Wednesday, February 27, 2008

अमेरिका और हम

साथियो, फिदेल को लेकर आपका स्टैंड हौसला बढ़ाने वाला रहा। दरअसल हमारे राष्ट्रवादियों की राष्ट्रभक्ति ही यही है कि अमेरिका को कैसे-कैसे, कितनी बार सलाम बजाय जाए और अमेरिका के विरोधी को खास दुश्मन माना जाए। बाकी मध्यवर्ग का क्या हाल हुआ है, उसे असद जैदी की टिपण्णी में पढ़ा जा सकता है। मैं जिन दिनों करनाल था, वहां के एक पब्लिक स्कूल में कोई भाषण प्रतियोगिता थी। एक बच्चे ने मेरी मदद चाही और उसमें शुरुआत में इराक के सिलसिले में एक वाक्य में कुछ इस तरह था - खुले सांड की तरह रौंदता अमेरिका। इस बात को लेकर एक टीचर बेहद नाराज थीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका को गाली दी जा रही है और मैं ये बर्दाश्त नही कर सकती। ऐसे लोगों को भी फिदेल कास्त्रो में लाख खामियां नज़र आती हैं और अमेरिका की हर करतूत पर इन्हें नाज़ होता है। मुझे इस सिलसिले में दो बेहद दिलचस्प कवितायें याद आ रही हैं- एक मनमोहन की है और एक विष्णु नागर की, वक्त मिलते ही पोस्ट करूँगा।

2 comments:

Arun Aditya said...

donon kavitayen jaldi post karo.

परेश टोकेकर said...

कामरेड, असद जैदी साहब की टिप्पणी मध्यवर्ग की मनोवृत्ति का पर्दापाश करती है। आजका मध्यवर्ग 70-80 के दशक में किन्सीयनवादी समाजवाद के फल के रस का आस्वाद चख रहे मध्यवर्ग की ही संतान है जिसे 90 के दशक में भूमंळलीकरण के दौर की एसी हवा लगी की नयी सहस्त्राब्दी आते-आते वह साम्राज्यवाद का पिछलग्गू हो गया। ये विडंबना रही कि किन्सीयन नितीयो को देश में समाजवाद समझा जाता रहा वही सर्वहारा वर्ग इन किन्स के नाजायज संतानो के लिये अपना सबकुछ आज तक दाव पर लगा रहा है। यह भी विडंबना ही है कि आज के नव युवा वर्ग के लिये समस्त समस्याआे की जड भारत की समाजवादी नितीया है। मुझे तो याद नहीं पडता अब आप ही बताईये भारत ने कब समाजवादी नितीया अपनायी? उदारवाद की चकाचौंध में डूबा ये वर्ग अपने विचरण के लिये एक नयी ही दुनिया गढ रहा है, जिसमें मेंट्रो कल्चर है, नये नये गजेट्स है, मोबाईल है, सस्ती कारे है, महंगे फ्लेट्स है, बडे बडे पैकेज्स वाली नौकरीया है, नित नये उगते आध्यात्मिक गुरू है, उपर से धर्म के साथ राजनिती का घालमेल करने वाले आदर्शपात्र इनके दक्षिणपंथी नेता-बुद्धुजीवी है। सदियो तक दलितो के साथ अन्याय करने के बाद अब खुद को बेचारा निरूपित कर रहा यह तबका आजादी के सारे लाभ उठाने के बाद भी देश को ठेंगा दिखा एन आर आई बनने की फिराक में लगा रहता है। लाखो कमा रहे इस वर्ग का इसपर भी तुर्रा ये कि हमारे लिये अवसर कहा? तथाकथित अच्छे अवसरो की तलाश में "प्रतिभा पलायन" के लिये भारत में रहने वाली 80 प्रतिशत भूखी नंगी जनता तो जिम्मेदार कतई ही नहीं है इसके विपरीत प्रतिभा पलायन का प्रमुख कारण इंडिया में बसे युवाआे का डालरी लालच है। इस वर्ग का अपने ही देश की बहुसंख्यक आबादी के दुख दर्दो से भला क्या लेना देना। तो कुल मिलाकर यह है - भारत की लाश पर बैठ एन आर आई बनने के लिये बेकरार वर्ग की दास्ताने इंडिया।