Tuesday, January 10, 2012

शुभम श्री की कविताएं


ये कोई नई बात नहीं
लंबी परंपरा है
मासिक चक्र से घृणा करने की
'अपवित्रता' की इस लक्ष्मण रेखा में
कैद है आधी आबादी
अक्सर
रहस्य-सा खड़ा करते हुए सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन
दुविधा में डाल देते हैं संस्कारों को...

झेंपती हुई टेढ़ी मुस्कराहटों के साथ खरीदा बेचा जाता है इन्हें
और इस्तेमाल के बाद
संसार की सबसे घृणित वस्तु बन जाती हैं
सेनिटरी नैपकिन ही नहीं, उनकी समानधर्माएँ भी
पुराने कपड़ों के टुकड़े
आँचल का कोर
दुपट्टे का टुकड़ा


रास्ते में पड़े हों तो
मुस्करा उठते हैं लड़के
झेंप जाती हैं लड़कियाँ


हमारी इन बहिष्कृत दोस्तों को
घर का कूड़ेदान भी नसीब नहीं
अभिशप्त हैं वे सबकी नजरों से दूर
निर्वासित होने को

अगर कभी आ जाती हैं सामने
तो ऐसे घूरा जाता है
जिसकी तीव्रता नापने का यंत्र अब तक नहीं बना...

इनका कसूर शायद ये है
कि सोख लेती हैं चुपचाप
एक नष्ट हो चुके गर्भ बीज को

या फिर ये कि
मासिक धर्म की स्तुति में
पूर्वजों ने श्लोक नहीं बनाए
वीर्य की प्रशस्ति की तरह

मुझे पता है ये बेहद कमजोर कविता है
मासिक चक्र से गुजरती औरत की तरह
पर क्या करूँ

मुझे समझ नहीं आता कि
वीर्य को धारण करनेवाले अंतर्वस्त्र
क्यों शान से अलगनी पर जगह पाते हैं
धुलते ही 'पवित्र' हो जाते हैं
और किसी गुमनाम कोने में
फेंक दिए जाते हैं

उस खून से सने कपड़े
जो बेहद पीड़ा, तनाव और कष्ट के साथ
किसी योनि से बाहर आया है

मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अखबार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं जरा भी उनकी सूरत

करीने से डाला जाए कूड़ेदान में
न कि छोड़ दिया जाए

'जहाँ तहाँ' अनावृत ...
पता नहीं क्यों

मुझे सुनाई नहीं दे रहा
उस सफाई कर्मचारी का इनकार

गूँज रहे हैं कानों में वीर्य की स्तुति में लिखे श्लोक...


कितनी मुलायम हो जाती है
माथे की शिकन
एक बेटी का पिता बनने के बाद

खुद-ब-खुद --खुद छूट जाता है
मुट्ठियों का भिंचना, नसों का तनना
कॉफी हाउस में घंटों बैठना

धीरे-धीरे संयत होता स्वर
धीमे...धीमे...पकती गंभीरता
और, देखते...देखते... मृदु हो उठता चेहरा

एक बेटी का जन्म लेना
उसके भीतर उसका भी जन्म लेना है
सफेद बालों की गिनती
ओवरटाइम के घंटे
सबका
निरंतर बढ़ना है

बेटी का बाप होना
हर लड़के के नाम के साथ 'जी' लगाना है
या शायद...चरागाह में उगा पौधा होना

लेकिन
(बहुत मजबूर हो कर लिया गया कर्ज
और उसके सूद तले दबा कर्जदार हो कर भी
बेटी का पिता होना
एक साहसी सर्जक होना है
(या सर्जक मात्र केवल!)


(1)
तुमने मुझे  क्या बना दिया, सिमोन ?
सधे कदमों से चल रही थी मैं

उस रास्ते पर
जहाँ

जल-फूल चढ़ाने लायक
'पवित्रता'
मेरे इंतजार में थी

ठीक नहीं किया तुमने...
ऐन बीच रस्ते धक्का दे कर
गलीज भाषा में इस्तमाल होने के लिए

बोलो ना सिमोन, क्यों किया तुमने ऐसा ?
(2)

'तुम
मेरे भीतर शब्द बन कर
बह रहे हो

तिर रहा है प्यास-सा एहसास
बज रही है
एक कोई ख़ूबसूरत धुन'

काश ऐसी कविता लिख पाती
तुमसे मिलने के बाद

मैंने तो लिखा है
सिर्फ
सिमोन का नाम

पूरे पन्ने पर
आड़े तिरछे
(3)

मुझे पता है
तुम देरिदा से बात शुरू करोगे

अचानक वर्जीनिया कौंधेगी दिमाग में
बर्ट्रेंड रसेल को कोट करते करते

वात्स्यायन की व्याख्याएँ करोगे
महिला आरक्षण की बहस से

मेरी आजादी तक
दर्जन भर सिगरेटें होंगी राख

तुम्हारी जाति से घृणा करते हुए भी
तुमसे मैं प्यार करूँगी

मुझे पता है
बराबरी के अधिकार का मतलब
नौकरी, आरक्षण या सत्ता नहीं है
बिस्तर पर होना है
मेरा जीवंत शरीर

जानती हूँ...

