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Wednesday, March 27, 2013

युद्ध का जख़्मी शरीर


एक मरणासन्न रिटायर फ़ौजी की आख़िरी चिट्ठीः  पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और पूर्व रक्षा मंत्री डिक चेनी के नाम संदेश
मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद/रूपांतरः शिवप्रसाद जोशी

श्री बुश और श्री चेनी,
इराक़ युद्ध की दसवीं बरसी पर, अपने साथी पूर्व फ़ौजियों के हवाले से मैं ये चिट्ठी लिख रहा हूं. मैं ये चिट्ठी लिख रहा हूं उन चार हज़ार चार सौ अट्ठासी सैनिकों के हवाले से जो इराक़ में मारे गए थे. मैं लिख रहा हूं उन सैकड़ों हज़ारों पूर्व सैनिकों की तरफ़ से जो घायल हुए थे जिन्होंने जख़्म खाए थे और मैं भी उनमें से एक हूं. मैं बुरी तरह घायलों में से एक हूं. 2004 में सद्र शहर में घुसपैठियों के साथ मुठभेड़ में मुझे लकवा हो गया. मेरी ज़िंदगी ख़त्म हो रही है. मरणासन्न मरीज़ के तौर पर मैं अस्पताली देखरेख में जीवित हूं.
मैं ये चिट्ठी लिख रहा हूं उन पतियों और पत्नियों की तरफ़ से जिन्होंने अपना दाम्पत्य खो दिया, उन बच्चों की तरफ़ से जिन्होंने अपने मांबाप गंवा दिए, उन पिताओं और मांओं की तरफ़ से जिन्होने बेटे और बेटियां गंवा दी और उन लोगों की तरफ़ से जो मेरे उन साथी फौज़ियों की देखभाल कर रहे हैं जिन्हें दिमागी चोटें आई थीं. मैं ये पत्र लिख रहा हूं उन पूर्व सैनिकों की तरफ़ से जो अपराधबोध से घिरे हैं और जिन्हें ख़ुद से नफ़रत हो गई है कि उन्होंने जो किया, जिसके वे चश्मदीद थे और जो उन्होंने भुगता और इन सब बातों ने उन्हें आत्महत्या की ओर धकेल दिया और क़रीब दस लाख मृत इराकियों की तरफ़ से भी मैं लिख रहा हूं और उन अनगिनत इराकियों की तरफ़ से जो घायल हुए. मैं हम सबकी तरफ़ से लिख रहा हूं- उस इंसानी मलबे की तरफ़ से जो आपके उस युद्ध के बाद पीछे पड़ा रह गया है, वे सारे के सारे लोग जो अपनी ज़िंदगियां कभी न ख़त्म होने वाले दर्द और दुख में काट रहे हैं.  
आपकी सत्ताएं, आपकी लाखों डॉलरों की निजी दौलतें, आपके जनसंपर्क सलाहकार और आपके विशेषाधिकार और शक्तियां आपके किरदार के खोखलेपन को ढांप नहीं सकतीं. आपने हमें लड़ने और मरने के लिए इराक़ रवाना किया, चेनी महोदय आप एक अनिवार्य सैन्य ड्यूटी से निकल भागे थे और आप बुश महोदय अपनी नेशनल गार्ड यूनिट से आधिकारिक रूप से छुट्टी लिए बिना ग़ैरहाज़िर थे. आपकी कायरता और ख़ुदग़र्ज़ी दशकों पहले पता चल गई थी. हमारे राष्ट्र के लिए आप अपनी जान का जोखिम उठाने के लिए कभी भी तत्पर नहीं थे लेकिन आपने सैकड़ों हज़ार युवा आदमियों और औरतों को एक बेमानी युद्ध में बलिदान के लिए झोंक दिया मानो आप महज़ कबाड़ का ढेर हटा रहे थे.
