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Tuesday, November 30, 2010

संस्कृति का जनपक्ष : दूसरी और अंतिम किस्त

(पिछली कड़ी से जारी)

हमने अपनी लोक-प्रज्ञा की उपेक्षा की है, उस पारंपरिक ज्ञान के भण्डार की भी उपेक्षा की है जो पंचायत प्रशासन का आधार थी. इस व्यवस्था में पेड़-पौधों और जड़ी-बूटियों की प्रचुर जानकारी थी, फसलों के आवर्तन, देशी खाद्य व्यवस्था,महाकाव्यों की मौखिक परंपरा,लोक साहित्य,गाथा-गीत,लोक-गीत और ठेठ देशी प्रदर्शन कलाओं का प्राचुर्य था. इस लोक ज्ञान के दायरे में आदिवासी मांझी समुदाय की सामाजिक न्याय पर आधारित व्यवस्था,विधिशास्त्र,पेड़ों को संरक्षित करने से सम्बंधित वर्जनाएं,जंगल का जीवन एवं मानवाधिकार सभी कुछ शामिल था. इस लोक-ज्ञान का तिरस्कार कर हमने सर्वाधिक भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था को, जिसमें चुनाव व्यवस्था भी शामिल थी, ऊपर से नीचे तक पनपने का मौका दिया और ऐसा हमने इसलिए किया क्योंकि यह हमारे निहित स्वार्थ को पोषित करता था और प्रशासन भी सुविधाजनक था. मानक प्रशासनिक व्यवस्था सबसे अधिक सुरक्षित एवं सुविधाजनक थी क्योंकि इसमें आम आदमी की कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी.
एकरूपता के सिद्धांत पर आधारित बाज़ार व्यवस्था से सीख लेकर कला,संस्कृति एवं लोक रीति-रिवाजों को भी खरीदी-बिक्री की उपभोक्ता सामग्री में तब्दील कर दिया गया. जैसा कि प्रोफ़ेसर अमिय बागची ने संकेत किया था कि जन जातियों के कल्याण,बड़ी पूँजी एवं बड़े उद्योग तथा कृषि आधारित उद्योगों की ज़रूरतों के हिसाब से विकास के अलग-अलग ढांचों की तलाश को निहायत असुविधाजनक बताते हुए खारिज कर दिया गया. दूसरी तरफ हमने भूमि-वितरण के मुद्दे की वर्षों तक अवहेलना की,जिससे बिचौलियों का शोषण तंत्र पनपता रहा.जंगल एवं जंगल से जुड़े उत्पादों पर से आदिवासियों के अधिकार छीन लिए गए जिसके परिणामस्वरूप जनजातीय विकास में बाधा उपस्थित हुई और वे कंगाल हो गए. इस तरह से उनकी सामुदायिक समझ को नष्ट कर दिया गया और उन्हें दिहाड़ी मजदूर,पियक्कड़ और वेश्या में तब्दील कर दिया गया. इनके स्थान पर हमने असंख्य भ्रष्ट अंतर्राष्ट्रीय दूरदर्शन चैनलों को पनपने दिया जिन्होंने 'चमचमाते भारत' को ग्रामीण एवं जनजातीय सामुदायिक केन्द्रों में प्रदर्शित किया और इस प्रक्रिया में लोक एवं जनजातीय प्रस्तुति कलाओं को विकृत और कमज़ोर कर नष्ट कर दिया गया.हमने जानबूझकर और लगातार बीजों,जड़ी-बूटियों,औषधि-वनस्पतियों और फलों से सम्बंधित अपनी बौद्धिक संपत्ति और अधिकारों की अवहेलना की जिसके फलस्वरूप हल्दी,जीरा,नीम और अन्य मसाले तथा बासमती, आम आदि फल के अधिकार शिकागो,कैलिफोर्निया,फ्रांस आदि की झोली में चले गए. इस तरह से, संस्कृति जो दूसरे शब्दों में हमारी जीवन-शैली थी, उसे विनिमय-वस्तु में तब्दील कर दिया गया और परिणामस्वरूप हमें मिले विदेशी कपडे,नियमित भोजन और नृत्य और संगीत के अपरिचित तरीके.
कला और संस्कृति जो जीवन के हर पक्ष से सम्बंधित है उसे सिर्फ एक विभाग,एक फ़ाइल तक सीमित कर दिया गया और इस छलावे द्वारा संस्कृति को बचाने पर जोर दिया गया. सूचना एवं प्रसारण,वाणिज्य एवं वित्त मंत्रालय के सहयोग एवं तालमेल के बिना ही संस्कृति को सुरक्षित किया गया. इस तरह भारतीय बाज़ार इन मंत्रालयों की खुली छूट की वजह से विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण झेलने को अभिशप्त होकर रह गए. हमें इस बात का कभी ख्याल ही नहीं आया कि हम एक सार्थक सांस्कृतिक नीति बनाएं जो रक्षा एवं विदेश मंत्रालयों सहित सभी विभागों के कार्यक्रमों हावी रहे. पोटा जो अब शायद समाप्त होने वाला है, उसे शुरू किया गया और अब एक बार फिर वह विरोधी दलों की कार्यसूची में शामिल है. हम शायद भूल रहे हैं कि रूढ़िवाद, रूढ़िवाद को ही जन्म देता है, साम्प्रदायिकता से साम्प्रदायिकता ही पैदा होती है और आतंकवाद से आतंकवाद. एक बम अनेक बमों की श्रृंखला को जन्म देता है और इस अंधी दौड़ में हम जनसंहार के हथियारों का ढेर लगाते जा रहे हैं.
