Saturday, March 1, 2014

जलेस सम्मेलन में साझा संस्कृति संगम की घोषणा

नयी साहसिक पहलक़दमी की जरूरत

जनवादी लेखक संघ के इलाहाबाद में हुए राष्ट्रीय सम्मलेन के अवसर पर आयोजित साझा संस्कृति संगम (14 फरवरी, 2014) में स्वीकृत घोषणा-

भारतीय समाज इस समय फ़ासीवाद के मुहाने पर खड़ा है। सच तो यह है कि देश के अनेक हिस्सों में लोग अघोषित फ़ासीवाद की परिस्थिति में ही सांस ले रहे हैं। यह ख़तरा काफ़ी समय से मंडरा रहा था पर अब एक अलग कि़स्म के और ज्यादा निर्णायक चरण में दाखि़ल होना चाहता है। सामराजी सरमाया के दबाव में थोपे गये आर्थिक उदारीकरण ने बेतहाशा आर्थिक तबाही के साथ देश की संवैधानिक संरचना, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सामाजिक और सांस्कृतिक परस्परता के ढांचे को ध्वस्त करना शुरू किया, और ऐसी हालत आन पहुंची है कि प्रतिक्रियावाद के ये बहुमुखी आक्रमण रोके नहीं गये तो हिंदुस्तानी मुश्तरक़ा तहज़ीब, जीवन शैली और पिछले डेढ़ सौ सालों में विकसित राजनीतिक पहचान और क़ौमी परंपराएं ही लापता हो जायेंगी। संगठित पूंजी ने राज्य और राजकीय संस्थाओं पर, प्रमुख राजनीतिक दलों में, कार्यपालिका, सुरक्षातंत्र और न्यायपालिका पर अपनी घुसपैठ इतनी बढ़ा ली है कि वह लगभग सभी दूरगामी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक नीतियों की दिशा निर्धारित करने लगी है और हुक्मरान तबक़ा इसके अर्दली की तरह काम करता दिखायी देता है। मीडिया के बड़े हिस्से पर पूंजी का क़ब्ज़ा हो चुका है। सूचना, प्रचार, समाचार और मनोरंजन के साधनों पर वह लगभग एकाधिकार की स्थिति में है। कानून, व्यवस्था और सुरक्षा के तंत्र अब पूंजी के चौकस प्रहरी, उसकी साजि़शों के प्रभावी वाहक और जन-हितों को कुचलने वाली हिंसक मशीन में बदल चुके हैं।

यह परिस्थिति सिर्फ़ अमरीकी दबाव या कारपोरेट घरानों के इशारे भर से नहीं बनी है; इसके पीछे प्रतिक्रियावादी ताक़तों द्वारा तालमेल के साथ भारतीय मध्यवर्ग और आम जनता के बहुत से हिस्सों की लामबंदी के संगठित प्रयास हैं और इन प्रयासों का एक लंबा इतिहास है। हमारे देश में भी फ़ासीवादी विचारधारा का एक अतीत है, वह अरसे से ताक़त इकट्ठा करती आ रही है अब वह नाजु़क हालत आ पहुंची है कि यह हमारे भविष्य को निर्धारित करना चाहती है। पिछले दो दशकों में शासक वर्ग की अवाम दुश्मन और लुटेरी नीतियों के नतीजे के तौर पर आनन फानन में धनी हुए मध्यवर्ग का एक बड़ा टुकड़ा, जिसमें नौकरीपेशा लोग भी शामिल हैं, अब इस पूंजी के पीछे लामबंद है। दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथी, फि़रक़ावाराना और मज़हबी जुनून फैलाने वाली कुव्वतें, ख़ासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे सम्बद्ध दर्जनों संगठन हिंदुत्ववादी अस्मिता के निर्माण, प्रचार-प्रसार, योजनाबद्ध साजि़शों और आतंकवादी तरीक़ों से भारतीय समाज के प्रतिक्रियावादी पुनर्गठन में मुब्तिला हैं। इसी दौर में राष्ट्रीय आंदोलन की उदारवादी और जनोन्मुखी प्रेरणाएं और मूल्य तेज़ी से टूटे बिखरे हैं और बांये बाजू़ की वैकल्पिक चुनौती और प्रतिरोध की परंपरा भी कमज़ोर पड़ी है। संक्षेप में, सामराजी भूमंडलीकरण, कारपोरेट पूंजी और हिंदू राष्ट्रवाद का यह गठजोड़ हमारे राष्ट्रीय जीवन के हर हिस्से पर क़ाबिज़ होना चाहता है, और ऐसी हालत बनायी जा रही है कि लोगों को लगे कि अब और कोई विकल्प बचा नहीं है। जबकि सच यह है कि ऐन इसी समय समाज के बड़े हिस्से, ख़ासतौर पर वंचित तबके़ अपनी कशमकश और अपने संगठित-असंगठित निरंतर संघर्षों से बार-बार और तरह-तरह से जनवाद के विस्तार की तीव्र और मूलगामी आकांक्षा का संकेत दे रहे हैं। विश्वविजय के अभियान को पूरा कर चुका पूंजीवाद अभी गंभीर संकट में है और अपनी विध्वंसक मुहिम को बढ़ाने के अलावा उसे कोई विकल्प दिखायी नहीं देता। दुनिया भर में उसके खि्लाफ़ व्यापक जनअसंतोष की तीव्र अभिव्यक्ति स्वत:स्फूर्त और संगठित संघर्षों के रूप में सामने आ रही है, जिसे कुचलने या विकृत करने या दिशाहीन बनाने या अराजकता की ओर ले जाने की कोशिशें भी बड़े पैमाने पर चल रही हैं। मौजूदा फ़ासीवादी उभार इसी चुनौती का मुक़ाबला करने का मंसूबा लेकर सामने आया है। लोकतांत्रिक और वामपंथी ताक़तें इस समय एक अलगाव के हालात के बीच कॉरपोरेट फ़ासीवाद के भारी दबाव और हमलों का सामना कर रही हैं। यह एक विडंबना है कि जिस समय ऐसी ताक़तों की पारस्परिकता और विशाल एकजुटता की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, वे काफ़ी कुछ बिखराव की शिकार हैं।

हमने देखा है कि हर प्रकार की तानाशाही - फि़रक़ावाराना हो या किसी और तरह की - जनाधार ढूंढ़ती है और ख़ास हालात में वह उसे हासिल भी कर लेती है। जर्मनी और इटली की मिसालें लंबे समय से हमारे सामने हैं। भारतीय समाज की सामाजिक बनावट, विचारधारात्मक तंत्र और दैनिक सांस्कृतिक जीवन में निरंकुशतावादी या फ़ासीवादी तत्वों की मौजूदगी और सक्रियता का इतिहास बहुत पुराना है। पिछले बीस-तीस वर्षों में इस प्रतिक्रियावादी अवशिष्ट का एक विशाल कारोबार ही खड़ा हो गया है और इसमें नयी जान पड़ गयी है। ‘पॉपुलर कल्चर’ के परंपरागत रूपों और मास कल्चर के नमूने की नयी लुम्पेन बाज़ारी संस्कृति में ढल कर फ़ासीवाद के अनेक तत्व इस वक्त सतत क्रियाशील हैं। साधु, संत, मठ, आश्रम, धार्मिक टी.वी. चैनल, हिंदुत्ववादी प्रचारतंत्र, रूढि़वादी सामाजिक और धार्मिक सीरियलों की बढ़ती लोकप्रियता ने जहां एक तरफ़ धर्म और ‘देवत्व’ का एक विशाल बाज़ार पैदा कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ़ नृशंसता का उत्सव मनाती सत्य कथाओं और अपराध कथाओं के ज़रिये मनोरंजन उद्योग फलफूल रहा है, जिसमें शिक्षित मध्यवर्ग सहित आबादी के विशाल तबक़े प्रशिक्षित और अनुकूलित हो रहे हैं। इस विशाल कारोबार में फ़ासीवादी कुव्वतें पूरी तरह संलग्न हैं और इसमें बेशुमार पूंजी लगी हुई है। इस तरह फ़ासीवाद के लिए अनुकूल सांस्कृतिक वातावरण पहले से तैयार है और ये कुव्वतें अपनी हेकड़ी से मीडिया में मौजूद विवेकशील स्वरों को दबाने में सफल हो रही हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार हमले हो रहे हैं। किताबें जलाना, सिनेमा और नाटक का प्रदर्शन रुकवाना, चित्र-प्रदर्शनियों पर हिंसक हमले करना - सांप्रदायिक फ़ासीवाद के उन्मत्त गिरोहों के द्वारा अंजाम दी जानेवाली ऐसी घटनाएं आये दिन घट रही हैं।

मुज़फ्फ़रनगर का हत्याकांड और अल्पसंख्यकों का विस्थापन बताता है कि फ़ासीवादी शक्ति किस तरह से रूढि़-पोषक खाप पंचायतों, हरित क्रांति तथा पुरुष सत्तावाद के आधार पर खड़ी राजनीति और प्रतिक्रियावादी सामाजिक संस्थाओं से तालमेल बिठाकर उन्हें अपने नियंत्रण में लेती है। उन्होंने नियोजित तरीक़े से ‘लव जिहाद’ का दुष्प्रचार करके सांप्रदायिकता को बहू-बेटी की इज्ज़त का मामला बनाया और एक साथ वर्गीय और जेंडर हिंसा का षडयंत्र रचा, जिसमें हम आज़ादी के बाद सम्पन्न हुए भूस्वामी वर्ग और पूंजीपति वर्ग की आपसी सुलह और कारस्तानियों का सबसे भद्दा रूप देख सकते है।

