Showing posts with label वाम. Show all posts
Showing posts with label वाम. Show all posts

Sunday, August 2, 2020

अपने विद्वेषी पूर्वजों के मोह में धूर्तता कर रहे हैं अपूर्वानंद?

पिछली पोस्ट से आगे 
अपूर्वानंद से बात कर रहे युवकों ने एक सीधे सवाल के जवाब में `कलाकार के अपने भीतर रहने` जैसी तमाम बातें झेलने के बाद फिर से अपने सवाल पर लौटने की कोशिश की। दब्बूपन से ही सही पर अपना सवाल और साफ़ करने की कोशिश करते हुए मेजबान युवा ने पूछा, ``…हम लोग एक्चुअली सवाल के जरिये जानना चाहते थे कि जहाँ कुछ लोग इस पर सवाल उठाते हैं कि वो एक फेक राष्ट्रवाद था, उन्होंने क्यों लिखा, लोग ये देखना भूल जाते हैं कि उस वक़्त और भी लेखक थे जो बिल्कुल जैसा आपने कहा, खुद में जीकर, आर्ट में छुपकर जो उस समय की सरकार थी, उस समय अंग्रेज थे, उनको बढ़ावा देने वाली, उस समय की जो पार्टी इन्वॉल्व थी, उनको बढ़ावा देने वाला लिटरेचर लिख रहे थे…``
सवाल में और भी तमाम बातें थीं पर शायद अपूर्वानंद के सीने में लगने वाली बात यही थी। वे बोले, देखिए पहले तो हम इसको समझ लें कि ऐसा शायद ही कोई लेखक था जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए काम कर रहा हो। ब्रिटिश हुक़ूमत के बारे में हम अभी जैसा सोचते हैं, उस वक़्त के सारे लोग उसी तरह नहीं सोचते थे। यह कहकर अपूर्वानंद का हृदय अपने `पूर्वजों` से एकमेक होने लगा और वे मुग़ल सल्तनत में जा पहुंचे। अपूर्वानंद बोले, जैसे मुग़लिया-मुग़ल सल्तनत थी  या कोई और राज्य, वो तो आख़िर राज की ही चीज़ थी। बादशाह की चीज़ थी। उसमें जनता की तो भागीदारी नहीं थी। फिर उन्होंने तुलसी द्वारा मंथरा के मुँह से बुलवाई गई उस मशहूर पंक्ति का सहारा लिया कि कोई भी नृप हो, हम को क्या फ़र्क़ पड़ता है। अपूर्वानंद बोले कि मैं तो तय नहीं कर सकता कि राज्य कैसा हो। तो मुग़ल बादशाहों की जगह अगर अंग्रेज आ गए तो उसे हमारे गाँव की ज़िंदगी, बाकी ज़िंदगियों पर बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ा।
यह एक ऐसा आदमी बोल रहा था जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिन्दी विभाग का प्रोफेसर है और जिसने हिन्दी के बाहर अपनी अच्छी-ख़ासी नेटवर्किंग करके अपनी पहचान एक बड़े सुलझे हुए विद्वान की बना रखी है। आख़िर उसे यह बताने में क्या दिक्कत थी कि प्रेमचंद राष्ट्रीय आंदोलन में घुसे हुए थे। मुग़ल शासन और अंग्रेजी राज के बीच 1857 की क्रांति भी हुई थी। जनता में गहरा उबाल था और उसे राजनीतिक नेतृत्व भी मिल रहा था। आंदोलन की भी कई धाराएं थीं और अंग्रेजों के पिट्ठुओं की भी जमात थी। हिन्दी लेखक भी थे जो अपूर्वानंद जैसी ही बातें करते थे और मुगल सल्तनत जैसे धूर्त तर्कों के जरिये अंग्रेजों के राज को फायदा पहुँचाने वाली साम्प्रदायिक और विद्वेषी चालें चला करते थे। प्रेमचंद ऐसे अभियानों से भी गुत्थमगुत्था थे। अपूर्वानंद ने धूर्तता और निर्लज्जता का अपूर्व परिचय देते हुए पहले मुगल काल में छलांग लगाई और फिर राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही चल रहे समाज सुधार आंदोलनों को सवाल के बरक्स खड़ा करने लगे। राजा राममोहन राय और ईश्वर चंद्र विद्या सागर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि बाल विवाह समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करने या विधवा विवाह शुरू करने की प्रक्रिया अंग्रेजी राज के बाद लोगों ने उनकी सहायता से ही शुरू की। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के साथ थे या नहीं थे, इस तरह देखने से महात्मा फुले, रमाबाई, आंबेडकर आदि के साथ अन्याय होगा। सवाल को उसकी जगह से हटाकर कहीं और ले जाने के पीछे अपूर्वानंद का मकसद क्या था? हिन्दी में प्रेमचंद अपने लेखन के जरिये राष्ट्रीय आंदोलन में मुब्तिला थे और उनके समकालीन क्या कर रहे थे या नहीं कर रहे थे, इस पर बात करने के बजाय सवाल को ही संदिग्ध बनाकर जो ओट लेने की कोशिश अपूर्वानंद ने की, वह इतनी धूर्तता भरी थी कि समझ तो बातचीत कर रहे युवा भी गए होंगे पर अपने ही सीनियर्स के द्वारा गोबर को देवता बना कर खड़ा कर देने की वजह से बोल नहीं पा रहे थे।
