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Tuesday, December 11, 2012

क्या आप क्षमा सावंत को जानते हैं? : भारतभूषण तिवारी



पश्चिमी देशों में ख़ासकर अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की सफलता को लेकर हमारे मीडिया का उत्साह देखते ही बनता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्द वैज्ञानिक डॉ. हरगोबिन्द खुराना (जो भारत में पैदा होकर अमेरिकी नागरिक बने) हों या मशहूर अंतरिक्ष-यात्री सुनीता विलियम्स (जो भारतीय माता-पिता की अमेरिका में पैदा हुई संतान हैं)हमारा कलेक्टिव सीना चौड़ा होना को तत्पर होता है। हाल ही में सिटी बैंक के सीईओ पद से हटे या हटाये गए गए विक्रम पंडित जब 2007 के अंत में उस ओहदे पर नियुक्त हुए थे तब विदर्भ के हिंदी-मराठी अखबारों ने उनके नागपुर कनेक्शन और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुए औलिया संत श्री गजानन महाराज (जिनका मंदिर महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के शेगांव में स्थित है और उस मंदिर की देखभाल करने वाला ट्रस्ट 'श्री गजानन महाराज संस्थानअस्पतालस्कूलें और इंजीनियरिंग कॉलेज भी चलाता है लिहाजा उसकी आर्थिक हैसियत शिर्डी के श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट से कुछ ही कम है) के परम भक्त होने की कहानियों से अपने पन्ने रंग डाले थे। स्कूली बच्चों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के कठिन और कम ज्ञात शब्दों के हिज्जे बताने वाली प्रतियोगिता 'स्पेलिंग बीमें भारतीय मूल के बच्चों की सफलता का मुद्दा हो या कुल मिलाकर अमेरिकी स्कूली शिक्षा में उनके फ़्लाइंग कलर्स” का मामलाहम अपने जींस पर गर्व करने का मौका नहीं छोड़ते। 'अपनेपनका नशा इस कदर तारी होता है कि रजत गुप्ता के अर्श से फर्श पर आ गिरने की दास्ताँ या सीएनएन से जुड़े विख्यात पत्रकार और लेखक फरीद ज़कारिया पर लगे साहित्यिक चोरी के आरोपों की कहानी से भी हमें एक रूहानी सुकून ही हासिल होता है।