जिस आसानी से और बिना किसी जवाबदेही के भारतीय राज्य, विरोधी आवाज़ों को दबाता जा रहा है, जिस तरह आतंकवाद की झूठी आड़ में निरपराध मुस्लिम नवयुवकों को गिरफ्तार कर लेता है और माओवाद के नाम पर किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता को पकड़ लेता है और यातनाएं देता है, जिस तरह श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ायी जाती हैं, लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों को जिस तरह कुचला जाता है, जिस तरह से बड़े पैमाने पर कश्मीर और उत्तरपूर्व के राज्यों में मानवाधिकार हनन हो रहा है, दलितों और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मामलों में सरकारी तंत्र कोई कार्रवाई करने के बजाय हमलावरों के बचाव में जिस तरह लग जाता है, और कॉरपोरेट मीडिया तंत्र लोगों को इन चीज़ों की ख़बर तक नहीं देता, यह सब न केवल यह दर्शाता है कि हमारे समाज और राजनीति का संकट गंभीर रूप अखि्तयार कर चुका है बल्कि यह भी बताता है कि हमारे इस संवैधानिक-लोकतांत्रिक निज़ाम के अंदर ही इन सब चीज़ों के लिए गुंजाइश बन चुकी है और यह निज़ाम अब इसी दिशा में आगे जाये, इसकी तैयारी भी पूरी है। मौजूदा फ़ासीवादी मुहिम राज्य की इसी निरंकुशता को एक नयी आपराधिक आक्रामकता और स्थायित्व देने के लक्ष्य से संचालित है। इस संदर्भ में आने वाले आम चुनावों में फ़ासीवादी ताक़तों को नाकामयाब करना बेहद ज़रूरी है।

रोज़गारविहीन ‘विकास’ का जो मॉडल राज्य ने लागू किया है, उसने इस चुनौती को और विकराल बना दिया है। विस्थापन और बेदख़ली के ज़रिये संचय का नज़ारा आज का मुख्य नज़ारा है। देश के बेशक़ीमती प्राकृतिक संसाधनों और लाखों-करोडों़ की सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बेरहम लूट और बर्बादी एक लंबे समय से जारी है। लोगों से खेत, जंगल, ज़मीन, पंचायती ज़मीनें छीनी जा रहीं हैं और खनन करने, राजमार्ग बनाने से लेकर बैंक, बीमा, जनसंचार, शिक्षा, स्वास्थ्य यहां तक कि डिफेंस जैसे क्षेत्रों को कॉरपोरेट पूंजी और विदेशी निवेशकों के हवाले करने के उपक्रम लगातार चल रहे हैं, जिससे असमानता बेतहाशा बढ़ी है और सामाजिक ध्रुवीकरण चरम बिंदु पर पहुंच रहा है। आबादियों के विशाल हिस्से उजड़ रहे हैं और रोज़ी रोटी के लिए वे मारे-मारे फिर रहे हैं। जिंदगी बसर करने के हालात कठिन से कठिनतर होते जा रहे हैं। अवाम की प्रतिरोध की ख्वाहिश को मुख्यधारा की सियासी पार्टियों का समर्थन लगभग नहीं मिल रहा। कई बार छोटे छोटे ग्रुप विभिन्न मुद्दों पर अपनी सीमित क्षमता के सहारे, कई बार बिना नेतृत्व के भी, लड़ते और कभी कभी थकते नज़र आते हैं। आदिवासियों, ग़रीब किसानों, दलितों, बेसहारा शहरी ग़रीबों, उत्पीडि़त स्त्रियों, अल्पसंख्यकों का विशाल जनसमुदाय मुख्यधारा के राजनीतिक प्रतिष्ठान की हृदयहीनता से हैरान और ख़फ़ा है, और उससे उसका भरोसा उठता जा रहा है। असंगठित, असहाय, हताश आबादियों और बेरोज़गार भीड़ों का गुस्सा अक़्सर आसानी से दक्षिणपंथी और फासिस्ट लामबन्दी के काम आता है। अस्मिता की प्रतिक्रियावादी राजनीति कई बार इसका उपयोग करती है। इसके लिए जहां वर्चस्ववादी अस्मिता की शासक वर्गीय राजनीति से लड़ना ज़रूरी है वहीं यह भी ज़रूरी है कि वंचित तबकों की प्रतिरोधी अस्मिता के सकारात्मक और जनतांत्रिक सारतत्व के प्रति हम ग्रहणशील हों और उसकी रक्षा करें और साथ ही वंचित तबकों की व्यापक जनतांत्रिक एकता के निर्माण की चुनौती को स्वीकार करें। हमें यह भी समझना होगा कि अल्पसंख्यकों में काम करने वाली फिरके़वाराना और दकि़यानूसी ताक़तें भी अन्ततः हिन्दुत्ववादी फासिस्ट मुहिम की खुराक़ और इसके विनाशक दुष्टचक्र को चलाने का औज़ार ही सिद्ध होती हैं। इसलिए साम्प्रदायिक फासीवाद से कारगर ढंग से लड़ने के लिए हर रंगत की साम्प्रदायिक, कट्टरतावादी और रूढि़वादी ताक़तों से एक साथ वैचारिक संघर्ष भी ज़रूरी है। इस वक्त़ जहां सियासी सतह पर वामपंथी और लोकतांत्रिक व सेक्यूलर ताक़तों और संगठनों की ऐतिहासिक जि़म्मेदारी है कि वे बिना वक्त़ गंवाये एकजुट हो कर मुक़ाबले की तैयारी करें, वहीं इसमें कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों, समाजविज्ञानियों, शिक्षकों, पत्रकारों और अन्य पेशेवर लोगों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राजनीति की अक्षमता का हवाला देकर हम अपनी जि़म्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते।

लेखक और कलाकार आज के हालात में लेखक-नागरिक और कलाकार-नागरिक ही हो सकते हैं, अपने क़लम और अपनी कला के साथ इस अवामी जंग में शिरकत करते हुए। सभी तरक्क़ीपसंद, जम्हूरियतपसंद और मानवतावादी सांस्कृतिक संगठनों की इस जंग में शिरकत लाजि़म है।

हम भूले नहीं हैं कि 1930 के दशक में जब हिंदी-उर्दू इलाक़े के इंक़लाबी नौजवान लेखक और लेखिकाओं की कोशिशों के नतीजे के तौर पर प्रेमचंद की सदारत में प्रोग्रैसिव मूवमेंट की बुनियाद पड़ी तो कुछ ही समय में यह पहल किस तरह एक विराट, बहुमुखी अखिल भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन में बदल गयी थी। भारतीय संस्कृति में मध्ययुग के बाद इस पैमाने का परिवर्तन नहीं हुआ था। उस समय, 1930 और 40 के दशक में यह दुनिया विकल्पहीन नहीं लग रही थी। सब एक बेहतर, न्यायपूर्ण समाज का सपना ही नहीं देख रहे थे, उसे पूरा करने की लड़ाई में हिस्सा लेने को तत्पर थे। यही दौर यूरोप और जापान मे फ़ासीवाद के उदय, स्पेनी गृहयुद्ध और दूसरे विश्वयुद्ध का भी था। दुनिया भर में उपनिवेशवाद के खि़लाफ़ चले स्वतंत्रता आंदोलन हों या फ़ासिज्म़ का प्रतिरोध, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने उनमें अग्रगामी भूमिका अदा की। हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्विरोधों के चलते जैसी क्षतिग्रस्त और खून में रंगी आज़ादी हमें मिली, उसके बावजूद हमारे फनकारों और अदीबों ने हिम्मत नहीं हारी और उपमहाद्वीप की जनता के दिल में प्रगतिशील मानव-मूल्यों को परवान चढ़ाने वाली रचनाशीलता की जगह बनायी। सिनेमा, रंगमंच, संगीत, चित्रकला और साहित्य में प्रगतिशील रचनाकारों ने जनमानस को नयी दिशा देने वाले काम किये जिनका असर आज तक हमारी ज़बान और बरताव में दिखायी देता है। उस समय प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू नहीं, उसके आगे चलने वाली मशाल है, या होनी चाहिए। हम इसी परंपरा के वारिस हैं।

आज एक बड़ी और नयी साहसिक पहलक़दमी की ज़रूरत है। फ़ासीवादी ताक़तें जिस पैमाने पर सक्रिय हैं, उसी पैमाने पर उनका जवाब देना होगा। छोटे मोटे वक्तव्य या प्रतीकात्मक कार्रवाइयों की भी अहमियत है, मगर इतने भर से इस जद्दोजहद में कामयाबी हासिल नहीं होगी। स्थिति की विडंबना है कि अभी भी ऐसे बहुत से मोर्चे हैं जिन पर सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तें लंबे समय से उपस्थित और आक्रामकता के साथ सक्रिय हैं, उन पर धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक इदारों की सक्रियता नहीं के बराबर है। लेकिन इस कठिन घड़ी में भी फ़ासीवाद का मुकाबला किया जा सकता है, उसे रोका जा सकता है और यहां तक कि उसे शिकस्त दी जा सकती है बशर्ते कि हम इसके लिए एकजुट हो कर खड़े हों। तमाम विषम चुनौतियों के बावजूद अंतत: यह हमारा समय है। इसके लिए ज़रूरी है कि हम साहित्यिक परिदृश्य में व्याप्त अपसंस्कृति से खु़द को आज़ाद करें, आपाधापी, आत्मपूजा, गुटबाज़ी, लालच और तुच्छताओं से ऊपर उठते हुए, संघर्षशील चेतना के साथ आसन्न चुनौती का मिलकर सामना करें। प्रतिरोध की शक्तियों के लिए यह समय गहन पारस्परिक संवाद, सहकार और एकजुटता का समय है। आज ज़रूरी है कि देशभर में (और ख़ासकर उत्तर भारत में) तमाम प्रगतिशील, जनवादी, सेक्युलर और सच्चे उदार मानववादी साहित्यिक सांस्कृतिक संगठन और व्यक्ति, छोटे बड़े मंच और पत्र-पत्रिकाएं, लेखक, नाट्यकर्मी, संगीतकार, चित्रकार, शिल्पी और समाजविज्ञानी एक वृहत्तर संजाल बना कर काम करें, नयी योजनाएं बनायें, वर्कशाप करें, हर फ़ोरम पर वैचारिक-सांस्कृतिक अभियानों को संगठित करें, प्रदर्शनियां तैयार करें, जत्थे निकालें और तमाम सांस्कृतिक कलात्मक व वर्चुअल माध्यमों और रूपों का उपयोग करते हुए साधारण लोगों को बड़े पैमाने पर संबोधित करें। फ़ासीवाद के कुटिल कुत्सित प्रचार-तंत्र का मुक़ाबला यही चीज़ कर सकती है।