कुछ अंतरंग पल चाहिए
'सचमुच आधुनिक' होने की मुहर लगवाने के लिए

एक 'एलीट' और 'इंटेलेक्चुअल' सेक्स के बाद
जब मैं सोचूँगी

मैं आजाद हूँ
सचमुच आधुनिक भी...
तब

मुझे पता है
तुम एक ही शब्द सोचोगे
'चरित्रहीन'

(4)

जानती हो सिमोन,

मैं अकसर सोचती हूँ
सोचती क्या, चाहती हूँ

पहुँचाऊँ
कुछ प्रतियाँ 'द सेकंड सेक्स' की

उन तक नहीं
जो अपना ब्लॉग अपडेट कर रही हैं

मीटिंग की जल्दी में हैं
बहस में मशगूल हैं

'सोचनेवाली औरतों' तक नहीं

उन तक

जो एक अदद दूल्हा खरीदे जाने के इंतजार में

बैठी हैं

कई साल हो आए जिन्हें
अपनी उम्र उन्नीस बताते हुए

चाहती हूँ

किसी दिन कढ़ाई करते
क्रोशिया चलते, सीरियल देखते

चुपके से थमा दूँ एक प्रति
छठे वेतन आयोग के बाद

महँगे हो गए हैं लड़के
पूरा नहीं पड़ेगा लोन

प्रार्थना कर रही हैं वे
सोलह सोमवार

पाँच मंगलवार सात शनिवार
निर्जल...निराहार...


चाहती हूँ

वे पढ़ें

बृहस्पति व्रत कथा के बदले
तुम्हें, तुम्हारे शब्दों को
जानती हो
डर लगता है
पता नहीं

जब तक वे खाना बनाने
सिलाई करने, साड़ियों पर फूल बनाने के बीच

वक्त निकालें
तब तक

संयोग से कहीं सौदा पट जाए
और
तीस साल की उम्र में

इक्कीस वर्षीय आयुष्मती कुमारी क
परिणय सूत्र में बँधने के बाद

'द सेकंड सेक्स' के पन्नों में
लपेट कर रखने लगें अपनी चूड़ियाँ

तब क्या होगा, सिमोन ?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एमए प्रथम वर्ष की छात्रा शुभम श्री की इन कविताओं की ओर अनिल जनविजय ने ध्यान आकृष्ट कराया। उनकी ये कविताएं hindisamay.com से ली गई हैं। वहां उनकी कुछ और कविताएं भी पढ़ी जा सकती हैं। 

Thursday, January 5, 2012

बहरहाल सुलह-सफाई : गो निराला बहस से बाहर ही रहे



वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने निराला को लेकर खुद पर लगी तोहमत पर नया मेल जारी किया है। उसका मजमून-

`निराला की अपाठ्यता का पटाक्षेप


मुझे एक क्षीण-सी आशा थी कि केदारजी इस मसले को लेकर अपनी ओर से कुछ न कुछ कहेंगे और वह सही सिद्ध हुई.वे इन्टरनेट और ब्लॉग-विश्व से अनभिज्ञ हैं और ई-मेल आदि भी नहीं करते, किन्तु इस प्रकरण को लेकर उनके कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें सूचना दी  और उन्होंने तत्काल आज सुबह मुझे  फोन किया और एक भावनापूर्ण बातचीत  में  अधिकृत किया है कि मैं नेट के ज़रिये उनकी तरफ से सभी हिंदी लेखकों और निराला-प्रेमियों को सूचित कर दूं कि उन्होंने अलाहाबाद के अपने भाषण में निराला की 'तुलसीदास',' राम  की शक्ति-पूजा' और 'महाराज शिवाजी का पत्र' सरीखी कविताओं को लेकर मेरी दृढ आपत्ति का उल्लेख अवश्य किया था किन्तु यह क़तई नहीं कहा था कि विष्णु खरे के लिए निराला "अपाठ्य" हैं.केदारजी का कहना है कि उनके उस वक्तव्य को असावधान और ग़ैर-जिम्मेदाराना ढंग  से प्रकाशित-अनूदित कर दिया गया है. इस प्रकरण पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए उन्होंने  मुझसे तथा अन्य सैकड़ों निराला-प्रेमियों से इस भ्रान्ति के लिए मार्मिक शब्दों में हार्दिक खेद व्यक्त किया है.केदारजी ने यह भी कहा है कि  वे उपयुक्त सार्वजनिक  अवसर और मंच पर भी इस ग़लतबयानी   का खंडन और निराकरण करेंगे.
हमारे वरिष्ठ और प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के इस स्पष्टीकरण और खेद-प्रकाश  के बाद,जो  उनके अनुमोदन के लिए उन्हें पढ़ कर सुना दिया गया था,मुझे उम्मीद है कि इस प्रसंग पर आगे कोई विवाद नहीं होगा.फिर भी इसे सत्यापित करने के लिए कोई चाहे तो उनसे उनके टेलीफोन 09868637566 पर संपर्क कर सकता है, किन्तु ध्यान रहे कि केदारजी की मा कलकत्ता में गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं.
विष्णु खरे
पुनश्च:    'रविवार','एक-जिद्दी-धुन' तथा 'भड़ास' के ब्लॉगमास्टरों से विशेष अनुरोध है कि इस पत्र को शीघ्रातिशीघ्र अवश्य  प्रकाशित  करें.धन्यवाद.   वि.ख.`

Wednesday, January 4, 2012

`कारनामा-ए-केदारनाथ सिंह` : निराला निंदा की तोहमत से आहत हैं खरे जी



वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने अपने मित्रों परिचितों को एक मेल सर्कुलेट किया है जो घूमता हुआ मुझ तक भी पहुंचा है। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह के हवाले से कहीं छपा है कि खरे जी महाकिव निराला को   अपाठ्य मानते हैं। इससे हैरान और आहत खरे जी की यह टिपण्णी उनका पक्ष भर ही नहीं है, यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि हिंदी की दुनिया में आखिर चल क्या रहा है। युवाओं पर जिस गैरजिम्मेदारी की तोहमत अक्सर लगती रही है, इसकी जड़ें पीछे ही तो नहीं हैं?