फासिज़्म जो लोकतंत्र की पूजीवादी व्यवस्था का हिस्सा है, उसके भयानक चेहरे पर से १९६४ में तब नकाब हट गया जब सैकड़ों बस्तर आदिवासियों को उनके राजा समेत मौत के घाट उतार दिया गया. १९८४ में सैकड़ों सिखों का कत्लेआम हुआ, उनकी संपत्ति को या तो लूट लिया गया या जला दिया गया. १९९० में इन दंगों के परिणामस्वरूप भीषण नरसंहार और लूट की वारदातें हुईं, जिंदा लोगों को उनके घर-परिवार से वंचित कर बेरोज़गारी की मार झेलने को छोड़ दिया गया. २००२ में हजारों मुसलमानों का संहार हुआ, जिसमें पहली बार दलित एवं पिछड़ी जनजातियाँ, कैबिनेट मंत्री और पुलिस भी दंगों में शामिल थी. २००४ में ईसाई आदिवासियों को धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया. झाबुआ के ईसाई धर्मगुरुओं, चर्चों और ईसाई आदिवासी परिवारों और उनके घरों पर आक्रमण हुआ. इस दबाव के फलस्वरूप सैकड़ों की संख्या में लोग जंगलों में भाग गए और आज भी लापता हैं. इन घटनाओं से जहाँ एक ओर जातियों के समूल विनाश का पता चलता है, वहीँ फासिस्ट आक्रमणों से होने वाले घिनौने आर्थिक लाभ का भी पर्दाफाश होता है. क्या आप किसी अल्पसंखक समुदाय द्वारा प्रचारित किये गए फासिज़्म की कल्पना कर सकते हैं? फासिज़्म पर हमेशा बहुसंख्यक समुदाय का एकाधिकार रहा है, फिर वह चाहे इटली का हो, जर्मनी का या भारत का. सोनिया गांधी के नामांकन के बिना, जिसने कई महत्त्वाकांक्षी सदस्यों की आशाओं पर पानी फेर दिया, अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले मनमोहन सिंह शायद कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते. आप अल्पसंख्यक समुदाय के किसी सदस्य को राष्ट्रपति के रूप में देख सकते हैं पर क्या आप कभी किसी ईसाई या मुसलमान की प्रधानमंत्री के रूप में कल्पना कर सकते हैं? गांधीजी की सलाह के बावजूद जिन्ना प्रधानमंत्री नहीं बन सके. यहाँ तक की जगजीवन राम जो शूद्र जाति के हिन्दू थे वे भी राजनीतिक दांव-पेंचों और चालों की वजह से प्रधानमन्त्री होते-होते रह गए.
फूट डालो और शासन करो की नीति ने न केवल अल्पसंख्यक समुदाय को अलग अलग वोट बैंकों में बांटा है, बल्कि हिन्दुओं को भी दलित,अनुसूचित जाति एवं जनजातियों में विभाजित कर पूरी चुनाव प्रणाली को ही विकृत व्यवस्था में तब्दील कर सत्ता का रास्ता साफ़ किया है. इस देश में सिर्फ गांधी को ही मारा नहीं गया, उनकी नीतियों का भी दम घोंट दिया गया है. आज गांधी सिर्फ जिह्वा-विलास की वस्तु होकर रह गए हैं, जिनकी तस्वीरें मंत्रियों के दफ्तरों की शोभा हैं और उनका नाम केवल सड़कों और पार्कों के नाम के साथ जुड़कर ही जीवित बचा है.
आज हम एक-ध्रुवीय विश्व में बड़े दादा अमरीका की निगरानी में जी रहे हैं. पर यह बड़ा भाई आज पश्चिमी विश्व के लिए भी एक खतरा बन चुका है. इसी वजह से यूरोपीय संघ का गठन हुआ और यह संघ सैन्य बल के रूप में भी खुद को अमरीका की एकपक्षीय मनमानी की प्रतिरोधी शक्ति के रूप में सुदृढ़ कर रहा है.
यह एक बुरा एवं अप्रिय समय है. अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, एक तेज व सक्रिय जीवन-शक्ति से समृद्ध भारत तो हमें कई ज़रूरी कदम उठाने होंगे. हमें समझना होगा की समदृष्टि के बिना कोई भी आर्थिक नीति न तो गरीबी कम कर सकती है, न ही संस्कृति को बचा सकती है और उसका चेहरा तो कदापि मानवीय नहीं हो सकता. सामाजिक न्याय के बिना कोई भी राजनैतिक योजना केवल फासिज़्म को ही जन्म देगी. मानवाधिकार संरक्षण की गारंटी के बिना गृह मंत्रालय की कोई भी नीति सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद को ही पनपने में मदद करेगी. निःशस्त्रीकरण की अवधारणा के बगैर बनाई गई रक्षा-नीति सिर्फ तलवार खड़खड़ाने तक ही सीमित होकर रह जायेगी और कभी भी शान्ति कायम नहीं कर पाएगी. सांस्कृतिक सन्दर्भ से रहित विदेश नीति कदापि सद्भाव एवं सही विकास को जन्म नहीं दे पाएगी.
संक्षेप में, हाशिये पर जीवन जीने को अभिशप्त असंख्य वंचितों की भलाई ही मूल समस्या है. हमारे देश की मजबूती और जीवन-शक्ति इन्हीं वंचितों की भलाई से कायम रह सकती है. मैंने बहुत सरलीकृत ढंग से संस्कृति को दो भागों में विभाजित किया है: शोषक-वर्ग की संस्कृति और शोषितों की संस्कृति. आपको तय करना है, आप किसके साथ हैं : शोषकों के या शोषितों के?