हम इस देश की ज़रख़ेज़ सेकुलर सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत और नवजागरण की संपन्न मानवतावादी जनतांत्रिक और प्रगतिशील साहित्यिक परंपराओं के सच्चे वारिस हैं। ये विरासत कहीं गयी नहीं है। बस विस्मृति की धूल में दबी हुई है। प्रतिरोध का निश्चय करते ही वह हमारे लिए फिर से जी उठेगी और उसके अर्थ चमकने लगेंगे। स्वतंत्रता, समानता और जनवाद के लिए संघर्ष और कुरबानियों की अपनी महान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रगतिशील विरासत की शान के मुताबिक इस कठिन समय में भी यक़ीनन व्यापक जनतांत्रिक शक्तियों के साथ एकजुटता से इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। हमें यक़ीन है कि अपनी प्रतिबद्धता, लगन, रचनात्मक कल्पना और आविष्कारशील प्रतिभा की मदद से हम अपनी इस भूमिका का कारगर ढंग से निर्वाह कर सकेंगे।
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Monday, February 17, 2014

`फैन्ड्री’ के निर्देशक का मार्मिक आत्म-कथन


सपनों को छोटी-छोटी राहें और सख्त नाकेबंदी
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इस हफ्ते एक मराठी फिल्म रिलीज़ हुई है 'फैन्ड्री', जो कुछ-कुछ निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले की अपनी कहानी है. आज महाराष्ट्र टाइम्स के रविवारी संस्करण में नागराज का यह आत्म-कथन छपा है, जिसे यहां भारतभूषण तिवारी की बदौलत दिया जा पा रहा है.  पक्का नहीं मालूम पर पढ़ने से लगता है कि वे महाराष्ट्र की अति पिछड़ी घुमंतू जाति 'वडर' से सम्बन्ध रखते हैं. फिल्म मैंने अभी तक नहीं देखी पर उसका प्रोमो यूट्यूब पर मौजूद है.



फैन्ड्री को याद करते हुए

‘फैन्ड्री’ के बहाने अलग-अलग यादों का कोलाहल मचने लगा है मन में...इन यादों का कालखंड बहुत लम्बा है. फैन्ड्री इस शीर्षक के साथ बचपन से लेकर कल-परसों तक की अनेक बातें आँखों के सामने तैरने लगती हैं. जैसे-जैसे समझ आती गई वैसे-वैसे मन में एक अजीब सा डर, हीनता का अहसास ‘बाइ डीफ़ॉल्ट’ रहा. यह हीन भावना खानदानी है. जब से समझ आई तभी से अनजाने ही अपनी सीमाओं का अहसास मन में घर कर गया था. बचपन में रामायण देखने जाता तब सब की जगहें निश्चित हुआ करती थीं. मैं अपनी जगह पर खड़े होकर राजा राम की माया देखा करता, तभी मन के अन्दर लगे “नो एंट्री” के अदृश्य बोर्ड मज़बूत होते गए होंगे. मेरे अन्दर की हीनता के पुख्ता सुबूत परिवेश द्वारा अधोरेखित हो रहे थे.
अबोध उम्र के मासूम साहस पर पाबंदी कब लगी यह पक्का याद नहीं. हरेक दहलीज की जाति-धर्म पता करके कदम कब से रखने लगा कौन जाने? ये नपुंसक सयानापन, एक अंधी शरणशीलता कब घर कर गई किसे पता? स्कूल में अलग-अलग फॉर्म भरते हुए खुद का, माँ-बाप का या जाति का नाम बताया तो एक हिंस्र, कुटिल हँसी क्लास में गूँजती, इसलिए जितना संभव हो सके उतना अध्यापक के करीब जाकर किसी दूसरे को सुनाई न दे पाए इतनी धीमी आवाज़ में अपनी पहचान बताई जाए यह सयानापन तीसरी-चौथी कक्षा से आने लगा था. अपनी पहचान का, अस्तित्व का रूपांतर हीन भावना में हो जाने पर कहने लायक खुद के पास कुछ नहीं बचता.
पता नहीं कब से खुद अपना नाम लेते हुए भय लगने लगा. कोई अपराध होने का, हो चुकने का डर लगातार लगने लगा.
मेरा बाप मेरे हमउम्र दोस्तों को सीधे ‘सेठ’,’साहेब’,’सरकार’ ऐसे संबोधनों से पुकारता तब अपनी दोस्ती की, समानता की आशा अतिरंजना लगती और गले का फंदा कभी किसी ने ढीला कर बाँधा तो वही आज़ादी लगती. ऐसा होने पर भी पलकें सपने संजोना नहीं छोड़तीं. इतनी सख्त नाकेबंदी में सपनों को छोटी-छोटी राहें मिलतीं. बस एक जींस पैंट, तीज-त्यौहार पर पूरनपोली, घर में बिजली का कनेक्शन, पैरों में चप्पल ऐसी बातें सपनों जैसी लगतीं. ऐसी साधारण इच्छाओं की जमाखोरी करके व्यवस्था उन्हें सपनों का भाव दिला देती है. मगर इच्छाओं की, सपनों की न कोई जाति होती है न धर्म. सपने मासूमियत के साथ कोई भी इच्छा ज़ाहिर करते हैं. फिर अपने सपनों और हीन भावना का संघर्ष शुरू होता है. इस संघर्ष में हमेशा ही हीन भावना सपनों को मात दे देती है.
कॉलेज पहुँचने पर एक पुराना सा सपना ठाठें मारने लगा. क्लास में, कॉलेज में सम्मानजनक व्यवहार हो, इज्ज़त मिले यह सपना था. प्रथम वर्ष में श्री.म. माटे की एक कहानी पाठ्यक्रम में थी. उस कहानी का नायक एक खलनायक को ‘ए, काले वडर[i]....’ कहते हुए गालियाँ देता है. पाठ्यक्रम की सारी कहानियाँ पहले से पढ़ लेने की आदत की वजह से यह वाक्य पढ़ कर मैंने फैसला कर लिया था कि यह कहानी जब क्लास में पढ़ाई जाएगी तब अनुपस्थित रहूँगा. कहानी पढ़ाई जा चुकी होगी यह मानकर आठ-दस दिनों बाद क्लास में हाज़िर हुआ तो ठीक उसी दिन सर ने माटे की वह कहानी पढ़ाना शुरू किया. और जिस बात का मुझे डर था वही हुआ. ‘ऐ, काले वडर...’ यह वाक्य सर ने पढ़ा और सारी क्लास अपनी हंसी रोकते हुए मेरी ओर देखने लगी. ईश्वर की भांति वहीँ बैठे-बैठे अंतर्ध्यान हो जाऊं, ऐसा बस उसी क्षण लगा था.
ऐसे तबाह असफल लम्हों में आदमी ऐसे चमत्कारों की उम्मीद करने लगता है. ‘फैन्ड्री’ कहने पर ऐसे तबाह होने की याद आती है. स्कूल नाम के भयालय की याद आती है. ‘फैन्ड्री’ कहने पर नाज़ुक मासूम सपनों की याद आती है...सपनों के चूर-चूर होने की याद आती है...

फैन्ड्री का क्या मतलब?
यह सवाल मुझसे कई बार पूछा गया.
और मैं आज तक टालता रहा एक लफ्ज़ में फैन्ड्री के मानी बताना..
फैन्ड्री हमारे ही अगल-बगल में जीने वाली एक जनजाति की बोली का शब्द
है.
यह भाषा बोलने वाले इंसानों को हम नहीं जानते
उनके सुख-दुख
उनके सपने
उनकी वेदनाएं
उनके अस्तित्व का जैसे हमें कोई अहसास ही नहीं.

आप फैन्ड्री का मतलब क्या है यह खोजने आएँगे तब
आपको इन उपेक्षित-तुच्छ समझे जाने वाले इंसानों के अस्तित्व का, उनकी वेदनाओं का
अहसास हुआ तो
फैन्ड्री की आपकी तलाश
और मैंने बनाकर रखा हुआ रहस्य दोनों फलीभूत हुए, ऐसा कहा जा सकेगा.

असल में फैन्ड्री ये कोई रहस्य नहीं.
वह एक आमंत्रण है हम सबके लिए
कि आएं और स्वीकार करें इस कटु यथार्थ को
जिस से हमेशा हम आँख बचाकर निकल जाना चाहते हैं...
जिसे हरदम हम छुपाते आए किसी महारोग की भांति
एड्स की तरह.
मगर जब इस बीमारी का इलाज होगा
हम स्वीकार करेंगे कि हम रोगग्रस्त हैं
तभी एक निरोग, ममतामयी सुबह की संभावना तैयार होगी.



[i] महाराष्ट्र की एक पिछड़ी घुमंतू जाति जिसका पारंपरिक काम पत्थर तोड़ना है.

