Tuesday, September 29, 2015

वीरेन डंगवाल की याद कचोटती रहेगी : शिवप्रसाद जोशी


 
साठ के दशक के फ़ौरन बाद की हिंदी कविता के जिन कवियों का नई पीढ़ी से सबसे ज़्यादा नाता थाः वो त्रयी वीरेन डंगवाल, असद ज़ैदी और मंगलेश डबराल की रही है.

वीरेन ठिकानेदारों को ठिकाने लगाने वाले कवि थे. उन्होंने कई मतलबियों, नकलचियों और चतुरों के तेवर उतारे हैं. उनकी बातों में इतनी तीक्ष्णता और इतना पैनापन और इतना आवेग था.

हिंदी कविता में वो मोमेंटम के सबसे बड़े कवि थे. उनके न रहने से सबसे ज़्यादा नुकसान नई पीढ़ी को हुआ है.
अपनी बातों, अपनी कविता, अपनी सलाहों और अपनी झिड़कियों से वे एक पेड़ बन गए थे. उस पेड़ की छांह अब स्मृति में चली गई है.

वीरेन डंगवाल ने उत्तर भारत की हिंदी पत्रकारिता को भाषा और व्यक्ति दोनो दिए. उनके शागिर्दों का एक अभूतपूर्व फैलाव है. वे प्रिंट से लेकर टीवी और रेडियो तक बिखरे हुए हैं. उनमें से कई लोग अत्यन्त कामयाब जीवन में आए हैं और एक भव्य भविष्य की ओर उन्मुख हैं. वे भी आज वीरेन के न रहने पर निश्चित ही चुपके चुपके रो न भी रहे हों तो एक असहाय धक्के में आ गए होंगे. ये धक्का वे निकाल नहीं पाएंगें. ऐसी उपस्थिति की शर्त के साथ वीरेन ने अपनी शख़्सियत का जादू फैलाया था.

वीरेन लटकी हुई कथित उदासियों पर गुलेल खींच कर भौंचक करने वाले कवि पत्रकार थे. वो नकली नैराश्य के विरोधी थे और उन्होंने एक अपना मार्क्सवाद विकसित किया था. वीरेन की आवाज़ एक ऐसी नाव थी जो मुसीबत के मारों को किनारे छोड़ आती थी. फिर वो मुसीबत प्रेम करने वालों की हो या नौकरी के लिए दर दर भटकने वालों की या सामाजिक लड़ाइयों में इंतज़ार की.

इस तरह उन्होंने संघर्ष को एक लोकप्रिय विधा में बदल दिया.

उन्हें समझने वालों और उन्हें मानने वालों ने संघर्ष के पानी से प्यास बुझाई. ऐसा विवेक भरने वाले वीरेन डंगवाल, इसीलिए स्मृति को कचोटते रहेंगें.

Wednesday, January 14, 2015

पिथागोरस का प्रमेय - सब्ब बेद में बा : आशीष लाहिड़ी



(बांग्ला अखबार 'एई समय' में प्रकाशित आशीष लाहिड़ी के लेख का वरिष्ठ कवि व वैज्ञानिक लाल्टू का किया अनुवाद। आशीष लाहिड़ी नैशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्युज़ियम में विज्ञान के इतिहास के अध्यापक हैं)


वैज्ञानिक मेघनाद साहा कम उम्र में ही ताप-आधारित आयनीकरण की खोज 

कर दुनिया भर में प्रख्यात हो चुके थे। उनका मन हुआ कि बचपन के गाँव 

जाकर आम लोगों से बातचीत कर आएँ। एक बूढ़े वकील ने उनसे पूछा, 'बेटा,  

का खोजा है तुमने कि एतना नाम हो गया।' मेघनाद ने समझाने की कोशिश की 

कि सूरज के प्रकाश में रंगों का विश्लेषण कर वहाँ मौजूद या जो मौजूद नहीं हैं,
  
उन तत्वों को जानने का तरीका निकाला है। सुनकर उम्रदराज वकील साहब 

बोले, 'हँ:, इसमें नया का है, सब्ब बेद में बा।'

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद यह 'सब्ब बेद में बा' बात काफी फैल चुकी है। 