क्या मेजबान युवाओं का सवाल और अपूर्वानंद के जवाब में कोई तअल्लुक़ बनता है? अगर प्रेमचंद राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा थे तो क्या वे समाज सुधार आंदोलनों या बराबरी के दूसरे संघर्षों के ख़िलाफ़ खड़े थे या अगर उनके कोई समकालीन विभाजनकारी राह पर चलकर राजसत्ता को फायदा पहुँचा रहे थे तो क्या इसलिए कि राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आंबेडकर, फुले, रमाबाई आदि शख़्सियतें विभिन्न मसलों पर सक्रिय थीं? प्रेमचंद के यहाँ तो उनकी समझ और सीमाओं के साथ सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, साम्प्रदायिकता, स्त्रियों की स्थिति आदि सवाल केंद्रीयता पा रहे थे। राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भागीदारी का मतलब भी इन सभी बातों से मिलकर बनता है। अपूर्वानंद को बताना चाहिए था कि हिन्दी में वे कौन लोग थे जो साम्प्रदायिकता, छुआछूत, स्त्री शोषण आदि मसलों पर प्रेमचंद्र के ही विरोध में खड़े थे। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनके वे कौन पूर्वज थे जो बाल विवाह और विधवा विवाह का उग्र विरोध कर रहे थे। हिन्दी की गौरवाशाली परंपरा के ज़िक्र से उन्हें सांप क्यों सूंघ गया और विभाजनकारी `पुरोधाओं` के बचाव में वे शातिराना कुतर्कों पर क्यों उतर आए? और अपूर्वानंद फिर से उसी ज्ञान पर लौट आए कि प्रेमचंद की दिलचस्पी ज़िंदगी में थी। लोग कैसे जी रहे हैं, वे बहुत रुचि के साथ देख रहे थे और उनका चित्रण करने की कोशिश कर रहे थे। उस जीवन के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास कर रहे थे।

अपूर्वानंद ने प्रेमचंद की कहानी `मंदिर और मस्जिद` पर चर्चा करते हुए अज्ञेय वगैराह के हवाले दिए और कहा कि प्रेमचंद को इंसानियत की अच्छाइयों में यक़ीन है। कोई अपने धर्मस्थल की नहीं बल्कि दूसरे के धर्मस्थल की भी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त न करे, खून खौल उठे। अगर ऐसा हो सकता है तो आप पूरे इंसान हैं और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो आप की इंसानियत में कुछ कमी है। यह है ज़िंदगी का वो पैमाना है जो प्रेमचंद पेश करते हैं।  लेखिका सुसेन का हवाला देकर उन्होंने कहा कि इतना ऊंचा पैमाना जिस पर खरा उतरना मुमकिन न हो, उससे लोग चिढ़ जाते हैं और कहते हैं कि ऐसा करने वाला या तो मूर्ख है या इलीट। इस से वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों लोग चिढ़ जाते हैं। आखिर, अपूर्वानंद अपने इन दिनों के अपने मुख्य एजेंडे पर आए और बोले कि (बहुत लोग मानते हैं) जो मेरे मुताबिक नहीं होता तो उसे मारना ही पड़ेगा न! मेजबान युवा ने मूर्खता से हामी में सिर हिलाते हुए कहा, और कोई रास्ता ही नहीं है। अपूर्वानंद ने कहा कि सत्ताएं निरंकुश हो जाती हैं, वो लेनिन की हों, स्टालिन की हों, माओजेजोंग की हों या हिटलर की हों। वे विश्वास करतीं हैं कि मैं जिस तरह देख रहा हूँ, आपको जिस ढांचे में डाल रहा हूँ, आप बस वही हैं। चूंकि मैं अच्छा हूँ और आप अच्छे नहीं हैं तो आपको खत्म होना चाहिए। प्रेमचंद कहते हैं कि मनुष्य वह है जिसको अहसास है कि वह अधूरा है…।
तो इस धूर्तता भरे प्रवचन के आयोजन के लिए और ऐसे धूर्तों के लिए सीढ़ी बनते रहने वाले वाम बुद्धिजीवियों को बधाई देनी चाहिए?