Thursday, February 13, 2014

पेंगुइन को अरुंधति की फटकार



अमेरिकी लेखक वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को पेंगुइन ने एक अनजान से कट्टर हिंदू संगठन के दबाव में `भारत` के अपने ठिकानों से हटाने का फैसला किया है। मशहूर लेखिका-एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय जिनकी खुद की किताबें भी इस प्रकाशन से ही आई हैं, ने पेंगुइन को यह कड़ा पत्र लिखा है जो Times of India में छपा है।पत्र का हिंदी अनुवाद:

तुम्हारी इस कारगुजारी से हर कोई स्तब्ध है। तुमने एक अनजान हिंदू कट्टरवादी संस्था से अदालत के बाहर समझौता कर लिया है और तुम वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को भारत के अपने किताबघरों से हटाकर इसकी लुगदी बनाने पर राजी हो गए हो। कोई शक नहीं कि प्रदर्शनकारी तुम्हारे दफ्तर के बाहर इकट्ठा होकर अपनी निराशा का इजहार करेंगे।

कृपया हमें यह बताओ कि तुम इतना डर किस बात से गए? तुम भूल गए कि तुम कौन हो? तुम दुनिया के सबसे पुराने और सबसे शानदार प्रकाशकों में से हो। तुम प्रकाशन के व्यवसाय में बदल जाने से पहले और किताबों के मॉस्किटो रेपेलेंट और खुशबुदार साबुन जैसे बाज़ार के दूसरे खाक़ हो जाने वाले उत्पादनों जैसा हो जाने से पहले से (प्रकाशन में) मौज़ूद हो। तुमने इतिहास के कुछ महानतम लेखकों को प्रकाशित किया है। तुम उनके साथ खड़े रहे हो जैसा कि प्रकाशकों को रहना चाहिए। तुम अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सबसे हिंसक और भयावह मुश्किलों के खिलाफ लड़ चुके हो। और अब जबकि न कोई फतवा था, न पाबंदी और न कोई अदालती हुक्म तो तुम न केवल गुफा में जा बैठे, तुमने एक अविश्वसनीय संस्था के साथ समझौते पर दस्तखत करके खुद को दीनतापूर्ण ढंग से नीचा दिखाया है। आखिर क्यों? कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी हो सकने वाले सारे संसाधन तुम्हारे पास है। अगर तुम अपनी ज़मीन पर खड़े रह पाते तो तुम्हारे साथ प्रबुद्ध जनता की राय और सारे न सही पर तुम्हारे अधिकांश लेखकों का समर्थन भी होता। तुम्हें हमें बताना चाहिए कि आखिर हुआ क्या। आखिर वह क्या है, जिसने तुम्हें आतंकित किया? तुम्हें अपने लेखकों को कम से कम स्पष्टीकरण देना तो बनता ही है।

चुनाव में अभी भी कुछ महीने बाकी हैं। फासिस्ट् अभी दूर हैं, सिर्फ अभियान में मुब्तिला हैं। हां, ये भी खराब लग रहा है पर फिर भी वे अभी ताकत में नहीं हैं। अभी तक नहीं। और तुमने पहले ही दम तोड़ दिया।

हम इससे क्या समझें? क्या अब हमें सिर्फ हिन्दुत्व समर्थक किताबें लिखनी चाहिए। या `भारत` के किताबघरों से बाहर फेंक दिए जाने (जैसा कि तुम्हारा समझौता कहता है) और लुगदी बना दिए जाने का खतरा उठाएं? शायद पेंगुइन से छपने वाले लेखकों के लिए कुछ एडिटोरियल गाइडलाइन्स होंगी? क्या कोई नीतिगत बयान है?
साफ कहूं, मुझे यकीन नहीं होता, यह हुआ है। हमें बताओ कि यह प्रतिद्वंद्वी पब्लिशिंग हाउस का प्रोपेगंडा भर है। या अप्रैल फूल दिवस का मज़ाक था जो पहले ही लीक हो गया। कृपया, कुछ कहिए। हमें बताइए कि यह सच नहीं है।
अभी तक मैं से पेंगुइन छपने पर बहुत खुश होती थी। लेकिन अब?
तुमने जो किया है, हम सबके दिल पर लगा है।
-अरुंधति रॉय

Monday, December 30, 2013

वाम पक्षों में यौन हिंसा के मामले और जवाबदेही : लॉरी पैनी



(लॉरी पेनी ब्रिटेन की मशहूर नारीवादी वामपंथी लेखक और ब्लॉगर हैं. उनकी यह टिप्पणी “न्यू स्टेट्समन” पत्रिका में प्रकाशित हुई  थी जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखती हैं. घटना विशेष और देश के ख़ास सन्दर्भ में लिखी गई यह टिप्पणी हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी कितनी मौजूं है ये देखकर हैरत और अफ़सोस दोनों का अहसास होता है. इस टिप्पणी का अंग्रेजी से अनुवाद भारतभूषण तिवारी ने किया है।)

वाम पक्षों में होने वाली यौन हिंसा के साथ किस तरह पेश आएँ? एक केस स्टडी पर नज़र डालते हैं.
जो लोग पहले से वाकिफ़ नहीं है उनके लिए बता दिया जाए कि सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (एसडब्ल्यूपी) कई हज़ार सदस्यों वाला एक राजनीतिक संगठन है जो 30 से भी अधिक सालों से ब्रिटिश वाम की प्रमुख ताक़त रहा है ब्रिटेन में सड़कछाप फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में वह आगे रहा है,पिछले कई सालों से छात्र और कामगार आंदोलन में उसकी बड़ी सांगठनिक उपस्थिति रही है और जर्मनी की डी लिंख जैसे अन्य देशों के बड़े,सक्रिय दलों से संलग्न रहा है. यूके के बहुत से बेहद महत्वपूर्ण चिन्तक और लेखक इस पार्टी के सदस्य हैं अथवा पूर्व सदस्य रहे हैं.
ब्रिटेन के बहुत से वामपंथियों की तरह मेरी भी उनसे अपनी असहमतियाँ रही हैं मगर मैं उनके सम्मेलनों में बोल चुकी हूँ, उनकी चाय पी चुकी हूँ और जो काम वे करते हैं उसके प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. उनका समूह गौण या परिधि के बाहर का नहीं है: वे महत्त्व रखते हैं. और यह भी महत्त्व रखता है इस वक्त लैंगिकवाद (सेक्सिज़्म), यौन हिंसा और जवाबदेही के वृहत मुद्दों पर बहस की वजह से पार्टी का ठीकरा बहुत बुरे तरीके से फूट रहा है.
जनवरी के दूसरे हफ्ते में पता चला कि एक वरिष्ठ पार्टी सदस्य के खिलाफ जब बलात्कार और यौन हिंसा के आरोप लगाए गए,तो मामले की रपट पुलिस को नहीं दी गई बल्कि उसे खारिज किए जाने से पहले उससे 'अंदरूनी तौर' पर निपटा गया. जनवरी की शुरुआत में हुए पार्टी के वार्षिक सम्मेलन की लिखित प्रतिलिपि (ट्रांसक्रिप्ट) के अनुसार शिकायत की तहक़ीक़ करने की अनुमति कथित बलात्कारी के मित्रों को दी गई,इतना ही नहीं बल्कि कथित पीड़ितों का और भी उत्पीडन किया गया. उनके पीने की आदतों और पूर्व संबंधों पर सवाल उठाए गए,और जिन्होंने उनका साथ दिया उन्हें निष्कासित कर दिया गया या किनारे कर दिया गया.
पार्टी के एक सदस्य टॉम वॉकर ने इस हफ्ते उकताकर इस्तीफ़ा दे दिया. वे बताते हैं कि नारीवाद (फेमिनिज़्म) को  "पार्टी नेतृत्व के समर्थक बड़े प्रभावशाली ढंग से अपशब्द की तरह इस्तेमाल करते हैं..जेंडर के मुद्दों पर जो 'अति चिंतित' नज़र आता है उसके खिलाफ यह असरदार तरीके से इस्तेमाल किया जाता है."
10 जनवरी को प्रकाशित अपने साहसी और सिद्धांतों पर आधारित अपने त्यागपत्र में वॉकर ने कहा कि: “वाम पक्षों में शक्तिशाली पदों पर आसीन बहुत से पुरुषों की यौन राजनीति पर ज़ाहिर तौर पर एक सवालिया निशान लगा है. मुझे लगता है इसकी जड़ इस बात में है कि या तो प्रतिष्ठा के कारण,या आतंरिक लोकतंत्र के अभाव के कारण या दोनों ही वजहों से ये अक्सर ऐसे पद होते हैं जिन्हें असल में चुनौती नहीं दी जा सकती. ये यूँ ही नहीं हुआ कि हाल में दुनिया भर में लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों का फोकस 'सज़ा से ऊपर होने की संस्कृति’ (कल्चर ऑफ इम्प्युनिटी) के विचार पर था.सोशलिस्ट वर्कर ने इशारा किया है कि किस तरह संस्थाएँ अपने अंदर के ताक़तवर लोगों को बचाने के लिए अपने आप को बंद सा कर लेती हैं. जो बात स्वीकार नहीं की गई है वह यह कि जीवित रहने के लिए आत्म-रक्षा की अपनी प्रवृत्ति के साथ एसडब्ल्यूपी भी इन अर्थो में एक संस्था ही है. जैसा कि पहले कहा गया है, स्वयं के विश्व-ऐतिहासिक महत्त्व में उसका भरोसा ऐसी बातों को छिपाने की कोशिशों और दुष्कर्मियों को सुरक्षित महसूस करवाने का निमित्त बनता है.”
पार्टी के सम्मेलन में यह मामला सामने आने पर और बहसों की लिखित प्रतिलिपि के इंटरनेट पर लीक होने के बाद अब सदस्य भारी संख्या में पार्टी छोड़ रहे हैं या निष्कासित किए जा रहे हैं.
एसडब्ल्यूपी के काफी पुराने सदस्य और लेखक चाइना मिएविल ने मुझसे कहा कि बहुत से सदस्यों की तरह वे भी "हक्का-बक्का' हैं: “इन आरोपों को लेकर जिस तरह का बर्ताव किया गया - आरोप लगाने वालों के पूर्व संबंधों और पीने की आदतों को लेकर उठाये गए सवालों से भरपूर, किसी और सन्दर्भ में हम तुरंत और उचित ही इसकी लैंगिकवादी कह कर भर्त्सना कर देते - वह भयावह है. लोकतंत्र, जवाबदेही और आतंरिक संस्कृति की यह भीषण समस्या है कि ऐसी स्थिति उपजती है और यह तथ्य भी कि प्रभारी वर्ग जिसे अवांछनीय मानता है उस तरीके से ऑफिशियल लाइन के खिलाफ बात करने वालों को 'गुप्त गुटवाद' के लिए निष्कासित किया जा सकता है.”
मिएविल ने समझाया कि अन्य कई संगठनों की ही तरह उनकी पार्टी में भी इस तरह की समस्याओं को आगे बढाने वाले शक्ति सोपानक्रम (पावर हाइरार्की) लंबे समय से विवादास्पद रहे हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि "बिलकुल इसी तरह के लोकतंत्र के अभाव, केंद्रीय समिति और उनके वफादारों की अत्यधिक शक्ति, कथित 'असहमति' को लेकर सख्त पुलिसिया रवैया, और गलतियों को मानने से इनकार- जैसे कि वर्तमान स्थिति जो नेतृत्व के दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार से उपजी त्रासदी है-जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए हम बहुत से लोग बरसों से संगठन की संस्कृति और संरचना में बदलाव के लिए खुले रूप से लड़ रहे हैं. पार्टी के हम सभी लोगों में इस तरह के मुद्दों को स्वीकार करने की विनम्रता होनी चाहिए. एसडब्ल्यूपी के सदस्यों की ये ज़िम्मेदारी है कि वे हमारी परम्परा के भले के लिए लड़ें,बुरी बातों को बर्दाश्त न करें और हमारे संगठन को ऐसा बनाएँ जैसा वह हो सकता है मगर बदकिस्मती से अब तक हुआ नहीं है.

