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Sunday, September 2, 2012

तन्हा कर देने वाली है इंसाफ की लड़ाई - तीस्ता सीतलवाड



गुजरात के नरोदा पाटिया केस में स्पेशल कॉर्ट के फैसले और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ी जा रही पूरी लड़ाई पर एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड से Tehelka की मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधुरी की बातचीत। 

इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि क्या है?

दोषियों की संख्या – 32 – जो अब तक सबसे अधिक है। और एक यह तथ्य कि छुटभैयों और आसपड़ोस के अपराधियों से आगे पॉलिटिकल मास्टरमाइंड और भड़काने वाले दोषी साबित हुए है, ऐसे लोग जो सर्वोच्च राजनीतिक संरक्षण का लुत्फ ले रहे थे।

क्या इससे बाहर यह संदेश गया है कि गुजरात में इसांफ मिल सकता है?

मैं समझती हूं कि इससे बाहर यह मजबूत संदेश गया है कि न्याय व्यवस्था काम कर सकती है बशर्ते कि इससे पहले की जरूरी अपेक्षाएं पूरी हों। मतलब कि सुप्रीम कॉर्ट केस को सावधानी के साथ मॉनिटर करता है, अपॉइंटमेंट्स में रुचि लेती हैं कि केस किस तरह संचालित किया जा रहा है और यह सुनिश्चित करती है कि केस को डीरेल नहीं किया जा रहा है। इस केस में स्पेशल कोर्ट गठित कर स्पेशल जज की नियुक्ति की गई थी। सभी पीड़ितों-गवाहों को केंद्रीय अर्द्धसनिक बलों की सुरक्षा मुहैया कराई गई थी। यह एक बेहद महत्वपूर्ण कारक है। फिर हमने पीडितों और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को रोजबरोज कानूनी सहायता मुहैया कराने का इंतजाम किया था। ये बेहद जटिल मामले हैं, आम आदमी के लिए कानूनी प्रक्रिया समझ पाना आसान नहीं है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप section 24 (8) के तहत पीड़ितों-गवाहों को उपलब्ध अपने निजी वकील के अधिकार, का इस्तेमाल करते हैं। हां, यदि ये सभी पूर्व-अपेक्षाएं पूरी हुई हैं तो बाहर एक मजबूत संदेश गया है कि इंसाफ किया जा सकता है। लेकिन, हम इस बारे में बहुत सतही नहीं हो सकते हैं। यह दुर्लभ है कि सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को मॉनिटर करे और पीड़ितों को उच्चतम स्तर की सुरक्षा मिले और आप उनके लिए कानूनी तौर पर किस तरह भावनात्मक व आर्थिक मदद की जिम्मेदारी ले पाएं।

आप इसमें क्यों शामिल हुईं?

गुजरात से मेरा रिश्ता 1998 का है, जब मैंने बतौर पत्रकार यहां काम शुरू किया। पहले ही दिखाई देने लगा था कि कुछ नृशंस बन रहा है। हमें पहले ही 1992-93 के बंबई दंगों का अनुभव था और हम श्रीकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित कराने की कोशिश में जुटे थे। गुजरात दंगों ने मुझे गुस्से से भर दिया था, मैंने कहा, आओ देखते हैं कि क्या हम लड़ सकते हैं और क्या यह देश कभी पीड़ितों को इंसाफ दे सकता है। अप्रैल 2012 में हमने सिटीज़न फॉर जस्टिस एंड पीस (सीपीजे) गठित की क्योंकि हमें लगा कि मदद की जरूरत है। विजय तेंडुलकर हमारे संस्थापक अध्यक्ष थे और साथ में आईएम कादरी थे, एक समूह था – साइरस गुज़देर, राहुल बोस, अलीक़ पदमसी, ग़ुलाम पेश ईमान, जावेद और मैं। आपके पीछे एक ऐसे ग्रुप का होना जरूरी है ताकि आप निपट अकेले न हो जाएं क्योंकि इसके लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से बड़ी कीमत अदाकरनी होती है। खुद को बहुत सारे ऐसे आरोपों के लिए पेश करना पड़ता है जो कभी साबित नहीं होते लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में फैले रहते हैं।

एसआईटी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? नरोदा पाटिया केस में उसने अलग तरह काम किया जबकि ज़किया जाफरी केस जिसमें नरेंद्र मोदी पर व्यापक साजिश का आरोप है, में उसका रवैया ठीक अलग रहा।
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2002 में नरोदा पाटिया पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई करीब 16 एफआईआर में मायाबेन कोडनानी को नमजद कराया गया था। लेकिन मई 2002 में जांच गुजरात क्राइम ब्रांच के हाथ में आई तो इन्हें छोड़ दिया गया। एसआईटी का गठन हो जाने के बाद भी उसे आरोपी नहीं बनाया गया। 2009 में हम इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट गए कि ताकतवर लोगों को सजा नहीं दी जा रही है। शायद इसी से प्रेरित होकर अप्रेल 2010 में मायाबेन को आरोपी बनाया गया। संक्षेप में कहूं तो समग्र अन्वेषण के मामले में संभवतः एसआइटी २५-३० प्रतिशत सुधार ले आई है मगर (अलग-अलग) जाँचों में शत प्रतिशत सुधार लाने में वह बहुत पीछे रह गई है। गुलबर्ग सोसाइटी और ज़ाकिया जाफरी केस में वे पूरी तरह पीडितों के विरोधी रहे। एक जांच एजेंसी का ऐसी पॉजिशन लेना बेहद अजीब है। शायद बाधा यह रही कि इन मामलों में नरेंद्र मोदी पर बड़े पैमाने पर साजिश रचने का आरोप है। लेकिन एसआईटी की इन पॉजिशन्स पर से सवाल खत्म होने नहीं जा रहे हैं। इस केस में मायाबेन और बाबू बजरंगी को सजा हो चुकी है तो एसआईटी हमारी प्रोटेस्ट पिटीशन की सुनवाई में अपनी विरोधाभासी पॉजिशन का बचाव कैसे करेगी? ये दोनों ज़ाकिया केस में भी आरोपी हैं। इस तरह यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है।
     
कुछ बड़े अनुत्तरित सवाल क्या हैं?