खरेजी के मेल का मजमून :
यदि मामला  निराला से सम्बद्ध न होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण  टिप्पणी शायद न लिखी जाती.अनुरोध है कि संभव  और उचित हो तो कृपया अन्य साहित्य-जागरूक  मित्रों तक पहुँचाएँ.केदारजी से सार्वजनिक क्षमा चाहता हूँ.
सधन्यवाद,
विष्णु खरे



यदि वरिष्ठ कवि-आलोचक विजय कुमार का फोन न आता तो यह सब न लिखा जाता.पिछले एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने अपने किस लेख में कब लिखा है कि मैं निराला को अपाठ्य कवि मानता हूँ.मुझे उनके इस प्रश्न का सन्दर्भ कुछ याद तो आया किन्तु मैंने उनसे माजरा जानना चाहा.बोले कि गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी पत्रिका  में केदारनाथ सिंह का कोई अनूदित लेख या वक्तव्य प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि विष्णु खरे निराला को अपाठ्य मानता है.
मैंने विजयजी से यह नहीं पूछा कि वे वर्धा की बेहूदा और खरदिमाग ढंग से संपादित-प्रकाशित  कल्पनाशून्य  पत्रिकाएँ पढ़ते ही क्यों हैं – यद्यपि हिंदी में कूड़ा पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है - किन्तु मामले की गंभीरता से सजग हुआ.केदारजी ने शायद अलाहाबाद के अपने किसी भाषण में उस तरह का  कुछ कहा था जिसे किसी पत्रिका ने उद्धृत भी किया था किन्तु अधिकांश हिंदी अखबारों और साहित्यिक पत्रिकाओं में ऐसे भाषणों का जो अनर्गल चर्बा छपता है वह अविश्वसनीय और रद्दी  के लायक होता है.लेकिन पूरे भाषण या लेख का ऐसा हिस्सा ,भले ही आशंकित खराब अंग्रेज़ी अनुवाद में,कुछ तवज्जोह चाहता है.
केदारजी की प्रतिष्ठा ऐसी है कि उनके किसी भी वक्तव्य को,विशेषतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरीभाषी अंचल में, आर्षवाक्य मान लिया जाता है.यदि वह कथन विष्णु खरे को निराला का निंदक ठहराता हो तो कहना ही क्या - सैकड़ों विकलमस्तिष्कों  के मानस-मुकुल खिल-खिल जाते हैं.
हमारे यहाँ कोई यह पूछने या जानने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता कि अमुक बात यदि कही या लिखी गयी है तो कहाँ या कब ? उसके लिखित या दृश्य-श्रव्य सबूत  या गवाह क्या और कौन हैं ? स्वयं केदारजी ने कोई हवाला नहीं दिया है.इतने बड़े कवि तथा प्रोफ़ेसर-पीर से उसका मुत्तवल्ली-मंडल भला क्यों तफ्तीश करे – बाबा वाक्यं प्रमाणं.
सच क्या है ? मैं सार्वजनिक रूप से निराला पर कभी नहीं बोला हूँ – उन पर लिखी गयी अपनी दो टिप्पणियों को अवश्य मैंने संगोष्ठियों में पढ़ा है,एक को वर्षों पहले भारत भवन में और दूसरी को पिछले तीन वर्षों में कभी हिंदी अकादेमी के तत्त्वावधान में दिल्ली में.पहली में निराला की बीसियों प्रारंभिक कविताओं की सराहना और यत्किंचित विश्लेषण हैं और दूसरी में उनकी सिर्फ एक कविता – महगू महगा रहा - की लंबी व्याख्या,क्योंकि विषय वैसा ही था.दोनों मौकों पर कुल मिला कर ढाई-तीन सौ सुधी श्रोता तो रहे होंगे,भले ही केदारजी मौजूद न रहे हों.दोनों टिप्पणियाँ शायद आयोजकों द्वारा प्रकाशित भी की जा चुकी हैं या उनके रिकॉर्ड में होंगी.मेरे पास तो हैं ही.उनमें निराला की हल्की-सी भी आलोचना नहीं है – वे एक निर्लज्ज भक्ति-सरीखे भाव से भरी हुई हैं.
इसे भले ही आत्मश्लाघा समझा जाए लेकिन मैं हिंदी के शायद उन कुछ लोगों में से हूँ जिन्होंने निराला की एक-एक कविता एकाधिक बार पढ़ रखी है.नंदकिशोर नवल द्वारा क़ाबिलियत से संपादित ‘निराला रचनावली’ के पहले दोनों – कविता – खण्डों में मेरे बीसियों पेन्सिल-निशान हैं और शेष छः खण्ड भी लगभग पूरे पढ़े हुए हैं.यह स्पष्ट ही होगा कि मैंने निराला को अपाठ्य मानकर पूरा का पूरा तो पढ़ा न होगा.
निराला से मेरी ताज़िन्दगी वाबस्तगी का एक ताज़ा उदाहरण देना चाहता हूँ.निराला के सभी समर्पित पाठक जानते हैं कि नेहरू-परिवार से,विशेषतः विजयलक्ष्मी पंडित से,उनके जटिल रागात्मक सम्बन्ध थे.उनकी कुछ कविताओं में इसके साक्ष्य हैं.यह सुविदित है कि आज़ादी के बाद निराला की बदहाली को जानकर जवाहरलाल नेहरू ने उनके लिए एक नियमित आर्थिक सहायता का प्रबंध किया था.हाल नवंबर में संयोगवश मेरी भेंट विजयलक्ष्मी की बेटी और सुपरिचित भारतीय-अंग्रेज़ी लेखिका नयनतारा सहगल से हुई, जो अब स्वयं चौरासी वर्ष की हैं.अपने बदतमीज़ दुस्साहस में मैंने उनसे निराला और उनकी मा के विषय में पूछा,और यह भी कि क्या विजयलक्ष्मीजी के मृत्योपरांत कागज़ात में निरालाजी के कोई पत्र मिलते हैं,जिनका हवाला उनकी कविताओं में है ? मुझे लगा कि मेरे इस प्रश्न से नयनताराजी अपने-आप में लौट गईं और उन्होंने मुझे अजीब ढंग से देखकर – शायद यह  मेरी कल्पना ही हो - सिर्फ इतना कहा कि ऐसे कोई पत्र नहीं हैं.मैंने तब बात को आगे नहीं बढ़ाया.लेकिन हमारे स्वनामधन्य मतिमंद हिंदी प्राध्यापकों को ऐसी चीज़ों से भला क्या लेना-देना ?