ताप-आधारित आयनीकरण की जगह पिथागोरस के प्रमेय या अंग 

ट्रांस्प्लांटेशन (गणेश इसके प्रमाण हैं) ने ले ली है। एन आर आई की ताकत के 

बल पर पहलवान बने बजरंगबली की पूँछ में तीन ''शालें धू-धू जल रही हैं
  
मनी, मैनेजमेंट, मीडिया। हाल में इस मशाल की लपटें विज्ञान महासभा तक 

धधक उठीं। भले लोग आतंकित हैं। पर अगर ऐसा नहीं होता तो क्या हिसाब 

ठीक रहता? पढ़े लिखे लोगों ने बीजेपी से इससे अलग और क्या अपेक्षा रखी 

थी? पिछली बार बीजेपी के सत्ता में आने पर विश्वविद्यालयों में ज्योतिष (हस्तरेखा)-

'विज्ञान' को अलग विषय मानकर पढ़ाना लगभग चालू ही हो गया था। नार्लिकर 

समेत दीगर वैज्ञानिकों ने विरोध जताया था। यह सब जानकर ही तो पढ़े लिखे 

लोगों ने बीजेपी को सत्ता दी है। तो फिर बंधु अब क्यों चीखो मम्मी, मम्मी...!'
 
सवाल प्रधानमंत्री या बीजेपी के आचरण का नहीं है। सवाल यह है कि लोग 

आज क्यों चौंक रहे हैं? इसमें बड़ी बेईमानी है। अगर बीजेपी सत्ता में नहीं भी 

होती, तो क्या देश के लोगों के बड़े हिस्से की, वैज्ञानिकों की भी, आस्था क्या 

ऐसी ही नहीं है? सब्ब बेद में होने की परंपरा तो आधुनिक हिंदू-चेतना में 

अमिट, अमर है। विद्यासागर ने 1853 में कहा था, 'भारत के पंडितों' के लिए 

वैज्ञानिक सच गौण हैं, गैरज़रूरी हैं, वे यह देखते हैं कि इस सच के साथ हिंदुओं 

के शास्त्रों के किसी विचार का सही या कल्पित मेल कितना है। अक्षय दत्त ने 

आजीवन ऐसे खयालों का विरोध करते हुए खुद को समाज से बहिष्कृत तक 

करवा लिया, पर क्या इससे किसी का विचार बदला? जी नहीं, अगर बदला 

होता तो विवेकानंद क्यों कहते कि न्यूटन के जन्म के एक हजार साल पहले ही 

हिंदुओं ने गुरुत्वाकर्षण की खोज कर ली थी। विवेकानंद के हमउम्र प्रकांड 

विद्वान योगेशचंद्र राय विद्यानिधि ने इसका विरोध करते हुए कहा था, 'कम 

जानकारी रखने वाले कुछ लोग भास्कराचार्य के कथन पेश कर न्यूटन के महत्व 

को कम करना चाहते हैं। उन्हें यह जानना चाहिए कि दोनों में ज़मीं आस्मान का 

फर्क है। मेघनाद साहा स्वभाव से तीखा लिखते थे, 'इस देश में कई लोग 

सोचते हैं कि ग्यारहवीं सदी में भास्कराचार्य गुरुत्वाकर्षण पर धुँधला सा कुछ 

कह गए तो वे न्यूटन के बराबर हो गए। और न्यूटन ने नया क्या किया है? पर ये 
  
'नीम हकीम खतरे जान' वाले श्रेणी के लोग भूल जाते हैं कि भास्कराचार्य ने 

कहीं यह नहीं कहा कि धरती और दीगर ग्रह सूरज के चारों ओर अंडाकार परिधि 

में घूम रहे हैं। उन्होंने कहीं यह सिद्ध नहीं किया कि गुरुत्वाकर्षण और गति के 

नियमों को जोड़कर धरती और दीगर ग्रहों के गति-कक्ष पता लगाए जा सकते 

हैं। इसलिए भास्कराचार्य या कोई हिंदू, ग्रीक या अरब केप्लर-गैलीलिओ या 

न्यूटन के बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोज चुके हैं, ऐसा कहना 

पागल का प्रलाप ही होगा। बदकिस्मती से इस मुल्क में ऐसे अंधविश्वास फैलाने 

वाले लोगों की कमी नहीं है, ये लोग सच के नाम पर महज खाँटी झूठ फैला रहे 

हैं।'





इससे हमारी निष्क्रिय चेतना पर कोई खरोंच पड़ी क्या? नहीं, अगर पड़ती तो 

हिग्स बोज़ोन की खोज के बाद देश के उच्च-शिक्षित लोग क्यों कह रहे थे कि 

अब भारत ने जो वेदांतिक सच खोजा था, वह सिद्ध हुआ।





1961 में रवींद्रनाथ की विज्ञान-चेतना की चर्चा करते हुए परिमल गोस्वामी ने 

लिखा था, 'प्राचीन भारत में सब कुछ ग्रामीण मान्यताओं पर आधारित था, इस 

देश में विज्ञान के आने के बाद कई पढ़े-लिखे लोगों में इसका असर दिखने 

लगा था।... बिना प्रमाण और तर्क के कई बार ऐसा कहा गया है कि आधुनिक 

यूरोपी विज्ञान असल में प्राचीन भारतीय विज्ञान के एक छोटे से हिस्से की खोज 

मात्र है। मेरे विचार में बंगाल में आधुनिक विज्ञान को पूरी आस्था के साथ 

स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति अक्षयकुमार दत्त थे। पर अकेले उनके प्रचार 