बहुत सारे हैं। राहुल शर्मा और आरबी श्रीकुमार जैसे गुजरात के सीनियर पुलिसकर्मियों द्वारा उपलब्ध कराए गए क्रिटिकल साक्ष्य कोर्ट में समय पर क्यों पेश नहीं किए गए? यदि 2006 में राहुल शर्मा की सीडी (उन संहारक दिनों की कॉल रेकॉर्ड्स के साथ) की सीबीआई जांच होती और इसे विश्वसनीयता मिलती तो इससे बहुत सामग्री उपलब्ध होती। लेकिन इसका विश्लेषण एनजीओज पर छोड़ दिया गया। पहले जन संघर्ष मोर्चा ने कुछ विश्लेषण किया और फिर जब हमें पता चला कि मोदी और दूसरों के फोन रेकॉर्ड जांच में शामिल नहीं किए गए तो हमने विश्लेषण की कमियों को दूर किया।

मोदी के फोन रेकॉर्ड का विश्लेशषण क्या बताता है?
हमने उसके घर के नंबर, दफ्तर के नंबर, मुख्यमंत्री कार्यालय और उनसे जुड़े अफसरों का विश्लेषण किया। इनसे साफ होता है कि कई दिशाओं में जांच की जानी चाहिए। मसलन, 28 फरवरी को दोपहर 12 बज से तीसरेपहर तीन बजे के बीच जब गुलबर्ग सोसाइटी और नरोदा पाटिया जल रहे थे, बेहद हैरत की बात है कि तब डीजीपी पी. सी. पांडे अपने कमरे से, जोकि इन दोनों जगहों से महज आधेक किलोमीटर दूरी पर है, बाहर ही नहीं निकले। उन्होंने बाहर निकलकर संकट का मुआयना नहीं किया अलबत्ता इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय से 15 फोन कॉल रिसीव कीं। किसी भी जांच एजेंसी को यह पूछना चाहिए कि ये कॉल किस बारे में थीं। अगर वे उन्हें अपना काम करने के लिए कह रहे थे, तो वे काम क्यों नहीं कर रहे थे या फिर वे उन्हें अपना काम करने से रोक रहे थे? लेकिन इस बारे में एसआईटी और कॉर्ट दोनों की ही स्पष्ट खामोशी है, दोनों ही मोदी, पांडे या सीएम कार्यालय के अफसरों से इस बारे में सवाल नहीं पूछ रही हैं। ये न्यायिक व्यवस्था और जांच एजेंसी में बड़ी खामियों की तरह हैं। हमें हर मुद्दे पर हर तरीके से दबाव बनाना पड़ा। और हर बार जब आप दबाव बनाते हैं तो आप खुद को और ज्यादा उत्पीड़न व आरोपों के लिए पेश कर रहे होते हैं।

नरोदा पाटिया केस में न्याय मिलने में `तहलका` के स्टिंग `ऑपरेशन कलंक` की क्या भूमिका रही?