मैं ये चिट्ठी, अपनी आखिरी चिट्ठी आपको बुश महोदय और चेनी महोदय आपको लिख रहा हूं. मैं इसलिए नहीं लिखता कि मैं सोचता हूं आपने अपने झूठों, चालबाज़ियों और दौलत और सत्ता की प्यास के भयानक मानवीय और नैतिक परिणामों को समझ लिया होगा. मैं ये चिट्ठी इसलिए लिख रहा हूं, अपनी मृत्यु से पहले, क्योंकि मैं ये बात साफ़ करना चाहता हूं कि मैं और मेरे जैसे हज़ारों फौजी, और मेरे लाखों सह नागरिक, लाखों करोड़ों वे नागरिक जो इराक़ में और मध्यपूर्व(पश्चिम एशिया) में रहते हैं- हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि आप लोग कौन हैं और आपने क्या किया है. आप इंसाफ़ से बच निकलेंगे लेकिन हमारी निगाहों में आप दोनों अत्यन्त ख़राब युद्ध अपराधों, लूट और आख़िरकार हज़ारों अमेरिकियों की-मेरे साथी फौजियों की (जिनका भविष्य तुमने चुरा लिया)- उन सब की हत्या के दोषी हैं.
नौ बटा ग्यारह हमलों के दो दिन बाद मैं सेना में भर्ती हुआ था. मैं सेना में इसलिए आया क्योंकि हमारे देश पर हमला हुआ था. मैं उन लोगों को जवाब देना चाहता था जिन्होंने हमारे क़रीब तीन हज़ार नागरिकों को मार डाला था. मैंने इराक़ जाने के लिए सेना नहीं ज्वाइन की थी, उस देश का 9 बटा 11 के हमलों से कोई वास्ता नहीं था और वो अपने पड़ोसियों के लिए भी ख़तरा नहीं था. अमेरिका के लिए तो बिल्कुल भी नहीं. मैंने इराक़ियों को मुक्त कराने के लिए या जनसंहार के मिथकीय हथियारों को नष्ट करने या बगदाद या मध्यपूर्व में उस व्यवस्था को स्थापित करने के लिए सेना ज्वाइन नहीं की थी जिसे आप कटाक्ष की हद तक डेमोक्रेसी कहते थे. मैंने इराक़ के पुनर्निमाण के लिए सेना में भर्ती नहीं हुआ था जिसके बारे में आपने एक बार कहा था कि इराक के तेल राजस्वों से उसकी भरपाई हो जाएगी. हुआ उलटा. अमेरिका को युद्ध की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. पैसे में ही सिर्फ़ तीन करोड़ खरब डॉलर. मैं ख़ासकर युद्ध छेड़ने के लिए सेना में भर्ती नहीं हुआ था. इस तरह का युद्ध अंतरराष्ट्रीय क़ानून के दायरे में अवैध है. इराक में सैनिक के रूप में, मैं अब जानता हूं कि आपकी मूर्खता और आपके अपराधों को बढ़ावा दे रहा था. अमेरिकी इतिहास में इराक़ युद्ध सबसे बड़ी सामरिक चूक है. मध्यपूर्व में इसने सत्ता के संतुलन को नष्ट कर दिया है. इससे इराक में एक भ्रष्ट और क्रूर इरान समर्थक सरकार की स्थापना हुई है. जो यातना, जानलेवा दस्तों और आतंक के दम पर सत्ता में जड़ें जमा चुकी है और उसने ईरान को पूरे इलाके में बड़ी ताक़त बना दिया है. हर स्तर पर- नैतिक, सामरिक, सैन्य और आर्थिक- हर स्तर पर इराक़ एक नाकामी थी. और आपने- बुश महोदय आपने और चेनी महोदय आपने- आप दोनों ने ये युद्ध भड़काया. आप दोनों को ही इसके नतीजे भुगतने चाहिए.  
दूसरे घायल और विकलांग रिटायर फौजियों की तरह मैंने भी इलाज में प्रशासन की बदइंतज़ामी और लापरवाही को झेला है. दूसरे घायल और टूटे हुए रिटायर सैनिकों की तरह मैं भी जान गया हूं कि हमारी मानसिक और शारीरिक कमियां और जख़्म आपके किसी काम के नहीं. शायद किसी भी नेता को हममें दिलचस्पी नहीं. हमारा इस्तेमाल किया गया. हमसे छल हुआ. और हमें अब ठुकरा दिया गया है. आप बुश महोदय, खुद को बड़ा ईसाई दिखाते हैं. लेकिन क्या झूठ बोलना पाप नहीं है. क्या चोरी और स्वार्थी इच्छाएं पाप नहीं हैं. मैं ईसाई नहीं हूं. लेकिन मैं ईसाईयत के विचार में यक़ीन रखता हूं. मैं मानता हूं कि जो भी कमतर से कमतर आप अपने भाईयों के साथ करते हैं वैसा ही आप आख़िरकार एक दिन अपने साथ करते हैं, अपनी आत्मा के साथ करते हैं.