की औकात ही क्या कि वह नए उभरते घमंड के बनिस्बत तर्कशीलता की 

प्रतिष्ठा करे। रवींद्रनाथ के वक्त झूठे घमंड में बढ़ोतरी होती चली थी।' और 

इसके विरोध में रवींद्रनाथ ने वयंग्य के औजार की मदद ली थी। हेमंतबाला को 

लिखे अमर ख़तों में रवींद्रनाथ ने इस मूढ़ता की जम कर खिंचाई की थी। क्या 

उस तिरस्कार कोई असर हम पर पड़ा था? नहीं। किसी भी बात से हम पर 

कोई असर नहीं पड़ने वाला।


1891 में ज्योतिराव फुले ने लिखा था, 'कुछ साल पहले मराठी में लिखी एक 

पुस्तक में मैंने ब्राह्मणों के संस्कारों के असली रुप की पोल खोली थी।' उसी 

महाराष्ट्र में गणेश आगरकर ने लिखा था, 'इंसान के चमड़े के रंग से उसकी 

काबिलियत कैसे पहचानी जा सकती है? इस चतुर्वर्ण प्रथा को किसने शुरू 

किया? किस ने यह अतिवादी कथा चलाई कि ब्राह्मणों का जन्म 'समाजपुरुष'  

नामक किसी पुराणकल्पित आदमी के मुँह से और अछूतों का उसके पैर से 

जन्म हुआ? ऐसे अन्यायी शास्त्रों का विनाश हो।' विनाश हुआ क्या? नहीं। 

इसीलिए फुले-आगरकर की चेतावनी के सौ सालों से भी ज्यादा समय के बाद 

उसी महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी ताकतों के हाथों तर्कशील जनसेवक चिकित्सक 

नरेंद्र दाभोल्कर की मौत हुई। सनातन धर्म संस्था के सिद्धांतों के नेता डा.  

जयंत अठवले ने अपनी निजी मानविकता का ब्रांड दिखलाते हुए सार्वजनिक 

रूप से कहा, हत्यारे के हाथों मारा जाना दाभोलकर का कर्मफल है; अच्छा ही 

हुआ, डॉक्टर की छुरी सहकर, ऑपरेशन टेबल पर मरने से तो यह तो बेहतर 

है! उस प्रांत के कुछ वैज्ञानिकों के अलावा हममें से और किसी के सीने में कहीं 

कोई आग धधकी? नहीं धधकी। रोशनी नहीं चमकी।
 
हाँ, यह मानना पड़ेगा कि अंधविश्वास और अंधविश्वास मौसेरे भाई हैं। 

हिंदुत्ववादी सब्ब वेद में है कहकर जो हुंकार देते हैं, उसकी बिल्कुल एक जैसी 

प्रतिध्वनि पश्चिमी सीमा के पार सुनाई पड़ती है। बस 'बेद' की जगह वे 'कुरान'  

कहते हैं। पाकिस्तान के प्रसिद्ध नाभिकीय भौतिकी के माहिर परवेज हूदभाई ने 

इसके कुछ नमूने पेश किए हैं। जैसे 'इस्लामाबाद में विज्ञान सम्मेलन में एक 

जर्मन प्रतिनिधि ने कहा कि उन्होंने गणितीय टोपोलोजी का इस्तेमाल कर सिद्ध 

कर दिया है कि वे 'अल्लाह का कोण' माप सकते हैं। यह है पाई बटा n, जहाँ 

पाई का मान है 3.1415927... और n का मान अनिश्चित है। पाठक इस 

बात को मानने से इन्कार कर सकते हैं। सही है, ऐसा अजीब हिसाब किसी के 

दिमाग में कैसे आ सकता है? पर पाकिस्तान के विज्ञान और प्रौद्योगिकी 

मंत्रालय के इस्लामी विज्ञान सम्मेलन के संक्षिप्त विवरण-ग्रंथ (1983) के पृ

82 को देखिए। अगर देखें तो अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं कर पाएँगे। 