`ऑपरेशन कलंक` की बहुत बड़ी भूमिका रही। 2007 में जब यह जांच सार्वजनिक की गई तो इससे सभी को धक्का पहुंचा। ज़ाकिया जाफरी केस हाई कॉर्ट में  इन्साफ़ का मुन्तज़िर था। हमने तुरंत ज़ाकिया आपा के हलफनामे के जरिए हाई कॉर्ट से `ऑपरेशन कलंक` पर गौर करते हुए जांच का आदेश जारी करने का अनुरोध किया। जज ने प्रार्थनापत्र को खारिज कर दिया। हम सुप्रीम कॉर्ट गए लेकिन शुरू में वहां भी इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। मैं बहुत चिंतित थी। हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास गए। आयोग ने मेरे प्रार्थना पत्र पर फुल बेंच ऑर्डर पारित करते हुए तहलका टेप्स में सीबीआई जांच का आदेश दे दिया। गुजरात सरकार ने यह कहते हुए इसका विरोध किया कि आयोग ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकता है। आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस राजेंद्र बाबू ने तमाम कानूनी किताबों से उद्धरण पेश करते हुए कहा कि आयोग के पास सीबीआई को जांच सौंपने का अधिकार है। आयोग के इस कदम से तहलका टेप्स को विश्वसनीयता हासिल हुई। यदि टेप्स सीधे राघवन की अध्यक्षता वाली एसआईटी के पास पहुंचते तो उनमें छेड़छाड़ मुमकिन थी।
मुझे लगता है कि साम्प्रदायिक हिंसा के इतिहास में इस तरह की सामग्री पहली बार उपलब्ध हो सकी। भागलपुर दंगों, 1984 के सिख दंगों या 1992-93 के बंबई दंगों में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी. लेकिन गुजरात मामले में हमारे पास ऐसी तमाम अंदरूनी जानकारियां थीं, मसलन- राहुल शर्मा की दंगों के दौरान मिसिंग कॉल रेकॉर्ड वाली सीडी, आरबी श्रीकुमार का हलफनामा और साक्ष्यों को मजबूती देने वाले तहलका टेप्स से मिलीं बेहद कीमती सामग्री। मैंने फौजदारी के जितने भी वकीलों से बात की, उन सभी ने यही कहा कि तहलका जांच एक्सट्रा-जुडिशल लीगल कन्फेशन्स है। यह प्राथमिक साक्ष्य नहीं हो सकता है लेकिन यदि किसी व्यक्ति के अपराध में शामिल होने के पहले से ही साक्ष्य हैं और टेप्स को विश्वसनीयता हासिल होती है तो यह अपराध को साबित करने में सबसे ज्यादा मजबूत साक्ष्य होगा। लेकिन एसआईटी ने इस सामग्री को लेकर उत्साह दिखाने के बजाय क्या किया?
उन्होंने श्रीकुमार को यह कहकर अविश्वसनीय बताने की कोशिश की कि यह अफसर सिर्फ प्रोन्नति से इंकार कर दिए जाने की वजह से बोल रहा है। यह तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि उन्होंने अपने पहले दो हलफनामे प्रोन्नति प्रकरण से पहले जमा कर दिए थे। यही वे हलफनामे हैं जिनमें अपराध साबित कर पाने वाले साक्ष्य और स्टेट इंटेलीजेंस ब्यूरो के आंकड़े हैं। केवल तीसरे-चौथे हलफनामे में ही उनकी अपनी राय शामिल है। लेकिन राघवन का अनंत टालमटोल वाला रवैया रहा कि श्रीकुमार का रजिस्टर वैध है भी या नहीं।
तहलका टेप्स पर भी उनका रवैया अजीब और विरोधाभासी रहा। नरोदा-पाटिया केस में उन्होंने टेप्स को स्वीकार किया और हमारे पास आशीष खेतान का 120 पेज का मूल्यवान बयान (deposition) है। लेकिन ज़ाकिया जाफरी केस में, जहां नरेंद्र मोदी मुख्य आरोपी है, साक्ष्य बेकार और प्रेरित बता दिया गया। किसी भी तर्कशील मनुष्य के लिए यह बात समझ से परे है। हम इन सारे विरोधाभासों को पकड़ सकते हैं और इन पर प्रतिक्रया सिर्फ इसलिए दे पाते हैं क्योंकि हम इन सभी मुकदमों में शामिल हैं। लेकिन यह आपको पागल कर देता है।

इंसाफ की तलाश की इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा विपरीत पहलू क्या रहा?

सबसे मुश्किल बात यह है कि यह एक बेहद अकेली लड़ाई है। हमारे ग्रुप में हर कोई बेहद शानदार है पर फिर भी यह बेहद, बेहद तन्हा कर देने वाली है। आपको सार्वजनिक रूप से झूठे आरोप लगाकर जलील किया जाता है। लड़ाई में बड़ा तबका शामिल होता तो इससे बहुत ताकत मिलती। हम जानते हैं कि अच्छे लोग सभी जगहों पर हैं जो हमारे काम की सराहना करते हैं लेकिन ऐसे बहुत कम हैं जो व्यवस्था के खिलाफ आगे आकर खतरा मोल लें। आप किसी व्यवस्था से जूझते हुए ही उसके खिलाफ लड़ाई लड़ सकते हैं लेकिन ऐसे में आप ही सबसे ज्यादा खतरे में होते हैं। व्यवस्था आपको थकाकर बाहर फेंक देती है, इंसाफ नहीं देती। आप दृढ़निश्चयी और किस्मत वाले हैं तो आप सर्वाइव कर जाते हैं, किस्मत वाले नहीं हैं तो नहीं।  
ये सभी इल्जाम - कि गवाहों को मैंने सिखा दिया या हमारे पूर्व कर्मचारी रईस ख़ान का मामला- गुजरात कॉर्ट निराधार करार दे चुकी है। लेकिन फिर भी यूट्यूब पर ऐसी बकवास फैली हुई हैं। मैंने इस बारे में जवाब देना बंद कर दिया है। अगर लोग वाकई जानना चाहते हैं तो वे सच तक पहुंच जाएंगे। पर मैं नहीं जानती कि मैं यह सब दोबारा कर पाऊंगी। इसकी कीमत बहुत बड़ी है। आपको खुद को बताना पड़ता है कि आप अपनी ज़िंदगी के 10-20 बरस किसी एक चीज के लिए न्यौछावर कर देंगे। यह बहुत मुश्किल है। आप इसके बाद सामान्य नहीं रह पाते।
http://www.tehelka.com से साभार।  (मूल अंग्रेजी से अनुवाद)

