पश्चिमी देशों में ख़ासकर अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की सफलता को लेकर हमारे मीडिया का उत्साह देखते ही बनता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्द वैज्ञानिक डॉ. हरगोबिन्द खुराना (जो भारत में पैदा होकर अमेरिकी नागरिक बने) हों या मशहूर अंतरिक्ष-यात्री सुनीता विलियम्स (जो भारतीय माता-पिता की अमेरिका में पैदा हुई संतान हैं), हमारा कलेक्टिव सीना चौड़ा होना को तत्पर होता है। हाल ही में सिटी बैंक के सीईओ पद से हटे या हटाये गए गए विक्रम पंडित जब 2007 के अंत में उस ओहदे पर नियुक्त हुए थे तब विदर्भ के हिंदी-मराठी अखबारों ने उनके नागपुर कनेक्शन और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुए औलिया संत श्री गजानन महाराज (जिनका मंदिर महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के शेगांव में स्थित है और उस मंदिर की देखभाल करने वाला ट्रस्ट 'श्री गजानन महाराज संस्थान' अस्पताल, स्कूलें और इंजीनियरिंग कॉलेज भी चलाता है लिहाजा उसकी आर्थिक हैसियत शिर्डी के श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट से कुछ ही कम है) के परम भक्त होने की कहानियों से अपने पन्ने रंग डाले थे। स्कूली बच्चों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के कठिन और कम ज्ञात शब्दों के हिज्जे बताने वाली प्रतियोगिता 'स्पेलिंग बी' में भारतीय मूल के बच्चों की सफलता का मुद्दा हो या कुल मिलाकर अमेरिकी स्कूली शिक्षा में उनके “फ़्लाइंग कलर्स” का मामला, हम अपने जींस पर गर्व करने का मौका नहीं छोड़ते। 'अपनेपन' का नशा इस कदर तारी होता है कि रजत गुप्ता के अर्श से फर्श पर आ गिरने की दास्ताँ या सीएनएन से जुड़े विख्यात पत्रकार और लेखक फरीद ज़कारिया पर लगे साहित्यिक चोरी के आरोपों की कहानी से भी हमें एक रूहानी सुकून ही हासिल होता है।
हाल के कुछ वर्षों में अमेरिकी राजनीति के पटल पर दो भारतीय मूल की शख्सियतें चमकी हैं। ये हैं लुइज़ियाना राज्य के गवर्नर बॉबी जिंदल (जिन्हें अगल्रे राष्ट्रपति चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनाये जाने की बात जब-तब उठती रहती है और साउथ कैरोलाइना राज्य की गवर्नर निकी हेली उर्फ़ नम्रता रंधावा। इन दोनों की सफलताओं को हमने अपने स्वभाव के मुताबिक़ पर्याप्त सेलेब्रेट किया है बावजूद इसके कि इन दोनों को अपनी तहज़ीबी वल्दियत या 'कल्चरल ब्लडलाइन' पर कोई ख़ास नाज़ नहीं। और वह 'नाज़' भी उसी समय दृष्टिगोचर होता है जब वे अपेक्षाकृत संपन्न इन्डियन-अमेरिकन कम्युनिटी में वोट या आर्थिक सहायता माँगने जाते हैं, वरना वृहत सार्वजनिक जीवन में वे अपनी बची-खुची सांस्कृतिक विरासत को लेकर न केवल खासे शर्मिंदा नज़र आते हैं बल्कि उसे सार्वजनिक तौर पर तज भी चुके हैं। हिन्दू माता-पिता की संतान बॉबी जिंदल तो बीस साल की उम्र से पहले ही कैथलिक बन गए थे। हाँ, ये पता करना मुश्किल है कि उनका धर्म-परिवर्तन वास्तव में आध्यात्मिक ह्रदय-परिवर्तन से उपजा था या अपनी भावी (राजनीतिक अथवा पेशेवर) ज़िन्दगी की कामयाबी के लिए किये गए हिसाब-किताब का परिणाम था। सिख परिवार में जन्मीं निकी हेली ने विवाह के बाद अपने पति का धर्म स्वीकार कर लिया और अब इस बात पर जोर देती हैं कि वे एक 'प्रैक्टाइज़िन्ग क्रिश्चन' हैं और सिर्फ अपने माता-पिता का मन रखने के लिए और उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए गुरूद्वारे जाती हैं।