निराला का मेरे लिए क्या अर्थ है इसे ज़्यादा तूल न देते हुए मैं सिर्फ अपनी तीन कविताओं  का हवाला देना चाहूँगा.एक का शीर्षक है सरोज-स्मृति जो एक अलग तरह की सरोज की अलग तरह की स्मृति है.यह अभी प्रकाशित नहीं हुई है.दूसरी है जो मार खा रोईं नहीं जो दो बच्चियों की उनके पिता द्वारा पिटाई को लेकर है और संग्रह सबकी आवाज़ के परदे में छपी है.तीसरी कूकर है जो खुद अपनी आँख से में संकलित है और जिसकी कुछ प्रासंगिक अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं :
कबीर निराला मुक्तिबोध के नाम का जाप आजकल शातिरों और जाहिलों में जारी है
उन पागल संतों के कहीं भी निकट न आता हुआ सिर्फ उनकी जूठन पर पला
छोटे मुँह इस बड़ी बात पर भी उनसे क्षमा माँगता हुआ
मैं हूँ उनके जूतों की निगरानी करने को अपने खून में
अपना धर्म समझता हुआ भूँकता हुआ.
निराला की और भी प्रकट-प्रच्छन्न उपस्थितियाँ मेरी कविताओं में होंगी और होती रहेंगी.उनकी एक कविता मेरे लिए बतौर कवि अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और मेरे और उसके बीच एक लंबा कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध चल रहा है. अपने गद्य में मुझे निराला का चमरौंधे वाला जुमला बहुत उपयोगी और मुफीद लगता है और उनका द्याखौ चुतिया कौ, हमहीं से पूछत है हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि कौन है तो अपनी नकली खीझ-भरी सैंस ऑफ़ ह्यूमर में अद्वितीय है और कभी-कभी मेरे काम आता है.
तो क्या जब केदारजी यह कहते हैं कि विष्णु खरे निराला को अपाठ्य मानता है तो वह एक अनुत्तरदायित्वपूर्ण,शरारती प्रलाप है ? नहीं. वह मयपरस्ती से पैदा हुई एक अतिरंजित स्मृतिभ्रष्ट गलतबयानी है.
मैं केदारजी को अपना मित्र समझने की मुँहचाटू गुस्ताखी तो नहीं कर सकता लेकिन हाँ, वे बहुत प्यारे इंसान हैं,मुझे बर्दाश्त कर लेते हैं और उनकी सोहबतों की सौगातें मुझे मिलती  रही  हैं .उनकी संगत बहुत पुरलुत्फ,जीवंत,शेर-ओ-सुखन व ज़बरदस्त सैंस ऑफ़ ह्यूमर से मालामाल होती और करती है.श्लेषों और ज़ूमानियत की आवाजाही  लगातार  बनी  रहती  है.वे बराहे मयपरस्ती खूब खुल भी लेते हैं.साक़ी,हमप्यालों और पैमानों  पर  एक ही गर्दिश रहती है कि केदारजी को जितना शौक़ मुँह की लगी हुई से है,उसके एक-दो कश के बाद ही वे एक उतने ही खूबसूरत सुरूर में दाखिल हो जाते हैं और दो-तीन के बाद तो, अल्लाह झूठ न बुलवाए,खुद पर एक क़लन्दराना हाल-नुमा तारी कर लेते हैं.फिर उन्हें या तो मौक़-ए-वारदात पर ही आरामफ़र्मा किया जाता है या किसी गुलगोथने,नींद में मुस्कुराते हुए नौज़ाईदा की मानिंद निहायत एहतियात से हाथों-हाथ उनके दौलतख़ाने ले जाया जाता है.अगली सुबह और उसके बाद उनकी कैफियत ‘इक याद रही इक भूल गये’ की रहती है.
बात कुछ वर्षों पहले शायद बिलासपुर,छत्तीसगढ़ की है.केदारजी और मैं एक साहित्यिक आयोजन में वहाँ आमंत्रित थे.रात जवान होते-होते होटल के कमरे में अदब और बादे का दोस्ताना इजलास शुरू हुआ और बात निराला तक पहुँची.जब ‘तुलसीदास और ‘राम की शक्ति-पूजा’ सरीखी उनकी कविताओं का चर्चा हुआ तो मेरा निवेदन यह था कि मैं निराला की ऐसी पुनरुत्थानवादी,वर्णाश्रमधर्मी,मृदु-हिन्दुत्ववादियों के द्वारा इस्तेमाल की जा सकने वाली रचनाओं को सराह नहीं सकता और उनके पाठ्यक्रमों में रखे जाने के सख्त खिलाफ़ हूँ.केदारजी का निराला की ऐसी कविताओं को लेकर अपने तरह का बचाव रहा होगा किन्तु मैं तब भी सिर्फ निराला ही नहीं,मैथिलीशरण गुप्त,जयशंकर प्रसाद और अन्य कवियों की ऐसी कविताओं का विरोधी था, अब भी हूँ और रहूँगा.उनकी ऐसी रचनाएँ,जो सौभाग्य से बहुत कम हैं, दुर्भाग्यपूर्ण हैं किन्तु वे तब भी हमारे महान और कालजयी कवि हैं.
मुझे हैरत इस बात की है कि बिलासपुर की उस पुरजोश शाम के बाद हालाँकि केदारजी से बीसियों बार तर-ओ-खुश्क मुलाकातें नसीब हुई हैं लेकिन उन्होंने कभी निराला का न तो ज़िक्र छेड़ा न उस सरसरी बहस को आगे बढ़ाया,उलटे वैसा एकतरफ़ा,बेबुनियाद और निराला (के लिए बहुत कम) व मेरे लिए (काफी) नुकसानदेह बयान दे डाला.यदि वह वैसा न करते तो मैं भी यह सब लिखने को मजबूर न होता.नामवर सिंह जैसे लबार यहाँ-वहाँ अनर्गल प्रलाप करते घूमते रहते हैं किन्तु उन्हें बरसों से कुछ चिरकुट-चेलों और प्रलेस के उनके मतिमंद क्रीतदासों के सिवा कोई गंभीरता से नहीं लेता.जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से संबद्ध होने के बावजूद केदारनाथ सिंह की सार्वजनिक प्रतिष्ठा अब भी बची हुई है और मुझ सरीखे लोग उनकी स्नेहिल कद्र भी करते हैं, लिहाज़ा उनसे उम्मीद और इल्तिज़ा की जाती है कि वे अतिरेक में ऐसी गैर-जिम्मेदाराना गलतबयानी से बचेंगे.