हाल के कुछ वर्षों में अमेरिकी राजनीति के पटल पर दो भारतीय मूल की शख्सियतें चमकी हैं। ये हैं लुइज़ियाना राज्य के गवर्नर बॉबी जिंदल (जिन्हें अगल्रे राष्ट्रपति चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनाये जाने की बात जब-तब उठती रहती है और साउथ कैरोलाइना राज्य की गवर्नर निकी हेली उर्फ़ नम्रता रंधावा। इन दोनों की सफलताओं को हमने अपने स्वभाव के मुताबिक़ पर्याप्त सेलेब्रेट किया है बावजूद इसके कि इन दोनों को अपनी तहज़ीबी वल्दियत या 'कल्चरल ब्लडलाइनपर कोई ख़ास नाज़ नहीं। और वह 'नाज़भी उसी समय दृष्टिगोचर होता है जब वे अपेक्षाकृत संपन्न इन्डियन-अमेरिकन कम्युनिटी में वोट या आर्थिक सहायता माँगने जाते हैंवरना वृहत सार्वजनिक जीवन में वे अपनी बची-खुची सांस्कृतिक विरासत को लेकर न केवल खासे शर्मिंदा नज़र आते हैं बल्कि उसे सार्वजनिक तौर पर तज भी चुके हैं। हिन्दू माता-पिता की संतान बॉबी जिंदल तो बीस साल की उम्र से पहले ही कैथलिक बन गए थे। हाँये पता करना मुश्किल है कि उनका धर्म-परिवर्तन वास्तव में आध्यात्मिक ह्रदय-परिवर्तन से उपजा था या अपनी भावी (राजनीतिक अथवा पेशेवर) ज़िन्दगी की कामयाबी के लिए किये गए हिसाब-किताब का परिणाम था। सिख परिवार में जन्मीं निकी हेली ने विवाह के बाद अपने पति का धर्म स्वीकार कर लिया और अब इस बात पर जोर देती हैं कि वे एक 'प्रैक्टाइज़िन्ग क्रिश्चनहैं और सिर्फ अपने माता-पिता का मन रखने के लिए और उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए गुरूद्वारे जाती हैं।
याद रहे कि यहाँ मूल मुद्दा इन दोनों का अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से दूर होना नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बहुसांस्कृतिक देश में अश्वेतगैर-ईसाई और अप्रवासी पृष्भूठमि के नागरिक आम तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते हैं। मगर जिंदल और हेली को अमेरिका की ग्रैंड ओल्ड पार्टी (रिपब्लिकन पार्टी) के 'फार राइटचेहरे का प्रतिनिधित्व करते देखना तकलीफदेह है।  मार्क्सवादी इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. विजय प्रसाद ने जिंदल के गवर्नर बनने पर उनके बारे में एक मुख़्तसर टिप्पणी की थी जो बहुत कुछ कह देती है: 'एंटी-अबॉर्शनप्रो-गनएंटी-सेकुलरप्रो-सारएंटी-साइं….सूची अंतहीन है।अमेरिका की एक प्रगतिशील पत्रिका 'दि प्रोग्रेसिवके प्रबंध सम्पादक अमिताभ पाल बताते हैं कि निकी हेली पिछले दो-तीन सालों में अमेरिका में उभरे घोर दक्षिणपंथी और प्रति-क्रांतिकारी आन्दोलन 'टी पार्टी मूवमेंटकी चहेती हैं और उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनावों में उपराष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाया जा सकता है। इस आधार पर जिंदल और हेली को सत्तर और उसके बाद के दशकों में भारतअमेरिका या अन्यत्र पैदा हुई और पली-बढ़ी पीढ़ी की प्रोटो-फासिस्ट प्रवृत्तियों का मूर्तन कहना अतिशयोक्ति न होगी।

वहीं दूसरी ओर क्षमा सावंत हैं जिनका कहीं कोई ज़िक्र भारतीय मीडिया ने नहीं किया। सावंत सिएटल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने `सोशलिस्ट अल्टरनेटिव` नाम की वामपंथी पार्टी की उम्मीदवार के तौर पर गत नवम्बर में वाशिंगटन राज्य की प्रतिनिधि सभा का चुनाव लड़ा था। ये अलग बात है कि वे चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकींमगर एक चौथाई से ज़्यादा (28 फ़ीसदी) या लगभग 14,000 वोट हासिल कर उन्होंने इतिहास बनाया। उनके प्रतिद्वंद्वी थे डेमोक्रेटिक पार्टी के उमीदवार और निवर्तमान सभा के अध्यक्ष फ्रैंक चॉप जिनके लिए यह टक्कर उनके पिछले अठारह सालों के कार्यकाल में सबसे मुश्किल साबित हुई।

सोशलिस्ट अल्टरनेटिव का गठन 1986 में 'कमिटी फॉर अ वर्कर्स इंटरनेशनल' (1974 में स्थापित ट्रॉटस्कीवादी वामपंथी पार्टियों का अंतर्राष्ट्रीय संघ जिसका मुख्यालय लन्दन में है) से जुड़े और अस्सी के दशक में अमेरिका जा बसे सदस्यों ने'लेबर मिलिटेंटके नाम से किया था। अपने शुरूआती दिनों में लेबर मिलिटेंट ने अमेरिका के मजदूर आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वहाँ के कई बड़े शहरों की प्रमुख यूनियनों में अपनी पैठ बनाई। 1998-99 के बाद से यह पार्टी सोशलिस्ट अल्टरनेटिव के नाम से जानी जाती है। नाम बदलने के तुरंत बाद वाले दौर में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने अमेरिका के भूमंडलीकरण विरोधी आन्दोलनों में हिस्सेदारी की। 30 नवम्बर 1999 को सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की बैठक के दौरान हुए ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन ( जिसे एन-30 के नाम से भी जाना जाता है) में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने सक्रिय भूमिका निभाई थी।