(समाप्त)

Wednesday, November 24, 2010

संस्कृति का जनपक्ष : हबीब तनवीर


(उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 'क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भों में भारत की जीवन शक्ति' में हबीब तनवीर ने यह व्याख्यान अंग्रेज़ी में दिया था जो 'नुक्कड़ जनम संवाद' में छपा था. आभा गुप्ता ठाकुर का यह हिंदी अनुवाद संवेद पत्रिका के जुलाई २०१० अंक से साभार)

अधिकतर मैं कुछ सूत्रों से मदद लेकर तात्कालिक भाषण दिया करता हूँ, पर ऐसे में शब्दों के भावावेग में बह जाने की प्रवृत्ति की वजह से समय का ध्यान नहीं रहता. मैंने एक व्याख्यान ही लिखा है, लेख नहीं, इसलिए मैं इसे पढ़कर सुना रहा हूँ.
कल के एक घंटे के व्याख्यान में ही अध्यात्म की काफी भारी खुराक आपको मिल चुकी है. मैं मूलतः एक रंगकर्मी हूँ. मैं कला को अध्यात्म से अलग-थलग नहीं देखता. कला हो या विज्ञान दोनों ही जीवन से सम्बंधित हैं. मेरा मानना है कि रंगकर्म जीवन के हर पहलू से सम्बंधित होता है. भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित अभिप्राय की ही तरह मैं प्रस्तुति कला को एक गंभीर अध्यात्मिक कार्य मानता हूँ.
मुझे अपनी लोक-कलाओं की जीवंत समृद्ध परंपरा और क्लासिकल नाटकों की महान विरासत पर गर्व है. जैसा कि अधिकाँश कला समीक्षक मानते हैं, ये एक दूसरे के विरोध में नहीं खड़ी हैं, अपितु के दूसरे से जुड़ी हुई हैं. स्पष्ट कारणों की वजह से मैं संस्कृत भाषा के ज्ञान से अनभिज्ञ रहा, पर मैंने अनुवाद के माध्यम से अपने धर्मग्रंथों, नाटकों एवं उपनिषदों से परिचित होने का प्रयास किया. मैंने ऋग्वेद के उस प्रसिद्द स्तोत्र का अनुवाद किया जो प्राचीन भारत की वैज्ञानिक दृष्टि का प्रतिबिम्ब है. यह स्तोत्र जिज्ञासा एवं प्रश्नाकुलता से परिपूर्ण है और अज्ञेयवाद की सीमा तक पहुंचे संशय के प्रति एक संबोध-गीति है. मैंने एक उर्दू कविता में इस स्तोत्र का भाषांतरण किया है. उर्दू मेरी मातृभाषा है और मैं मूलतः एक उर्दू लेखक हूँ. मैं उर्दू,हिंदी एवं छतीसगढ़ी में नाटक लिखता हूँ, पर मेरा सर्जनात्मक लेखन हमेशा अरबी लिपि में होता है. मैंने अपने जीवन में हिंदी काफी देर से सीखी. मैं हिंदी पढ़ता हूँ और ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ व्यावसायिक पत्र हिंदी में लिखता हूँ.
मुझे अफ़सोस है कि उत्तर से दक्षिण तक के इतने व्यापक क्षेत्र में बोली जाने वाली समृद्ध भाषा उर्दू को हमारे देश के राजनीतिज्ञों ने एक राज्य तो क्या,एक शहर यहाँ तक कि एक मोहल्ला भी देना मुनासिब नहीं समझा. इस रूप में निश्चित ही इन लोगों ने इस समृद्ध भाषा को दुर्बल किया है. उर्दू सिर्फ मुसलमानों की भाषा नहीं है, बल्कि यह जनता की भाषा है और हिन्दू और मुसलमान दोनों कौमों में प्रचलित है. उर्दू गद्य और पद्य को विकसित करने में मुसलमानों का ही नहीं हिन्दू लेखकों का भी योगदान है. इन लेखकों में कुछ महत्त्वपूर्ण नाम हैं- मुंशी प्रेमचंद, चकबस्त,रघुपति सही 'फ़िराक', किशनचन्दर, राजेन्द्र सिंह बेदी आदि. उर्दू को अपनी जायज़ जगह न देकर और चालाकी से हिंदी साम्राज्यवाद के प्रसार के माध्यम से एक भाषा द्वारा दूसरी का दम घोंट दिया गया और इसके परिणामस्वरूप हिंदी भाषा स्वयं असक्त एवं कमज़ोर हो गयी. विश्व की अन्य भाषाओं में मौखिक और लिखित रूप में बहुत कम अंतर है. इसके विपरीत रेडियो तथा अन्य सरकारी उपायों के माध्यम से हिंदी के जिस सरकारी संस्करण को प्रचलित किया गया, वह मौखिक हिंदी से बिलकुल अलग थी, जिसके परिणामस्वरूप लिखित हिंदी के स्वरूप पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा और हिन्दी भाषा मूलतः मौखिक भाषा के रूप में ही सफल हो पायी.
इस तरह के विकृत विकास का केवल एक ही और उदाहरण मिलता है. हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा मानते हुए इसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने उर्दू को इतने खतरनाक रूप से संरक्षण दिया कि पश्तो,पंजाबी,सिन्धी आदि समृद्ध भाषाएँ हाशिये पर धकेल दी गयीं और पाकिस्तान के उर्दू साम्राज्यवाद ने अंततः उर्दू को एक गूढ़ भाषा बना दिया. पाकिस्तान एवं हिन्दुस्तान का आम आदमी इन भाषाओं से इतना कट गया अपनी मातृभाषा समझने के लिए उसे विशिष्ट अकादमिक उपाधि की ज़रूरत पड़ने लगी. हमारी प्राचीन गौरवशाली समृद्ध देशी-बोलियों के साथ भारतीय न्याय व्यवस्था के इसी बर्ताव की वजह से संस्कृत के दिव्य शब्दों के साथ-साथ ध्वनियों से भी दूर रखा गया. इस तरह आभिजात्य वर्ग ने जनसंचार के माध्यम से जनता को अलग रखकर इस भाषा की ओजस्विता से वंचित रखा, जिससे वह आसानी से शासन कर सके.