Monday, March 26, 2012

लोग बोलेंगे: लाल्टू


गुजरात और नरेंद्र मोदी फिर से सुर्खियों में हैं। एक ओर 2002 की दुःखदायी घटनाओं गोधरा और उसके बाद का नरसंहार – के दस साल बाद कई सामाजिक कार्यकर्त्ताओं और चिंतकों ने लेखाजोखा लेने की कोशिश की है कि दस साल बाद हम कहाँ खड़े हैंगुजरात में नरसंहार के दोषियों में से किसे सजा मिली और कौन खुला घूम रहा हैपीड़ितों में से कौन ज़िंदगी को दुबारा लकीर पर ला पाया है और कौन नहीं। दूसरी ओर टाइम मैगज़ीन के मार्च अंक में आवरण पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर है और अंदर एक साक्षात्कार आधारित आलेख हैजिसमें मोदी को कुशल प्रशासक के रूप में चित्रित किया गया है और साथ ही सवाल उठाया गया है कि क्या यह व्यक्ति भारत का नेतृत्व कर सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी की गिरती साख और दो साल बाद 2014 में होने वाले आम चुनावों के मद्देनज़र राजनैतिक गलियारों में इन बातों को गंभीरता से लिया जा रहा है।
कइयों ने सवाल उठाया है कि अमरीकी समीक्षकों का अचानक मोदी से मोह क्यूँकर बढ़ने लगा। आखिर कल तक असहिष्णु सांप्रदायिक माने जाने वाला व्यक्ति महज पब्लिसिटी कंपनियों को पैसा खिलाकर अपनी छवि सुधारने में सफल कैसे हो गया। इसे समझने के लिए हम पूँजीवाद और अमरीकी तथा यूरोपी व्यापारी समुदाय की फासीवादियों और अन्य मानव विरोधी तोकतों के प्रति ऐतिहासिक भूमिका कैसी रही हैइस ओर नज़र डाल सकते हैं। 1936 में स्पेन में लोकतांत्रिक ताकतों के साथ तानाशाह फ्रांको के समर्थन में सेना और अन्य चरमपंथी राष्ट्रवादियों के गृहयुद्ध के दौरान दीगर पश्चिमी मुल्कों के बीच यह समझौता हुआ कि कोई दूसरा मुल्क किसी पक्ष की ओर से युद्ध में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसके बावजूद दोनों पक्षों के समर्थन में धन और बल हर तरह की मदद पहुँची। हिटलर के अधीन जर्मन सेनाओं ने खुलकर राष्ट्रवादियों के समर्थन में लड़ाई में हिस्सा लिया। पाबलो पिकासो की बीसवीं सदी की महानतम माने जाने वाली कलाकृति ग्वेर्निका इसी नाम के गाँव पर 26 अप्रैल 1937को हुई जर्मन बमबारी से हुए ध्वंस और करीब 300 लोगों की मृत्यु पर आधारित है। अमरीकाब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने लोकतांत्रिक बलों की मदद के लिए स्पेन पहुँचने की कोशिश करते लोगों को गिरफ्तार किया। भारत से मुल्कराज आनंद पत्रकार के रूप में जाना चाहते थेपर ब्रिटिश सिपाहियों ने उन्हें रोक दिया। अमरीका से चोरी छिपे स्पेन पहुँचे कुछ बहादुरों ने अब्राहम लिंकन ब्रिगेड नाम से फौज की टुकड़ी बनाई और युद्ध में हिस्सा लिया। दूसरी ओर कम से कम 16000 जर्मन सिपाहियों ओर उनके द्वारा प्रशिक्षित औरों ने फ्रांको के राष्ट्रवादियों के समर्थन में लड़ाई लड़ी। इसी तरह मुसोलिनी के इटली से भी आए सैनिकों ने राष्ट्रवादियों के पक्ष में लड़ाई में हिस्सा लिया। आंद्रे मालरो के प्रसिद्ध उपन्यास'ले'एस्पोआर् (मानव की आस)' में ऐसे कई संदर्भों का रोचक वर्णन है।
स्पेन के पास खनिज तेल के स्रोत न थे। फ्रांको को यह संसाधन अमरीकी और ब्रिटिश तेल कंपनियों से मिला। पूँजीवाद के मानव विरोधी पक्ष का यह एक अच्छा उदाहरण है कि एक ओर तो निरपेक्षता के नाम पर लोकतंत्र समर्थकों को स्पेन जाने से रोका गया और दूसरी ओर तानाशाह को मुनाफे के लिए सारे संसाधन दिए गए। इतिहास में ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। इसलिए आज टाइम मैगज़ीन में आवरण पर नरेंद्र मोदी की शक्ल देखकर या उस पर लिखा आलेख पढ़ कर और अमरीका की ब्रूकिंग्स संस्था द्वारा उसकी प्रशंसा देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अमरीकी कंपनियों को मुनाफा चाहिए। यह मुनाफा गुजरात के लोग भेजें या भविष्य में भारत के एक जनविरोधी नेतृत्व को हटाकर दूसरे जनविरोधी नेतृत्व के जरिए उनको मिलेउन्हें इससे कोई मतलब नहीं। अभी कुछ समय पहले अमरीकी संसद में नरेंद्र मोदी की निंदा का प्रस्ताव पारित हुआ था। अमरीका ने मोदी को अपने यहाँ आने के लिए वीज़ा देने से भी इन्कार कर दिया था। अमरीका का व्यापारी समुदाय इससे बहुत खुश तो नहीं होगाक्योंकि आर्थिक साम्राज्यवाद के लिए गुजरात के धनकुबेरों के साथ उन्हें संबंध बनाए रखना है। बाद में अगर मनमोहन के मोह से छूटने की ज़रूरत महसूस हो रही है तो नया मुर्गा या नई कठपुतली भी ढूँढना है। इसलिए डेनमार्क के पाकशास्त्री रेने रेद्ज़ेपी पर चार पन्नों और ब्रिटिश फैशन लेबल मलबेरी पर तीन पन्नों के साथ मोदी पर दो ही सहीटाइम मैगज़ीन में पन्ने तो हैं ही।
फ्रांकोमुसोलिनी और हिटलर आए और गए। उस जमाने में उन मुल्कों में अधिकांश लोगों ने उनका समर्थन किया। आज उसी जर्मनी में लोग यह सोचकर अचंभित होते हैं कि ऐसा कैसे हुआ कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों ने हिटलर जैसे एक मानसिक रूप से बीमार आदमी का नेतृत्व स्वीकार किया। यह मनोविज्ञान का एक बड़ा सवाल है। मोदी जैसों का राष्ट्रवादजो आज कुछ लोगों के लिए गुजराती राष्ट्रवाद हैबहुसंख्यक लोगों को अल्पसंख्यक लोगों के प्रति नफ़रत करने के लिए मजबूर करता है। इस नफ़रत के बिना ऐसे राष्ट्रवाद का अस्तित्व नहीं टिकता।