***  

अपू्र्वानंद की नई उपलब्धि : वाम के मंच से वाम पर हमला

भारत में वाम और उसकी सांस्कृतिक इकाइयां क्या बौद्धिक रूप से इतनी दरिद्र हो चुकी हैं कि वे लेनिन के विरुद्ध घृणा भरे अभियान चलाकर राजसत्ता की चापलूसी पर उतारु शख़्स को ही अपना मेंटर बना लें? इंडियन पीपल्स थियेटर असोसिएशन (इप्टा) के लाइव में अपूर्वानंद को देखकर मैं चौंक पड़ा। तीन महीने पहले जो शख़्स `अक्तूबर क्रांति` और उसके नायक लेनिन को लेकर विष-वमन कर रहा था, भारतीय वाम उसके लिए लाल कालीन बिछा रहा हो तो मेरा चौंकना ग़ैर-वाजिब नहीं कहा जा सकता। अपूर्वानंद के लिए तो यह एक मज़ेदार उपलब्धि की तरह रही होगी कि वह वाम के मंच से ही वाम विरोधी दुष्प्रचार कर आया हो।
31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती के मौके पर बिहार इप्टा के ऑनलाइन आयोजन ('एक सौ चालीस वर्ष के प्रेमचंद' संवाद और कहानी पाठ) के संवाद सत्र में अपूर्वानंद को आमंत्रित किया गया था। इप्टा की केंद्रीय इकाई के पेज पर इस लाइव को शेयर किया जा रहा था। आज़ादी के आंदोलन के दौरान इंडियन प्रग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन के गठन के सिलसिले में ही इंडियन पीपल्स थियेटर असोसिएशन (इप्टा) की स्थापना हुई थी। प्रेमचंद पीडब्ल्यूए की स्थापना में शामिल थे। कहना न होगा कि लेनिन और उसके साथियों ने दुनियाभर में राजनीतिक और सांस्कृतिक हलकों में जो प्रगतिशील तड़प पैदा की थी, पीडब्ल्यूए और इप्टा उसी की देन थे। इप्टा की धूम, धमक और इसका शानदार प्रभाव इतना व्यापक रहा कि उसने आज़ादी की लड़ाई से लेकर राजनीतिक व सामाजिक बराबरी की तमाम लड़ाइयों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उसका असर सिनेमा जैसे मनोरंजन के पॉपुलर और ताक़तवर माध्यमों को भी किसी हद तक सेकुलर और ग़रीबों का हिमायती बनाए रहा। उसकी रौशनी अभी तक चली आती है। कहते है कि इप्टा के पराभव की वजह भी भारतीय वाम नेतृत्व के विवादास्पद फ़ैसले ही थे। अफ़सोस कि ऐसे जगमग आंदोलन के मंच पर एक ऐसा शख़्स प्रवचन दे रहा था जिसका मुख्य एजेंडा ही इस आंदोलन को रौशन बनाने वाले विचार पर हमला करना हो। हाल ही में 23 अप्रैल को अपूर्वानंद ने `इंडियन एक्सप्रैस` में लेख लिखकर अक्तूबर क्रांति और लेनिन को लेकर जमकर ज़हर उगला था। देने वालों ने जवाब दिए पर हैरानी यह थी कि लेनिन को आदर्श मानकर चलने वाली भारत की तीनों बड़ी वाम पार्टियों के सांस्कृतिक संगठनों ने चुप्पी साथ ली थी और उनके नेतृत्व ने `ससुर-दामाद` के प्रति जातिगत निष्ठा का निर्वाह किया था।
अपूर्वानंद के लिए रेड कार्पेट बिछाने वाले कह सकते हैं कि उन्होंने अपूर्वानंद को वाम या लेनिन पर बोलेन के लिए नहीं बुलाया था बल्कि बतौर `प्रेमचंद विशेषज्ञ` आमंत्रित किया था। लेकिन, अपूर्वानंद ने ऐसी गुंजाइश छोड़ी ही नहीं। प्रेमचंद पर बोलते-बोलते वे लेनिन, माओ और हिटलर के साथ खड़ा कर हिंसा-अहिंसा पर नसीहत देने आ गए। एक तरह से उन्होंने फिर ऐलान किया कि अब उनका एजेंडा यही है। दिलचस्प यह है कि इस लाइव को सुनने के बाद ही यह ज्ञान हुआ कि अपूर्वानंद इस बीच प्रेमचंद विशेषज्ञ भी बन चुके है। अपूर्वानंद से बातचीत कर रहे दो युवा बार-बार प्रेमचंद पर उनकी किसी प्रेमचंद श्रृंखला का पारायण कर चुकने का ज़िक्र कर रहे थे। इन दोनों युवाओं के हृदय में अपूर्वानंद के प्रति ऐसी श्रद्धा थी कि उसकी धूर्तता भरी बातों का प्रतिवाद करना तो दूर, वे `जी सर`, `जी सर` करते जाते थे।