हम सभी प्राचीन भारत के गौरव से परिचित हैं पर हमें देशभक्ति पूर्ण व्याख्यानों के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय संस्कृति की महानता से परिचित होने की ज़रूरत है. हमने जहाँ अमीर खुसरो एवं गुरु नानक जैसे मुस्लिम और सिख संतों का आवाहन किया वहीँ इकबाल का गलत हवाला दिया. हमने समकालीन भारत के कुछ हिस्सों में अल्पसंख्यक जाति संहार, महान कवियों एवं गायकों की कब्रों का विनाश एवं मस्जिदों के ध्वंस की पृष्ठभूमि में भारत में धार्मिक विश्वासों,भाषाओँ एवं संस्कृतियों की विविधता का गुणगान किया. इस क्रम में कई कलाकृतियों, किताबों,फिल्मों एवं रंगमंच पर प्रहार किया गया और इस तरह से भारत को मजबूती प्रदान करने की दुस्साहसी कोशिशें की गईं जिससे आने वाले चुनाव में अल्पसंख्यक समुदाय के वोट हासिल किये जा सकें.
प्रोफ़ेसर यशपाल के द्वारा 'शक्ति' को कट्टर देश प्रेम के सन्दर्भ में परिभाषित करने पर मुझे इस शब्द से घृणा होती है. इस शब्द से अंधी उग्र राष्ट्रीयता की गंध आती है, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और नकलची संस्कृति के रूप में प्रचलित हो गया है, विशेषतः इस सन्दर्भ में कि किसी राष्ट्र की जीवन-शक्ति से सम्बंधित पहली चर्चा अमेरिका,नीदरलैंड तथा जापान में प्रारम्भ हुई. मैं 'जीवन-शक्ति' (vitality) की जगह सामान्य शब्द 'शक्ति' का प्रयोग बेहतर मानता हूँ. अंग्रेजी शासकों, वर्तमान अमेरिकी मालिकों और बहुराष्ट्रीय संगठनों के प्रभाव में हम लोग नकलची राष्ट्र के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं. हम अभी भी सीखने के दौर से गुज़र रहे हैं, क्योंकि लोकतंत्र का पश्चिमी ढांचा हमारे सामने पहले आया फिर पूंजीवाद. अतः पूंजीवाद के पश्चिमी संस्करण अभी भी अपने चरम उत्कर्ष पर हैं. लेकिन पूंजीवाद के परिणामस्वरूप विकास का कौनसा रूप हमारे सामने आया? तकनीक ने विज्ञान को अपने वश में किया और उसे पीछे छोड़ दिया, पूरी दुनिया को प्रदूषित और निरावृत्त कर दिया. मानव निवास के लिए अंतरिक्ष में जगह की खोज शुरू हुई और हर प्रकार के युद्ध की शुरुआत हुई - पेट्रोल के लिए,पानी के लिए, बाज़ार के लिए, राज्य पोषित आतंकवाद पर आधारित युद्ध, नस्ली युद्ध, गैर ईसाईयों से युद्ध आदि. ये युद्ध अफ्रीका,एशिया,पूर्वी यूरोप,लातिन अमेरिका तथा अन्य सभी जगहों में फ़ैल गए, लेकिन विशुद्ध पश्चिमी देशों में ये शायद ही कभी लड़े गए.
पश्चिमी संस्कृति की नकल की इस अंधी दौड़ में हमने अविकसित देशों की स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक विकास के ढाँचे को विकसित करने का स्वर्णिम अवसर खो दिया. हम यह भूल गए कि पूंजीवादी एकरूपता पर आधारित पश्चिमी समाज बंद गली के उस आखिरी मुकाम तक पहुँच गया है जहाँ युद्ध के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है. पश्चिमी जगत इस विनाश के कगार पर बहुत तेजी से पहुँचा, अविकसित देशों के लोगों ने उनकी इस गलती से सीखने का स्वर्णिम अवसर देखा. लेकिन हम भूल गए कि विकास के इस अराजक परिदृश्य और संतृप्ति के कगार पर पहुंचे मानव समाज के बीच भी सिर्फ अविकसित दुनिया के लोगों के पास स्वयं के विकास का ढांचा बनाने तथा अस्तित्व बचाने का दुर्लभ अवसर उपलब्ध था.
हमने अपनी आत्मा को प्रौद्योगिकी,भूमंडलीकरण,उपभोक्तावाद,उदारीकरण,खुली बाज़ार-व्यवस्था,अश्लील विज्ञापनों एवं जहरीले दूरदर्शन के शैतान को बेच दिया और हमने १३ प्रतिशत सेलफोन और वाहन धारकों को विपुल धन-संपत्ति के नशे में झूमने का मौका दिया है. इस तरह वंचितों की एक बहुत बड़ी आबादी जिसमें आदिवासी,दलित, किसान एवं शहरी निम्न मध्यवर्ग शामिल है, गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को बाध्य है,हज़ारों लोग आत्महत्या कर रहे हैं. पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण एवं शहरी बेरोजगारों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. कृषि प्रधान भारत के वही लोग जिनके उत्पादन ने 'चमचमाते भारत' को कायम रखा है, उन्हीं को इस साम्प्रदायिक एवं दूषित शिक्षा-व्यवस्था ने निरक्षर एवं अशिक्षित छोड़ दिया है. बस्तर के एक व्यक्ति ने मुझसे कहा-' तुम अपने शिक्षक को पढ़ाने के लिए पैसे देते हो, पर हमारे बच्चों को क्यों पढ़ने के लिए पैसे नहीं देते?'