शक्तिशाली पदों पर बैठे पुरुषों द्वारा यौन दुर्व्यवहार और महिला-द्वेष (मिसोजनी) अबाधित रूप से चलने देने वाली संरचनाएँ रखने में राजनीतिक दलों के बीच, वामपंथी समूहों के बीच, प्रतिबद्ध लोगों के संगठनों के बीच, या वास्तव में मित्रों या सहकर्मियों के समूहों के बीच ब्रिटिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी का मामला शायद ही असामान्य है. फक़त पिछले 12 महीनों के दौर में जिन बातों की इशारा किया जा सकता है वह हैं जिमी साविल के मामले में बीबीसी का बर्ताव, या विकिलीक्स के वे समर्थक जो मानते हैं कि जूलियन असांज को स्वीडन में बलात्कार और यौन दुष्कर्म पर सफाई देने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
व्यक्तिगत तौर पर मैं दो मिसालें दे सकती हूँ जिनमें सम्मानित व्यक्ति कष्टपूर्वक अलग हो गए और फौरेवर फ्रेंडशिप समूह जिनमें ऐसी घटनाओं को स्वीकार करने का साहस नहीं था. एकमात्र फर्क यह है कि एसडब्ल्यूपी ने खुले रूप से उन अनकहे नियमों की बात की जिनकी वजह से ऐसा डराना-धमकाना अक्सर चलता जाता है. दीगर समूह इतने बेशर्म नहीं हैं जो यह कह दें कि उनके नैतिक संघर्ष नारीवाद जैसे महत्त्वहीन मुद्दों से ज्यादा अहम हैं - भले ही असलियत में उनका तात्पर्य यही हो, या यह दावा कर दें की सही सोच रखने वाले वे लोग और उनके नेतागण कानून से ऊपर हैं. प्रतीत होता है कि एसडब्ल्यूपी के नेतृत्व ने यह बात अपने नियमों में लिख रखी थी.
यौन हिंसा के मामले बरतने में वाम को दिक्कत होती है ऐसा कहने का मतलब यह नहीं कि दूसरी जगहों पर यह समस्या नहीं है. मगर खास तौर पर वाम में या वृहत रूप में प्रगतिशीलों में पाए जाने वाले 'रेप कल्चर' को स्वीकार करने और हल करने को लेकर एक अड़ियल अस्वीकार ज़रूर है. निश्चित रूप से इसका सम्बन्ध इस ख़याल से है कि प्रगतिशील होने के नाते, बराबरी और सामाजिक न्याय  के लिए लड़ने के नाते, और हाँ, इस नाते के नाते, किसी तरह से हम नस्ल,जेंडर और यौन हिंसा के मुद्दों को लेकर व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने से ऊपर हैं.
हमारे अपने बर्ताव का विश्लेषण करने को लेकर अनिच्छा जल्दी ही जड़सूत्र (डॉग्मा) बन जाती है. तस्वीर ऐसी बनती है कि ये तुच्छ, ज़रा-ज़रा सी बात को मुद्दा बनाने वाली औरतों की वाम के भले आदमियों के अच्छे काम को बर्बाद करने की कोशिश है, औरतों वाले शिकायती अंदाज़ में इस बात पर ज़ोर देकर कि प्रगतिशील स्पेस भी ऐसी स्पेस हों जहाँ उन्हें बलात्कार की, दुर्व्यवहार की, बदचलन कहे जाने की, और अपनी बात कहने पर शिकार बनाए जाने की उम्मीद न हो. और भावनाओं में रोष और नाराजगी है कि: वर्ग युद्ध,पारदर्शिता और सेंसरशिप से आज़ादी का हमारा विशुद्ध और परिपूर्ण संघर्ष क्यों कर 'अस्मिता की राजनीति' से प्रदूषित हो? और अस्मिता की राजनीति इस तरह मुँह बनाकर बोला जाता है जैसे यह लफ्ज़ कितना बेस्वाद है. आम कट्टरपंथियों से अधिक जवाबदेही की अपेक्षा हम से क्यों की जाए? क्यों हमें उच्चतर आदर्शों पर रखा जाए?
वह इसलिए कि अगर हम ऐसे नहीं हैं,तो हमें प्रगतिशील कहलाने का कोई हक नहीं. क्योंकि अगर हम अपनी संस्थाओं के भीतर हिंसा, दुर्व्यवहार और जेंडर हाइरार्की के मुद्दों को स्वीकार नहीं करते तो हमें इन्साफ़ के लिए लड़ने का क्या उसकी बात करने का भी हक नहीं.
वॉकर लिखते हैं, "लोकतंत्र और लैंगिकवाद के मुद्दे अलग नहीं हैं, वे विकट रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. लोकतंत्र का अभाव लैंगिकवाद  के बढ़ने हेतु स्पेस तैयार करता है और जब वह बढ़ जाता है तो उसे जड़ से दूर करने को और भी मुश्किल बनाता है." वे एसडब्ल्यूपी के बारे में बात कर रहे हैं मगर यह बात वाम की किसी भी पार्टी के बारे में कही जा सकती है जो पीढ़ियों के महिला-द्वेषी असबाब से स्वयं को मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रही है. 
बराबरी कोई वैकल्पिक पूरक या गौण मुद्दा नहीं जिस से इन्कलाब के बाद निपटा जा सकता है. महिलाओं के अधिकारों के बिना न कोई सच्चा लोकतंत्र हो सकता है और न ढंग का वर्ग-संघर्ष. वाम जितनी जल्दी इस बात को स्वीकार कर लेगा और अपने साझा पिछवाड़े से  दम्भीपन और पूर्वाग्रह का भारी-भरकम डंडा निकालने  का काम शुरू कर देगा, उतनी जल्दी हम अपना असली काम शुरू कर पाएँगे.

Thursday, November 28, 2013

अपने से डरा हुआ बहुमत : असद ज़ैदी



क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बन्दगी में मिरा भला न हुआ (ग़ालिब)

नमरूद बाइबिल और क़ुरआन में वर्णित एक अत्याचारी शासक था जिसने ख़ुदाई का दावा किया और राज्याज्ञा जारी की कि अब से उसके अलावा किसी की मूर्ति नहीं पूजी जाएगी। पालन न करने वालों को क़त्ल कर दिया जाता था। नरेन्द्र मोदी ने, जिनके नाम और कारनामे सहज ही नमरूद की याद दिलाते हैं, अब अपने आप को भारत का प्रधानमंत्री चुन लिया है। बस इतनी सी कसर है कि भारत के अवाम अगले साल होने वाले आम चुनाव में उनकी भारतीय जनता पार्टी को अगर स्पष्ट बहुमत नहीं तो सबसे ज़्यादा सीट जीतने वाला दल बना दें। इसके बाद क्या होगा यह अभी से तय है। पूरी स्क्रिप्ट लिखी ही जा चुकी है। इस भविष्य को पाने के लिए ज़रूरी कार्रवाइयों की तैयारी एक अरसे से जारी है । मुज़फ़्फ़रनगर में मुस्लिम जनता पर बर्बर हमला, हत्याएँ, बलात्कार, असाधारण क्रूरता की नुमाइश और बड़े पैमाने पर विस्थापन इस स्क्रिप्ट का आरंभिक अध्याय है। यह उस दस-साला खूनी अभियान का भी हिस्सा है जिसके ज़रिए हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ हिन्दुस्तानी राज्य और समाज पर अपने दावे और आधिपत्य को बढ़ाती जा रही हैं।