पाठक यह भी जान लेंगे कि इस पागल को पाकिस्तान सरकार ने निमंत्रण कर 

उसकी आवभगत का खर्च तक उठाया था। सवाल उठ सकता है कि इस 

आदमी को ईश निंदा के ज़ुर्म में क्यों नहीं पकड़ा गया? इसकी दो वजहें हैं। एक 

तो इस आदमी की ऊल-जलूल बातें (जो छपी हैं) ऐसी निरर्थक हैं, कि वह 

किसी के समझ नहीं आ सकतीं। दूसरी बात यह कि उस सभा में वे अकेले ऐसे 

पागल नहीं थे।' क्या मुंबई विज्ञान कॉंग्रेस की सभा में मौजूद विद्वान जन हूदभाई 

की इस पुरानी टिप्पणी से वक्त रहते कोई सीख ले पाए?

इसलिए, बीजेपी का काम बीजेपी कर रही है, इससे दुखी होने का नाटक करने 

से पहले, हे साधुजन, अपनी नज़र साफ करो।

Friday, January 2, 2015

बहुसंख्यकवाद, मास मीडिया और मारवा अमीर ख़ान का : शिवप्रसाद जोशी





सही तो है.. अमीर ख़ान ने जो गाया. जग बावरा. जग बावरा ही तो है. वरना ऐसी मूर्खताएं कहां नज़र आती. ऐसी हिंसाएं. ऐसा कपट ऐसी बेईमानियां.

जग बावरा सुनते हुए मुझे अहसास हुआ कि अरे अमीर ख़ान तो सदियों का हिसाब लिखने बैठ गए. और लिखते ही चले जाते हैं. धीरे धीरे. चुपके चुपके. ऐसा इतिहासकार विरल ही है. गाता संगीत है लेकिन सोचता समय है. अमीर ख़ान का मारवा समकालीन इतिहास का एक अलग ही स्वरूप हमारे सामने पेश करता है. ये एक नया मुज़ाहिरा है. है तो कुछ पुराना लेकिन ये सुने जाते हुए नया ही हो उठता है. समीचीन. समसामयिक. जैसे समकालीन साधारण इंसान का आर्तनाद.

अमीर ख़ान का मारवा जैसे एक एक कर सारे हिसाब बताता है. हमारी बुनियाद बताता है. हमारी करुणा. फिर हमारी नालायकी और बदमाशी के क़िस्से वहां फंसे हुए हैं. सारी अश्लीलताएं जैसे गिरती है और फिर आप सामने होते हैं. सच्चे हैं तो सच्चे, झूठे हैं तो झूठे. सोचिए क्या किसी के गा भर देने से ये संभव है.

लेकिन असल में ये गायन सिर्फ़ सांगीतिक दुर्लभता या विशिष्टता की मिसाल नहीं है, ये जीवन और कर्म और समाज के दूसरे पैमानों पर भी उतना ही खरा उतरता हुआ है. मिसाल के लिए मैं इसे जनसंचार के यूं नये उदित क्षेत्र में एक अध्ययन की तरह पढ़ता हूं. फ़्रेंच स्कूल की जो धारा ग्राम्शी से आगे बढ़ती है, मैं उसके हवाले से कहना चाहता हूं कि अमीर ख़ान उस स्कूल को न सिर्फ़ रिप्रेज़ेंट करते हैं बल्कि उनकी आवाज़ में आप नये वाम को समझने के तरीक़े भी विकसित कर सकते हैं.

वो स्थिर आवाज़, विचलित होती हुई, दाद से बेपरवाह लेकिन टिप्पणी करती हुई, अपने रास्ते के धुंधलेपन को आप ही साफ़ करती हुई, आगे बढ़ती हुई एक निश्चिंत लय में, एक निर्भीक स्पष्टता के हवाले से, एक निस्वार्थ कामना, एक ज़िद्दी धुन सरीखी है वो आवाज़ वो मारवा उनका.

अमीर ख़ान की आवाज़ एक साधारण औजी का ढोल है जो हमारे गांवों में बजाते हैं वे. औजी की अपनी कल्पनाशक्ति से निकला वो नाद ही अमीर ख़ान की आवाज़ में जाकर मिल जाता है. सोचिए तो इतना सिंपल गायन है वो. उसमें क्यों जटिलताएं देखनी. आप चाहें तो एक एक रेशा पढ़ सकते हैं उस गायन का. न चाहें तो भी फ़ितूर ही है. 
मैं अपनी नाकामियां ढूंढता हूं. और उन्हें दुरुस्त करने की कोशिश करता हूं. बहुत सारे लोग जो ब्लॉगों से, लिखने से, गाने से और चिंतन से दूर हैं वे भी सोचते होंगे, और आगे का सोचते होंगे. ऐसे भी तो होंगे जो उस आवाज़ में घुल जाते होंगे. उनको सलाम है.