अगर मैं अफ़ग़ानिस्तान में उन ताक़तों के ख़िलाफ़ घायल हुआ होता जिन्होंने 9 बटा 11 हमलों को अंजाम दिया था, तो मैं ये पत्र नहीं लिखता. मैं वहां घायल हुआ होता तो अपनी शारीरिक बदहाली और अवश्यंभावी मौत से तब भी वैसा ही घिसटता रहता, लेकिन मुझे तब कम से कम ये जानने की सुविधा रहती कि मेरी चोटें अपने देश के बचाने के मेरे अपने फ़ैसले की वजह से आई हैं-उस देश को जिसे मैं प्यार करता हूं. (अनुवादक, पूर्व सैनिक की भावना और तक़लीफ़ के प्रति पूरे सम्मान और सहानुभूति के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी युद्ध को किसी भी रूप में जायज़ नहीं मानता. सैनिक की मूल युद्ध विरोधी भावना में अफ़ग़ानिस्तान युद्ध के प्रति सहमति का होना अजीब विरोधाभास ही दिखाता है. और ये भी बताता है कि अमेरिकी सैनिकों का एक बड़ा तबका अफ़ग़ान मामले पर अब भी कैसा गुमराह है. हालांकि अफ़ग़ान युद्ध की छानबीन वाली रिपोर्टें/दस्तावेज/किताबें आ चुकी हैं, आ रही हैं) मुझे दर्दनिवारक दवाओं से भरे हुए अपने शरीर के साथ बिस्तर पर पड़े नही रहना था और इस तथ्य से जूझते नहीं रहना था कि तेल कंपनियों में अपने लालच के चलते, सऊदी अरब के तेल धनिक शेखों से अपने गठजोड़ के चलते और साम्राज्य के अपने उन्मादी नज़रिए के चलते आपने बच्चों समेत मेरे जैसे हज़ारों हज़ार लोगों को मौत की ओर धकेल दिया.
हिसाब किताब का मेरा वक़्त नज़दीक है. आपका भी आएगा. मुझे उम्मीद है आप पर मुक़दमा चलेगा. लेकिन ज़्यादा उम्मीद मुझे अब भी यही होती है कि अपनी ख़ातिर आपमें ये नैतिक साहस आ पाएगा कि आप उस सब का सामना कर सकें जो आपने मेरे साथ किया और बहुत सारे लोगों के साथ. उन बहुत सारों के साथ जिन्हें जीना चाहिए था. मैं उम्मीद करता हूं कि इस पृथ्वी पर अपना समय पूरा करने से पहले, जैसा कि मेरा अभी हो रहा है, आपके भीतर विवेक की इतनी जुंबिश आ पाएगी कि अमेरिकी जनता के सामने और दुनिया के सामने और ख़ासकर इराक़ी लोगों के सामने खड़े होकर आप माफ़ी की भीख मांग लेंगे.
बिस्तर पर बीमार और विकलांग पड़े टॉमस यंग इराक युद्ध में हिस्सा ले चुके पूर्व सैनिक हैं. 2007 में बनी बॉडी ऑफ़ वॉर नाम की अद्भुत डॉक्युमेंट्री फ़िल्म में प्रमुख क़िरदार और विषय भी वही थे. जानेमाने टीवी टॉक शो होस्ट फ़िल डोनाह्यु और एलन स्पाइरो ने ये फ़िल्म बनाई थी. 4 अप्रैल 2004 को इराक़ में उनका पांचवां दिन था. जब बगदाद के पड़ोसी शहर सद्र में उनकी यूनिट गोलीबारी की चपेट में आ गईं. एक गोली यंग को लगी, वो घायल हुए और उस गोली से उन्हें सीने से नीचे पूरे शरीर में लकवा मार गया. फिर वे दोबारा नहीं चल सके. तीन महीने बाद सरकारी चिकित्सा देखभाल से रिलीज़ होकर यंग घर लौटे और इराक वेटेरन्स अगेन्स्ट द वार नाम के एक संगठन में सक्रिय सदस्य बन गए. उन्होंने हाल में इच्छा मृत्यु का एलान किया है कि वो अपनी दवाएं और खाना नहीं लेंगे जो उन्हें एक नली के सहारे द्रव के रूप में दिए जाते हैं. खाने की नली को हटा दिए जाने के बाद टॉमस यंग धीरे धीरे मौत का रुख़ कर पाएंगें.
(डेमोक्रेसी नाऊ डॉट ओर्ग से साभार)
इराक युद्ध की 10वीं बरसी पर