यह आधिपत्य कहाँ तक जा पहुँचा है इसकी प्रत्यक्ष मिसालें देना ज़रूरी नहीं है -- क्योंकि जो देखना चाहते हैं देख ही सकते हैं -- पर जो परोक्ष में है और भी चिंताजनक है। मसलन, लेखक कवियों और कलाकारों के बीच विमर्श को जाँचिए, उस स्पर्धा और घमासान को देखिए जो हमेशा उनके बीच होता ही रहता है, हिन्दी के अध्यापकों से बात कीजिए, और मुज़फ़्फ़रनगर का ज़िक्र छेड़िये तो लगेगा मुज़फ़्फ़रनगर में शायद कोई मामूली वारदात हुई है जो होकर ख़त्म हो गई। जैसे किसी को मच्छर ने काट लिया हो! मुज़फ़्फ़रनगर की बग़ल में, दिल्ली में, बैठे हुए किसी को सुध नहीं कि पड़ोस में क्या हुआ था और हो रहा है, बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, भोपाल, पटना, चंडीगढ़ और शिमला का तो ज़िक्र ही क्या! इक्के दुक्के पत्रकारों, चंद कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों की को छोड़ दें तो किसी लेखक-कलाकार को वहाँ जाने की तौफ़ीक़ नहीं हुई। उनमें से एक शरणार्थी कैम्प तो दिल्ली की सीमा ही पर है। मात्र एक ज़िले में क़रीब एक लाख लोग अपने गाँवों और घरों से खदेड़ दिये गए, शायद अब कभी वहाँ लौट नहीं पाएँगे, उनके भविष्य में असुरक्षा और अंधकार के सिवा कुछ नहीं, उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति साहित्य, कला, संस्कृति, पत्र-पत्रिका, अख़बार, सोशल मीडिया में सरसरी तौर से भी ठीक से दर्ज नहीं हो पा रही। ऐसे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। और जो अब हो रहा है वो भी नहीं हो रहा!

मामला इतने पर ही नहीं रुकता। संघ परिवार, नरेन्द्र मोदी और भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह का इस प्रसंग से जैसे कोई वास्ता ही नहीं! मीडिया को उनका नामोल्लेख करना ग़ैर-जायज़ लगता है। मामले को ऐसे बयान किया गया कि यह सिर्फ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की चुनावी चाल थी जो उल्टी पड़ गई। अगर कोई कहता है कि कैसे मुज़फ़्फ़रनगर में गुजरात का प्रयोग विधिवत ढंग से दोहराया गया है, और इस वक़्त वहाँ की दबंग जातियाँ, पुलिस और काफ़ी हद तक प्रशासन मोदी-मय हो रहा है, और यह कि मुज़फ़्फ्ररनगर क्षेत्र में संघ परिवार बहुत दिन से ये कारनामा अंजाम देने की तैयारी कर रहा था, तो आम बौद्धिक कहने वाले की तरफ़ ऐसे देखते हैं जैसे कोई बहुत दूर की कौड़ी लाया हो। हिन्दी इलाक़े के बौद्धिकों में -- जिनमें अपने को प्रगतिशील कहने वाले लोग भी कम नहीं हैं -- फ़ासिज़्म को इसी तरह देखा या अनदेखा किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले हिन्दी के एक पुराने बुद्धिमान ने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी पर ज़्यादा चर्चा से उसीका महत्व बढ़ता है; बेहतर हो कि हम मोदी को 'इगनोर' करना सीख लें। एक प्रकार से वह साहित्य की दुनिया में आज़माये फ़ार्मूले को राष्ट्रीय राजनीति पर लागू कर रहे थे। इतिहास में उन जैसे चिन्तकों ने पहले भी हिटलर और मुसोलिनी को 'इगनोर' करने की सलाह दी थी।

अगर यह नादानी या मासूमियत की दास्तान होती तो दूसरी बात होती। इसी तबक़े के लोगों ने यू आर अनंतमूर्ति प्रकरण में जिस मुस्तैदी और जोश से बहस में हिस्सा लिया वह कहाँ से आई? अनंतमूर्ति ने जब यह कहा कि वह ऐसे मुल्क में नहीं रहना चाहेंगे जहाँ मोदी जैसा आदमी प्रधानमंत्री हो, संघ परिवार द्वारा लोकतंत्र पर जैसी फ़ासीवादी चढ़ाई की तैयारी है, अगर वह सफल हो गई तो यह देश रहने लायक़ नहीं रह जाएगा, तो लगा जैसे क़हर बरपा हो गया! शायद ही वर्तमान या अतीत के किसी लोहियावादी को एक साथ संघ परिवार और हिन्दी के उदारमना मध्यममार्गी लोगों का ऐसा कोप झेलना पड़ा हो। अचानक साहित्य और पत्रकारिता के सारे देशभक्त जाग उठे और बुज़ुर्ग लेखक के 'देशद्रोह' की बेहूदा तरीक़े से निन्दा करने लगे। यह अनंतमूर्ति की वतनपरस्ती ही थी कि उन्होंने ऐसी बात कही। रंगे सियारों के मुँह से यह बात थोड़े ही निकलने वाली थी! कौन चाहेगा कि उसका वतन एक क़ातिल और मानवद्रोही के पंजे में आ जाए? क्या इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि हज़ारों, बल्कि लाखों बल्कि लोगों को, रोते और बिलबिलाते हुए, अपने वतन को अलविदा कहनी पड़ी? पिछली सदी में जर्मनी में और स्पेन में, और १९४७ के भारत में क्या हुआ था? हर तरह के फ़ासिस्ट और साम्प्रदायिक लोग क्या इसी को शुद्धिकरण और राष्ट्र-निर्माण का दर्जा नहीं देते थे? कुछ लोग तमाम जानकारी जुटा कर यह साबित करने पर तुल गए कि अनंतमूर्ति नाम का शख़्स कितना चतुर, अवसरवादी और चालबाज़ रहा है। मामला फ़ासिस्ट ख़तरे से फिसलकर एक असहमत आदमी के चरित्र विश्लेषण पर आ ठहरा। वे किसका पक्ष ले रहे थे? ऐसी ही दुर्भाग्पूर्ण ख़बरदारी वह थी जिसका निशाना मक़बूल फ़िदा हुसेन बने। कई बुद्धिजीवी और अख़बारों के सम्पादक हुसेन को देश से खदेड़े जाने और परदेस में भी उनको चैन न लेने देने के अभियान का हिस्सा बन गए थे।

मुज़फ़्फ़रनगर पर ख़ामोशी और अनंतमूर्ति के मर्मभेदी बयान पर ऐसी वाचालता दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इससे यह पता चलता है कि ज़हर कितना अन्दर तक फैल चुका है। फ़ासिज्‍़म लोगों की भर्ती पैदल सैनिक के रूप में लुम्पेन तबक़े से ही नहीं, बीच और ऊपर के दर्जों से भी करता है। उसका एक छोटा दरवाज़ा बायें बाज़ू के इच्छुकों के लिए भी खुला होता है। कुछ साल के अन्तराल से आप किसी पुराने दोस्त और हमख़याल से मिलते हैं तो पता चलता है वह बस हमज़बान है, हमख़याल नहीं। आपका दिल टूटता है, ज़मीन आपके पैरों के नीचे से खिसकती लगती है, अपनी ही होशमन्दी पर शक होने लगता है। वैचारिक बदलाव ऐसे ही चुपके से आते हैं। बेशक इनके पीछे परिस्थितियों का दबाव भी होता है, पर यही दबाव प्रतिरोध के विकल्प को भी तो सामने कर सकता है। ऐसा नहीं होता नज़र आता इसकी वजह है बहुमत का डर और वाम-प्रतिरोध की परंपरा का क्षय। मेरी नज़र में जब लोग लोकतंत्र के मूल्यों की जगह बहुमतवाद के सिद्धान्त को ही सर्वोपरि मानने लगें, और राजनीति-समाज-दैनिक जीवन सब जगह उसी की संप्रभुता को स्वीकार कर लें, बहुमतवाद के पक्ष में न होकर भी उसके आतंक में रहने लगें, अपने को अल्पमत और अन्य को अचल बहुमत की तरह देखने लगें और ख़ुद अपने विचारों और प्रतिबद्धताओं के साथ नाइन्साफ़ी करने लगें तो अंत में यह नौबत आ जाती है कि बहुमत के लोग ही बहुमत से डरने लगते हैं। बहुमत ख़ुद से डरने लगता है।आज हिन्दुस्तान का लिबरल हिन्दू अपने ही से डरा हुआ है, उसे बाहर या भीतर के वास्तविक या काल्पनिक शत्रु की ज़रूरत नहीं रही। फ़ासिज़्म का रास्ता इसी तरह बना है, इसी से फ़ासीवादियों की ताक़त बढ़ी है। यह वह माहौल है जिसमें प्रगतिशील आदमी भी सच्ची बात कहने से घबराने लगता है, साफ़दिल लोग भी एक दूसरे से कन्नी काटने लगते हैं। बाक़ी अक़्लमंदों का तो कहना ही क्या, उनके भीतर छिपा सौदागर कमाई का मौक़ा भाँपकर सामने आ जाता है और अपनी प्रतिभा दिखाने लगता है। अक़लमंद लोग अपनी कायरता को भी फ़ायदे के यंत्र में बदल लेते हैं।