विष्णु खरे
(निराला का यह मशहूर चित्र प्रभु जोशी के ब्रश से)

Saturday, December 31, 2011

रघुवीर सहाय की एक कविता



औरत की ज़िंदगी
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कई कोठरियाँ थीं कतार में
उनमें किसी में एक औरत ले जाई गई
थोड़ी देर बाद उसका रोना सुनाई दिया

उसी रोने से हमें जाननी थी एक पूरी कथा
उसके बचपन से जवानी तक की कथा
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रघुवीर सहाय (९ दिसंबर १९२९-३० दिसंबर १९९०)
चित्र-  अंजलि इला मेनन की पेंटिंग

Friday, December 16, 2011

शिवांजलि की कवितायें


कंडीशंस अप्लाई
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अब भी
चौराहों पर बालक खड़े हैं
भूखे
अब भी घूंघट में मुखड़ा छिपाये
पनिहारिनें दूर तक जाती हैं
कोई पलक टकटकी लगाये
आज भी किसी की बाट जोहती है
आसमान का नीला फलक
आज भी
अपनी ओर उठने वाली नज़रों से
बिंध जाता है
आज जबकि `सब है` का दम भरते
बेदम पड़े कुछ आम
बिल्कुल चूस कर फेंक दिये गये हैं
चारों तरफ इश्तिहार
और नीचे छपा है-
कंडीशंस अप्लाई.



समय
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कुछ करूँ.
अब मेरी जड़ें खोखली होती जा रहीं
एक दाना भीख का
मुट्ठियों के शिकंजे में कसता
उस दाने की दरयाफ्त सुनूं
कि चरमराहट की आवाज के साथ
पिसते दानों पर
भूख का भार बढ़ रहा.
अब तो कुछ करूं
कि चमड़े की महक
भ्रम पैदा करती
निर्माण और उपभोग के बीच
वह भीतर ही भीतर सुराख बढ़ाती
पैबन्दों के
जड़ों में पड़ती पानी की पतली धार
कि उन सुराखों में
कि उन गलियों में
आँखों की नमी नहीं सूखती
उन भीख के दानों से भूख नहीं मिटती
बढ़ती है ज्वाला ओहदों की
फैले हुए हाथ
कसती मुट्ठियाँ
खोखली पड़ती जड़ें
और अपने रसूख से कटते लोग
दिखते हैं
बाज़ार पर बसर बनाये हुए.