याद रहे कि यहाँ मूल मुद्दा इन दोनों का अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से दूर होना नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बहुसांस्कृतिक देश में अश्वेत, गैर-ईसाई और अप्रवासी पृष्भूठमि के नागरिक आम तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते हैं। मगर जिंदल और हेली को अमेरिका की ग्रैंड ओल्ड पार्टी (रिपब्लिकन पार्टी) के 'फार राइट' चेहरे का प्रतिनिधित्व करते देखना तकलीफदेह है। मार्क्सवादी इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. विजय प्रसाद ने जिंदल के गवर्नर बनने पर उनके बारे में एक मुख़्तसर टिप्पणी की थी जो बहुत कुछ कह देती है: 'एंटी-अबॉर्शन, प्रो-गन, एं टी-सेकुलर, प्रो-सार, एंटी-साइं स….सूची अंतहीन है।' अमेरिका की एक प्रगतिशील पत्रिका 'दि प्रोग्रेसिव' के प्रबंध सम्पादक अमिताभ पाल बताते हैं कि निकी हेली पिछले दो-तीन सालों में अमेरिका में उभरे घोर दक्षिणपंथी और प्रति-क्रांतिकारी आन्दोलन 'टी पार्टी मूवमेंट' की चहेती हैं और उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनावों में उपराष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाया जा सकता है। इस आधार पर जिंदल और हेली को सत्तर और उसके बाद के दशकों में भारत, अमेरिका या अन्यत्र पैदा हुई और पली-बढ़ी पीढ़ी की प्रोटो-फासिस्ट प्रवृत्तियों का मूर्तन कहना अतिशयोक्ति न होगी।
वहीं दूसरी ओर क्षमा सावंत हैं जिनका कहीं कोई ज़िक्र भारतीय मीडिया ने नहीं किया। सावंत सिएटल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने `सोशलिस्ट अल्टरनेटिव` नाम की वामपंथी पार्टी की उम्मीदवार के तौर पर गत नवम्बर में वाशिंगटन राज्य की प्रतिनिधि सभा का चुनाव लड़ा था। ये अलग बात है कि वे चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकीं, मगर एक चौथाई से ज़्यादा (28 फ़ीसदी) या लगभग 14,000 वोट हासिल कर उन्होंने इतिहास बनाया। उनके प्रतिद्वंद्वी थे डेमोक्रेटिक पार्टी के उमीदवार और निवर्तमान सभा के अध्यक्ष फ्रैंक चॉप जिनके लिए यह टक्कर उनके पिछले अठारह सालों के कार्यकाल में सबसे मुश्किल साबित हुई।
सोशलिस्ट अल्टरनेटिव का गठन 1986 में 'कमिटी फॉर अ वर्कर्स इंटरनेशनल' (1974 में स्थापित ट्रॉटस्कीवादी वामपंथी पार्टियों का अंतर्राष्ट्रीय संघ जिसका मुख्यालय लन्दन में है) से जुड़े और अस्सी के दशक में अमेरिका जा बसे सदस्यों ने'लेबर मिलिटेंट' के नाम से किया था। अपने शुरूआती दिनों में लेबर मिलिटेंट ने अमेरिका के मजदूर आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वहाँ के कई बड़े शहरों की प्रमुख यूनियनों में अपनी पैठ बनाई। 1998-99 के बाद से यह पार्टी सोशलिस्ट अल्टरनेटिव के नाम से जानी जाती है। नाम बदलने के तुरंत बाद वाले दौर में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने अमेरिका के भूमंडलीकरण विरोधी आन्दोलनों में हिस्सेदारी की। 30 नवम्बर 1999 को सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की बैठक के दौरान हुए ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन ( जिसे एन-30 के नाम से भी जाना जाता है) में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने सक्रिय भूमिका निभाई थी।