१९८९ के बाद पंद्रह बीस साल ऐसे आए थे जब भारत का मुख्यधारा का वाम (संसदीय वामपंथ ) यह कहता पाया जाता था कि दुनिया भर में समाजवादी राज्य-व्यवस्थाएँ टूट रही हैं, कुछ बिल्कुल मिट चुकी हैं लेकिन हिन्दुस्तान में वाम की शक्ति घटी नहीं बल्कि इसी दौर में उत्तरोत्तर बढ़ी है। वाम संगठनों की सदस्यता में इज़ाफ़ा हुआ है और यह इसका प्रमाण है कि वाम दलों की नीतियाँ सही हैं, और यह कि हमारी वाम समझ ज़्यादा परिपक्व, ज़मीनी और पायेदार है। बूर्ज्वा पार्टियों का दिवालियापन अब ज़ाहिर होने लगा है। इस सूत्र को इसी दौर की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति से मिलाकर देखें तो पता चलता है कि वाम के एक हिस्से ने अपने लिए कितनी बड़ी मरीचिका रच ली थी, और यथार्थ के प्रतिकूल पक्ष की अनदेखी करना सीख लिया था। वाम दलों ने अपनी बनाई मरीचिका में फँसकर अपने ही हौसले पस्त कर लिए हैं। इसी दौर में संघ परिवार की ख़ूनी रथयात्राएँ और सामाजिक अभियान शुरू हुए जिनकी परिणति बाबरी मस्जिद के विध्वंस और मुम्बई और सूरत के नरसंहारों में हुई। यह दौर हिन्दुत्व के राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्रीय तथ्य बनने का है, पहले खाड़ी युद्ध के साथ पश्चिम एशिया पर अमरीकी साम्राज्य के हमलों का है, और भारत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के आत्मसमर्पण का है। इसी दौर में भारत स्वाधीन नीति छोड़कर अमरीका का मातहत और इज़राइल का दोस्त हुआ। इसी दौर में बंगाल की लम्बे अरसे से चली आ रही वाम मोर्चा सरकार ने अवाम के एक हिस्से का समर्थन खो दिया क्योंकि वाम सरकार और वाम पार्टियों के व्यवहार में वाम और ग़ैर-वाम का फ़र्क़ ही नज़र आना बंद हो गया था। यही दौर मोदी की देखरेख में गुजरात में सन २००२ का ऐतिहासिक नरसंहार सम्पन्न हुआ जिसमें राजसत्ता के सभी अंगों ने अभूतपूर्व तालमेल का परिचय दिया और भारत में भावी फ़ासिज़्म क्या शक्ल लेगा इसकी झाँकी दिखाई। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, निजीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण के तहत इसी हिन्दू फ़ासिस्ट मॉडल को विकास के अनुकरणीय आदर्श की तरह पेश किया जाता रहा है।

आज हिन्दुस्तान में संसाधनों की कारपोरेट लूट लूट नहीं राजकीय नीति के संरक्षण में क्रियान्वित की जाने वाली हथियारबंद व्यवस्था है। भारतीय राज्य का राष्ट्रवाद अवामी नहीं, दमनकारी पुलिसिया राष्ट्रवाद है, अर्धसैनिक और सैनिक ताक़त पर आश्रित राष्ट्रवाद है। यह अपनी ही जनता के विरुद्ध खड़ा राष्ट्रवाद है। वैसे तो सर्वत्र लेकिन उत्तरपूर्व, छत्तीसगढ़ और कश्मीर में सुबहो-शाम इसका असल रूप देखा जा सकता है। आर्थिक नीति, सैन्यीकृत राष्ट्रवाद और शासन-व्यवस्था के मामलों में कांग्रेस और भाजपा में कोई अन्तर नहीं है। फ़ासिज्‍़म के उभार में इमरजेम्सी के ज़माने से ही दोनों का साझा रहा है। हिन्दुस्तान में फ़ासिज़्म के उभार का पिछली सदी में उभरे योरोपीय फ़ासिज़्म से काफ़ी साम्य है। जर्मन नात्सीवाद के नक़्शे क़दम पर चल रहा है। वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा । बड़ा फ़र्क़ बस यह है कि भारतीय मीडिया और मध्यवर्ग इसी चीज़ को छिपाने में जी-जान से लगा है। फ़ासिज़्म फ़ासिज़्म न होकर कभी विकास हो जाता है कभी दंगा, गुजरात का नस्ली सफ़ाया गोधरा कांड की प्रतिक्रिया हो जाता है, मुज़फ़्फ़रनगर की व्यापक हिंसा जाट-मुस्लिम समुदायों की आपसी रंजिश का नतीजा या कवाल कांड की प्रतिक्रिया बन जाती है। हमारे बुद्धिजीवी विषयांतर में अपनी महारत दिखाकर इस फ़ासिज़्म को मज़बूत बनाए दे रहे हैं।

इस दुष्चक्र को तोड़ने का एक ही तरीक़ा है इन ताक़तों से सीधा सामना, हर स्तर पर सामना। और समय रहते हुए सामना। अपने रोज़मर्रा में हर जगह हस्तक्षेप के मूल्य को पहचानना। ऐसी सक्रिय नागरिकता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। सबसे ज़्यादा ज़रूरी है आज व्यवस्था के सताये हुए अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई), दलित और आदिवासी के साथ मज़बूती से खड़े होने की। अगर वाम शक्तियाँ और ग़ैर-दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी वर्ग प्रतिबद्धता से यह कर सकें तो फ़ासिज़्म की इमारतें हिल जाएँगी और उनके आधे मन्सूबे धरे रह जाएँगे। इस समय ज़रूरत है फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ व्यापक वाम और अवामी एकता की -- अगर यह एकता राजनीतिक शऊर और ज़मीर से समझौते की माँग करे तो भी। बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी का काम इससे बाहर नहीं है।
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 `प्रभात खबर` दीवाली विशेषांक से साभार

Monday, November 18, 2013

मुज़फ़्फ़रनगर के ओमप्रकाश वाल्मीकि


ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ़्फ़रनगर जिले के थे और इस तरह एक चलन की तरह मैं कह सकता हूं कि यह मेरी निजी क्षति है। कहने को मुज़फ़्फ़रनगर की `साहित्यिक?` संस्थाएं भी ऐसे बयान अखबारों के लोकल पन्नों पर छपवा सकती हैं कि यह उनकी और मुज़फ़्फ़रनगर की `अपूर्णीय क्षति` है। लेकिन, सच यह है कि वे दिल्ली-देहरादून राजमार्ग पर मुज़फ़्फ़रनगर जिला मुख्यालय के पास ही स्थित बरला गांव में पले-बढ़े होने के बावजूद न मुज़फ़्फ़रनगर के ताकतवर सामाजिक-सांस्कृतिक मिजाज का प्रतिनिधित्व करते थे और न खुद को साहित्य-संस्कृति की संस्था कहने वाले स्थानीय सवर्ण नेतृत्व वाले जमावड़ों का। ऊपर से कोई कुछ भी कहे, इन संस्थाओं के हालचाल, इनकी नातियों, एजेंडों और इनकी किताबों को देखते ही पता चल जाएगा कि वाल्मीकि जी बचपन के प्राइमरी स्कूल के त्यागी मास्टर की तरह इनके लिए भी `अबे चूहडे के` ही बने रहे। जिन संस्थाओं ने कवि सम्मेलनों के मंच पर ज़िंदगी भर अश्लील-फूहड़ चुटकुलेबाजी करने वाले सत्यदेव शास्त्री भोंपू को हास्यारसावतार बताकर उसकी पालकी ढ़ोई हो और जहां कभी जाति, वर्ग और दूसरे यथार्थवादी सवालों पर बहस आते ही इस्तीफों और निष्कासन की नौबत आ जाती हो, जिन संस्थाओं की सालाना किताबें फूहड़ ब्राह्मणवादी, स्त्री विरोधी और उन्मादी और दक्षिणपंथी सामग्री से भरी रहती हों, वहां वाल्मीकि जी को आयकन होना भी नहीं चाहिए था।

लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि से परिचय से पहले स्कूली दिनों मैंने शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा `अक्करमाशी` के बारे में किसी अखबार के इतवारी पन्ने पर पढ़ा था और किसी तरह दिल्ली पहुंचकर यह किताब हासिल भी कर ली थी। इस किताब ने दिल-दिमाग में तूफान खड़ा कर दिया था। जूठन चूंकि अपने ही आसपास की `कहानी` थी, उसे पढ़ने पर बेचैनी और ज्यादा बढ़ जाना स्वाभाविक था। मैंने कई लोगों को बड़ी बेशर्मी से यह कहते भी सुना कि मेलोड़्रामा पैदा कर किताब बेचने का यह बढ़िया तरीका है। इनमें एक सज्जन गाहे-बगाहे दलितों के प्रति भावभीने उद्गार सुनाने में प्रवीण थे। मैंने कहा कि कौन नहीं जानता कि इसमें लिखा एक-एक शब्द सही है और गांव का नाम बदलने और मास्टर से पहले त्यागी की जगह जाट, राजपूत वगैरहा ऐसा कोई दूसरा `ताकतवर शब्द` जोड़ देने से भी उतना ही सही रहता है।

1992 के बाद के किसी साल वाल्मीकि जी मुज़फ़्फ़रनगर के लेखकों के पास रुके होंगे। मुझे अगले दिन `अमर उजाला` में पहुंची `वाणी` नाम की एक संस्था की प्रेस विज्ञप्ति से यह पता चला। उन्होंने गोष्ठी में क्या कहा, स्थानीय लेखकों से उनकी क्या बातचीत हुई, इस बारे में विज्ञप्ति में कोई शब्द नहीं था। मैंने उनके कार्यक्रम की कोई पूर्व सूचना न देने और विज्ञप्ति में उनकी कही बातों का जिक्र तक न होने पर नाराजगी जताई तो वाणी के एक जिम्मेदार पदाधिकारी ने बताया कि वे तो बस यूं ही आए थे, मुलाकात हुई, कुछ बातें हुईं। पिछले साल इसी संस्था की सालाना किताब के संपादन की जिम्मेदारी एक दलित युवक को दी गई थी जिसने `समन्वय` उनवान को सार्थक बनाने के लिए पूरा समर्पण कर रखा था। तो भी संस्था के सवर्ण संचालकों को जाने क्या नागवार गुजरा कि इस बरस शर्त बना दी गई कि रचनाएं शोधपरक न हों और सद्भाव बिगाड़ने वाली न हों। तो मुझे लगता है कि उस दिन बाल्मीकि जी की बातें `सद्भाव की हिफाजत` करने के लिहाज से ही जारी नहीं की गई होंगी।