अफ़गानिस्तान और इराक़ में चल रही जंग के विरोध में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने 2004 में 'यूथ अगेंस्ट वार एंड रेसिज्मनाम से मुहिम चलाई। हाईस्कूलों में चलाई गई इस मुहिम का फोकस लड़ाइयों की खातिर की जाने वाली युवाओं की सैन्य-भर्ती से सम्बंधित नीतियों का विरोध करना था। 1996 से 2008 तक हर राष्ट्रपति चुनाव लड़ने वाले राजनीतिज्ञ राल्फ नेडर की उम्मीदवारी का सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने उन्हें बुर्जुआ प्रत्याशी मानते हुए भी हर बार समर्थन किया। नेडर की सीमाओं को स्वीकार करते हुए उनके प्रति ज़ाहिर किये गए समर्थन का औचित्य सिद्ध करते हुए पार्टी का तर्क यह था कि  द्विदलीय व्यवस्था को तोड़ने और मेहनतकशों की पार्टी खड़ी करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है। पिछले साल-डेढ़ साल में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव ने देश भर में चले ऑक्युपाई आन्दोलन में हिस्सा लेते हुए कॉर्पोरेट हितों की गुलाम और सड़ी हुई पूंजीवादी व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक समाजवाद को लेकर जनता में जागरूकता बढ़ाने का ज़रूरी काम किया।
  
ज़ाहिर सी बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के शक्तिशाली उम्मीदवारजिन्हें कॉर्पोरेट अनुदानों की कोई कमी नहीं थीके खिलाफ़ बहुत कम पैसों में अपना चुनाव अभियान चलाना क्षमा सावंत के लिए कोई आसान बात नहीं थी। चुनावों से पहले उनकी उम्मीदवारी का किस्सा भी दिलचस्प है। सावंत ने वाशिंगटन राज्य के 43वें विधान जनपद (लेजिस्लेटिव डिस्ट्रिक्ट) की सीट संख्या 1 के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत किया था। मगर दि स्ट्रेंजर नाम के अखबार ने नामजद प्रत्याशी के तौर पर सीट संख्या 2 में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया। राज्य के निर्वाचन सम्बन्धी कानूनों के अनुसार वे दोनों में से कोई एक सीट चुन सकती थींजिसमें उन्होंने फ्रैंक चॉप के खिलाफ़ लड़ने के लिए सीट संख्या 2 को चुना। मगर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कार्यालय का मानना था कि निर्वाचन सम्बन्धी क़ानून के अनुसार नामजद प्रत्याशी अपनी पार्टी प्राथमिकता मतपत्र पर ज़ाहिर नहीं कर सकते। इसको लेकर क्षमा सावंत ने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट के खिलाफ़ किंग्ज़ काउंटी निर्वाचन कार्यालय में मुकदमा दायर किया और फैसला उनके पक्ष में आने पर राज्य को उनकी पार्टी प्राथमिकता को मतपत्र में शामिल करना पड़ा।

चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद जारी अपने बयान में सावंत ने कहा कि वॉल स्ट्रीट के पास दो पार्टियाँ हैंअब ज़रूरत इस बात की है कि मेहनतकश लोगों की भी अपनी एक पार्टी हो। उन्होंने 2013 में हर नगर परिषद और मेयर के पद के लिए होने वाले चुनावों में श्रमजीवी वर्ग के प्रत्याशी खड़े करने के लिए अमेरिका की अन्य प्रगतिशील शक्तियों के साथ मिलकर एक साझा मोर्चा बनाने का भी इरादा ज़ाहिर किया।

उनके इस इरादे पर बुलंद आवाज़ में आमीन कहा जाना चाहिए।
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समयांतर के दिसंबर 2012 अंक में प्रकाशित। 

Monday, November 26, 2012

लोकतांत्रिक महिलावादः एलिस वॉकर




हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में बहुत सारे उदारवादी ओबामा के पक्ष में `कम बुरे` का तर्क दे रहे थे। हमारे यहां भी इस तरह कॆ तर्क खूब दिए जाते हैं। अमेरिकी चुनावी नतीजों के तुरंत बाद गाज़ा पर अमेरिकी पिट्ठू इस्राइल के बर्बर हमले के बाद इन `उदारवादियों` के न जाने क्या तर्क होंगे पर एलिस वॉकर ने इस कविता के जरिए इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया था। कविता में वॉकर `लोकतांत्रिक महिलावाद` का जो प्रारूप पेश करती हैं, वह भी गौरतलब है। इस कविता का हिंदी अनुवाद भारतभूषण तिवारी ने किया है।