अफ़गानिस्तान और इराक़ में चल रही जंग के विरोध में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने 2004 में 'यूथ अगेंस्ट वार एंड रेसिज्म' नाम से मुहिम चलाई। हाईस्कूलों में चलाई गई इस मुहिम का फोकस लड़ाइयों की खातिर की जाने वाली युवाओं की सैन्य-भर्ती से सम्बंधित नीतियों का विरोध करना था। 1996 से 2008 तक हर राष्ट्रपति चुनाव लड़ने वाले राजनीतिज्ञ राल्फ नेडर की उम्मीदवारी का सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने उन्हें बुर्जुआ प्रत्याशी मानते हुए भी हर बार समर्थन किया। नेडर की सीमाओं को स्वीकार करते हुए उनके प्रति ज़ाहिर किये गए समर्थन का औचित्य सिद्ध करते हुए पार्टी का तर्क यह था कि द्विदलीय व्यवस्था को तोड़ने और मेहनतकशों की पार्टी खड़ी करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है। पिछले साल-डेढ़ साल में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने देश भर में चले ऑक्युपाई आन्दोलन में हिस्सा लेते हुए कॉर्पोरेट हितों की गुलाम और सड़ी हुई पूंजीवादी व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक समाजवाद को लेकर जनता में जागरूकता बढ़ाने का ज़रूरी काम किया।
ज़ाहिर सी बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के शक्तिशाली उम्मीदवार, जिन्हें कॉर्पोरेट अनुदानों की कोई कमी नहीं थी, के खिलाफ़ बहुत कम पैसों में अपना चुनाव अभियान चलाना क्षमा सावंत के लिए कोई आसान बात नहीं थी। चुनावों से पहले उनकी उम्मीदवारी का किस्सा भी दिलचस्प है। सावंत ने वाशिंगटन राज्य के 43वें विधान जनपद (लेजिस्लेटिव डिस्ट्रिक्ट) की सीट संख्या 1 के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत किया था। मगर दि स्ट्रेंजर नाम के अखबार ने नामजद प्रत्याशी के तौर पर सीट संख्या 2 में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया। राज्य के निर्वाचन सम्बन्धी कानूनों के अनुसार वे दोनों में से कोई एक सीट चुन सकती थीं, जिसमें उन्होंने फ्रैंक चॉप के खिलाफ़ लड़ने के लिए सीट संख्या 2 को चुना। मगर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कार्यालय का मानना था कि निर्वाचन सम्बन्धी क़ानून के अनुसार नामजद प्रत्याशी अपनी पार्टी प्राथमिकता मतपत्र पर ज़ाहिर नहीं कर सकते। इसको लेकर क्षमा सावंत ने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट के खिलाफ़ किंग्ज़ काउंटी निर्वाचन कार्यालय में मुकदमा दायर किया और फैसला उनके पक्ष में आने पर राज्य को उनकी पार्टी प्राथमिकता को मतपत्र में शामिल करना पड़ा।
चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद जारी अपने बयान में सावंत ने कहा कि वॉल स्ट्रीट के पास दो पार्टियाँ हैं, अब ज़रूरत इस बात की है कि मेहनतकश लोगों की भी अपनी एक पार्टी हो। उन्होंने 2013 में हर नगर परिषद और मेयर के पद के लिए होने वाले चुनावों में श्रमजीवी वर्ग के प्रत्याशी खड़े करने के लिए अमेरिका की अन्य प्रगतिशील शक्तियों के साथ मिलकर एक साझा मोर्चा बनाने का भी इरादा ज़ाहिर किया।
उनके इस इरादे पर बुलंद आवाज़ में आमीन कहा जाना चाहिए।
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समयांतर के दिसंबर 2012 अंक में प्रकाशित।