(अगली किस्त में समाप्य)

Thursday, August 13, 2009

हबीब तनवीर और सतनामी समुदाय

साथियो, वाणी प्रकाशन से प्रकाशित 'चरनदास चोर, २००४ संस्करण की हबीब तनवीर द्वारा लिखित भूमिका का एक अंश भेज रहा हूं, ताकि पाठक खुद निर्णय कर सकें कि हबीब साहब का सतनामी समुदाय से क्या रिश्ता था. जबसे सहमत, बहुरूप, जन संस्कृति मंच, इप्टा, प्रलेस, जलेस आदि ने प्रतिबंध का विरोध किया है, तबसे रायपुर से ब्लाग दुनिया में रिपोर्टें आ रही हैं कि नाटक प्रतिबंधित नहीं हुआ है, किताब या उसकी भूमिका ही प्रतिबंधित है. बहरहाल इन रिपोर्टों में किसी आधिकारिक स्रोत का हवाला नहीं दिया गया है, जबकि हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स अफ़ इंडिया आदि में नाटक खेलने पर भी प्रतिबंध की बात स्पष्ट रूप से कही गई है. बहरहाल मैं यह उद्धरण भूमिका से ही दे रहा हूं -

मैने दर्शकों से कहा कि " हम एक नया नाटक तैय्यार करन्र जा रहे हैं.अभी यह दिमाग के कारखाने से पूरी तरह नहीं निकला है,और न ऎक्टरों की तैय्यारी अभी पूरी हुई है,फ़िर भी यह देखते हुए कि इस मंचन की आयोजक एक सतनामी संस्था है, और यहां सतनामी दर्शक हज़ारों की संख्या में जमा हैं, और हमारे नाटक का आधार 'सतनाम' धर्म है, अगर आप कहें तो हम इस अधपके नाटक को भी अभी प्रस्तुत कर दें!". सबने एक आवाज़ हो कर कहा "हो!, ज़रूर दिखाओ,हम मन ला कोई जल्दी नई है! अभी भोर कहां हुए है?"
विजयदान ने अपनी कहानी में चोर को कोई नाम नहीं दिया है. हम नाम सोचने में लगे थे. पहले सोचा चोर मरने के बाद अमर हो जाता है, क्यों न उसका नाम'अमरदास' रखें.पंथियों ने कहा, " ये नाम नहीं हो सकता,अमरदास नाम के हमारे एक गुरू गुज़रे हैं." हमने दूसरा नाम तज़वीज़ किया. ये दूसरे गुरू का नाम निकला.आखिर हमने भिलाई के शो के लिए 'चोर चोर' नाम रख दिया,और आगे चलकर 'चरनदास' रख दिया. नाचा पार्टियों में हमारे साथ वर्कशाप में धमतरी के अछोटा गांव की नाचा पार्टी भी थी,उसके लीडर थे रामलाल निर्मलकर. अच्छे कामिक ऎक्टर थे. उनसे कहा,चोर की भूमिका में खड़े हो जाओ.
मैनें दर्शकों से कहा, "हो सकता है कि बीच में उठकर मुझे किसी अभिनेता की जगह ठीक करना पड़े या संवाद में मदद करना पड़े, तो आप लोग कृपया इस बात को नज़रांदाज़ कर दीजिएगा". बिलकुल यही हुआ.मुझे न सिर्फ़ एकाध बार उठकरकिसी सैनिक की मंच पर जगह ठीक करनी पड़ी क्योंकि आगे चलकर इसके कारण सीन में बाधा पड़ने का अंदेशा था, बल्कि बीच बीच में आर्केस्ट्रा के साथ बैठकर खुद गाने भी गाता रहा. गाने उस वक्त तक नहीं लिखे गए थे. मैनें पंथी गीतों की एक छोटी सी पुस्तक अपने पास रख ली थी. साजिंदे हमारे अपने साथ थे ही,बस मैं गाता रहा, कोरस में गाने वाले कलाकार दोहराते रहे,और इस तरह कोई ४५-५० मिनट में नाटक समाप्त हुअ तो मैदान तारीफ़ और तालियों से देर तक गूंजता रहा.
मुझे दर्शकों की राय मिल गई थी, उन्होंने नाटक को अपनी कच्ची शैली और बाकी सब कमज़ोरियों के बावजूद पसंद कर लिया था.दर्शकों में सभी लोग पंथी थे और पंथियों का बुनियादी उसूल है ,"सत्य ही ईश्वर है,ईश्वर ही सत्य है." यही उसूल उनके रोज़मर्रा के पारंपरिक गीत में भी है,और उसी गीत पर हमने नाटक खत्म किया था. बाकी ये सब देख सुन कर उनकी भावुकता उबल पड़ी थी. इस भावुकता का एक कारण यह भी हो सकता है कि उन्ही के पंथ का एक व्यक्ति नाटक का नायक था जिसे नाटकों में पहले कभी नहीं देखा गया था.