लोकतांत्रिक महिलावाद
वंगारी माथाई (1940-2011) के लिए

आप पूछते हैं मैं क्यों मुस्कुरा उठती हूँ
जब आप मुझसे यह कहते हैं कि
आगामी राष्ट्रीय चुनावों में 
आप बड़ी अनिच्छा के साथ आप
दोनों में से कम बुरे विकल्प के पक्ष में वोट देंगे.

मुस्कुराने की एक वजह ये है कि
हमारे सामने बुरे विकल्प दो से ज़्यादा हैं

दूसरी यह कि हमारे पुराने मित्र नॉस्त्रदमस
याद आते हैं, अपनी चार सौ सालों पुरानी
डरावनी भविष्यवाणी के साथ: कि हमारी दुनिया
और उनकी भी
(हमारे "शत्रु"- जिन में बहुत से बच्चे शामिल हैं)
हमारे जीवन काल में ही
(आणविक नकबा या होलोकॉस्ट की वजह से) ख़त्म हो जायेगी.
ये सब बातें चुनावों के विचार और उन पर
ज़ाया किये जाने वाले अरबों डॉलर को
तनिक मूर्खतापूर्ण साबित करती है.

मैं अमेरिका के दक्षिण वाली अश्वेत,
मेरे लोगों को अपना वोट
बेहद प्यारा था
जबकि दूसरे, सदियों तक,
अपने वोट से खेलते नज़र आये.

जिस एक बात के प्रति मैं आपको
आश्वस्त कर सकती हूँ वह यह कि: 
बुरे विकल्प को वोट देकर मैं कभी
ऐसे पाक दिलों को धोखा नहीं दूँगी
चाहे बुराई उसमें सूक्ष्म प्रमाण में ही क्यों न हो
जो, जैसा कि समाचार प्रसारणों में, उनके रुझान के बावजूद
आप देख सकते हैं
कि सूक्ष्म मात्रा में नहीं है

मैं कुछ और चाहती हूँ;
एक अलग व्यवस्था
पूरी तरह से.
जैसी इस धरती पर
हज़ारों सालों में न देखी गई. जैसे भी.
लोकतांत्रिक महिलावाद.
Democratic Womanism

गौर करिए कि इस शब्द में man कैसे उसके बीचोंबीच है?
यह एक वजह है कि यह मुझे पसंद है. वह वहीं है, सामने और बीच में. मगर वह घिरा हुआ है
मैं उस जीवन पद्धति के पक्ष में वोट देना चाहती हूँ और काम करना चाहती हूँ
जो स्त्रैण का सम्मान करे;
वह पद्धति जो स्वीकार करती है
उस अक्लमंदी की चोरी को
जो महिला और काले मातृ नेतृत्व ने
शायद हमेशा से हमारे अंतरिक्षयान को मुहैया कराई है

मैं टीवी पत्रकार किस्म की लड़की
की नहीं सोच रही:
जो ख़ुशी-ख़ुशी  इस दुनिया के 
बुरे से बुरे लड़कों के साथ घुल-मिल जाए
उसकी आँखें मानों एक दरार
उसका मुँह मानों ज़िप चेन

नहीं, मैं एक असली
व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रही हूँ.
जिसमें औरतें 
एक साथ उठें
इस धरती के कमज़ोर और नाकाम जहाज़
का नियंत्रण अपने हाथों में लेने के लिए

जहाँ हर एक हज़ार सालों की
हमारी ख़ामोशी खेदपूर्वक परखी जाती है,
और जिस क्रूर अंदाज़ में करुणा और दयालुता
के हमारे मूल्यों की
खिल्ली उड़ाई गई है
उन्हें दबाया गया है
आज के दौर की त्रासदी को अंजाम देने के लिए

मेरा मानना है, अतीत को बड़े ध्यान से परखा जाना चाहिए
उस से पहले कि हम उसे पीछे छोड़ दें. 
मैं सोच रही हूँ लोकतांत्रिक, और शायद 
समाजवादी, महिलावाद के बारे में.
क्योंकि माँओं, दादियों, दीदियों
और चाचियों के अलावा 
आपस में बाँटने के बारे में गहराई से
और किसे पता होगा?

