थवत्ता भी ऐसी ही कविता में रौशन होती है.

आज कविता एक भयावह सरलीकरण के दौर से गुज़र रही है और यह सरलीकरण मोटी समझ या ठसपन वाला सरलीकरण नहीं, एक नैतिक और राजनीतिक सरलीकरण है. चूंकि घुटन, पीड़ा, दुःख और क्रोध से, अन्याय और विषमता के प्रतिकार से, अंतर्विरोध की मार से बचकर कविता नहीं लिखी जा सकती, और लिखी जाए तो समकालीन कविता नहीं हो सकती, इसलिए यथास्थितिवादी रचनाकारों ने वास्तविक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की जगह काल्पनिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की भूलभुलैयाँ रचनी शुरू की है. बिना विद्रोह किए, बिना उस विद्रोह की क़ीमत चुकाने को तैयार हुए ये लोग विद्रोह और प्रतिरोध का एक रुग्ण रोमांटिक और उत्तर-आधुनिकतावादी संसार कलाओं में रच रहे हैं. अब मुठभेड़ और प्रतिरोध की जगह 'जेस्चर' और 'मेटाफर' ने ले ली है. देखते देखते आज ऐसे कवि काफ़ी तादाद में इकट्ठे हो गए हैं जो इस तरीक़े को ही असल 'तरीक़ा' और सच्चा 'सिलसिला' मानते हैं. इस परिदृश्य में नरेन्द्र जैन की कविता क्लैसिकल प्रतिरोध की बाख़बर कविता है, जहाँ अत्याचारी का चेहरा दिखाई देता है, और कवि जिन पीड़ितों की हिमायत कर रहा है उनके चहरे भी दिखाई देते हैं. उनकी कविता ने अपना पैना राजनीतिक फ़ोकस खोया नहीं है, बल्कि उसे मामूली जीवन की तरह जिया है.

नरेन्द्र की कविता एक राजनीतिक विभीषिका, विराट दुर्घटना, आपातकालीन परिस्थिति, अर्जेंट अपील या ख़तरे और चेतावनी के लिए जागने वाली कविता नहीं बल्कि दैनिक जीवन में राजनीतिक चेतना और व्यवहार के दाख़िल होने,जज़्ब होने और ज़ाहिर होने की कविता है. उनका सरोकार उस रोज़मर्रा से है जहाँ 'राजनीतिक' और 'ग़ैर-राजनीतिक' की कोई विभाजक रेखा नहीं होती, और जहाँ राजनीति अलग शख्सियत के साथ, मुखौटा लगाकर, खुद अपनी पैरोडी बनकर नहीं, मानवीय अनुभव के अनिवार्य पहलू की तरह आती है.

नरेन्द्र ने अपनी वामपक्षीय प्रतिबद्धता को बोझ की तरह नहीं ढोया; उसे अपने रचनात्मक और नैतिक जीवन में जज़्ब किया है और एक गहरी ज़िम्मेदारी से उसे बरता है. उनके पास मुक्तिबोध के उस मशहूर सवाल का जवाब है.` -असद ज़ैदी

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आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16 पंचकूला 134113 (हरियाणा)