गवाह
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सड़क के इस छोर से
उस छोर तक
पैबस्त जख्म
चुप्पी से सुन उनकी खामोश धड़कनें
ये हैं गवाह
अनगिनत गुजरते काफिलों के
लोग भूलते जाते
कि जिस पर होकर वे गुजरे थे
पर उनकी खामोश धड़कनें
अपने में समेट लेतीं
चुप रह सहतीं
अनगिनत पड़ते कोड़ों का दर्द
सड़कों पर पटकते
लाचारी वाले पैरों को महसूस कर
कभी उनकी झल्लाहट तो कभी उनकी बेबसी
का राग पढ़ते
पर कभी न सिमटते
न ही फैलते
जख्मों से रिसते
पानी का दर्द
कौन देखता?
सड़कों पर पड़े अलकतरे, मोरंग और बालुओं की तह में
पर कभी न सिमटते
न ही फैलते
जख्मों से रिसते पानी का दर्द
कौन देखता?
सड़कों पर पड़े
अलकतरे, मोरंग और बालुओं की तह में
पैबस्त जख्म
सबके गवाह.





चिथड़ों में लिपटे सुख का गीत
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सूखे हुए सरकंडे
तन कर खड़े हैं
गीत गाती बुलबुल रानी
दलदली भूमि पर खड़े
सरकंडों पर बैठी
निहार रही
अपने आसपास की
वीरान जिंदगियों को
बिखरे हुए झोपड़ों को
और वह निहार रही
नीले आसमान में फटे बादलों को
देख रही है-
माँ खुश है भूखी रह कर
बच्चों के पेट आज बाहर निकले हैं
वह गा रही है -
चिथड़ों में लिपटे सुख का गीत
वह प्रसन्न है
मज़दूरी मिली है
कई दिनों के बाद
चरमराती खाट पर आज
अंगड़ाइयां लेता मज़दूर
बुलबुल के गीत गा रहा है
बुलबुल सोच रही है -
आसमान के फटे बादल जुड़ेंगे
तो बारिश होगी.
 
गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोध छात्र शिवांजलि श्रीवास्तव की ये कवितायें
`दस्तक टाइम्स` पत्रिका में छपी हैं.