स्त्री और पुरुष दोनों को
प्यार और दुलार करना?
बीच वालों की तो बात ही छोडिये.
पूरे समुदाय को 
पोषित, शिक्षित और
सुरक्षित रखना?

लोकतांत्रिक महिलावाद
लोकतांत्रिक समाजवादी
महिलावाद, के आइकन होंगे
भलाई के लिए लड़ने वाले प्रखर योद्धा
जैसे वंदना शिवा,
आंग सान सू ची,
वंगारी माथाई
हैरिए टबमन, 
योको ओनो,
फ्रीदा काहलो,
एंजेला डेविस,
और बारबरा लुईस,
और जिधर देखो उधर से, नए-नए आइकन आते ही रहेंगे
आपका नाम भी इस फेहरिस्त में है
मगर यह इतनी बड़ी है (आइसिस* का नाम बीच में आएगा) कि मुझे यहीं रुकना होगा
वरना कविता ख़त्म नहीं हो पायेगी!
तो ज्ञात हो कि मैंने आपको उस समुदाय में शामिल किया है जिसमें
मेरियन राइट इडलमन, एमी गुडमन, सोजोर्नर ट्रुथ, ग्लोरिया स्टीनम और मेरी मेक्लौयड बेथ्यून भी हैं.
जॉन ब्राउन, फ्रेडरिक डगलस, जॉन लेनन और हॉवर्ड ज़िन हैं.
अपने को घिरे हुए पाकर खुश हैं!

कोई व्यवस्था नहीं हैं
कोई व्यवस्था नहीं है फिलवक्त यहाँ
जो रुख बदल सके उस
बर्बादी के रास्ते का जिस पर धरती चल रही है

कोई शक?

धरती के पुरुष नेताओं ने
लगता है कि अपने विवेक को ताक पर
रख दिया है
हालाँकि लगता है कि
बहुत से पूरी तरह
अपने दिमागों में रहते हैं.

वे क़त्ल करते हैं इंसानों और दूसरे जानवरों का
जंगलों नदियों और पहाड़ों का 
हर दिन
वे काम में लगे होते हैं
और लगता नहीं कि वे कभी इस बात
पर ध्यान भी देते हैं

वे विनाश को खाते और पीते हैं
दुनिया की औरतों
दुनिया की औरतों
क्या हम ये विनाश हैं?
तेल के लिए (या किसी और चीज़ के लिए) 
हम समूचे महाद्वीपों को ख़त्म कर देंगे
बजाय इसके कि हम जिन्हें पैदा करते हैं
उन उपभोक्ता औलादों की संख्या पर रोक लगाएँ

एक शासन व्यवस्था
जिसका ख़्वाब हम देख सकते हैं, कल्पना कर सकते हैं और साथ मिल कर 
तैयार कर सकते हैं. व्यवस्था जो स्वीकार करती है
प्रकृति माँ की हत्या में कम से कम छह हज़ार सालों तक 
क्रूरता से लागू की गई सहभागिता
मगर देखती है छह हज़ार साल आगे तक
जब हम झुकेंगे नहीं

हमें क्या चाहिए होगा? योजना बनाने के लिए
कम से कम सौ साल: (जब दुनिया इतनी डरी
हुई है तो हमें ख़ुशी-ख़ुशी
पांच सौ साल दे दिए जायेंगे)
जिसमें महिलाओं के समूह आपस में मिलेंगे,
अपने आप को संगठित करेंगे, 
और उन पुरुषों के साथ मिलकर
जिनमें महिलाओं के साथ खड़े होने का साहस है
आदमी जिनमें औरतों के साथ खड़े होने का साहस है
हमारे ग्रह की परवरिश कर उसे सेहत के एक अच्छे दर्जे तक 
ले आयेंगे.