पंथ की स्थापना के पहले गुरू घासी दास स्वयं एक डाकू थे. शूद्र वर्ग के लोगों ने सतनामी धर्म अपनाया तो उन्होंने समाज में उनकी अत्महीनता दूर करने के लिए उन्हे जनेऊ पहनने का अदेश दिया.इन तमाम चीज़ों के बावजूद आजतक उनका मुकाम गांव के बाहर है.उनका कुआं,उनका पानी समाज से अलग है,इन्हीं कारणों से सतनामियों में अपने धर्म के प्रति जोश होता है. वे अपनी सुरक्षा के लिए लाठी चलाने में भी निपुण होते हैं और जहांतक अपने अधिकारों के लिए लड़ने का संबंध है, तो इतिहास सैकड़ों साल से उनके आंदोलनों,उनके संघ्र्ष से भरा पड़ा है."

तो मित्रो, ये है हबीब साहब के खयालात सतनामी समुदाय के प्रति, ममता और सम्मान से ओत-प्रोत.

-मृत्युंजय

(आलोचक मृत्युंजय का यह मेल कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने उपलब्ध कराया है।)


मैंने पोस्ट लगाने के बाद देखा कि कबाड़खाना पर अशोक भाई इसे लगा चुके हैं।

Monday, August 10, 2009

क्या हबीब आएंगे यह लड़ाई लड़ने?



दो महीने हुए जब हबीब तनवीर रुखसत हुए तो उनके बारे में काफी-कुछ लिखा गया था. लेकिन इस बात का ज़िक्र कम ही किया गया कि वे कला की दुनिया में प्रभावी (और अब दुर्लभ) सेक्युलर उपस्थिति थे. विशुद्ध कला के पैरोकार उनके रंग कौशल पर तो काफी लिख रहे थे लेकिन आरएसएस के कुनबे से उनकी मुठभेड़ पर वे चुप ही थे. जिन लेखकों ने इस बारे में लिखा भी, वे प्रायः वही लेखक थे जिन पर लाल रंग में रंगे होने की `तोहमत` है.
यह सर्वविदित तथ्य है कि `लिविंग लीजेंड` की कला जोखिम भरे रस्ते से होकर गुजरती थी. 90 के दशक में सांप्रदायिक उभार के साथ उनके सेक्युलर मिजाज़ के नाटकों को लेकर संघ का कुनबा बेहद हमलावर हो गया था. `मोटेराम का सत्याग्रह`, `पोंगा पंडित`, `जिस लाहौर नहीं वेख्या` जैसे नाटक कट्टरपंथियों को कभी रास नहीं आये. हबीब साहब को नाटकों के प्रदर्शन के दौरान भी हमले झेलने पड़े, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता और मजबूत होती गई. उन्होंने बहुत से `सेक्युलर चेम्पियनों` की तरह इसका न रोना रोया और न इसके लिए किसी वाहवाही की अपेक्षा की. उन्होंने यही कहा कि वे कला की दुनिया और सड़क दोनों जगह लड़ सकते हैं. वे होते तो `चरणदास चोर` पर छत्तीसगढ़ की संघी सरकार की पाबंदी को लेकर किसी की मदद ताकने के बजाय मोर्चा संभाले मिलते.
तो क्या मोनिका मिश्र और हबीब तनवीर की मौत के साथ हमारे लेखकों, कलाकारों और जागरूक नागरिकों ने नया थियेटर और उसके मूल्यों का भी फातिहा पढ़ दिया है? क्या इस लड़ाई को आकर लड़ने की जिम्मेदारी उन मरहूमों की ही बनती है? जाहिर है कि यह लड़ाई सेक्युलर, डेमोक्रेटिक और प्रोग्रेसिव मूल्यों की हिफाज़त की लड़ाई है और ये लड़ाई इन मूल्यों में आस्था रखने वाले हर कलाकार, एक्टिविस्ट और साधारण नागरिक के सामने खड़ी है.
जहाँ तक लेखकों, कलाकारों का सवाल है तो प्रेमचंद और हुसेन पर हमलों व ऐसे बहुत से दूसरे मसलों पर व्यापक एकजुटता और इच्छाशक्ति का अभाव सामने आता रहा है. हुसेन के मसले पर तो कई `प्रोग्रेसिव` लेखक अक्सर राइट लिबरल और कई बार राइट विंग की भाषा बोलते भी मिल जाते हैं. इस `बौद्धिक` वर्ग ने हाल के उदयप्रकाश-योगी आदित्यनाथ प्रकरण और प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान प्रकरण में भी हद दर्जे की अवसरवादिता, मूल्यहीनता और लिजलिजापन दिखाया है. तो क्या ताजा मामले में प्रमुख प्रोग्रेसिव संगठनों को क्रूर आत्मालोचना करते हुए और अपने बीच के रंगे सियारों को अलग करते हुए साझा रणनीति के साथ मोर्चा नहीं संभालना चाहिए?