नरेंद्र मोदी को गुजरात के बहुसंख्यक लोगों का समर्थन हासिल है। दंगों की निंदा को गुजरात और गुजरातियों की आलोचना बनाने में मोदी को सफलता ज़रूर मिलीपर यह झूठ लंबे समय तक बनाए रखना संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी जो है सो हैइतिहास उसे उचित जगह पर ही रखेगा। तमाम सूचनाओं के होते हुए भी लोगों को यह समझ न आए कि आज नफरत की राजनीति का समर्थन भविष्य में उनके बच्चों के लिए बेइंतहा शर्म का सबब होगाऐसा हो नहीं सकता। अमरीकी पब्लिसिटी कंपनियों को बहुत सारा पैसा देकर एक ऐसे व्यक्ति ने अपनी साख बनाए रखने की कोशिश की हैजिसका नाम लेते हुए हर भले आदमी को शर्म आती है। यह किसका पैसा हैयह गुजरात के लोगों का पैसा है। पूँजीवाद मूलतः मानव विरोधी है। मुनाफे के लिए अमरीकी कंपनियाँ कुछ भी कर सकती हैं। पर क्या सचमुच वह कुछ भी कर लें और लोग आँखें मूँदे वह मान लेंगेयह 1936 नहीं है कि पब्लिसिटी से सच गायब किया जा सके। नफरत की राजनीति करनेवोलों की करतूतें जगजाहिर हैं। लाख कोशिशें करने पर भी वे बच नहीं सकते। उनको सजा मिलने में देर हो सकती हैपर सजा उनको मिलेगी ही। एहसान जाफरी और शाह आलम शिविर में बिलखती रूहों से लेकर इशरत जहान तक के सच सिर्फ पैसों और अमरीकी पब्लिसिटी से गायब नहीं हो सकते। 1936 में हिटलर और फ्रांको ने क्या कहावह गायब नहीं हुआ है। लोग उसे आज भी सुनते हैं और मानव की अधोगति पर अचंभित होते हैं। नरेंद्र मोदी ने नब्बे के दशक में सत्ता हथियाने के लिए भाषण दर भाषण में मुसलमानों के खिलाफ जो जहर उगला थावह सारा हमारी स्मृति में है। उसकी परिणति गोधरा के पहले और बाद की घटनाओं में हुई। यह गुजरात के लोगों को तय करना है कि उनके बच्चे भविष्य में उनके बारे में इतिहास में क्या पढ़ेंगे। नरेंद्र मोदी की सारी कोशिशें सच को दबा नहीं पाएँगीं।
इधर कई वर्षों से एक बड़ा झूठ यह फैलाया जा रहा है कि मोदी की वजह से गुजरात राज्य में अभूतपूर्व तरक्की हुई है। 'गुड गवर्नेंस' – ये दो शब्द,जिनका मतलब है अच्छा प्रशासनऐसे कहे जाते हैं जैसे मोदी की सरकार के पहले अंग्रेज़ी भाषा में इनका अस्तित्व ही नहीं था। गुजरात के बारे में जानकारी रखने वाले लोग यह बतलाते हैं कि अव्वल तो यह बात सच नहीं है। गुजरात कई सूचकांकों में अन्य कई राज्यों से पीछे है। जो तरक्की दिखती भी हैवह न केवल उच्च और मध्य वर्गों तक सीमित हैवह अधिकतः पहले से हुए अर्थ निवेश ओर पहले से चल रही योजनाओं की वजह से है। जब से अफ्रीकी देशों से निकले गुजराती मूल के व्यापारियों में से कई अमरीका या ब्रिटेन से लौट कर भारत और गुजरात में बस गए हैंतब से शहरीकरण और उसके साथ होता पूँजीवादी विकास वहाँ चल रहा है। यह बात गुजरात के पढ़े लिखे लोगों से छिपी नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद में बीस साल पहले भी गुजरात राष्ट्रीय औसत से आगे था और आज भी है। पर योजना ओयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि गरीबी उन्मूलन में गुजरात बिहारउत्तर प्रदेशपश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से पीछे है। मानव विकास के कई सूचकांकों में भी गुजरात अन्य कई राज्यों से पीछे है। राज्य के 44% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अक्सर तानाशाह आतंक के जरिए व्यवस्थाओं में कहीं कहीं प्रशासनिक नियमितता लाने में सफल होते हैं। अभी कुछ वर्षों पहले तक बहुत से ऐसे लोग मिल जाते थे जो देश की सभी समस्याओं की वजह अंग्रेज़ों के चले जाने को मानते थे। कई लोग तो भारत में हिटलर जैसा तानाशाह चाहते रहे हैं। पर क्या हम सचमुच इतने नादान हैं कि हमें तानाशाही की सीमाएँ मालूम नहींभारत के लोग गठबंधन की राजनीति से परेशान हो सकते हैंपर अगर हाल में के राज्यों से चुनाव परिणाम आए हैंउनसे साफ दिखता है कि उनकी राजनैतिक समझ परिपक्व है और तानाशाही उन्हें स्वीकार नहीं है।
गुजरात के नागरिकों की पीड़ा हर मानव की पीड़ा है। इतिहास हमें बतलाता है कि समय समय पर इंसान हैवान बना है। अतीत में ताकत के बल पर ही सभ्यताएँ बनती बिगड़ती थीं। आधुनिक काल में संगठित रूप से मानव ने सवाल उठाना शुरू किया है कि हैवानियत से हम कैसे बचें। गुजरात में हुए नरसंहार की निंदा और अपराधियों को उचित सजा देमे की माँग गुजरातियों की निंदा नहीं है। किसी नरसंहार के विरोध में उठी आवाज इतिहास के हर नरसंहार का विरोध है। यह ज़रूरी है कि हम विरोध करें ताकि फिर कभी न केवल का गोधरा और उसके बाद की घटनाएं न होंबल्कि 1984 जैसा, 1947 जैसाहिटलर के नरसंहार जैसा नरसंहार या ऐसी कोई भी सांप्रदायिक हिंसा कभी न हो। अपने दो पन्नों के साक्षात्कार में टाइम मैगज़ीन की ज्योति थोट्टम ने मोदी को गुजरात के दंगों पर पूछा तो उसका जवाब था मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता लोग बोलेंगे। मानवता को इंतज़ार है कि गुजरात के लोग अब नफ़रत की राजनीति के खिलाफ बोलें और अपने बच्चों को निष्कलंक भविष्य दें। यही गुजरात का सच्चा गौरव होगा। यह हर मानव का सच्चा गौरव होगा।