और किसी क्षमा-याचना के बिना --
(जितनी गन्दगी मचाई जा चुकी है उस से ज्यादा 
मचाना आगे मुमकिन नहीं) --
समर्पित कर दें अपने आप को, विरोध की परवाह किये बिना,
अथक सेवा कार्य में और हमारी मातृ नौका को पुनर्जीवित करने में
और उसने जो हमारी देखभाल की है
उसके प्रति कृतज्ञता के साथ 
श्रद्धापूर्वक उसे पुनःस्थापित
करने हेतु प्रतिबद्ध हों.

*मिस्र की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आइसिस प्रकृति की संरक्षक देवी है.

(इस कविता का एक छोटा अंश `समकालीन सरोकार` पत्रिका में छप चुका है।)

Tuesday, March 11, 2008

गाजा की शहीद रशेल कूरी

क्या आपको गाजा की शहीद रशेल कूरी की याद आ रही है? भगत सिंह की उम्र की ये लड़की करीब 6 बरस पहले गाज़ा में इस्रायल के बुलडोज़रों को रोकने की कोशिश में शहीद हुई थी। अमेरिका के साम्राज्यवादी निरंकुश शासकों के जूतों को भी चाटने को उतावले रहने वालों को हैरानी हो सकती है कि यह न्याय की चाहत रखने वाली और उसके लिए गाज़ा में शहादत देने वाली युवा लड़की अमेरिका की ही रहने वाली थी। एक पूरी आबादी को उजाड़ने की मुहिम को देख कर उसने शहादत से पहले अपने परिवार को जो मेल भेजे थे, उनमें भी उसकी न्याय के प्रति क़ुर्बानी और संवेदनशीलता की झलक थी। इसे आत्मतुष्ट, फर्जी लोग नहीं समझ सकते, वे तो गुजरात में भी जश्न मनाते हैं।
.......दरअसल मोहल्ला ब्लॉग पर फिलिस्तीन में हो रहे दमन के खिलाफ एकजुटता दर्शाने की अपील की गई थी। अब बहुत से लोगों को इस पर एतराज हो गया और वे बेशर्म जुमलों के साथ प्रतिकिरिया में आ गए। मैंने बेहद दुखी मन से ये याद दिलाने के लिए कि अन्याय का विरोध करना सिर्फ़ फिलिस्तीन के लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं है। वे लड़ ही रहे हैं क्योंकि ये लड़ाई उनके हिस्से में आई है पर अमेरिकाजिसने ये कत्ल-ओ-गारत थोप राखी है, के रहने वाले न्यायप्रिय लोग भी अपने शाशकों के स्टैंड की परवाह किए बिना न्याय के पक्ष में खड़े होते हैं। और मैंने रशेल कूरी को याद किया। मोहल्ला ने इस टिपण्णी के साथ रशेल कूरी का वीडियो भी जोडा है, और हम इससे से प्रेरणा ले सकते हैं।

Wednesday, March 5, 2008

देश हमारा

देश हमारा कितना प्यारा
बुश की भी आँखों का तारा

डंडा उनका मूंछें अपनी
कैसा अच्छा मिला सहारा

मूंछें ऊंची रहें हमारी
डंडा ऊंचा रहे तुम्हारा

ना फिर कोई आँख उठाए
ना फिर कोई आफत आए

बम से अपने बच्चे खेलें
दुनिया को हाथों में लेलें

भूख गरीबी और बेकारी
खाली-पीली बातें सारी

देश-वेश और जनता-वनता
इन सबसे कुछ काम न बनता

ज्यों-ज्यों बिजिनिस को चमकाएं
महाशक्ति हम बनते जाएँ

हम ही क्यों अमरीका जाएँ
अमरीका को भारत लाएं

झुमका, घुंघटा, कंगना, बिंदिया
नंबर वन हो अपना इंडिया

हाई लिविंग एंड सिम्पिल थिंकिंग
यही है अपना मोटो डार्लिंग

मुसलमान को दूर भगाएं
कम्युनिस्ट से छुट्टी पाएं

अच्छे हिंदू बस बच जाएँ
बाकी सारे भाड़ में जाएँ
-मनमोहन

Tuesday, March 4, 2008

अमरीकीकरण

मैं कभी अमरीका नहीं गया, बुलाया भी नहीं गया
इसकी संभावना कम है कि बुलाया जाऊँ
मेरे बच्चों की भी फिलहाल वहां जाने या बसने की
कोई योजना नहीं है
मेरा कोई नाती-रिश्तेदार, दोस्त भी संयोग से वहां नहीं है
तब भी मैं अमरीकी नज़र से दुनिया को देखता हूँ