Monday, June 8, 2009

बेमिसाल हबीब


आज सुबह हबीब तनवीर नहीं रहे. अपने विशुद्ध थियेटर के काम की लिहाज़ से भी वे लिविंग लीजैंड थे पर उन्होंने सेक्युलर मूल्यों को बचाने के लिए जिस कदर संघ परिवार और उसकी साम्प्रदायिक बिरादरी से मोर्चा लिया, वैसे उदाहरण दुनिया भर में कम ही मिलते हैं. फिर अपने यहाँ तो साहित्यकारों-कलाकारों में संघ के फासीवाद तक को सांस्कृतिक शब्दावली से गौरवान्वित करने की लम्बी परम्परा है. जल्द ही हबीब साहब पर अलग से एक पोस्ट देने की कोशिश करूँगा, फ़िलहाल श्रद्धांजलि स्वरूप इसी ब्लॉग से ये पुरानी पोस्ट (5सितम्बर 2008) चस्पा कर रहा हूँ-


1सितंबर को महान रंगकर्मी हबीब तनवीर का जन्मदिन था। इस मौके पर वीपी हाउस, दिल्ली में सहमत ने हबीब के चाहने वालों और अदीबों से उनकी बातचीत का इंतजाम किया था। मैं इसके कुछ हिस्से को पोस्ट करना चाहता था कि इस बीच वेणुगोपाल नहीं रहे। इस नाते इस पोस्ट को स्थगित करना पड़ा। इस बीच इसका बड़ा हिस्सा मुझसे खो भी गया.....बहरहाल जो है, उसका लुत्फ लीजिए-

मासूमियत या मजबूरी
कीमतें आसमान छू रही हैं। एक तरफ गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी है और दूसरी तरफ कुछ लोग लाखों रुपये महीना कमा रहे हैं। यह खाई पटना जरूरी है। कैसे पटेगी मोटेंक अहलूवालिया या चिदंबरम से, नहीं जानता। या तो मासूमियत है या मजबूरी कि वो किसी और तरीके से सोच नहीं सकते। ...मां के पेट से झूठ बोलते हुए कोई नहीं आता सोसायटी से ही सीखते हैं...

अंधेरे में उम्मीद भी
जो थिएटर छोड़कर फिल्मों, सीरियलों की तरफ जा रहे हैं, वहां काम की तलाश में जूतियां चटकाते हैं। कुछ चापलूसी, कुछ जान-पहचान काम करती है। मुझे उनसे कुछ शिकायत नहीं है। क्या करें पेट पर पत्थर रखकर काम मुश्किल है। हमारे जमाने में दुश्मन बहुत साफ नजर आता था। सामराजवाद से लड़ाई थी। एक मकसद (सबका) - अंग्रेजों को हटाओ, रास्ते कितने अलग हों (भले ही)। अब घर के भीतर दुश्मन है, उसे पहचान नहीं सकते। विचारधारा बंटी है। पार्टियों की गिनती नहीं, हरेक की मंजिल अलग-अलग। इस अफरातफरी में क्या किसी से कोई आदर्श की तवक्को करे। हां, मगर लिबरेलाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन, नए कालोनेलिज्म के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं सब तरफ से। खुद उनके गढ़ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन में भी। तो ये उम्मीद बनती है।

जवाब से कतराता हूं
मैं अपने डेमोक्रेटिक मिजाज का शिकार रहा हूं। मेरी अप्रोच डेमोक्रेसी रही है, मैं प्रचारक या उपदेशक थिएटर में यकीन नहीं रखता। ये कोई जम्हूरी बात नहीं (शायद यही शब्द बोला था) कि आपने सब कुछ पका-पकाया दे दिया, कि मुंह में डालकर पी जाना है। अगर आप समझते हैं कि दिल-दिमाग वाला दर्शक आता है तो उकसाने वाला सवाल देना काफी होता है। ये नहीं कि मैं सवाल भी और जवाब भी पेश कर दूं। जवाब से कतराता हूं। हां, इसका हक नुक्कड़ नाटक को है, वहां जरूरी है जवाब भी देना। उनकी प्रोब्लम्स हैं। हड़ताल वगैरह होती हैं, सड़कों पर भी निकलना पड़ता है (नुक्कड़ नाटक वालों को)।