Tuesday, December 11, 2012

क्या आप क्षमा सावंत को जानते हैं? : भारतभूषण तिवारी



पश्चिमी देशों में ख़ासकर अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की सफलता को लेकर हमारे मीडिया का उत्साह देखते ही बनता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्द वैज्ञानिक डॉ. हरगोबिन्द खुराना (जो भारत में पैदा होकर अमेरिकी नागरिक बने) हों या मशहूर अंतरिक्ष-यात्री सुनीता विलियम्स (जो भारतीय माता-पिता की अमेरिका में पैदा हुई संतान हैं)हमारा कलेक्टिव सीना चौड़ा होना को तत्पर होता है। हाल ही में सिटी बैंक के सीईओ पद से हटे या हटाये गए गए विक्रम पंडित जब 2007 के अंत में उस ओहदे पर नियुक्त हुए थे तब विदर्भ के हिंदी-मराठी अखबारों ने उनके नागपुर कनेक्शन और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुए औलिया संत श्री गजानन महाराज (जिनका मंदिर महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के शेगांव में स्थित है और उस मंदिर की देखभाल करने वाला ट्रस्ट 'श्री गजानन महाराज संस्थानअस्पतालस्कूलें और इंजीनियरिंग कॉलेज भी चलाता है लिहाजा उसकी आर्थिक हैसियत शिर्डी के श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट से कुछ ही कम है) के परम भक्त होने की कहानियों से अपने पन्ने रंग डाले थे। स्कूली बच्चों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के कठिन और कम ज्ञात शब्दों के हिज्जे बताने वाली प्रतियोगिता 'स्पेलिंग बीमें भारतीय मूल के बच्चों की सफलता का मुद्दा हो या कुल मिलाकर अमेरिकी स्कूली शिक्षा में उनके फ़्लाइंग कलर्स” का मामलाहम अपने जींस पर गर्व करने का मौका नहीं छोड़ते। 'अपनेपनका नशा इस कदर तारी होता है कि रजत गुप्ता के अर्श से फर्श पर आ गिरने की दास्ताँ या सीएनएन से जुड़े विख्यात पत्रकार और लेखक फरीद ज़कारिया पर लगे साहित्यिक चोरी के आरोपों की कहानी से भी हमें एक रूहानी सुकून ही हासिल होता है।