मुझे अमरीकी हित, अंतर्राष्ट्रीय हित लगते हैं
कई बार लगता है कि अमरीका के साथ
अन्याय हो रहा है
जिसे और कोई नहीं तो इतिहास जरूर दुरुस्त करेगा
बल्कि जब नोम चोम्स्की अपनी सरकार की नीतियों
का कडा विरोध करते हैं
तो मुझे लगता है कि एक अमरीकी इस तरह अपने देश
के साथ ज्यादती कर रहा है
क्योंकि यह आदमी मेरे देश का होता तो आज तक जिंदा नहीं बचता
मुझे तो कभी-कभी यह भी लगने लगता है कि मेरा रंग गोरा है
मैं जार्ज बुश को राष्ट्रपति कहते हुए यह नहीं सोचता
कि सौभाग्य से वे मेरे राष्ट्रपति नहीं हैं

क्या मैं ऐसा इसलिए हो चुका हूँ कि मैं अमरीकी
अखबारों में छपे लेख और खबरें पढता हूँ
टाइम और न्यूजवीक पढता हूँ , बीबीसी और सीएनएन देखता हूँ
या मुझे उम्मीद है कि मेरे वर्ग के दूसरे बच्चों की तरह
किसी दिन मेरे बच्चे भी अमरीका में बस जाएँगे
और मुझे दस साल का अमरीकी वीसा मिल जाएगा
बिना अमरीकी कपड़ा पहने, बिना अमरीकी खाना खाए
मैं इतना अमरीकी बन चुका हूँ कि
जब कभी दुनिया में कहीं भी अमरीकी हितों को चोट पहुँचती है तो मुझे बुरा लगता है
जिस बात पर अमरीकी सरकार को गुस्सा आता है
मुझे भी आता है
जब अमरीकी दुविधा से गुजरते हैं तो मैं भी गुजरता हूँ

मैं सद्दाम को फांसी देने से इसलिए परेशान नहीं हुआ
क्योंकि अमरीका यही चाहता था
मैं फिदेल कास्त्रो की मौत का
बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ
क्योंकि अमरीका भी यही कर रहा है
ह्यूगो शावेज मुझे इसलिए अच्छे नहीं लगते
क्योंकि अमरीका इन्हें अच्छा नहीं लगता
मैं इसराइल के साथ इसलिए हूँ कि
वह अमरीका के साथ है
मुझे वे सब दयनीय, समय से पिछडे,
गए बीते लगते हैं
जो अमरीका के साथ नहीं हैं
और ग्लोबलाईजेशन का विरोध करते हैं

हालांकि अमरीका मेरे देश के हितों के खिलाफ भी अक्सर जाता है
लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए है कि मेरे
देश के शासक पूरे मन से अमरीका के साथ नहीं हैं
हालांकि मैं जब अमरीकी नीतियों के साथ नहीं भी होता
तब भी मुझे लगता है कि ये मेरे देश की सरकार की ही ग़लत नीतियां हैं
इसलिए इनका मुझे विरोध करना चाहिए

जब अमरीका अन्तरिक्ष में घातक हथियार स्थापित करता है
या इराक पर हमला करता है या ग्लोबल वार्मिंग पर टस से मस नहीं होता
तो मुझे लगता है कि मेरे अमरीका को ज़्यादा मानवीय होना चाहिए
उसे यह नहीं करना चाहिए
ताकि मैं उसे ज़्यादा प्यार कर सकूं

हालांकि मैं तो उसे वैसे भी और ज़्यादा प्यार करना चाहता हूँ
यहाँ तक कि अमरीका के विरुद्ध प्रदर्शनों में शामिल होने
और अमरीका विरोधी के रूप में शिनाख्त किए जाने पर
भी मैं महसूस करता हूँ
क्योंकि अमरीका है इसलिए विरोध है