हुसेन के मिजाज की कद्र करता हूं
मैं दोनों काम करता हूं, सड़कों पर भी निकलता हूं, न निकलने वालों पर एतराज नहीं। हुसेन नहीं निकलते। उनका मिजाज अलग है। उसकी मैं कद्र करता हूं। उन्होंने (हुसेन ने) कहा, जो मेरे खिलाफ बातें हो रही हैं, सैकड़ों मुकदमे बना दिए गए हैं, इसलिए नहीं आ रहा हूं। ये भी एक तरीका है रेजिस्टेंस का। हर आर्टिस्ट अपने-अपने मिजाज के तहत काम करता है।मैं यहां कोई फारमूला पेश नहीं करता। मैंने अपने नाटकों में कई तरह के प्रयोग किए। ये आप लोग रियलाइज करें, चाहें तो उड़ाएं, चाहें तो सराहें। इस बारे में पूछकर आप मुझे थका रहे हैं। मैं अपने काम की व्याख्या से इंकार करता

दिल को तनहा भी छोड़िए
(मख्दूम के एक शेर का हवाला देते हुए रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कुछ कहते हैं। शायद अंतरात्मा जैसा कुछ )...वो इकबाल का शेर है- अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल, कभी-कभी इसे तनहा भी छोड़िए। सिर्फ अक्ल से क्रिएट करना संभव नहीं है। दिल से भी बातें होती हैं। (मख्दूम का - शहर में धूम है एक शोलानवां की मख्दूम को पूरा पढ़ते हैं।) बाल्जक से पूछा गया था कि एक प्रास्टीच्यूट की एसी तस्वीर क्यों बनाई, उन्होंने कहा, एमा इज मी। एलन्सबर्ग ने भी कहा कि आप करक्टर क्रिएट जरूर करते हैं लेकिन वो अपनी कहानी खुद कहता है। आपका उसमें कोई कंट्रोल नहीं रहता।
देखिए आप उसमें शऊर घुसाएंगे तो वो कुछ हो जाएगी- उपदेश, अखबारनवीसी या कुछ न कुछ मगर कला नहीं रहेगी।

मौत के सौदागर कर रहे हैं रूल
ग्लोबलाइजेशन सब कुछ सपाट कर रहा है। सिस्टेमेटिक ढंग से सोचने के आदी हो गए हैं। आराम इसी में है कि सिस्टम बनाएं, उसके पीछे छिप जाएं। इन लोगों के लिए ये मुमकिन नहीं है कि आदिवासी सभ्यता को समझ कर लोकेट किया जाए या हर तबके के लिए अलग ढंग से सोचें। एक सिस्टम बना है शोषण-दमन का, बंटवारे का, कि लोगों को डिवाइड करो। यही क्लासिकल तरीका था, अब इसमें नए-नए तरीके जुड़ गए हैं। पालिटिशन, गवर्मेंट्स रूल नहीं कर रहे हैं, मर्चेंट्स आफ वार, मर्चेंट आफ डेथ, ड्रग मर्चेंट (कुछ और भी जुमले कहे), यही सब डिक्टेट कर रहे हैं। होम, फारन, इकानमी, सब पालिसी वही तय कर रहे हैं। हमारे यहां इसकी शुरुआत है। हम ग्लोबलाइजेशन के चौराहे पर हैं।

खतरे के रास्ते से मिलता है खजाना
पुराने जमाने में किस्से यूं थे कि एक हीरो निकला, दो रास्ते आए। एक मुश्किलों भरा, जिस पर न जाने के लिए उसे सलाह दी जाती है लेकिन वो उसी मुश्किलों भरे रास्ते पर निकलता है। और खजाना उसी रास्ते पर जाकर मिलता है। हीरोइन भी खतरे भरे रास्ते के आखिर में ही मिलती है।

(कार्यक्रम में कई बड़े आर्टिस्ट थे, अलग-अलग फील्ड के। सबने कुछ पूछा। लंबी बातें जो नोट कीं, मुझसे खो गईं। जोहरा सहगल से किसी ने कहा, आपा कुछ पूछेंगी, हबीब साहब से। उन्होंने कहा, मैं क्या पूछूंगी, मैं तो उनकी आशिक हूं। उन्होंने हबीब के 25 साल और जीने की तमन्ना भी की। एक सवाल के जवाब में हबीब ने कहा कि बहादुर कलारिन तैयार करने में सबसे ज्यादा मुश्किल आई। पोंगा पंडित पहले से होता आया। मैंने खेला तो संघ वालों ने खूब पत्थर फेंके और मुझे मशहूर कर दिया। इस सब के बीच कुछ करने का दबाव भी हमेशा रहा। गुमनामी अच्छी है या नामवरी...जैसे कई गीत भी हबीब की मंडली ने सुनाए।)