हाल के कुछ वर्षों में अमेरिकी राजनीति के पटल पर दो भारतीय मूल की शख्सियतें चमकी हैं। ये हैं लुइज़ियाना राज्य के गवर्नर बॉबी जिंदल (जिन्हें अगल्रे राष्ट्रपति चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनाये जाने की बात जब-तब उठती रहती है और साउथ कैरोलाइना राज्य की गवर्नर निकी हेली उर्फ़ नम्रता रंधावा। इन दोनों की सफलताओं को हमने अपने स्वभाव के मुताबिक़ पर्याप्त सेलेब्रेट किया है बावजूद इसके कि इन दोनों को अपनी तहज़ीबी वल्दियत या 'कल्चरल ब्लडलाइनपर कोई ख़ास नाज़ नहीं। और वह 'नाज़भी उसी समय दृष्टिगोचर होता है जब वे अपेक्षाकृत संपन्न इन्डियन-अमेरिकन कम्युनिटी में वोट या आर्थिक सहायता माँगने जाते हैंवरना वृहत सार्वजनिक जीवन में वे अपनी बची-खुची सांस्कृतिक विरासत को लेकर न केवल खासे शर्मिंदा नज़र आते हैं बल्कि उसे सार्वजनिक तौर पर तज भी चुके हैं। हिन्दू माता-पिता की संतान बॉबी जिंदल तो बीस साल की उम्र से पहले ही कैथलिक बन गए थे। हाँये पता करना मुश्किल है कि उनका धर्म-परिवर्तन वास्तव में आध्यात्मिक ह्रदय-परिवर्तन से उपजा था या अपनी भावी (राजनीतिक अथवा पेशेवर) ज़िन्दगी की कामयाबी के लिए किये गए हिसाब-किताब का परिणाम था। सिख परिवार में जन्मीं निकी हेली ने विवाह के बाद अपने पति का धर्म स्वीकार कर लिया और अब इस बात पर जोर देती हैं कि वे एक 'प्रैक्टाइज़िन्ग क्रिश्चनहैं और सिर्फ अपने माता-पिता का मन रखने के लिए और उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए गुरूद्वारे जाती हैं।
याद रहे कि यहाँ मूल मुद्दा इन दोनों का अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से दूर होना नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बहुसांस्कृतिक देश में अश्वेतगैर-ईसाई और अप्रवासी पृष्भूठमि के नागरिक आम तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते हैं। मगर जिंदल और हेली को अमेरिका की ग्रैंड ओल्ड पार्टी (रिपब्लिकन पार्टी) के 'फार राइटचेहरे का प्रतिनिधित्व करते देखना तकलीफदेह है।  मार्क्सवादी इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. विजय प्रसाद ने जिंदल के गवर्नर बनने पर उनके बारे में एक मुख़्तसर टिप्पणी की थी जो बहुत कुछ कह देती है: 'एंटी-अबॉर्शनप्रो-गनएंटी-सेकुलरप्रो-सारएंटी-साइं….सूची अंतहीन है।अमेरिका की एक प्रगतिशील पत्रिका 'दि प्रोग्रेसिवके प्रबंध सम्पादक अमिताभ पाल बताते हैं कि निकी हेली पिछले दो-तीन सालों में अमेरिका में उभरे घोर दक्षिणपंथी और प्रति-क्रांतिकारी आन्दोलन 'टी पार्टी मूवमेंटकी चहेती हैं और उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनावों में उपराष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाया जा सकता है। इस आधार पर जिंदल और हेली को सत्तर और उसके बाद के दशकों में भारतअमेरिका या अन्यत्र पैदा हुई और पली-बढ़ी पीढ़ी की प्रोटो-फासिस्ट प्रवृत्तियों का मूर्तन कहना अतिशयोक्ति न होगी।

वहीं दूसरी ओर क्षमा सावंत हैं जिनका कहीं कोई ज़िक्र भारतीय मीडिया ने नहीं किया। सावंत सिएटल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने `सोशलिस्ट अल्टरनेटिव` नाम की वामपंथी पार्टी की उम्मीदवार के तौर पर गत नवम्बर में वाशिंगटन राज्य की प्रतिनिधि सभा का चुनाव लड़ा था। ये अलग बात है कि वे चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकींमगर एक चौथाई से ज़्यादा (28 फ़ीसदी) या लगभग 14,000 वोट हासिल कर उन्होंने इतिहास बनाया। उनके प्रतिद्वंद्वी थे डेमोक्रेटिक पार्टी के उमीदवार और निवर्तमान सभा के अध्यक्ष फ्रैंक चॉप जिनके लिए यह टक्कर उनके पिछले अठारह सालों के कार्यकाल में सबसे मुश्किल साबित हुई।

सोशलिस्ट अल्टरनेटिव का गठन 1986 में 'कमिटी फॉर अ वर्कर्स इंटरनेशनल' (1974 में स्थापित ट्रॉटस्कीवादी वामपंथी पार्टियों का अंतर्राष्ट्रीय संघ जिसका मुख्यालय लन्दन में है) से जुड़े और अस्सी के दशक में अमेरिका जा बसे सदस्यों ने'लेबर मिलिटेंटके नाम से किया था। अपने शुरूआती दिनों में लेबर मिलिटेंट ने अमेरिका के मजदूर आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वहाँ के कई बड़े शहरों की प्रमुख यूनियनों में अपनी पैठ बनाई। 1998-99 के बाद से यह पार्टी सोशलिस्ट अल्टरनेटिव के नाम से जानी जाती है। नाम बदलने के तुरंत बाद वाले दौर में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने अमेरिका के भूमंडलीकरण विरोधी आन्दोलनों में हिस्सेदारी की। 30 नवम्बर 1999 को सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की बैठक के दौरान हुए ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन ( जिसे एन-30 के नाम से भी जाना जाता है) में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने सक्रिय भूमिका निभाई थी।