जब कभी मुझे लगता है कि अमरीका पूरी दुनिया के लिए खतरा है
तो भी मैं इस खतरे को
एक सच्चे अमरीकी की तरह महसूस करता हूँ
और जब कभी मुझे लगता है कि
अमरीका बर्बर है
तब मैं अपने से पूछता हूँ कि आख़िर
मैं अमरीकी क्यों हूँ
और कुछ देर बाद यह सोचकर मुस्कुरा पड़ता हूँ कि
मेरे पास इसका विकल्प भी क्या है।
-विष्णु नागर

Wednesday, February 27, 2008

अमेरिका और हम

साथियो, फिदेल को लेकर आपका स्टैंड हौसला बढ़ाने वाला रहा। दरअसल हमारे राष्ट्रवादियों की राष्ट्रभक्ति ही यही है कि अमेरिका को कैसे-कैसे, कितनी बार सलाम बजाय जाए और अमेरिका के विरोधी को खास दुश्मन माना जाए। बाकी मध्यवर्ग का क्या हाल हुआ है, उसे असद जैदी की टिपण्णी में पढ़ा जा सकता है। मैं जिन दिनों करनाल था, वहां के एक पब्लिक स्कूल में कोई भाषण प्रतियोगिता थी। एक बच्चे ने मेरी मदद चाही और उसमें शुरुआत में इराक के सिलसिले में एक वाक्य में कुछ इस तरह था - खुले सांड की तरह रौंदता अमेरिका। इस बात को लेकर एक टीचर बेहद नाराज थीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका को गाली दी जा रही है और मैं ये बर्दाश्त नही कर सकती। ऐसे लोगों को भी फिदेल कास्त्रो में लाख खामियां नज़र आती हैं और अमेरिका की हर करतूत पर इन्हें नाज़ होता है। मुझे इस सिलसिले में दो बेहद दिलचस्प कवितायें याद आ रही हैं- एक मनमोहन की है और एक विष्णु नागर की, वक्त मिलते ही पोस्ट करूँगा।

Tuesday, February 19, 2008

सलाम फिदेल

फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में सत्ता छोड़ने का एलान किया है। वे पिछले काफी वक्त से बीमार हैं। अमरीका और हर समर्ज्यवादी-पूंजीवादी की आँखों की किरकिरी कास्त्रो अमेरिका से लेकर दुनिया के हर कोने में न्याय के पक्षधर लोगों के दिलों पर राज करते हैं और इस बात का कोई अर्थ नही है कि वे अब सत्ता नहीं संभालेंगे। उन्होंने अपने जीवन का बेहद विवेक और बेमिसाल साहस के साथ जनता के लिए इस्तेमाल किया है और वे एक गहरे भरोसे की तरह हैं। अपने भगत सिंह और कास्त्रो के साथी चे की तरह ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे, जिन्होंने अपनी शहादत से मिसाल पेश कीं। लेकिन कास्त्रो के जीवन को देखकर अचरज ही होता है कि कैसे उन्होंने क्रांति की कमान संभाली, और फिर तमाम आर्थिक पाबंदियों के बावजूद देश में आम लोगों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की ऊँचे स्तर की सुविधाएँ मुहैया करायीं और इस समाजवादी ढांचे की सफलता से दुनिया भर के लोगों को रह दिखाई, लगातार एक बेहद सजग बुद्धिजीवी की तरह जटिल मसलों पर लिखते-बोलते रहे। यह अकारण नहीं है की उन्हें हजारों हज़ार ढंग से मारने की कोशिश करता रहा दुश्मन भी अपने मीडिया में उनकी उपलब्धियों को देखने को मजबूर रहा है। यह भी अकारण नही है कि वे इस वक्त समरज्य्वाद, पूंजीवाद और हर तरह के अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वालों के बीच सबसे ज़्यादा पढे जा रहे हैं और अपने यंहा भी उनके लगातार अनुवाद हो रहे हैं। नेरुदा और मर्ख्वेज जैसे कवि उन पर लिखते हैं। मर्ख्वेज की उन पर लिखी छोटी सी पुस्तक अद्भुत है।