प्रेमचंद पर अपूर्वानंद का ज्ञान-दान पूरी तरह धूर्तता भरा रहा। फेसबुक पर ऐसे कई योद्धाओं को हम देखते हैं जो आरएसएस व भाजपा के प्रवक्ताओं की तरह सवाल को छोड़कर अपना मनचाहा ज्ञान पेलने लगते हैं। सबसे पहले तो उन्होंने कहा कि वे 140 साल के नहीं, 110 साल के प्रेमचंद पर बात करेंगे क्योंकि प्रेमचंद के रूप में साहित्यिक अवतार 1910 में हुआ। अपूर्वानंद की पूरी बातचीत इसी शैली पर टिकी हुई थी। वे बातचीत में शामिल युवाओं की श्रद्धा और मूर्खता का लाभ उठाकर सवालों का जवाब देने के बजाय प्रेमचंद को एक ऐसा राजनीतिक चेतना विहीन लेखक साबित करने में जुटे रहे जिस पर न उस समय के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों का असर था और न वह अपने लेखन से सचेत रूप से राष्ट्रीय आंदोलन में कोई भूमिका निभा रहा था। कोई मूर्ख या धूर्त ही कहेगा कि प्रेमचंद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की उपज नहीं थे या भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर वे असर नहीं डाल रहे थे। असल में अपूर्वानंद का कष्ट है - नवजागरण में प्रेमचंद की भूमिका। वह भूमिका जो अपने समकालीन और अपने पूर्व के हिन्दी लेखकों में व हिन्दी समाज और राजनीति में सक्रिय साम्प्रदायिक, जातिवादी और राजभक्त शक्तियों से टकराती थी। वह भूमिका जो हिन्दी की दुनिया में पहली बार एक बड़ा निर्णायक प्रतिरोध पैदा करती है। अपूर्वानंद को इस भूमिका पर परदा डालना था और हिन्दी के खलनायकों को नाम लिए बिना सर्टिफिकेट देना था कि प्रेमचंद हों या कोई भी लेखक सभी `एक जैसे होते हैं`। अपूर्वानंद के मुताबिक, प्रेमचंद की दिलचस्पी कहानी-क़िस्से लिखने-पढ़ने में थी और यही वे करते थे।
`सोज़े वतन` का ज़िक्र आ चुका था। सवाल करने वाले ने अपूर्वानंद से पूछा कि नवाब राय-महताब राय वाले फेज़ में प्रेमचंद की कहानियां देशभक्ति से ओतप्रोत थीं जिस पर अंग्रेजी सरकार ने सख़्ती बरती तो क्या वे प्रेमचंद के रूप में देशभक्ति पर लौटे या उसको छोड़ कर चले। क्योंकि आजकल हम देखते है कि ये जो फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद चल रहा है, तो क्या प्रेमचंद का वो राष्ट्रवाद वहीं पे विराम लग गया था या उसको उन्होंने अपनी रचना में कहीं न कहीं दिखाने की कोशिश की है? अपूर्वानंद ने जवाब में लंबा ज्ञान दिया पर मूल सवाल से पूरी तरह कन्नी काट गए कि प्रेमचंद देशभक्ति की तरफ़ लोटे थे या नहीं और कि उनकी रचनाओं में यह आई थी या नहीं। वजह वही कि वे जिस एजेंडे को लेकर इस बातचीत में आए थे, उस पर ही बोलना मात्र उनका ध्येय था। वे कलाकार के अपने भीतर रहने, कला प्रचार का माध्यम न होने जैसे पुराने घिसे-पिटे जुमले बोलते गए। अपूर्वानंद ने कहा - ``जिस तरह हम सोचते हैं, लेखक-कलाकार उस तरह अपना काम नहीं करता है। प्रेमचंद की पहली दिलचस्पी थी कहानी से और वो कहानी पढ़ना चाहते थे और कहानी लिखना चाहते थे। आप कह रहे हैं, देशभक्त, राष्ट्र, राष्ट्रवाद, जनता। ये सारी चीज़ें थीं पर पहली बात थी ज़बान में दिलचस्पी औप कहानी कहने में दिलचस्पी। ये बात अटपटी लग सकती है लेकिन अंग्रेजी हक़ूमत में रहते हुए, मैं हो सकता है, सिर्फ़ अपने भीतर रहा हूँ। अपने भीतर रहने का मतलब है, अपनी कला के भीतर रहा हूँ। क्योंकि प्रेमचंद की रुचि थी कहानियों में, कथा में। और उन्होंने अपने पहले का कथा-साहित्य काफ़ी घोटा था। उनकी परवरिश उसी में हुई थी। क़िस्से उन्हें अपनी ओर खींचते थे। प्रेमचंद का काम कहानी-क़िस्से लिखना था। प्रेमचंद का काम यह नहीं था कि देशभक्ति का प्रसार करने के लिए क़िस्सा लिखा जाए या राष्ट्रवाद का प्रचार करने के लिए कहानी लिखी जाए। कहानी कोई माध्यम नहीं है कि कहानी लिखी जाए। इसको यूं समझना चाहिए कि कहानी हो, कविता हो या उपन्यास हो, वह किसी प्रचार को व्यक्त करने का माध्यम नहीं होता है।``