मेरे लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की `जूठन` मेरे `घर` के यथार्थ को सामने रखने वाली किताब थी और वे इस जिले की उन हस्तियों की तरह मेरे लिए गौरव की वजह थे जिन्हें मुख्यधारा या तो भुलाए रखती है या याद भी करती है तो इस तरह कि उनकी ज़िंदगी और उनके कामों के जिक्र से कथित सद्भाव में कोई खलल न पड़े। वाल्मीकि जी ने कई उल्लेखनीय कविताएं और कहानियां लिखीं पर `जूठन` के साथ कुछ ऐसा रहा कि वह मेरे पास कभी नहीं रह सकी। मैं इस किताब को हमेशा किसी को पढ़ने के लिए देता रहा और मौका लगते ही फिर-फिर खरीदता रहा। `अमर उजाला` ने करनाल भेज दिया तो वहां रंगकर्मी युवक अमित नागपाल ने `जूठन` के कुछ हिस्सों की अनेक बार एकल प्रस्तुति दी। तरह-तरह के तर्क देकर इस मंचन को रोकने की कोशिशें बार-बार की गईं। युवा महोत्सव में यह तर्क दिया गया कि एक अकेले कलाकार की प्रस्तुति को सामूहिकता दर्शाने वाले कार्यक्रम में नहीं होना चाहिए। कॉलेजों के ऐसे जाहिल और धूर्त मास्टरों-`कला-संरक्षकों` को उनकी असल चिढ़ का कारण बताकर हम लोगों ने हमेशा चुप भी कराया।

संयोग से वाल्मीकि जी से एकमात्र मुलाकात कुछ बरस पहले रोहतक में एक सेमिनार में हुई थी। उनकी कई बातों से मैं सहमत नहीं था बल्कि कई बातों से हैरान था। सीपीआईएम से जुड़े लोगों और बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड़े एक अध्यापक व उनके कार्यकर्ताओं के रवैये से सेमिनार में सवाल-जवाब का मौका भी नहीं मिल सका। मैं उनसे फिर कभी मिलकर विस्तार से बहुत सारी बातें करना चाहता था। उन्हें लम्बे समय से पसंद करने की अपनी वजहें एक आम कस्बाई पाठक की तरह बताना चाहता था और उनसे अपनी असहमतियों और सामने खड़े खतरों पर चर्चा करना चाहता था। इन दिनों जबकि मुज़फ़्फ़रनगर उन्हीं मनुवादी ताकतों की साम्प्रदायिक चालों का शिकार हो रहा हो, जिनके खिलाफ संघर्ष से उनका लेखन निकला था, ये बातें और भी ज्यादा जरूरी लग रही थीं। मुझे उम्मीद थी कि वे ठीक होकर फिर से सक्रिय होंगे।

`जनसंदेश टाइम्स` अखबार में आज 18 नवंबर को प्रकाशित।
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और मुज़फ़्फ़रनगर के ही रहने वाले कवि-मित्र परमेंद्र सिंह की फेसबुक पर इस पोस्ट पर आई टिपण्णी के बिना ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुज़फ़्फ़रनगर के साहित्यिक समाज के रिश्ते की यह गाथा अधूरी रह जाती। इसलिए वह टिपण्णी यहां भी साझा कर रहा हूं-`ओमप्रकाश वाल्मीकि का निधन एक बहुत बड़ी क्षति है पूरे हिंदी समाज के लिए. जहाँ तक मुज़फ्फरनगर से उनके सम्बन्ध का सवाल है, तो मुज़फ़्फ़रनगर की साहित्यिक संस्थाएं जिस तरह से अन्य मूर्धन्यों का नाम लेकर आत्मगौरव के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करती रही हैं, करती रहेंगी. ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ्फरनगर आये थे 'वाणी' संस्था के वार्षिक संकलन 'तारतम्य' (सम्पादक - नेमपाल प्रजापति) के विमोचन के लिए. समारोह में उनके वक्तव्य में प्रसाद, प्रेमचंद, पन्त पर की गयीं उनकी टिप्पणियों से अग्रिम पंक्ति में बैठे डिग्री कॉलेज के हिंदी विभागों के अध्यक्ष, रीडर, प्रोफेसर वगैरह जिन्होंने साहित्यकार होने का सर्टिफिकेट देने का ठेका उठा रखा ही, कैसे उछल-उछल पड़े थे तिलमिलाकर, देखते ही बनता था. प्रोफेसर साहिबान के कुछ शिष्यों ने तो बाकायदा नारेबाजी तक की थी. हम कुछ लोगों ने मिलकर उन उपद्रवी शिष्यों पर बामुश्किल काबू पाया था. उक्त संकलन में शामिल किया गया 'दलित खंड' ही दरअसल में उन लोगों की आँख की किरकिरी बन गया था, और बना भी रहा... हमारा यह प्रतिरोध बना रहा और अंततः हम तीन मित्रों ने उस संस्था से किनारा कर लिया... खैर, उस गोष्ठी के बाद भाई Ashwani Khandelwal के घर पर 'प्रोफेसरों के साथ चाय पर भी बड़ी गरमा-गरम बहस हुई... एक प्रोफेसर ने अंत में कहा - दलितों को बराबरी का दर्जा देते हुए हमारे संस्कार आड़े आते हैं.`

Friday, November 15, 2013

ख्वाजादास के पद वाया मृत्युंजय



पिछले कुछ दिनों से वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी पर महाकवि ख्वाजादास की कृपा बनी हुई है। खुशी की बात यह है कि अब वे हमारे एक और बेहतरीन हिंदी कवि मृत्युंजय पर भी नाजिल हुए हैं। उन्होंने जो फरमाया, वह मृत्युंजय भाई की ही जुबानी-
 


[ख्वाजादास से असद जी ज़ैदी साहब ने तआररूफ़ करवाया था। असद जी की साखी पर मुझ नाचीज पर भी उनकी अहेतुक कृपा बरसी।]

[क]
सुबकत-अफनत ख्वाजादास !
नैहर-सासुर दोनों छूटा टूटी निर्गुनिये से आस
लतफत लोर हकासल चोला बीच करेजे अटकी फांस
गगने-पवने, माटी-पानी, अगिन काहु पर नहिं बिस्वास
थहकल गोड़ रीढ़ पर हमला जुद्धभूमि में उखड़ी  सांस  
सुन्न सिखर पर जख्म हरियरा फूलन लागे चहुंदिस बांस 
जेतने संगी सब मतिभंगी नुचड़ी-चिथड़ी दिखे उजास
बिरिछे बिरिछे टंगी चतुर्दिक फरहादो शीरीं की लाश

[ख]
ख्वाजादास पिया नहिं बहुरे !
नैनन नीर न जीव ठेकाने कथा फेरु नहिं कहु रे
यह रणभूमि नित्यप्रति खांडा गर्दन पे लपकहु रे 
ज़ोर जुलुम तन-मन-धन लूटत, जेठे कभु कभु लहुरे
कवन राहि तुम बिन अवगाहों खाय मरो अब महुरे
जहर तीर बेधत हैं तन-मन अगिन कांट करकहु रे
तुम्हरी आस फूल गूलर कै मन हरिना डरपहु रे
नाहिं कछू, हम कटि-लड़ि मरबों पाछे जनि आवहु रे

[ग]
ख्वाजा का पियवा रूठा रे !
भीतर धधकत मुंह नहिं खोलत दुबिधा परा अनूठा रे
आवहु सखि मिलि गेह सँभारो गुरु के छपरा टूटा रे
कोही कूर कुचाली कादर कुटिल कलंकी लूटा रे  
जप तप जोग समाधि हकीकी इश्क कोलाहल झूठा रे
पछिम दिसा से चक्रवात घट-पट-पनघट सब छूटा रे
मन महजिद पे मूसर धमकत राई-रत्ता कूटा रे   
सहमा-सिकुड़ा-डरा देस का पत्ता, बूटा-बूटा रे  

[घ]
ख्वाजा, संत बजार गये !
बधना असनी रेहल माला सब कुछ यहीं उतार गये
जतन से ओढ़ी धवल कामरी कचड़ा बीच लबार गये 
जनम करम की नासी सब गति करने को व्योपार गये
छोड़ि संग लकुटी-कामरि को हाथ लिये ज्योनार गये
नेम पेम जप जोग ज्ञान सब झोंकि आगि पतवार गये
हड़बड़ तड़बड़ लंगटा-लोटा बीच गली में डार गये
नये राज की नयी नीत के सिजदे को दरबार गये
 
[ङ]
ख्वाजा कहा होय अफनाये !
राजनीति बिष बेल लहालह धरम क दूध पियाये
देवल महजिद पण्य छापरी पंडित - मुल्ला छाये
सतचितसंवेदन पजारि के कुबुधि फसल उपजाये
देस पीर की झोरी - चादर साखा मृग नोचवाये
मन भीतर सौ-सौ तहखाना घृणा प्रपंच रचाये
दुरदिन दमन दुक्ख दरवाजे दंभिन राज बनाये
सांवर सखी संग हम रन में जो हो सो हो जाये

(ऊपर पेटिंग जाने-माने चित्रकार मनजीत बावा की है।)