अफ़गानिस्तान और इराक़ में चल रही जंग के विरोध में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने 2004 में 'यूथ अगेंस्ट वार एंड रेसिज्मनाम से मुहिम चलाई। हाईस्कूलों में चलाई गई इस मुहिम का फोकस लड़ाइयों की खातिर की जाने वाली युवाओं की सैन्य-भर्ती से सम्बंधित नीतियों का विरोध करना था। 1996 से 2008 तक हर राष्ट्रपति चुनाव लड़ने वाले राजनीतिज्ञ राल्फ नेडर की उम्मीदवारी का सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने उन्हें बुर्जुआ प्रत्याशी मानते हुए भी हर बार समर्थन किया। नेडर की सीमाओं को स्वीकार करते हुए उनके प्रति ज़ाहिर किये गए समर्थन का औचित्य सिद्ध करते हुए पार्टी का तर्क यह था कि  द्विदलीय व्यवस्था को तोड़ने और मेहनतकशों की पार्टी खड़ी करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है। पिछले साल-डेढ़ साल में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने देश भर में चले ऑक्युपाई आन्दोलन में हिस्सा लेते हुए कॉर्पोरेट हितों की गुलाम और सड़ी हुई पूंजीवादी व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक समाजवाद को लेकर जनता में जागरूकता बढ़ाने का ज़रूरी काम किया।
  
ज़ाहिर सी बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के शक्तिशाली उम्मीदवारजिन्हें कॉर्पोरेट अनुदानों की कोई कमी नहीं थीके खिलाफ़ बहुत कम पैसों में अपना चुनाव अभियान चलाना क्षमा सावंत के लिए कोई आसान बात नहीं थी। चुनावों से पहले उनकी उम्मीदवारी का किस्सा भी दिलचस्प है। सावंत ने वाशिंगटन राज्य के 43वें विधान जनपद (लेजिस्लेटिव डिस्ट्रिक्ट) की सीट संख्या 1 के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत किया था। मगर दि स्ट्रेंजर नाम के अखबार ने नामजद प्रत्याशी के तौर पर सीट संख्या 2 में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया। राज्य के निर्वाचन सम्बन्धी कानूनों के अनुसार वे दोनों में से कोई एक सीट चुन सकती थींजिसमें उन्होंने फ्रैंक चॉप के खिलाफ़ लड़ने के लिए सीट संख्या 2 को चुना। मगर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कार्यालय का मानना था कि निर्वाचन सम्बन्धी क़ानून के अनुसार नामजद प्रत्याशी अपनी पार्टी प्राथमिकता मतपत्र पर ज़ाहिर नहीं कर सकते। इसको लेकर क्षमा सावंत ने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट के खिलाफ़ किंग्ज़ काउंटी निर्वाचन कार्यालय में मुकदमा दायर किया और फैसला उनके पक्ष में आने पर राज्य को उनकी पार्टी प्राथमिकता को मतपत्र में शामिल करना पड़ा।

चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद जारी अपने बयान में सावंत ने कहा कि वॉल स्ट्रीट के पास दो पार्टियाँ हैंअब ज़रूरत इस बात की है कि मेहनतकश लोगों की भी अपनी एक पार्टी हो। उन्होंने 2013 में हर नगर परिषद और मेयर के पद के लिए होने वाले चुनावों में श्रमजीवी वर्ग के प्रत्याशी खड़े करने के लिए अमेरिका की अन्य प्रगतिशील शक्तियों के साथ मिलकर एक साझा मोर्चा बनाने का भी इरादा ज़ाहिर किया।

उनके इस इरादे पर बुलंद आवाज़ में आमीन कहा जाना चाहिए।
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समयांतर के दिसंबर 2012 अंक में प्रकाशित। 

Monday, November 26, 2012

लोकतांत्रिक महिलावादः एलिस वॉकर




हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में बहुत सारे उदारवादी ओबामा के पक्ष में `कम बुरे` का तर्क दे रहे थे। हमारे यहां भी इस तरह कॆ तर्क खूब दिए जाते हैं। अमेरिकी चुनावी नतीजों के तुरंत बाद गाज़ा पर अमेरिकी पिट्ठू इस्राइल के बर्बर हमले के बाद इन `उदारवादियों` के न जाने क्या तर्क होंगे पर एलिस वॉकर ने इस कविता के जरिए इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया था। कविता में वॉकर `लोकतांत्रिक महिलावाद` का जो प्रारूप पेश करती हैं, वह भी गौरतलब है। इस कविता का हिंदी अनुवाद भारतभूषण तिवारी ने किया है।



लोकतांत्रिक महिलावाद
वंगारी माथाई (1940-2011) के लिए

आप पूछते हैं मैं क्यों मुस्कुरा उठती हूँ
जब आप मुझसे यह कहते हैं कि
आगामी राष्ट्रीय चुनावों में 
आप बड़ी अनिच्छा के साथ आप
दोनों में से कम बुरे विकल्प के पक्ष में वोट देंगे.