अपूर्वानंद शायद प्रचार की जगह विचार बोलना चाह रहे थे कि कहानी या कोई कला तो कला होती है, किसी विचार को व्यक्त करने का माध्यम नहीं होती है। लेकिन, कोई कहेगा कि यह उनके मुँह में अपनी बात घुसेड़ने की कोशिश हुई तो यह छोड़कर उस सवाल के जवाब में चल रहे उनके भाषण के अगले वाक्य सुनते हैं जिनके लिए उन्होंने इतनी लंबी मशक्कत की थी।
``कविता या नाटक या कहानी या उपन्यास या कोई भी कला-माध्यम या कोई भी कला, उसका विचार उसका अपना विचार होता है। वो गांधी का विचार नहीं है, वो कोई दादा भाई नौरोज़ी का विचार नहीं है, सरोजनी नायडू का नहीं है। उसका ख़ुद का प्रेमचंद का अपना विचार प्रेमचंद का विचार है। वह कोई गांधीवाद, मार्क्सवाद, इसको व्यक्त नहीं कर रहे हैं। राष्ट्रवाद, इसको व्यक्त नहीं कर रहे हैं।``
अपूर्वानंद को सीधे यह कहने में शायद शर्म आ रही थी कि प्रेमचंद का लेखन सचेत राजनीतिक लेखन भी है। अपनी कहानियों में भी वे कोई ग़ाफिल कहानीकार भी नहीं हैं। उनका लेखन एक निरंतर यात्रा है। गांधीवाद का उन पर गहरा प्रभाव रहा और दुनियाभर के रचनाकारों को उद्वेलित कर रहे मार्क्सवाद से भी वे अछूते नहीं हैं। हालांकि, ये तमाम बहसें हो चुकी हैं और उनके पत्रों व बाद के उनके भाषणों से यह सब पटाक्षेप भी हो चुका है पर इससे डरे अपूर्वानंद ने गांधीवाद के प्रभाव को भी नकारने का नाटक करते हुए दादा भाई नौरोज़ी और सरोजनी नायडू का भी नाहक ही घसीट लिया। ऐसे लंपट बुद्धिजीवियों का यही तरीक़ा है। जाहिर है कि हर लेखक का विचार उसका अपना ही विचार होता है और वह किसी विचार को अपने ही ढंग से ग्रहण करता है। जैसे वाम विचार को अपने ससुर नंद किशोर नवल की तरह अपूर्वानंद ने करियर और बौद्धिक दुनिया में जुगाड़बाजी के लिए इस्तेमाल कर लिया और प्रेमचंद ने अपनी पक्षधरता और प्रखरता के तौर पर हासिल किया था।
अपूर्वानंद ने समझाया कि प्रेमचंद ज़िंदगी जीने का एक पैमाना आपके सामने रख रहे हैं या ज़िंदगी का मेयार पेश कर रहे हैं। कहानीकार की प्राथमिक दिलचस्पी ज़िंदगी में होती है, लोगों में होती और वो उनके बारे में बात करना चाहता है। अपूर्वानंद की इस बात से क्या इंकार हो सकता है कि प्रेमचंद की दिलचस्पी लोगों में थी और उनके यहाँ वीरता, त्याग, उत्सर्ग, दोस्ती, दयानतदारी, सहानुभिति वगैराह भावनवाओं और संवेदनाओं का बड़ा महत्व था। लेकिन, प्रेमचंद निरा राजनीतिक कहानीकार थे यह साबित करने की कोशिश करना या इस सीधे सवाल कि क्या `सोज़े-वतन` जला दिए जाने के बाद देशभक्ति उनकी रचनाओं में लौटी, पर ऐसा प्रवचन जो उनकी वैचारिक यात्रा को छुपाने की कोशिश करता हो, असल में अपूर्वानंद की वैचारिक धूर्तता का प्रमाण है।
(जारी)

Monday, December 30, 2013

वाम पक्षों में यौन हिंसा के मामले और जवाबदेही : लॉरी पैनी



(लॉरी पेनी ब्रिटेन की मशहूर नारीवादी वामपंथी लेखक और ब्लॉगर हैं. उनकी यह टिप्पणी न्यू स्टेट्समन पत्रिका में प्रकाशित हुई  थी जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखती हैं. घटना विशेष और देश के ख़ास सन्दर्भ में लिखी गई यह टिप्पणी हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी कितनी मौजूं है ये देखकर हैरत और अफ़सोस दोनों का अहसास होता है. इस टिप्पणी का अंग्रेजी से अनुवाद भारतभूषण तिवारी ने किया है।)

वाम पक्षों में होने वाली यौन हिंसा के साथ किस तरह पेश आएँएक केस स्टडी पर नज़र डालते हैं.