आज के दौर में, जब बहुसंख्यक हिंसाएं हम पर आमादा हैं, दोस्तों, अमीर ख़ान का ये मारवा ही हिफ़ाज़त करेगा और तैयार करेगा. अपना ख़याल दुरुस्त रखने की बात है बस.

Tuesday, December 23, 2014

ज्योत्सना शर्मा की दो कविताएं


ज्योत्स्ना शर्मा (11 मार्च 1965-23 दिसंबर 2008) अपनी कुछ कविताओं के प्रकाशन के बावजूद हिंदी साहित्य की दुनिया में अनजाना नाम है। अनजाना की जगह उपेक्षित शब्द भी इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि उनकी जो कविताएं `अनुनाद` ब्लॉग, `संबोधन` और `जलसा` पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, वे एक रचनाकार को लेकर साहित्य के पाठकों और अन्वेषणकर्ताओं में चर्चा, जिज्ञासा और उन्हें और ज्यादा पढ़ने के लिए उनकी अप्रकाशित सामग्री की तलाश की भूख पैदा करने लायक तो हैं ही। लेकिन, इस वक़्त या कहें कि हमेशा ही जो हाल इस दुनिया का रहा है, उसमें ऐसा होना स्वाभाविक है। उपेक्षा की बात करें तो ज्योत्सना में खुद पत्रिकाओं में छपने या हिंदी साहित्य का हिस्सा बनने के प्रति गहरा उपेक्षा का भाव था। यह भाव उनमें शायद हर किस्म के ढांचों से था और अंततः इसका असर उनके अपने जीवन पर भी था। आज ही के दिन उन्होंने जैसा कि गहरी बेचैनियों में जीने वाले संवेदनशील मनुष्यों के साथ होता है, अचानक आत्महत्या का रास्ता चुन लिया था। उनकी स्मृति में उनकी  दो कविताएं, जो `जलसा` में प्रकाशित हो चुकी हैं-


ज्योत्सना की दो कविताएं
---------------------------------

लौटना

लौट चले कमेरे घर की ओर
                         भूख लिये साथ
प्रियजनों की यादें बिखरी बिखरी
जब चिडि़यों के बोल धीमे थे
जब लौटते थे बच्चे थके से
छाती थी पेड़ों पर काली गहराई
जब बकरियों के उदास रेवड़
लौटते थे बाड़ों में
अपने पीछे लिये खोये-खोये चरवाहों को
जब मच्छर निकलते थे भनभनाते
और दीवारों पर खिन्न छिपकलियाँ
जब जलती थी पुश्तैनी अंधेरे कमरों में
                            बल्ब की बीमार रोशनी
मैदान होने लगते थे अकेले
आसमान के गुलाबी सिरे पर
उठती थी अज़ान
                              डूबी डूबी।
..............



गुमनाम साहस

वयस्कों की दुनिया में बच्चा
और पुरूषों की दुनिया में स्त्री
अगर होते सिर्फ़ योद्धा
अगर होती ये धरती सिर्फ़ रणक्षेत्र
                     तो युद्ध भी और जीत भी
आसान होती किस क़दर;
लेकिन मरने का साहस लेकर
आते हैं बच्चे
और हारने का साहस लेकर
आती हैं स्त्रियां
ऐसा साहस जो गुमनाम है
ऐसा विचित्र साहस जो लील जाता है
                        समूचे व्यक्ति को

और कहते हैं वो जो मरा और हारा
                         कमज़ोर था
कि यही है भाग्य कीड़ों का;

ऐसी भी होती है एक शक्ति
उस छाती में जिसपर
हर रोज़ गुज़र जाती है
                              एक ओछी दुनिया।
--------

Sunday, October 5, 2014

रामचंद्र गुहा की प्रॉब्लम क्या है?