मुस्कुराने की एक वजह ये है कि
हमारे सामने बुरे विकल्प दो से ज़्यादा हैं

दूसरी यह कि हमारे पुराने मित्र नॉस्त्रदमस
याद आते हैं, अपनी चार सौ सालों पुरानी
डरावनी भविष्यवाणी के साथ: कि हमारी दुनिया
और उनकी भी
(हमारे "शत्रु"- जिन में बहुत से बच्चे शामिल हैं)
हमारे जीवन काल में ही
(आणविक नकबा या होलोकॉस्ट की वजह से) ख़त्म हो जायेगी.
ये सब बातें चुनावों के विचार और उन पर
ज़ाया किये जाने वाले अरबों डॉलर को
तनिक मूर्खतापूर्ण साबित करती है.

मैं अमेरिका के दक्षिण वाली अश्वेत,
मेरे लोगों को अपना वोट
बेहद प्यारा था
जबकि दूसरे, सदियों तक,
अपने वोट से खेलते नज़र आये.

जिस एक बात के प्रति मैं आपको
आश्वस्त कर सकती हूँ वह यह कि: 
बुरे विकल्प को वोट देकर मैं कभी
ऐसे पाक दिलों को धोखा नहीं दूँगी
चाहे बुराई उसमें सूक्ष्म प्रमाण में ही क्यों न हो
जो, जैसा कि समाचार प्रसारणों में, उनके रुझान के बावजूद
आप देख सकते हैं
कि सूक्ष्म मात्रा में नहीं है

मैं कुछ और चाहती हूँ;
एक अलग व्यवस्था
पूरी तरह से.
जैसी इस धरती पर
हज़ारों सालों में न देखी गई. जैसे भी.
लोकतांत्रिक महिलावाद.
Democratic Womanism

गौर करिए कि इस शब्द में man कैसे उसके बीचोंबीच है?
यह एक वजह है कि यह मुझे पसंद है. वह वहीं है, सामने और बीच में. मगर वह घिरा हुआ है
मैं उस जीवन पद्धति के पक्ष में वोट देना चाहती हूँ और काम करना चाहती हूँ
जो स्त्रैण का सम्मान करे;
वह पद्धति जो स्वीकार करती है
उस अक्लमंदी की चोरी को
जो महिला और काले मातृ नेतृत्व ने
शायद हमेशा से हमारे अंतरिक्षयान को मुहैया कराई है

मैं टीवी पत्रकार किस्म की लड़की
की नहीं सोच रही:
जो ख़ुशी-ख़ुशी  इस दुनिया के 
बुरे से बुरे लड़कों के साथ घुल-मिल जाए
उसकी आँखें मानों एक दरार
उसका मुँह मानों ज़िप चेन

नहीं, मैं एक असली
व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रही हूँ.
जिसमें औरतें 
एक साथ उठें
इस धरती के कमज़ोर और नाकाम जहाज़
का नियंत्रण अपने हाथों में लेने के लिए

जहाँ हर एक हज़ार सालों की
हमारी ख़ामोशी खेदपूर्वक परखी जाती है,
और जिस क्रूर अंदाज़ में करुणा और दयालुता
के हमारे मूल्यों की
खिल्ली उड़ाई गई है
उन्हें दबाया गया है
आज के दौर की त्रासदी को अंजाम देने के लिए

मेरा मानना है, अतीत को बड़े ध्यान से परखा जाना चाहिए
उस से पहले कि हम उसे पीछे छोड़ दें. 
मैं सोच रही हूँ लोकतांत्रिक, और शायद 
समाजवादी, महिलावाद के बारे में.
क्योंकि माँओं, दादियों, दीदियों
और चाचियों के अलावा 
आपस में बाँटने के बारे में गहराई से
और किसे पता होगा?

स्त्री और पुरुष दोनों को
प्यार और दुलार करना?
बीच वालों की तो बात ही छोडिये.
पूरे समुदाय को 
पोषित, शिक्षित और
सुरक्षित रखना?