Friday, November 25, 2011

टीवी आत्मनियमन के सवाल : शिवप्रसाद जोशी


मार्कंडेय काटजू ने मीडिया से जुड़ी कमोबेश उसी क़िस्म की विचलित कर देने वाली बहस शुरू की है जो बड़े फलक पर और व्यापक कथित लोकतंत्रीय राजनीति समाज और जनअधिकारों पर लेखिका अरुंधति रॉय बहुत पहले से और बार बार उठाती रही हैं. ये अलग बात है कि मुख्यधारा के बौद्धिकों और कॉरपोरेट मीडिया के एक हिस्से में उन्हें काफ़िर की तरह देखा जाता है.
काटजू ने मीडिया ख़ासकर टीवी मीडिया के लिए जो आत्मनियमन की बात पर तीखे सवाल उठाए हैं, आखिर देश में उदारवाद के दो दशकों और टीवी के डेढ़ दशक से कुछ ज़्यादा के वक्त के बाद उनके जवाब तो दिए ही जाने चाहिए. मिलने ही चाहिए. काटजू के आक्षेपों पर आहत होने और मुंह बिसूरने और बुरा भला कहने और बौद्धिक झुरझुरी से झनझनाने की शायद ज़रूरत नहीं है. समाज को दिशा देने की अपनी कथित महानता के साए में किसी श्रेष्ठता ग्रंथि में फंस जाने की भी ये वक़्त नहीं है.
आत्मनियमन क्या होता है. किस चीज़ का आत्मनियमन. कहां से शुरू करेंगे कहां कहां करेंगे कहां तक जाएंगें. क्या टीवी मीडिया के अंदरूनी हालचाल की टोह लेने का भी वक़्त नहीं आ गया है. वहां किसी बाहरी व्यक्ति को झांकने देने का सवाल हटा दें क्या आत्मनियमन में आत्मनिरीक्षण भी आ रहा है. क्या अपना काम अपनी शैली अपना दफ्तर अपने कर्मचारी अपना स्टाफ़ अपने लोग भी इस निरीक्षण में दिख रहे हैं. आत्मनियमन की बहस को और आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
अब टीवी स्टुडियो में आत्मनियमन पर गाल बजाने का वक़्त भी नहीं रहा. चीज़ें बहुत तेज़ी से बदल रही हैं. टीवी मीडिया नया होता हुआ भी 16 साल में अजीब ज़िद और सनक का शिकार होता हुआ बुढ़ाता जा रहा है. ठीक सामने एक नया मीडिया उतर गया है. जो हमारा टीवी दिखाने से परहेज़ कर रहा है संकोच कर रहा है दबाव में है उसे नया मीडिया दिखा रहा है. वहां ऑडियो वीडियो और प्रिंट का एक नया पर्यावरण बन चुका है. केबल टीवी और मुद्रित शब्द जब थकान से भरे हैं तो वर्चुअल स्पेस में शब्द और दृश्य और वास्तविकता का एक नयी संवेदना एक नई थरथराहट बन रही है. वहां विखंडन और सृजन का द्वंद्व अपने कच्चेपन के साथ जारी है.
आत्मनियमन को टीवी न्यूज़ रूम के हालात से भी जोड़िए. एक बेहद मुश्किल समय वहां पत्रकारों का बीत रहा है. रोज़गार की विवशता ने टीवी मीडिया के कर्मचारी स्तर के पत्रकारों को एक क्रूर किस्म की विसंगति में डाल दिया है. तर्क विवशता दबाव आकर्षण और छंटनी की मिलीजुली घंटियां ख़तरा है- 24 घंटे यही बताती रहती हैं.
टीवी मीडिया के भीतर देखिए वर्चस्ववाद के कई प्रेत मंडरा रहे हैं. वहां कॉरपोरेट पूंजीवाद और मुनाफ़ावाद के अलावा सामंतवाद है. टीवी का एक सामंत कहता है कि वो सब कुछ जानता है आप लोग मूर्ख है नहीं पढ़ते नहीं जानते संविधान क़ानून नहीं जानते समाज और आंकड़ें नहीं जानते. वो चिल्लाता जाता है और पहले से भयभीत कर्मचारियों को डराता जाता है डराता जाता है. उन भय से भरे चेहरों को देखिए. वे बहुत सारे हैं.
कितनी आसानी से टीवी मीडिया के धुरंधर कही जाने वाली दिल्ली बिरादरी इसे भूल जाती है कि उसके मीडिया पर इधर जो छींटे आए हैं वे एक लंबे और गंभीर होमवर्क से निकले हैं. सिस्टम को सड़ांध से भरा हुआ देखना ही कि क्या हमारी नियति है. अरुधंति ज़रूरी मसलों पर जब कुछ कहती हैं तो बाजु भौंहे और कॉलर क्यों फड़फड़ाने लगते हैं. काटजू की टिप्पणियों पर इतनी बालनोचू क़िस्म की प्रतिक्रिया के क्या माने हैं. हुसैन तो सिर्फ़ चित्र बना रहे थे, उन्हें तक असहज कर बाहर धकेल दिया गया. वो एक लिहाज़ से निर्वसन और अफ़सोस में इस दुनिया से चले गए.   
अपने टीवी मीडिया की उपलब्धियों पर इतराने का भी ये वक़्त नहीं है. हमारे सामने बहुत सारे सवाल हैं. बहुत सारे लोग हैं. वे देश की अस्सी फ़ीसदी आबादी हैं. उनमें ग़रीब, वंचित, दलित, विस्थापित, अल्पसंख्यक आते हैं. वे देख रहे हैं. बाबाओं से मुक्ति पा लेने से ही, फ़िल्मी सितारों की जगमग को दिखाते रहने की आदतों से बाज़ आने को ही, अयोध्या फैसले पर संयमित रिपोर्टिंग करने को ही और भी कथित धैर्य दिखाने की आत्मनियमित कैटगरी वाली रिपोर्टिंग को आत्मनियमन नहीं कहते.
आत्मनियमन में बहुत सारी चीज़ें और आती हैं. आनी चाहिए. हम श्रेष्ठ हैं कहने के बजाय या इस भावना के तहत प्रतिक्रिया करने से बेहतर है ख़ुद को श्रेष्ठतर बनाना. प्रोफ़ेश्नल और नैतिक ऊंचाई, वैसी श्रेष्ठता. प्रेमचंद के नमक का दारोगा बन सकते हैं आत्मनियमन का दारोगा मत बनिए. मीडिया में ये थानेदारी बंद कीजिए. आप जिस टीवी लोकतंत्र की ओर इशारा कर रहे हैं बार बार- माफ़ कीजिए वो गढ़ा हुआ है और उससे क्रूरता की गंध आती है. मीडिया की जिस आज़ादी की रक्षा का परचम टीवी स्टुडियो में लहराया जा रहा है उसमें उस आज़ादी के निहितार्थ कोई तो देखेगा. ऐसा नहीं हो सकता कि अंदर हम अनैतिक खलबली मचाए रखें और बाहर वाले से कहें कि आप अपने मुंह और कान और आंख बंद रखें. मीडिया की नैतिकता को इस छद्म लोकतंत्र के कांच में ज़्यादा देर तक रखना नामुमकिन है. अच्छा- अब आप..हमें बताएंगें कि बापनुमा मानसिकता मत ढोइए. क्योंकि बहुत से मौक़े वाकए ऐसे हैं टीवी मीडिया के इतिहास में जब वही किया जाता रहा है जो कोई बताता है. वह आत्मनियमन का कोई मौक़ा इसलिए नहीं आने देता क्योंकि आत्मा पर उसका पहले से क़ब्ज़ा हो चुका होता है. इस आत्मा में विचार शक्ति तर्कशक्ति और इमोश्नल इंटेलिजेंस सब आते हैं. मीडिया को बौद्धिक और सामंती वर्चस्व का गिरवी नहीं रखा जा सकता. और जो अभी गिरवी हालात दिखते हैं उसमें आत्मनियमन कैसे करेंगे.   

Friday, November 18, 2011

दो अमरीकी कविताएँ







अभी नहीं

ज़रा धीरे, उन्होंने कहा.
इतनी जल्दी भी नहीं, वे बोले.
अभी नहीं.
इंतज़ार करो.

हम आपसे सहमत हैं, उन्होंने कहा, पर यह ठीक वक़्त
नहीं है.