रामचंद्र गुहा के बेसिक्स में ही कोई प्रॉब्लम है या एक सधी हुई चतुरता। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के नागपुर भाषण को दूरदर्शन पर लाइव करने की आलोचना की। उन्होंने ट्वीट किया,`आरएसएस एक सांप्रदायिक हिंदू संगठन है। अगली बार मस्जिद के इमाम, चर्च के पादरी भी लाइव स्पीच दिखाने की बात करेंगे।'
गुहा पहली लाइन में जो बात बोल रहे हैं, अगली लाइन में उस बात को सिर के बल खड़ा कर देते हैं। आरएसएस एक साम्प्रदायिक हिंदू संगठन है, ठीक है। आगे इस लाइन का क्या मतलब है-`अगली बार मस्जिद के इमाम, चर्च के पादरी भी लाइव स्पीच दिखाने की बात करेंगे।` क्या गुहा मस्जिद और चर्च को साम्प्रदायिक संस्था मानते हैं या फिर आरएसएस को मंदिर? संघ तो खुद को किसी भी हिंदू धर्माचार्य या धार्मिक संस्था से ज्यादा आधिकारिक हिंदू घोषित करता ही है। उसने अपने धर्माचार्य औऱ धर्म संसद खड़ी की। साम्प्रदायिकता से असहमत धर्माचार्यों को खारिज किया। गुहा उसे इसी तरह मान्यता देते दिखाई देते हैं। गुहा जितना संघ पर हमला नहीं करते हैं, उससे ज्यादा मस्जिद, चर्च औऱ इमाम, पादरी को कठघरे में खड़ा कर संघ के एजेंडे पर मुहर लगाते हैं।
ऐसा भी नहीं है कि गुहा धर्म और उसकी संस्थाओं को सिरे से खारिज करने वाले, उन्हें ही साम्प्रदायिकता की जड़ मानने वाले और नास्तिकता में विश्वास रखने वाले विद्वान हैं। ऐसा होता भी तो भी संघ पर बात करते हुए मस्जिद-चर्च पर कूद पड़ना हैरान ही करता। एक अजीब तरीका यह रहा है कि जब संघ की साम्प्रदायिकता की बात करो तो हर हाल में किसी मुस्लिम औऱ चाहो तो ईसाई कट्टर संगठन की भी निंदा जरूर करो। यहां गुहा इस परंपरा से कई कदम आगे बढ़ गए हैं और संघ की आलोचना में एक लाइन बोलकर सीधे मस्जिद के इमाम और चर्च के पादरी को घसीट लेते हैं। गुहा जी बेफिक्र रहिए, इमाम और पादरी ऐसी कोई मांग नहीं करने जा रहे हैं, होने दीजिए भागवत को दूरदर्शन पर लाइव!