जो लोग पहले से वाकिफ़ नहीं है उनके लिए बता दिया जाए कि सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (एसडब्ल्यूपी) कई हज़ार सदस्यों वाला एक राजनीतिक संगठन है जो 30 से भी अधिक सालों से ब्रिटिश वाम की प्रमुख ताक़त रहा है ब्रिटेन में सड़कछाप फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में वह आगे रहा है,पिछले कई सालों से छात्र और कामगार आंदोलन में उसकी बड़ी सांगठनिक उपस्थिति रही है और जर्मनी की डी लिंख जैसे अन्य देशों के बड़े,सक्रिय दलों से संलग्न रहा है. यूके के बहुत से बेहद महत्वपूर्ण चिन्तक और लेखक इस पार्टी के सदस्य हैं अथवा पूर्व सदस्य रहे हैं.
ब्रिटेन के बहुत से वामपंथियों की तरह मेरी भी उनसे अपनी असहमतियाँ रही हैं मगर मैं उनके सम्मेलनों में बोल चुकी हूँउनकी चाय पी चुकी हूँ और जो काम वे करते हैं उसके प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान हैउनका समूह गौण या परिधि के बाहर का नहीं हैवे महत्त्व रखते हैंऔर यह भी महत्त्व रखता है इस वक्त लैंगिकवाद (सेक्सिज़्म), यौन हिंसा और जवाबदेही के वृहत मुद्दों पर बहस की वजह से पार्टी का ठीकरा बहुत बुरे तरीके से फूट रहा है.
जनवरी के दूसरे हफ्ते में पता चला कि एक वरिष्ठ पार्टी सदस्य के खिलाफ जब बलात्कार और यौन हिंसा के आरोप लगाए गए,तो मामले की रपट पुलिस को नहीं दी गई बल्कि उसे खारिज किए जाने से पहले उससे 'अंदरूनी तौरपर निपटा गयाजनवरी की शुरुआत में हुए पार्टी के वार्षिक सम्मेलन की लिखित प्रतिलिपि (ट्रांसक्रिप्टके अनुसार शिकायत की तहक़ीक़ करने की अनुमति कथित बलात्कारी के मित्रों को दी गई,इतना ही नहीं बल्कि कथित पीड़ितों का और भी उत्पीडन किया गयाउनके पीने की आदतों और पूर्व संबंधों पर सवाल उठाए गए,और जिन्होंने उनका साथ दिया उन्हें निष्कासित कर दिया गया या किनारे कर दिया गया.
पार्टी के एक सदस्य टॉम वॉकर ने इस हफ्ते उकताकर इस्तीफ़ा दे दिया. वे बताते हैं कि नारीवाद (फेमिनिज़्म) को  "पार्टी नेतृत्व के समर्थक बड़े प्रभावशाली ढंग से अपशब्द की तरह इस्तेमाल करते हैं..जेंडर के मुद्दों पर जो 'अति चिंतितनज़र आता है उसके खिलाफ यह असरदार तरीके से इस्तेमाल किया जाता है."