दासता समाप्त करने के लिए.
नवीनतम युद्ध रोकने के लिए.
सही चीज़ करने के लिए.

अभी से इतनी आज़ादी दे देने से तो
अनर्थ हो जायेगा, वे कहते हैं. ज़रूरत है लोगों को सिखाने की
कि आज़ादी को कैसे बरता जाए.

हम पूछते हैं, वक़्त कब ठीक होगा?
कब होगी वह मुकम्मल स्थिति,
न ज्यादा कच्ची, न अधिक पकी?

और कैसे हमें पता चलेगा कि आ गया है वह सुनहरा क्षण
कहता हुआ, "लो, आखिर मैं आ ही गया, जिसके आने की भविष्यवाणी की गई थी
मैं वही हूँ. कानून और हथियारों के बल पर मेरा भरोसा दिलवाओ बेझिझक."

और हम अब तक यहाँ हैं, अपनी खाली कलाई घड़ियों को थपथपाते
उस फ्रीडम ट्रेन के लिए पटरियों पर यहाँ से वहाँ नज़र दौड़ते.
पटरियों से उतर गई होगी किसी वजह...

इस बीच, हमें किसी न किसी स्वर्ग की टिकटें
बेचने वाला, हमारे अपने इतिहास में प्रवेश के लिए
हमसे पैसे लेना वाला अमीर आदमी--
उसके लिए अभी क्या बजा है?

मज़े की बात है कि  उन घड़ियों पर
वक़्त हमेशा रुका हुआ होता है, या जा रहा होता है पीछे की ओर..

हमेशा वक़्त से बहुत पहले.
हमेशा वक़्त से बहुत बाद.

इब्तिदा का वक़्त हमेशा अभी होता है.



--रॉबर्ट एडवर्ड्स


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बड़ा आदमी, छोटा कुत्ता

शहर के व्यवसायिक इलाके में फुटपाथ पर
एक बहुत बड़ा आदमी एक बहुत छोटे कुत्ते को सैर करा रहा है
वह या तो पोस्ट ऑफिस जा रहा होगा या स्टोर से अचार का डिब्बा खरीदने
और इसी चक्कर में निबटा रहा है कुत्ते की आज की सैर

कसी हुई ज़ंजीर के एक तरफ वह छोटा कुत्ता है ऊर्जा और मुस्तैदी से भरपूर
कान खड़े, चुस्त, बड़े ध्यान से चारों ओर देखता
ज़ंजीर के दूसरे सिरे पर आदमी टहलते हुए परेशान सा लगा रहा है
उसकी  हवाइयन शर्ट फूली है उसकी तोंद से जो फुटपाथ को निहार रही है

शायद वह आदमी चरमराती अर्थव्यवस्था के बारे में सोच रहा है
या उसकी नौकरी छूट गई है शायद और वह सोच रहा है कि
कब तक उसे दूसरी नौकरी मिल पाएगी
और कैसे वह कुत्ते के लिए खाना खरीद पायेगा, कैसे किराया चुका पाएगा

या वह सोच रहा है मौसम के बारे में और यह कि क्यों कर
नवम्बर के आखिरी हफ्ते का यह दिन इतना गर्म है, धूप भी खिली है और न बारिश हुई है
जबकि हर हिसाब से इस दिन को होना चाहिए ठंडा, उदास और गीला
जब एक के बाद एक तूफ़ान नदी-नालों और तालाबों को भर देते हैं लबालब

यहाँ से पास ही जो खाड़ी है वहाँ लौटती हैं सैमन मछलियाँ हर बरस
और जहाँ स्थानीय लोग जाते हैं धारा में बहती मछलियों को देखने और वाहवाही करने
फेंक देते हैं अपने आप को प्रवाह के विरुद्ध
झरनों से और सीढ़ियों से

या हो सकता है कि वह मन ही मन हिसाब लगा रहा है  इराक़ और अफगानिस्तान में हुई मौतों का
हमारे मोबाइल फ़ोनों के लिए कांगो में जमा होती लाशों का
संभव है वह गाज़ा की भुखमरी के बारे में सोच रहा है
या नवाजो दादी-अम्माओं को महापर्वत से बेदखल किये जाने के बारे में

कुत्ता बेशक अर्थव्यवस्था और ग्लोबल वार्मिंग के बारे में नहीं जानता कुछ भी
वह नहीं जानता कब्जों और छद्म-युद्धों और बर्बर घेरेबंदियों और नरसंहारों के बारे में
पर उसे अंदाज़ा है कि कुछ गड़बड़ तो है जिसकी वजह से उसका मित्र तकलीफ में है
इसलिए बहुत छोटा कुत्ता बहुत बड़े आदमी को सैर करा रहा है
क्योंकि कुत्ता समझता है निराशा से हार न मानना कितना ज़रूरी है
कितना ज़रूरी है रोज़ घर से बाहर निकलना और खुली हवा का आनंद लेना
तथ्यों को सूंघ निकालना, खोद निकालना सच को, बड़े कुत्तों का सामना करना
और सारी दुनिया को यह बताना कि आप जिंदा हैं और भौंक रहे हैं

--बफ़ व्हिटमन-ब्रॅडली



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'शुक्रवार' (11 से 17 नवम्बर) से साभार, अंग्रेज़ी से अनुवाद: भारत  भूषण तिवारी