Sunday, September 28, 2014

14 साल जेल में रहे आमिर की आपबीती



मेरे पूर्वजों ने इस ज़मीन को, एक धर्म-निरपेक्ष देश को चुना, गांधी को अपनाया, और जिस मिट्टी में वे पैदा हुए उसी में हम दम तोड़ेंगे। ये शब्द हैं मोहम्मद आमिर ख़ान के जिन्होंने 18 से 32 साल के बीच की अपनी उम्र, यानी अपनी भरी जवानी के साल जेल में बिताए और 14 साल बाद बेगुनाही साबित होने पर कोर्ट के आदेश पर रिहाई हासिल की। रोहतक की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘सप्तरंग’ द्वारा 28 सितम्बर को शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस पर मानवाधिकारों को केन्द्र में रखते हुए आयोजित एक कार्यक्रम में मोहम्मद आमिर ख़ान ने अपनी आप-बीती 100 से अधिक उपस्थित लोगों के बीच सुनाई। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें सादा कपड़ों में पुलिस ने 20 फ़रवरी 1998 को 18 साल की उम्र में दिल्ली, रोहतक और गाज़ियाबाद के इलाकों में बम धमाके करने के नाम पर गिरफ़्तार कर लिया था। असल में तो यह कानूनन गिरफ़्तारी नहीं बल्कि अपहरण था क्योंकि उन्हें तो सड़क पर चलते हुए एक जिप्सी में धकेल कर डाल लिया गया और सात दिन तक तीसरे दर्जे की यातनाएँ देने तथा भयभीत हालत में कोरे कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाने के पश्चात अदालत में पेश किया गया था। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने पाकिस्तान जा कर बम बनाने का प्रशिक्षण लिया और फिर यहाँ आ कर बम धमाके किये। जब कि असलियत यह है कि जिन बम धमाकों का उन पर इलज़ाम लगा वे सब उन के पाकिस्तान जाने से 2 महीने पहले हो चुके थे। पाकिस्तान वे अपनी बहन से मिलने गए थे।
निर्दोष होते हुए भी उन्हें ही नहीं, उन के परिवार को भी बहुत कुछ झेलना पड़ा। पिता का छोटा-मोटा व्यापार ठप्प हो गया, माता-पिता कर्ज़ में डूबते चले गए,  अब्बा गुज़र गये और माँ को लकवा मार गया। माँ अब बोल भी नहीं सकतीं, और आमिर के कान ‘बेटा’ शब्द सुनने को तरस गये हैं। पुलिस द्वारा उन्हें ऐसे खतरनाक आतंकवादी के रूप में पेश किया गया कि अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार सब बेगाने हो गये थे, सब परछाई से दूर भागने लगे थे। लेकिन माँ-बाप का उन पर भरोसा था। इन्साफ़-पसन्द लोगों का सहारा मिला, कुछ वकीलों ने बिना फ़ीस का लिहाज़ किये मदद भी की। मानव अधिकार संगठन पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीस से सम्बद्ध वरिष्ठ वकील एन. डी. पंचोली ने केस सम्भाला तथा रोहतक से श्री राजेश शर्मा ने न्याय-मित्र के रूप में पैरवी की। अपने जीवन के 14 बेशकीमती साल जेल की सलाखों के पीछे गुज़ार कर 2012 में रिहाई हुई। 19 में से 17 मुकदमों में वे कोर्ट द्वारा बेकसूर साबित हो चुके हैं और 2 मामले अभी उच्च न्यायालय में लम्बित हैं।
आमिर ने बताया कि 16 साल पहले मिली यातनाएँ अब भी उन्हें चैन से सोने नहीं देतीं और रात में वे कई बार चीख़ कर उठ बैठते हैं। लेकिन उन की आप-बीती सुनने वाले हैरान थे कि उन्होंने इतना कुछ झेल लेने के बाद भी किस प्रकार बिना किसी कड़वाहट के, बिना किसी पर आक्रोशित हुए, नर्म आवाज़ में अपनी बात रखी। आमिर ने बताया कि उन्होंने अपनी सोच को हमेशा सकरात्मक ही रखा क्योंकि वे बेकसूर थे और उन्हें अपने मुल्क के संविधान में विश्वास था। उन्होंने बल दे कर यह बात कही कि उन के पूर्वजों ने इस ज़मीन को चुना, गांधी को अपनाया, एक धर्म-निरपेक्ष देश में रहना तय किया और जिस मिट्टी में वे पैदा हुए उसी में दम भी तोड़ेंगे। वे मानते हैं कि पूरा पुलिस विभाग तो बुरा नहीं है लेकिन कई हैं जो अपने काम को ईमानदारी से अंजाम नहीं देते और अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हैं। आमिर ने यह सवाल उठाया कि क्या आज का हमारा देश हमारे शहीदों के सपनों का देश बन पाया है जहाँ प्रत्येक नागरिक समानता के बीच सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सके?
जेल की अपनी यादें साझा करते हुए आमिर ने बताया कि किताबें और पेड़-पौधे जेल के उन के साथी रहे। ग्यारहवीं के बाद की अपनी पढ़ाई उन्होंने तिहाड़ जेल में रहते हुए इगनू के कोर्स के माध्यम से जारी रखी। गाज़ियाबाद जेल में रहते हुए उन्होंने गांधी जी पर आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में भाग लिया जिस में प्रदेश के अधिक नहीं तो 400 प्रतिभागी रहे होंगे और उन्हें इस में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। पिता की सलाह और हिदायत कि जेल में भी अच्छों में ही रहना और कोई अच्छा न मिले तो अकेले रहना का उन्होंने पालन किया और इस से उन्हें बहुत मदद मिली। रोहतक की जेल में गुज़रे अपने 6 महीनों को याद करते हुए उन्होंने यहाँ के लोगों की प्रशंसा की और बताया कि किस प्रकार साथी कैदी उन के साथ नर्मी से पेश आते थे।
जेल में कुरान, गीता और रामायण का अध्ययन करने वाले आमिर ने कहा कि उन के लिए तो मानवता ही सब से बड़ा धर्म है और गांधी उन के आदर्श हैं।
कार्यक्रम में आमिर की मदद करने वाले दिल्ली के वकील एवं पी.यू.सी.एल. (दिल्ली) के अध्यक्ष श्री एन.डी.पंचोली और रोहतक के वकील श्री राजेश शर्मा भी मौजूद थे। पंचोली साहब ने कहा कि अगर हमारे लोकतंत्र को सफल होना है तो हमें सामाजिक विषमताओं के विरोध में इकट्ठा होना होगा। कानून का शासन हमारे संविधान का आधार है और यह सवाल उठता है कि क्या हमारी पुलिस का व्यवहार संविधान के मुताबिक होता है? उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्यों 1981 से सिफ़ारिश किये गए पुलिस सुधार लागू नहीं किये जा रहे? पुलिस को निष्पक्षता से काम करना चाहिए लेकिन गैर-मुनासिब हस्तक्षेप के कारण यह नहीं हो पाता। पुलिस में सुधार तब ही हो सकता है जब नियुक्तियाँ सही ढंग से होंगी। आमिर के केस के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि यह अपनी तरह का अकेला मामला नहीं है। अनेक बेकसूर बिना किसी अपराध के साबित हुए, जेल में सड़ रहे हैं। इन में गरीब, बेसहारा, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की तादाद ज्यादा है। 
यह सवाल भी केंद्र में आया कि इस प्रकार के मामलों में सम्बद्ध अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती - और निर्दोष पाए गए व्यक्ति को अपना जीवन नए सिरे से शुरू करने के लिए सहायता क्यों नहीं दी जाती। झूठे केस लादने के लिये किसी की जिम्मेदारी तो तय होनी चाहिये।
रोहतक के वकील श्री राजेश शर्मा जो आमिर की रोहतक में कानूनी मदद कर रहे थे, भी बोले और उन्होंने कहा कि हमारे संविधान के मुताबिक हर इंसान तब तक बेकसूर है जब तक कि उस के विरुद्ध कोई जुर्म साबित न हो जाए। कोई भी व्यक्ति जिस पर केस चल रहा है, वित्तीय संसाधनों के अभाव में मुफ़्त कानूनी सलाह लेने का हकदार है। आमिर पर 2 केस रोहतक के थे जिन में उन्होंने उन की सहायता की। आमिर के विरुद्ध कोई सबूत नहीं था और वे बेकसूर साबित हुए। श्री राजेश शर्मा ने लीगल सर्विस अथॉरिटी एक्ट की जानकारियाँ भी साझा कीं।
‘सप्तरंग’ के प्रधान प्रिंसिपल (सेवानिवृत्त) महावीर शर्मा ने कार्यक्रम के अंत में सब का धन्यवाद किया और आमिर को इस बात पर बधाई दी कि उन्होंने इतना कुछ झेलने के बाद भी अपने मानवीय मूल्यों को नहीं त्यागा। साथ ही श्री एन.डी.पंचोली और श्री राजेश शर्मा का भी आभार प्रकट किया और कहा कि हमें ये सोचना होगा कि कैसे यह सुनिश्चित हो कि जो आमिर के साथ बीती है वह किसी के साथ न बीते। समता और भाईचारे के मूल्यबोध और एक संवेदनशील समाज के बिना जनतंत्र बेमानी है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आज इस आप-बीती को सुनने वाला हर व्यक्ति अपने स्तर पर और मिलजुल कर, दोनों तरीके से ऐसे प्रयास करेंगे कि हर किसी को न्याय मिले और किसी के साथ अन्याय न हो.
(सप्तरंग का प्रेस नोट)