--लाल्टू

((इस आलेख का संपादित स्वरूप आज 26 मार्च 2012 को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ है)

Tuesday, February 28, 2012

गुलबर्ग सोसाइटी




"गोधरा में ट्रेन जलाये जाने के बारे में जब सुना तब मेरे बच्चे ट्यूशन में थे. घर पर टीवी चल रहा था पर उस समय मैंने ज़्यादा तवज्जो नहीं दी. मेरे पति ने, जो फिल्म प्रोजेक्शनिस्ट हैं, अपने ऑफिस से फ़ोन करके बताया कि हिंसक वारदातें होने की खबर है और हम लोग सावधान रहें. मैं अपने बच्चों को घर ले आई. फिर हमने अपने पड़ोसियों को चिंतित अवस्था में बाहर निकलते देखा. हमारी कालोनी छोटी और घेरेबंद सी है और अपने फ्लैट से मैं पास की छतों पर लोगों को इकठ्ठा होते देख रही थी. तभी मैंने हाथ में गुप्ती लिए एक आदमी को हमारी ओर इशारा करते देखा- मुझे फ़िक्र हुई."
"हम लोग जाफ़री साहब के घर पर इकठ्ठा होना शुरू हुए. वे सांसद थे और हमें यकीन था कि वे मदद जुटा लेंगे. एकाएक सैकड़ों आदमी दीवारें खरोंच रहे थे और सोसायटी में घुस रहे थे. उनके पास केमिकल्स की सैकड़ों छोटी-छोटी शीशियाँ थीं - जो नेल पॉलिश की शीशियों जैसी लग रही थीं, और जो उन्होंने हमारे घर में फेंकीं. ज़मीन पर पड़ते ही शीशियाँ आग की लपटें उगलते हुए फट पड़तीं. भीड़ ने बड़ी चतुराई से ऊपर लगी टंकियों से हो रही पानी की सप्लाई काट डाली ताकि हम किसी भी तरह आग न बुझा पाएँ. उन लोगों ने जाफ़री साहब के घर का घेराव करना शुरू किया और उन्हें बाहर आने को कहने लगे. हम 30-40 लोग छुपे हुए थे, और हमने गैस सिलेंडरों को छुपाने की कोशिश की ताकि केमिकल्स उनसे न टकरा जाएँ. वे दीवारें उड़ाने के लिए सिलेंडरों का इस्तेमाल कर रहे थे. इस बीच बाहर भीड़ हमारे पड़ोसियों को क़त्ल कर रही थी. हमें औरतों के चीखने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं- बाद में पता चला कि उनमें से कई औरतों के साथ बलात्कार किया गया."
"शाम तक लगभग हर कमरे में आग लग चुकी थी. घर के पीछे छत पर जाने के लिए एक सीढ़ी लगी थी. बाहर निकलने का रास्ता खोजते  हम सीढ़ी चढ़ने लगे. धुएँ की वजह से तब तक कई लोग अचेत हो गए थे. मैंने जाफ़री साहब को कहते हुए सुना, 'अगर तुम्हारी जान बच जाती है तो मर जाने दो मुझे.' वह हमने सुना हुआ उनका आखिरी वाक्य था. उन्हें भीड़ ने मार डाला. उस वक़्त मेरे दोनों बच्चे मेरे साथ थे. उस हो-हल्ले में मैं गिर पड़ी. "
"गिरते वक़्त मैं मेरी बेटी को चिल्लाते हुए सुना - मम्मी उठो, मम्मी उठो. जितनी देर हम जाफ़री साहब के घर छुपे हुए थे मेरी बेटी ने मेरे बेटे अज़हर का हाथ थाम रखा था. मुझे बचाने के लिए उसे अज़हर का हाथ छोड़ना पड़ा. जब मैं उठी तो केवल अपनी बेटी  बिनइफ़र को देखा, अज़हर नहीं था. हम चिल्लाते रहे अज्जू! अज्जू! पर वह नहीं मिला. आख़िरकार हम छत पर चढ़ गए पर वहां भी अज़हर नहीं मिला. मैं वापिस नीचे जाने लगी मगर हर किसी ने कहा कि भीड़ मुझे मार डालेगी. ज़कियाबेन ने फिर भी कहा, 'उसे जाने दो- वह एक माँ है.' आखिर जब मदद पहुंची तो हमें बताया गया कि अज़हर से मिलते-जुलते हुलिए वाला एक बच्चा साईबाग पुलिस स्टेशन में है. मैं अज्जू! अज्जू! चिल्लाते हुए पुलिस स्टेशन में घुसी पर वह लड़का अज्जू नहीं था. तब से अब तक मैंने उसे खोजना नहीं छोड़ा."
"हम लगभग दो हफ़्तों बाद गुलबर्ग सोसाइटी वापिस गए. पूरी कालोनी जला दी गई थी. विडम्बना यह कि हमारा घर सही-सलामत था. शायद इसलिए कि दीवार पर माता की एक तस्वीर थी और उन्होंने सोचा होगा कि यह एक हिन्दू का घर है. कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर हमने अपना घर नहीं छोड़ा होता तो हम सलामत होते और अज़हर भी मेरे पास होता."

गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड के बारे में रूपा (तनाज़) मोदी की फ्रंटलाइन से बातचीत, राहुल ढोलकिया की फिल्म 'परज़ानिया'  उनके अनुभवों पर आधारित है.
हिन्दी अनुवाद भारतभूषण तिवारी का है।

Wednesday, October 5, 2011

संजीव भट्ट को सलाम



गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने `सद्भावना उपवास` के बाद आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को गिरफ्तार कराकर अपनी सद्भावना की असलियत पेश कर दी है. उनके शाही उपवास को उनके हृदय परिवर्तन की मिसाल बताने और उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिये योग्य बताने वाले मीडिया और पोलिटिकल विश्लेषक ऐसी कारगुजारियों पर ध्यान नहीं देते हैं. मोदी के सरंक्षण में मुसलमानों के नरसंहार को कथित विकास या फिर  1984 के सिख नरसंहार की आड़ में उचित ठहराने की कोशिशें लगातार की जाती हैं. खुद मोदी अपने खूनी जबड़े छुपाने की कोशिश कभी नहीं करते, उलटे इसे वे देश भर में हिन्दू कट्टरपंथियों और आरएसएस को ख़ुश रखने के लिये प्रमाण पत्र के रूप में पेश करते हैं. गुजरात में या तो कोई उनके खिलाफ बोलता ही नहीं है और अगर कोई बोलता है तो उसे बुरी तरह सबक सिखा दिया जाता है. लेकिन गौरतलब यह है कि ऐसे भयावह माहौल में भी प्रतिरोध जिंदा रहता है. कुछ लोग सच के लिये, न्याय के लिये, मनुष्यता के लिये सब कुछ दांव पर लगाते रहते हैं. संजीव भट्ट ऐसे ही विरले लोगों में से हैं. जो उनके साथ हो रहा है, निश्चय ही उन्होंने इसकी और इससे भी बुरी स्थितयों की कल्पना कर रखी होगी. 
हैरानी  की बात यह है कि भट्ट की गिरफ्तारी के विरोध में सेक्युलर, इंसाफपसंद और लोकतान्त्रिक ताकतों की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, वैसी हुई नहीं है. कम संख्या में ही सही, पर लोकतंत्र में यकीन रखने वाले लोगों को देश भर के शहरों, कस्बों में जमा होकर कम से कम ज्ञापन आदि तो देने ही चाहिए. बाबरी मस्जिद के खिलाफ शुरू किये गए उन्माद के दिनों में जिस तरह साम्प्रदायिकता से लड़ने की कोशिशें हुई थीं, वे बाद के दिनों में कम ही होती गयीं. आखिर पोपुलर पॉलिटिक्स से प्रतिरोध की दिखावी मुद्रा भी जाती रही. `वैकल्पिक` मीडिया के साथी भी इन दिनों ऐसे सवालों से उदासीन नज़र आने लगे हैं. दोहराने की जरूरत नहीं है कि संजीव भट्ट का साहस और कर्तव्यनिष्ठा ऐसे दौर में और भी ज्यादा उल्लेखनीय है. उन्हें और उनके संघर्ष के साथियों को सलाम. 