लोकतांत्रिक महिलावाद
लोकतांत्रिक समाजवादी
महिलावाद, के आइकन होंगे
भलाई के लिए लड़ने वाले प्रखर योद्धा
जैसे वंदना शिवा,
आंग सान सू ची,
वंगारी माथाई
हैरिए टबमन, 
योको ओनो,
फ्रीदा काहलो,
एंजेला डेविस,
और बारबरा लुईस,
और जिधर देखो उधर से, नए-नए आइकन आते ही रहेंगे
आपका नाम भी इस फेहरिस्त में है
मगर यह इतनी बड़ी है (आइसिस* का नाम बीच में आएगा) कि मुझे यहीं रुकना होगा
वरना कविता ख़त्म नहीं हो पायेगी!
तो ज्ञात हो कि मैंने आपको उस समुदाय में शामिल किया है जिसमें
मेरियन राइट इडलमन, एमी गुडमन, सोजोर्नर ट्रुथ, ग्लोरिया स्टीनम और मेरी मेक्लौयड बेथ्यून भी हैं.
जॉन ब्राउन, फ्रेडरिक डगलस, जॉन लेनन और हॉवर्ड ज़िन हैं.
अपने को घिरे हुए पाकर खुश हैं!

कोई व्यवस्था नहीं हैं
कोई व्यवस्था नहीं है फिलवक्त यहाँ
जो रुख बदल सके उस
बर्बादी के रास्ते का जिस पर धरती चल रही है

कोई शक?

धरती के पुरुष नेताओं ने
लगता है कि अपने विवेक को ताक पर
रख दिया है
हालाँकि लगता है कि
बहुत से पूरी तरह
अपने दिमागों में रहते हैं.

वे क़त्ल करते हैं इंसानों और दूसरे जानवरों का
जंगलों नदियों और पहाड़ों का 
हर दिन
वे काम में लगे होते हैं
और लगता नहीं कि वे कभी इस बात
पर ध्यान भी देते हैं

वे विनाश को खाते और पीते हैं
दुनिया की औरतों
दुनिया की औरतों
क्या हम ये विनाश हैं?
तेल के लिए (या किसी और चीज़ के लिए) 
हम समूचे महाद्वीपों को ख़त्म कर देंगे
बजाय इसके कि हम जिन्हें पैदा करते हैं
उन उपभोक्ता औलादों की संख्या पर रोक लगाएँ

एक शासन व्यवस्था
जिसका ख़्वाब हम देख सकते हैं, कल्पना कर सकते हैं और साथ मिल कर 
तैयार कर सकते हैं. व्यवस्था जो स्वीकार करती है
प्रकृति माँ की हत्या में कम से कम छह हज़ार सालों तक 
क्रूरता से लागू की गई सहभागिता
मगर देखती है छह हज़ार साल आगे तक
जब हम झुकेंगे नहीं

हमें क्या चाहिए होगा? योजना बनाने के लिए
कम से कम सौ साल: (जब दुनिया इतनी डरी
हुई है तो हमें ख़ुशी-ख़ुशी
पांच सौ साल दे दिए जायेंगे)
जिसमें महिलाओं के समूह आपस में मिलेंगे,
अपने आप को संगठित करेंगे, 
और उन पुरुषों के साथ मिलकर
जिनमें महिलाओं के साथ खड़े होने का साहस है
आदमी जिनमें औरतों के साथ खड़े होने का साहस है
हमारे ग्रह की परवरिश कर उसे सेहत के एक अच्छे दर्जे तक 
ले आयेंगे.

और किसी क्षमा-याचना के बिना --
(जितनी गन्दगी मचाई जा चुकी है उस से ज्यादा 
मचाना आगे मुमकिन नहीं) --
समर्पित कर दें अपने आप को, विरोध की परवाह किये बिना,
अथक सेवा कार्य में और हमारी मातृ नौका को पुनर्जीवित करने में
और उसने जो हमारी देखभाल की है
उसके प्रति कृतज्ञता के साथ 
श्रद्धापूर्वक उसे पुनःस्थापित
करने हेतु प्रतिबद्ध हों.

*मिस्र की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आइसिस प्रकृति की संरक्षक देवी है.

(इस कविता का एक छोटा अंश `समकालीन सरोकार` पत्रिका में छप चुका है।)