कार्यक्रम संयोजक  प्रोफेसर राजेन्द्र चौधरी,                                                                               
 रमणीक मोहन, सचिव, ‘सप्तरंग'.

Saturday, September 6, 2014

शुभा की चार कविताएं


वरिष्ठ कवयित्री, लेखिका और एक्टिविस्ट शुभा का आज जन्मदिन है। इस मौके पर हम अपनी 60 साल की इस युवा साथी की चार कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं।
1
एक लम्बी दूरी
एक अधूरा काम
एक भ्रूण
ये सभी जगाते हैं कल्पना
कल्पना से
दूरी कम नहीं होती
काम पूरा नहीं होता
फिर भी दिखती है मंज़िल

दिखाई पड़ती है हंसती हुई
एक बच्ची रास्ते पर
***

2
हवा आधी है
आग आधी है
पानी आधा है
दुनिया आधी है
आधा-आधा नहीं
बीच से टूटा है
यह संसार बीच से टूटा है।
***

3
एक और एक
दो नहीं होते
एक और एक ग्यारह भी नहीं होते
क्योंकि एक नहीं है
एक के टुकड़े हैं
जिनसे एक भी नहीं बनता
इसे टूटना कहते हैं।
***

4
प्यासा आदमी
पानी को याद करता है
वह उसे पीना चाहता है

फिर प्यास बढ़ती है
तो वह उसे देखना चाहता है

और प्यास बढ़ती है
तो वह उसकी आवाज़ सुनना चाहता है

और प्यास बढ़ती है
तो वह अपने और पानी के बीच की दूरी देखने लगता है

और प्यास बढ़ती है तो वह
इस दूरी को एक रास्ते की तरह देखता है

और दूरी बढ़ती है
तो वह रास्ते को प्यार करने लगता है

और प्यास बढ़ती है
तो हर क्षण पानी भी उसके साथ रहने लगता है

लोग न उसके पानी को देखते हैं न उसकी प्यास को

ऐसा आदमी कभी-कभी गूंगा हो जाता है।
-----------