10 जनवरी को प्रकाशित अपने साहसी और सिद्धांतों पर आधारित अपने त्यागपत्र में वॉकर ने कहा कि“वाम पक्षों में शक्तिशाली पदों पर आसीन बहुत से पुरुषों की यौन राजनीति पर ज़ाहिर तौर पर एक सवालिया निशान लगा हैमुझे लगता है इसकी जड़ इस बात में है कि या तो प्रतिष्ठा के कारण,या आतंरिक लोकतंत्र के अभाव के कारण या दोनों ही वजहों से ये अक्सर ऐसे पद होते हैं जिन्हें असल में चुनौती नहीं दी जा सकतीये यूँ ही नहीं हुआ कि हाल में दुनिया भर में लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों का फोकस 'सज़ा से ऊपर होने की संस्कृति’ (कल्चर ऑफ इम्प्युनिटीके विचार पर था.सोशलिस्ट वर्कर ने इशारा किया है कि किस तरह संस्थाएँ अपने अंदर के ताक़तवर लोगों को बचाने के लिए अपने आप को बंद सा कर लेती हैंजो बात स्वीकार नहीं की गई है वह यह कि जीवित रहने के लिए आत्म-रक्षा की अपनी प्रवृत्ति के साथ एसडब्ल्यूपी भी इन अर्थो में एक संस्था ही हैजैसा कि पहले कहा गया हैस्वयं के विश्व-ऐतिहासिक महत्त्व में उसका भरोसा ऐसी बातों को छिपाने की कोशिशों और दुष्कर्मियों को सुरक्षित महसूस करवाने का निमित्त बनता है.
पार्टी के सम्मेलन में यह मामला सामने आने पर और बहसों की लिखित प्रतिलिपि के इंटरनेट पर लीक होने के बाद अब सदस्य भारी संख्या में पार्टी छोड़ रहे हैं या निष्कासित किए जा रहे हैं.
एसडब्ल्यूपी के काफी पुराने सदस्य और लेखक चाइना मिएविल ने मुझसे कहा कि बहुत से सदस्यों की तरह वे भी "हक्का-बक्काहैं: “इन आरोपों को लेकर जिस तरह का बर्ताव किया गया आरोप लगाने वालों के पूर्व संबंधों और पीने की आदतों को लेकर उठाये गए सवालों से भरपूरकिसी और सन्दर्भ में हम तुरंत और उचित ही इसकी लैंगिकवादी कह कर भर्त्सना कर देते वह भयावह हैलोकतंत्रजवाबदेही और आतंरिक संस्कृति की यह भीषण समस्या है कि ऐसी स्थिति उपजती है और यह तथ्य भी कि प्रभारी वर्ग जिसे अवांछनीय मानता है उस तरीके से ऑफिशियल लाइन के खिलाफ बात करने वालों को 'गुप्त गुटवादके लिए निष्कासित किया जा सकता है.
मिएविल ने समझाया कि अन्य कई संगठनों की ही तरह उनकी पार्टी में भी इस तरह की समस्याओं को आगे बढाने वाले शक्ति सोपानक्रम (पावर हाइरार्कीलंबे समय से विवादास्पद रहे हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि "बिलकुल इसी तरह के लोकतंत्र के अभावकेंद्रीय समिति और उनके वफादारों की अत्यधिक शक्तिकथित 'असहमतिको लेकर सख्त पुलिसिया रवैयाऔर गलतियों को मानने से इनकारजैसे कि वर्तमान स्थिति जो नेतृत्व के दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार से उपजी त्रासदी है-जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए हम बहुत से लोग बरसों से संगठन की संस्कृति और संरचना में बदलाव के लिए खुले रूप से लड़ रहे हैंपार्टी के हम सभी लोगों में इस तरह के मुद्दों को स्वीकार करने की विनम्रता होनी चाहिएएसडब्ल्यूपी के सदस्यों की ये ज़िम्मेदारी है कि वे हमारी परम्परा के भले के लिए लड़ें,बुरी बातों को बर्दाश्त न करें और हमारे संगठन को ऐसा बनाएँ जैसा वह हो सकता है मगर बदकिस्मती से अब तक हुआ नहीं है.

शक्तिशाली पदों पर बैठे पुरुषों द्वारा यौन दुर्व्यवहार और महिला-द्वेष (मिसोजनीअबाधित रूप से चलने देने वाली संरचनाएँ रखने में राजनीतिक दलों के बीचवामपंथी समूहों के बीचप्रतिबद्ध लोगों के संगठनों के बीचया वास्तव में मित्रों या सहकर्मियों के समूहों के बीच ब्रिटिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी का मामला शायद ही असामान्य हैफक़त पिछले 12 महीनों के दौर में जिन बातों की इशारा किया जा सकता है वह हैं जिमी साविल के मामले में बीबीसी का बर्तावया विकिलीक्स के वे समर्थक जो मानते हैं कि जूलियन असांज को स्वीडन में बलात्कार और यौन दुष्कर्म पर सफाई देने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
व्यक्तिगत तौर पर मैं दो मिसालें दे सकती हूँ जिनमें सम्मानित व्यक्ति कष्टपूर्वक अलग हो गए और फौरेवर फ्रेंडशिप समूह जिनमें ऐसी घटनाओं को स्वीकार करने का साहस नहीं थाएकमात्र फर्क यह है कि एसडब्ल्यूपी ने खुले रूप से उन अनकहे नियमों की बात की जिनकी वजह से ऐसा डराना-धमकाना अक्सर चलता जाता हैदीगर समूह इतने बेशर्म नहीं हैं जो यह कह दें कि उनके नैतिक संघर्ष नारीवाद जैसे महत्त्वहीन मुद्दों से ज्यादा अहम हैं भले ही असलियत में उनका तात्पर्य यही होया यह दावा कर दें की सही सोच रखने वाले वे लोग और उनके नेतागण कानून से ऊपर हैंप्रतीत होता है कि एसडब्ल्यूपी के नेतृत्व ने यह बात अपने नियमों में लिख रखी थी.