Saturday, September 17, 2011

मोदी और मीडिया

पेड न्यूज़, कॉर्पोरेट की दलाली और दूसरे गोरखधंधों की कालिख से सना मीडिया बेशर्मी के नित नये आयाम स्थापित कर रहा है. अन्ना का उपवास प्रायोजित करने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के मिशन पीएम में उसका उत्साह देखते ही बनता है. नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं. अपनी गुजरात प्रयोगशाला में मुसलमानों के व्यापक संहार का उनका प्रयोग बेहद सफल साबित रहा है और अब वे इसके सहारे प्रधानमंत्री पद तक पहुँचना चाहते हैं. कभी लालकृष्ण आडवाणी के रथ यात्रा के प्रयोग ने भी मुल्क को सांप्रदायिक खून ख़राबे की आग में झोंक दिया था और तब लौह पुरूष और सरदार पटेल के खिताब भी उन्हें मिले थे लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी दूसरे स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी के हिस्से में आई थी. अब सरदार पटेल का खिताब भी आडवाणी के बजाय मोदी के पास है और मोदी इसके सच्चे हक़दार भी हैं. आखिर 1947 में मुल्क के गृह मंत्री रहते हुए पटेल ने मुसलमानों के कत्लो गारत में जो भूमिका निभाई थी, नरेन्द्र मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात में उसी परम्परा को ज्यादा असरदार और `निर्भय` रहते हुए नई `ऊंचाई` दी. मोदी जानते हैं कि आडवाणी की हालत लालची बूढ़ी लोमड़ी जैसी है और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पास उनके (मोदी) जैसे बनैले दांतों वाला दूसरा ऐसा चेहरा नहीं है जो हिन्दुत्ववादी अभियानों से तैयार वोटरों को नई ऊर्जा और आक्रामकता दे सकता हो. लगता है हमारे मीडिया को भी उनसे बड़ी उम्मीदें हैं. उनके शाही उपवास की कवरेज से तो यही लगता है. यानी कॉर्पोरेट अन्ना और मोदी दोनों का चितेरा है.
`आज तक` चैनल का उत्साह देखने लायक है. सुबह एंकर चीखता है, मोदी बदल गए हैं, उन्हें मौका दिया जाना चाहिए. वह गुस्से में है और जोर देकर कहता है, मोदी को मौका दिया ही जाना चाहिए. शाम हो चली है इसी चैनल पर एक महिला पत्रकार खुशी से फूली नहीं समा रही है. मोदी के भाषण की तारीफों के पुल बांधें जा रहे हैं. दैनिक भास्कर के मालिक संपादक श्रवण गर्ग भाषण की सूक्तियों का भक्ति भाव से `विश्लेषण` कर रहे हैं और वे कहते हैं कि मोदी का भाषण ऐसा लग रहा था, जैसे लाल किले से प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हों. दूसरे चैनलों पर भी यही हो रहा है, मोदी बदल गए हैं, मोदी बदल गए हैं का शोर है. देखो-देखो हत्यारा संत हो गया है. देखो कैसा आक्रामक नेता, कैसा विनम्र हो गया है. माँ से आशीर्वाद लिया है. कहता है- `मानवता सबसे बड़ी प्रेरणा है. माँ और मानवता जैसे शब्दों के महिमा गई जा रही है. और अचानक मोदी का जीवन चरित्र आने लगता है. उनका बचपन, उंनका गाँव, उनका त्याग - वो सब जो मीडिया किसी के सीएम, पीएम आदि बनने पर या दुनिया छोड़ने पर पेश करता रहा है.
मीडिया साबित करना चाहता है कि मोदी विकास और शांति के मसीहा हैं. उन्हें कुछ मौलवियों से मिलते दिखाया जाता है. लगता है कि मोदी ने गुजरात के हत्यारे नेताओं और अफसरों को चार्जशीट करा दिया है, अपना कसूर मान लिया है और गुनाहों से तौबा कर ली है. लेकिन ऐसी छवि तो आक्रामक खूनी नेता का तेज खो सकती है, यही छवि तो जीवन की गाढ़ी कमाई है. विश्लेषक कहता है, नहीं जी, उनकी आक्रामकता जस की तस है. सुना नहीं, उन्होंने साफ़ कहा कि वे सेक्युलरिज्म में यकीन नहीं रखते. फिर किसी भी मकसद से किया हो पर डायलोग तो गब्बर का ही सुनाया है.
उपवास समारोह में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की उपस्थिति और तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता का प्रतिनिधियों को भेजना भी मोदी के बदलने और उनकी गैर साम्प्रदायिक छवि की स्वीकार्यता के रूप में दर्ज किया जाता है. मगर बादल तो खुद सांप्रदायिक राजनीति करने वाली जमात के प्रतिनिधि हैं. फिर मुसलमानों की खुशी-नाखुशी का पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता है. जयललिता का दक्षिणपंथी रुझान भी जगजाहिर है. वैसे भी एनडीए गैर भाजपाई दलों का सेक्युलर एजेंडा अटल बिहारी वाजपेयी की सेक्युलर छवि की तरह कभी भी मखौल से बढ़कर कुछ नहीं रहा है. आखिर गुजरात मुस्लिम संहार भी इन्ही दलों के बीजेपी की अगुआई में केंद्र की सत्ता में भागीदार रहते हुआ था.
तो न मोदी बदले हैं, न बीजेपी और न संघ बल्कि इन सबने देश के सेक्युलर मिजाज को काफी बदल दिया है. इसीलिये छोटे दलों को नहीं लगता है कि सेक्युलर छवि पर दाग़ आने से उन्हें कोई नुकसान होता है और न ही मीडिया को शर्म आती है. गांधी का मनचाहे ढंग से नाम लेने वाले अन्ना ने मोदी के उपवास और आडवाणी की यात्रा को लेकर गोलमोल रस्मी बयान जरूर दे दिया है पर साम्प्रदायिक ताकतों से लोहा लेने की गलती उन्होंने भी कभी नहीं की. बल्कि वे और ये ताकतें एक दूसरे के काम ही आते रहे हैं.