यौन हिंसा के मामले बरतने में वाम को दिक्कत होती है ऐसा कहने का मतलब यह नहीं कि दूसरी जगहों पर यह समस्या नहीं हैमगर खास तौर पर वाम में या वृहत रूप में प्रगतिशीलों में पाए जाने वाले 'रेप कल्चरको स्वीकार करने और हल करने को लेकर एक अड़ियल अस्वीकार ज़रूर हैनिश्चित रूप से इसका सम्बन्ध इस ख़याल से है कि प्रगतिशील होने के नातेबराबरी और सामाजिक न्याय  के लिए लड़ने के नातेऔर हाँइस नाते के नातेकिसी तरह से हम नस्ल,जेंडर और यौन हिंसा के मुद्दों को लेकर व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने से ऊपर हैं.
हमारे अपने बर्ताव का विश्लेषण करने को लेकर अनिच्छा जल्दी ही जड़सूत्र (डॉग्माबन जाती हैतस्वीर ऐसी बनती है कि ये तुच्छज़रा-ज़रा सी बात को मुद्दा बनाने वाली औरतों की वाम के भले आदमियों के अच्छे काम को बर्बाद करने की कोशिश हैऔरतों वाले शिकायती अंदाज़ में इस बात पर ज़ोर देकर कि प्रगतिशील स्पेस भी ऐसी स्पेस हों जहाँ उन्हें बलात्कार कीदुर्व्यवहार कीबदचलन कहे जाने कीऔर अपनी बात कहने पर शिकार बनाए जाने की उम्मीद न होऔर भावनाओं में रोष और नाराजगी है किवर्ग युद्ध,पारदर्शिता और सेंसरशिप से आज़ादी का हमारा विशुद्ध और परिपूर्ण संघर्ष क्यों कर 'अस्मिता की राजनीतिसे प्रदूषित होऔर अस्मिता की राजनीति इस तरह मुँह बनाकर बोला जाता है जैसे यह लफ्ज़ कितना बेस्वाद हैआम कट्टरपंथियों से अधिक जवाबदेही की अपेक्षा हम से क्यों की जाएक्यों हमें उच्चतर आदर्शों पर रखा जाए?
वह इसलिए कि अगर हम ऐसे नहीं हैं,तो हमें प्रगतिशील कहलाने का कोई हक नहींक्योंकि अगर हम अपनी संस्थाओं के भीतर हिंसादुर्व्यवहार और जेंडर हाइरार्की के मुद्दों को स्वीकार नहीं करते तो हमें इन्साफ़ के लिए लड़ने का क्या उसकी बात करने का भी हक नहीं.
वॉकर लिखते हैं, "लोकतंत्र और लैंगिकवाद के मुद्दे अलग नहीं हैंवे विकट रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैंलोकतंत्र का अभाव लैंगिकवाद  के बढ़ने हेतु स्पेस तैयार करता है और जब वह बढ़ जाता है तो उसे जड़ से दूर करने को और भी मुश्किल बनाता है." वे एसडब्ल्यूपी के बारे में बात कर रहे हैं मगर यह बात वाम की किसी भी पार्टी के बारे में कही जा सकती है जो पीढ़ियों के महिला-द्वेषी असबाब से स्वयं को मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रही है
बराबरी कोई वैकल्पिक पूरक या गौण मुद्दा नहीं जिस से इन्कलाब के बाद निपटा जा सकता हैमहिलाओं के अधिकारों के बिना न कोई सच्चा लोकतंत्र हो सकता है और न ढंग का वर्ग-संघर्षवाम जितनी जल्दी इस बात को स्वीकार कर लेगा और अपने साझा पिछवाड़े से  दम्भीपन और पूर्वाग्रह का भारी-भरकम डंडा निकालने  का काम शुरू कर देगाउतनी जल्दी हम अपना असली काम शुरू कर पाएँगे.